संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 41 : उसने कहा था // अशोक कुमार शुक्ला

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प्रविष्टि क्र. 41

उसने कहा था

अशोक कुमार शुक्ला


वह जमाना सामाजिकता का था। आस पड़ोस के लोग घंटों एक दूसरे के पास बैठा करते थे। यह तो याद नहीं कि कौन सा महीना था लेकिन इतना याद है कि किराये के जिस घर में हमारा परिवार रहता था उसके सामने क्यारी में गेंदा खूब खिला था। वो हमारे पड़ोस में ही रहती थी और सुबह-सुबह पूजा के लिये ताजे फूल तोड़ने उस क्यारी तक आती थी।
किसी का भी पौधों से फूल तोड़ना मुझे कभी नहीं सुहाया लेकिन उसे मैंने कभी इसके लिये टोका भी नहीं, यह अक्षरशः सच है। कहने को तो मैं पढाई करने के लिये सुबह उठ जाता था लेकिन सच्चाई यह है कि उठकर अपने कमरे का परदा कुछ इस तरह खिसका देता कि कमरे के अंदर अपनी चारपाई पर बैठे-बैठे ही मुझे फूलों की क्यारी नजर आती रहे।

आंख किताब में गड़ी होती लेकिन मन परदे सिलवटों के बीच खुली दरारों में झांक रहा होता जहां से वह क्यारी नजर आती थी। वह भी जब फूल लेने आती तो उसका ध्यान फूल तोड़ने से ज्यादा मेरे कमरे के दरवाजे पर टंगे परदे पर ज्यादा होता। मैं गौर करता कि वो कनखियों से मेरे कमरे के अंदर झांकने की कोशिश करा करती थी। कई सुबह तक यह सिलसिला चला तो एक शाम कुछ ऐसा संयोग बना कि वह अपनी मां के साथ मेरे घर पर ही दिख गयी। मांजी मेरी छोटी बहन बेबी के साथ वो लोग अपने कमरे में बैठे थे। मां के कमरे में पड़े दीवान पर चारों लोग बैठे थे। ठंढ से बचाव के लिये चारों ने अपने पांव पर एक कम्बल में डाल रखे थे। मैंने अवसर का लाभ उठाया और हाथ में चाय का प्याला पकड़े-पकड़े मैं भी उस कमरे में दाखिल हो गया। बहन बेबी और वो एक ओर बैठी थीं और मां और आन्टी एक ओर।

”आन्टी जी…! नमस्ते…!!” कहता हुआ मैं चालाकी से मां और उनके बीच दाखिल होकर वार्तालाप में शामिल हो गया। कुछ ही देर में मैंने भी उस कम्बल के भीतर अपने पांव पसार लिये। इस कवायद में अनायास ही मेरे पैर के अंगूठे का पोर सामने बैठी उनके पांव से छू गया। हालांकि मैंने ऐसा जानबूझ कर नहीं किया था लेकिन अनायास घटित इस घटना ने मन के तारों को झनझना दिया। मैंने अपने मन में सितार जैसा कुछ बजता हुआ सा अनुभव किया। सामने बैठी उनके चेहरे आंखों में कुछ पढ़ पाता इससे पहले ही छोटी बहन बेबी ने निश्छलता से टोक दिया-
”दद्दा जी…! पांव समेटकर ठीक से बैठिये ना। आपका पांव लगने से मुझे गुदगुदी हो रही है।”

मैं सकपका गया। तुरंत अपने पांव तो समेट लिये लेकिन मन को न समेट सका। उस शाम इसके बाद की बातचीत में मैं सामान्य न रह सका। अब मेरे अंदर उनकी ओर देखने का साहस भी नहीं बचा था। हालांकि ऐसा कोई अपराध नहीं हुआ था लेकिन जाने क्यूं मन ही मन अपराध-बोध अनुभव हो रहा था। शीघ्र ही मैं वहां से उठकर अपने कक्ष में आ गया और न जाने क्या सोचने लगा। मुझे याद है उस रात मैंने कुछ पंक्तियां लिखी थीं जिसमें स्वयं को राक्षस प्रदर्शित किया था। कुछ इस तरह –
”क्या मैं रक्तबीज हूं ?
मेरे मन की दुर्गा …!
बार-बार मार देती है मुझे
लेकिन फिर-फिर जीवित हो उठता हूं
अंतःस्थल में,
जबकि जानता हूं कि
इन ढेरों पुस्तकों में ही है
मेरे आराध्य
यही से खुलेगा मुक्ति का मार्ग …..आदि …..आदि….

मुझे ठीक से याद भी नहीं कि वो लोग कितनी देर तक वहां रूके ओर कब चले गये। जैसे वह रात भी मेरे लिये सामान्य रात जैसी नहीं थी ठीक इसी तरह अगली सुबह भी सामान्य सुबह नहीं थी। उस सुबह मैं मन को दृढ़ंता से रोका और सामान्य दिनो की तरह उठकर कमरे के दरवाजे पर टंगे परदों को हलका सा खिसका कर उसकी सिलवटों के बीच वह झिरी जैसी नहीं बनायी जैसी प्रत्येक सुबह बनाता था और आंख किताब में आंख गडाने का उपक्रम करते हुये कनखियों से परदे की सिलवटों के बीच खुली दरारों में झांक रहा होता जहां से गेंदे के फूल वाली वह क्यारी नजर आती थी।
उस सुबह वह जब फूल लेने आयी तो मेरे कमरे के दरवाजे पर टंगे परदों को नयी मुद्रा में देखकर जरूर उसके मन को खटका हुआ होगा तभी तो उसके कदम क्यारी की सीमा लांधकर बरामदा पार कर परदे के पास तक आ पहुंचे थे। वहां पर पहुंच कर कुछ सोचकर ठिठकी और बोली-
”क्या अभी तक सो रहे हो भाई जी ?”
उसका यह कदम मेरे लिये अप्रत्याशित था। मैंने इस दृष्य की कल्पना सपने में भी नहीं की थी सो हड़बडाया सकपका सा मैं क्या जवाब देता। जुबान ने अपना काम अनायास किया और स्वतःस्फूर्त प्रतिउत्तर निकल गया –
”नहीं… नहीं… उठ गया हूं और पढ़ रहा हूं । तुम यहां कैसे?”
वह शायद पूर्ण सोच विचार के बाद मेरे कक्ष के पास तक आयी थी इसलिये मेरे आमंत्रण की प्रतीक्षा किये बिना ही उसने परदे की सिलवटों के एक सिरे को अपने एक हाथ से हटाया और दूसरे हाथ में गेंदे के फूल पकड़े पकड़े वह कक्ष के भीतर दाखिल हो गयी। मैं तो जैसे विचारशून्य और जड़ हो गया।
”…ब ….ब…. बै…..बैठो…..!” से इतर कुछ न कह सका। बगल में सो रहे छोटे भाई मनोज की ओर इशारा करते हुये उसने पुनः पूछा –
”मनोज भैया नहीं उठे अभी तक ? ये कब उठते हैं?”


मैंने उसके प्रश्नों के औपचारिक उत्तर दिये लेकिन अपनी मनःस्थित सामान्य न कर सका। कुछ सेकेन्ड वहां रूकने के बाद शायद वह मेरा संकोच और मनःस्थिति को भॉप गयी तो बोली-
”एक बात बताओ ? कल शाम कम्बल के भीतर तुमने जानबूझ कर मेरी ओर पांव बढाये थे ना? ”
मुझे काटो तो खून नहीं रहा। इस तरह की स्थिति और ऐसे प्रश्न की मैंने कभी कल्पना ही नहीं की थी। मैं चुप रहा कुछ न बोला। उसने एक बार फिर पूछा- ”बताओ ना ….! ”
इस बार का उसका बताओ ‘ना’ कहने का अंदाज इतना अनोखा था और उसमें भी ‘ना’ शब्द के साथ उसकी गर्दन की लचक…., और आग्रह…., किसी को भी अभिभूत कर सकता था। इसके बावजूद मैं जड़ ही बना रहा और कुछ नही बोला । वह स्वयं मेरी पढाई की मेज टटोलने लगी तो राइटिंग पैड के उपर फंसा कागज का वह टुकडा उसकी नजर में आ गया जिस पर लिखा था –
”क्या मैं रक्तबीज हूं ?
मेरे मन की दुर्गा …!
बार-बार मार देती है मुझे
लेकिन फिर फिर जीवित हो उठता हूं
अंतःस्थल में,
क्या मैं रक्तबीज हूं ?
………..”
उसने झट से पैड से वह कागज निकाल लिया और समेटकर अपनी कुर्ती के भीतर कर लिया। और तुरंत अपने हाथ से मेरे सिर पर थपकी जैसी मार कर बोली-
”तुम पागल हो …! मनोज को जगाते क्यों नहीं ? आखिर कब तक सोयेगें ये महाशय?”
फिर बिजली जैसी तेजी से उस कमरे से बाहर निकल गयी। यह सब घटनाक्रम इतनी तेजी से घटित हुआ कि मुझे संभलने का मौका ही नहीं मिला। मैं तो अब अपने सिर पर दी गयी उसकी थाप के आनन्दातिरेक में था और यह पंक्तियां लिखते हुये आज भी सोच रहा हूं कि #उसने_कहा_था –
”तुम पागल हो …!”

अशोक कुमार शुक्ला

संर्पक सूत्रः- तपस्या, 2-614,सेक्टरएच,जानकीपुरम् , लखनऊ(उ0प्र0) पिन-226021

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