व्यंग्य // टोपी से सूट-बूट तक // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

image

टोपी पहने हुए गांधी जी की हमें बहुत कम तस्वीरें देखने को मिलती हैं लेकिन ‘गांधी टोपी’ एक ज़माने में बड़ी मशहूर हुई थी। हर स्वतंत्रता सेनानी और हर कांग्रेसी की पोशाक का यह एक ज़रूरी हिस्सा बन गई थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद गांधी टोपी पहनकर लोग भ्रष्टाचार में लिप्त हो गए। गांधी जी की झक सफ़ेद टोपी गन्दला गई। बदनाम हो गई। गांधी टोपी का दबदबा फिर भी कायम रहा। अन्य राजनैतिक दलों ने टोपी तो अपना ली लेकिन सफ़ेद की बजाय उसे रंगीन कर लिया। किसी पार्टी ने काले रंग की टोपी पसंद की तो किसी ने लाल रंग की। बहरहाल राजनीति में टोपी शिरकत करती रही, और आज भी रूप बदल बदलकर कर ही रही है।

पंडित नेहरू ‘गांधी टोपी’ तो लगाते ही थे, लेकिन उनकी वास्कट ने भी खूब नाम कमाया। वह उन्हीं के नाम से ‘नेहरू वास्कट’ कहलाने लगी। नेहरू वास्कट कहें, या कहें, ‘जेकेट’, बात एक ही है और इसे आज भी खूब पहना जाता है। पर वास्कट किसी एक पार्टी से बंधकर कभी नहीं रही। ‘वास्कट’ मोदी जी भी पहनते हैं और (‘जेकेट’) राहुल गांधी भी पहनते हैं। ‘वेस्ट-कोट’ आम तौर से पहने जाने वाला वो परिधान है जिसे भारत में आम आदमी अपनी भाषा में “वास्कट” कहता है। अंग्रेज़ी में यही जेकेट है।

गांधी-टोपी और नेहरू-वास्कट के बाद जिसने भारतीय राजनीति में अपनी जगह सुरक्षित कर ली वह है, ‘मोदी कुर्ता’। आधे बाजू का यह कुर्ता अपेक्षाकृत लम्बाई में भी थोड़ा छोटा होता है। गांधी और मोदी के प्रदेश गुजरात में खूब पहना जाता है। इसी कुरते को पहन कर मोदी जी प्रधान-मंत्री के पद पर रहते हुए देश-विदेश के चक्कर लगा आए हैं और अनजाने ही यह एक फैशन की वस्तु बन गया है। यह एक ऐसा, अंग्रेज़ी में कहें तो, “स्टाइल स्टेटमेंट” हो गया है जिसमें शान और सादगी का संवाद है। मोदी जी अपने आरंभिक गरीबी के दिनों में अपने कपडे खुद ही धोते थे। वे बताते हैं की उन दिनों उन्हें कुरते के इस लघुकाय संस्करण को धोने में अधिक कठिनाई नहीं होती थी सो इसीलिए इसे उन्होंने अपना लिया। वजह कोई भी हो वह इतनी महत्त्व पूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण यह है की वे इसे आजतक अपनाए हुए हैं और इसी कारण यह अब एक आम और साधारण पहनावा नहीं रहा। सामान्य से विशिष्ट बन गया। एक फैशनेबल परिधान बन गया।

कुर्ता एक और भी है। यह गेरुए-रंग का लंबा कुर्ता है जिसे उत्तर-प्रदेश के मुख्य-मंत्री योगी जी पहनते हैं। योगी-कट इस कुरते ने अपनी धाक न केवल राजनीति में जमा ली है बल्कि उत्तर-प्रदेश में यह एक “फैशन आईकन” की तरह उभरा है। योगी जी तो ठहरे योगी। मठावास छोड़ कर वे कठिन राजनैतिक साधना साध रहे हैं, लेकिन उनके ढीले-ढाले गेरुए कुरते ने इस अवसर को खूब भुनाया और वह अब फैशन के मारे युवकों के सर पर चढ़ कर बोल रहा है। अभी हाल ही में एक खबर आई थी कि एक लडके ने अपनी शादी इसी तरह का एक गेरुए रंग का कुर्ता धारण करके रचाई थी। ...विवाहोपरांत उसकी पत्नी ने पूछा, शादी में यह जोगियों की तरह का गेरुए रंग का कुरता क्यों पहना था ? बोला, जब हमारे मुख्यमंत्री जी गेरुए रंग का कुर्ता पहन कर राजनीति कर सकते हैं तो क्या मैं गेरुआ कुर्ता पहन कर शादी भी नहीं कर सकता !

भारतीय राजनीति में वर्तमान काल “कॉस्टयूम-काल” कहा जा सकता है। राजनैतिक दल एक दूसरे के कपड़ों पर राजनीति कर रहे हैं। राहुल गांधी ने एक नारा उछाल दिया है। “सूट-बूट की सरकार”। वे मोदी सरकार को सूट-बूट की सरकार ही कहते हैं कि जो गरीबों की पक्षधर नहीं है और जिसका प्रधान-मंत्री दो करोड़ का सूट पहनता है। ऐसा लगता है, राहुल गांधी ने ३०-३५ साल पुरानी एक फिल्म (किशन कन्हैया) के गाने में नई जान डाल दी है। गाने का मुखड़ा कुछ इस प्रकार है –

सूट-बूट में आया कन्हैया बैंड बजाने को

नए गीत पर नाच नचाने नए ज़माने को

जहां क्रिया है वहां प्रतिक्रिया हो कर रहती है। सो मोदी सरकार को सूट-बूट की सरकार बताना बताने वाले को भारी पड़ गया। किसी ने कहा ‘लूट-पाट की सरकार’ से तो सूट-बूट की सरकार ही बेहतर है। कोई बोला, मोदी सरकार भले ही सूट-बूट की सरकार हो पर ‘सूट-केस की सरकार’ नहीं है। किसी ने राय दी कि मोदी सरकार वस्तुत: सूट-बूट की नहीं, “सूझ बूझ की सरकार” है। एक ने तो यहाँ तक कह दिया कि मोदी सरकार ‘बूटेड’ भले हो कांग्रेस की तरह ‘बूटेड-आउट’ नहीं है।

कांग्रेस प्रेसीडेंट ने मेघालय में किसी सभा में एक कीमती जाकेट पहनी हुई थी। लोगों ने अंदाज़ लगाया कि वह लगभग १० हज़ार की रही होगी। लोगों ने पूछा, १० हज़ार की जाकेट पहनने वाले को आखिर सूट-बूट पर इतना एतराज़ क्योंकर होना चाहिए ? कोई जवाब नहीं बन पड़ा। सफाई दी गई कि वह जेकेट खरीदी नहीं गई थी, उधार की थी !

क्या आपने कभी किसी किसान को सूट-बूट पहन कर खेती करते देखा है ? शायद नहीं, क्योंकि भारत में किसान अधिकतर धोती कुर्ता पहन कर ही खेती करता है। जापान में भी किसान सादा कपड़ों में ही रहते हैं। लेकिन अभी कुछ महीने पहले ही खबर मिली है कि वहां कैंगो में रहने वाले कियोटो साइटो नामक एक व्यक्ति ऐसे किसान हैं जो सूट-बूट पहन कर खेती करते हैं। अपने इस अंदाज़ से वे दुनिया भर में मशहूर हो गए हैं। उनका कहना है कि वे किसानों के प्रति लोगों की सोच और उनका नज़रिया बदलना चाहते हैं। मोदी जी भी तो यही चाहते हैं। हमारे वित्त मंत्री ने इस बार किसानों के पक्ष में एक ऐसा बजट पेश किया है की वह भी किसानों से सम्बंधित हमारा सोच और नज़रिया बदल देगा। क्या पता हिन्दुस्तान के किसान भी आगे से सूट-बूट पहन कर हल जोतने लगें।

मोदी जी के सफाई अभियान का भी कोई कम असर नहीं हुआ है। आलम यह है कि एक ७९ वर्षीय सूटेड-बूटेड बुज़ुर्ग अपना जन्म दिन मनाने जब इंडिया गेट पहुंचे तो वहां उन्होंने गंदगी का अम्बार देखा। मन ही मन बहुत दुखी हुए। जुट गए सफाई करने में। आजकल वे रोज़ हस्ब-मामूल सूट-बूट धारण किए सुबह इंडिया गेट तक टहलते आते हैं। उनकी कमर भले ही थोड़ी झुक गई हो लेकिन अपनी कमर पर हाथ रखे वे वहां रोजाना कचरा बीनने देखे जा सकते हैं। अन्य टहलार्थी इसके गवाह हैं।

कहा न, गांधी-टोपी, जवाहर-जैकेट और यहाँ तक कि मोदी कुरते को भी पीछे छोड़ कर भारत में आजकल सूट-बूट प्रधान “कॉस्ट्यूम-काल” चल रहा है। जय हो।

-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

0 टिप्पणी "व्यंग्य // टोपी से सूट-बूट तक // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.