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लघुकथा // जीवन साध // योगेश किनकर

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गुलाबी ठण्ड दस्तक देने लगी थी, तड़के सैर को निकलने वाले अब थोड़ी देर से निकले लगे थे। लेकिन शर्माजी और उनकी धर्म पत्नी अपने नियोजित समय पर प्रातः भ्रमण पर निकल आए। पिछले 40 सालों का यह अनवरत् सिलसिला यदा कदा ही भंग हुआ अन्यथा कोई भी परिस्थिति इस सिलसिले को रोक नहीं पाई। शर्मा जी रेल्वे विभाग से सेवानिवृत्त हुए और अब अपने गृह नगर सीहोर में अपनी धर्मपत्नी के साथ रहते हैं । दो बेटों और एक बेटी की शादी कर दी और वे सब अपने परिवार के साथ खुश है। बड़ा बेटा राजेश बैंक में मैनेजर है और इंदौर में रहता है, बेटी विनीता की शादी एक अच्छे प्रतिष्ठित परिवार में हुई है और दामाद ऊँचे ओहदे पर है। और छोटे बेटे विनय का भोपाल में कपड़ों का शोरूम है। सब अपने पैरों पर खड़े है और अपनी जिन्दगी में मस्त है।

शर्मा जी ने अपनी पूरी जिन्दगी सच्चाई एवं मेहनत से अपने कर्तव्यों का पालन करने में बिताई एवं अपने बच्चों में भी इन गुणों का विकास किया। दोनों बेटों ने कितनी बार उन लोगों से अपने पास ही रहने की जिद की लेकिन दोनों पति-पत्नी कुछ दिन उनके पास रहकर वापस लौट आते। उन्होंने जमीन-जायदाद और रूपयों-पैसों का बंटवारा अपने बच्चों में कर दिया था लेकिन अभी भी एक बैंक खाता संयुक्त रूप से दोनों के नाम था। उन्हें अपनी जरूरतों के लिए बार-बार अपने बेटों के आगे हाथ न पसारना पड़े इसीलिए उन्होंने कुछ रकम अपने पास रखी थी। इसके अलावा उनका एक पैतृक घर था।

श्रीमती जी हमेशा उनसे कहती की सब बेच-बांच कर अपने छोटे बेटे के पास रहने चले लेकिन शर्माजी हमेशा हँस कर टाल जाते। लेकिन एक बार बहुत जोर देने पर उन्होंने अपनी पत्नी को समझाया, “ लता ! मैंने अपनी पूरी जिन्दगी सच्चाई और ईमानदारी से बिताई कभी लोगों को अपनी खुद्दारी पर उॅंगली उठाने का मौका नहीं दिया। जिन्दगी की इस संध्या बेला में भी मैं पूरी खुद्दारी से इन पलों को उन्मुक्त हो कर जीना चाहता हूँ। बुढ़ापे और बचपन में काफी हद तक समानता होती है, बचपन में इन्सान हर एक नई चीज को पाने की हसरत करता है और उन्मुक्त होकर जीता है। इसी तरह बुढ़ापे में भी इन्सान का मन हर हसरतों एवं इच्छाओं को पूरा करने के लिए मचलता है और मैं नहीं चाहता कि अपनी इन इच्छाओं को पूरा करने के लिए हमें बार-बार अपने बच्चों से मांगने में झिझक महसूस हो। मैं जानता हूँ कि हमारे बच्चे हमें बहुत प्यार करते हैं और हमारी सभी इच्छाओं को पूरा करने के लिए तत्पर रहते हैं लेकिन फिर भी जिन्दगी की इस सांध्य बेला को मैं तुम्हारे साथ बचपन-सी उन्मुक्तता के झूलें पर बिताना चाहता हूँ और यही मेरी जीवन साध है।“ श्रीमती जी को आज अपने सवाल का जवाब मिल गया था और वह मधुर नयनों से अपने पतिदेव को निहार रही थी।

योगेश किनकर

सारनी, जिला-बैतूल (म.प्र.)

e-mail – ykinkar1987@gmail.com

लघुकथा 419590077719571661

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