मिर्ची का मज़ा // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा


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मेरे पत्रकार मित्र बता रहे थे कि जिसे हम ‘समाचार’ कहते हैं वह वस्तुत: सम+आचार नहीं होता। अखबारों में छपने वाले समाचार, आचार-व्यवहार के वे ‘अपवाद’ होते हैं, जो सामान्यत: घटित नहीं होते। उदाहरण के लिए अधिकतर पति-पत्नी प्रेम-पूर्वक सुखी जीवन बिताते हैं। विवाह-विच्छेद अपवाद स्वरूप ही होता है। लेकिन हमारा ध्यान तो इन अपवादों पर ही जाता है और वे ही समाचार पत्रों के समाचार बनते हैं। इन समाज के अपवादों को और भी आकर्षक बनाने के लिए, या कहें चटपटा करने के लिए, हम पत्रकार इनमें थोड़ा मिर्च मसाला डाल कर इन्हें “समाचार-कथा” (न्यूज़- स्टोरी) बना देते हैं। आप तो जानते ही हैं,समाचार रस लेकर पढ़े जाएं, इसलिए उनमें थोड़ा मिर्च-मसाला डाला जाना ज़रूरी हो जाता है।

ज़ाहिर है मिर्च मसाले का यह एक व्यंजनात्मक भाषाई-प्रयोग है। मिर्च-मसाले का वास्तविक उपयोग तो खाने-पीने की वस्तुओं को चटपटा बनाने के लिए ही किया जाता है और हम भारतवासी इसके लिए बदनाम हैं। यह बात दूसरी है कि मिर्च-मसाला खाने को तो मजेदार बनाता ही है लेकिन बात भी सीधी-सपाट सुनना कौन पसंद करता है ? बातों में भी तो मिर्च का तड़का लगाना ज़रूरी हो जाता है।

अंतर राष्ट्रीय बाज़ार में भारत के मिर्च मसालों की मांग सर्वाधिक है। हर साल यह ५-६ % बढ़ती ही जा रही है। मसालों में सर्वाधिक मांग भी मिर्च की ही रहती है। ‘मिर्च-मसाले’ में मिर्च सर्वोपरि है। वह मसाला क्या जिसमें मिर्च न हो ! पीली, लाल. हरी, काली – मिर्च कई रंग की, कई तरह की, होती है। कोई कम कोई ज्यादह तीखी होती है। पर वह मिर्च क्या जिसमें ‘मिर्च’ न हो। हरी ताज़ी मिर्च को तो, यदि वह बहुत तीखी न हो हम कुतर कुतर कर भी खा जाते हैं। आदमी क्या, तोता भी इसे शौक़ से कुतरकर खाता है। तोते व आदमी में यह एक ज़बरदस्त समानता है जिसे अधिकतर, न जाने क्यों, अनदेखा कर दिया जाता है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि तोता-चश्म आदमी तोता-कुतर भी होता है।

सब्जियों में तो मिर्च पड़ती ही है, मिर्च की सब्जी भी बनती है। जिसे शिमला मिर्च कहते हैं, बहुत तीखी नहीं होती और आकार में भी बड़ी होती है। इसकी भरवां सब्जी बनाई जाती है। भूटान में तो लोग खाने में मसाले के तौर पर नहीं बल्कि सब्जी की तरह ही मिर्च का सेवन करते है। चीज़ और लाल मिर्च की सब्जी यहाँ हर होटल में मिल सकती है। यहाँ छोटे छोटे बच्चों को माँ-बाप बचपन से ही मिर्ची चटा देते हैं।

मिर्च का वास्तविक स्वाद किसी को पता नहीं है। मिर्च में मिर्च होती है। ‘मिर्ची’ ही उसका स्वाद है। यों मिर्च के स्वाद का वर्णन कई तरह से किया गया है। मिर्च चरपरी होती है, मिर्च तेज़ होती है, मिर्च तीखी होती है, मिर्च कड़वी होती है, इत्यादि। अंग्रेज़ी में मिर्च के स्वाद को ‘गरम’ कहा गया है। (It’s hot)। हमारे यहाँ भी गरम-मसाला ‘गरम’ इसलिए कहा जाता है कि उसमे मिर्च, लौंग, तेजपात जैसी तीखी चीजें पड़ती हैं।

कई लोंगों का मिज़ाज भी काफी गरम होता है। द्वेष, डाह, ईर्ष्या आदि भावनाएं मनुष्य के स्वभाव में तेज़ी और चरपराहट लाती हैं। क्रोध करने वाले व्यक्ति को गरम मिज़ाज का व्यक्ति कहा जाता है। क्या मिज़ाज की यह गरमी मिर्च के सेवन से आती है ? पता नहीं। लेकिन एक लोक-गीत में एक स्त्री अपने पति के खाने में हरी मिर्च डालने को इसलिए कतराती है क्योंकि उसका विश्वास है कि तीखी हरी मिर्च खाने से पति का क्रोध और भी बढ़ सकता है –

हरी मिर्चततैया ज़ालिम ना डालूँ रे

देखा तुम्हारा गुस्सा

मेरे बच्चे बिगड़ गए, हाय दैया रे

कुछ भी कहें बोरियत भरी ज़िंदगी में मिर्च का अपना महत्त्व होता है, जी। और इस मज़े को राजनीति में खूब भुनाया गया है। एक सज्जन ने पूछा, मिर्च और मक्खन में क्या अंतर है। अंतर स्पष्ट है। दोनों ही मक्कार (मकार) हैं। दोनों ही ‘लगाए’ जाते हैं। पर मक्खन चापलूसी के काम आता है। मिर्च लगा कर सामने वाले को ईर्ष्या की आग में ‘जलाया’ जाता है। वो एक गाना है न ! “मैं तो भेलपूरी खा रहा था .. तुमको मिर्ची लगी तो मैं क्या करूं !”

टिकिट न मिलने पर एक मोहतरमा चुनाव में स्वतन्त्र उम्मीदवार के रूप में खड़ी हुईं तो उनकी पार्टी को मिर्च लग गई। उन्होंने अपना चुनाव-चिह्न भी “मिर्च” ही चुना। बोली, संभल के रहना, मैं मिर्च जैसी “हौट” हूँ; बोलती भी मिर्च की तरह हूँ। तड़का भी मिर्च का ही लगाती हूँ। जीतूंगी ज़रूर।आखिर आम आदमी की ज़रूरत है मिर्च।

भारतीय राजनीति इन दिनों ‘मिर्च-मयी’ हो गई है। मिर्च राजनीति करते हुए सत्ता पक्ष अपनी उपलब्धियां जब गिनाता है तो विपक्ष को मिर्च लग जाती है। खीज इतनी बढ़ गई कि मिर्ची लौटाते हुए बदले में इंदौर में कांग्रेसी कार्य- कर्ताओं ने गांधी भवन के नजदीक एक बैनर ही टांग दिया। लिखा था – सरकार को लाल और हरी मिर्च सप्रेम भेंट !

और तो और, योग गुरू परम आलय जी आजकल ‘तुमको मिर्ची लगी’ गाने की ‘बीट’ पर अपने चेलों को योगासन सिखा रहे हैं। आपने सीखा?

कृपया मिर्च से परहेज़ न करें। स्वास्थ्य के लिए मिर्च मुफीद मानी गई है। चटपटी है।भूनती, जलाती है। किस्मत, सौरी, ‘मिर्ची’ हमारे साथ है, जलनेवाले जला करें !

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--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी, / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद (२११००१)

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