सम्वहनीय विकास और गांधी जी // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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सम्वहनीय(ता) अपेक्षाकृत एक नई अवधारणा है। यह एक बहुकोणीय, बहुआयामी, जटिल संकल्पना है। अंग्रेज़ी शब्द, ‘सस्टेनेबल’ (sustainable) का यह हिन्दी पर्याय है। हिन्दी में इसके लिए सतत, समग्र, सम्पूर्ण, निरंतर धारणीय या संधारणीय आदि, शब्द भी प्रचलित हैं। शब्द, ‘संवहनीय’ का अधिकतर विकास के सन्दर्भ में प्रयोग किया जाता है। विकास ऐसा होना चाहिए कि जो धारण किया जा सके और आगे निरंतर बढ़ता रहे। ऐसे विकास को ही ‘संवहनीय-विकास’ की संज्ञा दी गई है। अक्सर विकास की उतावली में विकसित राष्ट्र अपने स्वार्थ और लोभ के आगे न तो पर्यावरण के संरक्षण की तरफ और न ही उससे होने वाले आर्थिक और सामाजिक वैषम्य पर ध्यान दे पाते हैं। इसी स्वार्थ और लोभ को जुटाने के चक्कर में कई लोगों / देशों का आर्थिक विकास तो बेशक अंधाधुंध तेज़ हुआ और उन्होंने अधिक से अधिक धन-संपदा इकट्ठा कर ली किन्तु समाज के सबसे पिछड़े लोगों पर और पर्यावरण पर इसकी चोट सबसे ज्यादह पडी। ‘संवहनीय-विकास’ आर्थिक, सामाजिक एवं भौतिक-पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखने का उपाय ढूँढ़ता है और इस तरह आने वाली पीढी के लिए भी सतत विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। संवहनीय-विकास की सर्वग्राह्य परिभाषा संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा गठित ब्रण्डलैंड कमीशन की रिपोर्ट ‘हमारा साझा भविष्य’ में दी गई है। इसके अनुसार –

-संवहनीय-विकास वह है, जो आने वाली पीढ़ियों की आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता से समझौता किए बगैर वर्तमान पीढी की आवश्यकताओं को पूरा करे-

इस मोटे उद्देश्य को लेकर जब हम विकास की बात करते हैं तो इसमें अन्य अनेक लक्ष्य स्वत: सम्मिलित हो जाते हैं जिनकी विकास की योजना बनाते समय अनदेखी नहीं की जा सकती। जैसे भुखमरी और गरीबी उन्मूलन, स्वस्थ जीवन, गुणवतापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, साफ़ जल एवं स्वच्छता का प्रबंधन, सस्ती एवं संवहनीय ऊर्जा की उपलब्धि, सर्व-समावेशी आर्थिक उन्नति, वैषम्य और असमानता का अधिक से अधिक निराकरण, गैर-ज़िम्मेदार उपभोग और उत्पादन पर अंकुश, जल, थल और वायु को अप्रदूषित रखने का संकल्प, इत्यादि।

गांधी जी के समय में विकास के सन्दर्भ में ‘संवहनीय’ शब्द अधिक प्रचलित नहीं था। किन्तु गांधी जी इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि भारत की कीमत पर इंग्लैण्ड का आर्थिक और सामाजिक विकास तो बेशक हो रहा है और कहने के लिए भारत में भी तथाकथित विकास की प्रक्रिया साम्राज्यवाद के हाथों ही, भारत में स्थापित संस्थाओं को ध्वंस कर, डाली जा रही है। किन्तु यह न तो भारत के हित में है और न ही उसे ऐसे विकास की संज्ञा दी जा सकती है जो भारत के लिए उपयुक्त और संधारणीय हो। भारत इस तरह के विकास के लिए न तो समर्थ है और न ही इसे वहन कर सकता है।


आधुनिक विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम मशीनों का उपयोग है। लेकिन विकास के लिए मशीनों का उपयोग कितना, कैसे और किस दृष्टि से किया जाए इसपर गांधी जी ने समुचित प्रकाश डाला है। प्राय: जैसा माना जाता है कि गांधी जी मशीनों के सख्त खिलाफ थे। किन्तु ऐसा नहीं है। वे कहते हैं कि वे भला मशीनों के विरुद्ध कैसे हो सकते हैं जबकि वे अच्छी तरह जानते हैं कि यह शरीर भी तो एक बहुत नाज़ुक यंत्र ही तो है। और चरखा भी तो, जिसकी वकालत करते हुए वे कभी थकते नहीं, एक यंत्र ही है। गांधी जी को आपत्ति विकास के लिए यंत्रों के प्रति जो एक प्रकार का पागलपन दिखाई देता है, उससे है। उन्होंने नोट किया है कि आज यंत्र की बदौलत चंद लोग लाखों- लोगों की पीठ पर सवार हैं। ऐसी स्थितियों के खिलाफ गांधी जी अपनी पूरी ताकत से लड़ते की बात करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो गांधी जी यंत्र को पूंजीवाद के औज़ार के रूप में जो गरीब को बेरोजगार कर उसकी की रोटी छीनता है और आर्थिक विषमता को जन्म देता है, अभिशाप मानते हैं। उनके अनुसार शहरों में स्थापित बड़ी मशीनों और उनके अधिक उपयोग से निश्चित ही भारत जैसे देश में बेरोजगारी और भी बढ़ेगी और गाँवों से लोगों का शहर की और पलायन होने लगेगा। ज़रूरत इस बात की है कि हम गाँवों में ही बेकार बैठे लोगों को रोज़गार मुहैया कराएं और इसके लिए बड़ी मशीनों की, जो ज़रूरत से कहीं ज्यादह उत्पादन करती हैं, आवश्यकता नहीं है। गाँवों में तो केवल ऐसी मशीनों की आवश्यकता है जिसे गाँव संवहन कर सके, उन्हें आसानी से चला सके। गांधी जी ने अपने समय में यह पाया कि चरखा एक ऐसा ही यंत्र है जो घर घर कपड़ा और रोटी का इंतजाम कर सकता है और इसका उपयोग इस प्रकार मुंह-बाये खड़ी बेरोजगारी पर अंकुश लगाने में सफल हो सकता है। गांधी जी का कहना है कि मेनचेस्टर में उपयोग होने वाली मशीनरी ने भारत को दरिद्र बनाया है। ऐसी मशीनों के सम्बन्ध में गांधी जी एक भी अच्छी बात तलाश नहीं कर सके। उसकी बुराइयों पर, जैसा कि वे अपनी पुस्तक ‘हिन्द-स्वराज्य’ में वे कहते हैं, बेशक ‘ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं।’

आज की भाषा में कहें तो गांधी जी भारी मात्रा में उत्पादन करने वाली उन मशीनों के खिलाफ थे जो असहाय, गरीब और बेरोजगारों के प्रति हमारे सह-सरोकार और संवेदनाओं को खत्म करती हैं, तथा मानवीय भावनाओं को कुंठित करने में सहायक होती हैं। बड़ी बड़ी मशीनों से बने आकर्षक उत्पादों द्वारा उपभोक्ताओं को रिझाया जाता है और ये यंत्र उत्पादकों की षड्यंत्रपूर्वक स्वार्थ-सिद्धि का माध्यम बन जाते हैं। गांधी जी केवल उन मशीनों के ही हिमायती हैं जो मानवीय कोमल भावनाओं से प्रेरित होकर बनाई जाती हैं और अनावश्यक श्रम को थोड़ा आसान बनाती हैं। इसका एक उदाहरण गांधी जी के अनुसार ‘सिंगर सिलाई मशीन’ है। सिंगर महोदय ने अपनी पत्नी को बड़ी मेहनत से हाथ से सिलाई करते देखा था। रोजी रोटी के लिए सिलाई करना उसे आवश्यक था। अत: उन्होंने एक ऐसी मशीन बनाई जो सिलाई के श्रम को थोड़ा कम कर सके। सिंगर सिलाई मशीन के आविष्कार के पीछे इस प्रकार किसी तरह का लालच न होकर करुणा की वह भावना थी जो सिलाई करने वाले श्रमिक के काम को आसान कर सके न की अन्यान्य सिलाई करने वालों को बेरोज़गार बना दे।

गांधी जी ने तथाकथित आधुनिक सभ्यता को, जिसे हम आधुनिक विकास का पर्यायवाची मान बैठे हैं, हमारी सबसे बड़ी मुसीबत बताया है। ‘हिन्द-स्वराज्य’ में गांधी जी ने इस सभ्यता को ‘एक रोग’ और ‘बिगाड़ करने वाली’ सभ्यता कहा है। इस तरह का विकास उनके अनुसार ‘बिगाड़’ ही नहीं विनाश का कारण भी बन सकता है। यदि हम ध्यान से देखें तो यह स्पष्ट है कि विकास की इन योजनाओं का इन्द्रीय सुख और उपभोग की लालच भरी सुविधाओं को प्रदान कराना ही एक मात्र लक्ष्य है। इससे आर्थिक विषमता और पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ता ही चला जा रहा है। जो अंतत: मानव-जाति को ही विनाश की ओर अग्रसर किए बगैर नहीं रह सकता। ज़ाहिर है, गांधी जी ऐसे सारे विकास को निरस्त कर देना चाहते हैं। इस तरह का विकास न तो वहन किया जा सकता है और न ही वांछनीय है। आज हमें एक भिन्न प्रकार की प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है जिसे, बिना किसी विनाश के खतरे के, धारण की जा सके; जो बिना किसी भेद-भाव के समावेशित हो और जिसको बिना किसी रुकावट सतत संवहन किया जा सके।

यह एक शुभ संकेत है कि आज की राजनीति और अर्थशास्त्र भी ऐसी ही एक वैकल्पिक प्रौद्योगिकी की तलाश में जुटा हुआ है। जिस तरह आधुनिक विकास के चलते प्रर्यावरण अत्यधिक प्रदूषित होता जा रहा है तथा ओ-ज़ोन में छिद्र होने से मानव अस्तित्व के लिए संकट गहराने लगा है, साथ ही गरीबी और अमीरी के बीच की खाई दिन ब दिन बढ़ती जा रही है- इसे रोकने के लिए उपाय ढूँढे जाने लगे हैं। वस्तुत: इन्हीं कठिनाइयों को दूर करने के लिए “संवहनीय विकास” की अवधारणा सामने आई है।

जहां तक गरीब और अमीर की खाई पाटने का प्रश्न है, गांधी जी का चिंतन आज एक वैकल्पिक सुझाव देने में सफल प्रतीत होता है। यह सुझाव मुख्यत: ‘नैतिक’ है और शायद इसीलिए आज का आर्थिक विकास जो पूरी तरह नैतिक रूप से पतित हो गया है, इसे स्वीकार कर पाने में असमर्थ सा दिखता है। लेकिन हम सभी जानते हैं कि उत्पादन और बाज़ार का मुख्य लक्ष्य हमारी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। गांधी जी ने एक बार कहा था कि प्रकृति के पास हर इंसान की आवश्यकताओं (needs) की संतुष्टि के लिए सब कुछ है किन्तु हमारे लालच (greed) को वह संतुष्ट नहीं कर सकती। पर विडम्बना यह है कि आज बड़ी-बड़ी मिलें और कारखाने बजाय इसके कि बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करने पर अपना ध्यान केन्द्रित करें वे भारी मात्रा में अपने उत्पादन को ठिकाने लगाने के लिए उपभोग की कृत्रिम मांगों को पैदा करके उनकी पूर्ती में दिलचस्पी दिखा रहे हैं ताकि उत्पादकों को अंधाधुंध लाभ दिया जा सके। साथ ही कृत्रिम मांगों की जाल में फंसा उपभोक्ता भी पूरी तरह गैर-ज़िम्मेदार होकर इस पूरी प्रक्रिया में अपना सहयोग दे रहा है। ऐसे में गांधी जी के नैतिक हस्तक्षेप को हम निरस्त नहीं कर सकते। गांधी जी का ‘अपरिग्रह’ पर बल और ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ भावना (त्यागपूर्ण भोग) का समर्थन विकास के इस अनैतिक प्रवाह को निश्चित ही रोक सकता है। गांधी जी का अपरिग्रह से आशय केवल उतना ही परिग्रह करने से है जितनी कि हमारी आवश्यकता है, लेकिन हम अपने लालच में परिग्रह करते ही चले जाते हैं जो दूसरों की आवश्यकताओं की पूर्ती में बाधक बनाता है। इसी लिए “तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ त्याग-पूर्ण भोग ज़रूरी है। भोग करते समय हमें अपने लालच को त्यागना होगा ताकि सभी सम्यग-भोग कर सकें और कोई गरीबी के कारण व्यापक अर्थ में ‘भूखा’ न रहे। गांधी जी का कहना था कि यदि अमीर लोग साधारण ढंग से रहना सीख लेंगे तो गरीब लोग भी साधारण ढंग से रह सकेंगे। वस्तुत: प्रौद्योगिकी वही श्रेष्ठ है जो सबके लिए रोज़गार के अवसर पैदा कर सके, न कि अधिकाधिक उत्पादन कर लोगों को बेरोजगार बनाए – अमीर को अमीर तथा गरीब को और गरीब बनाए।

इसी प्रकार गांधी जी का ‘ट्रस्टीशिप’ का सिद्धान्त भी, अब ऐसा प्रतीत होता है, अपनाने का वक्त आ गया है। यदि सामूहिक रूप से पूंजीपति वर्ग यह समझ-बूझ कर कि उसने जो पैसा कमाया है उसमें गरीब श्रमिकों का भी अपना योगदान है अत: ‘ह्रदय परिवर्तन’ कर उस पैसे का केवल “ट्रस्टी” के रूप में वह अपने पास रख सके तो बेहतर है, लेकिन यदि ऐसा नहीं हो पाता है तो क्या (१) अपने योगदान के हित में मजदूर वर्ग अहिंसक प्रतिरोध या सत्याग्रह नहीं कर सकता ? और (२) ट्रस्टीशिप को क्या राज्य-नियमित नहीं किया जा सकता ? गांधी जी पहले विकल्प का तो समर्थन बेशक करते ही करते, हालांकि ऐसा उनके जीवन काल में हो नहीं पाया, किन्तु दूसरे विकल्प को भी स्वीकार करने में गांधी जी को कोई हिचक नहीं थी। यह नियम आखिर वृहत्तर समाज के हित में ही तो है।

यह ज़रूरी है कि आर्थिक और सामाजिक विकास के सन्दर्भ में गांधी जी के नैतिक हस्तक्षेप की आवश्यकता को, इससे पहले की पानी सिर से ऊपर आ जाए, हम समझ सकें और उसे राजनैतिक स्तर पर अपनाने के लिए राज्य को बाध्य कर सकें। जब तक हम इस नैतिक आयाम को विकास में सम्मिलित नहीं का पाते हमारी “संवहनीय-विकास” की परिकल्पना मूर्त रूप नहीं ले सकती।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१० एच आई जी / १,सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

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