संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 39 संस्मरण व्यंग्य // हमारी पहली नरक यात्रा // शशिकांत सिंह ’शशि’

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प्रविष्टि क्र. 39 हमारी पहली नरक यात्रा संस्मरण व्यंग्य शशिकांत सिंह ’शशि’ यह बात तब की है जब हम पहली बार मरे थे। मरने का अनुभव नहीं होने के...

प्रविष्टि क्र. 39

हमारी पहली नरक यात्रा

संस्मरण व्यंग्य

शशिकांत सिंह ’शशि’

यह बात तब की है जब हम पहली बार मरे थे। मरने का अनुभव नहीं होने के कारण दिन और तारीख लिखना तो भूल ही गये लेकिन घटनाएं याद हैं। घुप्प अंधेरा था। हम आकाश मार्ग से जा रहे थे। एक भले से यमदूत ने हमें अपनी बाघम्बर की जेब में डाल रखा था। जेब फटी हुई थी इसलिए एक छेद बन गया था जिससे मैं बाहर का नज़ारा देख सकता था। यमदूत बेचारे को साल में दो बाघम्बर मिलते थे, एक दीवाली पर और दूसरा होली पर। दीवाली वाली पहन रहा था, होली अभी दूर थी, तो जेब फटी ही होगी। भैंसे की गति काफी तेज थी, शायद यह देवलोक का बुलेट भैंसा था। मज़ा नहीं आ रहा था। रेल की यात्रा होती तो ट्रेन रुकने पर, स्टेशन पर हवाखोरी करते, पान के रस से गला तर करते, पीक किसी साफ जगह पर थूककर सफाई कर्मचारियों को कोसते, पड़ोसी यात्री से तम्बाकू मांगकर दांतों के नीचे दबाते, सरकार को दस गालियां देते और पुनः गाड़ी में चढ़ लेते लेकिन यहां तो यमदूत जल्दी में था। यह कांट्रेक्ट पर काम करने वाला यमदूत था जैसा कि उसने मुझे धरती पर ही बताया था, उसे पर सोल पचास रुपये मिलते थे। बेचारा जितने अधिक चक्कर काटता उतनी उसकी आमदनी होती। उसके परिवार में एक अदद यमदूती और दो छोटे-छोटे यमी में थे। उसकी करुण कथा जिला परिषद के मास्टरों से मिलती थी जिन्हें तीन साल तक वेतन देने की गलती सरकार नहीं करती जबकि मैनेजमेंट वाले उससे खूब मोटी रकम वसूल चुके होते हैं। यमदूत के जीवन और मास्टर के जीवन की तुलना करते पता नहीं चला कि कब हम -’नरक नगर’ के प्रवेश द्वार पर आ गये।

भैंसा रुका तो सामने एक विशाल भवन था। लिखा था-’ चित्रगुप्त भवन’। अहा...तो यही वह मुकाम है, जहां सबको आना होता है सुना तो बहुत था, आज देख भी लिया। हम बाहर का आनंद ले ही रहे थे कि यमदूत ने हमें झटके से निकाल लिया। बाहर का नज़ारा अत्यंत रोमांचकारी था। नाना प्रकार की आत्माएं काउंटर से पर्ची ले रही थीं। यमदूत ने धक्का दिया-

-’’ जा बे अपना रजिस्ट्रेशन करा ले।’’

यमदूत जी तो उड़ गये अगली किसी आत्मा की तलाश में। हम लाईन में जा लगे। लाईन में लगने का अपना चालीस साल का अनुभव था। एक फार्म मिला जिसपर अपना नाम, मरते समय उम्र, मरने का कारण, घर में रोने वालों की संख्या, आदि भरकर देना था। हमने भर दिया फार्म भरते-भरते ही जीवन कटा था। राशन कार्ड के लिए फार्म भरने से लेकर नौकरी तक के फार्म भरने में हम विशेषज्ञ माने जाते रहे थे। फार्म जमा करके हमने एक चौकन्ने से दिख रहे जीवात्मा से पूछा-’’ भैया ! यहां चाय मिलती है कहीं ?’’

-’’ तीन नंबर काउंटर के बाहर मंगला चायवाला बैठता है। वह आजीवन चाय बेचता रहा था इसलिए मरने के बाद उसे चाय बांटने की ड्युटी दी गई है। देखो कहीं आज आया हो तो।’’

काउंटर गिनते-गिनते हम पहुंचे तीन नंबर पर। एक मरियल सा आदमी चाय की एक केतली और दस-बीस प्लास्टिक के कप हाथ में धारण किये दिखा। आनंद आ गया, लगा जैसे मोतिहारी स्टेशन पर आ गये। पायल सिनेमा हॉल के बाहर बैठे हैं। हमने मंगला चाय वाले से एक कप चाय की फरमाईश की और वहीं बैठ गये कि बतरस भी हो जाये। जगह-जगह सोमरस की दुकानें दिख रही थीं। मंगला बता रहा था कि देवता लोग सोमरस को अत्यंत आदर भाव से पीते हैं। जब कभी देवराज इंद्र का दौरा होता है तो सोमरस की बिक्री बढ़ जाती है। सोमरस के प्रति हमारी जिज्ञासा बढ़ गई कि यह अनोखा पेय आखिर है क्या ? मंगला भैया ने बताया कि सोमरस वही पदार्थ है जिसे हम धरती पर दारू कहते हैं। हमें जरूरत से ज्यादा तसल्ली हुई कि हम नहीं सुधरे तो कोई नहीं सुधरा। आश्चर्य भी हुआ कि जब दारू मिल ही रही है तो इसे नरक क्यों कहते हैं ? मंगला बता रहा था कि यहां रजिस्ट्रेशन कराने के बाद भी सालों-साल साहब से मिलने का टाईम नहीं मिलता। देवताओं का एक मिनट आदमियों के कई साल के बराबर होता है। यदि कह दिया कि दो मिनट के बाद आओ तो समझो दो साल के बाद नंबर आयेगा। बेचारा, उसे तो कह दिया था दूत ने कि पांच मिनट के बाद आओ। तबसे वह चाय बांटकर अपना समय पास कर रहा है। हमें और खुशी हुई कि ऑफिस कहीं का भी हो काम एक ही गति से करता है। अब मरने का अफसोस भी जाता रहा। चाय पीकर आये तो दो जीवात्माएं एक दूसरे को पटककर मार रही थीं। दुबारा मरने का डर तो था नहीं, भिड़ी हुई थीं, मरी हुई माताओं को श्रद्धा से याद कर रही थीं। यह तो सिद्ध हो रहा था कि मरने के बाद गाली ही आपके साथ जाती है। गालियां अजर, अमर, अविनाशी होती हैं। मामला था लाईन तोड़कर आगे बढ़ने का। यह सनातन भारतीय आदत है जो मरने पर भी नहीं छूटती। पीछे वाले ने आगे वाले को धक्का दिया था या खुद आगे बढ़ गया था यह प्रकाशित नहीं हो सका। हमने पराये फट्टे में टांग नहीं फंसाई और आगे बढ़ गये।

काउंटर नंबर एक पर हमने अपना फार्म भर कर दिया था सो वहां पता करने चले गये। काउंटर पर एक क्लर्क की आत्मा विराजमान थी। पान का नहीं होना क्लर्क को श्रृंगारविहीन बना रहा था। पान न हो तो बर्दाश्त किया जा सकता है लेकिन तम्बाकू भी नहीं ! तम्बाकू तक न हो तो क्लर्क की आत्मा कितनी पीड़ा में होगी लेकिन काम तो करना ही होगा। हमने जाते ही प्रणाम ठोका-

-’’ परनाम सर।’’

-’’ परनाम, परनाम। कहां से ?’’

-’’ जी मोतिहारी से आये हैं भइया जी। आये का हैं लाये गये हैं। गये तो अस्पताल थे अउर उ भी खाली खांसी लेकर लेकिन आ गये इहां। डागदर को जब तक बीमारी पकड़ाता तब तक यमदूत को आत्मा पकड़ा गया सो हियां आ गये। अउर कहिये सब कुसल मंगल।’’

चिरपरिचित बिहारी शैली से कर्ल्क की सूखी आत्मा में हरियाली आई। वह चहचहाया।

-’’ नरकों में ठेलम ठेल है। का कहें। खैर कहिये आपका फार्म नंबर कितना है ?’’

-’’ दू सौ तीन सर। तनिका देखिये कउनो उपाय हो जाये विधाता जी से जल्दी मिलने का तो। सुनते हैं कि सालों-साल नहीं मिलते।’’

क्लर्क महोदय ने फाईल देखी। मुझे देखा। फाईल देखी फिर मुझे देखा इसी बीच दिख गया अपना मंगल चाय लेकर इधर ही आ रहा था। हमने एक कप चाय पकड़ी और कर्ल्क साहब को दिया। उनकी आंखें थैंक यू बोल रही थीं। उन्होंने चाय सुड़की और बोले-

-’’ आपके केस में जुगाड़ है। यमदूत किया है कौनो मिस्टेक। हमारे खाते में आपका उम्र अभी चालीस साल तीन दिन तेरह घंटा पंद्रह सेकेंड लिखा हुआ है। हम आपकी इमरजैंसी मीटिंग कराते हैं। चइया वाला है कि चला गया ?’’

हमने एक कप चाय और ली। क्लर्क साहब ने सुड़की और इमरजैंसी का लाल रंग का पर्चा हमारे हाथ में थमा दिया। बोले-

-’’ सीधे दाहिने जाकर बायें घूम जाइयेगा। रिसेप्शन वाले को पर्चा दिखाइये। वह बता देगा क्या करना है।’’

रिसेप्शन में मिले हरखू चाचा। हरखू चाचा को हमारे गांव में देवता की उपाधि मिली हुई है। कहते हैं कि वे अंग्रेजों के खिलाफ लड़े था ताकि देश में सुराज आ जाये। वहां ग्राम देवताओं के काउंटर लगे थे। हमने तड़ से ताड़ लिया कि हमारे हरखू चाचा यही हैं जो सौ साल पहले गोली खाकर स्वर्गवासी हुये थे। गोली खाकर तो हम भी हुये हैं लेकिन उन्होंने पुलिस की खाई हमने डॉक्टर की। हमारा फार्म देखकर ही चाचा भावुक हो रहे थे। हमने जब बताया कि रामसेवक सिंह के पोते हैं तो खूब प्रेम से मिले। गांव-गंवई का हाल पूछने लगे। रामजान मियां के बारे में पूछा लेकिन हमने गर्व से बताया कि बंटवारे के समय उनको भगा दिया गया था। रामदीन हलवाई के बारे में भी जानकारी मांगी हमारी जानकारी के मुताबिक इस नाम का कोई आदमी हमारे गांव में है ही नहीं। उन्होंने जब बताया कि पहले होली-दिवाली पर सबलोग एकसाथ त्योहार मनाते थे तो हमें हंसी आई। पुराने लोग हमेशा पिछड़े ही रहेंगे चाहे कितना भी ऊपर क्यों न उठ जायें। उन्होंने जब कहा कि गांव तो अब शहर हो गया होगा और किसान ठाठ से खेती कर रहे होंगे तो हम अपनी हंसी रोक नहीं पाये। किसानों के लिए थोड़े ही सुराज लिया गया। सुराज तो लिया गया था महाजनों के लिए वे ठाठ से हैं। काश ! हरखू चाचा को इतनी बातों की जानकारी होती। खैर, हालचाल के बाद काका हमारा फार्म देखने लगे। हमारे फार्म में डिफाल्ट था इसलिए एक्सट्रा एग्जामिनेशन होना था। शुरू हुआ-

-’’ तुम कहां मरे थे ?’’

-’’ अस्पताल में।’’

-’’ बीमारी क्या थी ?’’

-’’ पता नहीं डॉक्टर को भी पता नहीं थी। मैने मरते-मरते उनसे पूछा भी था। मेरी आखिरी इच्छा थी कि अपनी बीमारी को जान सकूं। बेचारे मायूस हो गये। उन्हें भी पता नहीं था कि वे किस बीमारी का इलाज कर रहे थे।’’

-’’ तुम डॉक्टर के पास गये ही क्यों थे ? ऊपर आने के और भी तो रास्ते हैं ?’’

-’’ खांसी खत्म ही नहीं हो रही थी तो चेक करवाने गया था। एक ने कहा टी बी है, दूसरे ने कहा हैजा है , तीसरे ने कहा कालाजार है और जब चौथे ने कहा कि कैंसर है तो डर के मारे मैं मर गया। डॉक्टर की गलती नहीं है मैं मारे डर के मरा। डर का तो इलाज भी नहीं होता।’’

-’’ लेकिन यमदूत ने रिपोर्ट भेजी है कि तुम्हारी आत्मा पर तीन टन टेबलेट और कम से कम दस लीटर पेय दवाइयों का कचरा चढ़ा हुआ था।’’

-’’ हां, अस्पताल का अपना एक नियम है जो मरने के बाद मुझे दूसरे मरीज की आत्मा ने बताया था कि वहां के डॉक्टर मरने से पहले हर मरीज के घरवालों से कम से कम दर हजार रुपये वसूलते हैं। इस मामले में वे पक्षपात नहीं करते। अमीरी-गरीबी या जाति-पाति नहीं देखते।’’

-’’ डॉक्टर ने चेकअप तो कराया ही होगा। अब तो साईंस काफी आगे बढ़ गया है।’’

-’’ जी वही तो, साईंस इतना आगे बढ़ गया कि आदमी पीछे छूट गया। डॉक्टर ने चेकअप ही किया केवल। मुझे जनरल वार्ड में खांसी आई तो तुरंत फेफड़े का एक्सरे कराया गया और आई सी यू में डाल दिया गया। मेरे फूफा मुझे लेकर गये थे। उन्हें इतना डरा दिया गया कि वे सिर से पांव तक चेकअप के लिए तैयार हो गये। जमीन बेंचकर पैसे ले आये। जब आई सी यू में फेफड़े का काला चित्र लेकर नाना प्रकार के डॉक्टर उलट-पुलटकर देख रहे थे तभी एक ने कहा पीठ का एक्सरे कराना होगा। पीठ का हुआ तो एक विद्वान ने कहा कि हो न हो बीमारी टांग में छिप गई है। हो जाये एक-एक एक्सरे टांग का भी। केवल हाथ रह गये। इसके अलावा खून, पिशाब, बलगम के साथ-साथ दूसरे जितने भी गम थे सबकी जांच कराई गई थी।’’

-’’यानी तुम बिना बीमारी के ही मर गये।’’

-’’ जी अफसोस तो यही है लेकिन मेरी शहादत बेकार नहीं गई। डॉक्टर, नर्स से लेकर चाय वाले डब्लू तक ने पैसे लूटे।’’

-’’ तुम्हारे घर में कौन-कौन है ?’’

-’’ भूख, भय और बुढ़ापा। बेरोजगारी तो खत्म हो गई क्योंकि मैं यहां आ गया। अब केवल बूढ़े मां-बाप हैं। उनके सामने लंबा जीवन है जिसका भय है।’’

हरखू चाचा भावुक हो गये। उन्होंने यमदूत के ट्रांजेक्शन पर तुरंत अपना कोई रिमार्क लिखा और बोले-

-’’ रिश्ते में तो हम तुम्हारे दादा लगते हैं फिर भी सीधे वापसी का टिकट नहीं दे सकते। हमने तुम्हारी फाईल पर अपना रिमार्क लिख दिया है अब यह बड़े साहब की टेबुल पर जायेगा। वहां से तीन मिनट में निकलने का रिवाज है अर्थात धरती के समय के अनुसार तीन साल में लेकिन तब तक तो तुम्हारी देह अग्नि को समर्पित हो जायेगी। समस्या और बढ़ेगी। मैं खुद इसे ले जाता हूं और साहब को रिक्वेस्ट करके निष्पादन कराता हूं। तुम चिंता मत करो। अभी तुम्हारी देह को श्मशान जाने में दो घंटे की देरी है। तब तक तुम्हारा काम हो जायेगा।’’

हमारी आत्मा जो कि चैन महसूस करने लगी थी बेचैनी को प्राप्त हो गई। हरखू चाचा को मेरी देह की अपडेट कैसे मालूम ? हमने उन्हें दरियाफ्त की तो मुस्कराये । उनके मुस्कराने से यह ज्ञात हो गया कि चित्रगुप्त नगर में मुस्कराने पर पाबंदी नहीं है। पहली बार किसी को मुस्कराते देखकर हमें भी मुस्कराने की तलब हुई और मुस्कराये। उन्होंने सूचित किया-

-’’ आत्मा के रंग से हम जान जाते हैं। अभी तुम्हारा रंग नीला है जो कि धरती के रंग से टैली कर रहा है। जब अग्नि को देह समर्पित हो जायेगी तो यह रंगा लाल हो जायेगा। लालिमा चढ़ने लगती है जब देह चिता पर चढ़ जाती है।’’

देवलोक की टेक्नोलोजी कितनी महान है। हमारा शीश श्रद्धा से झुक गया। चाचा समझे कि हम उन्हें प्रणाम कर रहे हैं तो एकबार पुनः भावुक हो गये। बोले-

-’’बचवा तुम चिंता मत करो। अगले एक घंटे में तुम धरती पर रहोगे। ’’

हम फिर से काउंटर नंबर एक पर आकर इंतजार करने लगे। मंगला चाय बांट चुका था और क्लर्क से उलझ रहा था।

-’’ हमारा फाईल अंदर गया तो आजतक बाहर नहीं आया। आ उ बाबूसाहब का फाईल कइसे तड़ातड़ दौड़ रहा है। मरने के बाद भी भाई-भतीजावाद नहीं गया। फोकट की चाय पिला रहे हैं तीन महीना से तो इसका लाज रखना चाहिए कि नहीं।’’

कर्ल्क आदतन नाराज हो गया। फोकट की चाय वाली बात उसे चुभ गई। उसने भी हल्ला किया-

-’’ तुम्हारा काम ही चाय बांटना है। तुम अपना काम कर रहे हो। हम पर एहसान नहीं कर रहे। का समझे ?’’

हल्ला-गुल्ला जारी था कि हमारा आगमन हुआ। मामला समझने के लिए हम थोड़ी देर रुके। कर्ल्क की नजर हम पर पड़ी तो अंदर से ही बोला-

-’’ अरे इ मंगला को समझाइये कि आपका केस फाल्टी था इसलिए उसकी अरजेंट सुनवाई हुई है। लड़ने आ गया बिना मतलब।’’

हम सरपंच बनने की ओर अग्रसर नहीं हुये। अपना काम हो चुका था। वापसी का टिकट कन्फर्म हो जाये तो निकले। मां-बाप यदि धरती पर नहीं होते तो जाता भी नहीं। जाते ही कल से लाईन लग जायेगी। रामखेलावन पांडे तो इस बार छोड़ेगा नहीं उसका दस हजार रुपया उधार है। काम-धंधे की संभावना में जिंदगी आधी बीत गई। ईन एंड आउट कंपनी में काम की बात चल रही है तो उनको चाहिए घूस। घूस देकर धरती पर रहने से तो बेहतर है नरक का सरपंच बनकर रहना। बाहर के बेंच पर बैठ गये। अभी पांच मिनट भी नहीं हुये थे कि क्लर्क महोदय ने आवाज दी-

-’’ फार्म संख्या दो सौ तीन।’’

-’’ जी सर।’’ हम लपके।

-’’ आप यह पर्ची लीजिये। जाकर तीन नंबर चबूतरे पर खड़े हो जाइये। वहां से अभी थोड़ी देर में एक यमदूत आपके गांव के लिए रवाना होने वाला है। सलमान मियां की आवक है। उसको पर्ची दिखाइये और जाकर अपने गांव में , अपने शरीर में घुस जाइये। ’’

हम पर्ची लेकर लपके और तीन नंबर चबूतरे पर जा खड़े हुये। थोड़ी देर में हम पंचू यमदूत के साथ अपने गांव के लिए उड़े जा रहे थे। नाम तो हमने चलते-चलते पूछ ही लिया था।

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शशिकांत सिंह ’शशि’

जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़ महाराष्ट्र, 431736


इमेल- skantsingh28@gmail.com

नाम

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रचनाकार: संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 39 संस्मरण व्यंग्य // हमारी पहली नरक यात्रा // शशिकांत सिंह ’शशि’
संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 39 संस्मरण व्यंग्य // हमारी पहली नरक यात्रा // शशिकांत सिंह ’शशि’
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