नाटक // भोला विनायक - खंड 5 // दिनेश चन्द्र पुरोहित

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नाटक ‘भोला विनायक’ का खंड ५

लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

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[मंच रोशन होता है, गाड़ी के शयनयान डब्बे में सावंतजी, रशीद भाई और ठोक सिंहजी बैठे हैं। ठोक सिंहजी विनायक का किस्सा बयान कर रहे हैं।]

ठोक सिंहजी – [किस्सा बयान करते हुए, वे रशीद भाई से प्रश्न करते हैं] – अब आप यह बताइये कि, इन तीनों सवारों को देखकर, विनायक भय और रोब में आ गया क्या? बस, आप यह बता दीजिएगा कि, उसके दिल में भय और शंका न व्यापी?

रशीद भाई – बस वह कुछ आश्चर्य और कुतूहल में आ गया होगा, पर इन सवारों का भयंकर वेश देखकर सामान्य बालकों की तरह डरकर पीछे न हटा होगा। और सच्च बात यही है, अभी उसके बाप को गए आधा घंटा भी न बीता था और नए अतिथि के आतिथेय के लिए परमानन्द जैसी ताकीद कर गए थे वे सब शब्द मानों विनायक के कान में अभी-तक गूंज रहे होंगे?

सावंतजी – इसलिए मैं कहता हूँ, वह बालक स्वभाव से इन तीनों सवारों को अपने घर के सामने रुकते देखकर इसे ज़रूर हर्ष ही हुआ होगा।

ठोक सिंहजी – सच्च है, ऐसा हर्ष का अनुभव बालक ही कर सकते हैं। यह कौन नहीं जानता है कि लड़कों को अपना गौरव प्रगट करने में एक प्रकार का घमंड होता है। जिसमें वे अपने बड़ों का कोई कृत्य प्रकाश कर सकें। यही दशा उस दिन विनायक की थी उसे इस बात का घमंड सा हो रहा था कि आज मेरे बाप के मित्रों और नातेदारों की मेहमानी का इन्तिज़ाम मुझे सौंपा गया है।

सावंतजी – इसलिए जब इन तीन सवारों को अपने घर की ओर मुड़ते देखा तो इसके मन में हर्ष और कुतूहल मिला हुआ एक प्रकार का भाव उदय हुआ होगा। कुतूहल तो इन हथियारबंद इन तीनों सवारों की भयावनी सूरत पर हुआ होगा और हर्ष इस बात का कि पिताजी जो काम मेरे सुपुर्द कर गए हैं उसका अवसर अब आ पहुंचा है।

रशीद भाई – जी हाँ। यही बात रही होगी? उसने सोचा होगा कि अब मैं इन तीनों मेहमानों की मेहमानदारी ऐसे ढंग से कर लूं कि पिता के आने पर मेरी बात उज्जवल रहे और यह तभी संभव है जब इन मेहमानों के मुंह से मेरी प्रशंसा पिताजी सुनेंगे। पर यह बात ज़रूर हुई होगी कि इन तीनों का रोब उसके दिल पर ऐसा असर कर गया होगा कि वह खुल के इन लोगों से मिल न सका होगा?

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ठोक सिंहजी – इसलिए कह रहा हूँ कि, पहले जिस तरह वह लपककर दौड़ा था कि इन लोगों को खातिरदारी के साथ घर में ले जाय वह उमंग अब ठंडी पड़ गयी और इनके विचित्र व्यवहार को देख़ विनायक चकित सा रह गया। पहले तो तीनों ने अपने भाले वहीँ दालान में गाड़ दिए और फिर पेशकब्ज़ पर हाथ रखे आगे बढ़े और कदाचित किसी को उस घर के पास न देख फिर हथियारों की कुछ ज़रूरत नहीं समझी।

[मंच पर, अँधेरा छा जाता है।]


[क्रमशः अगले खंडों में जारी...]

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