नाटक // भोला विनायक - खंड 4 // दिनेश चन्द्र पुरोहित

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नाटक “भोला विनायक” का खंड ४ लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित

[मंच रोशन होता है, रेल गाडी के शयनयान डब्बे का मंज़र सामने आता है। केबिन में ठोक सिंहजी, रशीद भाई, सावंतजी, चाचा कमालुद्दीन और उनका नेक दख्तर नूरिया बैठे हैं। नूरिया बैठा-बैठा झपकी ले रहा है, अभी-तक उसकी ऊंघ दूर हुई नहीं हैं। ठोक सिंहजी विनायक का किस्सा सुनाते जा रहे हैं।]

ठोक सिंहजी – [किस्सा बयान करते हुए, कहते हैं] – विनायक अभी आठ वर्ष और तीन या चार महीने का होगा पर देखने से छ: वर्ष का मालूम होता था। उसका दुबला-पतला शरीर ऐसा न था कि बाल्यअवस्था से ही आगामी युवावस्था के सब पूरे लक्षण प्रगट कर सके। प्रत्युत उसका डील-डौल उन पेड़ों के समान था जो आरम्भ में लगाने वाले को कुछ निराश सा कर देते हैं पर समय पाय भरपूर फूलते हैं।

सावंतजी – अरे भाई, डील-डौल न हुआ तो क्या? चौड़ा और ऊँचा ललाट तो होगा? जो भाग्य की पहचान है।

ठोक सिंहजी – एक बात खेद के साथ कह देता हूँ विनायक के भाग्य में किसी प्रकार का बड़प्पन नहीं लिखा था। उसकी आँखें भी छोटी-छोटी लड़कपन के कुतूहल से भरी हुई और पल-पल में बीसों तरह के भाव दिखलाने वाली निस्संदेह उसके मुख की शोभा को घटाती थी। कभी तो उनमें बड़े गूढ़ भाव के चिन्ह दिखलाई पड़ते थे जिन पर ध्यान देने से यही मालूम होता था कि...

सावंतजी – क्या मालूम पड़ता था, ठोक सिंहजी? इस तरह आप, चलती बातों की गाड़ी को रोका न करें।

ठोक सिंहजी - ये आँखें नहीं किन्तु बड़ी दूर तक चले जाने वाले दो अँधेरे सुरंग हैं जो विनायक के ह्रदयगत भाव रूप गढ़ी तक पहुंचते हैं। फिर पल-भर में ही वह सब भाव ऐसे साफ़ हो जाते हैं मानो उसकी आँखों में कभी गाम्भीर्य रहा ही नहीं और उसके सहज सौन्दर्य और प्राकृतिक निष्कपट भाव को देखने वाला ऊपर ही से खींच ले। सत्य है चितवन में जो एक प्रकार का जादू लोगों ने मान रखा है वह यही है...

सावंतजी – जी हाँ, हम जानते हैं। वरन सामुन्द्रिक का एक प्रधान अंग इन आँख के भावों को जिसने समझा उसने मानों ईश्वर की ईश्वरता पहचानने का पूर्ण अभ्यास कर लिया।

ठोक सिंहजी - मेरे साथियों हमें पूरा विश्वास है कि लोगों की प्रसिद्ध रूचि के अनुसार छोटी आँखों की प्रशंसा आपको कदापि भली न लगी होगी पर अवसर पाकर वह प्रश्न पूछने का सहस हमें क्यों न होना चाहिए कि यह बात स्वयं सिद्ध है कि बड़ी वस्तु के घूमने-फिरने में छोटे पदार्थ की अपेक्षा कहीं अधिक देर लगती है। तब यदि विविध भावों से पूर्ण चंचलता की शोभा आर्य को प्रिय है तो कभी अपनी पसंद को बड़ी आँखों का उम्मीदवार न बनाइये।

रशीद भाई – देखिये, ज़नाब। आगे बयान मैं कर देता हूँ। सुनिए इतने पर भी आप गतानुगतिक न्याय के बाहर होने का सहस नहीं बाँध सकते और अपनी रूचि बड़ी आँखों से अलग नहीं कर सकते तो क्या किया जाय? लाचारी है “भिन्न रुचिहिं लोक:” इस लोकोक्ति पर ध्यान रख हमीं को क्षमा कीजिये। न यही कह सकते हैं कि इन्ही आँखों के ऊपर जो भौं होंगे वही बड़े घने होंगे पर इतना तो कहेंगे ही कि बाल्यावस्था की मचलाई का क्रोध दरसाने भर को भरपूर गाझिन होने चाहिए।

ठोक सिंहजी – आपने वज़ा फरमाया, रशीद भाई। क्रोध के समय बालकों की भृकुटी के आगे दुर्वासा की भृकुटी भी मात है। यह माता का स्नेह नहीं वरन उन भृकुटियों ही का प्रताप था जो विनायक को अपनी मनमानी करा ही के छोड़ता था और मां को भी उसी के मन की करना ही पड़ता था। मां जो संसार में वात्सल्य-रस की सजीव मूर्ति होती है उसके साथ विनायक को अपनी भृकुटी काम में लाने का अवसर भी नहीं मिलता था पर पिता के कड़े बर्ताव के कारण बेचारा विनायक क्रोध और दु:ख में जब भर जाता था..

कमालुद्दीन – यह कमबख्त तो बड़ा जिद्दी निकला, ऐसी जिद्द मेरा बच्चा कर लेता था तो मैं उसे पीट-पीटकर सीधा कर दिया करता। उस विनायक की मां ने अपने सर पर चढ़ा रखा था, इस नामुराद विनायक को?

[तभी पाख़ाना जाने लिए उठी चच्ची हमीदा बी कुछ अलग सुन लेती है, उधर से गुज़रते वक़्त वह इस केबिन में बैठे कमालुद्दीन को बिफर कर कहती है।]

हमीदा बी – अभी तक गुस्सा ठंडा हुआ नहीं तुम्हारा, जानते हो मैं कितनी भारी पड़ती हूँ? बोलो, मैंने कब अपने नेक दख्तर को सर पर बैठाया? यह तुमने चढ़ाया है इसे अपने सर पर, जो रात बीते देखता रहता है भूतों की फिल्म और फिर दिन-भर ऊंघ में पड़ा रहता है नामाकूल।

रशीद भाई – अरे चाची, सर पर क्या चढ़ाया इसे, यह नामुराद ऊंघ में पड़ा-पड़ा खोल देता है हिज़ड़े का तीजारबंद। ख़ुदा खैर करे, अब तो ये गाड़ी में फिरने वाले हिज़ड़े इस नामाकूल से दूर ही रहते हैं। अच्छा है इसे आप अपने पास बैठा लें, तो आपको इन हिज़ड़ो को रुपये-पैसे देने नहीं होंगे।

हमीदा बी – तेरे केबिन में बैठा है तो क्या तकलीफ दे रहा है, तुझे? तू तो कमबख्त अनाप-शनाप खाकर, पूरे डब्बे में दुर्गन्ध फैला देता है...पिछवाड़े से तोप छोड़कर? फिर तुझसे तो दूर रहते ही होंगे, ये हिज़ड़े?

ठोक सिंहजी – नहीं चाची ऐसी बात नहीं है, ये सारे हिज़ड़े तो इनको समधीजी कहकर बुलाया करते हैं। कई बार तो इनकी नज़र उतारने के लिए इन पर रुपये भी वार लेते हैं। अरे चाची आप आकर चाचा के पहलू में बैठ जाओ, ये हिज़ड़े रशीद भाई पर रुपये वारकर तुमको देते रहेंगे। फिर, फ़ायदा ही फ़ायदा है आपको।

[तभी ऊंघ में पड़ा नूरिया, नींद में ही बोल उठता है।]

नूरिया – [ऊंघ में बोलता है] – फिर मज़ा ही मज़ा, खूब खाओ रसगुल्ला...

हमीदा बी – [चिढ कर, कह उठती है] – नामुराद। क्या कह रहा है, कमबख्त? कमाता धमाता कुछ नहीं, ऊपर से कह रहा है रसगुल्ला खाऊं? तेरे बाप की पेंशन से चल रहा है घर, तू पड़ा-पड़ा ऊंघ लेता रह। अब तू तेरी खोपड़ी पर खायेगा, मेरी जूत्ती का प्रसाद..तब तेरी ऊंघ मिटेगी, नालायक।

[गुस्से में हमीदा बी पाँव की जूत्ती निकालकर, झट उसके सर पर वार करती है। खोपड़े पर मार क्या खाई, उसने? वास्तव में वह तो देख रहा था, सपना। और सपने में उसके सामने खंज़र लिए खड़ी है, भूतनी। मार खाते ही, उसे ऐसा लगा मानो उस भूतनी ने खंज़र उसके सीने में उतार डाला है? डर के मारे वह चीख उठता है, और चिल्लाकर कहता है।

नूरिया – [चीखता हुआ, कहता है] – मार डाला, इस भूतनी ने।

[सुनकर, गुस्सेल हमीदा बी एक बार और जूत्ती से पीटती है..तब कहीं जाकर नूरिये की आँख खुलती है। वह आँखें मसलकर उठता है, और डरता हुआ हमीदा बी से कहता है।]

नूरिया – [आँखें मसलता हुआ, कहता है] – अरे अम्मीजान, आप? कहिये क्या हुक्म है? क्या आपके साथ चलूँ?

हमीदा बी – [जूत्ती को पाँव में डालती हुई, कहती हैं] – कमबख्त, मेरे साथ पाख़ाना चलेगा क्या? वहां बाहर बैठकर, पत्थर बजाते रहना।

नूरिया – जो हुक्म, अम्मी। अभी चलता हूँ।

हमीदा बी – [गुस्से से] – जा बैठ जा, तेरी दुल्हन के पास पल्लू में बंधकर। बड़ा आया नासपीटा, पाख़ाना जाएगा मेरे साथ..?

[गुस्से में पाँव पटकती हुई, हमीदा बी चली जाती है।]

नूरिया – [कमालुद्दीन से कहता है] – अब्बा जान, जा रहा हूँ अपनी दुल्हन के पास, अम्मी का हुक्म बजाना है। उसके पल्लू में बंधकर।

[नूरिया जाता है। उसे जाते देखकर, कमालुद्दीन अपना सर पीट लेते हैं।]

कमालुद्दीन – [सर पीटते हुए, कहते हैं] – लानत है मुझे, ऐसी औलाद पैदा की?

[रशीद भाई, ठोक सिंहजी और सावंतजी ठहाके लगाकर हंसते हैं। मंच पर अँधेरा छा जाता है। थोड़ी देर बाद मंच रोशन होता है, गाड़ी का मंज़र सामने आता है। अब ठोक सिंहजी, किस्सा बयान करना शुरू करते हैं।]

ठोक सिंहजी – [किस्सा बयान करते हुए, कहते हैं] – उसका बाप उसकी जिद्द को पूरी होने नहीं देता, जिससे विनायक गुस्से में भवों को सिकोड़ लेता और मुख खोल देता जिससे मोतियों की लड़ियों के समान चमकदार बत्तीसी दांतों की आभा काम्पते हुए बिंब-सदृश होंठों पर पड़ती हुई मानो इस बात को सूचित करती थी कि क्यों मेरे मन की न हो और पिता उसके ह्रदय तक पहुंच विनायक का मान क्यों नहीं रख लेता?

कमालुद्दीन – बाप क्यों करेगा, उस नालायक की जिद्द पूरी? बेटे को बिगाड़ना नहीं है। देख लीजिये, इस नूरिये के हाल। कमबख्त को मां ने बिगाड़ डाला, अब यह मेरे वश में नहीं रहा।

ठोक सिंहजी – मारने-पीटने से कुछ होने वाला नहीं। चाचा बाप की आँख से डरते हैं, बच्चे। आप आँख काम में लिया करें।

[तभी हमीदा बी पाख़ाने से लौट आती है, और वह ठोक सिंहजी की कही बात सुन लेती है।]

हमीदा बी – [केबिन में आकर, कहती है] – अरे मर्दूद। अब तू मेरे खाविंद को इस वृद्धावस्था में आँख चलाना सिखाएगा? घर में बहू-बेटियाँ बैठी है, और तू इनसे ऐसी वाहियात हरक़त कराएगा? [कमालुद्दीन की बांह पकड़कर, कहती है] नूरिये के अब्बा अब चलो, अपने केबिन में। यह नामुन्छ्या मुंडा तुमको बिगाड़ डालेगा कमबख्त।

ठोक सिंहजी – रुकिए चाची, बात यह नहीं है। मैं तो यह कह रहा था...

[मगर कौन सुने, बेचारे ठोक सिंहजी की अरदास? हमीदा बी तो ठहरी गुस्से की खारी। वह उनका हाथ पकड़कर ले जा देती है, अपने केबिन में। उन दोनों के जाने के बाद, कुछ देर सन्नाटा छाया रहता है। फिर इस सन्नाटे को तोड़ते हुए ठोक सिंहजी कहते हैं।]

ठोक सिंहजी – क्या करें, लोगों के दिल की बात आख़िर लबों पर आ जाती हैं। चलिए किस्सा आगे बयान करते हैं, सुनो। आख़िर में, विनायक को पिता की कही बात माननी पड़ती है। मगर दूसरे ही क्षण उसके क्रोध के चिन्ह कुछ नहीं रहते, परमानन्द जो कुछ विनायक को सिखलाता वह सब विनायक सीख लेता। और यह नया ब्रह्मचारी अनेक कष्ट, व्रत और ब्रह्मचर्य के कैसे ही कठिन नियम जो पिता आज्ञा करता था सब स्वीकार कर लेता था।

सावंतजी – आप सत्य कह रहे हैं, ठोक सिंहजी। आरम्भ में पहले इन खेलते-कूदते बच्चों को संयम से रहना अच्छा नहीं लगता। बस अगर उनको कुछ कह दिया जाय, तो ये बच्चे नाक-भौं सिकोड़ा करते हैं। क्योंकि, इस वक़्त ये बच्चे स्वतन्त्र और अपने मन के राजा हैं।

ठोक सिंहजी – इस कारण ही यह विनायक मनमाना एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ में घूमा करता था कभी नीचे उतर जाता था, कभी ऊपर की चोटी पर जाकर बैठ जाता था और भूख लगती थी तो बिना किसी के रोक-टोक के जंगली फलों को खा लेता था। प्यास लगने पर झरने का स्वच्छ स्वादिष्ट मधुर जल पी लेता था। छठवें वर्ष इन मीठे सुखों का बाधक-विद्यारम्भ जब से विनायक को कराया गया और समय से उठने-बैठने, खाने-पीने की कैद में जकड़ लिया गया, तबसे उसे अखरने लगा और अब तो ब्रह्मचर्य के टेडे से टेडे संयम उसकी स्वच्छंदता पर मानो आरा चला रहे थे।

रशीद भाई – ब्रह्मचारी बनना कोई आसान काम नहीं है। कठोरता से नियम पालन करने से शरीर पर काफी असर पड़ता है।

ठोक सिंहजी – इसलिए विनायक के दोनों गोल कपोल कुछ पीले पड़ गए थे पर यह पीतिमा विनायक के ब्रह्म तेज़ वेग को मानो बढ़ा रही थी। छोटा चिबुक और पतली कोती गरदन इसके गोल चेहरे के सौन्दर्य लुनाई पर मानो मुहर सी थी। ये सब एक-एक अंग मिलकर देखने वाले को विनायक के चेहरे ही से जो भाव दरसाते थे वे ये थे :- कितने बालकों के चेहरों से उनके होनहार बुद्धिवैभव का प्रकाश झलकता है, कितने अपने डील-डौल से बाल्यावस्था ही से अपनी कुटिल प्रकृति का परिचय देते हैं।

सावंतजी – कोई-कोई बालक ऐसे भी होते हैं जिनमें वाक चातुरों की चपलता उनके आकार ही से बरसती है। मगर, विनायक के चेहरे से देखने वाले को क्या असर होता था? इसे समझाइये।

ठोक सिंहजी – सावंतजी, हम जहां तक ख्याल दौड़ाते हैं इस नूतन ब्रह्मचारी के चेहरे से भोलापन हमें जंचता है। हाँ। उसके पतले भीतर को धंसे हुए होंठों को को देख इस बालक में एक प्रकार की दृढ़ता और अपने अध्यवसाय में स्थिरता अलबत्ता भासती थी जो वयक्रम के बढ़ने के साथ ही अवश्य बढ़ती जायेगी। पहले मैंने आपको बताया था कि विनायक दौड़ धूप को बहुत पसंद करता था। निस्संदेह ऐसी रमणीक पर्वतस्थली में रहकर भी जिसने दौड़ धूप न किया हो उसकी प्रकृति संसार भर से न्यारी होगी।

रशीद भाई – ऐसे पर्वतीय स्थल सचमुच रमणीक होते हैं। वहां विकट गुफाओं में विनायक उन्कृष्ट इच्छा से नि:शंक घुस जाता होगा कि अन्दर जाकर देखें यह सुरंग कितनी दूर तक है?

ठोक सिंहजी – सत्य कहा, आपने। वहां दिन में भी इन गुफाओं में “लींन दिवा भीतमिवान्धकारम्” इतना अंधकार रहता था कि पांच-दस क़दम आगे बढ़ने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी। एक दिन विनायक एक बड़ी नीची गुफा में उतरने के तांक-झाँक में था अकस्मात उसकी मां कमला बाई जो पास के झरने से पानी लेने आयी थी इसे नीचे उतरते देख दौड़ आयी और पकड़ ले गयी। कमला को इन गुफाओं के बारे में बहुत हाल मालूम न था पर मोटी रीति पर यह विश्वास उसके मन में जमा हुआ था कि..

clip_image001सावंतजी – ऐसा कौन-सा विश्वास जमा था उसके दिल में, जिससे यह कमला विनायक के गुफा में जाने से डरने लगी? और जाकर, उसे पकड़कर वहां से ले आयी।

ठोक सिंहजी – दुनिया भर के भयंकर जानवर सिंह, व्याघ्र आदि हिंस्त्र पशु सब इन्हीं गुफाओं में रहते हैं इससे और भी विनायक को गुफ़ाओं के निकट जाने नहीं देना चाहती थी। उन दिनों विनायक नित्य अपनी मां से रामायण की कथा सुनते-सुनते सो जाया करता था। उस दिन राम चन्द्र का दंडकारण्य के राक्षसों के मारने की कथा आयी। कमला विनायक की देह से धूल पोंछते और उसके बाल संवारती हुई बोली...

[किस्सा सुनते सावंतजी व रशीद भाई की आँख लग जाती है, अब वे ख़्वाब में वह मंज़र देख रहे हैं जिसमें विनायक के सवाल करने पर उसकी मां कमला उससे कह रही है।]

विनायक – और, सब राक्षस मारे गए?

कमला – हाँ। राक्षस मारे गए पर उनमें से एक भाग गया और राम चन्द्र उसे पकड़ नहीं सके और उसी गुफा में पैंठ गया। जहां वह आज-तक छिपा है, जिसकी ओर तुम जाते थे बल्कि रात को कभी-कभी यह निशाचर बाहर निकलता भी है।

[सुनकर, विनायक सहम जाता है। तब से वह इस गुफा के पास फटकने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। परमानन्द के मकान से उत्तर की और ५-७ गज की लम्बी-चौड़ी झील है, उस झील की गहराई नापने के लिए वह अपने घर में उपलब्ध सबसे लम्बी रस्सी ले आता है। फिर उसके सिरे पर ढेला बांधकर उस रस्सी को झील में डाल देता है फिर उसकी थाह लेने की कोशिश करता है मगर उसकी थाह नहीं मिलती, तब उसने समझ लिया है कि यह झील समुन्द्र का हिस्सा है। मगर जब इसने समुन्द्र मंथन की कहानी सुनी है, तब दूसरे दिन भोर से यह विनायक यह अजमाने की कोशिश करता है कि इस झील को अगर मथा जाय तो कोई रत्न मिलते हैं या नहीं? तब वह दो बड़ी लकडियाँ लाकर उस झील में डालकर घंटों तक उस झील में छपर-छपर करता हुआ खेलता जा रहा है। इस तरह कई दिन तक वह झील के किनारे बैठकर, झील को मथने की कोशिश करता है। आख़िर उसकी मां के डांटने से वह, सहम जाता है और यह हरक़त करना छोड़ देता है। गाड़ी के इंजन की सीटी सुनायी देती है, आवाज़ सुनकर सावंतजी और रशीद भाई की ऊंघ दूर हो जाती है। उनको सामने बैठे ठोक सिंहजी नज़र आते हैं, वे कह रहे हैं...]

ठोक सिंहजी – बेचारे विनायक को सदा इस बात का खेद रहा कि, क्यों मां मेरे सराहनीय प्रयासों को न समझ उलटा घोंटती है। विनायक क्या, इस संसार में लोग इसी अचरज और दु:ख में रहते हैं कि उनके मन की क्यों नहीं होती? पूर्वजन्य कर्म वासना रूप हो मनुष्य को सब और से जकड़े हुए हैं जो उसे एक क्षण भर के लिए भी मुक्त नहीं किया चाहती फिर भी वह जीव स्वयं प्रभु बन ईश्वर की इच्छा का कायल नहीं हुआ चाहता।

सावंतजी – ज्ञान की बातें बहुत सुन ली है, ज़नाब। अब आप आगे कहिये, ‘जब परमानन्द और कमला ठाकुर साहब की गढ़ी जा रहे थे, उस वक़्त विनायक क्या कर रहा था?’

ठोक सिंहजी – [अंगड़ाई लेते हुए, आगे कहते हैं] – उस दिन तड़के संध्या-वंदन आदि कर्म परमानन्द के जाने के पहले वह निपट चुका था और अब गौ के लिए चारा और उस दिन के होम के लिए लकड़ी और कुशा लाने की फ़िक्र में घर से बाहर निकला। ज्योंही ड्योढ़ी के बाहर पाँव रखा कि घोड़े की टाप का शब्द सुनायी दिया। विनायक का घर पगडंडी के रास्ते पर ही था इसलिए उसने समझा कि घोड़े पहाड़ के एक और से दूसरे को जाते होंगे पर उसे कुछ अचरज सा हुआ जब उसने देखा कि तीनों सवार रास्ते को छोड़ उसके घर ही की और मुड़े और जहां वह खड़ा था वहीं आकर उन्होंने अपने घोड़े रोके।

[गाडी तेज़ रफ़्तार से पटरियों के ऊपर दौड़ रही है। ठोक सिंहजी किस्से को यहीं छोड़, पाख़ाने की ओर क़दम बढ़ाते हैं। रशीद भाई के पिछवाड़े से तोप छूटती है, जिससे पूरे डब्बे में दुर्गन्ध फ़ैल जाती है। उधर ठोक सिंहजी ने पाख़ाने को दरवाज़ा खोला है, बदबू बढ़ जाती है। यह बदबू नाकाबिले बर्दाश्त होने पर, पास के केबिन में बैठी हमीदा बी कूकती है।]

clip_image003हमीदा बी – अरे मर्दूद। तूने बदबू फैला दी कमबख्त, इस पूरे डब्बे में। [ऊंघ ले रहे नूरिये से, कहती है] अरे नूरिये अब ऊंघ मत ले, उठ जा कमबख्त। अब जाकर पकड़कर ला, इस अब्दुल अज़ीज़ के छोरे को। मर्दूद, कब से छोड़ रहा है तोप?

[ऊंघ में पड़े नूरिये को पूरा साफ़ सुनायी नहीं देता, वह तो बैठा-बैठा ख़्वाब देख रहा है, जिसमें बरगद के पेड़ से एक नाग नीचे छलांग लगा रहा है। फिर क्या? वह ख़्वाब में उस नाग से बचने के लिए हाथ बढ़ाकर उसे पकड़ लेता है। मगर वास्तव में वह अपने पास बैठे अब्बा कमालुद्दीन के पायजामे का तीज़ारबंद पकड़कर, उसे खींच लेता है। और, ऊंघ में ही वह चीखता हुआ कहता है।]

नूरिया – [तीज़ारबंद खींचता हुआ, चीखता है] – पकड़ लिया, पकड़ लिया। सांप को पकड़ लिया।

कमालुद्दीन – [नूरिये के सर पर ठोल जमाते हुए, कहते है] – कमबख्त सांप नहीं है, यह। तेरे बाप का तीज़ारबंद है..अब तू इसे खोलकर, तेरे बाप को सरे आम नंगा करेगा क्या? छोड़, मेरा तीज़ारबंद।

[गाड़ी की रफ़्तार धीमी हो जाती है, लूणी स्टेशन आने वाला है। मंच पर अँधेरा छा जाता है।]


[क्रमशः अगले खंडों में जारी...]

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