संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 55 : पहली विमान यात्रा // राजशेखर चौबे

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राजशेखर चौबे

प्रविष्टि क्र. 55

पहली विमान यात्रा

राजशेखर चौबे

मनुष्य हमेशा से हवा में उड़ना चाहता रहा है । यह उसकी प्रारंभिक नैसर्गिक इच्छाओं में से एक है। अभी सभी जगह पर सत्ता पक्ष के लोग विपक्ष को निपटाकर (सिवाय दिल्ली के) हवा में उड़ रहे हैं, मैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं । मैं सचमुच हवा में उड़ने की बात कर रहा हूं हमारा दावा है कि राईट बन्धुओं के पहले हमने हवाई जहाज बना लिया था । इस पर एक फिल्म भी बनी थी जो बुरी तरह फ्लाप हुई थी । सामने वाला यदि इस तर्क से सहमत न हो तो ‘पुष्पक विमान‘ का उदाहरण देकर निरूत्तर (आप उसे) कर सकते हैं । आजकल हवाई यात्रा ‘माल‘ में फिल्म देखने और पापकार्न खाने से आसान काम हैं हरेक व्यक्ति जो माल में पापकार्न के साथ फिल्म देखता है, हवाई यात्रा कर चुका होता हैं। पहले-पहल नव धनाड्य लोग या LTC लेने वाले ही हवाई यात्रा करते थे। LTC में भी सभी कर्मचारियों को कश्मीर या अंडमान जाना होता था और वे अंडमान जाना पसंद करते थे । मुझे कइयों को एयरपोर्ट में टिन की पेटी पर बैठे हुए देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।

मुझे भी सस्ती एयरलाईन्स का सहारा मिला और मैं अपने परिवार के साथ रायपुर एयरपोर्ट पहुंचा । हमें मुंबई जाना था। मन में एक धुकधुकी भी लगी हुई थी । किसी ने बताया कि हवाई-झूला जैसा ही लगेगा। इस तरह हम तीनों (मेरी बेटी भी साथ थी) हवाई-झूला की सवारी के लिए तैयार हो गए थे । हमारी फ्लाइट का टाईम 3 बजे दोपहर को था । हम खाना खाकर एक बजे एयरपोर्ट पहुंच गए थे । अनुभवी मित्र ने बताया था कि समोसा, सैंडविच या कुछ और (जिसके बारे में ज्यादा मालूम नहीं हैं। ) लगभग 150 रू. में मिलेगा। सिक्यूरिटी चेक में मेरी सेविंग किट की कैंची को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। ( चूंकि यह हैंडबैग में रखा था ) फ्लाइट लेट होने के कारण हम लोग चार बजे हवाई जहाज के अंदर पहुंचे । विमान की सीटें छोटी थी । मोटे लोगों को बैठने में काफी दिक्कत हो रही थी । हमारे आसपास लोग खड़े नहीं थे अन्यथा मिनी बस की सवारी का ही एहसास होता ।

किसी तरह विमान आगे बढ़ने लगा। मेरी बेटी के साथ अन्य बच्चे भी ताली बजाने लगे । विमान की गति बढ़ने लगी । मैंने अपनी पत्नी और बेटी को इशारा किया । हम तीनों आंख बंदकर भगवान को याद करने लगे (इसकी प्लानिंग हम लोगों ने पहले ही कर रखी थी ) मुझे लग रहा था कि हम हवा में उपर उठ चुके है परन्तु इसका एहसास ही नहीं हो रहा था । मैंने आंखें खोली तो सामने स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट रायपुर लिखा था । मैंने अपनी भार्या से कहा कि देखो एयरपोर्ट उपर से भी वैसा ही दिखाई दे रहा है। उसने मुझसे कहा- ‘धीरे बोलो हम लोग जमीन में ही है‘। मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा । किसी को कुछ भी पता नहीं था । सभी सिर्फ यह जानते थे कि किसी कारण से विमान हवा में नहीं जमीन पर ही था । समय गुजरने लगा, पांच बज चुके थे । तभी एक एयर होस्टेस अपने चिर-परिचित मुस्कान के साथ आई और बताया कि विमान में कुछ तकनीकी खराबी आ गई है और उसे ठीक किया जा रहा है । उसके तुरन्त बाद हम मुंबई के लिए रवाना होगें । लगभग 6 बजे बताया गया कि अब सब ठीक-ठाक है और हम रवाना होने वाले हैं । इसी बीच बच्चे रोने लगे । यात्रियों की मांग पर जलपान की व्यवस्था की गई । हमारी सीट पीछे थी, फिर भी मैंने आगे जाकर Rs. 450 (150x3) की सैंडविच खरीद ही ली । लोगों का भरोसा ‘डेक्कन एयरलाइन्स‘से उठ चुका था । लोगों ने अधिक से अधिक खाने का सामान खरीद लिया । समोसा, सेंडविच, चाय कॉफी आदि सब कुछ खत्म हो चुका था । अंतिम 8 लाइन वालों को कुछ भी नसीब नहीं हुआ । वे अपनी शराफत का खमियाजा भुगत रहे थे ।

हम तीनों भी अंतिम 8 लाईन में शामिल थे । इन लाईनों के यात्री हमें खा जाने वाली नजरों से देख रहे थे । हम तीनों सैंडविच खा गए और उन्हें बुरा न लगे इसीलिए डकार भी नहीं ली । कुछ यात्री रिफन्ड की मांग करने लगे भूखे यात्री इस पर अधिक मुखर थे । हमारे आगे लाईन में दो कालेज के लड़के बैठे थे । वे आपस में लड़ रहे थे कि ट्रेन से यात्रा अधिक अच्छी है । कुछ यात्रियों की राय थी कि विमान उड़ाना चाहिए, भले ही ऊपर जाकर कुछ भी हो जाए । कुल मिलाकर जितने लोग उतनी राय और सबकी राय जुदा-जुदा थी । लगा कि हम विमान यात्री नहीं किसी विधान-सभा के सदस्य हैं । तभी दूसरी एअर होस्टेस आई और बताया कि तकनीकी खराबी दूर कर ली गई है । सभी यात्री बच्चों के साथ ताली बजाने लगे । किसी तरह 7 बजे विमान रवाना हुआ । हम लोगों ने भी टोटका किया और आंख खुली रखकर प्रार्थना की । विमान सचमुच उपर आ चुका था । सभी यात्री इस चिंता में थे कि तकनीकी खराबी सचमुच दूर हुई है या नहीं । पायलट ने बताया कि इस समय विमान 10000 फीट की ऊंचाई पर है और बाहर का तापमान -30 डिग्री सेल्सियस है । विमान के भीतर का तापमान 22 डिग्री रखा गया है । इसके बाद बताया गया कि हम मुबई पहुंचने वाले है । कुर्सी की पेटी बांधने का संदेश भी जारी कर दिया गया फिर बताया गया कि बारिश हो रही है और विमान कुछ समय बाद ही लैण्ड कर पाएगा । बारिश बंद हो चुकी थी फिर भी देरी हो रही थी । पूछने पर बताया गया कि एअरपोर्ट में congestion (भीड़) अधिक है अतः अभी लैण्ड करना संभव नहीं है । स्वाभाविक है क्योंकि पायलट रायपुर के आटो चालक जैसा एक्सपर्ट नहीं था ।

अंततः 10.00 बजे मुंबई एअरपोर्ट में हमारा विमान उतरा । आंखे शाहरूख, अमिताभ, माधुरी आदि को ढूंढने लगी परन्तु निराशा ही हाथ लगी । लगभग 10.30 बजे बेल्ट से अपना सूटकेस लेकर हम आगे बढ़े तभी मेरी पत्नी को कुछ शक हुआ, उसने कहा कि यह हमारा सूटकेस नहीं है। सूटकेस का रंग व माडल एक ही था परन्तु टैग पर राजशेखर की जगह ‘माहुरकर‘ का नाम लिखा था भगवान भी हमारी परीक्षा लेने पर उतारू थे । हम लोग तुरन्त एअरलाईन्स के काउन्टर पर पहुंचे । वहॉं बैठी लड़की से मैंने कहा हमारा सूटकेस कोई और ले गया है । हमारे साथ ही एक और व्यक्ति खड़ा था उसके साथ भी वही हादसा हुआ था । हम लोग सकते में थे परन्तु वह हल्ला करने लगा । लड़की के बॉस ने पूछा क्या हुआ । लड़की ने कहा Exchange Offer. ऐसा Exchange Offer हम लागों को पहली विमान यात्रा में ही नसीब हो गया था ।

किसी तरह माहुरकर जी का टिकट ढूंढ़ा गया उसमें उनका मोबाइल नंबर था । रिसेप्सनिस्ट ने उसे फोन लगाया परन्तु उसने फोन नहीं उठाया । दोबारा फोन लगाने पर बात हुई । वह उसे प्रेम से समझाने लगी । परन्तु सामने वाला जैसे केजरीवाल था और कोई गलती कर ही नहीं सकता था । मैंने माहुरकर जी से बात की उसने कहा कि मैं ‘‘पेडर रोड‘‘ तक आ गया हॅूं और अभी आ नहीं सकता । मैंने उनसे कहा कि मैं सूटकेस चोरी का FIR दर्ज करवा रहा हॅूं और यह धमकी ‘जुमला‘ नहीं है । यह धमकी काम कर गई और उन्हें वापस आना पड़ा । फिर भी वे 11.30 बजे रात को आए । इस तरह हमें ‘चीरा बाजार‘के होटल पहुंचने में रात को 1.00 बजे गए ।

होटल पहुंचकर मेरी पत्नी ने पूछा कि हमने किस एअरलाईन्स से यात्रा की है । मैंने कहा कि तुम्हीं बताओ उसने कहा ‘डेक्कन एअरलाईन्स‘। मैंने कहा ढक्कन एअरलाईन्स‘ कहना ज्यादा सही रहेगा और यह हमेशा ढक्कन ही रहेगा । क्या मालूम था कि इसे खरीदकर ‘विजय माल्या‘ पूरे देश को ही ढक्कन बना देगा ।

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परिचयः-

एक प्रबुद्ध, स्वतंत्र लेखक एवं व्यंग्यकार । श्री राजशेखर चौबे कविता, कहानी लेख आदि लगातार लिख रहे हैं लेकिन उनकी प्रथम रूचि व्यंग्य ही है । वे श्री हरिशंकर परसाई एवं श्री शरद जोशी से विशेष प्रभावित हैं। व्यंग्य की विधा में उनकी अभिरूचि उनकी विशिष्टता व्यक्त करती है । इस क्षेत्र में उनकी लेखनी बहुत ही पैनी है । व्यंग्य संग्रह ‘आजादी का जश्न‘ में उन्होंने हमारे आस-पास की सम-सामयिक घटनाओं पर ही व्यंग्य तैयार किया है । ‘आजादी का जश्न‘ भावना प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई एवं अमेजन सेल पर भी उपलब्ध है । राजशेखर चौबे जी.एस.टी. एवं कस्टम्स विभाग में असिस्टेंट कमिशनर के पद पर छत्तीसगढ़ में पदस्थ हैं ।

राजशेखर चौबे,

पता- मकान नं. 295/ए

रोहिणीपुरम रायपुर

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