नाटक // भोला विनायक - खंड 6 // दिनेश चन्द्र पुरोहित

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

पिछले खंड  यहाँ देखें - खंड 1 // खंड 2 // खंड 3 // खंड 4 // खंड 5 // 

नाटक ‘भोला विनायक’ का खंड 6

लेखक दिनेश चन्द्र पुरोहित


clip_image001

[मंच पर, रोशनी फ़ैल जाती है। रेल गाड़ी के शयनयान डब्बे में रशीद भाई, सावंतजी और ठोक सिंहजी अपनी सीटों पर बैठे हैं। ठोक सिंहजी इन दोनों को, विनायक का किस्सा सुना रहे हैं।]

ठोक सिंहजी – [क़िस्सा सुनाते हुए, कहते हैं] – देखिये ज़नाब, ये तीनों मेहमान कौन थे? इस बारे में मैं आपको एक बार और बता देता हूँ। ये तीनों वे ही डाकू थे, जिन्होंने इस जंगल में पेड़ों के तले रात को विश्राम किया था, और बाद तड़के उठकर इन लोगों ने देखा कि सामने टीले के ऊपर एक मकान है और उसी टीले से नीचे उतरते उन्होंने एक स्त्री और पुरुष को देखा।

सावंतजी – यह तो साधारण मनुष्य भी झट अनुमान लगा सकता है कि यह मकान इन्हीं दोनों का है। जब परमानन्द और उनकी पत्नी कमला इन डाकुओं के पास से गुज़रे थे, डाकुओं ने इन्हें भली-भांति देखा था। इनकी सीधी-साधी सूरत-शक्ल देखकर यही तय किया था इन्होंने कि, ये दोनों ब्राह्मण हैं।

ठोक सिंहजी – आपका अनुमान सही है। परमानन्द अपनी स्त्री से खुल के बतियाते जाते थे और ठाकुर साहेब के यहाँ जाने की खुशी में ऐसे डूबे थे कि उनकी आँख इन डाकुओं पर बिलकुल न पड़ी। और इन ठगों ने जब पेड़ की आड़ में उन दोनों की वार्ता सुन ली तो उनको तुरंत मालूम हो गया कि ये दोनों कहीं जाते हैं और देर से लौटकर घर आयेंगे। जब ताड़ लिया कि दोनों स्त्री-पुरुष आँख से ओझल हो गए तो तीनों डाकू भाले हाथ में लिए उस पहाड़ी टीले पर घोड़ा चढ़ाय परमानन्द के घर के सामने अपने-अपने घोड़े एक पेड़ से बांधकर वे घर में दाख़िल होना चाहते थे।

सावंतजी – ज़नाब, आप यह बताएं कि ऐसे जंगल में पक्के मकान बनने का कोई सवाल नहीं, तो फिर परमानन्द का मकान किस ईमारत सामग्री से तैयार किया गया? जिससे, इनका घर मज़बूत मकान के रूप में दिखाई दें।

ठोक सिंहजी – परमानन्द का मकान काठ का बना था केवल कहीं-कहीं पत्थर के जोड़ थे। सामने उसके तीन दर की एक दालान और जिस दरवाज़े से भीतर जाने का रास्ता था उस पर एक छोटी सी सेंदूर से रंगी लाल मूर्ति गणेशजी की रखी थी। उसी दरवाज़े पर विनायक आकर खड़ा हो गया।

रशीद भाई – क्या उस बेचारे विनायक को धक्का देकर, वे तीनों अन्दर दाख़िल तो न हो गए?

ठोक सिंहजी – नहीं, ऐसा नहीं हुआ। सरदार के दोनों साथी भले ही बड़ी-बड़ी खूनी लड़ाइयां लड़े थे पर न जाने क्यों वे भी क्षण भर ठहर से गए और चाहे वे सभी हथियार लिए थे पर नि:शस्त्र विनायक को हटाकर भीतर घुसने की हिम्मत उनकी भी न पड़ी। कहाँ तो वे सरदार से दो क़दम आगे बढ़े जाते थे कहाँ यहाँ आकर रुक गए और सरदार का मुंह जोहने लगे। फिर क्या? सरदार विनायक से, कहने लगा...

[अब सावंतजी और रशीद भाई की आँखों के आगे, वाकया चित्र बनाकर छाने लगा। विनायक के घर का मंज़र दिखाई देता है, विनायक दरवाज़े के पास खड़ा है और सरदार उससे पूछ रहा है।]

सरदार – क्यों रे। तू क्यों घर पर रह गया है?

विनायक – महाराज। पिताजी हमारे ठाकुर साहेब के यहाँ गए हैं।

सरदार – हाँ, हाँ, सो तो हम जानते ही हैं। अभी राह में उनसे भेंट हुई थी।

विनायक – हाँ, तो फिर घर चलिए ना।

[अब विनायक को कुछ संदेह न रहा, वह समझने लगा कि ये लोग उसके बाप के कोई जान-पहचान के या दोस्त हैं और वह द्वार से हट गया जिससे ये लोग भीतर जा सके। इस बात से इन तीनों की हिम्मत बढ़ी और भेद लेने के ढंग पर यों पूछने लगे।]

सरदार – तो यह बताओ। तुम्हारे पिता कहाँ चले गए हैं, और तुमको अकेला क्यों छोड़ गए?

[यह सुनकर विनायक कुछ चौकन्ना-सा हो गया क्योंकि अभी ही उन लोगों ने कहा था कि हम लोगों से तुम्हारे पिताजी से बात हो चुकी है तो फिर हमसे फिर इस तरह क्यों पूछते हैं? फिर भी, विनायक कह देता है।]

विनायक – जी हाँ। ठाकुर साहेब के यहाँ गए हैं।

सरदार – हाँ। ठाकुर साहेब के यहाँ क्यों गए हैं?

विनायक – उन्होंने बुलाया था। कल हमारे यज्ञोपवीत के समावार्त्तन का दिन है।

सरदार – किसका दिन कल है? [क्योंकि डाकू लोग बेचारे क्या जानते, संस्कृत के शब्द? उन्होंने कभी ऐसा शब्द सुना नहीं था।]

विनायक – [विनायाक ने समझा, उन लोगों ने सुना नहीं होगा इसलिए वह एक बार और बोला] – समावार्त्तन।

सरदार – हाँ। तभी तुम्हारे पिताजी ने कहा तुम ऊपर वहां चलो। तुम्हारा नाम क्या है?

विनायक – मेरा नाम विनायक है।

सरदार – ठीक है, तुम्हारे पिताजी ने यही कहा आप लोग ऊपर चलिए वहां विनायक है। वह आप लोगों को उतारेगा। अच्छा। अब यह बताओ कि तुम्हीं अकेले इस घर में हो कि कोई दूसरा भी है?

विनायक – अभी तो मैं ही हूँ। रामू बेचारा अहीर हमारा कुछ काम कर देता है पर इस समय वह भी जो उस गाँव में हाट लगती है वहां कुछ वस्तु लेने गया है।

सरदार – कौन-सी वस्तु?

विनायक – वह तो मैं नहीं जानता पर पिताजी ने उससे चलते वक़्त यह कहा कि चीजें तो हमारे सब आ गयी है किन्तु थोड़ी-थोड़ी और ला दे कदाचित जून पर घाट जाए तो यहाँ पास बाज़ार भी नहीं है काम पड़ने पर कैसे इकट्ठी हो सकेगी।

सरदार – तो यह कहो कि, सब चीजें आ गयी है। क्योंकि, इस बात का अंदाजा हमको भी था। भला देखें तो क्या-क्या आया है, और क्या-क्या नहीं आया।

[इतनी बातचीत विनायक और तीन आदमियों से बाहर ही हुई। विनायक आगे हुआ और वे लोग उसके पीछे-पीछे घर में चले। भीतर जाकर देखा तो घर में कोई बात अमीरी कहीं भी झलकती नहीं, पर सफ़ाई और सुथरापन हर एक वस्तु में झलकता है। भीतर आकर उन दोनों साथियों को निराशा ही उत्पन्न हुई। जैसा बाहर से देखने से यह मकान भड़कीला मालूम होता था वैसा भीतर कुछ भी सामान न था। मकान परमानन्द के पूर्वजों ने बनाया था, वे लोग ज़रूर संपन्न रहे होंगे। मगर परमानन्द बेचारे की दशा समय के हेर-फेर के कारण अब वैसी नहीं है इसलिए ग़रीबी दशा में रहने से जो जो बातें होती है वही सभी दिखाई दे रही है। विनायक थोड़ा आगे बढ़ गया है, तब पीछे से ये तीनों आपस में बातें करने लगे।]

सरदार – देखो भाई, इस विनायक की चितवन और बोल-चाल में एक ऐसी अनोखी मिठास भरी हुई है जिसने मेरे मन को वश में कर लिया है।

पहला साथी – हुज़ूर, आप यह क्या कह रहे हैं? हम डाकू हैं, किसी के साथ प्रेम-स्नेह नहीं रखा करते।

दूसरा साथी – [सभी ओर आँखें फाड़कर, देखता हुआ] – हुज़ूर, कुछ न कुछ तो लूटेंगे ही, आख़िर हम हैं दस्यु। हम किसी से सम्बन्ध जोड़ने नहीं आये हैं, यहाँ।

सरदार – देख भाई, आख़िर हम लोग भी इंसान हैं। इस बच्चे पर रहम रखना, हमारा फ़र्ज़ है। अब हम अपने हथियार यहीं रख देते हैं, क्योंकि यह बेचारा अकेला बालक है जो हमारा कुछ बिगाड़ नहीं सकता।

[फिर क्या? वे तीनों अपने हथियार वहीं दालान में रख देते हैं। तभी विनायक भण्डार गृह के दरवाज़े के पास पहुंचकर, पीछे घूमता है। तब उन तीनों को आते न देख वह जोर से उनको आवाज़ देते हुए कहता है।]

विनायक – [आगे भण्डार गृह से, ज़ोर से आवाज़ देता हुआ कहता है] – अजी महाराज, कहाँ रुक गए आप तीनों?

सरदार – आ रहे हैं, तुम वहीं खड़े रहो। [साथियों से कहता है] अब चलिए। देखते हैं यह बालक क्या दिखलाता है?

[सभी भण्डार कक्ष के दरवाज़े पर पहुंच जाते हैं। रास्ते में एक ऐसा स्थान था, जहां एक चबूतरा बना दिखाई देता है। जिस पर एक चटाई बिछी हुई है। इन तीनों डाकूओं को उस स्थान की जानकारी देते हुए, विनायक अब कहने लगा।]

विनायक – महाराज रास्ते में जिस चबूतरे को आप तीनों देख आये हैं, जिस पर एक चटाई बिछी है..वह स्थान पिताजी के अध्यापन कराने का स्थान हैं।

पहला साथी – क्या कहा, विनायक? अध् पान..पान? यानी तुम्हारे पिता यहाँ बैठकर, पान खाया करते हैं?

[विनायक और सरदार ठहाका लगाकर हंस पड़ते हैं। किसी तरह हंसी दबाकर, सरदार कहता है।]

सरदार – [लबों पर आ रही हंसी को दबाता हुआ, कहता है] – अरे भाई, तुम अच्छी तरह से सुना करो। विनायक कह रहा है, “अध्यापन” यानि पढ़ाना। यहाँ बैठकर, इसके पिताजी अपने शिष्यों को पढ़ाया करते हैं। जब तू छोटा था, तब तूझे कहा था कि ‘गुरुकुल जाकर शिक्षा भी लिया कर, नहीं तो उज्जड़ बना रहेगा।’

दूसरा साथी – पढ़ाई नहीं की तो क्या हो गया? आखिर आप और हम है तो, एक ही पेशे में। इस पेशे में यह पढ़ाई किस काम की?

सरदार – प्यारे, दोनों में फ़र्क है। मैं इस पेशे में आया हूँ मेरी मज़बूरी के कारण, मगर तुम दोनों आये हो अपने स्वभाव के कारण।

विनायक – अरे महाराज, आप तीनों तो आपस में बहस करने लगे? मैं कह रहा था कि, आपने उस चबूतरे पर काठ की पेटी देखी होगी? उसमें कई ग्रन्थ और मेरे पिताजी के हाथ की लिखी गयी टीका की पुस्तकें हैं। क्या आपको, पेटी खोलकर दिखालाऊं? आपको मालूम होगा, कई गुरुकुल ऐसे हैं जहां मेरे पिताजी की लिखी हुई पुस्तकें पढाई जाती है।

सरदार – [उसे दुआ देता हुआ, कहता है] – बेटा, तू भाग्यशाली है, जो तू ऐसे ग्यानी पुरुष का पुत्र है। ईश्वर करे, तू भी पिताजी की तरह ज्ञानवान बनें। अब तू इन उज्जड़ आदमियों के सामने ज्ञान की बात मत कर। आगे चल, और दिखला, तेरे पिताजी ने क्या-क्या सामग्री लाकर रखी है?

[सरदार के साथी अपने साथ किये जा रहे अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। मगर सरदार के रोब के कारण वे मन-मसोसकर एक दूसरे का मुंह देखने लगते हैं। इधर विनायक को याद आने लगा, जाते समय वह अपनी मां से इस भण्डार गृह के ताले की चाबी लेना भूल गया। अब उसे फ़िक्र होने लगी कि, अब वह इस कोठरी को कैसे खोलकर इकट्ठी की गयी सामग्री इनको दिखला पायेगा?]

विनायक – [फ़िक्र करता हुआ, कहता है] - क्या कहूं, महाराज? कोठरी के ताले की चाबी मां के पास रह गयी है, अब मैं कोठरी खोलकर कैसे दिखलाऊं, आपको? कल ही मां ने इस कोठरी में, सामान रखे हैं।

पहला साथी – चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है, विनायक। [सरदार के कान में, फुसफुसाकर कहता है] यह बेवकूफ समझता है, हम बिना चाबी इस कोठरी को देख नहीं पायेंगे और निराश होकर लौट जायेंगे। [प्रगट में, कहता है ] कुछ हर्ज़ नहीं, हम लोगों के पास सब तालों की एक बड़ी ताली रहती है। अच्छा आओ। ज़रा देखें, तुम्हारे पिता ने कल के लिए क्या-क्या मंगवाया है?

[इतना कहकर, वह आगे बढ़कर उस ताले को अपने हाथ से ऐसा जोर से झटकता है..तब ताला क्या दरवाज़ा तक ढीला पड़ जाता है। विनायक इस बात से चकित तो ज़रूर होता है क्योंकि इस तरह वह अपनी मां को दरवाज़ा खोलते कभी न देखा था। फिर भी उसका कुछ विशेष ध्यान उसके जी में न रहता है। कोठरी में आने के बाद उन तीनों को वहां की चीजें दिखलाने के बदले वह आप कुछ देखने सा लगता है और बड़े चाव से विनायक ने सरदार को केवल दो चीजें दिखलाता है और जब सरदार ने और-और चीजों के सामने उसकी बतायी हुई चीजों पर आँख भी उठाकर नहीं देखता है वरन सुनी बात अनसुनी-सा कर देता है तब तो विनायक का जी कुछ छोटा हो जाता है और-और उन दोनों चीजों को स्वयं उठाकर बड़े प्यार से देखने लगता है। वे कोई भारी चीज़ नज़र नहीं आ रही है, वे तो केवल मिट्टी के खिलौने हैं। उनमें से एक तो हनुमानजी की मूर्ति है। इसको विनायक इसलिए अपने पास रखता है कि इसकी पूजा करने से उसके बल में वृद्धि होगी। और दूसरी, नीली-पीली रंग की गौ है। विनायक जब कभी मचलता है, तब उसकी मां इस गाय के खिलौने को उसे देकर कहती है कि यह गाय तेरी सास ने भेजी है अब अगर तू मचलाई करेगा तो यह गाय तेरी सास के पास चली जायेगी। और, तेरा ब्याह नहीं होगा। अब इस वक़्त विनायक इन खिलौनों को पाकर क्षण-भर के लिए उन तीनों मेहमानों का ख्याल छोड़ उनकी ओर पीठ कर खिलौनों को देखता जा रहा है। इस बीच वे डाकू कोठरी में रखे सामान को अच्छी तरह से देखते जा रहे हैं। तीन-चार जोड़े पीताम्बर, दो-एक चांदी के, और दस-पंद्रह ताम्बे के बरतन देखकर उन्होंने फूल आदि की भी वस्तुएं साथ में देखते जा रहे हैं। वहां अटारी पर विनायक की मां का कपड़ा भी रखा है, इसके साथ कल होने वाले जेउनार की सामग्री मैदा, चीनी, घी फल आदि रखे हुए हैं। सरदार के साथी ठहरे, भूक्खड़। फल देखते ही, वे झट लपककर उन फलों को उठा लेते हैं।]

सरदार – क्या कर रहे हो, तुम दोनों? तुम नहीं जानते, यह यज्ञ की सामग्री है।

पहला साथी – [केला छीलता हुआ, कहता है] – हुज़ूर यह पेट की जठराग्नि, होम की अग्नि से कहीं उत्तम है, इसलिए मैं समझता हूँ इस जठराग्नि को शांत करना एक पुण्य का कार्य है।

दूसरा साथी – [खट्टे केरुन्दों को मुंह में डालकर चबाता हुआ, कहता है] – अरे विनायक, यह फल स्वादिष्ट होना चाहिए...अरे..अरे..[चबाते-चबाते, उसका मुंह खट्टा हो जाता है] मेरा मुंह तो, खट्टा होता जा रहा है। हाय हाय, विनायक कुछ करो...

विनायक – [लबों पर चंचल मुस्कान बिखेरता हुआ, कहता है] – अरे महाराज ये खट्टे हैं, आपने क्यों खाए? इन फलों को हरी मिर्चों के साथ मिलाकर पकाया जाता है, तब स्वादिष्ट सब्जी बनती है।

दूसरा साथी – [तिलमिलाया हुआ, कहता है] – बकवास मत कर, विनायक। पहले तू कुछ ला, मेरे मुंह का जायका बदल जाय।

विनायक – [आले की तरफ़ उंगली से इशारा करके, कहता है] – महाराज उस आले में चूर्ण की पुड़िया रखी है, आप उसे चखिए...ध्यान रखें कि..

[मगर उस डाकू के दिल में मची है उतावली, वह क्यों सुनेगा विनायक की कही जा रही हिदायत? सत्य बात तो यह है कि, चूर्ण की पुड़िया के पास सोनामुखी की पुड़िया भी रखी है। विनायक उस पुड़िया को न उठाने की हिदायत दे रहा था..मगर उतावली वश उस डाकू ने उसकी बात सुनी नहीं और सोनामुखी की पुड़िया खोलकर फटाफट उस सोनामुखी के चूर्ण को खा जाता है। तभी उसका पहला साथी केला खाकर छिलका नीचे गिरा देता है जिसके ऊपर दूसरा साथी अपना पाँव रख देता है। रखते ही डाकू महाशय धडाम से गिर पड़ते हैं। उसको चारों खाना चित्त पड़े देखकर, सभी ठहाके लगाकर जोर से हंसते हैं। उन सबको हँसता पाकर, वह अपना अपमान मान बैठता है।]

सरदार – [हँसता हुआ, कहता है] – अरे धृतराष्ट्र के अवतार, इस तरह कहीं अब मधुमक्खियों के छत्ते में हाथ मत डाल देना। इसलिए कहता हूँ ज़रा संभलकर चला कर, ज़माना खराब है।

विनायक – [सहारा देने के लिए, अपना हाथ आगे लाता है] – लीजिये महाराज, हाथ थामिए और उठ जाइए। गिरकर जो इंसान संभल जाता है, वही सच्चा इंसान होता है।

[एक छोटे बालक का सहारा लेकर, वह डाकू क्यों उठना चाहेगा? जिसने कई लड़ाइयां लड़कर जंगजू का खिताब जीता है। उसके उठने के बाद, विनायक उनसे कहता है।]

विनायक – महाराज, जो-जो फल आप खाना चाहते हैं, आप ज़रूर खाइएगा। आप हमारे अतिथि हैं, निसंकोच फल ग्रहण कीजिये।

दूसरा साथी – [होंठों में ही, कहता है] – तू हँसता बहुत है, इसलिए अब तुझको ऐसा फल चखाऊंगा कि, तू मुझे पूरी ज़िंदगी याद रखेगा कभी इस डाकू से पाला पड़ा। [अट्टहास करता है] तू ही खा तेरे फल, ऐसे खट्टे फल..

[जैसे ही वह अगला क़दम रखता है, और वह ध्यान नहीं रखता है कि उसका पाँव फिर उसी केले के छिलके पर रख दिया जाता है। और फिर ज़नाब, एक बार और धूल चाटते नज़र आते हैं। सरदार और उसका साथी जोर से हंस पड़ते हैं। विनायक उसको हाथ का सहारा देकर उठाता है, फिर वह कहता है।]

विनायक – फल खट्टे नहीं हैं, मगर जंगल की लोमड़ी के हाथ न आने वाले अंगूर है जो लोमड़ी को खट्टे ही लगते हैं। [खिलखिलाकर, हंस पड़ता है।]

[उसकी हंसी सुनकर, वह डाकू तिलमिला जाता है, बहुत शर्मिन्दगी महशूश करता हुआ वह अपने साथियों की तरफ़ देखता है। तभी, विनायक सरदार को कहता है।]

विनायक – चलिए महाराज, दालान में। वहां चलाकर रसोई बनाइये।

सरदार – [अपने साथियों से कहता है] – चलो, अब चलें।

पहला साथी – [होंठों में ही, कहता है] – अरे इस सरदार को आज क्या हो गया? माल लूटने आये और यह तो इस बच्चे के मोह जाल में फंसता जा रहा है?

दूसरा साथी – [पहले साथी के कान में, कहता है] – यार, यह सरदार बदलता जा रहा है, अपने धंधे पर लात मार रहा है। तुम कहो तो, इसे कुछ कर दिखाएँ? आखिर हम भी इससे कम नहीं पड़ते हैं, लड़ने में।

पहला साथी – [धीरे से, उसे कहता है] – दोस्त अभी वक़्त नहीं आया है कि, इसे इसके कर्मों की सज़ा दें।

[इन दोनों को फुसफुसाते देख, सरदार ज़रा तल्ख़ आवाज़ में कहता है।]

सरदार – [तल्ख़ आवाज़ में, कहता है] - क्या कह रहे हो, तुम आपस में? ज़रा जोर से कहो, तो हम भी सुनें।

पहला साथी – कुछ नहीं, सरदार। कह रहा था कि विनायक का बाप सांझ तक आयेगा और यह अहीर जो सौदा लेने गया है वह कुछ काल में ही आया चाहता है..मगर उसके आने का कोई खतरा नहीं है।

दूसरा साथी – एक आदमी हो या दो? हमें क्या डर है?

पहला साथी – अच्छा है, उसके आने के पहले हम अपना काम निपटकर यहाँ से चले जाएँ।

[मगर सरदार कुछ नहीं कहता है, सरदार का तो यह हाल है कि विनायक की भोली सूरत और उसके भलमनसाहत के बर्त्ताव ने उस पर ऐसा असर किया कि वह मानों अपने को भूल ही गया और विनायक इसी फ़िक्र में लगा है कि ये लोग खाने का सामान लेकर बाहर निकलें इसलिए वह एक बार और कहता है।]

विनायक – महाराज बाहर चलकर रसोई पानी का सामान कीजिये।

[मगर सुनकर, सरदार चुप रहता है। क्षण भर के लिए ये चारों एक दूसरे का मुंह ताकते रहते हैं। विनायक इन तीनों का मुंह देखता है और सरदार के दोनों साथी सरदार का मुंह ताकते हैं। सरदार एक बार विनायक का मुख देखकर, सोचने लगता है। अंत में दोनों साथियों से रहा नहीं जाता, और वे सरदार से खुलकर कहते हैं।]

पहला साथी – क्यों सरदार, क्या हुक्म है?

दूसरा साथी – सरदार क्या आज खाली हाथ ही यहाँ से चलना है?

[सर नीचे किये सरदार कुछ सोच रहा है, दूसरे साथी के बोलने से वह चौंक जाता है। फिर, वह कहता है।]

सरदार – हाँ आओ। बाहर चलो।

विनायक – [होंठों में ही, कहता है] – शायद ये अतिथि लम्बे सफ़र के कारण थक गए हैं, इसलिए ये तीनों थोड़ा सुस्ता लेंगे तब खाने-पीने की तदबीर करेंगे। इसलिए अभी इनको कुछ कहना अच्छा नहीं।

[इस प्रकार विनायक भी उनके साथ बाहर आ जाता है। फिर वह मंडप के तले आ जाता है जहां उसका उपनयन संस्कार किया गया था। जहां की पवित्र वायु और सुरभि गंध धूम्र मन और ध्राण इंद्री को प्रफुल्लित करते तपोधन ऋषियों के पुण्य आश्रम का अनुकरण कर रहे हैं। विनायक पहले से तोतली भाषा में सब वृन्तात कहता आया है, वैसा ही यहाँ भी चाहता है कि उपनयन के दिन से आज तक का जो हाल उन लोगों से कह सुनावे पर अचानक सरदार की आँखों में आंसू आ गए हैं और वह गदगदे स्वर से कहता है।]

सरदार – विनायक। तुम्हारे माता-पिता को धन्य है। निस्संदेह तुम्हारा सा सुशील बालक पाकर वे बड़भागी हुए हैं। वे आवे तब उनसे कहना कि आज तीन डाकू जिन्होंने बड़े-बड़े बहादुरों से हथियार रखवा लिए थे यहाँ लूटने को आये थे पर तुमने उनके साथ ऐसी अच्छी रीति से बर्त्ताव किया कि उनके सरदार का मन फिर गया और लोगों की हिम्मत लूटने की न पड़ी। भगवान तुम्हारी कुशल करे और तुम्हारी सब तरह से रक्षा करे। अपने तपोधन पूज्य पिताजी से कह देना कि दो दिन बाद फिर तुम्हारे दर्शन करेंगे।

[इतना कहकर, वह अपने साथियों से कहता है।]

सरदार – चलो।

[और वे सभी बाहर निकल आते हैं, बाहर आकर अपने हथियार उठाकर चटपट घोड़ों पर सवार होकर अपनी राह चल देते हैं। उनके जाने के बाद, बेचारा विनायक घबरा जाता है, वह स्तब्ध और मुग्ध-सा हो जाता है। मानों पृथ्वी में उसे किसी ने ठोक दिया हो। हिलने-डुलने की शक्ति भी उसके बदन में न रहती है। बेचारे के हाथ-पाँव कांपते जा रहे हैं। ब्रह्मचर्य का कमंडल हाथ से गिर जाता है, सितली छूट आती है और बदन से पसीना बहने लगता है। त्रिपुंड के बीचो-बीच प्रस्वेद बिंदु मोतियों की लड़ी से सोहने लगते हैं। ऐसा लगता है, मानों वह पत्थर का हो ‘जहां का तहां’ खड़ा-खड़ा उन जाते हुए डाकूओं को निहारता जा रहा है। थोड़ी देर बाद, मंच पर अँधेरा छा जाता है।] मंच रोशन होता है, रास्ते में दूसरा साथी सरादार से रुकने की बात कहता है।]

दूसरा साथी – सरदार ज़रा रुकिए, मेरे पेट में मरोड़े [एंठन] उठ रहे हैं...

पहला साथी – अरे यार तू तो विनायक के सामने अपनी बहादुरी दिखला रहा था कह रहा था ‘अब तुझको ऐसा फल चखाऊंगा कि, तू मुझे पूरी ज़िंदगी याद रखेगा कभी इस डाकू से पाला पड़ा।’ अभी तो यार तू..

सरदार – [हंसता हुआ, कहता है] – प्यारे, तू तो अपनी धोती ढीली कर बैठा? अब बार-बार दिशा मैदान जाएगा तब यह समझ जाएगा आख़िर विनायक तुझको हिदायत क्यों दे रहा था? ताकि..

पहला साथी – सोनामुखी का चूर्ण न अरोग जाए। अब भय्या उतर जाओ, और जाकर निपट आओ। कहीं अपने कपड़े खराब मत कर डालना।

[सभी सवार अपने घोड़े रोकते हैं, दूसरा साथी चट-पट उतरकर थैले से लोटा निकालकर बन्नाट करता भागता है, पीछे से देख रहे उसके साथी जोर से ठहाके लगाकर हंसते हैं। इन ठहाकों से आसमान गूंज़ उठता है, इसके साथ सरदार की व्यंग भरी आवाज़ सुनायी देती है।]

सरदार – [हँसता हुआ, कहता है] – विनायक ने सच्च ही कहा कि, ‘फल खट्टे नहीं हैं, मगर जंगल की लोमड़ी के हाथ न आने वाले अंगूर हैं जो लोमड़ी को खट्टे ही लगते हैं।’

[धीरे-धीरे, मंच पर अँधेरा बढ़ता जाता है। थोड़ी देर बाद, मंच रोशन होता है। रेल गाडी का मंज़र, नज़र आता है। ठोक सिंहजी क़िस्सा बयान करते नज़र आ रहे हैं। सावंतजी और रशीद भाई ध्यान लगाकर किस्सा सुनते दिखाई दे रहे हैं।]

ठोक सिंहजी – बालक हो तो विनायक जैसा, ऐसा बालक दुश्मनों का भी दिल जीत लेता है।

रशीद भाई – बाप की आँख से, बच्चे डरते हैं। मगर इधर देखो, चच्चा कमालुद्दीन के नेक दख्तर नूरिये को... कमबख्त के पर निकल गए, नामाकूल बाप के पायजामे का तीजाराबंद खोलने चला...?

सावंतजी – कभी यह कमबख्त नाड़ा खोल देता है, हिज़ड़े के लहंगे का...

ठोक सिंहजी – [हंसते हुए, कहते हैं] – ज़नाब, नाड़ा खोलना है तो खोलिए उस ढूंढिए महाराज की तरह जो कह देता है डरकर ‘बाया मैं तो ग्रन्थ का नाड़ा यानि ज्ञान का द्वार खोलने की बात कह रहा था।

रशीद भाई – अब तो हुज़ूर, आपको इस ढूंढिए महाराज का किस्सा सुनाना होगा। ऐसा कौनसा संत था जिसे ऐसे व्यंग भरे कथन कहने का शौक रहा है।

ठोक सिंहजी – तब सुनिए, साथियों। जैन साधुओं के उपासरे में संध्या के बाद बिजली गुल रहती है, यह वक़्त है, उनका ध्यान लगाने का। मगर एक बार एक ढोंगी को मज़बूरन संत का जामा पहनना पड़ा। संध्या के बाद अगर कोई खूबसूरत भक्त महिला उपासरे में रुक जाती तो, महाराज उसे इस तरह कहते ‘बाया, नाड़ा खोल।’

सावंतजी – अगर वह बेचारी भोली हुई, तो उस ढूंढिए महाराज का काम बन गया, मगर तेज़ महिला हुई और वह तड़ककर कह देगी कि ‘क्या बोले, महाराज? भोगना ठिकाने है?’

ठोक सिंहजी – तब बेचारे ढूंढिए महाराज डरते हुए कह उठेंगे ‘बाया, नाराज़ काहे हो रही है? यह सामने पड़ा है ग्रन्थ जो कपड़े में लिपटा पड़ा है, इसका नाड़ा खोलने की बात कह रहा था।’ अब पूछा जाय इस ढूंढिए महाराज से ‘भाया बिजली गुल है, और तू कैसे ग्रन्थ पढ़कर सुनाएगा?’

[फिर क्या? ठोक सिंहजी की बात सुनकर, हंसी के ठहाके गूंज उठते हैं। थोड़ी देर बाद, मंच पर अँधेरा छा जाता है।]


[क्रमशः अगले खंडों में जारी...]

--- विज्ञापन ---

----------- *** -----------

_____________________________________

0 टिप्पणी "नाटक // भोला विनायक - खंड 6 // दिनेश चन्द्र पुरोहित"

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.