सुनीता असीम का का काव्य संसार

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(1)

भूल से भी करार ....मत करना।

तुम किसी से यूँ'खार मत करना।

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शर्म गहना रहा है' .....नारी का।

लाज को तुम बजार मत करना।

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भेद देती जुबान ये ...दिल को।

तुम किसी पर ये'मार मत करना।

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आज हैवान घूम रहे ......हरसू।

खुद पे' भी एतबार मत करना।

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धोखा' देते हैं'  यार भी... देखो।

भूल से तुम तो प्यार मत करना।

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जो खिले प्यार में कली दिल की।

पर जिया बेकरार मत करना।

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टोकने का बुरा सभी...... मानें।

तुम किसी को जिऩ्हार मत करना।

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सुनीता असीम

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(2)

क्यूँ नहीं कोई खुशी है।

आपका दिल जो दुखी है।

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प्यार होता है सही वो।

जिसमें दिल दुखता नहीं है।

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हो गया ये इश्क जिसको।

आँख में उसके नमी है।

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जान लो सच्ची खुशी को।

बस वही तो जिन्दगी है।

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तुम जिसे हो प्यार कहते।

कुछ नहीं ये खुदकुशी है।

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दर्द दिल का बोल दे जो।

वो सही में शायरी है।

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रूह में जाके बसे जो।

वो ही तो बस मौशिकी है।

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जो हमारे साथ होता।

राम ने लीला रची है।

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सुनीता असीम

19/12/17

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(3)

: फायदा कुछ भी नहीं इस प्यार के आज़ार में।

दोस्ती ही है खुदा अब मतलबी सँसार में।

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काम चलता ही नहीं अब तो मुहब्बत से यहाँ।

हर मुसीबत से बचाए यार ही तकरार में।

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इश्क में जलते यहाँ सब आदमी हैं देखिए।

मित्रता पर क्यूँ करें चर्चा यहाँ बेकार में।

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प्यार तो इक मोम है इसमें पिघल जाते सभी।

यारी' तो चट्टान है दुनिया की' हर यलगार में।

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ये मुहब्बत तो रुलाती है सभी को खामखाँ।

मित्र मरहम ही लगाए हर किसी दुत्कार में।

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सुनीता असीम

20/12/17

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(4)

लिए मेरे दुआ... कर दो।

ज़रा ये गम फ़ना कर दो।

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नहीं ये दर्द ......जाता है।

इसे मुझसे जुदा कर दो।

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बनाकर प्रेम की.... मूरत।

मुहब्बत का खुदा कर दो।

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लगा मुझसे ये दिल अपना।

यही इक तो खता कर दो।

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नजारा इक भला क्यूँ कर।

मुझे अपना सता कर दो।

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कि होली खेल लें अब तो।

रंगों से तुम भरा कर दो।

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भरे गम जिन्दगी में जो ।

इन्हें मेरे बिना कर दो।

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शज़र बन जाओ'तुम मेरे।

मुझे अपनी लता कर दो।

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सुनीता असीम

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(5)

बँजर धरती पर गुल कुछ अब खिलाएँ हम।

चलो अब आसमाँ पर घर इक बनाएँ हम।

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चन्दन ले मेहनत का चढ़ पहाड़ों पर।

नज़र से दूर सब मुश्किल भगाएँ हम।

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बना लें आशियाँ अपना भरोसे पर।

कँगूरे प्यार के उनपर सजाएँ हम।

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हमारे हौंसले से डर जहाँ जाये।

कि दीपक आस के घर पर लगाएँ हम।

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सही रस्ते पे चलके हम बनें सच्चे।

रिवाजों की वहाँ नीवें जमाएँ हम।

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डगर पर खार हैं कितने उन्ही पर चल।

खुदी के बाजुओं को आजमाएँ हम।

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सदा हमसे यही कहता कबीरा था।

कि अपने राम में खुद को रमाएँ हम।

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सुनीता असीम

(6)

भारत की जय जय हरसू है।

मेरी मिट्टी .........तू ही तू है।

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मेरे मन की कोमल भाषा।

रखती पावन सी खुश्बू है।

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शायर की गजलों सा सुन्दर ।

मेरा मुक्तक भी ... .धाँसू है।

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मन ही मन करता ये बातें।

मेरा क्षन कितना चालू है।

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सब बातें मानूँ ....मैं तेरी।

तेरी आँखों का जादू है।

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मेरे तन में बहता है जो।

वो तो मेरी माँ का खू है।

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सुनीता असीम

(7)

: कैसा ये इलहाम .....हुआ है।

सब कुछ उसके नाम हुआ है।

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जो है रहता सबके.... भीतर।

उसका ही इकराम.. हुआ है।

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जिसकी रचना सारा है जग।

उससे ये अजराम हुआ है।

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भूले उसको सब क्यूँ ऐसे।

ये ही तो असकाम हुआ है।

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ध्या लो उसको माया  छोड़ो।

तब लगता कुछ काम हुआ है।

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जाना सबको इक दिन जग से।

सबका ये अन्जाम ....हुआ है।

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सुनीता असीम

(8)

: हर हकीकत रूबरू होने लगी।

रँज की जब गुफ्तगू होने लगी।

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खिल गया जब प्यार का इक बीज भी।

नफरतें फिर चारसू होने लगी।

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अब नहीं महफूज़ है कोई यहाँ।

बालिका बेआबरू होने लगी।

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पर्व कोई हम मनाएँ जब कभी।

ईश की फिर तू ही तू होने लगी।

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मिल गया जो हमनवां कोई हसीं।

जिन्दगी तब सुर्खरू होने लगी।

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सुनीता असीम

(9)

: वो कहानी कुछ नई कुछ तो पुरानी दे गया।

जिंदगी में याद वो अपनी सुहानी दे गया।

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वो बिताकर वस्ल की इक रात मेरे साथ में।

हिज़्र में रोते रहे ऐसी कहानी .......दे गया।

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ले गया वो दिल हमारा  छोड़कर हमको यहाँ।

हम तड़पते ही रहें दिल की निशानी दे गया।

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तीरगी से भर गए हम बाद उसके जाने के।

तिश्नगी बुझती नही प्यासी जवानी दे गया।

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वक्त सुन्दर सा बिताया साथ जिसके उम्र भर।

अन्त में वो नाम हमको ही दिवानी दे गया।

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सुनीता असीम

(10)

राम के हैं ...गीत गाते।

राम के ही लाल हैं हम।

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हों कभी दुश्मन जो हाबी।

उसके तो फिर काल हैं हम।

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झूठ का हो ......बोलबाला।

सच की बनते ढाल हैं हम।

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जो दिखाए आँख कोई।

चलते टेढ़ी चाल हैं हम।

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देख गलती क्यूँ निकालें।

बाल की फिर खाल हैं हम।

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राम का जो नाम लेवें।

होते मालामाल हैं हम।

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चल रिवाजों से मनाते।

अब नया ये साल हैं हम।

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सुनीता असीम

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