व्यंग्य // बस्ती में तेंदुए // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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इंसानों की बस्ती में तेंदुए। अब यह कोई नई और आश्चर्यजनक बात नहीं रही। वे आराम से अब यहाँ रहने लगे हैं। जब तबियत होती है, किसी को भी अपना शिकार आसानी बना लेते हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी में वे कई बार दिखाई दिए हैं। कल की ही बात है, लखनऊ में फिर दिखा तेंदुआ। वह पास के एक गाँव में पुलिया के नीचे छिपा बैठा था। सारे गाँव में दहशत फ़ैल गई। उसे पकड़ने की कोशिश की जा रही है। इधर मध्य-प्रदेश के रायसेन जिले में पिछली रात दो अलग अलग घटनाओं में तेंदुओं के हमले में दो लोगों की मौत हो चुकी है। तेंदुए कब कहाँ मिल जाएं कुछ कहा नहीं जा सकता। कभी घर के अन्दर वे टहलते हुए दिख जाते हैं तो कभी किसी बंगले में घुस आया करते हैं। सरकार और पुलिस बस कोशिश ही करती रहती है कि उन्हें किसी तरह ज़िंदा, या मुर्दा पकड़ लिया जाए।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि तेंदुआ चीते की जाति का एक हिंसक पशु है। मुख्यत: अफ्रीका और एशिया में पाया जाता है। शेर और बाघ से यह छोटा होता है। लेकिन यह अपेक्षाकृत बहुत चालाक, मौक़ा- परस्त, और फुर्तीला परभक्षी है। छोटे वन्य जीवों और पालतू पशुओं का इत्मीनान से शिकार करता है। सोते हुए बच्चों को अक्सर उठा ले जाता है। तेंदुए ने विभिन्न वास स्थलों ने निवास करने और मनुष्य के साथ रहने के लिए अपने आप को काफी-कुछ ढाल लिया है। कोई आदमखोर तेंदुआ जब बस्ती में आ जाता है, उसकी उपस्थिति से दहशत फ़ैल जाती है।

अधिकतर तेंदुए पीली चमड़ी के होते हैं और उनपर गहरे रंग के धब्बे होते हैं लेकिन तेंदुए की कई उपजातियां भी होती हैं। श्वेत हिम-तेंदुए तो होते ही हैं, काले रंग के तेंदुए भी देखे गए हैं। इंसानी बस्तियों में हर तरह के तेंदुए मिल जाते है। कभी कभी तो उन्हें पहचानना तक मुश्किल हो जाता है।

इंसानों की बस्ती में पाए जाने वाले तेंदुए स्वभाव से बेशक तेंदुए ही होते हैं। वे तेंदुओं की तरह ही चालाक, मौकापरस्त और फुर्तीले होते हैं। बहुत रहस्यमय होते हैं। पर उनकी शक्ल-सूरत ठीक आदमियों जैसी ही होती है। शिकार करके अधिकतर वे दूसरी बस्तियों में भाग जाते हैं। कुछ बेहद हिम्मती भागते नहीं। जहां हैं, वहीं जमे रहते हैं। डरते नहीं, डराते रहते हैं। पैसा-प्रेमी इन तेंदुओं का शिकार ज़रूरी नहीं कोई आदमी ही बने। वे आदमियों से दोस्ती करके अक्सर बैंकों को अपना शिकार बनाते हैं। पैसा निकाल कर चम्पत हो जाते हैं। पकडाई में न आएं इसलिए राजनीतिज्ञों से सांठ-गाँठ कर लेते हैं।

यही कारण है कि यदि कोई तेंदुआ पकड़ भी लिया गया तो उस पर तुरंत राजनीति शुरू हो जाती है। तेंदुए सर्वव्यापी नहीं हैं। राजनीति सर्वव्यापी है। यह बात अलग है कि तेंदुए राजनीति करते हैं और राजनीति में तेंदुए हैं।

तेंदुए आजकल बस्ती में हर जगह घुस आए हैं। घर घर में उनका वास है। शिक्षा और न्यायपालिकाओं तक में उन्होंने अपनी पैठ जमा ली है। कोई महकमा ऐसा नहीं रहा जहां तेंदुओं ने घुस पैठ न कर ली हो। संस्कृति विभाग से लेकर वन विभाग तक हर जगह इंसानी लिबास में तेंदुए घूम रहे हैं। और तो और उनकी घुसपैठ सरकार और संसद भवनों में भी देखी जा सकती है। उनसे बचने का बस शायद यही एक मात्र उपाय है की उनकी पहचान कर उन्हें चिह्नित किया जाए और यह काम कहीं किसी तेंदुए को ही न मिल जाए, इसके लिए चौकसी बरती जाए।

एक कवि हैं, अजय पाठक। उनकी पैनी दृष्टि (अपने) समय पर गई और उसमें उन्हें तेंदुए के सारे गुण (?) दिख गए। उनकी कुछ चुनी हुई पंक्तियाँ हैं –


समय तेंदुआ बैठे बैठे

घात लगाता है

मार झपट्टा एक बार में

धूल चटाता है

हिंसा उसका नेम धरम है

हिंसा है कानून

मास नोच लेता है सबका

हाड़ चबाता है


इति शुभम्।


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डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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2 टिप्पणियाँ "व्यंग्य // बस्ती में तेंदुए // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. बहुत खूब..!
    यह काम भी किसी तेंदुए को न मिल जाए..
    जवाब नहीं.. बहुत सटीक..!

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