व्यंग्य // समोसे का स्वाद // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

image

मेरे घर पधारे तो उनके हाथ में एक पेकेट था उसमें वे चार समोसे और लाल-चटनी लेकर आए थे। मैंने कहा, अरे आपके स्वागत के लिए तो मैंने खुद ही समोसे मंगा रखे थे।

कोई बात नहीं। इलाहाबाद में आवभगत समोसों से ही की जाती है। कितने भी हों, गिनती नहीं की जाती। मिल बैठ कर बातों बातों में सब समेट लिए जाते हैं। यहाँ समोसों का स्वाद ही कुछ अलग होता है। खाते जाओ, खाते जाओ –जी ही नहीं भरता।

मित्र मेरे ठहरे ठेठ इलाहाबादी। बोले, इलाहाबाद जैसा समोसा आपको और कहीं नहीं मिलेगा। आकार में तिकोना, आलू-मटर भरा, एकदम खस्ता ! बस देखते ही मुंह में पानी भर आता है। गरम गरम खट्टी-मीठी चटनी के साथ खाइए – तृप्त हो जाइए।

हाल ही में एक मूर्ख ‘विद्वान’ ने समोसे के बारे में बड़ी खोज-खबर करके अपने शोध-कार्य में यह सिद्ध करने की कोशिश की कि समोसा मूलत: फारस से आया है। और फारसी भाषा में इसे “सम्मोक्सा” कहा जाता है। कोई भी समझ सकता है कि किसी भाषा के किसी एक मिलते-जुलते शब्द से ‘समोसे’ के मूल तक पहुँचने की यह कोशिश कितनी मूर्खतापूर्ण है ! ऐसे तो इलाहाबाद में ‘अमोसा’ का एक मेला लगता है जिसे यहीं के प्रसिद्ध कवि, कैलाश गौतम ने अपनी कविता से प्रसिद्धि दिलाई। कहा जा सकता है कि ‘समोसे’ सबसे पहले इसी ‘अमोसे’ के मेले में बने थे। मेरा तो मन कहता है यही बात ज्यादह सही है। समोसे का मूल इलाहाबाद में ही है।

समोसा तो वस्तुत: इतनी लाजवाब चीज़ है कि हर जगह का आदमी उसकी उत्पत्ति बस अपने ही गाँव में मानता है। कभी आप किसी बंगाली से पूछिए, चट से कह देगा समोसा तो सबसे पहले कोलकाता में ही बना था। बिहारी से पूछें, वह समोसे का उद्गम पाटिलपुत्र से में बताएगा। कानपुर के लोग तो कहते हैं कि समोसा तो सबसे पहले कानपुर के कलेक्टरगंज में ही किसी हलवाई में बनाया था।

भारत में समोसे का इतिहास बड़ा पुराना है और यहीं से यह अमेरिका, इंग्लैड और यूरोप में पहुंचा। भारत वासी जहां कहीं भी गए इसे अपने साथ लेकर गए और हर जगह समोसे का डंका पिटता रहा। खुद भारत में इसकी उपस्थिति शताब्दियों पुरानी है। इब्नबतूता का नाम तो हर कोई जानता ही है। अरे ये वही इब्नबतूता हैं जिन्हें सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने जूते पहनाकर बाज़ार घुमाया था (इब्नबतूता /पहन के जूता /निकले जब बाज़ार को) और जिन्हें हिन्दी सिनेमा में एक गीत की तरह प्रस्तुत कर बुलंदियों तक पहुंचा दिया। १४वी शताब्दी में यही इब्नबतूता भारत आए थे। तब तुगलक के दरबार में उन्हें गोश्त, मूंगफली और बादाम से भरा लज़ीज़ समोसा खिलाया गया था। इसका ज़िक्र करना वे भूले नहीं। लेकिन इससे भी पहले १३वी शताब्दी में महान कवि अमीर खुसरो ने एक जगह लिखा है कि दिल्ली सल्तनत में मीट वाला, घी में तला समोसा शाही परिवार के सदस्यों और अमीरों का प्रिय व्यंजन हुआ करता था। गरज़ यह की समोसा कम से कम आठ सौ साल पहले से ही भारत में छाया हुआ है। वो तो गनीमत है कि किसी राष्ट्र प्रेमी भारतीय ने समोसा का उद्गम पुराने संस्कृत साहित्य में नहीं ढूँढ़ लिया वरना समोसा ठेठ भारतीय भारतीय सिद्ध हो जाता। जो भी हो अंतर बस इतना आया है कि कभी समोसा रईसों का खाना हुआ करता था लेकिन आज इसकी उपस्थिति फाइव स्टार होटलों से लेकर गली कूचों तक है।

समोसे छोटे भी होते हैं और कभी कभी इतने बड़े भी कि पूरा खाना ही एक समोसे में निबट जाए। लेकिन ज्यादहतर समोसे छोटे ही होते हैं। इसीलिए अधिकतर नाश्ते में इन्हें खाया-खिलाया जाता है। इसमें भरी जाने वाली चीजें बदली जा सकती हैं। कीमा भरा हो तो यह मांसाहारी हो जाता है और आलू, मटर, या कोई और सब्जी भरी हो तो यह शाकाहारी बन जाता है; लेकिन समोसे का आकार कभी नहीं बदलता। कैसा भी समोसा हो, अगर उसे समोसा कहलाना है तो रहेगा वह तिकोना ही।

उत्तर प्रदेश में एक जगह है, मैनपुरी। वहां की तम्बाकू बड़ी मशहूर है। एक बार चेन्नई में मैंने मैनपुरी की तम्बाकू की एक दुकान देखी। दंग रह गया। कहाँ चेन्नई और कहाँ मैनपुरी। मैनपुरी की तम्बाकू ने इतनी दूर का सफ़र तय कर लिया। तम्बाकू का स्वाद तो मैने कभी लिया नहीं लेकिन मैनपुरी की तम्बाकू की पुडिया ज़रूर देखी है। यह हमेशा तिकोनी होती है। चेन्नई में भी तिकोनी ही थी। ठीक समोसे की ही तरह। समोसा हो या मैनपुरी की तम्बाकू की पुडिया, दोनों ने अपना ‘तिकोना’ रूप कभी बदला ही नहीं। निहायत ताज्जुब की बात है। इसके पीछे क्या राज़ है कोई नहीं जानता।

एक बार समोसे और बर्गर में ठन गई। दोनों ही का शुमार “फ़ास्ट-फ़ूड” में होता है। गलतफहमी में न रहें। फास्ट फूड का मतलब फास्ट (उपवास) में खाया जाने वाला फूड नहीं बल्कि जल्दी में झट से खा लेने वाला भोज्य पदार्थ है। ज़ाहिर है बर्गर और समोसा दोनों ही उपवास में खाने वाले पदार्थ नहीं हैं लेकिन फास्टफूड हैं। जल्दी-पल्दी खाओ और चल दो। भारतीय समोसे और विदेशी बर्गर के बीच खूब घमासान हुआ। बर्गर की तरफ से कहा गया समोसा ‘अनहेल्दी’ है; बर्गर तुलनात्मक रूप से अधिक हेल्दी है। लेकिन सी एस ई (सेंटर ऑफ़ साइंस एंड एनविरोनम्रेंट) की जब रिपोर्ट आई तो उसमें स्पष्ट बता दिया गया कि वस्तुत: बर्गर से समोसा बेहतर है। समोसे में केलरीज़ बर्गर से कहीं ज़यादह कम हैं। आखिर समोसे ने बर्गर को पटकनी दे ही दी। बर्गर हार गया।

समोसे ने कभी हार नहीं मानी। उसके स्वाद की हर जगह, भारत में खासतौर पर, -और इलाहाबाद में तो पूछिए मत – तूती बोलती है।

जय हो।

---

-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो.९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड /

इलाहाबाद -२११००१

1 टिप्पणी "व्यंग्य // समोसे का स्वाद // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.