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संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 70 : बचपन के उलझे सुलझे किनारे // निर्मल गुप्त

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प्रविष्टि क्र. 70 बचपन के उलझे सुलझे किनारे निर्मल गुप्त मेरे बचपन के दो किनारे रहे जैसे बटी हुई ऊन के गोले के होते हैं। किनारे यदि गुम जाए...

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प्रविष्टि क्र. 70

बचपन के उलझे सुलझे किनारे

निर्मल गुप्त


मेरे बचपन के दो किनारे रहे जैसे बटी हुई ऊन के गोले के होते हैं। किनारे यदि गुम जाएँ तो पूरा गोला उलझ जाता है। उसे सुलझाते हुए इतने किनारे निकल आते हैं कि मौलिक सिरा कौन सा होगा ,पता ही नहीं चलता।

अपनी बात कहने के लिए मान लेता हूँ कि एक सिरा बंगाल के जिला बर्धवान की वो सैनिक छावनी पानागढ़ है जहां मेरी गर्भनाल दबी है। दबी होगी ही। दूसरा सिरा कलकत्ता की सेना के अफसरों की रिहाइशी बस्ती में गुम है। समय ने उम्र के लिहाज से बचपन भले ही छीन लिया है लेकिन वहाँ की फीकी- मीठी स्मृतियाँ मेरे पास हैं ,उसी तरह से है जैसे उन दिनों के कलकत्ता में बेंगी में लटका कर गली गली मिष्ठी दोही बिकती थी। बेंगी के एक पलड़े में मीठी दही होती थी ,दूसरे में सादी दही। जेब में इकन्नी हो तो जैसी चाहो चख लो। इन यादों को मैंने बड़ी हिफाजत के सहेज लिया है।

यह तय है कि मैं सोने की कोई चम्मच लेकर पैदा नहीं हुआ था। उसी सादा तरीके से ब्रह्मांड के इस ग्रह पर जन्मा था जैसे मेरे समय के हिंदुस्तान में अक्सर बच्चे पैदा हुआ करते होंगे। मेरी माँ बताती थीं कि सेना की उस बैरक में जहां हमारा घर था ,वहाँ दूर तक फैले बियाबान से साँप बिच्छू नेवले तक कभी भी बिन बुलाये मेहमान की तरह चले आते थे।

मेरे बचपन का पानागढ़ वही है जो या जितना मेरी माँ ने या गूगल सर्च इंजन ने बताया । पर उसकी तसदीक या इंकार सिर्फ मेरी अम्मा ही कर सकती हैं। उन्होंने बताया कि तुझे कोयले बीनने वाली माई इस दुनिया में लेकर आई थीं। जिस दिन तू जन्मा था उस दिन काली आँधी आई थी। पूरा आसमान गहरे काले बादलों से घिरा था। दिन में रात हो गयी थी। हवा इतनी तेज रफ्तार कि बैरक की टीन की छत कागजी पतंग की तरह उड़ने को तैयार थी । आसपास के लोगों ने जैसे तैसे उस टीन को जैसे तैसे थाम कर उसे उड़ने से रोका था। वह कहती थीं कि मेरे जन्म में मदद करने वाली उस दाय माँ ने तब कहा था –दईया रे दईया ,ये बच्चा है या बवाल। बहरहाल मैं पैदा हुआ। अपने माँ बाप की तब जीवित चौथी संतान।

मेरी माँ बेहद विदुषी ,सख्त मिजाज और आर्य समाज के संस्कार में रची बसी परन्तु बेहद ज़िंदादिल महिला थीं। उनकी यदा कदा की जाने वाली टिप्पणी प्राय: गहरा तंज़ लपेटे होती थीं। एक बार जब वह यह बता रही थीं कि तू जब गर्भ में था ,तब एक दिन दोपहर में वह कपड़े धोती रहीं और काला नाग उनकी पटिया के नीचे मजे से बैठा ऊँघता रहा । तब मैंने अचरज से पूछा था –आप साँप से डरी नहीं।

-साँप से क्या डरना। वे हम लोगों को नहीं डसते।

-क्यों ? मेरे बाल मन में कौतूहल उठा।

-वे रिश्ते में हमारे बिरादर जो होते हैं। उन्होंने बताया।

-कैसे ?

-साँप बनियों को नहीं डसता। वे भी धन के रक्षक होते हैं और हम भी। यह कह वह खिलखिला दीं। उनके इस व्यंग्यात्मक वनलाइनर की थाह मुझे बड़े दिनों के बाद लगी। मेरी माँ खुद पर व्यंग्य कर सकने वाली सहृदय माँ थी। यह नहीं पता कि उनसे मैंने क्या क्या सीखा लेकिन यह बात पक्की है कि उनके जरिये बिना तिलमिलाए अपनी बुराई या कमी को ग्रहण करना जरूर सीख लिया। सीखा ही होगा।

जब मैं कलकत्ता में था ,वह कोलकाता नहीं था। अलबत्ता वह महानगर तब भी था। पूजा ,मछली और पालिटिक्स में आकंठ डूबा सांस्कृतिक शहर। वहां नियोन साइन बोर्डों से दमकता न्यू मार्केट था। पैंठ शैली का स्थाई बाज़ार खिदरपुर था ,फोर्ट विलियम के पास एक परेड ग्राउंड था। वहां ऐसा बहुत कुछ देखा और भोगा जो बीतते समय के साथ भी जिन्दा रहा।

हुगली नदी के तट पर कॉलोनी के चौकीदार बाबा गुलाम रसूल की अंगुली पकड़ कर मटरगश्ती आज भी इसी तरह याद है जैसे वह मानो कल या बीते परसों की बात हो। बाबा की सुनाई आलसी बौनों की कथा आज तक जस की तस मेरी स्मृति में है। शायद उनसे ही मैंने जाना कि कोई मामूली सी बात किस तरह से कहानियों में तब्दील हो जाती है। मैं बाबा से कहता ,बाबा आज बौनों वाली नहीं तट पर चिंचायती सीग्ल्स की कहानी सुनाओ और वह परिंदों को केंद्र में रख कर तत्क्षण कथा गढ़ देते। हमारी इस मार्निंग वॉक में हमारा पालतू कुत्ता टॉमी भी होता था जो आगे आगे दौड़ता धमाल मचाता चलता। मैं किसी लकड़ी के टुकड़े को हुगली में फेंक देता और टॉमी तत्काल उसे पानी में छलांग लगा कर अपने मुंह में उठा लेता। यह बचपन के वो दिन थे जब मैंने समुद्र के सुदूर क्षितिज में अनायास नमूदार हो जाने वाले पानी के जहाज देखे। बाबा से मैंने जाना कि जानी पहचानी वस्तुएं किस तरह कहानियों में बदल जाती हैं। प्रत्याशित को अप्रत्याशित ढंग से कहने का हुनर ही है ,जहाँ से कहानी किस्सों का अनवरत सिलसिला आकार ग्रहण करता रहा है।

बाबा बहुत हंसोड़ थे । वह हरदम हंसने के लिए कोई न कोई चुटकुला ईजाद कर लेते । उनके चुटकुलों में कभी कभी गहरा तंज भी होता रहा होगा ,ऐसा मुझे आज लगता है। लेकिन वह जब उदास होते थे तब वह कोई भोजपुरी या बंगला गीत गाते। मैं जब उनसे उनका मतलब पूछ बैठता तो वह ठहाका लगाते और कहते –रोबिन्द्र सौंगीत।

परेड ग्राउंड से जुड़े बचपन में की सिर्फ इतनी याद है कि वहाँ किसी अंग्रेज की काले पत्थर की बनी आदमकद मूर्ति स्थापित थी। उस मूर्ति के सर पर जो तैरती हुई नौका के आकार की टोपी थी जिस पर कुछ पीली चोंच वाली मैनाओं ने घर बसाया हुआ था। शाम के समय वह जब अपने घोंसलों में लौटती तो बड़ी हलचल मचती। मुझे भली प्रकार याद है कि कलकत्ता को अलविदा कहने से पहले जब मैं उसके पास आया था तो उस मूर्तिवत अंग्रेज महापुरुष के चरणों में अपनी प्रिय गुलेल छुपा आया था। सोचता हूँ कि कभी कलकत्ता गया तो वहां मुझे मेरी गुलेल हिफाजत से रखी मिल जायेगी और शायद बचपन भी वापस मिल जाए ,कौन जाने।

फिर हुआ कुछ ऐसा.....पिता का तबादला दार्जलिंग के लिए हो गया। यह नॉन फेमिली स्टेशन था। हम लोग मेरठ आने के लिए सामान बाँधने लगे। कुर्सी मेज कपड़े बिस्तर आदि सब ठीक से पैक हो गये। जब यह सब हो रहा था ,तब मैं ,मेरी छोटी बहन डौली ,टॉमी और मैं बहुत बेचैन थे। टॉमी की परेशानी तो दिल को हिला देने वाली थी। वह जब भी पिताजी को कहीं आते जाते देखता तो उनके पैरों में लोटने लगता। मैं जब घर के बड़ों से इस बाबत पूछता तो वे जवाब में बस हाँ हूँ कर देते।

फिर वह दिन भी आया जब हमें कलकत्ता को अलविदा कहना था। घर के बाहर स्टेशन जाने के लिए टैक्सी आ गयी। भारी सामान शायद सेना के किसी भारी वाहन से पहले ही स्टेशन चला गया। अब तो टॉमी की बेताबी देखते ही बनती थी। एक बार जब टेक्सी का दरवाजा खुला मिला तो वह उसमें चढ़ कर ऐसे दुबक गया कि उसे हम लोग छोड़ न जाएँ। जब हम उसमें बैठने को हुए तो वह उतरने को तैयार न था। बाबा ने टॉमी को पुचकार कर समझाया –आओ भईया नीचे आ जाओ ,अपन लोग बाद में चलेंगे। तब मुझे पहली बार पता लगा कि बाबा और टॉमी अभी यहीं रहने वाले हैं।

लगभग चौबीस घंटे से अधिक के सफर के बाद जब मेरठ पहुंचे तो थक कर चूर हो लिए थे। अगले कई दिन तक मेरे भीतर रेलगाड़ी की छुकर छुकर चलती और काला धुआं उगलती रही। स्टेशन से रिक्शा में लदफद कर जब शहर के एक कदीमी मोहल्ले के दोमंजिला पुराने मकान में पहुंचे तो लगा कि मानो सारा जीवन ही बदल गया। सिविलियन इलाके की यह रिहाइश मेरे लिए अपनी तरह का नया तजुर्बा था। चारों तरफ अराजकता का माहौल। अक्खड़ भाषा में बतियाते लोग। तिस पर बाबा और टॉमी का कोई अता-पता नहीं। यही वह संधिस्थल भी था जहाँ से यह सुराग मिला कि जीवन के बहुत से रंगों में एक रंग धूसर भी होता है। अपने काम अपने हाथ पाँव से खुद करने पड़ते हैं। जरूरत पड़ने पर अपने बचाव में हाथ पांवों को ढंग से यदि इस्तेमाल नहीं आता तो यह समझ लें कि पिटना और मार खाना आपका प्रारब्ध है।

मेरठ आने के बाद मौज मस्ती वाला बचपना आंशिक रूप से चला गया। फिर कसैले बचपन की एक तरह से शुरुआत हुई। कलकत्ता में रहते हुए हिंदी बंगला और अंग्रेजी का ककहरा सीखा। सीखा क्या बड़ी मुश्किल से सीख पाया। अब सोचता हूँ लगता कि मैं तो खासा भोंदू टाइप का था। लिखने पढने से जी चुराने वाला लेकिन मौखिक रूप से खासा चंट टाइप का कुछ। शायद लेट लर्नर था। रहा ही हूँगा। हर नई चीज को समझ पाने में तब भी मुझे दिक्कत होती थी,आज तक होती है। किसी नई किताब को पढ़ने के लिए पहले मैं उसको इधर उधर से पढ़-झाँक कर उसकी टोह लेता हूँ। फिर यदि बात जंची तो उसमें उतर जाता हूँ। किसी नये आदमी से आगे बढ़ कर मिलने भी तब भी झिझकता था ,आज भी गहरे संकोच में गड़ जाता हूँ। पर एक बार जब मन किसी में रम गया तो बस उसी का हो लिया   ,आकंठ।

तो मेरठ जब आया और स्कूल में दाखिला पाया,तब तक मुझे यह गलतफहमी हो चली थी कि मैं पेन्सिल से कागज पर कोई अक्षर हो या तस्वीर उसे जैसा चाहूँ आकार दे सकता हूँ। मेरा सुलेख बहुत सुंदर था। मेरा यह मुगालता इतनी जल्दी टूटने वाला था ,इसका मुझे सपने में भी गुमान नहीं था।

मेरठ आकर स्कूल में अभी ठीक से खपा भी नहीं था कि मैं अपनी आर्ट टीचर सरला भैनजी के अचानक निशाने पर आ गया। वह मुझे देखते ही दांत पीसने लगती। वह बच्चों से कभी आम और कभी अमरुद बनाने को कहतीं। मैं पलक झपकते उसे ड्राइंग की कापी में स्केच कर उसमें मोमिया रंग भर देता। वह उसे देखती और बुरा सा मुंह बनाती और पीट देती। जबकि क्लास के उन बच्चों से कुछ न कहती जिन्होंने आम की जगह बैगन बना रखा होता। वह नियमित रूप से मुझे पीटती रहीं और मैं उसका इतना आदी हो गया कि जिस दिन संयोगवश ऐसा नहीं करती तो मुझे लगता कि भैन जी कितनी भुलक्कड़ हो चली हैं। उन्हीं दिनों मैंने निशब्द गालियाँ देने का जम कर अभ्यास किया। इस काम मैं अब प्रवीण हूँ। इतना हुनरमंद कि कायनात में ऐसी कोई चीज नहीं जिसे मैं जमकर गरिया न सकूँ। हद तो यह है कि मेरी प्रार्थनाओं में भी कभी कभार गालियाँ उतर आती हैं।

भैनजी की इस मारपीट ने मुझे धीरे धीरे ढींठ बना दिया। मैं घर आकर जितना बन पड़ता ड्राइंग का अभ्यास करता। इधर उधर दीवारों पर कोयले के टुकड़े से चित्र बना देता। धीरे धीरे मेरे बनाये गये 'भित्ति चित्र' अश्लील और वीभत्स होने लगे तो मैंने घर वालों द्वारा ऐसा करते देख लिए जाने के डर से इस भयावह कुटेव से किनारा कर लिया। किया होगा,ऐसा मेरा अनुमान है।

मेरठ आकर न जाने क्यों मैं धीरे धीरे अकेला पड़ने लगा। तब मुझे गुलेल की एकबार फिर याद आई। जैसे तैसे गुलेल बनी तो तय किया कि ऐसा निशानची बना जाये जैसा कोई न रहा हो। गली के बच्चों के साथ कंचे खेले तो मन ही मन ठाना कि माहिर कंचेबाज़ बना जाये।

फिर पता नहीं क्यों घर वालों ने स्कूल बदलवा दिया। वह स्कूल घर से दूर था और रिक्शे में आने जाने में व्यर्थ व्यय होता था,इसलिए। अब मैं एक मिशनरी स्कूल में भर्ती हुआ तो सारा नज़ारा ही बदल मिला। हरे भरे लॉन और बागीचे वाला बड़ा स्कूल। ईसाई शिक्षिकाओं की सहृदयता और उदारता देखता तो सोचता –हाय हम भी ईसाई क्यों न हुए। उन दिनों मेरे एक ईसाई सहपाठी ने बताया कि हमें फीस भी नहीं जमा करनी होती। हमें लंच भी स्कूल में फ्री मिलता है। हमें खाने के लिए उबले हुए अंडे ,पेस्ट्री और चौकलेट मिलती है। मेरे लालची मन ने सोचा कि ईसाई बनना ही होगा।

मिशनरी स्कूल में सब कुछ अच्छा चलता हुआ लगा कि तभी ज्योग्रफी की टीचर मिस लूथर ने कहना शुरू कि निर्मल ,यू आर वैरी वैरी वीक। मैं उनकी बात सुन सशंकित हुआ और लगा कि सरला भैन जी की रूह इनमें आ समाई है। वह शायद मेरी नियमित कुटाई कार्यक्रम की रूप रेखा बना रही हैं। लेकिन यह आशंका निराधार निकली जब वह मुझे रिसस में अपने साथ स्कूल परिसर के एक किनारे बने अपने स्टाफ क्वाटर में ले गयी। वह छावनी में बने एक फीती या दो फीती सैनिकों के बैरक जैसा ही था। बस फर्क उसके भीतर की साज सज्जा और साजो सामान का था। दीवार पर ईसा मसीह की बड़ी सी तस्वीर टंगी थी। मैडम ने बड़े अदब से घुटने मोड़ कर सिर नवाया तो मैंने भी अपना सर उसी तरह झुका दिया।

मैडम ने फ्रिज से कुछ सेब निकाले। चाकू से काट काट कर खुद भी खाती रहीं और मुझे भी खिलाती रही। बीच बीच में वह मुझसे बतियाती जाती। तमाम तरह की बातें। उनमें से कुछ मेरी समझ में आ पा रही थीं और अधिकांश सर के ऊपर से सर्र सर्र करके गुजरती रहीं। उन्होंने कहा कि तुम स्कूल टाइम के बाद मेरे साथ चला करो ,मैं तुम्हें क्लास का सबसे अच्छा बच्चा बना दूँगी ,बेस्ट बॉय। उन्होंने मुझे जब पेस्ट्री भी दी तो मुझे यकीन हो चला कि हो न हो ,वह मुझे ईसाई बना रही हैं। मन कुछ घबराया जरूर पर लगा कि बनाती हैं तो बना दें,मुझे क्या.

मैं अच्छा बच्चा बनने के चक्कर में उनके पास स्कूल टाइम के बाद पढने जाने लगा। वह पढ़ाती तो कम थी लेकिन बाइबल की कथाएं खूब सुनाती थीं। एक दिन अचानक उन्होंने मुझसे पूछती कि तुम तो कलकत्ता में रहे हो। मेरे ज्योति को जानते हो? मैं गुमसुम रहा तो कहा -अरे वही ज्योति जिसके घर के ऊपर के माले की खिड़की से विक्टोरिया मेमोरियल के गुम्बद पर लगा होली क्रॉस दमकता है। फिर वह अचानक गहरी उदासी में डूब गयी, फिर ओह जीसस कह मौन हो गयीं । उन्होंने लम्बी लम्बी सांस ली और कुछ ही पल में मुस्कुराने भी लगीं। मेरी और मिस की दोस्ती प्रगाढ़ होती गयी। वह कभी कभी मुझे अकेले घर में ज्योति डार्लिंग कह गले से लगा लेती। बेतहाशा चूमने लगती।

फिर एक दिन .....स्कूल टाइम के बाद जब मैं उनके क्वाटर में गया तो वह मुझे देख कुछ इस तरह से मुस्कुराई कि इससे पहले उन्हें तो क्या किसी भी औरत को ऐसी भाव भंगिमा में मुस्कुराते हुए न देखा था। उन्होंने ‘ओह जीसस ओह जीसस -फॉरगिव मी’ कह कर मुझे समीप बुलाया और.........। तब जो हुआ वो मुझे तब कतई समझ नहीं आया। आज अनुमान लगा पाता हूँ कि क्या हुआ होगा। इस विषय में अधिक लिखना मिस लूथर की जुड़ी यादों के साथ अश्लील ज्यादती होगी। उनके लिए तो मैं उनका वाला ज्योति ही था। रहा ही हूंगा।

बाद में वह स्कूल से छुट्टी पर चली गयी। क्रिसमस के लम्बे अवकाश के बाद स्कूल खुलने पर वह एक दिन आई। उन्हें देखते ही सारे बच्चों ने उन्हें घेर लिया। आज वह लांग स्कर्ट की जगह साड़ी पहने थीं। उनके गाल दमक रहे थे और गले में रत्नजड़ित होली क्रास झिलमिला रहा था। बच्चों ने उन्हें उनकी वेडिंग की बधाई दी। बदले में उन्होंने बच्चों को चॉकलेट दी तो बच्चों ने सामूहिक स्वर में कहा- थैंक्यू मिस। वह खिलखिला दीं ,बोली –अब मैं मिसेज एडवर्ड हूँ।

मैं घेरे के बाहर खड़ा चुपचाप यह सब देखता रहा। उन्होंने मुझे देखा तो तेज कदमों से मेरी ओर बढीं और ढेर सारी चॉकलेट मेरी ओर बढ़ा दीं। मैं हाथ बांधे खड़ा रहा तो उन्होंने चॉकलेट मेरे निकर की जेब में रख दीं। जेब में गये उनके कोमल ठंडे हाथों के स्पर्श ने मेरी देह को झनझना कर रख दिया। इसके बाद जाने क्या हुआ ,मैंने देखा कि उनकी आँख डबडबा आयीं हैं। वैसे आखें तो मेरी भी नम हो गयी थीं। पता नहीं क्यों? कच्ची उम्र में ही अडल्टहुड की ओर कदम बढ़ाने का यह शायद पहला संकेत था ,जिसे मैंने जाना।

यह मिशनरी स्कूल गर्ल्स स्कूल था ,जहाँ से पांचवी पास करने के बाद दूसरे स्कूल में जाना होता था। घर के समीप वाले एक इंटर कॉलेज में जब भर्ती हुआ तो बचपन से निकल सीधा घुटे घुटाये वयस्कों की दुनिया में एक तरह से मेरा बपतिस्मा ही हो गया। एक बढ़ कर एक शातिर छात्र और एक से बढ़ कर एक टीचर। एक सज्जन तो अध्यापक के वेष में ऐसे दुर्जन मिले जो आधी छुट्टी से पहले ही मेरे टिफिन का खाना अक्सर यह कर खाना खा जाते थे कि तेरी माँ खाना बहुत अच्छा बनाती हैं। माताजी को मेरा प्रणाम कहना। मैं भूखा रह जाता और घर जाकर सोचता कि किस माताजी को प्रणाम कहूँ। मेरे जाने तो मेरी अम्मा थीं। सुंदर सुडौल सुदर्शन महिला ,जिनका न मुंह दांत निकल जाने से पोपला हुआ। न उनकी निगाह इतनी कमजोर हुई थीं कि टटोल टटोल कर चलना पड़े। और तो और उनके केशों में सफेदी की एक लकीर भी न थी। तब तक मैं यही जानता था कि माताजी किसी कृशकाय बुढ़िया को ही कहा जा सकता है। मेरी अम्मा के पास ऐसी कोई आहर्ता न थी. बहरहाल वह जब तक मेरे क्लास टीचर रहे तब तक मेरा टिफिन मजे से चटखारे ले जीमते रहे। और मैं उनके भेजे प्रणाम को देने के लिए उपयुक्त पात्र को तलाशता रहा। मेरी अम्मा तब यकीनन माताजी थोड़े थीं।

मेरा बचपन यूँही बीतता गया। मैं बड़ी कठिनाई से किसी हमउम्र के साथ मित्रवत हो पाया। पर जो दोस्त बने वे भांति भांति के थे। कोई बस्ते में कोर्स की किताबों के बीच छुप छुप कर देखने लायक किताब लाता तो कोई लगभग रोज अंग्रेजी या हिंदी का ऐसा लफ्ज़ लिए चला आता जो मैंने इससे पहले कभी सुना ही नहीं होते। उन शब्दों के स्पेलिंग और अर्थ को लेकर हम खूब उलझते। कुछ दोस्त एकदम लफंगे टाइप के मस्तमौला थे तो कुछ बेहद पढ़ाकू प्रजाति के भी थे। ये वो दिन थे जब हर किस्म के बच्चा कोई न कोई मौलिक सपना अपनी आँख में संजोये रहता था। उस वक्त तक डिजिटल संसार की दूर दूर तक कोई भनक भी न थी। उन दिनों खेल बाकायदा खेले जाते थे और ज़िंदगी जी जाती थी ,सुरक्षित कछारों पर निठल्ले बैठकर तमाशा नहीं देखा जाता था।

आज यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि मेरी लफंडर लडकों से अधिक पटती थी। उन दिनों हॉकी क्रिकेट और गुल्ली डंडा ,सब तरह के खेलों में मन खूब रमता था। मेरे उन दिनों के कुछ साथी आगे चलकर हॉकी में देश की ओलम्पिक टीम तक पहुंचे। इनेगिने सेना में कमीशंड अफ़सर बने। क्रिकेट वाले रणजी से आगे न बढ़ पाए। मेरे पास प्रगाढ़ मुगालता यह था कि मेरे अंदर एक लार्जर देन लाइफ लेखक है जो एक दिन अपनी उपस्थिति से हर किसी को स्तब्ध कर देगा। वहम का यह बिरवा मेरे भीतर कैसे उपजा ,इसका मुझे आज तक नहीं पता।

मेरी स्मृति में बचपन से लेकर लड़कपन तक के तमाम तरह के दृश्य और ध्वनियाँ फ्रीज है। कुछ इस तरह चिपकी हुई हैं जैसे सेकंड वर्ड वार में हिरोशिमा और नागासाकी में एटम बम गिरने के बाद जीते जागते लोग पिघल कर वहां के पत्थरों पर जलछवि की तरह छप गये थे। जैसे बुंदेलखंड से होकर बहने वाली केन नदी में पड़े विशिष्ट किस्म की शिलाओं पर आसपास की छवियाँ के छप जाने की जनश्रुति है.

बचपन बीत कर भी बीतता कहाँ है ! यादें जीवाश्म बन जाती हैं। मेरे वजूद के भीतर मिस लूथर का ज्योति अभी तक मौजूद है। मेरी याददाश्त के वातायन से विक्टोरिया मेमोरियल दिखता है। टॉमी अभी भी मेरी यादों में अपनी झबरीली दुम हिलाता है। बाबा गुलाम रसूल आलसी बौनों की कथा के साथ तमाम तरह की कहानियाँ मेरी खातिर अभी भी बुनते हैं।

स्मृतियों का गागर कभी नहीं रीतता। बचपन का बचकानापन सदा के लिए होता है।

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निर्मल गुप्त ,208 छीपी टैंक ,मेरठ -250001

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रचनाकार: संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 70 : बचपन के उलझे सुलझे किनारे // निर्मल गुप्त
संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 70 : बचपन के उलझे सुलझे किनारे // निर्मल गुप्त
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