राजेश माहेश्वरी की कविताएँ

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माँ

माँ की ममता और त्याग का मूल्य
मानव तो क्या
परमात्मा भी नहीं चुका सकता।
वह स्नेह व प्यार
वे आदर्श की शिक्षाएँ
जो उसने दीं
और कौन दे सकता है ?
जननी की शिक्षा में ही छिपी है
हमारे जीवन की सफलता।
हमारी कितनी नादानियों को
वह करती है माफ।
हमारी चंचलता, हठ और शरारतें
वह करती है स्वीकार।
वह है सहनशीलता की प्रतिमूर्ति
उसकी अंतर आत्मा के ममत्व में
प्रकाशित होती है अंतर ज्योति।
जीवन के हर दुख में
वह रही है सहभागी
लेकिन जब सुख के दिन आए तो
वह चलने लगी
प्रभु की तलाश में
एकान्त प्रवास में।
हम उसे नहीं रोक सके
लेकिन उसके पोते-पोतियों ने
कर दिया कमाल
जाग उठी उसकी ममता
और दादी रूक गई।
संसार का नियम है
एक दिन तो उसे भी जाना है
अनन्त में
पर वह जाएगी
हमें अपने पैरों पर खड़ा करके
हमें स्वावलम्बी बनाकर
होगी वह अलविदा।


माँ

जब तक साँस है
तब तक आस है।
आस है जब तक,
साँस है तब तक।
चिंता नहीं है उपाय
यह देती है परेशानी
और करती है दिग्भ्रमित।
कर्मों का प्रतिफल
भोगना ही होगा
इससे मुक्त नहीं हो सकते।
कर्तव्यों को पूरा करो
जो हार गया
उसका अस्तित्व समाप्त हो गया।
पराक्रमी बनो,
संघर्षशील बनो,
सफलता अवश्य मिलेगी।
ये शब्द वह कह रही थी
हमें याद है उसका जीवन संघर्ष
अंतिम समय तक थी उसमें
जीने की चाह
समय पूरा हुआ
उसे मालूम था
फिर भी वह कर रही थी संघर्ष
उसने हमें आदेश दिया-
अब खिड़की खोल दो
मुझे जाना है प्रभु की शरण में
ये चिकित्सक,ये दवाएँ हटा दो
मुझे शांति दो, मुक्त करो
हिम्मत रखो, विचार मत करो।
उसका अंतिम संदेश
कहते-कहते वह विदा हो गई
हमें बतला गई
जीवन के सूत्र।

                     माँ

माँ का स्नेह
देता था स्वर्ग की अनुभूति।
उसका आशीष
भरता था जीवन में स्फूर्ति।

मुझे याद है
जब मैं रोता था
वह परेशान हो जाती थी।
जब मैं हँसता था
वह खुशी से फूल जाती थी।
वह हमेशा
सदाचार, सद्व्यवहार, सद्कर्म,
पीड़ित मानवता की सेवा,
राष्ट्र के प्रति समर्पण,
सेवा और त्याग की
देती थी शिक्षा।

शिक्षा देते-देते ही
आशीष लुटाते-लुटाते ही
ममता बरसाते-बरसाते ही
हमारे देखते-देखते ही
एक दिन वह
हो गई पंच तत्वों में विलीन।

आज भी
जब कभी होता हूँ
होता हूँ परेशान
बंद करता हूँ आंखें
वह सामने आ जाती है।
जब कभी होता हूँ व्यथित
बदल रहा होता हूँ करवटें
वह आती है
लोरी सुनाती है
और सुला जाती है।
समझ नहीं पाता हूँ
यह प्रारम्भ से अन्त है
या अन्त से प्रारम्भ।

कोरा कागज

कोरा कागज साफ, सुंदर, स्वच्छ
पर उसका मूल्य नगण्य
वह सार्थक शब्दों से
जब होता है लिपिबद्ध
तब अमूल्य होकर बनता है
इतिहास का एक अंग
हमारा जीवन भी है
कोरे कागज के समान
जो व्यक्ति अपने बुद्धि चातुर्य एवं
परिश्रम से नहीं कर पाता सृजन
वह वक्त के साथ विलुप्त होकर
अपनी पहचान खोकर
समाज में स्मृति विहीन बनकर
तिरस्कृत होकर,
करता है जीवन यापन
पर जो मानव अपनी कुशाग्र बुद्धि
मेहनत, लगन और परिश्रम से 
देता है समाज को मार्गदर्शन
सृजनात्मक होते हुये करता है
सफल नेतृत्व का प्रदर्शन
ऐसे युगपुरूष का जीवन
सफलता, मान-सम्मान एवं
वैभव से होता है परिपूर्ण
इसलिये हमारा जीवन
uk हो कोरे कागज के समान
युग पुरूष बनकर दिखाओ
और देश को विश्व में
गौरवपूर्ण स्थान दिलाओ 




बुजुर्गों के सपने

वह वृद्ध व्यक्ति
अपने अनुभवों को समेटे हुए
जिसके चेहरे पर झुर्रियाँ जैसे
कैनवास पर किसी चित्रकार ने
आढी तिरछी रेखाओं को खींचकर
एक स्वरूप दे दिया हो
वह टिमटिमाते हुए दिये की लौ में भी
गर्मी का अहसास कर रहा था
अपनी अवस्था से नहीं व्यवस्था से
वह दुखी व परेशान था
और चिंतन, मनन में खोया हुआ
वह भयमुक्त, ईमानदारी की राह,
नैतिकता से आच्छादित, सहृदयता, समरसता
एवं सद्चरित्र से परिपूर्ण
समाज का सपना उसका ध्येय था
यह उसके सपनों का देश नहीं था
परंतु विपरीत परिस्थितियाँ उसे
अपने में अपने आप को सोचने में मजबूर करती थी
उसके चेहरे पर फिर भी खुशी का भाव था
उसे नई पीढी से परिवर्तन की अपेक्षाएँ थी
एक दिन वह सूर्यास्त के समय
अनंत में विलीन हो गया,
उसके मन की आस मानो चीख चीख कर कह रही थी
कि एक दिन, देश में परिवर्तन आएगा
उसका सपना, साकार हो जाएगा।


वक्त और जीवन


कौन कहता है कि
वक्त बेरहम होता है,
यह तो जीवन में
जवानी की दास्ताँ के समान
मधुर और प्रेममय होता है
यह यौवन के आभास की तरह
कभी खट्टा कभी मीठा होता है
उन मोहब्बत के मारों का सोचो
जिन्हें वक्त और जवानी
दोनो ने दगा दे दिया हो
उनकी भावनायें तो
आँसुओं का दरिया बन जाती है
इसी में मजबूर होकर
उन्हें जीवन जीना पडता है
वक्त उनके लिए
गमों का अहसास है
जीवन पाकर भी
वे आहें भरते रहते हैं
वक्त होता है मेहरबान उनपर
जो वक्त को वक्त पर समझ लेते है
ऐसे व्यक्तित्व शहंशाह की तरह जीते है
पर ऐसे खुशनसीब
दुनिया में बहुत कम हेते है
जो वक्त को नहीं समझ पाते
वे इसकी मार से
भटकते रहते है
और जीवन में दूसरों को
मुकद्दर के सिंकदर
के रूप में देखते है
जीवन में वह सुखी रहता है
जो वक्त का दोस्त बनकर रहता है
उसे ही जीवन का फलसफा
समझकर जीता है
वक्त को समझो तो भी जीना है
uk समझ सको तो भी जीना है
एक जीवन का जीना है और
दूसरा, जीवन है सिर्फ इसलिये जीना है

गधे का बोझ

मेरे घर के सामने एक नेताजी का था निवास
एक दिन अचानक टूट पडा भीड का सैलाब
मैं अचंभित होकर सोचने लगा
कि क्या हो गया वहाँ
मैं भी वहाँ पहुँच कर शामिल हो गया
नेताजी को सब बधाई देकर
मिठाईयों पर हाथ साफ कर रहे थे
मैंने जब दी नेताजी को बधाई
तो वे बडे खुश हुये और बोले
सुनो मेरे भाई
लडका सप्लीमेंट्री में पास हो गया है
मुझे भी सप्लीमेंट्री आया करती थी परंतु
मैं उसमें भी पास नहीं हो पाता था
तब मुश्किल से मैं विधायक बन सका
इसने तो सप्लीमेंट्री पास कर ली है
भविष्य इसका मुझसे ज्यादा उज्जवल है
यह मंत्री पद अवश्य पा जायेगा
यह सुनकर मैं अपने ही ख्यालों में खो गया
पहले जनता का बोझ ढोता था गधा
अब गधे का बोझ ढोयगी जनता
लोकतंत्र का नया रूप नजर आयेगा
लोक अब इस गधा तंत्र का बोझा उठायेगा।



काश! ऐसा हो।

मानव का जीवन हो 
अमृत के समान
मनसा-वाचा-कर्मणा
सत्यमेव जयते और
सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् का
समन्वय हो
जीवन में लय व ताल हो
यही मानव की
परमपिता से आस हो।

हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाएं
मन को शान्ति
हृदय को संतुष्टि
आत्मा को तृप्ति देती हैं।
हमने सृजन के स्थान पर
प्रारम्भ कर दिया
विध्वंस।
कुछ क्षण पहले तक
आनन्द बिखरा रहा था
यह अद्भुत और अलौकिक सौन्दर्य।
कुछ क्षण बाद
आयी गोलियों की बौछार
कर गई काम-तमाम
और जीवन का हो गया पूर्ण विराम।

हमें विनाश नहीं
सृजन चाहिए
कोई नहीं समझ रहा
माँ का बेटा
पत्नी का पति
और अनाथ हो रहे
बच्चों का रूदन
किसी को सुनाई नहीं देता
राजनीतिज्ञ
कुर्सी पर बैठकर
चल रहे हैं
शतरंज की चालें
राष्ट्र प्रथम की भावना का संदेश देकर
हमें सरहद पर भेजकर
त्याग व समर्पण का पाठ पढ़ाकर
सेंक रहे हैं
राजनैतिक रोटियां।

अब हम हों जागरुक
नये जीवन का दें वे संदेश,
आर्थिक व सामाजिक तरक्की से
सम्पन्न हो हमारा देश।  

मानवीयता हो हमारा धर्म
सदाचार और सद्कर्म
हो हमारा कर्म
तभी जागृत होगी
एक नयी चेतना।
सत्यमेव जयते
शुभम् करोति
अहिन्सा परमो धर्मः
की कल्पना
हकीकत में साकार हो
भारत हमारा प्यारा देश
ऐसा महान हो।



दो बूंद

दो बूंद स्याही की
धरती पर टपकीं।
उन पर पड़ी
चित्रकार की दृष्टि
उसने अपनी तूलिका से
बना दिया उन्हें
एक चित्र।
अब वे बूंदें
हो गई थीं मूल्यवान।

दो-दो बूंदों से
भर जाता है घड़ा
बुझाता है हमारी प्यास।

रोको!
पानी की दो-दो बूंदों का
व्यर्थ बहना रोको।
करो इनका संरक्षण
यह देंगी
किसी प्यासे को
नया जीवन।

दो बूंदें
करती हैं पोलियो से रक्षा,
विकलांगता से सुरक्षा,
नवागत के स्वागत में
आँखों में छलकती
दो बूंदें
बिखराती हैं
हर्ष और उल्लास।
मृत्यु पर यही दो बूंदें
अर्पित करती हैं
श्रृद्धा-सुमन।
जीवन में दो बूंदों के महत्व को
करो स्वीकार
इनमें छुपी है
जीवन की अभिव्यक्ति
जीवन की संतुष्टि
और जीवन का आधार।

--

RAJESH MAHESHWARI

106, NAYAGAON CO-OPERATIVE
HOUSING SOCIETY, RAMPUR,
JABALPUR, 482008 [ M.P.]   
Email-authorrajeshmaheshwari@gmail.com

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