आशुतोष दीक्षित ''आशु" की कविताएँ

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संग्रह :-  अनाम बहन


*1*


भय
कहते
भय एक मनोभाव है
एक रिसाव है
जो रिसता है
दिल दिमाग और
उन आंखों में
जिनमे कुछ अलग से
ख़्वाब होते हैं
कुछ पूरे कुछ अधूरे
और कुछ ऐसे भी
जिनके देखने पर
पाबंदियाँ लगी है
बैठे है सख़्त पैहरे
विचार और अभिव्यक्ति पर
हम सिर्फ महसूस कर सकते हैं
विकराल सन्नाटा
और करते हैं रंज
कि क्यों होता है ये सब
कैसे लग जाती है
आग
वहाँ जहाँ होता है बहुत पानी।


*2.*


ज्ञात मुझे है
टिम-टिम करते तारो को तुम तकते तकते
रात रात भर एकाकी यूं जगते जगते
तुम मुझको दे ही जाती हो ;
ये स्नेहिल सौगात
ज्ञात मुझे है
अंधियारी इस रात में तुम क्या सोच रही है
खुली आंख से जैसे सपना देख रही है
प्रणय रात की उस स्नेहिल बेला में
जब कहते कहते रोक लिया था ;
तुमने अपनी बात
ज्ञात मुझे है
सावन की उन रिमझिम रातों में
मै तुममें तुम क्यों खोती मेरी बातो में
कौंध रही है बार बार क्यो;
प्यार भरी वो रात
ज्ञात तुम्हें है
चिर विरह दंश से अभिशापित मैं विकल कोक
रात दिवस की इस पीड़ा से चीख रहा हूँ
जीवन की इस व्यथा कथा में
क्यो आप नहीं हो साथ।


*3.*


मां
एक स्त्री
जो दिखती है अनेक रूपों में
बिखरता हुआ अक्स
टूटती किरचों के बीच
बिछा देती है
दृश्यों के जाल
ममता के आंगन में
घोंट देती है गला
इरादों और सुनहरे भविष्य का
और दे देती है
शांत सुमधुर सपने
नव कोंपलो को
मिटाती अस्तित्व अपना
बेबसी के दौर में
क्योंकि वह एक
मां है


*4.*


एक लड़की
        जिसके जन्म लेते ही
       पसर जाती है खामोशियां
       लोग बाग देने लगते हैं सांत्वना
       कि लड़के लड़की में कोई फर्क नहीं है
      बशर्ते उन्हें भी दी जाय अच्छी शिक्षा
       फिर भी टाल दिया जाता है :
      बधाईयों का आदान प्रदान ;
      डाल दिया जाता है पानी :
      पटाखों फुलझड़ियों में ;
     रोक दिया जाता है :
     मिठाइयों का बनना ;
     लगा दी जाती है पाबंदी : 
      सोहर और ढोल की थाप पर ;
     मातमी सन्नाटे के बीच
     बूढी औरतें करती है खुसुर पुसुर
     ये कैसे हो सकता है :एक ने कहा
    बहू का बायां पैर ही बढ़ता था आगे
     उजियारे पाख मे ही तो धारण किया था गर्भ
    दूसरी ने कहा :
   अरे कुछ नहीं होता इससे
   सब बकवास है
   विधि का विधान भला कौन टाल सकता है
    हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ
   कहकर याद किये जाते हैं बाबा तुलसी
सब विचारमग्न
   गोया कि घट गया हो कुछ अघटित
   जन्म ले लिया हो कसी कृत्या ने
अन्ततः होता है निर्णय -
     कि यही मौका है जब लड़की को
     चटा दो ढेर सारा नमक
     याकि जला दो नन्हीं पोरों को
      जमोगो के नाम पर
     और कर लो पश्चाताप
     सोनोग्राफी मशीन डाक्टर
     और
     मां के झूठ का।


*5.*


क्यों
क्यों
जाते हैं बदल
मेरे मधुबन
मरघटो में
जहाँ जलकर चटकती हड्डियों
बहती हुई मज्जा से घिरा
मेरा मै
बनता है बैताल।
क्यो
बार बार पूछता है बैताल
तुम्हारे होने न होने के
अनगिनत सवाल
मैं बचना चाहता हूँ
भागता भागता
पार कर जाता हूँ
अनेक शहर गांव घर
बच्चे चीखते हैं
लोग पिल पड़ते हैं लाठियाँ लेकर
एक बार फिर मारा जाता हूँ
उन्माद भीड़ और तमाशाई
लगाते हैं कहकहा।
क्यों
फिर जगता है बैताल
फूंकता है कान में कोई मंत्र (सलाह)
चिहुंककर उठ बैठता हूँ
टटोलता हूँ अपनी जेबों को
जहाँ अब भी सुरक्षित है
तुम्हारी चूडी का टुकड़ा
रोप देता हूँ उसे
रक्त से गीली मिट्टी में
हल्के से सहलाता
एकाएक
सिहरन से भर गया शरीर
रोंगटे खड़े हो गए
कि जैसे तुमने छुआ है अभी।
मुझे पता है
यहाँ फिर अंकुरित होगा प्रेम
एक न एक दिन हो जाऊंगा मुक्त
सुन रहे हो बैताल।


*6.*


भूख है कि मिटती नहीं हमारी
भरसक निचोड़कर कर पी गया
मां के स्तनों को
साथ ही
स्नेह वात्सल्य
कर गया हजम
डकार भी नहीं ली
नोच डाला
शाक पात सभी
कर दिया नग्न
पृथ्वी के जघन को
टूट पड़ा
जो भी हुआ समक्ष
कर लिया विजित
फिर भी रहा भूखा
पर खुद को न देख सका
पौरुषवान होकर बन गया परुष
दया क्षमा शील से रहा परे
सभ्यता के चरम पर पहुंच मैं
बना रहा आदिम।


*7*.


अनाम बहन के प्रति
मै देख रहा हूँ
(यद्यपि घना अंधकार है)
उत्तप्त हृदय
उदिग्न मन की
विचार सारिणियों का अजस्र प्रवाह
उठती गिरती
लहरों में बह रहा हूँ
अचानक से चमक जाती है बिजली
प्रकाशित हो उठते हैं हृदय तट
ऊंचे नीचे होने लगते हैं
स्नेहिल बिम्बों के प्रसार
याद आता है :
तुम्हारा हथेली के बल घिसटना
आइत हय आइत हय कहते कहते
छपाक से दाल की कटोरी का उलट देना
जलने पर मुझे ही दोष देना
याद आता है :
मेरा स्कूल जाना
घर आंगन बरोठा कोठरी हाता सभी जगह
मुझे तुम्हारा खोजना
फिर
ऊब और एकाकी चिंता के साथ
बुआ दादी से कहना
( हमार भइया कहं गया)
याद आता है :
उस विकट रात में
तुम्हारा पढ़ते पढ़ते सोना
और जल जाना
तुम्हे देखना
डरना
मेरे आंसुओं का सूख जाना
क्या था ये
सामाजिक बंधन थे?
या नेह के अदृश्य तन्तु?
ज्ञात नहीं।
मुझे याद है :
तुम्हारा स्कूल जाना
लघु शंका के बहाने
दिन दिन खेतो में घूमना
रामदाना खाना
बथुआ उखाड़ कर अदृश्य अज्ञात के लिए रख देना
मुझे याद है :
तुम्हारा पढ़ना
लड़ना
किसी भी बात पर घण्टों बहस करना
रूठना मनाना
अवसाद ग्रस्त होना
बिखरना
और फिर खुद को सहेज लेना।
मुझे याद है :
तुम्हारा घर का कोतवाल बनना
हर बात को नियंत्रित करना
हावी होना
बात को मनवाने का प्रयास करना
कुतर्क करना
और नाराज होना।
कभी छोटे बच्चों को मात करना
तो कभी बन जाना महाज्ञानी।
मुझे याद है :
कभी कभी मेरे लिए दिन भर खटते
मेरी ही इच्छा के
ढेर सारे पकवान बनते
तभी किसी बात पर उग्र हो
मुझसे लड़ पड़ते।
किन्तु अफसोस कि
मेरे नेत्रों में अश्रु देख जो विचलित होते
उनकी स्मृति ही आज आंखें नम करती है
बातो और रिश्तों के धागे भी तोड़ चुके वो
मेरी पहली सर्वाधिक प्रिय बहन
बता दो बस इतना
क्या मेरी स्मृति अब नहीं आती
या मिटा दिया है
मेरा नम्बर
अपने फोन बुक से
स्नेहिल स्मृतियों से भी
                              तुम्हारा भाई

*8*.


मै देख रहा हूँ
आगत विगत
स्वप्नों का विस्तार
उत्ताल लहरों से तिल तिल कटकर
टूटते हुए कगार।
मै देख रहा हूँ
घटाटोप अंधकार
झंझावात
उमड़ते काले घनो के मध्य
एक कौंध को तरसती
बिद्युत की कातर पुकार
सुनकर बखूबी महसूस करता हूँ
हृदय का हाहाकार।
मै देख रहा हूँ
स्तब्ध चकित सशंकित
मै भाग रहा हूँ
खुद से
आप से
आस पास से
छिपाना चाहता हूं उसे
जिसे मैने जिया ही नहीं
और बताना चाहता हूँ
कि करने पर भी अथक परिश्रम
खत्म न होने वाली दुश्वारियों की कतार।
मै जी रहा हूँ
सवालों को
सलाहों को
फब्तियों को
कुटिल मुस्कराहटों को
लिजलिजी व्यवस्था को
जहाँ रोजगार विहीन होना
अयोग्यता का परिमाप है।

*9.*


शब्दों को चबा चबा कर
खबरों की जुगाली
करते हैं प्रस्तोता
और बताते हैं कि
टी आर पी के मायने
गुमटियो ;चाय की दुकानों के
इर्द-गिर्द
महकती चाय की चुस्कियों
प्रसारित ठहाकों के मध्य
पान की पीक को इधर-उधर
थूकने के साथ हम देते हैं निर्णय
(असल में प्रद्युम्न का हत्यारा है कौन)
आओ बैठ ले कुछ देर
कर ले विचार कि
क्या प्रद्युम्न का मरना
अगस्त सितम्बर में बच्चों का मरना है
वस्तुतः फासीवाद और पूंजीवाद का यह दुष्चक्र
जिसमे फंस ही जाता है
कोई न कोई मुर्दा खलासी
और ढंक देता है उन प्रश्नों को
जो इन हिंसक जानवरों को
करते हैं बेनकाब
और छुपा जाते वहाँ
चहलकदमी करती हुई लाशों
के रहस्य को
और ये जिंदा लाशें करती रहती हैं
गुपचुप तरीके से
भारत निर्माण
                     

*10.*


कुदुवा
जो मात्र सूचना पर
बिना बुलाए आते हैं
लगाते हैं मजमा
बनाते हैं खुद का तमाशा
वे पूडी शक्कर भरते हैं झोली में
ताकि आगे कुछ दिनों तक पेट भर सके
इस बात पर लोग बजाते हैं तालियां
लोग कसते हैं फब्तियां :
ये नीयतछुट है
मांगने वाली जाति है ये
अरे! इनकी बराबरी कौन करेगा
हम लोग क्या कमाते हैं
जरायमपेशा हैं साले
बेटियों से व्यापार कराते हैं
जिस्म का।
सही कहते हैं जिजमान
हम ज्यादा कमाते हैं
लेकिन क्या आप आ सकते हैं
हमारे घर
करने तमाशा भूख का
जगन्नाथ की बोलने जय
कर सकते हैं दक्षिणा के लिए
चिरौरी।

*11.*


चांद क्या है
एक रोटी है
जिसे सब खाना चाहते हैं
वो भी जिसका पेट बहुत बड़ा है
वो भी जिसका पेट पीठ से मिला है
बड़े पेट के पास पैसा है
बंदूक है
गोलियां हैं
चाभी है बातों की
वह खोलता है रोज - सपनों की दुकान
दिखाता है - हमारे भविष्य के सुनहरे सपने
बन जाता है हाक़िम
बैठता है शौक से सिंहासन पर
कीमती लिबास पहनकर।
और वो जिसकी पीठ पेट में है
उसके पास भी हैं
भूख
लाचारी
भात के लिए बिलखती
मरती नयी पीढ़ी
बेरोजगारी का दंश झेलते
अवसादग्रस्त हो
आत्महत्या करते नौजवान
खलिहान में फसलों की डेरी
जमा कर
पसीने से सनी हथेली में
चंद सिक्के दबाकर
बाजार से लौटता किसान
उसके पास एक लाठी भी है
जिसे वो तानाशाह पर नहीं तानता
अपितु खुद को ढोता है।


प्रेषक :-
नाम- आशुतोष दीक्षित
पता- ग्राम व पोस्ट बीबीपुर
जिला - बाराबंकी

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2 टिप्पणियाँ "आशुतोष दीक्षित ''आशु" की कविताएँ"

  1. अंतरात्मा की आवाज को झकझोर कर रख दिया।अति उत्तम,अप्रतिम।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति......बहुत बहुत बधाई......

    उत्तर देंहटाएं

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