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स्मृतियों में हार्वर्ड - भाग 1 // सीताकान्त महापात्र // अनुवाद - दिनेश कुमार माली

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भाग 1 आमुख एक नदी जिसका नाम है चार्ल्स, इस नदी के किनारे दो विश्व विख्यात शिक्षा-संस्थान हार्वर्ड और एम॰आई॰टी॰ विद्यमान है। इस नदी के दूसरी...

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भाग 1

आमुख

एक नदी जिसका नाम है चार्ल्स, इस नदी के किनारे दो विश्व विख्यात शिक्षा-संस्थान हार्वर्ड और एम॰आई॰टी॰ विद्यमान है। इस नदी के दूसरी तरफ बोस्टन विश्वविद्यालय है। नदी के किनारे बसे शहर का नाम कैम्ब्रिज है। भले ही, क्षेत्रफल में यह छोटा है, मगर बहुत ही प्राचीन शहर है। नदी की दूसरी तरफ बहुत बड़ी नगरी बोस्टन है। हर दिन होने वाले परिवर्तन को सुदूरगामी बनाने वाले हार्वर्ड का परिवेश असाधारण है। इसकी सुदृढ़ नींव चार सौ साल की परंपराओं और संस्कारों की पृष्ठभूमि पर आधारित है। विश्व के सर्वोत्तम दस विश्वविद्यालयों में इसका स्थान हमेशा अव्वल रहा है। ऐसे विश्वविद्यालय में फोर्ड फ़ाउंडेशन फ़ेलो तथा एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में एक वर्ष(1987-88) बिताना मेरे लिए किसी परम सौभाग्य से कम बात नहीं थी।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय और कैम्ब्रिज शहर की स्थापना इंग्लैंड के ‘निर्वासित’ बहु प्रतिभाशाली व्यक्तियों के अथक प्रयासों का फल है। नए महाद्वीप में उपनिवेश की स्थापना करना,बोस्टन टी-पार्टी और न्यू इंग्लैंड जैसे नामकरण ऐतिहासिक कथावस्तु है। इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के पूर्वतन विद्यार्थी देश से निर्वासित होने के बाद भी 800 साल पुराने विश्वविद्यालय को भूल नहीं पाए थे, इसलिए उन्होंने इस शहर का नाम कैम्ब्रिज रखा और वह कुछ हद तक हार्वर्ड का ढांचा भी कैम्ब्रिज जैसा ही बनाया।संयोगवश सन 1968-69 में मैंने जो एक साल कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के फ़ेलो के रूप में बिताया था, उनकी स्मृतियाँ हार्वर्ड में एक साल प्रवास के दौरान तरोताजी हो उठती थीं।

हार्वर्ड ने मुझे अजस्र रंग-बिरंगे अनुभव प्रदान किए। सेंटर में मेरे साथ काम करने वालों में मेक्सिको के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार कार्लो फुएंट्स,आइरिस कवि सियामस हिनि मुझे घनिष्ठ मित्र के रूप में मिले।उस समय हिनि को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला था। विश्वविद्यालय के विभिन्न दौरों के समय मुझे नाइजेरिया के उपन्यासकार चिनिआ आचिबी,रूसी कवि जोसेफ ब्रोडस्की, मेक्सिको के कवि ओक्टेविओ पॉज ,स्वीडेन के कवि थॉमस ट्रांस्ट्रोमार के साथ मिलने का सुअवसर प्राप्त हुआ।

मैं जिस फ़ेलोसिप पर काम कर रहा था,उसमें संयुक्त राष्ट्र अमेरिका,कनाड़ा भ्रमण के साथ-साथ यूरोपियन कम्यूनिटी के निमंत्रण पर उनके हेडक्वार्टर और संसद और ब्रसेल्स और स्ट्रासबर्ग की यात्रा भी शामिल थी। इसके अतिरिक्त, मुझे अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान और काव्य-पाठ हेतु भी निमंत्रण मिला था। उनमें प्रमुख शिकागो विश्वविद्यालय की विलियम वॉन मूडी व्याख्यान-माला और काव्य-पाठ शामिल था, जिसकी अध्यक्षता मेरे मित्र ए.के. रामानुजन ने की थी। बहुत दिन से मेरे मन के अंदर प्राचीन संस्कृति के अन्यतम देश मेक्सिको देखने की प्रबल इच्छा थी। प्रवास के दौरान मैंने मेक्सिको का भ्रमण भी किया।

सारी बातों को लेकर एक किताब लिखने की इच्छा मन के अंदर बहुत दिनों से छुपी हुई थी, मगर समय के अभाव और मेरे स्वभाव-सुलभ आलस्य के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा था। बहुत सारे कागज-पत्र,मेरी पुरानी डायरी,उपरोक्त दोस्तों की चिट्ठियों आदि की सहायता से चार वर्ष पहले (2004) मैंने इस पुस्तक को लिखना शुरू किया था, जो अब यानि 2010 में पूरा हो रहा है। मुख्य प्रकाशक पीताम्बर बाबू को इसका प्रकाशन दायित्व लेने के लिए उन्हें और उनके छोटे पुत्र श्रद्धेय जीवानंद को मेरा हार्दिक धन्यवाद। सन 1981 में फ्रेंड्स पब्लिशर द्वारा प्रकाशित ‘अनेक शरत’ को पाठकों का भरपूर प्यार मिला। ज्ञानपीठ द्वारा इसके हिन्दी अनुवाद के तीन संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। इससे पूर्व मेरा दूसरा यात्रा-संस्मरण ‘शाणित तरवारि और सेवती फूल’ प्रकाशित हुआ है। अब इस पुस्तक को ओड़िया पाठकों को उपहार देते हुए मुझे खुशी हो रही है।

सीताकान्त महापात्र

महाशिवरात्रि

12.02.2010

अनुवादक की कलम से ...

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित डॉ.सीताकांत महापात्र का नाम न केवल भारतीय साहित्य में वरन विश्व साहित्य में भी अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज करवाता है। एक प्रबुद्ध प्रशासक और साहित्यकार होने के साथ-साथ नृतत्व (मानविकी) विषय पर आपका विशेष अधिकार है। भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में पूरे देश में अव्वल होने तथा परवर्ती प्रशासनिक सेवाओं में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए भारत सरकार की तरफ से आपको कैंब्रिज एवं विश्वविद्यालय में बतौर ‘फ़ेलो’ के रूप में भेजा गया। वहां पर भी वर्ष के अंत में होने वाली लिखित परीक्षा में सबसे ज्यादा अंक प्राप्त कर आपने हमारे देश का नाम गौरवान्वित किया।

विगत एक दशक से मैं सीताकान्त महापात्रा से परिचित हूं,ओड़िशा के ख्याति-लब्ध शीर्षस्थ कवि के तौर पर। ओड़िया काव्य के प्रति प्रगल्भ स्वानुभूत साहित्यिक अवधारणाओं एवं विमर्श के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं के समकालीन साहित्य पर भी आपकी गहरी पकड़ है।अपनी यात्रा-संस्मरण ‘हार्वर्डरे सेईसबु दिन उन्होंने मुझे सन 2011 में अवलोकनार्थ भेंट की थी,भुवनेश्वर में उनके घर सत्यनगर में एक औपचारिक मुलाक़ात के दौरान,जब मुझे आंतरिक उत्कंठा इस सदी के बड़े-बड़े लेखकों से मिलने को प्रेरित करती थी। ये पुस्तक मुझे उपहारस्वरूप देते हुए उन्होंने कहा था,“दिनेश,यह मेरे जीवन की एक अनमोल धरोहर है।” एक-दो महीने में मैंने इसे अच्छी तरह पढ़ लिया था, मगर वैदेशिक पृष्ठभूमि, अनेक विदेशज शब्द और विदेशी साहित्यकारों की अनभिज्ञता के कारण मैं इस पुस्तक का अनुवाद करने में अपने आपको अक्षम पा रहा था। मगर जब मैंने राहुल सांस्कृत्यायन की वोल्गा से गंगा तक’, किन्नर देश की ओर’ यात्रा-संस्मरण पढे तो मेरे यायावरी स्वभाव के कारण मुझे साहित्य की अन्य विधाओं की तुलना में यात्रा-संस्मरण ज्यादा आकर्षित करने लगे। सन 2011 में थाईलैंड-प्रवास पर लिखे मेरे संस्मरण को लखनऊ की तस्लीमा संस्थान ने उस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ संस्मरण घोषित कर मेरा उत्साहवर्धन किया। उसके बाद तो चीन की यात्रा पर तो मैंने चीन में सात दिन’ नामक पुस्तक तक लिख डाली, जो बाद में सन 2013 में यश-पब्लिकेशन्स से प्रकाशित हुई। इसी दौरान मुझे डॉ॰ विमला भंडारी का संस्मरणात्मक शैली में लिखा हुआ किशोर उपन्यास कारगिल की घाटी’ समीक्षार्थ प्राप्त हुई।

सात साल बाद मैं फिर से सीताकांत जी के इस पुस्तक को पढ़ने से रोक नहीं पाया और मन में जुनून पैदा हो गया और मन ही मन अनुभव करने लगा कि अगर यह काम शेष रह जाता तो शायद मुझे सुकून नहीं मिलता। जब मैंने अनुवाद करना शुरू किया तो बस करता ही चला गया। दो-अढ़ाई महीने कब बीत गए मालूम नहीं चला।टंकण,संशोधन और सम्पादन सब प्रक्रियाएँ एक ही साथ चल रही थीं। स्रोत भाषा की लक्ष्य भाषा में कोडिंग-डीकोडिंग इतनी गहनता से हो रही थ कि मुझे लगने लगा था मानो मैं भी सीताकांत जी की परछाई बनकर केंब्रिज,बोस्टन,हार्वर्ड,न्यूयॉर्क, मेक्सिको सभी देशों की यात्रा कर रहा हूं, उनका अनुगमन कर रहा हूं, विश्व के बड़े-बड़े साहित्यकारों से उनके साक्षात्कारों का प्रत्यक्षदर्शी बन रहा हूं, दर्शक-दीर्घा में बैठकर उनके व्याख्यानों पर करतल ध्वनि से आभार व्यक्त कर रहा हूं। ईश्वर समग्र विश्व भ्रमण का मौका राहुल सांस्कृत्यायन या सीताकान्त महापात्र जैसे बिरले भाग्यशाली व्यक्तियों को ही देता है।उनके लिपिबद्ध संस्मरण हमें विश्व की शिक्षा-संस्थानों की उत्कृष्टता के साथ-साथ सामाजिक,धार्मिक,राजनीतिक,सांस्कृतिक परिवेश का खाका प्रस्तुत करता है। राम मनोहर लोहिया की ‘विश्व-भाषा,विश्व-लोकतंत्र’ की अवधारणा की संपुष्टि करते हुए यह संस्मरण ‘वसुधैव कुटुंबकम’ उक्ति को चरितार्थ करने का आह्वान करता है। सीताकांत जी ने अपनी मूल कृति के प्रथम पृष्ठ पर जिन दो महाविद्वानों की उक्तियाँ उद्धृत की हैं, उनका भी मैं यहाँ उल्लेख करना समीचीन समझता हूं।लिन यूतांग लिखते है:- No one realises how beautiful it is to travel until he comes home and rests his head on his old familiar pillow.” तथा रोबर्ट लुइस स्टेवेंसों का कथन है, “There is no foreign lands. It is the traveller only who is foreign.”

मैंने इस यात्रा-संस्मरण को अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए डॉ॰ प्रसन्न कुमार बराल द्वारा ओड़िया भाषा में लिए गए उनके साक्षात्कार का मेरा हिंदी अनुवाद जोड़ा है। साथ ही साथ, हिंदी पाठकों को उनके समग्र कृतित्व और व्यक्तित्व के बारे में परिचित कराने के लिए भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित रवींद्र कालिया द्वारा संपादित ग्रंथ ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार(1965-2010)’ में से उनका प्रशस्ति-पत्र,वक्तव्य एवं ओड़िया समालोचक हरप्रसाद दास द्वारा उनकी रचनधर्मिता पर लिखे आलेख का अनुवाद भी परिशिष्ट में जोड़ दिया गया है। आशा है, सीताकांत महापात्र के इस यात्रा-संस्मरण का हिंदी जगत में भरपूर स्वागत होगा।

दिनेश कुमार माली

तालचेर


अनुक्रमणिका


1. हार्वर्ड : चार सदी पुराना सारस्वत मंदिर

2. केंब्रिज शहर और : इतिहास एवं वर्तमान

3. हार्वर्ड के चारों तरफ ऐतिहासिक बोस्टन नगरी

4. ऐतिहासिक बोस्टन तथा उसके उत्तरांचल वासी

5. हमारा सेंटर (सिफा): चार्ल्स नदी, कानकार्ड ऐवन्यू

6. हार्वर्ड में पहला कदम:अकेलेपन के वे दिन

7. विश्वविद्यालय की वार्षिक व्याख्यान-माला

8. पुनश्च ओक्टेविओ, पुनश्च कविता और वास्तुकला के जुगलबंदी

9. कार्लो फुएंटेस – अजन्मा क्रिस्टोफर

10. नाबोकोव और नीली तितली

11. जॉन केनेथ गालब्रेथ : सामुहिक दारिद्र्य का स्वरूप और धनाढ्य समाज

12. अमर्त्य सेन: कल्याण विकास अर्थशास्त्र के नए क्षितिज और स्टीव मार्लिन

13. सिआमस हिनि, थॉमस ट्रान्स्ट्रोमर, चिनुआ आचिबि और जोसेफ ब्रोडस्की

14. अमेरिका के स्वतंत्रता की प्रसवशाला- कॉनकॉर्ड

15. अमेरिका के दर्शन,साहित्य और संस्कृति की प्रसवशाला- कॉनकॉर्ड

16. हार्वर्ड से बहुदिगंत आनुष्ठानिक भ्रमण (भाग-एक)

I. न्यू हैम्पशायर, चुनाव एवं पतझड़

II. वॉशिंगटन: अमेरिका की सर्वशक्तिमान राजधानी की विरासत और संस्कृति

III. जुड़वां शहर: मिनियापोलिस-सेंट पॉल

IV. न्यू ऑरलियन्स-मिसिसिपी तट पर अमेरिका का एक 'अलग' शहर

V. मिसिसिपी नदी, काजुन और जाज

VI. मिसिसिपी राज्य का जैक्सन शहर : क्रीतदास नीलामी

VII. ऑरेंज काउंटी: कैलिफोर्निया का समृद्ध क्षेत्र

17. हार्वर्ड से बहुदिगंत आनुष्ठानिक भ्रमण (भाग-दो)

यूरोपीय समुदाय: स्ट्रासबर्ग और ब्रसेल्स

कनाडा यात्रा: अटलांटिक तट से प्रशांत महासागर तक

18. हार्वर्ड से बहुदिगंत आनुष्ठानिक भ्रमण: काव्य पाठ एवं व्याख्यान

I. हार्वर्ड विश्वविद्यालय का नृतत्व विभाग

II. शिकागो विश्वविद्यालय का नृतत्व विभाग और विलियम वॉन मूडी व्याख्यान

III. सैनहोज विश्वविद्यालय, सैन फ्रांसिस्को, मोंटेरी खाड़ी , रेडवुड नेशनल पार्क और चिमनी वृक्ष

IV. सैनफ्रांसिस्को

V. मोंटेरी खाड़ी

VI. रेडवुड राष्ट्रीय उद्यान और चिमनी पेड़

VII. बर्मिंघम विश्वविद्यालय, फ्लोरिडा, फिर से न्यू ऑरलियन्स

VIII. क्लेयरमाउंट पिट्जर कॉलेज समूह, लॉस एंजिल्स: कविता-पाठ और समालोचना

18. हार्वर्ड से एक और भ्रमण: मेक्सिको

मैक्सिको नगरी: क्रांति और संस्कृति का मनोरम शहर

i. गुआडालूपे बेसिलिका

ii. टेनोक्चिटलन और आज़्टेक सभ्यता

iii. राष्ट्रीय नृतत्व संग्रहालय

iv. जोकोला- संविधान प्लाजा

v. टियोतिहुआकान: सूर्य पिरामिड, चंद्र पिरामिड

vi. मैक्सिको का चापुलटेपेक पार्क

19. न्यूयार्क में फिर एक बार, नववर्ष 1988 का स्वागत

20. हार्वर्ड प्रवास के अंतिम दिन

21. परिशिष्ट

i. साक्षात्कार

ii. लेखक-परिचय,वक्तव्य एवं प्रशस्ति-पत्र

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1. हार्वर्ड : चार सदी पुराना सारस्वत मंदिर

सन 1968-69 में मुझे भारत सरकार द्वारा मनोनीत होने पर इंग्लैंड के कैंब्रिज विश्वविद्यालय में एक साल पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ था।यह प्रशिक्षण कोलंबो योजना के अंतर्गत आता था, इंग्लैंड के ओवरसीज डेवलपमेंट स्टडीज द्वारा संचालित किया जाता था। उस साल कोलंबो योजना के तहत विभिन्न देशों के बीच अधिकारियों को आमंत्रित किया गया था। प्रत्येक देश अपनी तरफ से एक अधिकारी का चयन करता है। उस कोर्स में चार प्रमुख विभाग थे तथा प्रत्येक विभाग किसी न किसी विकास की समस्या से जुड़ा हुआ था जैसे- विकास का आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक एवं प्रशासनिक दृष्टिकोण। साल के अंत में एक परीक्षा होती थी तथा डिप्लोमा सर्टिफिकेट प्रदान किया जाता था। उस परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर मुझे विश्वविद्यालय से पुरस्कृत किया गया था।

उसके लगभग बीस साल के बाद सन 1987-88 में मेरा हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अध्ययन तथा अनुसंधान के लिए चयन हुआ। इस कोर्स की खासियत के बारे में पहले से बताना उचित रहेगा। इस दार्शनिक कार्यक्रम तथा कैंब्रिज के सारे कोर्स में ज्यादा अंतर विशिष्टता को लेकर था। कोर्स सेंटर फॉर इंटरनेशनल अफेयर द्वारा आयोजित किया जाता था। इस कार्यक्रम के लिए प्रति वर्ष बीस अधिकारियों का चयन किया जाता था, जिसमें प्रत्येक देश अपने एक प्रतिनिधि को भेजता है। प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य हार्वर्ड के मेमोरेण्डम में दिया हुआ था- हम उनका चयन करते हैं, जिन्होंने अपने देश के जनजीवन और समाज में अब तक कुछ किया है और भविष्य में भी वे हुत कुछ कर सकते हैं तथा विशिष्ट दर्जे के अधिकारी हो सकते हैं। जिसमें सिविल-सर्विस के वरिष्ठ अधिकारी, विदेश विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, विशिष्ट अर्थशास्त्री, राजनैतिक नेता, उद्योग-धंधों में नाम रोशन करने वाले उद्योगपति, पत्रकारिता के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त संपादक इत्यादि की तालिका हार्वर्ड विश्वविद्यालय तैयार करता है। उदाहरण के तौर पर मेरे साथ थे, दक्षिण अफ्रीका में इंग्लैंड के राजदूत डैट्रिक मोबर्ली, सेनेगल में दक्षिण कोरिया के राजदूत सियंगली, इंटर-अमेरिकन बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री रबर्टो टोस्कानो, अमेरिका के एडमिरल फिर मिडलैंड, मलेशिया के पूर्व उप-प्रधानमंत्री मुसाबिन हितम, स्वीडन के दूसरे स्थान के सैनिक अधिकारी उड़वार मिडकांडल, जर्मन के वरीय सिविल सर्विस अधिकारी जोहान वेंजल, अमेरिका के सुप्रसिद्ध उद्योगपति जुलियान सेविन, वेनेजुएला के शीर्ष स्थान के संपादक गुस्ताभो गोरिटि, यूरोपियन कम्यूनिटी के मुख्य अधिकारी जेम्स, स्पेन तथा सहयोगी देशों के शरणार्थी अनुष्ठान के वरीय अधिकारी लुइस ड्रूक वोलेस्की।

हार्वर्ड जाते समय स्विट्जरलैंड तथा स्वीडन में भारत उत्सव आयोजन में भाग लेने के लिए पन्द्रह लेखकों के साथ मुझे भी निमंत्रण मिला था। पहले से ही मैंने आईसीसीआर को स्पष्ट बता दिया था कि मेरे हार्वर्ड पहुंचने की अंतिम तारीख 18 सितंबर, 1987 होने की वजह से सभी निमंत्रणों तथा प्रोग्रामों के सारे कार्यक्रमों में भाग लेना मेरे लिए संभव नहीं होगा। स्विट्जरलैंड के चार दिनों के आयोजनों (जुरिक, वासल और लुसर्ण में काव्य-पाठ और अभिभाषण) के अतिरिक्त स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के तीन दिनों के प्रोग्रामों, जिनमें विश्वविद्यालय के आलोचना-सत्र, लेखक-संघ में काव्य-पाठ और शहर के सामान्य भ्रमण समेत वाइस-चांसलर और हमारे राष्ट्रदूत के साथ रात्रि-भोज में भाग ले सकता हूं। बाकी स्वीडन-भ्रमण के सात दिनों में भाग नहीं ले सकता हूँ। भारत सरकार को मेरी इन हवाई यात्राओं के लिए कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ा, क्योंकि मैं हार्वर्ड पहले से ही जा रहा था।

स्वीडन के आयोजन में पी.लाल, अनंत मूर्ति, अरूण कोलाटकर, अमृता प्रीतम, रघुवीर सहाय इत्यादि मेरे अतिरिक्त पन्द्रह जन थे। किन्हीं विशिष्ट कारणों की वजह से मेरे सिवाय बाकी सभी स्वीजरलैंड नहीं जा सके, वे सब केवल स्वीडन तक ही जा सके। तत्कालीन सभी राष्ट्रीय स्तर के अखबारों ने सरकारी व्यवस्था और नीति की कड़ी आलोचना की। मैं हार्वर्ड जाते समय एक दिन पहले ही ज्यूरिख में पहुंचा था। ज्यूरिख के रिड़बर्ग म्यूजियम के निर्देशक, विख्यात कलाविद डॉ. एवरहार्ड फिरार ने स्विस अखबार में इस बात की घोर आलोचना की थी। उन्होंने यह भी बात कही थी कि अखबार वालों ने आश्वासन दिया है कि आखिरकार एक कवि यहां पधारे हैं। स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख, वासल, लूसर्ण में काव्य-पाठ और अभिभाषण समाप्त करने के बाद मैं स्टॉकहोम पहुंच गया। वहाँ बाकी लेखक बंधुओं से मेरी मुलाकात हुई।

स्टाकहोम में मेरे लिए सबसे ज्यादा खुशी की बात यह थी कि वहां काव्य-पाठ में स्वीडिश कवि थॉमस ट्रांसतोमर से मुलाकात होगी। स्वीडिश भाषा में अनूदित मेरा कविता-संग्रह (मार्टिन आलउड द्वारा अनूदित तथा स्वीडन में प्रकाशित) Dod Och Drom (मृत्यु और सपने ) को थॉमस ने पहले से पढ़ रखा था। मैंने ओड़िया भाषा में जो तीन कविताएं पढ़ी थीं, उनका अनुवाद उन्होंने उसी किताब से स्वीडिश में पढ़ा। थॉमस स्वीडन के एक बड़े कवि थे, जिनका अनुवाद यूरोपीय भाषाओं तथा अंग्रेजी भाषा में सर्वाधिक हुआ है। इस स्वीडिश कवि के कविता-संकलन स्वीडन में सबसे ज्यादा प्रचलित है। मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि वे भारतीय तथा ओड़िया काव्य प्रेमियों में भी अच्छे खासे लोकप्रिय है।

वहां के बहुत पुराने विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर के साथ रात्रि-भोज के समय मुझे अनेक लेखकों, कवियों, चित्रकारों, संगीतज्ञों तथा अनेक विद्वानों के साथ मिलने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ था। जिनमें एक कवि थे जेल एक्समार्क, जिनके कविता-संग्रह ‘बैला बारटॉक एण्ड द थर्ड रेइस ने (थॉमस के शब्दों में) स्वीडन में धूम मचाई थी।

वहाँ तीन दिन रहने के बाद मैंने सभी से विदा ली और न्यूयार्क चला गया, वहां से बोस्टन और फिर हार्वर्ड । हर फेलो को अपनी और स्कूली बच्चों को साथ में लाने तथा रखने की सुविधा प्रदान की जाती है। इसलिए मैं अपनी पत्नी तथा स्कूली बेटे सत्यकाम को साथ ले गया था। तीनों लड़कियाँ चूंकि कॉलेज जाने लगी थीं, इसलिए वे साथ नहीं आ सकीं। पत्नी और बेटे को न्यूयार्क में अपने रिश्तेदारों के पास छोड़कर मैं विश्वविद्यालय में एक साल रहने के लिए मकान खोजने गया। न्यूयार्क में रिश्तेदार स्वर्गीय कृष्ण मोहन दास (फूफाजी) और हार्वर्ड में मेरे मित्र विजय मिश्र (कवि मनमोहन मिश्र के पुत्र) तथा उनकी धर्मपत्नी सुवर्ण ने मकान खोजने में मेरी काफी मदद की। 6 नंबर, कॉनकॉर्ड एवेन्यु के छ मंजिले अपार्टमेंट के छठवें तल्ले पर एक मकान चुन लिया गया। रसोईघर, स्नानघर, इकट्ठे शयन कक्ष और बैठक कक्ष (पर्दे से विभक्त किया हुआ) पुस्तकें रखने के लिए एक बड़ा कमरा, अपार्टमेंट में पढ़ने की व्यवस्था थी। महीने का किराया 150 डॉलर था। ऐसा सुनने में आया कि विश्वविद्यालय और सीएफआईए पास-पास में होने तथा केम्ब्रिज शहर की वजह से किराया ज्यादा है, क्योंकि हार्वर्ड , एम आई टी, बोस्टन तीनों बड़े-बड़े विश्वविद्यालय होने की वजह से यहां किराए का मकान मिलना बहुत ही कष्ट दायक है। केंब्रिज शहर के आस-पास के तीन-चार छोटे शहरों में भाड़ा जरूर थोड़ा कम था, मगर दूर होने की वजह से गाडी रखने की जरूरत नहीं होने पर भी मेट्रो में आना-जाना पड़ता था तथा इसके अतिरिक्त, समय भी ज्यादा लगता था। मेरा गाड़ी खरीदने का कोई इरादा नहीं था, भले ही उस देश में सेकेण्ड हैंड गाड़ियाँ काफी सस्ते में मिलती थीं। मगर मैं एक खराब ड्राइवर था। इसलिए मैंने वह जगह चुनी, जहां से पैदल विश्वविद्यालय सेंटर तथा चार्ल्स नदी तक जाया जा सकता था। वहाँ हरदिन मुझे मेट्रो में आना-जाना करना पड़ता।

इस कोर्स के एक साल के भीतर प्रत्येक प्रत्याशी को दो बड़े शोध-आलेख सेमिनार के रूप में प्रस्तुत करने पड़ते थे। जिसमें सी.एफ.आई.ओ के सारे अध्यापकों तथा विश्वविद्यालय के अन्य वरीय अध्यापकों को आमंत्रित किया जाता था। एक सेमिनार प्रश्नोत्तर के साथ लगभग तीन घंटे चलता है। मेरे दोनों सेमिनारों के शीर्षक थे- इंटरनेशनल कल्चरल रिलेशन्स, टुडे एंड टुमारो एवं इंडियाज डिप्लोमेटिक रिलेशन इन साउथ ईस्ट एशिया।

दूसरा, सेमिनारों को छोड़कर अगर कोई शोधरत छात्र आपका निर्देशन अथवा सहायता चाहता है तो उनसे आपको मिला दिया जाता है। तीसरा, लगभग पूरे साल बाहरी आदमियों द्वारा सोलह अभिभाषणों की व्यवस्था की जाती है। इन अभिभाषणों को देने के लिए दो प्रकार के व्यक्तियों को आमंत्रित किया जाता है। अनेक निर्दिष्ट अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के उच्च पदस्थ अधिकारीगण जैसे यूरोपीय कम्यूनिटी के मुख्य श्री डोलोरस, जर्मनी के विदेशमंत्री, वर्ल्ड बैंक के प्रमुख इत्यादि। उनके अलावा सी.एफ.आई.ओ संकाय के रूप में काम करने वाले लगभग 10 वरीय अध्यापकों के साथ लंच और डिनर के समय एकत्रित होने पर बातचीत की जा सकती है। इन लंच अथवा डिनरों में भाग लेने वाले अधिकारी और संबंधित अध्यापकगण अपने घर अथवा फेकेल्टी क्लब में लंच/डिनर का आयोजन करते थे। इसी तरह सोलह अभिभाषण, जो बाहर से आमंत्रित किए गए व्यक्तियों द्वारा दिए जाते हैं, उनका आयोजन लंच और डिनर के साथ किया जाता है। अभिभाषण का परिवेश औपचारिक अथवा अनौपचारिक दोनों प्रकार का होता है। जैसे इसमें होती थी फ़ेलो स्टूडेंट्स की नाश्ते के दौरान बातचीत, जिनमें वे अपने-अपने देश के किसी विशिष्ट विषय पर प्रकाश डालते हैं।

एक साल के अंदर अनेक टूरों की व्यवस्था थी। पहले-पहल, अमेरिका के सक्रेटरी ऑफ स्टेट की तरफ से पन्द्रह दिनों के लिए अमेरिका भ्रमण, जिसमें स्टेट डिपार्टमेंट के वरीय अधिकारियों से मुलाकातें पेंटागन, उसके रिसर्च एंड डेवलपमेंट तथा अमेरिका के प्रमुख विश्वविद्यालयों तथा सांस्कृतिक केन्द्रों के दर्शन करना शामिल है। दूसरा, एक सप्ताह के लिए यूरोपीय कम्यूनिटी के आमंत्रण पर उसके मुख्यालय ब्रूसेल्स एवं ईसी (EC) के पार्लियामेंट के लिए रखा जाता है। तीसरा, कनाड़ा सरकार के आमंत्रण-क्रम में पन्द्रह दिनों के लिए उनके छह प्रमुख नगरों क्यूबेक, माट्रियम, राजधानी-ओटावा, टोरंटो, कालगारी, वाकूंबर इत्यादि के परिदर्शन तथा चर्चा सत्र की व्यवस्था की जाती है, चौथा उस वर्ष के कोर्स के शेष भाग में चीन, जापान और कोरिया सरकार के निमंत्रण पर उन सारे देशों में तीन सप्ताह भ्रमण तथा प्रत्यक्ष ज्ञान अर्जन की सुविधा भी उपलब्ध की जाती है।

इस कोर्स के लिए भारत सरकार आई.ए.एस और आई.एफ.एस अधिकारियों को एक-एक साल के अंतराल में भेजती है। अर्थात् मुझसे एक वर्ष पूर्व एक आइ.एफ.एस अधिकारी गए थे, मेरे बाद (1988-89) में भी एक आई.एफ.एस गए होंगे और उसके बाद (1989-90) में फिर एक आई.ए.एस अधिकारी का चयन किया होगा। पहले साल के दो सर्विस में इस फेलोशिप में भाग लेने वाले विश्ष्ट नामों को मैंने देख लिया था। कोर्स में भाग लेने वाले हम सभी को विश्वविद्यालय की अधिसूचना द्वारा ऐसोसिएट प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया गया था। कोर्स पूरा होने पर कोई डिग्री या डिप्लोमा नहीं दिया जाता था। केवल विश्वविद्यालय में उस वर्ष के फेलो होने का एक सर्टिफिकेट एक विशेष समारोह में दिया जाता था। यह फेलोशिप आजीवन के लिए होती है और कोई भी फेलो अधिक शोध अथवा अध्ययन के लिए किसी भी समय हार्वर्ड आ सकता है। ऐसोसिएट प्रोफेसर के हिसाब से विश्वविद्यालय में फेकल्टी क्लब की सदस्यता मिलती है, जहां सभी प्रोफेसरों को चाय, कॉफी तथा आपस में बातचीत करने का अवसर मिलता है। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित होने वाले थिएटर, कन्सर्ट, कला-प्रदर्शनी, विशेष-संभाषण, (इस प्रकार की व्यवस्था सारे साल हार्वर्ड में चलती रहती है), इन सभी में उपस्थित होने के लिए स्वतंत्र भाव से निमंत्रण पत्र मिलता है। इसी तरह उत्सवों के लिए भी एक विश्षिट स्थान होता है, जैसे थिएटर और कन्सर्ट के लिए साइंस थिएटर, कला प्रदर्शनी के लिए कारपेंटर सेंटर फॉर विजुअल आर्टस और फाग्ग आर्ट्स म्यूजियम, नाटक के लिए लोएब ड्रामा सेंटर, कविता पाठ और बाहर से आमंत्रित अन्य लेखकों (जैसे औपन्यासिक चिनुआ आचिवि, ओले स्त्रोयिंका, ओक्टावियो, पाज, डेरेक वालकट इत्यादि) को सुनने का अवसर सेंडर्स थिएटर हॉल अथवा लेमोंट लाइब्रेरी में प्राप्त होता है।

हार्वर्ड जाने से पूर्व मैंने पुराने फेलो से इस कोर्स के विषय पर बातचीत की थी, तभी से मेरे मन में एक विशद धारणा पैदा हो गई थी, आइ.ए.एस, श्री पी.एस.अप्पू तथा आई.एफ.एस, श्री ए.पी. वेंकटेश्वरन दोनों ने कहा था कि एक साल के अंदर चारों तरफ से इतनी ज्यादा ज्ञान-गरिमा, संस्कृति इस तरह पड़ी मिलेगी कि सारी चीजें ग्रहण करना मुश्किल हो जाएगा। मगर सीखने की दिशा सुदूर प्रसारी एवं व्यापक है। इसलिए हमेशा अपनी आंखें, कान और मन को खुला रखने की आवश्यकता है। साहित्य, कला, दर्शन अपने-अपने पाठ्यक्रम, शोध के विषय तथा लाइब्रेरी में पढ़ाई करना इत्यादि की वजह से यह फेलोशिप शायद सबसे ज्यादा आकर्षणीय है। उन्होंने कहा था कि इस फेलोशिप के लिए सर्वप्रथम विश्वविद्यालयों के बहुविध अनुष्ठानों से परिचित होना जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा था अर्थशास्त्री मित्र एवं हार्वर्ड विश्वविद्यालय के नामी प्रोफेसर स्टीफेन मार्गलिन को मिलने से पहले उनकी पत्नी से मिले थे।

ऐसे परिचित वातावरण में मैंने सबसे पहले विश्वविद्यालय की बहुत बड़ी लाइब्रेरी के सिस्टम को जानने की चेष्टा की थी। दूसरे पर्याय में विश्वविद्यालय के म्यूजियम को घूमकर देखना. विश्वविद्यालय का मोटो या आदर्श था - “व्यक्ति के व्यक्तित्व की अभिवृद्धि के साथ ज्ञान के उपयोग हेतु सभी प्रकार के अवसर प्रदान करना”।

हार्वर्ड के अध्यक्ष डेरेक क्यटिस वोक (जिन्हें हार्वर्ड के सबसे विख्यात अध्यक्ष के रूप में जाना जाता है) के शब्दों में

“ In serving Harvard we serve an institution with a remarkable capacity for human betterment, an institution that works continuously to discover the knowledge to illumine social problems, to prepare talented people for constructive lives ,to provide memorable experience to thousands of its students , to enlarge our comprehension of ourselves and our environment through writings and discoveries of lasting importance, and all in these ways, to set demanding standards of intellectual attainment that can help and inspire universities throughout the nation and abroad.”

उसके बाद हार्वर्ड के म्यूजियमों, अन्य सांस्कृतिक अनुष्ठानों, विविध विभागों तथा पाठ्यक्रमों इत्यादि के संबंध में कुछ चर्चा। साल के अंत में मुझे यह आभास हुआ कि एक साल में मैंने बहुत कुछ सीखा है, बहुत कुछ पढ़ा है, संगीत-आर्केस्ट्रा का रसास्वादन किया है, थिएटर, फिल्म, चित्रकला प्रदर्शनी आदि देखी है, बहुत विद्वान, कवि लेखक और अमूल्य साथियों के संपर्क में आया हूं, जिनकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती है। ये सारी चीजें जीवन भर मेरे ज्ञान भंडार में विशिष्ट अनुभूतियों का अंग बनकर रहेगी।

अर्थनीतिज्ञ, कवि, लेखकों के साथ की गई मुलाकातें, विभिन्न अमेरिकन विश्वविद्यालयों में उद्बोधन तथा काव्य-पाठ की यादें, अनेक देश तथा शहरों में घूमने आदि जैसे अनुभवों की बातें चर्चा के विषय हैं। पहले पहल सारे मित्रों और शुभेच्छुओं के अनुरूप हार्वर्ड के तरह-तरह अर्वाचीन अनुष्ठानों तथा उनके इतिहासों की जानकारी की बातें, उससे भी बढ़कर हार्वर्ड का परिवेश, शहर तथा मेट्रोपालिटन बोस्टन शहर की कहानियां चर्चित हैं।

2. केंब्रिज शहर और हार्वर्ड : इतिहास एवं वर्तमान

सन् 1631 में आधुनिक केम्ब्रिज की स्थापना बोस्टन के तटीय इलाके में हुई। जगह अच्छी थी और अनेक शहर उपकंठ की तरह पहले उसका नाम था न्यूटाऊन। मैसेच्यूट के एक सर्वोच्च अधिकारी थे ग्रेट एंड जनरल कोर्ट नामक एक संस्था के। सात साल पश्चात अर्थात् सन् 1638 में उन्होंने रेमरेण्ड थॉमस सेपार्ड के पारिस अथवा धार्मिक स्थल में दो वर्ष पहले 1636 में प्रतिष्ठित की गई कॉलेज को अच्छी तरह से स्थापित तथा संचालित करने का निर्णय लिया।

न्यूटाऊन नाम बदलकर रख दिया गया केम्ब्रिज, इंगलैंड के इस प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के नाम के अनुरूप मैसेच्यूट के अधिकांश नैतिकतावादी गवर्नर धर्म शिक्षा के लिए आते थे। मगर कॉलेज का नाम दे दिया गया हार्वर्ड । यह सम्मान उस व्यक्ति के नाम को दिया गया, जिसने अपने मरने के समय जायदाद का आधा हिस्सा और पूरी लाइब्रेरी कॉलेज के नाम कर दी। वे थे चार्ल्सटाऊन के कम उम्र के प्यूरिटान मंत्री जान हार्वर्ड । धीरे-धीरे केम्ब्रिज में अनेक शिल्प-संस्थान विकसित हुए। मगर हार्वर्ड और एम.आई.टी विश्वविद्यालय केम्ब्रिज शहर के प्राण-बिन्दु बन गए।

इस प्रकार प्लाईमाउथ में पिलग्रीम फादर इंग्लैंड से आने के पन्द्रह वर्ष बाद मैसेच्यूट उपसागर की बस्ती में हार्वर्ड कॉलेज की स्थापना हुई। सन् 1636 के अक्टूबर 28 तारीख को मैसेच्यूट प्रशासन कॉलेज को चार सौ पाऊंड देने के लिए राजी हो गया। अनुदान देने का मुख्य उद्देश्य यही था कि वह एक अच्छे स्कूल अथवा कॉलेज ( schoale or colledge उस समय अंग्रेजी में ऐसा लिखा जाता था) के निर्माण में सहायक सिद्ध होगा। यह धनराशि सन 1987-88 में हार्वर्ड में रहते समय मुझे बहुत हास्यास्पद लगी। मगर हार्वर्ड के इतिहास में दिखाया गया है कि मैसेच्यूट प्रशासन के तत्कालीन वार्षिक आय का वह चौथा भाग था। उसके बाद शरद ऋतु में कॉलेज के लिए पहले बोर्ड ऑफ ओवरसियर्स की नियुक्ति की गई तथा उनकी सहायता करने के लिए छह मजिस्ट्रेट तथा छह पादरियों की नियुक्ति हुई। सन 1638 की ग्रीष्म ऋतु में कॉलेज का पहला बैच बारह छात्रों को लेकर आरंभ हुआ। उस समय एक मास्टर जी छात्रों की देख-रेख करते थे। एक बहुत छोटे से घर में कॉलेज चलता था। जिस हार्वर्ड यार्ड में घूमना मुझे इतना अच्छा लग रहा था, उस समय वह कॉलेज यार्ड हुआ करता था। उसके चारों तरफ स्थानीय लोगों की गुहालें या गौशालाएं हुआ करती थी।

कॉलेज का नाम हार्वर्ड पडने के कुछ दिन तक कॉलेज पहले की तरह चला। पहले कहा जा चुका है कि चार्ल्स टाऊन में इस वंदनीय व्यक्ति ने अपने मृत्युकाल के समय अपनी सारी किताबें और जमीन-जायदाद का आधा हिस्सा कॉलेज को दान किया था। बहुत अच्छे ढंग से कॉलेज चलने लगा। सन् 1640 में मैसेच्युट विश्वविद्यालय कोर्ट ने कॉलेज के प्रथम अध्यक्ष के हेनेरी डनस्टर को नियुक्त किया। डनस्टर थे एक किसान के बेटे। वह नौजवान स्पष्टवादी थे तथा इंगलैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से स्नातक थे। उन्होंने अंग्रेजी मेडल में कॉलेज कोर्स का खूब गंभीर नाम रखा था द लिबरल आर्ट, द लर्नेड टंग्स एंड द थ्री फेलोसफीज। उसके बाद उन्होंने छात्रों के लिए आवास और कक्षाएं खोलीं । डनस्टर की धारणा थी कि एक अच्छे कॉलेज के लिए संपूर्ण आवासीय होना बहुत जरूरी है, जहाँ छात्र एक साथ में रहेंगे तथा एक दूसरे के संपर्क में आएंगे। हार्वर्ड कॉलेज में प्रथम कमेन्समेंट उत्सव (डिग्री प्रदान करने का) सन् 1642 में आयोजित किया गया, जिसमें नौ छात्रों को स्नातक डिग्री प्रदान की गई। इस समावर्तन समारोह में ग्रीक और लैटिन भाषा का इस्तेमाल किया गया। उस समारोह में 50 लोगों के रात्रि-भोज की व्यवस्था भी की गई। हार्वर्ड यार्ड में मैं कई बार पैदल घुमा हूं अथवा बैंच पर बैठकर जॉन हार्वर्ड की मूर्ति को निहारता रहा हूं। उस शीतल छाया के तले छुपा हुआ है तीन सौ साल का लंबा इतिहास, उस समय का प्रथम ग्रेजुएट बेच, मैसेच्यूट प्रशासन, जॉन हार्वर्ड , लुप्त हुए छोटे-छोटे घर, छात्रावास, चारों ओर का ग्राम्य-जीवन और गौशालाएं। ये सारे दृश्य आंखों के सामने उभर आते हैं। उसी रास्ते सन् 1987-88 (अर्थात् मेरे रहते समय) में असंख्य छात्र-छात्राएं अपने-अपने आवास स्थल से भिन्न-भिन्न लाइब्रेरियों, फेकेल्टी कक्षाओं या हार्वर्ड स्कवेयर में बने कॉफी सेंटर (जहां पैंतीस प्रकार की कॉफी मिलती है) अथवा सर्वाधिक पसंद चाइनीज या मेक्सिकॉन रेस्टोरेंट को खाना खाने जाते। बहुत प्राचीन किताबों की दुकान पर, जहां खूब सारी नई किताबें, मैग्जीन तथा बहुत पुरानी किताबें मिलती थी। फिर कई लोग जाते हार्वर्ड कॉपरेटिव स्टोर की तरफ, जहां सामान्य दर पर सारी चीजें (नित्य व्यवहार में आने वाली वस्तुएं जैसे हार्वर्ड विश्वविद्यालय की टाई, विशेष पोशाकें, समावर्तन समारोह के ड्रेस) बिकती थीं। यह विश्वविद्यालय द्वारा संचालित होता था। अनेक छात्र-छात्राएं रास्ते के किनारे पेड़ों की छांव में बैठकर किताबें अथवा पत्रिकाएं पढ़ते थे। हार्वर्ड यार्ड के एक तरफ रास्ते के किनारे छोटी-छोटी अनेक डोरमेटरी, दूसरी तरफ एक दूसरे के पीछे अनेक संकाय, जिसकी पहली पंक्ति में सुप्रसिद्ध हार्वर्ड चर्च और जॉन हार्वर्ड की सुंदर प्रतिमूर्ति, हार्वर्ड विश्वविद्यालय की लाइब्रेरियां, थोड़ा पीछे जाने से दायीं तरफ हेरी वाइडनर मेमोरियल लाइब्रेरी। यह हार्वर्ड विश्वविद्यालय के लाइब्रेरियों का प्राण-बिंदु है। जब टाइटेनिक जहाज समुद्र में डूबा, उसके मरने वालों में से अन्यतम हार्वर्ड विश्वविद्यालय के युवा छात्र का यह नाम था। वह थे अपनी वृद्धा माँ का एक मात्र पुत्र, जिनके पास बहुत सारी जमीन-जायदाद थी। बहुत सालों से एक पुरानी लाइब्रेरी थी। संपूर्ण लाइब्रेरी, अपना जीवन चलाने के लिए कुछ संपत्ति को छोड़कर सारा धन उसने दान कर दिया था, केवल एक शर्त पर कि उस लाइब्रेरी का नाम उसके बेटे के नाम पर रखा जाए। और वैसा ही हुआ। हमारे जगन्नाथ मंदिर की बाईस सीढ़ियों से भी ज्यादा, सीढ़ियों के बाद सीढ़ियां चढ़ते जाने के बाद रिसेप्शन काउन्टर आता है, जहां आठ-दस लोग रहते हैं पुस्तकें देने और लेने के लिए, जहां पर रखे हुए हैं बहुत सारे वर्णमालाओं में लेखकों तथा विषय-वस्तु से संबंधित केटालॉग। यह है धरती के सबसे बड़े विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी तथा अगर यू एस. लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस को छोड़ दें तो यह दुनिया की सबसे बड़ी लाइब्रेरी है। उस समय पुस्तकों की संख्या थी अड़तीस लाख तथा उसके अनुरूप बहुभाषी पत्रिकाओं का भी समावेश था।

अनेक विशिष्ट विभागों के अनुसार ये सारी पुस्तकें दस मंजिले स्टॉक में सजाई हुई थी तथा एक सुरंग द्वारा लामेंट तथा प्रूसे दोनों लाइब्रेरियों से जोड़ी गई थी जहां वाइड़न के अंश-विशेष रखे हुए थे। वाइड़न लाइब्रेरी के साहित्य और इतिहास विभाग की संपदा अतुलनीय तथा दुनिया की किसी भी लाइब्रेरी में नहीं मिलने वाली पुस्तकें यहां मिल जाती हैं । इसके अतिरिक्त हिब्रू और जुडाइक भाषा की किताबें, मध्य-प्राच्य और स्लोविक पूर्व यूरोपीय किताबों का सबसे ज्यादा व्यवहार होता है। यह लाइब्रेरी विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्र, दर्शन तथा राजनीति-विज्ञान के शोध-कार्य का केन्द्र-स्थली है।

अगर सच कहूं तो जब मैंने पहली बार उस लाइब्रेरी में प्रवेश किया तो मैं खुद चकित रह गया और इस आश्चर्यजनक संस्था को देखने में मन ही मन एक अद्भूत आनंद भी आया। मेरे लिए यह एक विशेष सौभाग्य था कि इससे पहले मुझे इंग्लैंड के सर्वप्राचीन और दुनिया की आधुनिकतम सुप्रसिद्ध केम्ब्रिज विश्वविद्यालय में एक साल पढ़ने का अवसर मिला था और उसकी लाइब्रेरी से पढ़ने के लिए पुस्तकें आने और लौटाने में विशेष आनंद का भी अनुभव किया था। वह लाइब्रेरी विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी की तुलना में बहुत बड़ी है, मगर वाइड़न लाइब्रेरी उससे भी ज्यादा बड़ी है, इस बात का मुझे दिल से अहसास हो गया था।

इस लाइब्रेरी की दूसरी खास बात है- संस्कृत पुस्तकें तथा पांडुलिपियों का होना। भारत पुरातत्ववेत्ता और संस्कृत अध्यापक विजेल धीरे-धीरे मेरे अंतरंग मित्र बन गए। वे डिपार्टमेंट ऑफ इंडियन स्टडीज के विभागाध्यक्ष थे।उनके मतानुसार हार्वर्ड में संस्कृत पुस्तकें दुनिया का अन्यतम सबसे बड़ा भंडार है।उनके इस मत को गुरुत्व न देने का मेरे पास कोई कारण नहीं था। उन्होंने पहले ही कहा था जर्मनी के ट्यूबंगेन विश्वविद्यालय के इंडोलोजी विभाग की संस्कृत पुस्तकों का उपयोग विश्व के अन्यतम समाहार में आता है। एक बार मुझे ट्यूबंगेन के संकलनों को देखने का मौका मिला था। मैंने वहां के अध्यापक हेनेरी स्टेटनक्रान के साथ कुछ दिन उस विश्वविद्यालय में बिताए थे, इसलिए अध्यापक विजेल का मत पूर्णतया प्रासंगिक था, इस बात का मुझे अहसास हुआ। हार्वर्ड में मेरे एक साल रहने के भीतर संस्कृत एस्थेटिक्स की प्रमुख पुस्तक आनंदवर्धन की “ध्वन्यालोक” और उसकी समीक्षा पर आधारित पुस्तक “लोचन” का अंग्रेजी में अनुवाद हो रहा था। जिसमें भारतीय संस्कृत विद्वान मुख्य रूप से भाग ले रहे थे। विजेल बीच-बीच में अपने सुझाव अनुवाद कार्य के लिए दे रहे थे। उसके बाद दो अंग्रेजी पुस्तकें ‘द लाइट ऑफ सजेशन‘ तथा ‘द आ शीर्षक से प्रकाशित हुई। प्रकाशित होकर हार्वर्ड ओरिएन्टल सीरीज में जुड़ जाने पर अध्यापक विजेल की प्रसन्नता भरी चिट्ठी मिली। उन्होंने लिखा था कि हार्वर्ड शृंखला में यह अन्यतम अत्यंत मूल्यवान युगलबंदी पुस्तक बनकर मान्यता प्राप्त करेगी।

वाइडनेर के सिवाय हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अन्य लाइब्रेरियों के बारे में अगर कुछ न कहा जाए तो समीक्षा अपूर्ण रह जाएगी। उनके अंतर्गत एक खास हार्वर्ड कॉलेज लाइब्रेरी भी है। यह कला और विज्ञान संकाय की लाइब्रेरी है और उसके चौवालीस भाग है। अन्य संकायों की तरह लाइब्रेरी और खासकर शोधकार्य में लगे विद्वानों के लिए छत्तीस लाइब्रेरियाँ हैं। हार्वर्ड में भर्ती होते ही छात्रों को परिचय पत्र दिया जाता है, जो विश्वविद्यालय की मुख्य लाइब्रेरियों का उपयोग के लिए पर्याप्त है। हमारे कोर्स अर्थात् सेंटर फॉर इंटरनेशनल अफेयर के फेलो को एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में नियुक्त किया जाता है, जिसके लिए हमारे पास एक अलग से कार्ड होता है और किसी भी लाइब्रेरी से एक साथ तीस पुस्तकें ले जाने की सुविधा प्रदान की जाती है।

विश्वविद्यालय की तरफ से लाइब्रेरी विषय पर तथा उनके साधारण एवं शोध-कार्य के लिए दो पुस्तकें लाइब्रेरी के छात्रों को मिलती हैं। पहली- गाइड टू हार्वर्ड लाइब्रेरीज तथा दूसरी-रिसर्च सीरीज एट हार्वर्ड लाइब्रेरीज। कई लाइब्रेरी स्टॉफ सदस्यों के परिवार को भी कार्ड तथा पुस्तकें दी जाती है। हमारे कोर्स के सभी प्रत्याशियों को यह सुयोग मिलता है। हार्वर्ड की अन्यतम प्रमुख लाइब्रेरियों में एक हैं हाऊटन लाइब्रेरी, जिसमें पांच लाख है विरल पुस्तकें तथा पांडुलिपियों की संख्या चालीस लाख होगी । पूरे अमेरिका तथा विश्व की सबसे बड़ी पांडुलिपि लाइब्रेरी यह है। यहां मैंने देखे थे न्यू इंग्लैंड के लेखकों (एमसर्न, मेलविली, लंगफेलो, जेम्स इत्यादि) की पांडुलिपियों समेत अन्य यूरोपिय लेखकों की पांडुलिपियां। इसके अतिरिक्त सन 1501 से पहले प्रकाशित हुई पुस्तकों का भंडार। इन पुस्तकों को विश्वविद्यालय ने नाम दिया था इनकुनबाला।पहले ही कहा जा चुहा है कि वाइडन लाइब्रेरी के दो हिस्से हैं- लामेंट लाइब्रेरी और प्रूसे लाइब्रेरी। पहले भाग में आधुनिक कविताओं (अंग्रेजी और यूरोपीय लेटिन अमेरिका, अफ्रीका, चीन, भारत इत्यादि) का विशाल भंडार और हर महीने यहां कविता पाठ किया जाता है। मेरा यह सौभाग्य रहा है कि एक बार मैंने भी अपनी कविता (मूल ओड़िया समेत अँग्रेजी अनुवाद) यहां सुनाई थी। मेरे रहते समय यहां सिआमस हिनी, डोनाल्ड हॉल, राबर्ट ब्लाई, थॉमस ट्रांस ट्रोमर इत्यादि ने भी अपना कविता-पाठ किया था।

पूरे लाइब्रेरी में हार्वर्ड के तीन सौ से ज्यादा पुराने आर्चिव, मानचित्र, थिएटर, संगीत कलेक्शन सभी देखने को मिलते हैं। इन प्रमुख लाइब्रेरियों के अतिरिक्त अंडर ग्रेजुएट छात्रों के लिए और छ लाइब्रेरी हैं और आखिर पन्द्रह खास लाइब्रेरी (कानून, फाइन आर्टस, डिजायन, इंजिनियरिंग इत्यादि) तथा डिवनिटी स्कूल की लाइब्रेरी तथा वूमेन स्टडीज लाइब्रेरी भी है।

कभी-कभी मुझे लगता है, वास्तव में हार्वर्ड की लाइब्रोरियों में सारे विश्व का सबसे बड़ा ज्ञान का भंडार है। बच्चों, छात्रों, अध्यापकों, शोधार्थियों को इतनी पुस्तकों और पत्रिकाओं की सुविधाएं कहीं और मिलती हैं, मेरी नजर में नहीं आई। अंत में इंग्लैंड की केम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड दो प्रमुख लाइब्रेरियों तथा अमेरिका के हार्वर्ड के अलावा और चार प्रमुख विश्वविद्यालयों की लाइब्रेरियों (येल, स्टेनफोर्ड, एमआईटी और शिकागो) के संबंध में मेरे कुछ प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर मेरी यह धारणा बनी है।

विश्वविद्यालय के संग्रहालय

विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा म्यूजियम है ‘यूनिवर्सिटी म्यूजियम’। वास्तव में यह चार संग्रहालयों का समूह है। ‘बाटोनिकल म्यूजियम’ जिसमें अमेरिका के मुख्य खाद्य-पदार्थ वाले पेड़ (औषधि-पत्र और आदिवासी समाज के पेड़ों के साथ साथ पुराने और लुप्त होने वाले पेड़-पौधों का समूह) तथा आर्किड के हरबेरियम जिस पर शोध-कार्य चालू है, तीसरा, अलग-अलग श्रेणियों में बांटे गए सबसे बड़े पेड़ों की गवेषणा (केलोफोर्निया के असुरनुमा ऊंचे रेडवुड देखकर उनकी याद ताजा हो गई) और चौथा, पृथ्वी के सबसे बड़े प्लांट फॉसिल का संग्रह। इसके साथ-साथ है शोध-कार्य के लिए अमेरिका में पाए जाने वाले सभी प्रकार की लकड़ियों के नमूने और पृथ्वी के सबसे प्राचीन एल्जी हेल्जेलाइक वस्तुओं के जीवाश्म। उस संग्रहालय में मेरे लिए सबसे ज्यादा चित्ताकर्षक वस्तु थी- वेयर कलेक्शन ऑफ ग्लास मॉडल्स ऑफ प्लांटस, जिनका साधारण लोकप्रिय नाम है काँच के फूल। ये सारे खासकर 1887 सदी में हार्वर्ड के लिए जर्मनी में तैयार किए गए थे और उनको प्रस्तुत करने वाले तत्कालीन दो कलाकारों का नाम था लियोपाल्ड और रूडोल्फ व्लास्का।

उसके बाद खनिज पदार्थ का संग्रहालय, जो कि दुनिया का सबसे बड़ा एक आदर्श संग्रहालय जिसमें डेढ़ लाख नमूने संग्रहित और सुरक्षित रखे गए हैं। यहां पर सोने तथा यूरेनियम खनिज के बहुत सारे प्रकार दर्शाए गए हैं।

तीसरा है तुलनात्मक प्राणीविज्ञान का संग्रहालय, जिनमें असंख्य प्रदर्शित नमूनों के विशेष लक्षण, 1932 में आविष्कृत सी-सरपेन्ट , गोलापगोस द्वीप के विविध नमूने। मेरे लिए सबसे ज्यादा आकर्षणीय था लोलिता उपन्यास के रचयिता वाल्दमीर नबाकोव द्वारा अपने हाथ से पकडी हुई अलग-अलग तितलियों के जीवाश्म। शेष विषय पर मैं बाद में लिखूंगा। चौथे संग्रहालय का नाम ता पीबॉडी म्यूजियम ऑफ आर्यिओलॉजी एंड एथनोलॉजी। इसमें स्वाभाविक रूप से मेरी ज्यादा रूचि थी और वहां मैं कई बार गया था और उनके निर्देशक पुरातत्वविद श्रीमती मोनी एडाम्स मेरी व्यक्तिगत मित्र बन गई थी। इस संग्रहालय का ऑडिटोरियम बहुत बड़ा था, जिसमें खास-खास भाषणों का आयोजन भी किया जाता था। हार्वर्ड पुरातत्व विभाग और उनके प्रमुख डेविज मे-वरि लुइस की अध्यक्षता में मैंने भी अपना एक भाषण दिया था, जिसका उल्लेख मैं बाद में करूंगा । इस संग्रहालय में पांच विशिष्ट मंजिलें हैं। यह सन् 1866 में स्थापित विश्व का सबसे पुराना पुरातत्व संग्रहालय है।

यूनिवर्सिटी संग्रहालय के नीचे एक और बहुत बड़ा संग्रहालय है- विलियम हेयस फॉग आर्ट म्यूजियम। संक्षेप में फॉग आर्ट म्यूजियम। प्राचीन पाश्चात्य कला की उत्पत्ति, अलग-अलग समय के चित्र, स्थापत्य और भास्कर्य कला का उल्लेखनीय प्रदर्शन यहां किया गया है। जिन चीजों ने मुझे इस संग्रहालय में सबसे ज्यादा आकर्षित किया वे हैं चाइनीज ब्रान्ज और जेड़, ग्रीक फूल दान, जिसे मैंने एलेन्स के संग्रहालय में देखा था - रोमन कलाकृति फ्रेंच उन्नीसवीं शताब्दी और इम्प्रेसनिष्ट पेंटिग में। एक साथ एक ही विश्वविद्यालय के संग्रहालय में इतने प्रकार और इतने ज्यादा सामान को संग्रहित कर प्रदर्शनी के रूप में काम में लाया जा सकता है, इस बात का मुझे आश्चर्य हुआ था। मन में तुलना के लिए भुवनेश्वर के स्टेट म्यूजियम का ख्याल आया था।

एक और दर्शनीय महत्वपूर्ण जगह है कारपेन्टर सेंटर फॉर विजुअल आर्ट। फॉग संग्रहालय के पास ली कारबुजीअर द्वारा इसका निर्माण किया गया है। विश्वविद्यालय के डिपार्टमेंट ऑफ विजुअल एनवायरनमेंटल स्टडीज़ केंद्र-स्थल है। यहां आक्टोविओ पॉज के काव्य-पाठ की चर्चा बाद में करूंगा ।

यहां केम्ब्रिज शहर के सबसे बड़ी आधुनिक चित्रकला और स्थापत्य कला के नमूने प्रदर्शित किए गए हैं।

उसके बाद एक दर्शनीय संग्रहालय, जो मुझे बहुत अच्छा लगा, जिसका नाम था बुश्य-रिसिंग का संग्रहालय। जहां मुक्त होती है भास्कर्य चित्रकला, डेकोरेटिव आर्ट, जो आस्ट्रिया, जर्मनी, स्केंडनेविया, स्विटरजलैंड, नीदरलैंड और बेल्जियम की। यह संग्रहालय युक्तिसंगत तरीके से दावा करता है कि यह अमेरिका का इस विशिष्ट विषय का सर्वोत्कृष्ट संग्रहालय है।

फिर से मध्य-प्राचीन जमाने की बहुविध कलावस्तुओं को एकत्रित कर सेमेटिक संग्रहालय में खासकर 1889 से हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विद्वानों के विभागीय एक्सपीडीशन और उत्खनन से प्राप्त कर रखा गया है। मध्य-प्राचीन की इतनी ज्यादा कला वस्तुओं को मैंने येरुशलम के विश्वविद्यालय संग्रहालय और येरुशलम शहर के संग्रहालय में देखा था। न्यूयार्क के मेट्रोपोलिटियन म्यूजियम ऑफ आर्ट के अधिकारियों के मतानुसार यह एक अति मूल्यवान संग्रह तथा प्रदर्शनी योग्य है।

हार्वर्ड कलानुष्ठान के बारे में एक और बात लिखना जरूरी है। वह लोएब ड्रामा सेंटर। जिसमें दो स्टेज और एक ऑडिटोरियम हॉल है। एक फ्लेक्जिबल स्टेज के साथ 556 विशिष्ट सीटें, दूसरा छात्रों के परीक्षामूलक नाटक एकांकी इत्यादि के प्रदर्शन के लिए 100 विशेष सीटें बनी हुई हैं। यहीं से अमेरिकन रिपारेटॉरी कंपनी अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करती है, छात्र-छात्राओं को शिक्षा देती है, उनके सारे प्रोग्राम हार्वर्ड गजट, इंडिपेंडेंट क्रिमसन और आर्ट स्पैक्ट्रम में प्रकाशित होते हैं। बहुत अच्छे-अच्छे छात्र इन कार्यक्रमों में अपना नाम दर्ज कराते हैं। अपनी पढ़ाई के साथ साथ इस ज्ञान की निपुणता को भी प्राप्त करते हैं।

अलग-अलग भाषाओं की फिल्में देखने के लिए विश्वविद्यालय में बहुत अच्छी व्यवस्था है। जिसमें दुनिया के कई देशों की फिल्मों (विशेष रूप से हंगरी, जापान और स्वीडन के मिकलोस जानस्को, कुरोसावा और बर्गमान इत्यादि ) को देखने का निमंत्रण, लगभग सारे मैंने स्वीकार किए हैं। विश्वविद्यालय के विज्ञापन के अनुरूप ‘फॉर फॉरेन फिल्म और फिल्म क्लासिक एडिक्ट, या नथिंग शार्ट ऑफ पैराडाइज। सही मायने में फिल्में देखने का नशा मुझ पर सवार था और मैंने उन्हें देखकर स्वर्ग-तुल्य सुख पाया।

संगीत, आर्केस्ट्रा इन सब की व्यवस्था के लिए छात्रों द्वारा पांच-छह संस्थाएं चलाई जाती हैं। वे हैं- हार्वर्ड रेडक्लिफ आर्केस्ट्रा, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी बैंड, रेडक्लिफ कोराल सोसायटी, कोलेजियम म्यूजिअम और हार्वर्ड ग्ली क्लब। साल भर चल रहे इन सारे आयोजनों में किसी के लिए भी पूरी तरह योगदान देना संभव नहीं है। मैंने पहले अर्थात् आर्केस्ट्रा ग्रुप और यूनिवर्सिटी बेंड के सब मिलाकर चार-पांच प्रोग्राम एक साल के भीतर देखे होंगे। उनमें से तीन विश्वविद्यालय के बच्चों का और दो बाहर से आए हुए दलों का।

सांडर्स थिएटर यूनिवर्सिटी का केंद्र स्थल है और यहां सारे वर्ष विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित होने वाले खूब सारे आर्केस्ट्रा, संगीत-संध्या, भाषण इत्यादि में मैंने भाग लिया है। यहां मैंने राजीव गांधी का भाषण सुना था। इसी तरह अनेक दूसरे लोगों का। विश्वविद्यालय की ओर से यहां पिओडी-मेसन म्यूजिक फाउंडेशऩ औऱ केंब्रिज सोसाइटी फॉर अर्ली म्यूजिक ने कई बार उल्लेखनीय संध्याओं का आयोजन किया है।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में कई विख्यात वार्षिक लेक्चर सीरीज है एवं हार्वर्ड मैगज़ीन जैसी साहित्यिक पत्रिका है। उसके अतिरिक्त हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस और उनका प्रकाशन समूह भी है।

इन तीनों के विषय पर पृथक से कुछ लिखूंगा। मगर यहां यूनिवर्सिटी के इतिहास से और कुछ ।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने यूनिवर्सिटी के इतिहास की अनेक पुस्तकें प्रकाशित की हैं। उनमें से जो किताब मुझे सबसे ज्यादा मूल्यवान लगी, वह है सैमुअल इलियट मॉरिस कृत थ्री सेंचुरी ऑफ हार्वर्ड , हार्वर्ड इन सेवनटीन्थ सेंचुरी ( दो भाग) तथा तीसरी द डेवलमेंट ऑफ हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (1869-1929), इसके अतिरिक्त क्लिटन के॰ सिप्टन रचित न्यू इंग्लैंड लाइफ इन द एटीन्थ सेंचुरी

इन इतिहासों को पढने के बाद मुझे लगा कि हार्वर्ड के लंबे इतिहास में विश्वविद्यालय के पांच अध्यक्षों का कार्यकाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रहा है। सबसे पहले, हेनेरी डनस्टर, जिन्होंने सन 1640 में कार्यभार ग्रहण किया था- उनके कार्यकाल में कुछ कक्षाएं तथा छात्रावासों का निर्माण हुआ था। दूसरे ख्याति प्राप्त अध्यक्ष रहे हैं जान लेवरेट,जिन्होंने सन 1708 में कार्यभार ग्रहण किया था। चार्ल्स विलियम इलियट (1869 में अध्यक्ष बने थे) और लारेन्स लायल (1909 में पदभार ग्रहण किया था)। उन दोनों को हार्वर्ड के इतिहास में सबसे ज्यादा समर्थ, कर्मठ और दूरदर्शी कहकर सम्मानित किया जाता है, जिनके कार्यकाल में सभी तरफ से हार्वर्ड की उन्नति हुई और उसके नाम को विश्व के अन्यतम प्रसिद्ध विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता प्राप्त हुई। इलियट (इतिहासज्ञ मारीसन के शब्दों में) स्ट्रक्चरड़ द मॉडर्न यूनिवर्सिटी अर्थात् आधुनिक हार्वर्ड की रूपरेखा प्रदान की। पाठ्यक्रम, लाइब्रेरी, संकाय निर्माण, सबसे अच्छे-अच्छे छात्रों को एडमिशन देना- सभी तरफ से उन्हें नूतन हार्वर्ड के निर्माता के रूप में जाना जाता है। उनके समकक्ष और एक थे लारेन्स लोयल (1909), जिन्होंने अपने चौबीस साल के कार्यकाल के भीतर सौ मिलियन डॉलर का एण्डावमेंट तैयार किया। हार्वर्ड के 273 वर्ष के इतिहास में जितने भवन निर्माण हुए थे, उनके मात्र 24 साल के कार्यक्रम में उनसे ज्यादा निर्माण कार्य हुआ। वर्तमान अध्यक्ष डेरेक कुर्टिस वाक (1971 से, केलिफोर्निया के पश्चिमी तट के रहने वाले, स्टेनफॉर्ड विश्वविद्यालय के स्नातक, हार्वर्ड लॉ स्कूल से 1954 में स्नातक) के समय में हार्वर्ड वास्तव में विश्व का प्रमुख शिक्षा केन्द्र बन गया। अपनी दूरदर्शिता से विश्व के सारे कुलपतियों के साथ अच्छे संबंध बनाकर उन्होंने हार्वर्ड में गैर-अमेरिकन छात्रों की संख्या को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाया है। सन 1988 में सारे छात्रों की संख्या का यह एक तृतीयांश हुआ, जो दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय में संभव नहीं हुआ था। साल की शुरुआत हम सभी फेलों से वे एक छोटे से रिसेप्शन में मिले थे। तब व्यक्तिगत रूप से हमारा परिचय हुआ था। एक बार फिर मिलेंगे, कहकर उन्होंने अपनी खुशी जाहिर की थी। दूसरा, उनके समय में हार्वर्ड में मल्टी डिसप्लिनरी रिसर्च सेंटर के कार्य में काफी अभिवृद्धि हुई थी। केवल एमआईटी, येल या स्टेनफॉर्ड ही नहीं, विश्व के दूसरे अनेक विश्वविद्यालयों के साथ परिवेश, जनसंख्या नियंत्रण, एड्स रिसर्च, हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के साथ आई॰आई॰एम, अहमदाबाद इत्यादि के साथ अनेक स्तर के कालोबरेटिव रिसर्च प्रोग्रामों को हार्वर्ड ने हाथ में लिया। परिमार्जित रुचि, ज्ञानी तथा खुले विचारों वाले मनुष्य वाली दृढ़ धारणा उनके प्रति प्रथम साक्षात्कार में बन गई थी।

हार्वर्ड में नौ संकाय हैं और प्रत्येक में एक एक डीन है। डिग्री प्रोग्राम और रिसर्च के 12 स्कूलों और कॉलेजो का संचालन होता है जिनमें प्रमुख हार्वर्ड कॉलेज तथा रेडक्लीफ़ कॉलेज सबसे पुराने हैं। ये दोनों विश्वविद्यालय शुरु से हैं। स्कूल का अर्थ हमारी स्कूलों की तरह नहीं है। प्रमुख स्कूले हैं- हार्वर्ड बिजनेस स्कूल, लॉ स्कूल, मेडिकल स्कूल, डिविनिटी स्कूल, केनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट एवं एक और स्कूल जिसका नाम है- सेंटर फॉर इंटरनेशनल अफेयर (सीआईएफ़ए)। इनमें से सबसे पुराना मेडिकल स्कूल (1780) है, उसके बाद डिविनिटी स्कूल (1811) तथा लॉ स्कूल (1817) है।

मैसेच्युसेट प्रशासन के ग्रांट से विश्वविद्यालय पहली बार शुरु हुआ था। पहला ग्रांट कितना कम मिला था, पहले लिखा जा चुका है। धीरे-धीरे विश्वविद्यालय आत्मनिर्भर होने लगे-एण्डावमेंट, प्राइवेट ग्रांट तथा भीतरी आय के द्वारा। इसलिए दोनों पक्षों (विश्वविद्यालय प्रशासन और मैसेच्युसेट प्रशासन) ने सन 1833 में आम सहमति द्वारा यह तय किया कि और विश्वविद्यालय को किसी भी प्रकार के ग्रांट की कोई आवश्यकता नहीं है, तब से बोर्ड ऑफ ओवरसीअर्स (विश्वविद्यालय प्रशासन), जो मैसेच्यूसेट प्रशासन द्वारा मनोनीत किया जा रहा था, वह कर दिया गया। हार्वर्ड डिग्रीधारियों ने इस हेतु चुनाव करना प्रारंभ किया अर्थात् सन् 1833 से (150 वर्ष पूर्व) हार्वर्ड आर्थिक तौर पर स्वावलंबी हो चुका था तथा वहां स्वायत्त शासन प्रारंभ हो गया था। मुझे ऐसा लगता है, सारे विश्व को, खासकर हमारे देश तथा ओड़िशा के लिए इससे कुछ सबक सीखने चाहिए।

विश्वविद्यालय के स्वाबलंबी होने तथा स्वायत्त शासन चलाने, दोनों एक दूसरे के संपूरक हैं, कहने का कोई अर्थ नहीं होगा। यहां एक छोटा-सा उदाहरण देना उचित समझता हूँ। मेरे अपार्टमेंट से थोड़ी दूरी पर कानकोर्ड ऐवन्यू में विश्वविद्यालय पुलिस का तीन मंजिला विशिष्ट मुख्यालय है। उनकी पोशाकें स्वतंत्र हैं। पुलिस अधिकारियों के भीतर हार्वर्ड डिग्रीधारी चालीस लोग हैं। विश्वविद्यालय के आंतरिक शांति, सुरक्षा और पुलिस संस्था का सारा खर्च विश्वविद्यालय उठाता है। उसके बाहर स्थानीय मेसेच्यूसेट खर्च करता है। मगर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के आर्थिक समृद्धि का कारण बहुत सारे दानशील अनुष्ठान एवं व्यक्तियों के अर्थ उपहार (गिफ्ट) है। भूतपूर्व छात्रों, शोधार्थियों तथा अध्यापकों द्वारा ऐसे उपहार दिए जाते हैं, अनेकों फाउंडेशन खोली जाती हैं और बहुत सारा मूलधन विश्वविद्यालय के उस फंड में जमा करते हैं जिसके ब्याज से निर्दिष्ट शोधकार्य, वृत्ति अथवा अन्य योजनाएं हाथ में ली जा सकती हैं। संक्षेप में सिविल सोसायटी के अवदान विश्वविद्यालय की समृद्धि का सबसे बड़ कारण है। हार्वर्ड की तरह अन्य विख्यात विश्वविद्यालयों (येल, एम.आई.टी, स्टेनफोर्ड, कर्कली, चिकागो, कर्णेल) में ऐसे ही अवदान मिलते हैं। मगर हार्वर्ड के ऐतिहासिक गुणात्मक उत्कर्ष के कारण सबसे ज्यादा धन मिलता है। अभी-अभी की बात है कॉरपोरेशन के मुख्य ने 115 अयुत डॉलर दान देने की प्रतिश्रुति दी थी। यह था विश्वविद्यालय के इतिहास में सबसे बड़ा दान। मगर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष लारेन्स समर के इस्तीफा देने के कारण वे देने अथवा न देने के बारे में फिर एक बार सोच रहे हैं। लोरेंस समर उनका व्यक्तिगत दोस्त हैं और उनका इस्तीफा देने के कारण उन्होंने कहा था “there are fewer women than men in science because of intrinsic attitude ”

विश्वविद्यालय का प्रमुख अध्यक्ष होता है। अध्यक्ष की सहायता करने के लिए उनकी अध्यक्षता में काऊंसिल ऑफ डींस बनाई जाती है जिसमें सभी फ़ैकल्टियों के डीन तथा रेडक्लिफ का अध्यक्ष सदस्य होता है। सभी प्रमुख स्कूलो के संचालन हेतु एक उच्चस्तरीय विजिटिंग कमेटी होती है सी.आई.एफ.ए के लिए जिस प्रकार से सदस्यों की समिति हैं और निर्देशक हैं सेमुअल हरिटन(संक्षेप में साम- हम सभी उन्हें इसी नाम से बुलाए, ऐसा उन्होंने अनुरोध किया है) तब तक उनकी बहुचर्चित पुस्तक द क्लास ऑफ सिविलाइजेशन नहीं लिखी गई थी। मगर उन्होंने जितने भी उदबोधन दिए या सेमिनार या बाहर प्रमुख वक्ता के रूप में सभापतित्व ग्रहण किया था, उनके भाषण में उनके ज्ञान, विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण की प्रशंसा करने के साथ-साथ मैंने उनके विरोधाभासी व्यक्तित्व की आलोचना भी की थी। निश्चित तौर पर उन्होंने इस बात पर ध्यान दिया था, नहीं तो मुझे नहीं कहते, “ एस॰के॰ इज माय वेटेरन क्रिटिक ”। अपनी आलोचना का भी वे स्वागत करते थे। स्पर्शकातर बिलकुल नहीं थे। सी.आई.एफ.ए की विजिटिंग कमेटी में बहुत उच्च स्तरीय कारपोरेट चीफ सदस्य हैं तथा चैयरमेन हैं जाने-माने विज्ञान हेनेरी स्लेशींजर (सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के उपदेष्टा)। सदस्यों के भीतर प्रमुख फ्रेंक बाओस, स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ऑफ इंटरनेशनल रिलेशन्स, ग्राहम स्टूअर्ट, सुप्रसिद्ध वाशिंगटन पोस्ट अखबार के अध्यक्ष कैथेरिन ग्राहम, आई.बी.एम के सेवानिवृत वरिष्ठ उपाध्यक्ष डीन फाईपर्स, टोयाटो मोटर कंपनी के अध्यक्ष सोइचिरा टोयाडा, मोबिल ऑयल कंपनी के कानून विशेषज्ञ, केन्या में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रदूत गेरालन थॉमसए, अपोलो टेक्नोलॉजी के अध्यक्ष इरा लूकिन, आर्थ ईस्टर्न विश्वविद्यालय के बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन के प्रोफेसर चार्ल्स वेकर, अमेरिका के डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट, ड्रेफस कारपोरेशन के सलाहकार वारेन मानसेल एवं ओईसीडी (ओर्गनाइजेशन फॉर यूरोपियन को-आपरेशन एंड डेवलपमेंट के पूर्व अमेरिकन राष्ट्रदूत हर्बट सालजमान। मोटा-मोटी विजिटिंग कमेटी बहु उच्चस्तरीय व्यक्तियों द्वारा गठित की जाती है। सभी को एक साथ मैं कभी नहीं मिला। बीच-बीच में उनमें से कईयों ने हमें रात्रि-भोज पर जरूर बुलाया है। अनेक संदर्भित विषयों, आर्थिक-नीति, राजनीति, शिक्षा और विश्वविद्यालय के विषय में चर्चा की है।

3. हार्वर्ड के चारों तरफ ऐतिहासिक बोस्टन नगरी

अगर बोस्टन नगर समझ में नहीं आया तो कैम्ब्रिज नगर समझ में नहीं आएगा और अगर कैम्ब्रिज नगर समझ में नहीं आया तो हार्वर्ड विश्वविद्यालय को बिल्कुल नहीं समझ पाओगे। यह एक पुराने जमाने से चली आ रही धारणा है। अमेरिका के शहरों में बोस्टन की एक स्वतंत्र सत्ता है, जो उसे शिकागो, न्यूयार्क, लॉसएंजिलस अथवा सेनफ्रेंसिस्को से पूरी तरह अलग कर देता है। इस स्वतंत्र सत्ता के संबंध में बहुत बार समीक्षा की गई है।

जिस समय बोस्टन ने अपने जीवन के दो सौ साल (1976) पूरे किये, उस समय अनेक पुस्तकें तथा समीक्षाएँ प्रकाशित हुई थीं ।

मुझे ऐसा लगता है, ये स्वतंत्र सत्ता दो वस्तुओं में निहित है। पहले बोस्टन नाम का उच्चारण करने से ही मन में आएगा कि लोगों की यह धारणा सही है कि यह शहर दूसरे शहरों की तरह नहीं है। एक असाधारण, अद्भूत जन-समागम वाला शहर है। दूसरा कारण आधुनिक अमेरिका का उदय बोस्टन से हुआ। सैम एडमस के बिना क्रांति संभव नहीं थी,जिस प्रकार स्वतंत्रता की घोषणा भी जॉन एडमस के बिना संभव नहीं थी। बोस्टन एक वैसा शहर है, जहाँ जगह व्यक्ति और संस्कृति में बदल जाती है।

केवल युद्ध नहीं, स्वाधीनता का आह्वान नहीं, पिलग्रीम फादर के चाय के बस्तों को समुद्र में फेंकना भी नहीं। बोस्टन टी पार्टी तो सहज में इतिहास का एक बड़ा अध्याय है। स्वाधीनता संग्राम के सूक्ष्म स्वर, जो धीरे-धीरे कॉनकॉर्ड में रण- दुंदुभि में बदल गई थी। बहुत सारे बगीचों में, विभिन्न शैलियों में तरह-तरह के लोगों ने अपना योगदान दिया है बोस्टन के निर्माण में, जो कि अमेरिका की सभ्यता की हृदय-स्थली है। बोस्टन चर्च से चानिंग, पार्क के॰ बिच और गेरिसन के दृढ़ संकल्प की घोषणा के बाद दास-प्रथा का उन्मूलन हुआ।उन्होंने दृढ़ भाव से दृप्त स्वर से चर्च का घोषणानामा जारी किया क्योंकि यह प्रथा क्रिश्चियन धर्म के विरुद्ध थी। अंकल टाम्स केबि के लेखक हारिएट विचर स्तोए से मिलकर लिंकन ने कहा था कि तुम वही छोटी औरत हो, जिसने इतने बड़े युद्ध को आरंभ किया है ? जब-जब मैं बोस्टन शहर में घूमता हूँ, अकेले या यूनिवर्सिटी के दोस्तों के साथ, यह इतिहास मेरे मन में उभर कर सामने आता है।

बोस्टन का नाम मन में आते ही याद आने लगते हैं अमेरिका के सारे राष्ट्राध्यक्ष जॉन आडामस, जॉन क्विन्सि आडामस, जॉन फिंजगोराल्ड केनेडी और उनके समकक्ष तथा अमेरिका के जनजीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालने वाले अधिकारी बेन फ्रेंकलिन, डान वेबस्टर, आलिवर वेंडल होमस, मैसेच्यूट राज्य, कॉनकॉर्ड तथा बोस्टन आदि । अमेरिका के सर्वश्रेष्ठ दार्शनिक रोल्फ वाल्डो एमर्सन, सर्वश्रेष्ठ मुक्तिचिंतक हेनेरी डेविड थोरो और प्रथम महत्वपूर्ण उपान्यसकार नाथानिएल हथर्ण। इन तीनों ने अपना समय काटा है कॉनकॉर्ड, बोस्टन में तथा समाधि प्राप्त किए हैं कॉनकॉर्ड में।

और चित्रकार जैसे गिल्बर्ट स्टुआर्ट, सिंग्लटन लोप्ले, सिंगर सर्वेंट इत्यादि। इतिहासकार फ्रासिस पार्कमान, हिकलिंग प्रेस्कट और लोथप मोरले की नजरो में बोस्टन एक कविता है। दूसरी तरफ कवि लंगफेलो, व्हिटिअर, लोएल और वेंडल होम्स ने इसका इतिहास लिखा है।यहां कविता, चित्रकला, और इतिहास सभी मिलकर एकाकार हुआ है। मन से बोस्टन की उन महान नारियों को भी याद करना होगा जैसे लुइसा आलकट, रोज फिंजगोराल्ड, केनेडी, मेरी बेकर जिन्होंने क्रिश्चियन साइंस सेटर की स्थापना की।

बोस्टन था नए इंग्लैंड का प्राण-केन्द्र। जिन लोगों ने विद्रोह करके प्लीमथ में आकर शरण ली थी, वे पिलग्रीम फादर खासकर उच्च शिक्षित लोग थे। बोस्टन में रहते समय मजाक-मजाक में उन्हें बोस्टन का ब्राह्मण कहा जाता था। विशेषकर दो उपनाम हुआ करते थे लोवल और काबोट। बोस्टन का मुख्य भोजन था बिन्स एवं कड़ मछह लियां। उससे एक लोकोक्ति बनी-

“ In this land of bean and cod, the Lowells speaks only to Cabot and the Cabots speaks only to God.” उस समय बोस्टन की जो भाषा थी,आज भी वैसी ही है। अग्रेजी, पायरिश और यांकी का अद्भूत सम्मिश्रण।

बोस्टन की धार्मिक आस्थाएं क्या थीं ? पहले जितने भी परिवार यहां आए तथा न्यू इंग्लैंड और बोस्टन को बसाया, उनका धर्म था Episcopalian,जिसके बारे में एर्मसन कहते हैं – The best diagonal line that could be drawn between the life of Jesus Christ and that of Boston Merchant. यह द्वैतभाव बोस्टन शहर के गिरजाघरों, बहुत ऊंचे हैंकॉक टावर, प्रूडेंसियल बिल्डिंग और मार्केट कांप्लेक्स में सहजता से देखा जा सकता है।

बोस्टन शहर में मेरी एक प्रिय जगह थी ट्रिनिटी चर्च। शहर के केन्द्र में कोप्ले स्केवयर में स्थित यह चर्च दुनिया का सबसे सुंदर स्थान है, जिसकी स्थापत्य तथा भास्कर्य कला बहुत प्रसिद्ध व चर्चित है। वाशिंगट के केथेड्रल चर्च ऑफ सैंट पीटर एवं सैंट पॉल, संक्षेप में नेशनल केथेड्रल के साथ इसकी तुलना की जाती है। मैंने देखे, रोम में वेटिकन सिटी का सुंदर एवं विशाल सेंट पिटर्स चर्च, लंदन का सैंटपाल, इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के किंग्स कॉलेज के अपेक्षाकृत छोटा केथेड्रल तथा जर्मनी के कोलोन शहर का चर्च - ये चारों मेरी दृष्टि में बहुत ही सुंदर तथा स्थापत्य-भास्कर्य दृष्टिकोण से आकर्षक, काँच पर बाइबिल के चित्रों का सुंदर अंकन। उन सभी के साथ मैं बोस्टन के ट्रिनिटी को भी जोड़ता हूं। मुझे उसकी भवन-निर्माण तथा स्थापत्य-कला बहुत ही अच्छी लगी। जब भी मैं अमेरिका और हार्वर्ड आता हूं (एक साल रहने के बाद और तीन बार आया हूँ), तब मैं बोस्टन जरूर जाता हूँ ट्रिनिटी से मिलने। बोस्टन अमेरिकन रोमन कैथोलिक से भरा हुआ है। कम से कम एक हजार लोग संडे को यहां आते हैं। कभी-कभी बहुत दूर के न्यू हैम्पसायर और केपकड के पेरिस से भी। सुना था, पहले ज्यादातर वयस्क, विधवाएं और बूढ़े लोग आते थे। मगर अभी सपरिवार बहुत लोग आते हैं। ट्रिनिटी के चर्च स्कूल में पहले बहुत कम बच्चे पढ़ते थे,मगर अभी दो सौ से ज्यादा। ट्रिनिटी के कम्यूनिटी चर्च में अनेक प्रोग्राम होते हैं। वाशिंगटन के केथेड्रल में प्रतिदिन छह ह सर्विस और रविवार को सात होती थी।इसके अतिरिक्त बहुत सारे कन्सर्ट, विशेष अनुष्ठान एवं इवेंट का आयोजन होता रहता है।

बोस्टन शहर के डाऊन-टाऊन अर्थात् व्यापारिक केन्द्र और जनाकीर्ण अंचल से होते हुए हाइवे गया है लोगान अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डे तक। पोताश्रय टनल से होते हुए यात्रीलोग एयरपोर्ट तक पहुंचते हैं। शहर की हृदय-स्थली के भीतर से जाने वाले इस द्रुतगामी ट्रेफिक भरे रास्ते ने शहरवासियों को परेशान कर दिया था। सौन्दर्य की दृष्टि से भी यह बहुत गंदा दिखता था। हाइवे के दोनों किनारों पर ऊंची दीवार उठाना भी संभव नहीं था। काफी सोच-विचार करने के बाद मैसेच्यूसेट की राज्य सरकार तथा फेडेरल सरकार ने शहर के भीतर से जाने तथा एयरपोर्ट को जोड़ने के लिए एक लंबी प्रशस्त योजना बनाई थी। सन 1984 में यह योजना पारित हुई। योजना थी शहर के अंदर से हाइवे हटा देने के बाद बहुत सारी जगह पार्क बनाने के लिए मिल जाएंगी तथा शहर के सौंदर्य में अभिवृद्धि होगी। हाइवे उठ जाने पर शहर का इटालियन अध्युषित उत्तरांचल तथा पोताश्रय के किनारों का सुंदर water front अंचल शहर के दक्षिण अंचल से अलग नहीं रहेगा और सारा शहर सही मायने में एक शहर की तरह दिखेगा। हाइवे के कारण वास्तव में ऐतिहासिक बोस्टन, जिन दो भागों में बंटा हुआ दिख रहा है, पूरी तरह से बदलकर एक हो जाएगा।

व्यक्तिगत रूप से बोस्टन के साथ अच्छी तरह परिचित होने के कारण शहर की अलग-अलग जगहों तथा खासकर इटली के उत्तरांचल में ज्यादा घुमने की वजह से मुझे यह योजना बहुत अच्छी लगी। इसके अतिरिक्त, लोगान अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पहुंचने वाले पोताश्रय टनल वाले रास्ते में हमेशा ट्रेफिक जाम रहता था।यहां से मैं स्वयं जाता हूं सीआईएफ़ए के प्रोग्राम में अमेरिका, कनाड़ा, यूरोपियन कम्यूनिटी, फिर भाषण देने शिकागो, केलिफोर्निया, बर्मिंहम, मेरे परिवार पत्नी और बच्चों समेत मांट्रियल। पहले रास्तों की कमी की जानकारी होने के कारण बहुत लंबी-चौड़ी टनल जो बोस्टन शहर और पोताश्रय के 110 फुट नीचे से जाएगी, यह मेरे लिए खुशी की खबर थी। तीन बिलियन डॉलर वाली पांच साल में खत्म होने वाली योजना थी। सन 1988 में मेरा कैम्ब्रिज छोड़ते समय काम आरंभ हो रहा था। बेटी के पास वांशिंगटन में रहकर यह लिखते समय मैंने अखबार में पढ़ा था कि वह परियोजना एक साल के अंतर्गत समाप्त हो जाएगी। खर्च बढ़कर पन्द्रह बिलियन डॉलर तक पहुंच गया था। तब मैंने सोचा कि केवल हमारे देश में ही प्रोजेक्ट देरी से पूरे नहीं होते हैं। योजना कमीशन तथा योजना कार्यान्वयन मंत्रालय में काम करने की वजह हमारे कई प्रोजेक्टों के कार्यान्वयन में विलंब तथा उससे बढ़े खर्च की समस्या से मैं अच्छी तरह परिचित था। मैंने देखा, अमेरिका में भी इस समस्या का कोई समाधान नहीं है।भले ही, उनके प्रयास अधिक तथ्यमूलक, आंतरिक तथा हमेशा मार्जित होते हैं।

हार्वर्ड में रहते समय मैं केवल लोगान एयरपोर्ट से आना-जाना या बोस्टन में इटालियन अध्युषित उत्तरांचल ही नहीं, वरन शहर के पार्क, प्राचीन कोठे और घर (लुइसा आलकट, अनेक प्रेसीडेंटों के, लेखकों और कलाकारों के) तथा बोस्टन टी पार्टी के स्थानों पर अनेक बार घूमा हूं। बोस्टन विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग में कई बार गया हूं। बोस्टन शहर के रहने वाले हमारे कोर्स के उद्योगपति फेलो जूलिएन सोबिन के साथ उनके घर गया हूँ। हमेशा याद रहेगा कि हार्वर्ड से विदा लेने से पहले जूलिएन ने सभी फेलो को अपने घर पर डिनर के लिए आमंत्रित किया था तथा चीनी कलाकारों के नृत्य-संगीत का प्रोग्राम भी रखा था। उनके अपने घर में एक बहुत बड़ा हॉल था, जिसमें वह अपने उद्योगपति दोस्तों तथा अर्थशास्त्र के विशारदों को पार्टी देते हैं । “हम” अर्थात् सारे फेलो वहां उपस्थित थे, मेरे जैसे कई फेलो बिना पत्नी के वहां अकेले आए थे।

(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

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 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनमोल विचार अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी 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कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बालगीत बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार 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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3789,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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रचनाकार: स्मृतियों में हार्वर्ड - भाग 1 // सीताकान्त महापात्र // अनुवाद - दिनेश कुमार माली
स्मृतियों में हार्वर्ड - भाग 1 // सीताकान्त महापात्र // अनुवाद - दिनेश कुमार माली
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