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बाल कवितायेँ // इन्द्रधनुषी संसार // शालिनी मुखरैया

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(01)

चाँद और कान्हा

हठ कर बैठा चाँद देख कर

कान्हा अपनी माँ से

ला दो मुझ को ऐसा ही इक चाँद आसमान से

बोला अपनी माँ से

बहुत दूर बाद्लोँ के पार

है यह चाँद आसमान मेँ

कोई न पहुँचा इस जग मेँ

लाने चाँद को इस धरती पे

खाना पीना छोडा कान्हा ने

बात न माँ की मानी

बहुत मनाया माँ ने उसको

फिर भी जिद उसने ठानी

रूठा देख कान्हा को

माँ ने इक युक्ति अपनायी

इक बरतन मेँ पानी भर कर

बाहर छ्त पर वो लायी

देख कर छवि चाँद की पानी मेँ

कान्हा ने छोडी जिद अपनी

खूब खेला वह चाँद से

माँ की चिंता अब दूर हुई

दूर बैठा यह सब देख चाँद मन्द मन्द मुस्काये

नन्हा कान्हा खिलखिल हँसे

माँ मन ही मन मेँ हर्षाये

(2)

हाथी दादा

हाथी दादा पड़े बीमार

चढा उन्हेँ है तेज़ बुखार

जाओ भईया जल्दी जाओ

कोई डाक्टर को बुलवाओ

डाक्टर जिराफ आये घर मेँ

आई जान मेँ जान सब के दिल मेँ

इक बड़ा इंजेक्शन लगाया

फिर सफाई का पाठ पढाया

हमेशा हाथ धो कर खाना खाओ

घर मेँ गन्द्गी नहीँ फैलाओ

जो अगर ध्यान रखोगे खान पान का

नहीँ नाम होगा घर मेँ बीमारी का

ये सब बातेँ हाथी दादा की समझ मेँ आईँ

फिर बीमारी न कभी लौट के आई


(3) पेड़

आओ मिल कर पेड़ लगायेँ

हरा भरा इस जग को बनायेँ

पेड़ हमको ऑक्सीजन देते हैँ

बद्ले मेँ कार्बन डाई ऑक्साइड लेते हैँ

दूर कर गन्द्गी हवा की

शुद्ध हवा हमेँ वो देते हैँ

हमारी हर ज़रूरत को पूरा करते

फल, सब्जी, दवाइयाँ भी हम को देते हैँ

धरती को ये बाँध कर रखते

बाढ़ से ये हमको हैँ बचाते

हमारा जीवन है निर्भर उन पर

पेड़ न होँगे अगर धरती पर

जी न पायेँगे हम पल भर

इसलिये तुम मत काटो पेड़

आओ मिल कर पेड़ लगायेँ

हरा भरा इस जग को बनायेँ


(4) बेटियाँ

बेटी है घर की रौनक

बेटी है घर की किस्मत

जिस घर मेँ होती हैँ बेटीयिँ

वह घर है खुदा की जन्नत

माँ बाप का अभिमान है बेटी

हर घर की शान है बेटी

मत कुचलो उसके जीवन को

दो कुलोँ की शान है बेटी

जिस घर मेँ खिलखिलाती हैँ बेटियाँ

उस घर मेँ सदा मुस्कुराती हैँ खुशियाँ

बेरौनक होते हैँ वे घर

जिस घर मेँ नहीँ होती हैँ बेटीयाँ

माँ – बाप की चिंता करतीँ

हर रिश्ते का मान वे रख्रतीँ

जो तुम नष्ट कर दोगे उन का जीवन

तो तुम भी कैसे पाओगे अपना जीवन

गर न होँगी बेटियाँ इस जग मेँ

तो पुत्र कहाँ से पाओगे

उनके घर संसार बसाने को

फिर बहू कहाँ से लाओगे

उनको खिलने दो ,महकने दो

विधाता की अनमोल रचना का

नव संसार को उन्हेँ रचने दो


(05) सूरज चाचा

सूरज चाचा ,सूरज चाचा

इतना क्योँ गुस्सा करते हो

किससे तुम नाराज़ हो इतना

क्योँ इतनी आग उगलते हो

तुम्हारे गुस्से से काँपते हैँ

सभी पशु , पक्षी और नर

इस गरमी से कैसे बचेँ

कोई उपाय नहीँ आये नज़र

हाय गरमी ,हाय गरमी सब पुकारेँ

फिर भी रहम नहीँ तुम खाते हो

थोड़ा गुस्सा तुम कम करो

क्योँ सब को इतना सताते हो

तुम भी चन्दा मामा की तरह

थोडे शीतल हो जाओ

****************


शालिनी मुखरैया

पंजाब नेशनल बैंक

विशेष सहायक शाखा मेडिकल रोड

अलीगढ़

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