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स्मृतियों में हार्वर्ड - भाग 3 // सीताकान्त महापात्र // अनुवाद - दिनेश कुमार माली

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भाग 1   भाग 2 7. विश्वविद्यालय की वार्षिक व्याख्यान-माला हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अनेक वार्षिक व्याख्यान मालाएं आयोजित की जाती हैं। उनमें ...

भाग 1  भाग 2

7. विश्वविद्यालय की वार्षिक व्याख्यान-माला

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अनेक वार्षिक व्याख्यान मालाएं आयोजित की जाती हैं। उनमें सबसे महत्वपूर्ण चार्ल्स नॉर्टन व्याख्यान माला है, जिसका नाम Norton Professorship of Poetry है, परंतु कविता की परिभाषा इस परिप्रेक्ष्य में इतनी व्यापक है कि इसमें कला-संगीत भी शामिल है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में किसी प्रख्यात लेखक, कलाकार या संगीतकार द्वारा दिए गए व्याख्यानों को यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाता है। इसके अलावा,सुविधानुसार संपृक्त फ़ैकल्टी निर्धारित कार्यालय में बीच-बीच में आते हैं। उस समय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और शोधकर्ता उनसे पूर्व नियुक्ति लेकर मिलते हैं।

सन 1926 में विश्वविद्यालय ने चार्ल्स नॉर्टन पीठ आरंभ की है। इसका महत्व पूर्व महान लोगों के नाम से स्पष्ट होता है। उनमें टी॰एस॰ इलियट, रॉबर्ट फ्रॉस्ट, इगोर स्ट्रैविन्स्की (विश्व प्रसिद्ध संगीतकार), उपन्यासकार थोरटन वाइल्डर, संगीत समीक्षक एरॉन कॉपलैंड, कवि ई॰ई॰ कमिंग्स, आलोचक लियोनेल ट्रिलिंग, कवि ओक्टेविओ पाज़, संगीतकार लियोनार्ड बर्नस्टेन, बेन साण, जॉर्ज लुई बोर्के (अर्जेंटीना के कवि और लेखक), पॉल हिंडेमिथ, नॉर्थोफ़ फ्राय और बकिंनिस्टर फुलर आदि शामिल हैं । मैंने सुना है कि इटालो कैल्विनो को सन 1985-86 में पीठ की नियुक्ति मिली थी, लेकिन व्याख्यान-माला शुरू होने से पहले उनका निधन हो गया था।

मेरे प्रवास के सन 1988 में नॉर्टन प्रोफेसर थे हेरोल्ड ब्लूम, प्रसिद्ध साहित्यिक आलोचक। उनकी व्याख्यान माला का सामान्य शीर्षक 'कविता और विश्वास' था, जिसमें उनके तीन व्याख्यान थे। पहला 'हिब्रू भाषा में बाइबिल' दूसरा 'होमर से लेकर दांते तक' और तीसरा 'शेक्सपियर' था। हार्वर्ड के चार्ल्स इलियट नॉर्टन प्रोफेसर के रूप में नियुक्त ब्लूम येल विश्वविद्यालय में मानविकी के स्टर्लिंग प्रोफेसर थे। वह येल से हार्वर्ड एक साल के लिए आए थे।

मैं ब्लूम के बारे में बहुत कुछ जानता था। मैंने उनकी रचनाओं को भी पढ़ा था। उन्होंने बहुत सारी पुस्तकें लिखी थीं । इसके अलावा, वह प्रख्यात संपादक और आलोचक भी थे। वह साहित्यिक आलोचना के चेल्सी हाऊस पुस्तकालय के महासचिव थे। इस माला में कई विशिष्ट खंड थे और बियोवुल्फ़ के समय से अंग्रेजी-अमेरिकी साहित्यिक आलोचकों के सारे विषयों पर प्रकाश डालना था।दूसरा, उन्होंने कई खंडों में आलोचनाओं के निर्दिष्ट संग्रह को संपादित कर उसका सामान्य परिचय लिखना था। तीसरा, वह आलोचनाओं की दो पुस्तकों के संपादक थे और उनकी भूमिका लिख रहे थे। इन पुस्तकों के शीर्षक 'मॉडर्न क्रिटिकल इंटरप्रिटेशन' (कुछ निर्दिष्ट पुस्तकों की आलोचनाएं) और 'क्रिटिकल कॉस्मॉस' (विविध समय और साहित्य के विभिन्न वर्गों का सामग्रिक दृष्टिकोण से तुलनात्मक अध्ययन)।

मैंने पहले कहा है कि ब्लूम ने तीन विषयों पर नॉर्टन व्याख्यान दिया था। उनमें हिब्रू बाइबिल पर उनका व्याख्यान मुझे सबसे ज्यादा अच्छा लगा। विशद व्याख्यान की पृष्ठभूमि में उनकी मुख्य अभिव्यक्ति यह थी कि वह बाइबल केवल ‘ऐतिहासिक समय का वर्णन’ नहीं है। इसमें हमारे समय का उपयोगी मानवीय दृष्टिकोण मिलता है। इस बात की पुष्टि करने की उनकी शैली आकर्षक और प्रभावी थी। उस नए दृष्टिकोण के संदर्भ में उनके व्याख्यान का सामान्य विषय यह था कि समस्त उच्च कोटि के साहित्य की रचना एक निर्दिष्ट कालखंड में हुई थी। फिर भी उनकी सार्वभौमिकता और सर्वकालीनता ने उन्हें अमर बना दिया। हर काल में मनुष्य ने उनके नए अर्थ खोजे। इस संबंध में, ब्लूम ने कहा, “Each generation searching for and finding in it new metaphor for living and dying.”

मैंने मिलने के लिए उनसे समय मांगा था। अपने आखिरी व्याख्यान के दो दिन बाद उन्होंने मुझे समय दिया। उनके साथ मेरे विचार-विमर्श और मेरे सवालों के उचित उत्तरों ने मुझे बहुत आनंद दिया। मैंने विशेषकर उनके द्वन्द्वात्मक और व्यक्तिगत दृष्टिकोण की सन 1973 में प्रकाशित पुस्तक 'द आंकजाइटी ऑफ इंफ्लूएन्स : ए थ्योरी ऑफ पोएट्री' में कविता में प्रतिपादित रचनात्मकता के स्रोत पर कुछ सवाल पूछे थे।

चार्ल्स इलियट नॉर्टन वार्षिक व्याख्यान माला के अतिरिक्त विश्वविद्यालय में अलग से हर साल छह ह अन्य व्याख्यान मालाओं का आयोजन करता था। वे निम्न थीं:-

(i) गडकीन व्याख्यान माला, जिसकी सन 1930 में एक एन्डोमेंट के आधार पर स्थापना की गई थी और इसका निर्दिष्ट शीर्षक 'स्वतंत्र सरकार की अनिवार्यता और नागरिकों के कर्तव्य था। केनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट अब इसे आयोजित करता है।

(ii) विलियम जेम्स व्याख्यान माला, जो दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान पर आधारित है।

(iii) इरास्मस व्याख्यान माला, जो नीदरलैंड की ‘सभ्यता’ पर आधारित है, जिसके लिए नीदरलैंड से अर्थशास्त्र, इतिहास, साहित्य और कला के विद्वानों को आमंत्रित किया जाता है।

(iv) एडवर्ड डनहम व्याख्यान माला,जो चिकित्सा-क्षेत्र के नए शोधों से संबंधित है और अन्य देशों से इस क्षेत्र के विशेषज्ञों को इस कार्यक्रम के तहत आमंत्रित किया जाता है।

(v) विलियम बेलडेन नोबेल व्याख्यान माला,जिसमें प्रख्यात धर्मविदों को अपने धार्मिक अनुभव के विशेष पहलू पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

(vi) केनेडी स्कूल ऑफ गवर्नमेंट की आर्को फोरम व्याख्यान माला,जिसमें उच्च स्तरीय राजनेताओं को व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता है।

नॉर्टन व्याख्यान माला के अलावा छह व्याख्यान मालाएं और बाहर के कई अन्य व्याख्यान मुझे आश्चर्यचकित कर रहे थे– इन सभी से,पत्र-पत्रिकाओं से, विविध प्रदर्शनियों आदि से कोई कितना ज्ञान ग्रहण कर सकता है? ज्ञान के भंडार हर तरफ उन्मुक्त उपलब्ध है! अपनी शक्ति सामर्थ्य और विभाग के हिसाब से यह सब चुनना पड़ता है। विश्वविद्यालय की प्रमुख साहित्यिक द्विमासिक पत्रिका 'हार्वर्ड मैगज़ीन' थी। इस पत्रिका में विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों और छात्रों की सृजनशील कविताएं, निबंध, कहानियां और शोध लेख प्रकाशित होते थे। सामान्यतः संपादक फ़ैकल्टी का कोई प्रोफेसर हुआ करते थे, तो कभी-कभी बाहर के प्रख्यात लेखक।मेरे प्रवास में प्रसिद्ध अमेरिकी कवि डोनाल्ड हॉल संपादक थे। इस पत्रिका के एक अंक में मेरी दो कविताएं प्रकाशित हुई थीं और दूसरे अंक में मेरा एक निबंध प्रकाशित हुआ था। उसके बाद संपादक से आत्मीयता बढ़ती गई। मैं कवि ए॰के॰रामानुज के साथ एक बार फ़ैकल्टी क्लब में उनसे और उनकी पत्नी से मिला था ( जिनका राज्य में बहुत नाम था और उनका कविता-संकलन ‘लेट इवनिंग कम' आलोचकों में चर्चा का विषय बना था)। मैं उन्हें बाद में उनके निवास पर भी मिला था। दोनों ‘अमेरिकी लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस’ के तत्वावधान में इंडिया इन्टरनेशनल सेंटर में आयोजित काव्य-पाठ में भाग लेने भारत आए थे। मुझे उस कार्यक्रम की अध्यक्षता करने का अनुरोध किया गया था। उनकी पत्नी जेन केन्यन ने ‘लेट इवनिंग कम' तथा डोनाल्ड ने अपना सर्वश्रेष्ठ कविता-संग्रह 'ओल्ड एंड न्यू पोएम्स' मुझे भेंट किया था। जिसमें डोनाल्ड ने लिखा था: ‘For SK, with pleasure; again drinking tea, again talking poetry, again in Delhi’ — Donald Hull, 4th September, 1993’.

इस संकलन में उनकी 1947 से 1990 की कविताएं संग्रहित हैं। ' किकिंग द लिव्ज़ '(1978) नामक कविता-संग्रह की बहुचर्चित मार्मिक शीर्षक कविता, जो उनकी पारिवारिक जीवन की स्मृतियाँ है, की कुछ पंक्तियाँ (लंबी होने पर भी) यहाँ उद्धृत करने का लोभ-संवरण नहीं कर पा रहा हूँ:-

1. I kick at the leaves, making a sound I remember as the leaves

swirl upward from my boot, and flutter, and I remember

***** ***

on a dirt road in New Hampshire; kicking the leaves,

autumn 1995 in Massachusetts, knowing

my father would die when the leaves were gone.

2. Kicking the leaves today, as we walk home together

from the game, among crowds of people.

with their bright pennants, as many and bright as leaves.

my daughter’s hair is the red-yellow colour

of birch leaves, and she is tall like a birch.

growing up, fifteen, growing older; and my son

flamboyant as maple, twenty.

3. This year the poems came back, when the leaves fell,

kicking the leaves, I heard the leaves tell stories,

remembering, and therefore looking ahead, and building

the house of dying, I locked up into the maples

and found them, the vowels of bright desire.

I thought they had gone for ever

while the bird sang I love you, I love you

and shook its black head.

4. Kicking the leaves, I uncover the lids of graves,

My grandfather died at seventy-seven, in March

When the sap was running; and I remember my father

twenty years ago,

Coughing himself to death at fifty-two in the house

in the suburbs, oh, how we flung

Leaves in the air! How they tumbled and fluttered around us,

like slowly cascading water, when we walked together.

उनकी एक अन्यतम कविता का शीर्षक है 'कविता'। इसमें कविता के प्रति उनका आभिमुख्य बहुत सुंदर ढंग से परिलक्षित हुआ है। मुझे यह कविता बहुत पसंद आई। उन्होंने एक बार हार्वर्ड फैकल्टी क्लब और दूसरी बार इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में इस कविता का पाठ किया था।पूछह ने पर उन्होंने बताया कि यह उनकी खास पसंदीदा कविता है। छोटी-सी इस कविता को नीचे दिया गया है:-

The Poem

It discovers by night

What the day hid from it.

Sometimes it turns itself

into an animal.

In summer it takes long walks

by itself where meadows

fold back from ditches.

Once it stood still

in a quite row of machines

Who knows

What it was thinking?

डोनाल्ड हॉल बारह वर्ष की आयु से कविता लिख रहे थे। 'ओल्ड एंड न्यू पोएम्स‘ संकलन में उनकी पुरानी और नई 179 चुनिंदा कविताएं हैं। सन 1989 में नेशनल बुक क्रिटिक्स अवार्ड प्राप्त उनकी लंबी कविता 'द वन डे' इसमें शामिल नहीं है । वह न्यू हैम्पशायर के ग्रामीण इलाके में रहते थे, जहां उनका परिवार सौ सालों से भी अधिक समय से रहता आ रहा था, वहाँ के भौगोलिक और सांस्कृतिक वातावरण पर स्व-चयनित कविता-संग्रह आधारित है। आलोचक इस संग्रह के बारे में लिखते हैं:-

‘a garland and a delight; as one of the foremost anthologies earthier and more passionate utterance.’

उनकी कवि-पत्नी जेन केन्योन की ‘लेट इवनिंग कम' के संकलन से पहले तीन अन्य कविता-संकलन प्रकाशित हुए थे। जिनके नाम हैं:- (i) The Boat of Quiet Hours, (ii) From Room to Room and (ii) Twenty poems for Anna Akhmatova.

ये जेन डोनाल्ड की छाया में पल्लवित हो रहे पौधें नहीं हैं । वे अपनी कविताओं के लिए अमेरिकी पाठकों और आलोचकों में बहुचर्चित एवं प्रशंसित हैं । उनके प्रथम कविता-संग्रह ‘लेट इवनिंग कम' की मुझे अच्छी लगने वाली दो कविताओं के कुछ अंश नीचे दिए गए हैं:-

1. Let the fox go back to its sandy den,

Let the wind die down, let the shed

go black inside. Let evening come,

…………………………………….

…………………………………....

Let it come, as it will, and don’t

be afraid, God does not leave us

Comfortless. So let evening come.

2. Through the screen door

I hear a hummingbird, inquiring

For nectar among the stalwart

…………………………………….

…………………………………....

The sky won’t darken in the West

Until then, Where shall I turn

This light and tired mind?

डोनाल्ड द्वारा संपादित 'हार्वर्ड मैगज़ीन' का एक नियमित हिस्सा ‘जॉन हार्वर्ड जर्नल' होती है,जिसमें विश्वविद्यालय के छात्रों के बारे में विभिन्न तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं। यह पत्रिका विश्वविद्यालय के संस्थापक जॉन हार्वर्ड के समय से चल रही है। एक समय टी॰एस॰इलियट इस पत्रिका के स्नातक उप-संपादक हुआ करते थे।

इस पत्रिका के अलावा अन्य छह ह नियमित पत्रिकाएं प्रकाशित होती थी। एक थी हार्वर्ड एडवोकेट और दूसरी हार्वर्ड लैंपून। पहली साहित्यिक पत्रिका है और दूसरी हास्य-पत्रिका है। दोनों छात्रों द्वारा

संपादित की जाती हैं। तीसरी साप्ताहिक पत्रिका 'हार्वर्ड इंडिपेंडेंट' है,जिसमें प्रकाशित समकालीन साहित्यिक आलोचना पाठकों द्वारा सराही जाती है। अन्य तीन हैं:-

1. 'हार्वर्ड यूनिवर्सिटी गैजेट' (साप्ताहिक पत्रिका),जिसमें संकायों की विभिन्न गतिविधियां, कार्यक्रम, विशेष व्याख्यान आदि प्रकाशित किए जाते हैं।

2. 'बैलून' (मासिक पत्रिका), जिसमें फ़ैकल्टी और स्टाफ सदस्यों के निबंध और समस्याओं की चर्चा होती है।

3. 'हार्वर्ड क्रिमसन' (छात्रों द्वारा प्रबंधित), जिसमें स्नातक और अधो-स्नातक छात्रों के निबंध और प्रमुख तथ्य प्रकाशित होते हैं।

मेरी जानकारी में इतनी सारी पत्र-पत्रिकाएं किसी अन्य विश्वविद्यालय से प्रकाशित नहीं होती हैं। सभी पत्रिकाओं की प्रतियां हार्वर्ड स्क्वायर की स्टाल में टाइम और न्यूजवीक के साथ उपलब्ध हैं।

इसके अलावा, साल में एक बार बसंत के समय राष्ट्रपति की रिपोर्ट और विभागों की रिपोर्ट (जिसे 'ग्रे बुक' कहा जाता है) विश्वविद्यालय प्रकाशनों द्वारा प्रकाशित की जाती है। सहयोगी प्रोफेसर के रूप में नियुक्त होने के कारण मुझे ये रिपोर्ट और सभी अन्य पत्रिकाएं डाक से मिलती थीं ।

इलियट शताब्दी और विश्वविद्यालय प्रेस

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (एचयूपी) अमेरिका का सबसे पुराना और सबसे बड़े प्रकाशन गृहों में से एक है। केवल शिकागो यूनिवर्सिटी प्रेस और येल यूनिवर्सिटी प्रेस अमेरिका में इसके साथ प्रतिस्पर्धा करती हैं। इंग्लैंड में इसके समानांतर दो प्रमुख विश्वविद्यालय प्रेस हैं, अर्थात् ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (ओयूपी) और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस (एचयूपी) एक साल में लगभग 200 सौ पुस्तकें प्रकाशित करता है। ये किताबें प्रमुख विद्वानों की रचनाएँ होती हैं। ऐसा अनुमान है कि इन पुस्तकों में से एक तिहाई विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों की रचनाएँ होती हैं और बाकी दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों की। नए प्रकाशनों की सूची हर साल शरद और बसंत सेमेस्टर में जारी की जाती है। प्रेस में संपादक सहित केवल सत्तर कर्मचारी हैं। एचयूपी के प्रकाशन बहु-मंजिला सुंदर इमारत से निकलते हैं। मुझे लगभग चार हजार प्रकाशित पुस्तकों पर नज़र डालने,पढ़ने और उनके पृष्ठों को पलटने में बहुत खुशी मिली थी। मैंने चार्ल्स नदी में नौकायन करते समय और कमर पर वॉकमेन टाँगकर नदी के तट पर जॉगिंग करते वक्त किताबें पढ़ते हुए बहुत सारे दोस्तों को देखा हैं।

टी.एस. इलियट की जन्म शताब्दी सन 1988 में विश्वविद्यालय में प्रवास के दौरान आई थी। उनका जन्म 26 सितंबर 1888 को सेंट लुइस में हुआ था। उन्होंने सन 1906 में हार्वर्ड में दाखिला लिया था और 1909 में स्नातक हो गए। वाल्टर लिपमान, स्टुअर्ट चेज़ और जॉन रीड उनके सहपाठी थे। मैंने पहले ही लिखा है कि इलियट 'हार्वर्ड एडवोकेट' के साहित्यिक पत्रिका के अधो-स्नातक संपादक थे। वे कई साहित्यिक संगठनों और हार्वर्ड के सामाजिक क्लबों के सदस्य थे।उन्होंने अपने दीक्षांत समारोह के लिए कविता ‘क्लास ओडे’ लिखी थी।

विश्वविद्यालय द्वारा शताब्दी उत्सव के उपलक्ष में कई गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा था। शताब्दी व्याख्यान हाउटन पुस्तकालय में आयोजित किए गए थे और वहाँ इलियट की कविताओं और निबंधों की पांडुलिपि की प्रदर्शनी लगाई गई थी। उन्हें देखने में मुझे खूब आनंद आया था। मैंने व्याख्यान-माला में से पांच व्याख्यान सुनने की योजना बनाई थी। उनमें से एक व्याख्यान था आयरिश कवि सिआमस हिनि का, जो विश्वविद्यालय में Visiting Boylston Professor of Rhetoric and Oratory के रूप में एक वर्ष के लिए आए थे। उनके व्याख्यान का शीर्षक 'लर्निंग फ्रॉम इलियट' था। मैं किसी दूसरे अध्याय में हिनि के साथ मेरी दोस्ती के बारे में लिखूंगा। सिआमस को उस समय तक नोबेल पुरस्कार नहीं मिला था। उनके व्याख्यान का आभिमुख्य था:- समकालीन आलोचनाओं में इलियट विरोधी स्वर होने के बावजूद आधुनिक कवि-कविता इलियट की इतनी ऋणी क्यों है ? और प्रत्येक कवि को उनसे क्या सीखना चाहिए? दूसरे चार व्याख्यान थे: हेलेन वेंडरर (हार्वर्ड विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के मुख्य आलोचक) 'द वैस्टलैंड', डेविड प्रस्किन का 'इलियट्स क्रिटिकल प्रोज़’, डब्ल्यू.जे.बेट्स का ‘फोर क्वार्ट्स' और विलियम अल्फ्रेड का ‘ऐश-वेडनेस डे’। हॉल हमेशा खचाखच भरा रहता था। हॉल के बाहर बैठे श्रोताओं के लिए माइक लगाए जाते थे। प्रत्येक व्याख्यान के बाद खूब जीवंत और द्वन्द्वात्मक आलोचना होती थी। व्याख्यानों को मैंने अपनी डायरी में 'इंटेलेक्ट्चुयल फीस्ट’ के रूप में उल्लेख किया है। प्रत्येक व्याख्यान के बाद रिसेप्शन आयोजित हुआ करता था।

इस संबंध में मुझे याद आता है कि हार्वर्ड और मैसाचुसेट्स के अटलांटिक महासागर के चट्टानी उपकूलों ने इलियट की कविताओं को किस हद तक प्रभावित किया है, खासकर समुद्र से संबंधित 'मरीना', 'फोर क्वार्टेट्स' और ऐसी ही कुछ अन्य कविताएं।उनकी डायरी की पांडुलिपि हमें बताती है कि चट्टानी तट और उनके मुहानों से टकराती लहरों से वह बहुत प्रभावित थे। शायद उन्हें समुद्र की आवाज़ में सुनाई पड़ रही थी ‘mermaids singing each to each’

इलियट सन 1914 में इंग्लैंड में रहने लगे और उन्होंने सन 1927 में ब्रिटिश नागरिकता ग्रहण कर ली। सन 1932 में चार्ल्स इलियट नॉर्टन प्रोफेसर ऑफ पोएट्री के रूप में एक वर्ष के लिए वे फिर से हार्वर्ड आए थे। विश्वविद्यालय प्रति वर्ष व्याख्यान-माला की पुस्तक प्रकाशित करता है। उनके व्याख्यान 1934 में ‘आफ्टर स्ट्रेंज गॉड’ शीर्षक से प्रकाशित हुए थे। सन 1950 में फिर से हार्वर्ड आए थे, थियेटर से संबंधित थियोडोर स्पॉन्सर स्मारकी व्याख्यान माला का उद्घाटन करने के लिए। मैंने देखा, अंग्रेजी और अमेरिकी साहित्य विभाग दोनों उन पर गर्व अनुभव करते हैं। वे अंग्रेजी काव्य-जगत के प्रमुख प्रवर्तक थे। उन्होंने कविता में एक नए युग की शुरुआत की। जिसका समकालीन कवियों, आलोचकों और विद्वानों पर गहरा प्रभाव पड़ा। दोनों साहित्यिक विभागों द्वारा उनके शताब्दी-समारोह के अनुपालन के अवसर पर मैंने लोगों में बहुत उत्साह देखा।

8. पुनश्च ओक्टेविओ, पुनश्च कविता और वास्तुकला की जुगलबंदी

मुझे ऑक्टेविओ का मैक्सिको सिटी के उनके पते से लिखा गया पत्र मिला कि यूनिवर्सिटी के कार्पेंटर सेंटर ऑफ विजुअल आर्ट्स में उनका कविता-पाठ होगा। इस बार उनका कविता-पाठ अलग शैली में होने की उम्मीद थी।कुल बीस कविताएं पढ़ी जाने वाली थीं। उनकी पृष्ठभूमि में दस कविताएं थीं और बाकी दस अलग-अलग लोग पढ़ेंगे। ये बीस कविताएं ओक्टेवियो और मैक्सिको के प्रसिद्ध आधुनिक चित्रकार और वास्तुकार ब्रायन निसेन दोनों ने चुनी थी। प्रत्येक कविता के लिए निसेन एक या एक से अधिक पेंटिंग दर्शक-श्रोताओं के सामने प्रस्तुत करते थे, जिन्हें उनके सामने रखा गया था।

कविता पाठ के लिए मुझे विशेष निमंत्रण प्राप्त हुआ था। थोड़ा जल्दी आकर मैंने निसेन को अपना परिचय दिया। ऑक्टेविओ ने स्वयं अपना परिचय दिया। वे उसी सुबह न्यूयॉर्क से आए थे। न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट (एमओएमए) में आयोजित 'मैक्सिकन कला के 2000 साल' प्रदर्शनी के लिए कैटलॉग तैयार करने की उनकी जिम्मेदारी थी। इस काम के संबंध में उन्हें अचानक न्यूयॉर्क जाना पड़ा। इसलिए उनसे मैक्सिको सिटी में मुलाक़ात नहीं हो पाई। मैक्सिको सिटी में जब मैं होटल पहुंचा तो उनका संक्षिप्त पत्र मेरा इंतजार कर रहा था।

कविता-पाठ अच्छी तरह से सम्पन्न हुआ। मैंने दर्शकों में सीमस हिनि, यूनानी कवि स्ट्रैटीस हविआरास (वे लैमोंट लाइब्रेरी में कविता पाठ के संयोजक थे), डोनाल्ड हल और उनकी पत्नी जेन केन्यॉन आदि को देखा। निसेन अत्यंत समझदारी से ओक्टेवियो की कविताओं की आत्माओं को दृश्य-काव्य में रूपायित कर प्रस्तुत कर रहे थे, अगर उन्हें कोई प्रत्यक्ष नहीं देखेगा तो विश्वास नहीं कर पाएगा। मुझे पहली बार ओक्टेविओ के अपनी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद सुनने का अवसर मिला था। उनकी आवाज़ गंभीर और नियंत्रित थी। प्रत्येक शब्द के उच्चारण काव्य-विभा का स्वरूप बदल रहा था और ब्रायन निसेन का दृश्यकाव्य काव्य-रूप में और जान फूँक रहा था।

इस बेहद मनोरंजक कार्यक्रम के अंत में फैकल्टी क्लब में हमें ओक्टेविओ और निसेन के साथ डिनर पर आमंत्रित किया गया था। अगले दिन ओक्टेवियो न्यूयॉर्क चले गए।

बाद में मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट (एमओएमए) में हुए 'मैक्सिकन कला का 2000 साल' प्रदर्शनी के उद्घाटन में मुझे ओक्टेविओ द्वारा तैयार, संपादित विशाल सूची को देखने का अवसर मिला था, जिसमें मैक्सिको के सामग्रिक कला-इतिहास और परिवेषण की उल्लेखनीय शैली के बारे में उनका प्रभूत ज्ञान परिलक्षित हो रहा था। लेकिन उन्होंने मुझे यह कहते हुए एक पत्र लिखा था, 'अब तक सबसे बड़ी सूची तैयार करने की बदनामी मुझे मिली है।'

ओक्टेविओ के साथ मेरा संबंध बहुत पुराना था। छह ठे दशक में जब वह भारत में मेक्सिको के राजदूत थे, उस समय से। तकक्षी शिवशंकर पिल्ले को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिलने के समारोह (सन 1985) में वे मुख्य अतिथि थे । उस समय मैं ज्ञानपीठ पुरस्कार की चयन समिति का एक अन्यतम सदस्य था। उनका परिचय देते समय उनकी कविता 'शिव-पार्वती' के अंग्रेजी और हिंदी अनुवाद पढे गए थे। बाद में उन्होंने कहा कि वह अपनी कविता से बहुत खुश हैं। इसलिए नहीं कि कविता भारत में उनके प्रवास के दौरान लिखी गई थी,बल्कि यह उनकी पसंदीदा कविताओं में से एक थी। कविता इस प्रकार है:-

“ शिव और पार्वती

वह महिला जो मेरी पत्नी है, और मैं

नहीं मांगते कुछ भी

उसके बारे में

जो दूसरी दुनिया से आता है;

केवल इतना रहने दो

प्रकाश समुद्र वक्ष पर

नंगे पांव पर प्रकाश

निद्रित धरती और समुद्र के ऊपर।”

(शिव और पार्वती)

पुरस्कार समारोह के बाद मैंने उनसे इस कविता के प्रेरणा-स्रोत के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि इस कविता के दो स्रोत थे। पहला स्रोत था, हार्दिक प्रार्थना, दूसरा मेरी विदायी के अनुभव। कविता भारत से लडेरा एस्टे (उनकी पूर्व भूमि) लौटने से ठीक पहले ही बनाई गई थी। उस समय उन्होंने मैक्सिको सिटी के छात्रों पर मैक्सिकन सरकार के फायरिंग के विरोध में भारत के राजदूत के पद से इस्तीफा दे दिया था। कविता पढ़ते समय मेरी आँखों के सामने फिर से एलीफेंटा नाचने लगी। शिव-पार्वती के विवाह की सुंदर तस्वीर एलीफेंटा की गुफाओं में अभी भी अक्षुण्ण है।मुझे निम्न पंक्तियां याद आ गईं, जो मेरे अंदर प्रतिध्वनित हो रही थीं :-

"हे जगन्नाथ, मैं तुमसे कुछ नहीं मांगता,

न धन मांगता हूँ, न जन,

मांगता हूँ सिर्फ हाथ भर श्रद्धा बालू । "

हमें पता था कि उन्होंने भारत में अपने प्रवास के दौरान कई जगहों ('वृंदावन', 'हिमाचल प्रदेश', 'ऋषिकेश') पर कविताएं एवं समय और घटनाओं के बारे में लिखा था । भारत उनकी नजरों में प्रिय भूमि थी, जो इतिहास की निर्जनता में खो गई थी। उन्होंने मुझसे कहा था कि उनकी किताब 'इन दी लाइट ऑफ इंडिया' उनके कर्ज को चुकाने का एक छोटा प्रयास था। भारतीय आत्मा का द्वंद्व और विरोधाभास, जिन्हें उन्होंने देखा था, उनकी पुस्तक में साफ झलकते हैं। एक बार बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था, "मैक्सिको का भी यही हाल है। हम मेक्सिकोवासी एक-दूसरे और दुनिया के लिए अबोध्य हैं। "

इस पुस्तक में, मैं उनके साथ अपने रिश्ते के लंबे इतिहास के बारे में नहीं लिख पाऊँगा। खास-खास बातें लिख रहा हूँ।

मैंने हार्वर्ड कारपेंटर सेंटर में कविता-पाठ के बारे में पहले कहा है। निसेन की प्रदर्शनी का नाम था "ओक्टेविओ पाज़ की ऑब्सीडियन तितली" । उनकी कविताओं में कई जगहों पर मैक्सिकन सभ्यता की परंपरा का चित्रण है,इसलिए मैंने उनसे और निसेन से कहा था कि प्रदर्शनी का शीर्षक वास्तव में काफी सोच-समझकर रखा गया है।

पठित कविताओं में सामग्रिक भाव से कविता और मेक्सिको के बारे में उनका दृष्टिकोण था। हमेशा कवि का भाग्य ऐसा ही होता है। उन्हें अपने समाज और समय के साथ बहुत करीबी रिश्ता बनाए रखने पर भी अपने आपको इतिहास के बोझ और उसके कोमल अत्याचार से बचाना पड़ता है। कवि और उनके उच्चारित शब्द एक और अभिन्न होने पर ही उच्च कोटि की कविता बनती है।उनकी भाषा में कविता एक परित्यक्त आँगन है। मेरे मन पसंद की तीन कविताएं उदधृत हैं :-

यौवन :-

तरंगों की उछह लकूद

और..... श्वेत-धवल

समय-समय पर अधिक हरा

दिन-ब-दिन और बचपना

मृत्यु

रचना:-

ये सारे अक्षर लिखता हूँ मैं

जैसे दिन आँकता है अपनी छह बियाँ सारी

फिर फूँक मारकर मिटा देता है

और आता नहीं वापस

संगीत:-

ऊपर नीला अंबर

नीचे पेड़ों के झुंड

रास्ते भर हवा

सुनसान कुआं

काली बाल्टी

स्थिर पानी

पानी

उतर आता है पेड़ों पर

आसमान

छा जाता है होठों पर

मैंने उनसे कुछ समय के लिए चित्रकार जे॰ स्वामीनाथन और कवि श्रीकांत वर्मा के बारे में बात की थी। वे दोनों हमारे दोस्त थे और दोनों इस दुनिया से विदा हो गए। स्वामीनाथन ने मेरे कविता-संग्रह 'चढ़ेईरे तू कि जाणू' के हिंदी अनुवाद ‘चिरईरे तू क्या जाने’ के लिए उनके द्वारा चयनित एक पेंटिंग की स्लाइड तैयार करके भेजी थी, मुझे याद आ गया। मुझे स्वामीनाथन के साथ मेरी पुरानी दोस्ती और उनकी मृत्यु शैय्या के शेष दिन याद आने लगे।

इस तरह सब-कुछ खो जाता है। मृत्यु का कोहरे हर किसी को डूबा देता है - उसके बाद कुछ भी दिखाई नहीं देता। जब मुझे ऑक्टेविओ की दारुण मृत्यु की खबर मिली तो मेरा मन छह टपटाने लगा था। अनजाने में इस दूर स्थित दोस्त के लिए मेरी आँखें नम हो गई थीं । एक बार वह अमेरिकी शिखर समिति की बैठक में भाग लेने के बाद चिली से विमान द्वारा लौट रहे थे। मुझे उनकी कविता ओब्सीडियन तितली याद आई, जिसे मिट्टी और फूलों की सुगंध से प्यार था फिर अपने पंखों को हिलाते हुए दूर चली गई। मुझे उनकी कविता 'शिव पार्वती' भी याद आई। क्या यह मृत्यु भी सभी से ‘विदाई, विदाई' कहने की शैली नहीं है?

ओक्टेवियो स्मृति और प्रेम के कवि थे। उनकी कविता 'सन स्टोन' की कुछ पंक्तियां नीचे उद्धृत है:

मैं अपनी उंगलियों से देखता हूं:

मेरी आँखें क्या छूती हैं:

दुनिया की छाया पर छाया डालती हैं।

मैं दुनिया को आकर्षित करता हूँ।

मैं दुनिया को छाया के साथ छिन्न-भिन्न करता हूँ।

मैक्सिको के राष्ट्रपति अर्नेस्टो ज़ेडिलो ने ओक्टेविओ की मौत की खबर पर संवेदना व्यक्त की थी, "उनकी मृत्यु समकालीन विचार और संस्कृति के लिए एक अपूरणीय क्षति है, न केवल लैटिन अमेरिका के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए।"

उनकी मृत्यु में कविता ने खो दिया है उस कवि को, जिसने सूनसान एस्प्लेनेड से हमें दुखद समय में कविता और कला के सूक्ष्म स्वर सुनाए थे। क्लांतिहीन पथिक बनकर, जिसने हमें चहुंमुखी निराशा और अवक्षय के भीतर आशा और नए सपनों का संचार किया था।सारा जीवन वह अथय यात्री थे, लौटना चाहते थे "प्रारम्भ के विस्मृत शब्दों में"

उन्होंने अपनी पुस्तक "द लिब्रिन्थ ऑफ सॉलिट्यूड" में एज़्टेक- माया सभ्यताओं और मेक्सिको के इतिहास और परंपरा के बारे में बहुत कुछ लिखा है। टेनोचिट्लान के खंडहरों पर स्थित ढाई करोड़ लोगों की दुनिया की सबसे बड़ी बस्ती मैक्सिको सिटी है, जिसके चारों तरफ पहाड़ ही पहाड़ है, जिसकी वजह से वह दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है। बारबाटी के खंडहरों पर स्थित कटक शहर और क्या है!

पेंगुइन से प्रकाशित अपना कविता-संग्रह मुझे उपहार देते समय उन्होंने स्पैनिश में दो पंक्तियां लिखीं: 'ए सीताकान्त दी पोएटा ए पोएटा' (सीताकांत को, कवि से, कवि को)। जब मैं अपनी पुस्तक के पन्नों को पलटता हूं तो उनकी ये पंक्तियाँ याद आती है:-

"लेखक को एकांत में रहना चाहिए। यह अभिशाप भी है तो आशीर्वाद भी। इसलिए हम लेखकगण सीमांत पर होते हैं।"

(क्रमशः अगले भागों में जारी...)

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रचनाकार: स्मृतियों में हार्वर्ड - भाग 3 // सीताकान्त महापात्र // अनुवाद - दिनेश कुमार माली
स्मृतियों में हार्वर्ड - भाग 3 // सीताकान्त महापात्र // अनुवाद - दिनेश कुमार माली
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रचनाकार
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