त्रेता : एक सम्यक मूल्यांकन - उद्भ्रांत के महाकाव्य त्रेता की पड़ताल - भाग 7 // दिनेश कुमार माली

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उद्भ्रांत के महाकाव्य त्रेता की पड़ताल

भाग 7

दिनेश कुमार माली

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रामायण का पाँचवाँ अध्याय सुंदरकांड (जिसमें कपि द्वारा सीता की खोज का उल्लेख है) अत्यंत ही लोक प्रिय अध्याय है, जो अपने परिजन को खो जाने पर पाने के लिए आशा का प्रतीक है। Rationalist के अनुसार हनुमान उड़ते नहीं थे। वह पानी में तैरते थे। वाल्मीकि रामायण में तैरने और उड़ने दोनों ही शब्द एक-दूसरे की जगह प्रयुक्त हो सकते हैं। भारत के प्रत्येक गाँव में एक ग्राम्यदेवी होती है जो उस गाँव की रक्षा करती है जैसे मुंबई की मुम्बा देवी, कोलकाता की काली देवी, चंडीगढ़ की चंडिका देवी तथा नैनीताल की नैनी देवी विख्यात है। भारत के अधिकांश किलों का नामकरण दुर्ग के रूप में किया जाता है क्योंकि वे दुर्गा देवी शेर पर सवार तथा हाथों में हथियार लिए उन राजाओं तथा किलों की रक्षा करती है। इस तरह लंका भी कोई अपवाद नहीं है। लंका शहर की रक्षा देवी ताड़का तथा लंकिनी द्वारा की जाती है। लंकिनी की तुलना ग्रीक माइथोलोजी के Amazon (योद्धा स्त्री) से की जाती है। चंद्रगुप्त मौर्य की सेना में भी महिला योद्धा होती थी। बंगाल में राम के द्वारा दुर्गा को अपनी आँख की आहुति देने की कहानी लोकप्रिय है। दशहरे के समय अभी भी कई गांवों में देवी के समक्ष एक सौ आठ कमल तथा एक सौ आठ दीप जलाने की प्रथा है। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने बंगाली रामायण की इस घटना पर आधारित राम की शक्ति–पूजा कविता लिखी थी, जो यह प्रदर्शित करती है कि आदमी को लक्ष्य की प्राप्ति के लिए व्यक्तिगत त्याग भी करना पड़ता है। दुर्गा, कालिका का कम जंगली रूप है, मगर गौरी से कम घरेलू है। वह दुल्हन और योद्धा के बीच में ठहरती है, काली, राक्षसों से ज्यादा जुड़ी हुई है और दुर्गा राम से, जो की सभ्यता का प्रतीक है, रावण से नहीं। वाल्मीकि रामायण में इन्द्र राम के लिए रथ और सारथी भेजता है, क्योंकि रावण बिना रथ वाले योद्धा से लड़ने के लिए इन्कार कर देता है। दक्षिणी पश्चिमी एशिया की लोक कथाओं में रावण को मारने वाला लक्ष्मण को बताया गया है राम को नहीं। जिन कथाओं के अनुसार किसी भी कहानी में एक क्रोधी नायक (वसुदेव), एक शांत करनेवाला नायक (बलदेव) और एक खलनायक(प्रति वसुदेव) होता है। रामायण की कहानी भी कुछ इस तरह ही है। राम बलदेव का रोल कर रहे हैं, रावण प्रति-वसुदेव तो लक्ष्मण वसुदेव। इसका मतलब लक्ष्मण रावण को मारेगा, न की राम। भील रामायण में लक्ष्मण मधुमक्खी को मारता है, जिसमें रावण के प्राण होते हैं। तमिल रामायण के अनुसार राम का एक धनुष रावण के शरीर को बार-बार भेदता है और उस हृदय को जिसमें सीता का स्थान होता है। लाओस के रामायण में फ्रा लाम (राम) को जीवन के शुरूआती वर्षों में बुद्ध के रूप में जाना जाता है और रावण को इच्छा राक्षस ‘मारा’के रूप में प्रकट किया है। तेलुगू कथा के अनुसार राम रावण की नाभि में तीर मारने से इन्कार कर देता है। युद्ध संहिता के अनुसार तीर केवल दुश्मन के चेहरे पर मारे जाने का नियम है। मगर हनुमान अपने पिता वायुदेव से राम के धनुष की दिशा बदलकर रावण की नाभि की और कर देता है। दशहरे के दिन राजस्थान के मुद्गल गोत्र के दवे ब्राह्मण रावण के लिए श्राद्ध रखते हैं और उसी दिन कानपुर में रावण के मंदिर के दरवाजे खुले रखे जाते हैं। यह मंदिर 19वीं सदी में बनाया गया था और रावण को शिव और शक्ति पीठ के संरक्षक के रूप में देखा जाता है।

थाइलेंड में आज भी कई मंदिरों में रावण को मंदिरों का दरबान तथा संरक्षक माना जाता है। राम और रावण दोनों शिव भक्त थे। अयोध्या (उत्तर प्रदेश), चित्रकूट (उत्तर प्रदेश), पंचवटी (महाराष्ट्र), किष्किन्धा (कर्नाटक), रामेश्वरम् (तमिलनाडु) आदि के शिव-मंदिर राम से संबंध रखते थे; वहीं गोकर्ण (कर्नाटक), मुर्देश्वर (कर्नाटक), काकीनाड़ा (आंध्रप्रदेश), वैद्यनाथ (झारखंड) आदि शिव मंदिर रावण द्वारा बनाए जाने की मान्यता है।

रामायण के बारे में कहा जाता है कि यह किसी नायक के विजय की गाथा नहीं है, वरन् ज्ञान संचरण के साथ–साथ यह याद दिलाती है कि सामग्री का युद्ध कम बल्कि विचारों का युद्ध ज्यादा है। किसी आदमी को देखना दर्शन है, इसका मतलब यह नहीं है कि आप उसे साधारण दृष्टि से देखेँ, बल्कि दूसरों के चरित्र के अंदर इतनी गहराई से झाँकना है कि उसे अपना चरित्र नजर आए। रामायण में राम लक्ष्मण को इसलिए डाँटते है कि वह अपना निर्णय लेने में बहुत जल्दबाजी करता है और अपनी भावनाओं से ज्यादा प्रभावित रहता है, वस्तुओं की ओर गहरी दृष्टि से नहीं देख पाता है। भारत में स्त्रियों के प्रति गहरे विक्षोभ का कारण राम का अपनी पत्नी की तुलना में परिवार को ज्यादा महत्व देना है। पारंपरिक समाज में नववधू को निम्न स्तर से देखा जाता है, जब तक कि वह घर की मुखिया न बन जाए, उसे अधिकार नहीं दिया जाता। इसके पीछे डर का कारण यह है कि कहीं पत्नी अपने पति को अपनी उँगलियों पर न नचाए और उसका पुत्र घर की गिरफ्त से भाग कर न चला जाए।

शाक्त हिन्दुत्व की एक शाखा पंद्रहवीं शताब्दी में अद्भुत रामायण में दृष्टांत पेश करती है कि रावण से भी ज्यादा शक्तिशाली सौ या हजार सिर वाले राक्षस का सीता वध करती है, न की राम। ओड़िया सारला दास की ‘बिलंका रामायण’ में सीता की ऐसी ही कहानी मिलती है। अदभुत रामायण में देवी के भयानक चंडी रूप से सभ्य मंगल रूप में बदलने का उल्लेख आता है। जिस रूप की मंदिरों में पूजा की जाती है, कपड़े, जेवर, प्रसाद, चढ़ाए जाते हैं और पूजा अर्चना की जाती है कि मानवता के लाभार्थ स्वेच्छा से यह रूप धारण करें। मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से दोनों दशरथ और रावण राम के पिता तुल्य हैं। मगर दोनों राम को कष्ट देते हैं, एक उसे अयोध्या से निकाल देता है, तो दूसरा सीता का अपहरण कर देता है। पहले में राम अपने गुस्से को अभिव्यक्त नहीं कर पाता है, बल्कि दूसरे में वह बंदरों के द्वारा वह अपने सीमित क्रोध को उजागर करता है। श्री वैष्णव साहित्य में सीता ने रावण को अपनी इच्छा से मरने का सामर्थ्य दिखलाया है, मगर राम के कहने पर वह ऐसा नहीं करती है।

· पुष्पक विमान – पद्म पुराण के अनुसार राम और दूसरे लोग उड़कर घर जाते हैं, क्योंकि समुद्र पर बना हुआ वह पुल तोड़ दिया जाता है। विभीषण राम को बंदरों द्वारा निर्मित पुल को तोड़ने का आग्रह करता है, ताकि लंका पर विदेशी आक्रमण न हो सके। कलाकार विमान या उड़ने वाले रथ को अलग-अलग ढंग से देखते हैं। कभी-कभी उसे ‘शगड़’ या रथ, जो की गधों, घोड़ों द्वारा खींचा जा रहा हो, तो कभी-कभी उनकी संरचना में पंख लगे हुए दिखाया जाता है। पारंपरिक हिन्दू या जैन मंदिर को भी विमान कहा जाता है, जो कि स्वर्ग और मृत्युलोक की यात्राएँ कराते हैं। ग्रीक माइथोलोजी में उड़ते हुए देवताओं और नायकों के बारे में सुनने को मिलता है। जेउस(Zeus) के ईगल (eagle)होते हैं, बेल्ल्रोफोम(Bellrophom)के पास उड़ने वाले घोड़े होते है, हेर्मेस(Hermes) के पास पंख लगे जूते होते हैं और मेडेय(Medea)के पास उड़ने वाले सापों का रथ होता है। संस्कृत काव्य में (वाल्मीकि से प्रारम्भ कर) अंतरिक्ष से पृथ्वी को देखने का वर्णन मिलता है।

· रामेश्वरम् – रामेश्वरम में तीर्थ यात्री बालुका शिवलिंग बनाते हैं जो कभी शिव को प्रसन्न करने के लिए राम और सीता ने बनाए थे, रामेश्वर मंदिर में दो शिवलिंग है, एक नहीं। कहानी इस तरह शुरू होती है कि राम ने हनुमान को काशी जाकर शिवलिंग लेने के लिए भेजा। मगर वह बहुत समय तक नहीं आए तो राम ने बालुका शिवलिंग लाने के लिए सीता से कहा। जैसे ही पूजा पाठ शुरू होने जा रहा था, वैसे ही हनुमान जी शिवलिंग लेकर वहाँ पहुँच जाते हैं और उसका इंतजार नहीं करने के कारण क्रोधित होते हैं। हनुमान अपनी पूंछ से सीता के उस बालुका शिवलिंग को तोड़ने का प्रयास करते है, मगर असफल रहते हैं। हनुमान को खुश करने के लिए सीता की शिवलिंग के पास हनुमान जी का शिवलिंग रखकर राम पूजार्चना करते हैं। मध्ययुग में राम को ब्रह्महत्या पाप से मुक्त करने के लिए तरह-तरह के कथानक सामने आए हैं। दक्षिण में रामेश्वरम तथा उत्तर में ऋषिकेश, ऐसे तीर्थस्थान हैं जहाँ राम ने रावण की याद में श्रद्धाञ्जलि पूर्वक आराधना की। भक्तिमार्ग के विपरीत एक दूसरा और मार्ग होता है,जिसे विपरीत भक्ति या रिवर्स डिवोशन कहते हैं। इसके अनुसार भगवान को लगातार गाली देने अथवा भगवान का दुश्मन बनने का अर्थ है। भगवान को इतनी बार याद करना कि वह उनकी दिव्य अनुकंपा का पात्र बन जाते हैं। रावण भी ऐसा ही एक पात्र है। जैन और बुद्ध परम्पराओं में रावण को कुछ कमजोरियों वाला बुद्धिमान पुरुष माना गया है। जैन परंपरा में वह साधु के रूप में पुनर्जन्म लेता है और बुद्ध परंपरा में उसे बुद्ध के रूप में माना गया है।

रावण का जन्म एक बुद्धिमान पुजारी के रूप में होता है और वह राजा के रूप में काम करता है। इसके बावजूद भी उसे बुद्धि प्राप्त नहीं होती है। भले ही,उसके पास अपार धन, शक्ति और ज्ञान क्यों न हो। हनुमान का जन्म बंदर के रूप में होता है और वह सूरज से शिक्षा प्राप्त करता है, न उसका कोई सामाजिक रुतबा होता है अथवा उसके पास धन दौलत होती है, मगर राम की सेवा के द्वारा अपने ज्ञान और शक्ति के उद्देश्य के बारे में समझ जाता है। इस तरह वह बुद्धिमानी का प्रतीक माना जाता है। रावण और हनुमान के दोनों चरित्रों में विरोधाभाव संयोग-वश नहीं है, बल्कि विचारों को समझने के लिए रचनाकर ने प्रस्तुत किया है। कन्नड़ रामायण में अपनी हड्डियों के चारों तरफ, राम के नाम लिखे जाने के उद्देश्य को प्रस्तुत किया है। सीता और राम को हनुमान द्वारा अपने हृदय में दिखाना लोगों की कल्पनाशक्ति को जागृत करना है। ओड़िया रामायण में सुग्रीव जब सीता के पाँव को देखता है तो वह सोचता है, बाकी उसका शरीर कितना सुंदर होगा। राम सुग्रीव को कहता है कि अगले जन्म में वह एक स्त्री से शादी करेगा,जो सीता का दूसरा रूप होगा, वह राधा कहलाएगी। मगर उन दोनों का संबंध कभी भी अपने चरम तक नहीं पहुँच पाएगा।

· रामनाम – हनुमान को बहुधा लाल रंग से दिखाया जाता है जो कि देवी का रंग है। कुछ ऐतिहासिक कहते हैं कि पुराने आदिवासी देवता जिसे यक्ष कहा जाता है, वे खून में नहाए हुए थे। जो कालान्तर में लाल रंग का प्रतीक बन जाता है। आधुनिक समय में हनुमान को केसरिया रंग से दिखाया जाता है, जो ब्रह्मचर्य के रंग का प्रतीक है। उत्तर भक्तिकाल में देवता और भक्त के बीच लड़ाई होना सामान्य बात है, भक्त देवता का नाम उच्चारण कर अपनी रक्षा करता है। कहने का अर्थ यह है कि देवता का नाम देवता की प्रतिमा से ज्यादा महत्व रखता है अर्थात् राम का नाम, राम के रूप से ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह सबसे बड़ा मंत्र है जो मंदिरों में जाने से भी ज्यादा मायने रखता है। यह प्रदर्शित करता है कि धीरे-धीरे सगुण भक्ति कम होती जाती है और निर्गुण भक्ति बढ़ती जाती है। कबीर और नानक (15वीं से 18वीं शताब्दी) के संतों ने अलौकिकता की कल्पना के लिए राम को व्यक्ति के रूप में स्वीकार नहीं किया। आज भी भारत में कई जगह पर अभिवादन के लिय ‘राम राम’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। अंत्येष्टि कर्म के दौरान भी अधिकांश हिन्दू “राम राम या राम नाम सत्य” है (राम का नाम ही सत्य है) का उच्चारण करते हैं। रामायण के अनुसार राम सगुण नायक अथवा निर्गुण राम के रूप में निराकार अलौकिकता को प्रकट करते हैं। राम रसिकों की धारणा है कि राम को न तो वनवास हुआ था, न ही सीता का अपहरण। यह तो केवल राम और सीता द्वारा भ्रम फैलाया गया, उन लोगों के लिए जो थ्रिल ऑफ एडवेंचर को पसंद करते थे। राम रसिक ध्यान के माध्यम से अपने मन में स्वर्ग की कल्पना करते हैं,जिसे साकेत कहा जाता है और कनक भवन प्रासाद,जहाँ वे राम और सीता के अंतरंग संबंधों को देखकर शांति प्राप्त करते है। कोई-कोई राम रसिक अपने आपको जनक का भाई मानकर (सीता के चाचा) मानकर अयोध्या में भोजन ग्रहण नहीं करते हैं, अपने दामाद का घर समझकर। दूसरा राम रसिक अपने आपको सीता का छोटा भाई समझते हैं और यह सोचकर अयोध्या जाते हैं कि सीता उसे मिठाई खिलाएगी और कोई राम रसिक सीता के लिए खिलौने खरीदकर ले जाता है। इस तरह दैविक जोड़ी के साथ वे अपने संबंधों को अभिव्यक्त करते है। कृष्ण के विपरीत राम को कभी भी यौनावेग(eroticism)से नहीं जोड़ा गया। मगर 19वीं शताब्दी में ओड़िआ कवि उपेन्द्र भंज ने इस संबंध में वैदेही विलास नामक ग्रन्थ की रचना की है। कईयों के अनुसार रामायण रामवेद है,जो राम और सीता के संबंधो को दर्शाता है। मानो एक मंत्र हो तो दूसरा उसका अर्थ। दोनों का एक दूसरे के बिना अस्तित्व नहीं है। पारंपरिक तौर पर सीता के नाम के पीछे राम का नाम जोड़ा जाता है, जैसे “जय सिया राम” (सीता के राम की जय हो) यद्यपि कई जगह पर स्त्री लिंग शब्द से हटाकर लोग “जय श्री राम” कहना पसंद करते हैं। मगर कई लोग तर्क करते हैं कि श्री = Mr. के तौर पर प्रयुक्त नहीं होता है। श्री वैदिक नाम है धन संपति की देवी का। 17वीं शताब्दी में एनोना (Annona) संवर्ग के लैटिन अमेरिका के फल जब भारत पहुँचते हैं तो उन्हें लोकप्रिय बनाने के लिए भारतीय नाम दिए जाते हैं जिनमें सीता-फल (सीता का फल) यानि कस्टर्ड एप्पल(Custard Apple) तथा राम-फल (राम का फल) (Bull’ heart) प्रचलित है। इसी तरह लक्ष्मण-फल और हनुमान-फल भी होते हैं।

· राम निर्णय – वाल्मीकि रामायण में भद्र नामक जासूस द्वारा राम के राज्य में लोगों द्वारा कही गई बातों की सूचना मिलती है। जब राम उसे केवल सकारात्मक बाते कहने के लिए डाँटते हैं तो भद्र नकारात्मक बातें शुरू करता है। राम को पुरुषोतम कहा जाता है जिसका अर्थ एक आदर्श व्यक्ति से होता है, इसलिए यह जानना स्वभाविक है कि एक आदर्श व्यक्ति महिलाओं के साथ किस तरह व्यवहार करता है। मगर राम केवल पुरुषोत्तम ही नहीं है, वह मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, जो नियम, नियमों की सीमा को जानते हैं और उनका सम्मान करते हैं और नियम और कानून को जानने वाले पैतृक रूप से अत्याचारी होते हैं, क्योंकि वे उचित आचरण के लिए कृत्रिम सौपानिकी का निर्माण करते हैं। कृष्ण भी पुरुषोत्तम हैं, मगर लीला पुरुषोत्तम, जो जीवन जीने की आवश्यकता पर बल देते हैं, न कि उसे गंभीरता से लेते हैं। तेलुगू लोक कथाओं में सीता की बहनें, जो कि उसके पास खड़ी होती हैं, वे भी महलों से अपने निष्कासन की माँग करती हैं। क्योंकि उनका भी यही कहना होता है रावण के बारे में उन्होंने भी सोचा है।

· वापस वनगमन – मराठी लोक गीतों में सीता के वनगमन के दौरान गर्भवती होने का उल्लेख मिलता है कि सीता की खुशी से किस तरह दूसरी औरतें ईर्ष्या करती हैं और उसे कष्ट देना चाहती हैं। जंगल जाते समय सीता गंगा में कूद कर अत्महत्या करना चाहती है, इसलिए शायद इसे जंगल भेजा जाता है। पद्मपुराण के अनुसार, बचपन में सीता दो तोतों की कहानी सुनती है। सीता शायद यह समझती है कि वे झूठ बोलते हैं और शेष कहानी सुनने के लिए उस पर दबाब डालती हैं, जिनमें से एक मर जाता है और सीता को वन गमन का अभिशाप देता है।

· राम के निर्णय का लक्ष्मण द्वारा अनुपालन – गंगा घाट के लोक गीतों में सीता लक्ष्मण को पानी लाने के लिए कहती है, तो वह कहता है आस-पास में कोई पानी का स्रोत नहीं है, तो वह कहती है अपने धनुष द्वारा पृथ्वी को भेदकर पानी निकालने के लिए। तो लक्ष्मण उसे खुद करने के लिए कहता है, ताकि उसे रथ नहीं रोकना पड़े तो सीता अपने सतीत्व के प्रभाव से एक कुँए का निर्माण करती है। यह घटना लक्ष्मण के लिए सिद्ध करती है कि वह वास्तव में सती है और उसने अग्नि परीक्षा से लेकर कभी भी रावण के बारे में नहीं सोचा है। प्रादेशिक रामायणों में या लोक कथाओं में राम, लक्ष्मण को सीता की हत्या कर उसकी मौत के प्रमाण लाने के लिए कहता है, या तो उसकी आँखें या उसका खून। मगर लक्ष्मण सीता को छोड़ देता है और उसकी जगह हिरण की आँखें ले जाता है। भील गानों में राम चाहता है कि लक्ष्मण सीता की हत्या करे, मगर उसे गर्भवती जानकार ऐसा नहीं करता। तेलगू गानों में सीता को मरा हुआ समझकर राम उसकी अन्त्येष्टि भी कर देते हैं। उत्तर रामायण पढ़ने के लिए मना किया जाता है, क्योंकि इस दुखान्त कहानी से धरती माता (सीता की माँ) दुखी हो जाती है, जिसकी वजह से भूकंप आने लगते है। जब लक्ष्मण महलों में लौटते है तो प्रकृति के यथार्थ पर राम के साथ उनकी दार्शनिक बाते होती हैं, जिसे अध्यात्म रामायण में रामगीता के रूप में जाना जाता है।

· शूर्पणखा द्वारा सीता को रुलाना – कई लेखक सोचते हैं कि शूर्पणखा का क्या हुआ? कई गाथाएँ राम द्वारा सीता के निष्कासन को दायी मानते हैं, तो कोई लेखक पितृसत्तात्मक समाज को उसका कारण मानते हैं, जबकि दूसरे, औरतों की ईर्ष्या का परिणाम समझते हैं। सुश्रुत संहिता में कटे नाक की सर्जरी के द्वारा यह अनुमान लगाया जाता है कि रावण के सर्जनों ने शूर्पणखा की नाक ठीक कर दी होगी। राजस्थानी लोक गाथाओं में शूर्पणखा के पुनर्जन्म की कहानियाँ मिलती हैं। वह फूलवती के रूप में जन्म लेती है और लक्ष्मण महान लोक नायक पाबूजी के रूप में जन्म लेते हैं। उनके भाग्य में शादी का संजोग होता है, मगर पाबूजी कभी ही इस संबंध को स्वीकार नहीं करता है। लक्ष्मण की तरह वह भी ब्रह्मचारी योद्धा के रूप में रहते हैं और और सूपर्नखा का प्यार फिर अधूरा रह जाता है।

· चोर जो कवि बन जाता है:- पुराने ग्रन्थों में वाल्मीकि को प्रचेत या भार्गव कुल का ऋषि बताया गया है,जबकि मध्ययुगीन शास्त्रों में उसे अपने परिवार का निर्वाह करने के लिए चोरी करने वाला निम्न जाति का सदस्य बताया है। यह दोनों विरोधाभासी तथ्य नहीं हैं, क्योंकि उस समय ऋषि किसी भी जाति का हो सकता था। कुछ कहानियों में जैसे स्कन्द पुराण, आनंद रामायण, अध्यात्म रामायण में सन्त ऋषि या नारद के आशीर्वाद से रत्नाकर वाल्मीकि बन जाता है। सारला दास की ओड़िआ विलंका रामायण के अनुसार नदी के किनारे बालू पर ब्रह्मा के पसीने की बूंद गिरने से वाल्मीकि का जन्म होता है। उत्तर भारत में नीची जातियाँ जिसमें स्वीपर (sweeper) और मोची (cobbler) आते हैं, वे वाल्मीकि को अपना आदि(patron) संत मानते हैं। राम को पतितपावन कहा गया है। जिसका अर्थ पतितों का उद्धार करने वाला। कुछ साधुवादी रामायण को जातिप्रथा से मुक्ति दिलाने वाला आइकॉन मानते हैं। 17वीं शताब्दी में चंपा (आधुनिक वियतनाम) में वाल्मीकि का मंदिर बनाया गया है, और उन्हें विष्णु भगवान का अवतार माना जाता है। पारंपरिक तौर पर वाल्मीकि का आश्रम उत्तर प्रदेश के बान्दा जिले में है। वाल्मीकि की पूरी रामायण अनुष्टुप छन्द में लिखी गई है।

· जुड़वाँ बच्चे – वाल्मीकि रामायण में सीता को जुड़वा बच्चों को जन्म देते दिखाया है। जबकि कथा सरित्-सागर और तेलुगू लोक संगीतों में वाल्मीकि द्वारा कुश-घास के माध्यम से दूसरे पुत्र की उत्पत्ति होती है। हिन्दुत्व में सम-मिति (symmetry) का ज्यादा महत्व है। देवताओं की दो पत्नियाँ होती हैं एक इधर,एक उधर। देवी के दो बच्चे होते हैं जैसे (गौरी के गणेश और कार्तिकेय)। दो भाई होते हैं जैसे- पूरी में (सुभद्रा के साथ जगन्नाथ और बलभद्र)। दो योद्धा होते हैं जैसे उत्तर भारत के शेरवाली मंदिरों में- भैरव और लंगुभीर या हनुमान। इसी से यह अनुमान लगाया जाता है कि सीता के दो पुत्र symmetry की विचार धारा को प्रतिपादित करते हैं। रावण के दश सिर देखने में asymmetrical लगते हैं। मुख्य सिर के एक तरफ चार तो दूसरे तरफ पाँच सिरों का होना अस्थायीत्व प्रदर्शित करते हैं।

· हनुमान की रामायण – कई लोक कथाओं में रामायण का स्रोत हनुमान को माना गया। वाल्मीकि ने वही लिखा जो उसे हनुमान ने बताया। इसके पीछे कहने का यह उद्देश्य है कि सारे कथानक अपूर्ण हैं तथा किसी भी रचनाकार को उनकी रचनाओं की पूर्णता पर घमंड नहीं होना चाहिए। कुछ संस्करणों में हनुमान पत्थरों पर रामायण लिखते हैं, बल्कि दूसरे संस्करणों में उन्हें बड़ के पत्तों पर रामायण लिखते हुए दिखाया गया है, जिन्हें हवा भारत के अलग-अलग हिस्सों में उड़ा देती है।

· शत्रुघ्न द्वारा रामायण सुनना – वाल्मीकि रामायण में राम अपने भाइयों को अलग-अलग स्वतंत्र राज्य की स्थापना करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। मगर लक्ष्मण और भरत मना कर देते है। जबकि शत्रुघ्न लवण असुर को हराने के बाद स्वतंत्र राज्य स्थापना करने का साहस करता है। रास्ते में लौटते समय वाल्मीकि आश्रम में रुकता है और उनकी रचना रामायण को दो युवा बच्चों द्वारा गाते हुए सुनते हैं। वह उन्हें अयोध्या में गाने के लिए आमंत्रित करता है। क्या वह अपने भतीजों को पहचान लेता है? क्या वह राम के परिवार को मिलाना चाहता है? क्या रामायण में शत्रुघ्न को केवल इतनी ही भूमिका दी गई है। शत्रुघ्न रामायण में भरत की छाया से ज्यादा कुछ नहीं है तथा उत्तर रामायण में लवण असुर को हराने के। लोक कथाओं में यह भी उल्लेख आता है कि लक्ष्मण सीता से चुपके–चुपके कई बार मिलते हैं। एक बार वह अपने बच्चों को दिखाने के लिए राम को ले जाते हैं। राम को देखकर वे उस पर कीचड़ फेंकते हैं।

· अयोध्या में मनोरंजन – सोने को शुद्ध धातु समझा जाता है, इसलिए राम ने सीता के प्रतिबिम्ब इसी धातु का प्रयोग करते हुए बनाया है। “कुशिलव” कहने का तात्पर्य घुमक्कड़ गायकों से हैं। जो राम के मौलिक पुत्र का दावा करते हुए राम से अपने पत्नी के परित्याग के निर्णय पर प्रश्नवाचक चिह्न खड़ा करते हैं। क्या उन्होंने अपने संदेह के कारण सीता का परित्याग किया? क्या वह लोगों की संतुष्ट करना चाहते थे या फिर समाज की धारणा के प्रति आवाज उठाना चाहते थे? जैन रामायण में (योग शास्त्र के रचयिता हेमचन्द्र के अनुसार) राम सीता को खोजने के लिए जंगल में जाते है, मगर उसे नहीं पाकर जंगली जानवरों द्वारा मरा हुआ जानकार उसकी अंत्येष्टि कर देते हैं। तेलगु लोक गीतों में घर की स्त्रियों द्वारा सीता के सोने के पुतलों को नहलाने का जिक्र आता है। राम की बड़ी बहन के साथ घर की स्त्रियाँ यह करने से इंकार कर देती है।

· राम का घोड़ा – वाल्मीकि रामायण में राम के घोड़े का कोई उल्लेख नहीं है, मगर आठवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक भवभूति के उत्तर राम चरित तथा 14वीं सदी के पद्मपुराण के पाताल खण्ड में आता है। राम और उसकी सारी सेना सीता के पुत्रों को हराने में असमर्थ होने का अर्थ अनुचित समाज को नकारने से है। कथकली नृत्य के समय सीता की अनुपस्थिति देखकर हनुमान अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं, और वह उन्हें जंगल में खोजने के लिए निकल पड़ते हैं। जहाँ सीता के पुत्र उन्हें पकड़कर बांध लेते हैं। तब हनुमान उन्हें सीता का पुत्र होने का अनुमान लगाते हैं। असमी और बंगाली कथाओं में लव-कुश न केवल राम को हराते हैं, बल्कि वे उन्हें जान से मार देते हैं और उनका मुकुट माँ के पास ले जाते हैं, जिसे देखकर सीता पूरी तरह डर जाती है। वह भगवान से प्रार्थना कर उन्हें जिंदा कर देती है। इस तरह सीता अपने साथ गलत किए हुए काम का बदला लेती है। अश्वमेघ यज्ञ के पीछे उद्देश्य यह है कि चक्रवर्ती राजा बनने के लिए कम से कम सेना का प्रयोग किया जाय। राम अपने प्रभुत्व को बढ़ाना चाहते हैं मगर मानवीय सीमाओं के तौर पर उसके पुत्र उसका विरोध कर देते हैं। कोई भी नियम पूरी तरह से उचित नहीं है। कोई न कोई उस वजह से पीड़ित अवश्य होता है और जो पीड़ित होता है वह उसका प्रतिरोध करता है। गौरी कभी भी संप्रभुत्व-शाली नहीं होती है, बल्कि काली होती है। रामायण के परवर्ती भागों में दसवीं शताब्दी के संस्कृत नाटक चलित राम के लेखक की जानकारी नहीं है और यह नाटक पूरी तरह से उपलब्ध भी नहीं है। इस नाटक के अनुसार राक्षस रावण कैकेयी और मंथरा के वेश में अपने जासूसों को सीता के चरित्र पर संदेह करने के लिए भेजता है। लव और कुश जंगल में राम के घोड़े को पकड़ते है, मगर लड़ाई में लव पकड़ा जाता है और अयोध्या ले जाया जाता है, जहाँ वह सीता की सोने की मूर्ति देखता है और उसे अपनी माँ के रूप में पहचान लेता है।

सीता का धरती में समाना – राम से मिलने का इंतजार कर सीता ने संस्कृति और सामाजिक नियमों से मुँह मोड़ लिया। उसे अब अपने स्टेट्स के लिए सामाजिक मर्यादाओं की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए उन्होंने धरती का चयन किया। जहाँ न कोई नियम है,न कोई सीमा। अधिकांश रामायण कथाकार राम द्वारा सीता के परित्याग की चर्चा अवश्य करते हैं। मगर राम के द्वारा पुनर्विवाह के लिये इन्कार तथा सीता के धरती में समा जाने के बाद अपने जिंदा रहने की बात नहीं करते हैं। इस तरह अधूरे विवरण राम को स्त्री के प्रति दृष्टिकोण से पूरी तरह अलग करते हैं। पश्चिम में इस तरह की घटनाओं की खूब तारीफ की जाती है। शायद यह भारतीयता और भारत की एक विशेष छवि है। गोविंद रामायण के अनुसार लव और कुश द्वारा राम को हराने के पश्चात राम सीता को लेकर अयोध्या लौट जाते हैं और दश हजार साल तक शासन करते हैं। मगर महल की स्त्रियाँ सीता का ध्यान रावण की तस्वीर की तरफ खींचती है, जिससे राम अपने आपको असुरक्षित एवं ईर्ष्यालु अनुभव करने लगते हैं और फिर से सीता के सतीत्व की परीक्षा की माँग करते हैं। इस बार सीता धरती में समा जाती है।

दूसरी लोककथाओं में सीता अयोध्या जाने के लिए इंकार कर देती है, मगर जब उसे कहा जाता है, कि राम मर गए हैं तो वह अयोध्या की तरफ दौड़ती है। जहाँ जाकर उसे पता चलता है कि राम जिंदा है और उसे धोखा दिया गया है तो वह धरती से फटने के लिये आग्रह करती है। आसामी रामायण में हनुमान सीता की खोज में पाताल लोक जाते हैं और उसे राम के पास आने के लिए मना लेते हैं। हरियाणा में करणाल जगह पर सीता माई का एक मंदिर है, जिसमें जमीन पर वह स्थल दिखाया गया है, जहाँ से धरती फटी थी और सीता उसमें समा गई थी।

राम की निसंगता- क्या वफादारी एक गुण है? वाल्मीकि रामायण में यह सवाल अत्यन्त ही लोकप्रिय है, जिसके आधार पर अपने भाई के प्रति प्रेम के खातिर लक्ष्मण ने अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी। न तो उसे नियमों की परवाह थी और न ही अयोध्या के लिए मोह। राम के लिए अयोध्या नियमों से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। यद्यपि अपने क्रूर व्यवहार के आधार पर राम ने लक्ष्मण को धर्म के पालन की शिक्षा दी और यहाँ तक कि राम का अंधानुकरण करने के लिए मना किया। कुत्ता यद्यपि वफादार और प्रिय जानवर है, मगर हिन्दू शास्त्र उसे शुभ नहीं मानते। शायद कुत्ते की वफादारी डर पर आधारित है और वैदिक शास्त्रों का मुख्य उद्देश्य दिमाग का विस्तार कर डर से मुक्ति पाने का है। राम का सहारा लिया जा सकता है और लक्ष्मण राम पर निर्भर करते हैं। इस कहानी के माध्यम से राम चाहते हैं कि लक्ष्मण अपनी निर्भरता से ऊपर उठकर ज्यादा आश्रय देने योग्य बनें। अतः “सिर काट दिया गया”, मेटाफर दिमाग के विस्तार का प्रतीक हैं।

जैन उदाहरणों में लक्ष्मण के मरने पर राम रोते हैं। तब एक जैन साधु चट्टान से पानी निकालते हुए कहते हैं कि उसके आँसू एक लाश को जिंदा नहीं कर सकते हैं। जिस तरह चट्टान का पानी कुआँ, पेड़ पौधों की उत्पत्ति नहीं कर सकता है।

इस तरह रामायण हमें नियमों को ज्यादा मानने के खतरों के प्रति सचेत करता है। इससे यह प्रदर्शित होता है वह आदमी जो सारी चीजों की तुलना में नियमों को ज्यादा मानते हैं, उसके व्यक्तित्व का सहारा लिया जा सकता है, उसके बारे में कुछ कहा जा सकता है, मगर वह अच्छा इन्सान नहीं हो सकता। कृष्ण नियमों से ऊपर उठकर देखते है और मानवीय गुणों को ज्यादा तव्वजो देते हैं। रामायण और महाभारत दोनों का उपसंहार मृत्यु है और जो बुद्धि मृत्यु का पीछा करती है, वही मृत्यु सुखांत है।

· अयोध्या का सिंहासन - वैदिक विचारों को सामान्यतया वेदान्त कहा जाता है जो आत्मा और परमात्मा के संबंधों की पुष्टि करता है। यह द्वैतवाद है। जिसके अनुसार आत्मा यह अनुभव करती है कि परमात्मा के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है और परमात्मा यह अनुभव करते हैं कि आत्मा के बिना उसका कोई अस्तित्व नहीं है। यह अद्वैतवाद है। सीता के धरती में समा जाने के बाद धीरे-धीरे राम की सांसारिक आकर्षणों से रुचि खत्म होने लगी और वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड के अनुसार राम सरयू नदी में जाकर जल समाधि ले लेते हैं। आधुनिक संवेदनाओं के अनुसार इस तरह किसी राजा की जल समाधि लेना आत्महत्या की दृष्टि से देखा जाता है। मगर भक्तों के अनुसार इसे मुक्त आत्माओं द्वारा स्वेच्छा से शरीर त्यागने की प्रक्रिया वाली समाधि की दृष्टि से देखा जाता है। आज भी यह प्रथा जैन साधुओं तथा हिन्दू संतों जैसे ज्ञानेश्वर आदि में देखी जाती है। राम ने गर्भ से जन्म लिया तो मृत्यु निश्चित है। दुनिया में ऐसे भी कोई स्थायित्व नहीं है। मगर हनुमान चिरंजीवी तथा अमर है। शायद अपने ब्रह्मचर्य के कारण। ग्रहस्थ राम की मृत्यु होती है, मगर साधु हनुमान की नहीं। भारतीय मिथकों में इस तरह की सारी संभावनाएँ देखी जाती हैं। जब कभी भी रामायण का पाठ होता है तो श्रोताओं में एक जगह हनुमान जी के लिए खाली छोड़ी जाती है। कई कथाओं के अनुसार लव और कुश दो अलग-अलग नगरों के उत्तराधिकारी बनते हैं, श्रावस्ती तथा कुशावती। बाद में लव अयोध्या को लौटते हैं और उसे खंडहर के रूप में पाते हैं। जिसका जीर्णोद्धार कर पुरानी कीर्ति को प्राप्त करते हैं।

कालिदास के रघुवंश में राम के उत्तराधिकारियों की कहानी है, जो अग्निवर्मा पर जाकर समाप्त होती है जो कि एक बिगड़ैल, सुखवादी भोगी राजा है, जो अपना सारा समय रानियों के साथ बिताता है और जब भी जन सुनवाई की जाती है, तो वह खिड़की से अपना पाँव दिखाता है। वह इतना आलसी है कि बिस्तर से उठ भी नहीं पाता है। आखिरकर वह मर जाता है और उसके सिंहासन पर गर्भवती रानी को बिठाया जाता है।

केरल में हिन्दू लोगों द्वारा मानसून के महीने में 16वी शताब्दी में एज़्हुथचन (Ezhuthachan)द्वारा मलयालम में लिखी सम्पूर्ण रामायण गाथा को गाया जाता है। भारतीय मिथकों में अनेक राम हैं तो अनेक रामायण भी। जो यह दर्शाते हैं जीवन एक सरल रेखा नहीं है, कहीं पर पूर्ण विराम भी नहीं है। जीवन एक चक्र है, जो जाता है, वही आता है। इस तरह समय के विचार कभी भी इतिहास का आदर नहीं करते हैं। जो भूतकाल था, वही भविष्य होगा। इसलिए अनेक भारतीय भाषाओं में बीते हुए और आनेवाले दोनों दिनों के लिए “कल” का प्रयोग किया जाता है। महाभारत की तरह रामायण भी एक इतिहास है, जिसका दो भागों में अनुवाद किया जा सकता है। पहला– प्राचीन घटनाओं के रिकार्डों का लेखाजोखा। दूसरा– ऐसी कहानी जो कालजयी है। इस तरह पाँच हजार साल या उससे पूर्व गंगा के मैदानी घाटों पर एक कवि वाल्मीकि द्वारा गायी गई कथा या हमारे व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं के चरित्र को मनोवैज्ञानिक तौर पर प्रस्तुत करती हुई कालजयी कृति है।

सोलहवाँ सर्ग

शबरी का साहस

कवि उद्भ्रांत के अनुसार शबरी भील जाति की एक आदिवासी महिला थी, जो अपने पति शबर के द्वारा इस दुनिया में अकेले छोड़े जाने की वजह से आस–पास के घरों में कामकाज करके अपना जीवन यापन करती थी। स्त्री ही स्त्री के दुख को जान सकती है और अगर कोई स्त्री विधवा हो जाए, तो उसके जीने का कोई मायने नहीं रहता है, और दलित जाति की स्त्री के लिए तो वह जीवन त्रासदी का पर्यायवाची बन जाता है। कवि की पंक्तियाँ:-

स्त्री यदि

विधवा हो जाए कहीं,

तब तो उसके

जीवित रहने के लिए

अर्थ ही नहीं बचता।

और तनिक कल्पना करो

वैसी स्त्री की

जो आती हो मेरे जैसी

अति वर्गीकृत जाति से।

स्त्री ही होना

पर्याप्त यों तो_

त्रासदी का

बनने को_

पर्यायवाची।

सूनी मांग, उलझे बिखरे बाल, फूटी चूड़ियाँ, खाली पाँव, नाक में न कोई नथनी और न कान में कोई बूंदे और उसके ऊपर पिछड़ी क्षुद्र जाति में जन्म लेना साक्षात अमंगल की मूर्ति के सिवाय और क्या हो सकता है? मानों करेले पर नीम, नीम पर जहरीला साँप बैठा हो। कवि तो यहाँ तक कह देता है कि एक तुच्छतम घृणित जीव मानो घोर रौरव नरक से चला आया हो। उनके शब्दों में:-

ऐसी स्त्री को

क्या कहेगा समाज यह

कैसा व्यवहार करेगा उससे?

करेले पर नीम,

नीम पर करहल सांप

बैठा हो जैसे!

साक्षात्

अमंगल मूर्ति!

घोर,

रौरव नरक से चला आया

जैसे

तुच्छतम_

एक घृणित जीव!

शबरी को अच्छे दिन की तरस रहती है और एक बार जब अयोध्या के राजकुमार सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास के दौरान उसी रास्ते से गुजरने की खबर सुनकर शबरी रोमांचित हो उठती है। कवि पुरानी मान्यताओं को उजागर करता हुआ कहता हैं, कि राजा तो प्रजा के लिए भगवान तथा राजवधू सीता उसके लिए देवी से कम नहीं है। अगर वे इस रास्ते से गुजरेंगे तो वह कैसे उनकी अगवानी करेगी? वन में सिवाय भूमि पर पड़े हुए बेर के अलावा कुछ भी तो नहीं था। जहाँ लोग रास्ते के दोनों तरफ पुष्पहार, फल व्यंजन और तरह-तरह के उपहार लेकर खड़े हुए थे, वहीं दूसरी तरफ शबरी अपने आँचल में टोकरी भर बेर छुपाए कातर भाव से असंख्य लोगों के बीच उनका इंतजार कर रही थी। शबरी के कातर-भाव कवि उद्भ्रांत जी के प्रकट किए:-

मैं भी खड़ी हो गई वहां

असंख्य लोगों के बीच

आंखों में रामजी की प्रतीक्षा का

लिए हुए कातर भाव

और अपने आंचल में छुपाए हुए

बेर टोकरी भर!

कितने पल बीते

नहीं मुझे पता

किंतु जैसे कितने ही युग बीते

राम की प्रतीक्षा में!

जब राम की जय का नारा लगा तो वह पुलकित हो गई, मगर तुरंत ही हतप्रभ होकर चौंक गई कि उसके पास व्यंजन न होकर केवल मीठे बेर हैं और अगर राम ने नहीं खाए तो वह प्राण त्याग देगी। जैसे ही यह बात उसने मंथर गति से चल रहे राम–लक्ष्मण, सीता को कही तो राम ने कौतुकता से मुस्कराते हुए उससे कहा कि बेर से बढ़कर इस जंगल में मेरे लिए कोई श्रेष्ठ व्यंजन नहीं है। यह कहते हुए राम के बेर लेने आते ही शबरी ने राम का हाथ पकड़कर कहा-, रुकें पहले में चख कर देख लेती हूँ कि कहीं बेर खट्टे न हों। मगर आसपास की भीड़ उसे राम को अपवित्र करने की धमकियाँ देते हुए, पीटने तथा धक्का देने लगी। यह देख राम ने सभी के समक्ष उसका पक्ष लेते हुए यह कहा कि- माता शबरी के वत्सल हाथों से मीठे रस में पके बेर खाकर न केवल वे अपने आपको गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं, वरन पुण्य लाभ के भागी भी बन रहे हैं। राम ही नहीं वरन् सीता और लक्ष्मण को भी यह मीठे बेर खिलाकर उपकृत करें। यह दृश्य “न भूतो न भविष्यति” की तरह था। इस अविस्मरणीय दृश्य को कवि उद्भ्रांत जी अपने निम्न शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं:-

“क्या करती है बुढ़िया?

तूने अपवित्र

कर दिया राम जी को। ”

कहते हुए उनमें से कुछ मुझको

बरजने को,

धक्का देने को,

पीटने को भी लपके मेरी ओर;

किंतु राम मुस्कराए

उन्हें आंखों के संकेत से ही

रोकते हुए,

मेरी ओर_

प्रेम-करुणा की सम्मिश्रित

दृष्टि की असीमित पूँजी

बरसाते हुए

भाव-विगलित स्वरों में

इस तरह बोले-

“मुझे मिल रहा है पुण्य-लाभ

जन्म मेरा हुआ सार्थक,

माता शबरी के हाथों से ही मैं

मीठे बेर खाकर

यात्रा आगे की करूंगा शुरू। ”

कालांतर से शबरी भीलनी दंडकारण्य की तपस्विनी के रूप में अपनी नवधा भक्ति से परिपूर्ण होकर प्रसिद्ध होती चली गई और उसका आश्रम हनुमान, बाली, सुग्रीव की गाथा, सीता के अपहरण, वानरों द्वारा सीता की खोज आदि घटनाओं का साक्षी बना।

सत्रहवाँ सर्ग

शूर्पणखा की महत्त्वाकांक्षा

कवि उद्भ्रांत के अनुसार शूर्पणखा बचपन से ही चंचल, शरारती, झगड़ालू, उछल-कूद करने वाली, क्रोधी तथा ढीठ लड़की थी। पिता और पितामह ऋषि वंश के होने के कारण उसके क्रिया कलापों से परेशान होते थे। रावण बचपन से ही तेजस्वी, शूरवीर, बुद्धिमान, शिव का परम-भक्त, महापंडित व महायोद्धा था। मनुस्मृति उसने पूरी तरह कंठस्थ कर ली थी और उसको उसमें पूरा विश्वास भी था, उसके अनुसार लज्जा स्त्री का आभूषण है और उसका कठोर होना समाज के प्रतिकूल है। शूर्पणखा बचपन से ही विद्रोहणी थी, गुड़ियों से खेलना कभी अच्छा नहीं लगता था। ये सब प्रवृतियाँ बहुत अच्छी लगती थीं। चूँकि बचपन से ही उसने अपने नाखून कभी नहीं काटे, जो युवावस्था में जाते-जाते वक्राकार सूप की तरह लगने लगे। इसलिये रावण ने हंसी मज़ाक में उसका नाम शूर्पणखा से पुकारना शुरू किया, धीरे–धीरे यह नाम लोगों की जुबान पर चढ़ गया और वह अपने माता-पिता द्वारा रखे नाम “सुन्दर” को भूल गई। इसकी व्याख्या कवि उद्भ्रांतजी ने इन शब्दों में करते हैं:-

मैंने जानबूझकर

अपने भीतर परूष

हिंस्र प्रवृतियां पोसीं।

अपने नखों को

काटती न कभी,

जिससे मेरे

युवावस्था में पहुंचने से

पूर्व बड़े वे असामान्य रूप से।

मुड़े हुए

वक्राकार नख लगते

सूप लघ्वाकार।

रावण ने ही

सबसे पहले मुझे

व्यंग्य में, विनोद में

नाम दिया-शूर्पणखा।

शनै:-शनै:

यही नाम

प्रचलित हो गया मेरा।

इसके चचेरे भाई खर, दूषण, त्रिशिरा उससे बहुत प्यार करते थे। खर, खरवाणी बोलता था और त्रिशिरा काम, क्रोध, लोभ, तीनों गुणों से संपन्न था। त्रिशिरा अहिरावण का पुत्र था तो खर-दूषण कुम्भकर्ण के जुड़वें बेटे थे। उसका छोटा भाई विभीषण शुरू से ही दब्बू और डरपोक था। रावण ने लंकाधिपति बनकर ही सुन्दर उत्तरक्षेत्र के जंगलों की शासिका उसे घोषित करते हुए और दूषण और त्रिशिरा को सेनापति नियुक्त किया। शायद वे लोग रावण की कूटनीति नहीं जान पाए। एक दिन जब अयोध्या के राजकुमार उन जंगलों में आए, तो उसकी क्रोधाग्नि में आग बबूला होते हुए खूब सोमरस पीकर उन्हें ललकारने के लिए आगे निकल पड़े। जंगल के एक आश्रम में एक सुन्दर राजकुमार धनुष वाण लिए टहल रहा था और आश्रम के भीतर एक सुंदरी, कमनीय, छरहरी बैठी हुई थी। शूर्पणखा उस सुन्दर पुरुष को देखकर आकर्षित हो गई और उसके भीतर की सारी सुषुप्त वासनाएँ फन उठाकर फुफकारने लगी। उसने हिम्मतकर अपना परिचय देते हुए अपने मन की इच्छा को प्रकट करते हुए राक्षसी विवाह का आग्रह करने लगी। वह मन ही मन सोचने लगी कि उसकी सहायता से रावण को अपदस्थ कर विश्व की प्रथम साम्राज्ञी बनने का गौरव प्राप्त करेगी। मगर उसके प्रणय निवेदन को जब राम ने अपने विवाहित होने के कारण ठुकरा दिया तब अपनी सुंदरता का बयान करते हुए शूर्पणखा ने रावण को लंका से हटाने का भी प्रलोभन दिया और राक्षस समुदाय में अविवाहित स्त्री द्वारा अपने मन-पसंद पुरुष को उठाकर ले जाने के बारे में भी उदाहरण प्रस्तुत किया। यह देख लक्ष्मण भड़क उठे और उसके ऊपर प्रहार किया। शूर्पणखा ने यह सारी कहानी अपने भाइयों को बताई, मगर वे लोग उसका प्रतिशोध नहीं ले सके। तब शूर्पणखा ने रावण की शरण ली और अयोध्या के राजकुमार राम और लक्ष्मण के द्वारा उसके साथ हुए अभद्र आचरण के बारे में बताया। उसने कहा कि वह राम से गंधर्व विवाह नहीं कर पा रही है तो नई परंपरा “राक्षसी विवाह” को पुनर्जीवित करना चाहती थी। इस बारे में कवि उद्भ्रांत कहते हैं:-

हमारे समाज में प्रचलित

चार विवाहों में

राक्षसी विवाह ही है सर्वश्रेष्ठ।

आदिम समाज में

इस त्रेता युग में भी

स्त्रियाँ करती है ऐसा विवाह,

और हमारा समाज

इस पर हर्षित होता।

राम के विवाहित होने के बाद भी वह उससे क्यों नहीं शादी कर सकती थी? राम ने उसका अनुरोध ठुकराकर सम्पूर्ण स्त्री जाति का अपमान किया है और उसके भ्रू-संकेत पर छोटे भाई लक्ष्मण ने उसे जमीन पर पटककर तलवार से हत्या करनी चाही। जंगल की साम्राज्ञी के साथ ऐसा दुर्व्यवहार? इस तरह शूर्पणखा ने रावण को उत्तेजित करते हुए राम से प्रतिशोध लेने के लिए चुनौती दी और यही चुनौती रावण के पतन के अध्याय की शुरुआत थी। उद्भ्रांत जी की मौलिकता निम्न पंक्तियों से प्रकट होती है:-

मैंने चिंगारी

सुलगा दी थी रावण के मन में-

देखना था मुझे अब यह चिंगारी

लपट बनकर कैसे भस्म

करती है स्वर्णमंडित

उसके साम्राज्य को।

रावण के पतन के

लोमहर्षक अध्याय की

भूमिका प्रारंभ

हो चुकी थी मेरे द्वारा।


(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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