सत्तू के सम्मान में // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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बात बहुत पुरानी है। उस समय मैं १२-१५ वर्ष का रहा होऊंगा। रोज़ शाम को गर्मियों के दिनों में सत्तू का शरबत बना करता था और तरावट के लिए उसका सेवन किया जाता था। गाँव से जब हमारे चाचा, ताऊ वगैरा, आते थे, उनके साथ सत्तू ज़रूर हुआ करता था। कहते थे रास्ते में भूख लगी तो बस थोड़ा-सा सत्तू घोला और खा लिया। यात्रा के लिए निकलो तो सत्तू हमेशा साथ रखो – उनकी हिदायत हुआ करती थी। सत्तू उन दिनों भारत का जाना-माना नाश्ता हुआ करता था। आसानी से उपलब्ध होने वाला और भूख शांत करने वाला भला और कौन सा भोजन हो सकता है ? “सत्तू मन मत्तू, चट घोलो पट खाओ” कहावत प्रसिद्ध है।

अल्पाहारों में सत्तू का बड़ा दबदबा रहा है। बिहार, झारखंड, पश्चिमी बंगाल, उत्तर- और मध्य-प्रदेश में सत्तू ने अपना झंडा गाढ़ रखा है। गर्मियां आई नहीं कि आम आदमी सत्तू खाना/पीना शुरू कर देता था। और इस शुरूआत को जश्न की तरह बड़े समारोह पूर्वक मनाया जाता था। बैसाख माह की अमावस्या “सतुमाही अमावस्या” या “सत्तू-अमावस्या” कही जाती है। इसी तरह मेष संक्रांति को भी “सतुआ-संक्रांति” कहा गया है। हिन्दू कलेंडर के हिसाब से प्रत्येक वर्ष में राशियों के अनुसार १२ संक्रांति होती हैं। इनमें मकर संक्रांति तो बड़ी लोकप्रिय है ही, मेष संक्रांति जो वैशाख में पड़ती है, गर्मियों के आगमन की सूचक है और इसे सत्तू खाकर मनाया जाता है। अभी कुछ समय पहले ही यह मनाई गई थी। इस दिन लोग बाकायदा सत्तू दान कर गंगा-स्नान करते, और सत्तू बनाकर, खाकर या पीकर पर्व मनाते हैं।

सत्तू का सेवन उत्तर भारत में शौक से किया जाता है। ‘सत्तू’ शब्द पाली और प्राकृत भाषा से आया है। हिन्दी में भी इसे सत्तू ही कहते हैं। अन्य भाषाओं में ‘स’ और ‘त’ से बने सत्तू के अनेक रूप मिलते हैं। भोजपुरी में इसे ‘सतुआ’ कहा गया है; कश्मीरी इसे ‘सोतु’ कहते हैं; कुमायूं में ‘सातु’ कहा जाता है और सिंध में इसे ‘सांतु’ कहकर पुकारा गया है।

बिहार के लोग तो सत्तू पर इतने फ़िदा हैं कि पूछिए मत। वहां की खान-पान की संस्कृति का यह एक अभिन्न अंग बन चुका है। नाश्ते में सत्तू, खाने में सत्तू,। घोल कर पी जाने के लिए, सत्तू। सान कर खाने के लिए, सत्तू। ‘बाटी’ में भरने के लिए, सत्तू। लड्डू, तो सत्तू के; और नमकीन खाना है, तो भी स्वाद के अनुसार नमक डाल कर सत्तू ही सान लीजिए। कितने ही तो तरीके हैं सत्तू खाने के ! सत्तू के लिए ब्रज भूमि भी खूब बदनाम रही है। कहा गया है कि श्रीपुर के “छप्पन भोग में वो स्वाद नहीं सो स्वाद मिले यहाँ सतुआ में।’’

सत्तू मन-मत्तू। लेकिन आज सत्तू बेचारा गुमनामी के अँधेरे में पडा है। आज की भाषा में कहें, सत्तू जो भारत का एक मुख्य “फास्ट-फ़ूड” था, उसका नाम तक महानगरों में रहने वाले न जाने कितने नौजवान आज नहीं जानते। फास्ट-फ़ूड के नाम पर उन्हें सिर्फ पश्चिम से आयातित बर्गर, पीजा, चाऊमीन, नूडल्स और पेस्ट्री आदि ही पता हैं। ये सारे के सारे फास्ट-फ़ूड, जैसा कि हम सभी जानते हैं न केवल फास्ट फ़ूड हैं ‘जंक फूड’ भी हैं। लेकिन लोग फैशन की तरह, (वो कितनी ही असुविधाजनक और हानिकारक क्यों न हो,) जंक फ़ूड का ही सेवन कर रहे हैं। स्थानीय/ भारतीय स्वास्थ्यवर्धक सत्तू लाचार है।

लेकिन कहते हैं न, कभी न कभी घूरे के दिन भी फिर जाते हैं। सो लगता है सत्तू के दिन भी अब फिरने ही वाले हैं। धीरे धीरे इसने अच्छी प्रसिद्धि प्राप्त कर ली है। नामी गिरामी लोगों ने अपने सत्तू प्रेम को खुल कर अभिव्यक्ति दी है। उदाहरण के लिए सेवा निवृत्त न्यायमूर्ति काटजू, जो अपने बडबोलेपन के लिए विख्यात हैं, बड़े फक्र से बताते हैं कि उनके सत्तू प्रेम को देखते हुए, बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, जिनसे उनके अच्छे सम्बन्ध रहे हैं, उन्हें सत्तू भेजा करते थे। इसी प्रकार दक्षिण कोरिया की एक मोहतरमा, ग्रेस ली, बीस साल पहले जब भारत आईं तो बिहार का सत्तू खाकर सत्तू पर ऐसी मोहित हुईं कि बिहार में ही बस गईं। उन्होंने अपने कोरियाई दोस्तों को भी इसका दीवाना बना दिया। वे सत्तू का व्यवसाय करने लगीं। वे ५००/- रूपए पर-किलो की दर से भारत और कोरिया में, कोरियाई लोगों को, सत्तू बेंचती हैं और उनका व्यवसाय अच्छा खासा चल निकला है।

जिस सत्तू के बिना बिहार का लिट्टी-चोखा बेमजा है वह सत्तू बिहार के एक जिले, नालंदा, की नई पहचान गढ़ने जा रहा है। सत्तू बहुत जल्दी नेशनल से इंटरनेशनल होने वाला है। अमेज़न ने नालंदा के सत्तू की ब्रांडिंग और मार्केटिंग की योजना बना ली है। यह जल्दी ही ऑन-लाइन उपलब्ध हो जाएगा। ‘नालंदा सत्तू’ की खासियत यह होगी कि इस सत्तू को किसी मिल में नहीं बनाया जाएगा बल्कि महिलाएं अपने हाथों से इसे तैयार करेंगी। शासन द्वारा इसे स्वीकृति मिल चुकी है। जुलाई के अंत तक ‘नालंदा सत्तू’ की सोंधी खुश्बू आप तक पहुँच जाएगी। लेकिन क्या आप जुलाई तक सत्तू का इंतज़ार कर सकेंगे ? इसकी ज़रूरत भी नहीं है। ऑन-लाइन न सही लेकिन सत्तू सामान्य रूप से उपलब्ध है। जल्दी कीजिए गर्मियां ख़त्म होने से पहले ही इसका सेवन करना आरम्भ कर दें और गरमी से राहत पाएं।

--डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद –(उ. प्र.)

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2 टिप्पणियाँ "सत्तू के सम्मान में // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. सत्तु खाने को जी करता है। अभी! अच्छी जानकारी पर्याप्त हुई। धन्यवाद।

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