डॉ. श्याम गुप्त की लघुकथा - इलेक्शन और गांधीजी

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वे जनरल इलेक्शन के दिन थे | सारे देश में नारों, सभाओं, गानों, भाषणों, पोस्टरों के युद्ध की धूम थी | यहाँ तक कि बच्चे भी इस सब में खूब धूम धाम से सम्मिलित थे | जश्न जैसा माहौल था | उन दिनों विभिन्न पार्टियों के चुनाव चिन्हों के प्लास्टिक या कागज़ के बिल्लों का खूब प्रचलन था | बच्चे भी अपनी अपने पसंद की पार्टियों के चुनाव चिन्हों के बिल्लों को बड़ी शान से अपनी कमीजों पर पोशाक पर पिन किये रहते थे, यहाँ तक की विभिन्न पार्टियों व उम्मीदवारों के गुणों, अच्छाइयों एवं विरोधी पार्टी के अवगुणों का भी खूब अपनी बाल-बुद्धि के अनुसार या जैसा घर में बड़े लोगों से या सड़क पर हुए प्रचार से सुने हुए अनुसार गली, मोहल्ले, सड़क आदि पर वर्णन/ बहसें चलती रहती थीं |

रामप्रकाश जब घर के बाहर खेलने निकला तो सभी बच्चे किसी न किसी का बिल्ला लगाए हुए आपस में बहस कर रहे थे | उसने जगदीश से, जो दो बैलों की जोड़ी’ का बिल्ला लगाये था, पूछा तुम ये क्यों लगाए हो ?

मैं गांधीजी को वोट दूंगा, जगदीश ने कहा | ये उनका निशान है |

गांधीजी ! रामप्रकाश ने आश्चर्य से कहा, पर वे तो मर चुके हैं | मेरे पिताजी कह रहे थे, ये तो कांग्रेस का चुनाव चिन्ह है | तो फिर ये नेहरू जी का निशान होगा, माया ने सुझाया |

पता नहीं जगदीश बोला, मेरे पिताजी कहते हैं कि हमें गांधीजी को वोट देना चाहिए, उन्होंने देश को आजाद कराया | अचानक जगदीश चिल्लाया, क्या तुम जनसंघी हो ? क्योंकि वे ही गांधीजी व कांग्रेस को बुरा भला कहते रहते हैं|

अचानक चिल्ला पड़े — जनसंघी है भंगी, गली गली में शोर है, दीपक वाला चोर है | कुछ अन्य बच्चे चिल्लाए --दीपक को देंगे वोट, कांग्रेस से लेंगे नोट | बैलों की जोड़ी भाग गयी |

पर मेरे पिताजी कहते हैं की हमें जनसंघ को वोट देना चाहिए क्योंकि वही पार्टी हिंदुत्व को बचा सकती है, रामप्रकाश बोला |

जगदीश कहने लगा – मेरे पिताजी ने बताया है की जनसंघियों ने गांधीजी को मारा है | गांधीजी के हत्यारे के साथ कोई मत खेलो, वह चिल्ला कर कहने लगा | |

आंसू भर कर रामप्रकाश बोला, पर मैंने तो उन्हें कभी देखा ही नहीं | हो सकता है किसे जनसंघ वाले ने मारा हो तो मैं क्या करूं |

बाद में जब रामप्रकाश ने अपने पिताजी से पूछा की गांधीजी को किसने मारा तो वे बोले, नाथूराम गोडसे जो आरएसएस का आदमी था और गांधीजी का सेवक था पर वह उनकी हिन्दू विरोधी बातों को अच्छा नहीं मानता था | गांधीजी ने तो उसे माफ़ कर दिया था |

क्यों रामप्रकाश ने आश्चर्य से पूछा |

ये महान लोगों की बातें हैं सोच हैं बेटा, गांधीजी ने गांधीजी की तरह सोचा और नाथूराम ने सामान्य देशभक्त की तरह अपनी तरह सोचा | परिस्थितयों के अनसार दोनों ही सही थे | वे सोच में डूब गए और रामप्रकाश आधा समझता हुआ आधा न समझता हुआ खेलने चल दिया |

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