डॉ. श्याम गुप्त की लघुकथा - कार्य विभाजन ...

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देखो कितना अच्छा रहा न, आपने आलू छील दिए, मेरा कितना समय बच गया | रीता जी प्रसन्न होते हुए बोलीं |

हाँ, वह तो है ही, यदि पुरुष, स्त्री साथ साथ किचन के कार्य, कपडे धोना आदि करने लगें तो अच्छा तो रहेगा ही | पर आप अपना समय बचा कर करेंगी क्या ? प्रशांत जी ने प्रश्न दाग दिया |

सखियों के साथ उठना बैठना, मिलना, जुलना करेंगे |

तमाम मित्रों के साथ, मित्रों-सखियों के शादी समारोहों में, दफ्तर, पारिवारिक समारोहों में तो जाना/ मिलना हो ही जाता है, फिर अलग से कहीं जाने की क्या आवश्यकता है |

हमें भी स्पेस चाहिए | वे बोलीं |

तो पुरुष अपना काम कब करें, कमायें नहीं, अपने मित्रों के साथ उठें बैठें नहीं ! केवल पत्नियों के साथ घर के कार्यों में लगे रहें | नारी ही पुरुष को पुरुष बनाती है, समाज को उन्नत राह पर ले जाती है संस्कार की शिक्षा देकर सहधर्मिणी रूप में, पुरुष को सांसारिक/ गृहकार्यों से मुक्त रखकर उच्च विचारों व कृतित्वों हेतु, परन्तु भटकाती भी है सहकर्मिणी के रूप में | ब्रह्म अकर्ता है, वह कोई भी कार्य या कृतित्व स्वयं नहीं करता | प्रकृति, शक्ति या माया ही कर्ता है परन्तु वह ब्रह्म-पुरुष की इच्छा-आज्ञा से ही कार्य में प्रवृत्त होती है |

भई, आजकल तो सभी पत्नियों का हाथ बटाते हैं, किचन में, गृहकार्य में | क्योंकि उन्हें भी नौकरी पर जाना होता है, सखी सहेलियों में, किटी पार्टी में जाना होता है | रीता जी कहने लगीं |

सच है, तो फिर वही प्राचीन व्यवस्था क्या बुरी थी जब साथ-साथ खेत पर जाना, मजदूरी करना, शिकार करना, केवल खाना-खेलना और कमाना ही था, प्रशांत जी ने कहते गए | ऊपर उठे - समाज उन्नत हुआ, पुरुष–स्त्री के, राजा-रानी के कर्तव्य अलग अलग हुए; कार्य विभाजन हुआ, तभी उच्च विचार, कथाएं, साहित्य, शास्त्रों की रचनाएँ हुईं, उच्च संस्कृतियाँ पनपीं |’

आज पुरुष के गृह कार्यों में लिप्त होजाने के कारण हम पुनः वहीं पर आगये हैं| पुरुष गृहकार्यों, बच्चों के कार्यों में हाथ बंटाने में व्यस्त हैं, महिलायें नौकरी में या पार्टियों-किटी पार्टियों में व्यस्त हैं | आज नारी-पुरुष के साथ साथ सभी कार्यों के करने की बयार से उच्च कोटि के कला, साहित्य, वैचारिकता व संस्कृति/ सुसन्तति का निर्माण व प्रसार नहीं हो पारहा है |

स्त्री को भी यदि इन सब गृह आदि कार्यों से समय मिले तो वे भी महान रचनाएँ, शास्त्रों आदि का सृजन कर सकती हैं|

अर्थात पुरुष सभी गृह कार्यों का दायित्व स्वयं ले ले तो, परन्तु अभी तक क्या कोई उदाहरण है कि स्त्रियों ने पौराणिक काल, भूतकाल-इतिहास वर्त्तमान में कोई महान ग्रन्थ, शास्त्र, साहित्य, धर्म, दर्शन, चिंतन आदि पर ग्रन्थ लिखे हैं | स्त्रियों के ज्ञान, कर्म पराक्रम व कृतित्व से शास्त्र भरे पड़े हैं| विदुषियां हैं, हुई हैं, परन्तु मौलिक सोच, कृतित्व नहीं रहा | क्यों ? क्योंकि नारी माया है, माया रूप है, प्रकृति रूपा है, शक्ति है, कार्यकारी शक्ति जो जड़ होती है | सोच व कृतित्व में स्वतंत्र चिंतन नहीं, अपितु अकर्ता ब्रह्म-पुरुष की इच्छा-आज्ञा से ही कार्य में प्रवृत्त होती है | इसीलिये पुराकाल में कार्य-विभाजन हुआ जो स्त्री-पुरुष दोनों को स्वीकृत था |

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