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डॉ. श्याम गुप्त की कविताएँ

कवि ! गुनुगुनाओ आज.....

 
कवि ! गुनगुनाओ आज ,
एसा गीत कोई ।

बहने लगे रवि रश्मि से भी,
प्रीति की शीतल हवाएं ।
प्रेम के संगीत सुर को-
लगें कंटक गुनगुनाने |
द्वेष द्वंद्वों के ह्रदय को -
रागिनी के स्वर सुहाएँ.

वैर और विद्वेष को ,
भाने लगे प्रिय मीत कोई ||

अहं में जो स्वयं को
जकडे हुए |
काष्ठवत और लोष्ठ्वत
अकड़े खड़े |
पिघलकर -
नवनीत बन जाएँ सभी |

देश के दुश्मन, औ आतंकी यथा-
देश द्रोही और द्रोही-
राष्ट्र  और समाज के;
जोश में भर लगें
वे भी गुनगुनाने,
राष्ट्र भक्ति के वे -
शुचि सुन्दर  तराने |

आज अंतस में बसालें ,
सुहृद सी ऋजु नीति कोई ||



वे अकर्मी औ कुकर्मी जन सभी
लिप्त हैं जो-
अनय और अनीति में |
अनाचारों का तमस-
चहुँ ओर फैला ;
छागये घन क्षितिज पर अभिचार के |
धुंध फ़ैली, स्वार्थ, कुंठा, भ्रम
  तथा अज्ञान की |
ज्ञान का इक दीप
जल जाए सभी में |

सब अनय के भाव , बन जाएँ -
विनय की रीति कोई ||

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१. पीर ज़माने की.... ग़ज़ल --

उसमें घुसने की मुझको ही मनाही है |
दरो दीवार जो मैंने ही बनाई है |

मैं ही सज़दे के काबिल नहीं उसमें,
ईंट दर ईंट मस्जिद मैंने ही चिनाई है |

पुस्तक के पन्नों मे उसी का ज़िक्र नहीं ,
पन्नों पन्नों ढली वो बेनाम स्याही है |

लिख दिए हैं ग्रंथों पर किस किस के नाम,
अक्षर अक्षर तो कलम की लिखाई है |

2.बुरी आदत है ---- ग़ज़ल---

माना की हमें कदमों पे झुकने की बुरी आदत है

नक़्शे कदम पे गैरों के चलने की बुरी आदत है |


रही है अपनी मेधा हज़ारों साल तक बंधक,

माना की हमें गुलामी में रहने की बुरी आदत है |


सिर्फ एक यही वज़ह नहीं कि पिछलग्गू हैं हम,

अपनी संस्कृति को भूलने की बुरी आदत है |


अपनी प्राचीन दीवारों से सबक लेकर हमें,

नयी दीवारें खडी न करने की बुरी आदत है |


अपनी संस्कृति के चन्दन की सुगंध भूल,

मिलावटी गंध पे लुटने की बुरी आदत है |


बहुत खो चुके, अब तो समझें कि ज़िंदा कौम हैं हम,

जिसको देश की मिट्टी पे मिटने की बुरी आदत है |


दुनिया फिर चलेगी तेरे नक़्शे कदम पे श्याम,

तुझे नवसृजन के गीत गढ़ने की बुरी आदत है ||

गगनचुम्बी अटारियों पर  है सब की नज़र,
नींव के पत्थर की सदा किसको सुहाई है |

सज संवर के इठलाती तो हैं इमारतें, पर,
अनगढ़ पत्थरों की पीर नींव में समाई है |

वो दिल तो कोई दिल ही नहीं जिसमें,
भावों की नहीं बजती शहनाई  है |

इस सूरतो-रंग का क्या फ़ायदा श्याम,
जो मन नहीं पीर ज़माने की समाई है ||

.

कविता 8854581653147270971

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