समीक्षा // व्यवस्था में फैली विसंगतियों पर तीव्र प्रहार का दस्तावेज़ है `सठियाने की दहलीज पर`

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प्रदीप उपाध्याय के लेखन का सफ़र बहुत लंबा है. प्रदीपजी पिछले चार दशक से अधिक समय से व्यंग्य लिख रहे हैं. देश के विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रदीपजी के व्यंग्य रचनाएं निरंतर प्रकाशित हो रही हैं. लेखक का पहला व्यंग्य संग्रह `मौसमी भावनाएँ` वर्ष 2009 में प्रकाशित हुआ था. अब पहले व्यंग्य संग्रह के प्रकाशन के 9 वर्षों के पश्चात लेखक का दूसरा व्यंग्य संग्रह `सठियाने की दहलीज पर` प्रकाशित हुआ हैं. व्यंग्यकार ने इस संग्रह की रचनाओं में वर्तमान समय में व्यवस्था में फैली अव्यवस्थाओं, विसंगतियों, विकृतियों, विद्रूपताओं, खोखलेपन, पाखण्ड इत्यादि अनैतिक आचरणों को उजागर करके इन अनैतिक मानदंडों पर तीखे प्रहार किए हैं.

शीर्षक रचना `सठियाने की दहलीज पर` में व्यंग्यकार लिखते है कि जब सरकारी नौकरी में साठ वर्ष को आधार मानकर सेवानिवृत्त कर दिया जाता लेकिन राजनीति में कुछ लोग ताउम्र अपने को फिट मानते हैं. लेखक को लगता है कि जब तक सत्ता सुख व्यक्ति भोगता है तब तक उसके दिमाग़ में जंग नहीं लगती लेकिन जैसे ही वह व्यक्ति सत्ताच्यूत हो जाता है तो वह सठिया जाता हैं. `काबिल की काबिलियत का सम्मान` व्यंग्य में लोकतंत्र के एक प्रहरी की कारगुजारियों पर प्रश्न-चिन्ह लगाया गया हैं. यह व्यंग्य हमारे जनप्रतिनिधियों पर गहरा कटाक्ष हैं. व्यंग्य `आख़िर लौट रहे हैं बीते हुए दिन` में व्यंग्यकार कहते है `लाल डिब्बे भी अब पुरातत्व महत्व की वस्तु होने लगे हैं.` वर्तमान समय में पोस्ट आफ़िस की दुर्दशा और उसकी कार्यप्रणाली पर तीव्र प्रहार हैं. `लगे रहो मुन्ना भाई......` सोशल मीडिया और राजनीतिक पार्टियों पर गहरा कटाक्ष हैं. `आ अब लौट चलें!` ज्ञान की बात करने वाले नेताओं और मंत्रियों पर तीखा प्रहार हैं. `आओ मेहरबान-कदरदान कीमत चुकाओं` व्यंग्य में लेखक का मानना ही कि सरकार काला धन समाप्त करने के लिए जीतने भी प्रयत्न कर रही है उसमें ईमानदार लोगों को ही कीमत चुकानी पड़ रही हैं.

`आचार संहिता के उल्लंघन का प्रश्न` में प्रदीप जी लिखते है `खैर, व्यक्ति के जीवन में चुनावी आचार संहिता ही नहीं है, बहुतेरी आचार संहिताओं का पालन करने की बाध्यता रहती है किंतु चोरी छुपे कार्य करने और इन आचार संहिताओं के उल्लंघन करने का अपना ही अलग मज़ा है, आनंद है, अंदाज है. आप भले ही लगाम कसते रहो, उल्लंघन करने वाले तो उल्लंघन करके ही रहेंगे!` `क्या यही होती है रीढ़विहीनता की स्थिति` के व्यंग्य में लेखक की मान्यता है कि सरकारी कार्यालयों में हर कर्मचारी रीढ़ विहीन होता हैं. `क्यों न गर्व करें विश्व की राजधानी होने पर` में व्यंग्यकार ने स्वच्छता अभियान की पोल खोल कर रख दी हैं. `आनंद के लिए सहनशीलता विभाग!` में व्यंग्यकर लिखते है `प्रसन्नता को पाने के लिए क्यों न हम अपने यहाँ मिनिस्ट्री ऑफ हेप्पीनैस के साथ मिनिस्ट्री ऑफ टॉलरैन्स की भी स्थापना कर दें ताकि सरकारे आला की प्रसन्नता तो हर हाल में कायम रहे ही, रियाया भी सहनशील रहकर हर हाल में प्रसन्नता अर्थात आनंद की अनुभूति करे, फिर चाहे गेंग रेप हों, किसान आत्महत्या करें या फिर आमजन भूखों मरें.` लेखक के अनुसार क्याँ प्रतिदिन नये-नये विभाग खोलना और नई-नई योजनाएं बनाकर जनता के सामने प्रस्तुत करना ही लोकतंत्र में प्रमुख कार्य हैं? `लीकेजेस भी ज़रूरी हैं श्रीमान` में लेखक लिखते है `लीकेजेस तो यत्र-तत्र-सर्वत्र व्याप्त है किंतु हम किसी पर कोई ऊँगली नहीं उठाते है और मुन्ना भाई लोग डाक्टर, इंजीनियर बन जाते हैं. सुरक्षा व्यवस्थाओं में सेंध लग जाती है, गोपनीय सूचनाएं लीक हो जाती हैं.` व्यवस्था में फैली अव्यवस्थाओं पर तीखा प्रहार हैं.

अधिकांश लोग अज्ञान या साहस के अभाव में परिस्थितियों से समझौता कर लेते हैं. प्रदीप जी को जो बातें, विचार-व्यवहार असंगत लगते है वे उसी समय अपनी लेखनी से त्वरित व्यंग्य आलेखों के माध्यम से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक क्षेत्र से जुड़े सभी कर्णधारों को सचेत करते रहते है और पाठकों का ध्यान आकृष्ट कर उन्हें झकझोर कर रख देते हैं. `यथा नाम तथा गुण`, `अब कहाँ लाखों का सावन`, `उनके मानसिक स्वास्थ्य का बिगड़ जाना`, `कौन काटत है चुटिया भाई ...`, `खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचे`, दाग अच्छे हैं`, पापी पेट का सवाल है बाबा` जैसे व्यंग्य अपनी विविधता का अहसास कराते है और पढ़ने की जिज्ञासा को बढ़ाते हैं. वैसे व्यंग्य की राह बहुत कठिन और साहस का काम है लेकिन प्रदीप जी की लेखनी का नश्तर व्यवस्था में फैली विसंगतियों पर तीव्र प्रहार करता हैं. व्यंग्य लेखन में प्रदीप जी की सक्रियता और प्रभाव व्यापक हैं.

व्यंग्यकार ने इस संग्रह में व्यवस्था में मौजूद हर वृत्ति पर कटाक्ष किए हैं. सामान्य लोगों और विशिष्ट लोगों के लिए अलग-अलग नियम, जो सरकारी विभाग, संस्थान जिस कार्य के लिए बने थे उनसे अन्य कार्य करवाना, भ्रष्टाचार, कुर्सी-पूजा, चापलूसी, शिक्षकों का अपमान, स्मार्ट फ़ोन रूपी नया नशा, डैमेज कन्ट्रोल, मार्गों के नामकरण में राजनीति, अलग-अलग मज़हब के लिए अलग-अलग नियम-क़ायदें, नेताओं-मंत्रियों द्वारा बिना विचार किए कुछ भी बयान देना, आज की व्यवस्था में परेशान सिर्फ़ ईमानदार है, क़ानून बनाने वालों द्वारा ही क़ानून की धज्जियाँ उड़ाना, दिमागी कूड़ा-करकट, काम कम और प्रदर्शन अधिक, जुगाड़ की महिमा, सिर्फ़ प्रमाणपत्र ही विकास और हैपीनैस का आधार, लोकतंत्र में दागदार छवि की महत्ता, ग़रीब और ग़रीबी की परिभाषा, नेतागिरी का जन्मजात गुण, पढ़ाई-लिखाई से अनुभवों का अधिक महत्व, आरोप-प्रत्यारोप, स्कूल मिड डे मील, अभिव्यक्ति की आज़ादी, अनुशासन, व्यवस्था में लीकेजेस इन सब विषयों पर व्यंग्यकार ने अपनी कलम चलाई हैं.

व्यंग्यकार प्रदीप उपाध्याय ने अपनी सहज लेखन शैली से गहरी बात सामर्थ्य के साथ व्यक्त की हैं. संग्रह की विभिन्न रचनाओं की भाषा, विचार और अभिव्यक्ति की शैली वैविध्यतापूर्ण हैं. इस व्यंग्य संग्रह में अधिकांश व्यंग्य सामयिक घटनाओं पर आधारित हैं. इस पुस्तक की सभी रचनाएं पाठकों को वर्तमान विसंगतियों पर सोचने को मजबूर कर देती हैं. संग्रह की रचनाएं पाठकों के दिलों को छू लेती हैं. यह व्यंग्य का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ है. इसके लिए प्रदीप जी बधाई पात्र हैं. हिन्दी साहित्य के पाठक इस पुस्तक का भरपूर स्वागत करेंगे ऐसी आशा हैं.

पुस्तक : सठियाने की दहलीज पर

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लेखक : डा. प्रदीप उपाध्याय

प्रकाशक : नोशन प्रेस, पुराना .38, नया .6, मेकनिकोलस रोड, चेटपेट, चेन्नई - 600 031

मूल्य : 195 रूपए

पेज : 185

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दीपक गिरकर

समीक्षक

28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,

इंदौर- 452016


मेल आईडी : deepakgirkar2016@gmail.com

दिनांक : 11.04.2018

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