आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : अध्याय 1 - आध्यात्मिकता : प्रारंभिक अन्वेषण - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे

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आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय

लेखक

डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास

भाषांतर

हर्षद दवे

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प्रस्तावना


अध्याय : १

आध्यात्मिकता : प्रारंभिक अन्वेषण

कुछ वर्ष पहले मैं इक अन्तर्राष्ट्रीय शैक्षिक सम्मलेन में गया था. उसमें विश्व के कोने कोने से बहुत सारे बिजनेस कालेज के डिन आए हुए थे. वॉल स्ट्रीट में (अमरिकन शेयर बाजार में) और उसके प्रभाव से हर जगह जो निंदात्मक घपले हुए उनके बारे में मैंने अपने साथिओं से कहा कि इन संस्थानों के व्यवस्थापकों के दुराचार के लिए कुछ हद तक हम सब जिम्मेवार हैं इस बात का हमें स्वीकार करना चाहिए. क्यों कि इन संस्थानों के अधिकतर लोगों के पास बिजनेस डिग्रीयां हैं और वे हमारे भूतपूर्व छात्र थे. मैंने आग्रहपूर्वक यह कहा कि हमें बिजनेस के पाठ्यक्रम पर अधिक ध्यान देना चाहिए. वे सहमत हुए. मैंने आग्रह के साथ यह भी कहा कि हमें 'संस्थानों में आध्यात्मिकता' विषयक कोर्स को पाठ्यक्रम में सम्मिलित करना चाहिए.

यद्यपि, उसमें एक समस्या थी. मैनेजमेंट के शैक्षिक संस्थानों में विशेष रूप से आध्यात्मिकता का विषय सिखाया जा सके ऐसा कोई शैक्षिक अनुसन्धान नहीं हुआ था. और उस विषय के सन्दर्भ में अधिकतर लेख छुट-पुट बिखरे हुए थे. इसलिए सम्पूर्ण जानकारी नहीं मिल पाती थी कि जिसके आधार पर पाठ्यक्रम निर्धारित किया जा सके. इसके आलावा बिजनेस अध्यापकों की ओर से 'आध्यात्मिकता' शब्द के लिए भी विरोध था, क्यों कि उनकी मान्यता के अनुसार उस में ईश्वर या धर्म जैसे खयालों का समावेश होता था, और यूनिवर्सिटी के नियम के अनुसार वर्ग में उन के बारे में विचार-विनिमय नहीं हो सकता.

मैंने अपने साथी मित्रों को बताया कि मेरे यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ करोलाइना, एकन के स्कूल ऑफ बिजनेस कालेज के डिन के पद से सेवानिवृत्त होने में एक ही महिना शेष रह गया है. और इस के बाद मैं अपना समय व शक्ति इसी विषय के लिए ही समर्पित करनेवाला हूँ. आध्यात्मिकता में गहरी अंतर्दृष्टि विकसित करने की बात को मैंने एक चुनौती के रूप में लिया है; उसमें पांडित्यपूर्ण लेख पर आधारित परिभाषाएँ प्रस्तुत करना, उस विषय को 'धर्म' की परिभाषा से अलग करते हुए समझाना एवं इसी विषय पर पूर्व और पश्चिम के विद्वानों के लेख व तत्संबंधित व्यावहारिक जानकारी का समन्वय करना इत्यादि बातों का समावेश होता था.

पिछले कुछ वर्षों का मेरा अनुसन्धान यह दर्शाता है कि अपने रोजमर्रा के कार्यों में आध्यात्मिकता के सकारात्मक पहलूओं के बारे में कंपनियां अच्छीखासी दिलचस्पी लेने लगीं हैं. वास्तव में इस दिलचस्पी के कारण बिजनेस कालेजों पर 'व्यवसाय में आध्यात्मिकता' विषयक पाठ्यक्रम (कोर्स) तैयार करने और उसे शैक्षणिक संस्थानों में अभ्यास के एक विषय के रूप में सम्मिलित करने के लिए कुछ दबाव उत्पन्न हुआ है.

इस प्रकार सहसा लोगों में आध्यात्मिक जागरूकता उत्पन्न होने का क्या कारण है? इस दिशा में जांच करनेवाले लोग इस के कुछ महत्वपूर्ण कारण दर्शाते हैं. संस्थान अपनी लागत कम करने के लिए बहुत सारे कर्मचारियों की छंटनी कर देते हैं, नतीजन शेष कर्मचारीयों पर कार्यबोज बढ़ जाता है और वे बहुत थक जाते हैं. उन्हें मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है और उनकी सर्जनात्मकता भी कम हो जाती है. इस के साथ यह बात भी उतनी ही सही है कि आधुनिक व्यापार विश्वव्यापी हो चला है, अतः कइ विदेशी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धात्मकता बनाए रखने के लिए और अपना अस्तित्व बचाने के लिए प्रत्येक कंपनी को अधिक से अधिक सर्जनात्मक बने रहेना अनिवार्य सा हो गया है.

२१ वीं शताब्दी में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कंपनिओं को चाहिए कि वे अपने कर्मचारीगण के लिए अधिक अर्थपूर्ण और हेतुपूर्ण समजदारी विकसित करें. वर्तमान गलाकाटू प्रतिस्पर्धा में अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए श्रेष्ठ निपुणता और योग्यता रखनेवाले लोग ऐसी कंपनी पसंद करने लगे हैं कि जो उनके आतंरिक मूल्य को समझे एवं उनको व्यक्तिगत विकास और अन्य लोगों की सेवा करने के सुअवसर प्रदान करें. वे केवल तगड़ा वेतन देनेवाली कंपनी में जाना पसंद नहीं करेंगे. आजकल सभी कर्मचारी चाहते हैं कि कार्य करने में उनकी सम्पूर्ण क्षमता और निपुणता का उपयोग हो. इसलिए आजकल संस्थानों में व्यक्ति की पूरी कार्यशक्ति और मूल्यों की अगत्यता पर अधिक जोर दिया जाता है. श्रेष्ठ कार्य निष्पादन के लिए केवल बौद्धिक क्षमता ही नहीं, किन्तु अब संस्थानों में भावनाएं और आध्यात्मिक मूल्य व संवेदनशीलता का उपयोग करने पर भी सोच-विचार होने लगा है.

कर्मचारिओं में आध्यात्मिकता के प्रति दिलचस्पी उत्पन्न होने का दूसरा कारण विज्ञान के स्वास्थ्य से संबंधित अन्य अनुसंधान (संशोधन) हैं जो दर्शाते हैं कि स्वास्थ्य और आध्यात्मिकता एकदूसरे के साथ जुड़े हुए हैं.

रोगप्रतिकारक आविष्कारों ने इस बात का समर्थन किया है कि ध्यान मानसिक तनाव के प्रभाव को कम करता है और राहत देता है और इससे स्वास्थ्य बनाए रखने का व्यय भी कम होता है. संस्थानों के बेहद तनाव का अनुभव करनेवाले कई लोगों को इन प्रयासों से लाभ हुआ है. मन को शांत करने से अपने भीतर झांकने में भी सरलता होती है. इस प्रकार के आध्यात्मिक प्रशिक्षण के द्वारा प्राप्त स्वस्थ मन की शक्ति का प्रयोग अपने संस्थानों के विकास के लिए किया जा सकता है.

आध्यात्मिकता की लोकप्रियता बढ़ने का एक और कारण यह भी है कि इस समय कम्पनिओं में महिला कर्मचारियों की संख्या पहले से कई गुना बढ़ गई है और आम तौर पर आध्यात्मिक मूल्यों के प्रति महिला कर्मचारियों का रवैया कंपनी के पुरुष सह्कर्मचारिओं से अधिक केन्द्रित होता है. अमरिका में आजकल वृद्धों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है, आध्यात्मिकता के प्रति उन की दिलचस्पी भी बढ़ रही है क्योंकि वे केवल भौतिकता अथवा सांसारिक बातों से संतुष्ट नहीं है. उन को अपनी मृत्यु का डर सताता है जिस से वे अपने कार्य के प्रति लगाव नहीं रख पाते हैं. उनका विश्वास है कि आध्यात्मिकता उन्हें ऐसी स्थिति से उबार सकती है.

आध्यात्मिक मूल्यों को मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में प्रयुक्त करने से व्यापार में भी बहुत सकारात्मक असर पड़ता है. अमरिका से व्यापारिक विषय पर प्रकाशित एक पत्रिका दर्शाती है कि ९५ प्रतिशत अमरिकन ऐसा मानते हैं कि व्यापारिक संस्थानों का आशय केवल पैसे कमाने का नहीं है. अमरीका के ३९ प्रतिशत निवेशक ऐसा कहते हैं कि वे किसी भी कंपनी में निवेश करने से पहले कंपनी के मूल्यों को और उस की नीतिमत्ता को देखते हैं. प्रति चार में से तीन ग्राहकों का कहना है कि यदि कीमत एवं मात्रा एक ही सामान हो तो वे उन कंपनियों को पसंद करते हैं जिस कंपनी का हेतु उच्च हो. इस पत्रिका में यह भी लिखा है कि व्यापारिक संस्थानों में आध्यात्मिकता का अच्छा खासा विकास हो रहा है. अमरीका की जानीमानी यूनिवर्सिटी के दो अध्यापकों ने कई संस्थानों के संचालकों से विभिन्न संस्थानों में आध्यात्मिकता का विकास किस प्रकार से किया जाना चाहिए उस विषय पर सुझाव आमंत्रित किये थे. इन से प्राप्त सारे सुझावों का सार दर्शाते हुए वे कहते हैं कि, कर्मचारिओं के साथ अनुचित व्यवहार किये बिना या उन के प्रति क्रोध रहित रहकर आध्यात्मिकता का पालन कैसे किया जा सकता है यह जानने के लिए संस्थानों के संचालक अब उत्सुकता दर्शाते हैं. उनका ऐसा दृढ़ विश्वास हैं कि जब तक संस्थान व्यक्ति की क्षमता का पूर्ण रूप से उपयोग करना नहीं सीखेगा और प्रत्येक व्यक्ति में रही अपार आध्यात्मिक शक्ति का उपयोग कैसे किया जा सकता है यह नहीं समझेगा तब तक वे उच्च कक्षा की गुणात्मकता रखनेवाली वस्तु या सेवा प्रदान नहीं कर सकते.

संस्थानों में आध्यात्मिकता का प्रसार करने में दो प्रकार के अवरोध सामने आते हैं:

१) वर्तमान शिक्षित कर्मचारिओं में आध्यात्मिक उत्कंठा अधिक है और वे मालिकाना भाव जता कर कर्मचारिओं को नियंत्रित करने में विश्वास रखनेवाले संस्थानों के संचालकों से संतुष्ट नहीं हैं.

२) टेक्नोलोजी का यंत्रवत कार्य करने का एक सा तरीका कि जिसमें कर्मचारिओं को एकदूसरे के साथ बात करने के अवसर अत्यंत कम होते जा रहे हैं, इस विषय को ले कर वे चिंतित हो रहे हैं.

बहुत पहले लोगों की सोच ऐसी थी कि आध्यात्मिकता की साधना करने के लिए व्यक्ति को सबकुछ छोड़ कर किसी वन में या पर्वत पर चले जाना चाहिए. किन्तु आज हमें समाज में रहते हुए आध्यात्मिकता की साधना करने की आवश्यकता है. इस समय हमारा यह समझना अधिक महत्वपूर्ण है कि जहाँ हम प्रतिदिन अपना काम करते हैं उससे संबंधित प्रमुख बातों की जटिलता के सन्दर्भ में आध्यात्मिकता हमें किस प्रकार से सहायता कर सकती है.

मुझे लगता है कि कोई भी निर्णय लेने से पहले हमें रोटरी क्लब के द्वारा व्यावहारिक आध्यात्मिकता की आधारशिला के रूप में सूचित किए गए चार प्रश्नों के बारे में अच्छे से जाँच कर लेनी चाहिए:

"हम जो कुछ भी सोचते हैं, कहते हैं और करते हैं...

१. क्या वह सही है?

२. क्या हमारा निर्णय उससे प्रभावित सभी लोगों के लिए योग्य है?

३. क्या उस से सदभाव व अधिक अच्छे मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित होंगे?

४. क्या हमारा निर्णय लोगों के लिए श्रेयस्कर होगा?"

यदि समाज को अच्छा बनाना है तो यह नैतिक और आध्यात्मिक लोगों के द्वारा ही संभव है जो सदैव दूसरों को मदद करने की भावना रखते हैं. किसीने कहा है कि जिन के पास खाने के लिए अन्न नहीं उन के लिए प्रार्थना करना अच्छी बात है परन्तु अन्न प्राप्त कर के उसमें से उन्हें हिस्सा देना ज्यादा अच्छी बात है. उससे भी अधिक अच्छा यह है कि उन्हें अन्न प्राप्त करने का तरीका सिखा कर ऐसे विक्सित किया जाए कि वे हमेशा अन्न प्राप्त कर सकें.

प्रत्येक मनुष्य वस्तु तथा सेवा का उत्पादक या ग्राहक बन सकता है. गरीबी का सर्जन समाज करता है, यह प्रकृतिदत्त अनिवार्यता नहीं है. वर्तमान टेक्नोलोजी का प्रसार सब के लिए समृद्धि की सम्भावनाओं के द्वार खोलता है. किन्तु जो समृद्धि उच्च आध्यात्मिक मूल्यों से प्रेरित नहीं है ऐसी संभावना हकीकत नहीं बन सकती. तब व्यक्ति के सामने बजाय समृद्धि, लोभ और लालसा आ जाते हैं.

आध्यात्मिकता में दिलचस्पी रखनेवाले संस्थानों के लिए अपने व्यवसाय की वृद्धि करने का श्रेष्ठ उपाय है इस विषय में आध्यात्मिकता द्वारा मार्गदर्शन पाना. ऐसे संस्थान अपनी समृद्धि समाज के पिछड़े हुए लोगों में बाँट सकते हैं. जो लोग आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहते हैं उन्हें प्रशिक्षण देने से वे भी इस समृद्धि के जरिये और भी विपुल समृद्धि का सृजन कर सकते हैं. भले ही यह बात आदर्शवादी कल्पना सी लगे, परन्तु यह ऐसी नहीं. यह अलग प्रकार की विचारधारा है जो अभाव बढाने में नहीं अपितु समृद्धि बढ़ाने में विश्वास रखती है.

v त्रिविध ध्येय:

इस समय विश्व के सारे व्यावसायिक क्षेत्रों में आध्यात्मिक और नैतिक मूल्यों को समाविष्ट करने की बात हो रही है. व्यवसाय में व्यस्त कई लोग अब केवल मुनाफे को ही अपना एकमेव ध्येय नहीं मानते. इस के स्थान पर वे 'त्रिविध ध्येय' की सोच पसंद करने लगे हैं, उस का स्वागत करने लगे हैं.

वे ये तीन 'पी' के नियम को ध्यान में रखना पसंद करते हैं: लोग (पीपल), पृथ्वी (प्लैनिट) और मुनाफा (प्रॉफिट).

अब कर्मचारिओं को और पर्यावरण को संपत्ति के समकक्ष महत्वपूर्ण माना जाता है. अमरिकन शेयर बाजार के वर्ष २००० के बाद के घपले और २००८-२००९ के अन्य घपलों के पश्चात् विश्व में जीवन के मूल्य और अच्छे आचरण के बारे में लोग विशेष रूप से चिंतित होने लगे हैं. धर्म अपने नियमों का आग्रह रखता है जब कि आध्यात्मिकता जीवन में अच्छे मूल्यों का पालन कैसे किया जा सकता है इस बात का आग्रह रखती है. नैतिक पूर्णता, प्रामाणिकता, जिम्मेवारी, विशेषता, सहकार, दूसरों की सेवा करना, विश्वसनीय विचारधारा, न्यायप्रियता, करुणा इत्यादि व्यवसाय के सन्दर्भ में महत्वपूर्व मूल्य हैं. उदहारण के रूप में: एक सुप्रसिद्ध संस्थान अपने कर्मचारियों से कहता है कि- 'ग्राहकों की मुश्किलें दूर करने के लिए और उन्हें सहायक बनने के लिए वे नैतिक रूप से बाध्य हैं. केवल लोगों को चीजें बेचना ही आपका कार्य नहीं है.'

क्या आध्यात्मिकता और मुनाफा एकदूसरे के विरुद्ध में हैं? नहीं. इस दिशा में किए गए संशोधनों से पता चलता है कि आध्यात्मिक मूल्यों को संस्थानों के व्यवहारों में समाविष्ट करने से उत्पादन में वृद्धि हो सकती है और मुनाफा भी बढ़ सकता है क्यों कि इससे कर्मचारिओं के आत्मगौरव के साथ साथ ग्राहकों की वफ़ादारी में भी वृद्धि होती है और संस्थानों का व्यवसाय भी विकसित होता है. वफ़ादारी की भावना में वृद्धि करने के लिए और आत्मश्रद्धा बढाने के लिए अधिक से अधिक कर्मचारी आध्यात्मिकता के प्रति सकारात्मक होते जा रहे हैं. ओस्ट्रेलिया की एक कंपनी अपने कर्मचारिओं के लिए आध्यात्मिक विचारधारा का उपयोग करती है, इससे कंपनी के उत्पादन में वृद्धि हुई है और कर्मचारिओं के नौकरी छोड़ कर चले जाने के किस्सों में काफी गिरावट आई है.

अब अपने कर्मचारियों को संस्थान की प्रमुख संपत्ति के रूप में माना जाता है और उनके विचारों का आदर किया जाने लगा है. अमरीका के कुछ विद्वानों का मानना है कि संस्थान यदि स्पर्धा में सफलता पाना चाहता है तो उसे आधात्मिकता का सहारा लेना ही पड़ेगा.

व्यापार विश्व में आध्यात्मिकता ऐसे आशाजनक संकेत दर्शाती है कि इस समय संसार के सब से अधिक सामर्थ्यवान संस्थानों का भी भीतर से कायापलट हो रहा है. कर्मचारीवर्ग अब संस्थानों को अपने मूल्यों को सिद्ध करने के स्थान के रूप में देखने लगे हैं. मुझे लगता है कि संस्थानों के ध्येयों को सिद्ध करने के लिए आध्यात्मिकता दीर्घकाल तक आवश्यक बनी रहेगी.

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 आध्यात्मिकता : मेरी निजी यात्रा:

उपर्युक्त जानकारी के सन्दर्भ में यह अच्छी बात है कि अब व्यवसायिक संस्थानों और शिक्षा में आध्यात्मिकता का प्रवेश होने लगा है. अब तक आध्यात्मिकता के विषय में मैंने बहुत अभ्यास किया है और कई मूल्यवान शोध-निबंध एवं साहित्य का भी बहुत अभ्यास किया है. इस विषय पर स्नो बर्ड, उटाह में (नवम्बर, १९९४) में आयोजित पांच दिवसीय सेमिनार में, जहाँ मैं उपस्थित था, डॉ. स्टिवन कवि ने अपनी पुस्तक 'दि एइटथ हेबिट फ्रॉम इफेक्टिवनेस टु ग्रेटनेस' पर आध्यात्मिकता के बहुत सारे पहलुओं के बारे में कहा है जिन में अपनी अंतरात्मा की आवाज को समझना, पूर्ण व्यक्ति बनने के लिए आध्यात्मिक अंक (स्पिरिच्युअल अंक = एसक्यू) को बढाना और परस्पर सम्बंधित रहने की आवश्यकता इत्यादि का समावेश होता है. मैंने वेईन डायर के आध्यात्मिकता से सम्बंधित संशोधन का भी अभ्यास किया है और टेलीविजन पर उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए भाषणों को भी सुना है.

आध्यात्मिकता से संबंधित मेरे अभ्यास में निम्नानुसार बातों का समावेश होता है:

१. मैंने इटली में असीसी से भेंट की और सेंट फ्रांसिस के आध्यात्मिक बोध का अध्ययन किया.

२. मैंने इजरायल में हाइफा से भेंट की और बहाई धार्मिक श्रद्धा से संबंधित बोध का अध्ययन किया.

३. आध्यात्मिकता के बारे में इस्लाम का नज़रिया समझने के लिए मैंने सूफी कवि रूमी और कवि खलील जिब्रान के आध्यात्मिक आलेखों का अध्ययन किया. इस्लाम के नियमों की अधिक जानकारी हेतु मैंने बहरीन की [मिडल ईस्ट] एक प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी में बतौर प्रोफ़ेसर पांच वर्ष बिताए.

४. आध्यात्मिक शक्ति को समझने के प्रयास में मैंने भीषण संहार से बचे हुए और उस से पीड़ित लोगों के बारे में लेख पढ़े.

५. पतंजलि, श्रीरामकृष्ण, रमण महर्षि, शंकराचार्य और श्री अरविन्द जैसे भारतीय आध्यात्मिक विद्वानों के बोध का मैंने अभ्यास किया. नेपाळ में पोखरा यूनिवर्सिटी के 'फूलब्राईट कंसल्टंट' के रूप में मैंने छ: सप्ताह बिताए. उस दौरान भगवान बुद्ध के बोध को समझने के लिए मैंने नेपाळ स्थित लुम्बिनी का दौरा किया. मैंने कुछ दिन हिज हाइनेस दलाई लामा के प्रवर्तमान निवासस्थान धरमशाला में कुछ दिन बिताए और आध्यात्मिकता विषयक उनके सन्देश का अध्ययन, मनन किया. मैंने भारत के इगतपुरी में विपश्यना की १० दिनों की शिविर में भी भाग लिया. विपश्यना बौद्ध धर्म का ऐसा अभिगम है जो मन को शांति प्रदान करता है. इसमें दस दिनों तक सम्पूर्ण रूप से मौन रहते हुए साधना की जाती है और ध्यान के कार्यक्रम का निरन्तर अनुपालन करना होता है. भारत में ऋषिकेश में वेदांत की आध्यात्मिकता के बारे में १० दिनों के सेमिनार में भी मैं शामिल हुआ था. यह वेदांत में प्राचीन जीवनदृष्टि का गहन तत्वज्ञान है.

२० वीं शताब्दी के आध्यात्मिकता के सुविख्यात विद्वान् श्री अरविन्द के आध्यात्मिक उपदेश का अभ्यास करने के लिए मैं पोंडिचेरी स्थित उन के आश्रम में दो सप्ताह रहा हूँ. आध्यात्मिकता के विषय में रमण महर्षि का उपदेश ग्रहण करने के लिए मैं कुछ दिनों के लिए पोंडिचेरी के पास ही स्थित रमण महर्षि के आश्रम में भी गया था.

आध्यात्मिकता के संबंध में पश्चिम के विद्वानों के उपदेश एवं लेखों का मैंने भलीभांति अध्ययन किया है और उन्हें ठीक से समझा हूँ. इटली में असीसी के और इजरायल में हाइफा के दौरे अत्यंत समृद्ध करने वाले थे. जैसा कि मैंने पहले कहा, मैंने डॉ. स्टिवन कवि (दि एइटथ हैबिट : फ्रॉम इफेक्टिवनेस टू ग्रेटनेस), डॉ. वेइन डायर और पश्चिम के अन्य कुछ विद्वानों के आध्यात्मिकता से संबंधित लेखों का अच्छे से सोच-समझकर अध्ययन किया.

मैंने आध्यात्मिकता से संबंधित विपुल साहित्य का संकलन और अध्ययन किया है. इस संकलन में सारे धर्मों के विद्वानों के विचार दीए गए हैं. इस के अतिरिक्त इस में व्यावसायिक सलाहकार व शिक्षण जगत के विद्वानों के विचारों को भी समाविष्ट किया गया है. पिछले छ: वर्षों के दौरान मैंने आध्यात्मिकता के विशेषज्ञ माने जाते कई लोगों से साक्षात्कार भी किया है, जिन में शिक्षाविद, धर्मगुरु, विविध संस्कृतियों के विद्यार्थी और साहित्य क्षेत्र से जुड़े यशस्वी कवि व लेखक, वैज्ञानिक एवं अन्य बहुत से क्षेत्रों के नामी संशोधनकर्ता और अध्ययनशील लोगों का समावेश होता है. यह कार्य अच्छी खासी मेहनत का होने पर भी, सब से अधिक आनंददायक और संतोष प्रदान करनेवाला बन गया है. इस पुस्तक के अगले अध्यायों में आध्यात्मिकता से संबंधित बहुत सारी बातों को उजागर किया गया है.

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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