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आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : प्रस्तावना - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे

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आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय लेखक डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास भाषांतर हर्षद दवे आध्यात्मिकता के द्वारा एकता एवं समन्वय लेखक परिचय डॉ. निरंजन...

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आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय

लेखक

डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास

भाषांतर

हर्षद दवे

आध्यात्मिकता के द्वारा एकता एवं समन्वय

लेखक परिचय

डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास:

बी.ई.(B.A.) इलेक्ट्रिकल एंजीनियरिंग, मुंबई यूनिवर्सिटी.

एम.बी.ए.(M.B.A.) क्लीवलैंड स्टेट यूनिवर्सिटी, यु.एस.ए.

पी.एच.डी.(Ph.D.) साउथ केरोलाइना यूनिवर्सिटी, यु.एस.ए.

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आदरणीय निरंजनभाई उत्तर अमरीका, योरप और भारत की अंतरराष्ट्रिय कंपनिओं में उच्च स्थान पर प्रबंधक के रूप में २७ वर्षों तक कार्यरत रहे हैं और आपने प्रचुर अनुभव प्राप्त किया है. पिछले १५ वर्षों में आपने साउथ केरोलाइना (एकन) यूनिवर्सिटी में प्राध्यापक के रूप में सेवा प्रदान की है. उन में जुलाई २००३ में सेवा निवृत्त होने से पूर्व के नौ वर्षों तक आप बिजनेस स्कूल के अध्यक्ष रहे. अपने उस समय के कार्यकाल में आपने बिजनेस स्कूल के लिए अमरीकी सरकार से ५० लाख डॉलर का अनुदान प्राप्त किया था. इस अनुदान का प्रयोजन इसी अणुवैज्ञानिकों को लघु उद्योग के विषय में प्रारंभिक मार्गदर्शन करने का था. इस के लिए डॉ. व्यास अपने साथी प्राध्यापकों के साथ रूस की यात्रा पर गए थे और तत्पाश्चत रूस के वैज्ञानिक अधिक प्रशिक्षण हेतु अमरीका, आप के बिजनेस स्कूल में आए थे.

डॉ.व्यास ने अंतरराष्ट्रीय कंपनिओं के बिजनेस के लिए और बाद में शैक्षिक सभाओं में प्रवचन के लिए देश-विदेश में भ्रमण किया है. आप ने बिजनेस के विषय में ३१ शोध-निबंध प्रस्तुत किये हैं और मार्केटिंग से संबंधित एक पुस्तक के सह-लेखक भी रहे हैं. अमरीका के सुप्रसिद्ध फूलब्राईट (Fulbright) कमीशन के द्वारा 'विद्वान प्राध्यापक' के प्रमाणपत्र के अंतर्गत २००४ में कठमंडू यूनिवर्सिटी में छः महिने के लिए आपकी नियुक्ति की गई थी. उस दौरान आपने एम.बी.ए. (M.B.A.) के छात्रों को पढ़ाया था. २००५ में फूलब्राईट कमीशन ने आप को नेपाल की पोखरा यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ सलाहकार के रूप में फिर से भेजे गए थे.

२००७ से २०११ तक आपने बहरीन की आहलिया यूनिवर्सिटी में अतिथि प्राध्यापक के रूप में कार्य किया था. उस दौरान आपने इस यूनिवर्सिटी के प्रमुख के प्लैनिंग और डिवेलपमेंट (Planning & Development) के लिए सलाहकार के रूप में भी सेवाएँ प्रदान की थीं. आहलिया यूनिवर्सिटी की पांच वर्ष की योजना की आयोजन समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए उसके प्रकाशन करवाने में भी आपने महत्वपूर्ण सहयोग दिया था. २०१० में डॉ. व्यास को जोर्डन के मुख्य शहर अमान (Aman) स्थित क्विन रानिया आन्त्रप्रेन्यरशिप केन्द्र में (Queen Rania Center for Entrepreneurship) स्ट्रेटिजिक प्लैनिंग के विषय का संचालन करने के लिए आमंत्रित किया गया था. २००९ में आप को दोहा (Doha), क़तार (Qatar) में संस्थान किस प्रकार से परिवर्तनशील बने रह सकते हैं (Managing Change) इस विषय पर चार दिवसीय शिविर का संचालन किया था. २००८ में बहरीन के अमरीकी विद्याकेन्द्र में 'पाठ्यपुस्तकों के उपरांत शिक्षा कैसे प्राप्त की जा सकती है?' इस विषय पर आपने भाषण दिया था.

डॉ. व्यास योरप, अमरीका, भारत एवं नेपाल के व्यापारिक संस्थानों में सलाहकार के रूप में सेवा प्रदान करते हैं. वर्तमान अनुसंधान के आपके विषय हैं: 'संस्थाकीय इमानदारी की वर्धमान आवश्यकता,' पर्यावरण को हानिकारक न हों ऐसे विद्युत व उत्पादन के अन्य उपकरण', और 'संस्थानों में आध्यात्मिकता का विकास.' आपने भिन्न भिन्न परिषदों में इन विषयों पर अपने वक्तव्य प्रस्तुत किये हैं. आप अंतरराष्ट्रिय सेवा संस्थान रोटरी क्लब के सदस्य हैं और आप रोटरी क्लब की सहकारी प्रवृत्तियों में महत्वपूर्ण सहयोग दे रहे हैं.

इस के उपरांत भारतीय संस्कृति और भगवान श्री स्वामीनारायण के सर्व जीव हितकारी सन्देश का समूचे विष में प्रचार-प्रसार कर रहे परम पूज्य गुरुवारी शाश्त्री श्री माधवप्रियदासजी स्वामी के साथ आप ह्रदय से जुड़े हुए हैं और पिछले पचीस वर्षों से एसजीवीपी (SGVP) के द्वारा निरंतर चल रही सेवाकीय प्रवृत्तियों में अपना योगदान दे रहे हैं.

- साधु यज्ञवल्लभदास,

एसजीवीपी, अमदावाद.

प्रस्तावना

मानवजात के इतिहास में धर्म के नाम पर सब से अधिक रक्तरंजित युद्ध हुए हैं. आज भी विश्व में ऐसे युद्ध निरंतर हो रहे हैं, और इस का अंत कहीं नजर नहीं आ रहा है. जब हम शांत चित्त से इस भीषण रक्तपात के बारे में सोच-विचार करते हैं तब यह बात हमारे ह्रदय को अत्यंत वेदना से भर देती है. और हमारे चित्त में विक्षोभ उत्पन्न करती है. मन में प्रश्न उठता है कि ऐसा कैसे हो सकता है, यह भी धर्म के नाम पर?

इन के कारणों को जांचने से पता चलता है कि इस रक्तरंजित युद्धों के मूल में हैं लोगों की धार्मिक मान्यताओं को आदरभाव से न देखने की असहिष्णुता और धर्मान्धता. इस के अलावा कुछ देशों के शासक भी ऐसी धर्मान्धता को बढ़ावा देते हैं. कतिपय हठधर्मी लोग जो अपने आप को धार्मिक मानते हैं वे धर्मग्रंथों में लिखी हुई बातों के संकुचित व गलत अर्थ घटाते हुए असहिष्णुता के जहरीले बिज बोते रहते हैं.

आध्यात्मिकता हमें एकता और समन्वय की ओर ले जाती है, यह जीवन का उद्देश्य और उस के मूल्यों को अच्छी तरह से समझने में सहायक बनाती है और आतंरिक शांति व स्वस्थता प्राप्त करने की दिशा भी दर्शाती है. कुछ लोग आध्यात्मिकता को निजी बात मानते हैं और उसे परम शक्ति की अखंडता की अनुभूति पाने का साधन बनाते हैं.

इस ग्रन्थ का प्रारंभिक प्रकरण आध्यात्मिकता की व्याख्या करता है और धर्म और आध्यात्मिकता के बीच का अंतर स्पष्ट करता है, चूंकि कई लोगों का ऐसा मानना है कि आध्यात्मिकता और धर्म एक ही है. यद्यपि प्रकरण ३ में दर्शाए गए विश्व के कई धर्मों में लोगों की विभिन्न मान्यताओं से पता चलता है कि सारे धर्मों में आध्यात्मिकता के तत्वों का अस्तित्व मौजूद है. किंतु धर्म एक ऐसी संस्था है कि जिस के अटल नियमों का पालन करना उस धर्म में विश्वास रखनेवालों के लिए आवश्यक है. आम तौर पर धर्मों के लिखित सिद्धांतों के प्रति संदेह करने की या उन्हें चुनौती देने की अनुमति किसी भी व्यक्ति को नहीं दी जाती. परंतु आजकल कई लोगों को ऐसा लगता है कि ऐसे अटल धार्मिक नियम जड़ और प्रतिबंधक हैं. आज बहुत सारे लोग ऐसी स्थिति से मुक्त होने के लिए आंदोलन कर रहे हैं, क्योंकि उनका ऐसा मानना हैं कि आध्यात्मिकता आदमी को संकीर्ण धार्मिक नियमों के विषय में स्वतन्त्र रूप से, अपने हिसाब से सोचने का अवसर प्रदान कराती है और जीवन की मूलभूत और गहन समस्याओं की सही समझ प्राप्त करने की प्रेरणा देती है.

पश्चिम की संस्कृति ने विज्ञान और टेक्नोलोजी के क्षेत्र में बहुत प्रगति की है, परंतु भौतिक और आध्यात्मिक विषयों के बीच कैसा संबंध है इस विषय पर उतनी ही मात्रा में प्रगति नहीं हो पाई.

वैज्ञानिक अनुसंधानों ने हमारे जीवन में बड़ी मात्रा में योगदान दिया है. और इस से हमारे जीवन में सुख-सुविधाओं की मात्रा में अत्यंत वृद्धि हुई है. फिर भी, मनुष्य के जीवन में संघर्ष बढता ही जा रहा है. व्यक्तिगत व पारिवारिक स्तर पर निराशा, मानसिक तनाव व दुःख पाया जाता है. ऐसी स्थिति से उबरने में आध्यात्मिकता की साधना सहायक हो सकती है, यह हमारी पूर्व की संस्कृति ने पहले से ही दर्शाया है.

१९ वीं शताब्दी के वैज्ञानिकों का मानना ऐसा था कि न्यूटन के सिद्धांतों से विश्व के सारे रहस्यों का उद्घाटन हो सकेगा. क्यों कि उन के अभिप्राय के अनुसार समस्त ब्रह्माण्ड यन्त्र की तरह चल रहा है. किंतु २० वीं शताब्दी के वैज्ञानिक अनुसंधानों ने न्यूटन के सिद्धांतों की मर्यादाएं स्पष्ट की है और विश्व के कई रहस्य अभी भी अज्ञात हैं ऐसा प्रतिपादित किया है. इस में भौतिकशाश्त्र के (Quantum Physics) के अनुसंधानों का महत्वपूर्ण योगदान है.

उदाहरण के तौर पर जर्मन भौतिकशाश्त्री वर्नर हाईजनबर्ग का 'अनिश्चितता का सिद्धांत' (Principle of Uncertainty) और डेनमार्क के भौतिक शाश्त्री निल्स बोर का 'परस्पर पूरकता का सिद्धांत' (Principle of Complementarity) दर्शाते हैं कि इस सृष्टि में कोई भी पदार्थ, फिर वह चाहे मनुष्य हो, प्राणी हो, कोई ग्रह हो या छोटे से छोटा परमाणु हो, किसी का भी इस सृष्टि से बिलकुल परे रहकर स्वतन्त्र रूप से अकेले अस्तित्व नहीं हो सकता; और ये ऐसा भी दर्शाते हैं कि हम सब इस अखिल ब्रह्माण्ड की सृष्टि में एकदूसरे के साथ जुड़े हुए अंश हैं. आध्यात्मिकता भी इसी बात का निर्देश करती है.

वर्तमान संस्थानों के अधिकारी एवं मालिकों के लिए आध्यात्मिक सिद्धांतों का पालन करना समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है. वर्तमान युग में संस्थओं के कर्मचारी गण अधिक शिक्षित और अधिक जानकारी रखते हैं. ऐसे में उन को जबरन नियंत्रित करने की परिपाटी आजकल पुरानी मानी जाती है और ऐसी प्रथा की निरर्थकता भी अधिकारिओं को अब समझ में आने लगी हैं.

आज का सफल अधिकारीवर्ग बुद्धिमानी, सहानुभूति, परस्पर आदर, सहकार एवं व्यवहार शुद्धि (किसी को भ्रान्ति में नहीं रहने देने की मानसिकता) जैसे मूल्यों का महत्व समझने लगे हैं. इस के अलावा वे कर्मचारिओं से मिलने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं, नया सिखने के लिए उत्सुक रहते हैं, एकदूसरे के अभिप्रायों को शांतिपूर्ण तरीके से सुनने के प्रति झुकाव रखते हैं और आवश्यकता के अनुसार संस्था के लिए अनिवार्य परिवर्तनों को लागू करने की क्षमता रखते हैं.

सेवक की सेवा भावना के साथ संचालन करने की परिपाटी (Servant-Leadership) को प्राचीन प्रथा मानी जाती है. कुछ उदहारण हैं महात्मा गाँधी, मदर टेरेसा, विनोबा भावे इत्यादि. वर्तमान समय की तेज रफतार में जल्दी से बदलते जा रहे विश्व के माहौल में आधुनिक सेवक-संचालक की प्रथा लोकप्रिय बनती जा रही है. यहां संचालक का ध्येय अपने संस्थान को अच्छी सेवा प्रदान करती संस्था में परिवर्तित करने का है. यहां वह अपने संस्थान से जुड़े हुए सभी लोगों को सेवा प्रदान करने के लिए उत्सुक होता है. दूसरों की सेवा करना ही आध्यात्मिकता का अभ्यास करने का महत्वपूर्ण घटक है, तथा अन्य संचालकों के लिए प्रेरक तत्व है.

व्यक्तिगत आध्यात्मिकता और कर्मचारियों के प्रतिदिन के कार्यों के बीच किसी भी प्रकार का संबंध नहीं होना चाहिए ऐसे विचार पाए जाते हैं. परंतु आजकल ऐसी बातें बहुत सुनाई देती हैं कि कई संचालक स्वयं और उन के कर्मचारी जो कुछ भी करते हैं उस में सार्थकता खोजते हैं और ऐसे कार्यों में ही दिलचस्पी दर्शाते हैं. अब वे ऐसा मानने लगे हैं कि इस में आध्यात्मिकता मार्गदर्शन कर सकती है और व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से एवं आध्यात्मिक रूप से विकास के पर्याप्त सुअवसर मिलने चाहिए, केवल अधिक आर्थिक लाभ के अवसर मिलना पर्याप्त नहीं है.

आध्यात्मिकता के विषय में सही जानकारी विद्यार्थिओं के जीवन-निर्माण के वर्षों में अच्छा सा सुधर ला सकती है. फिर भी, अमरीका में राज्य और धार्मिकता को अलग रखने के नियम से वर्गखण्डों में आध्यात्मिकता के विषय पर चर्चा करने पर शिक्षकगण में काफी विरोध के भाव सामने आते हैं. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि शिक्षण के क्षेत्र में आज भी यह गलत धारणा बनी हुई है कि आध्यात्मिकता और धर्म दोनों एक ही है. इस के उपरांत शिक्षकों के मन में जो तथ्य वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हो सकता है केवल वही विषय शिक्षण हेतु उचित है और केवल वही वास्तविक ज्ञान है यह बात न जाने कैसे बैठ गई है. यह धारणा ऐसा सूचित करती है कि आध्यात्मिकता जैसे विषयों की शुद्ध व सुस्पष्ट परिभाषाएँ होनी चाहिए. आध्यात्मिकता बहु आयामी विषय है और उसमें अत्यंत गहराई से खोजबीन करना कठिन है. फिर भी, कुछ शोधकर्ता उस की परिभाषा देने में काफी हद तक सफल हुए हैं और उन्होंने उस की जांच-परख करने के उपाय भी दर्शाएँ हैं. इस का स्वागत किया जाना चाहिए. किंतु जब तक एक विषय के रूप में आध्यात्मिकता शिक्षण जगत के प्रमुख पाठ्यक्रम का एक अनिवार्य हिस्सा नहीं बन जाती तब तक विद्यार्थी उस से वंचित रहेंगे और उन्हें यह स्थिति झेलनी पड़ेगी. एक प्रतिष्ठित युनिवर्सिटी के अध्यक्ष से पूछा गया कि आज के विद्यार्थिओं के लिए कौन सा विशेषण सर्वाधिक उपयुक्त है, तब उन्होंने प्रत्युत्तर में कहा था: 'खालीपन.' (शून्यता)

यह खालीपन विद्यार्थिओं को मादक द्रव्यों के सेवन, आत्महत्या और इम्तहान में छल-कपट की ओर ले जाता है. शिक्षण संस्थानों से जब भी विद्यार्थी ऐसे रिक्तता के भाव के साथ संसार में आते हैं तब बड़ी ही अव्यवस्था और अफरा-तफरी फैलती है. ये राजनीति, व्यवसाय व अनेकविध सामाजिक क्षेत्रों में हम सब देख सकते हैं.

हाल ही में हुए कुछ मेडिकल अनुसंधान दर्शाते हैं कि जो लोग आध्यात्मिकता के नियमों के अनुसार अपना जीवन यापन करते हैं, उनका आत्मघाती प्रवृत्तियों में झुकाव कम रहता है (आत्महत्या, धूम्रपान, मादक द्रव्यों का अधिक मात्रा में सेवन इत्यादि) और मानसिक तनाव भी कम महसूस करते हैं. इस के अलावा वे जीवन में संतोष के अनहद आनंद का अनुभव भी करते हैं. वर्तमान में हुए अनुसन्धान यह सिद्ध करते हैं कि आध्यात्मिकता को अपने जीवन में अपनाने से हताशा कम होती है, रक्तचाप में सुधार होता है और रोग-प्रतिरोधक शक्ति में भी वृद्धि होती है.

अभिनव मानव समाज गंभीर समस्याओं का सामना कर रहा है. संस्थानों की लालसा, मादक द्रव्यों का सेवन, गरीबी, बहुविध समूहों और राष्ट्रों के बीच टकराव, प्रदूषण, पर्यावरण का विनाश, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, धार्मिक असहिष्णुता, जात पांत के भेद-प्रभेद, बच्चें और नारी शोषण व क्रय इत्यादि... आध्यात्मिक शिक्षण इन सारी समस्याओं के समाधान के लिए आशा की किरण बन सकती है. यूनाइटेड नेशंस मिलेनियम डेवलपमेंट गोल्स (MDGS) और कमिटी ओन स्पिरिच्युअलिटी वेल्यूज एंड ग्लोबल कन्सर्न्स (CSVGC) जिनीवा, स्विट्जरलैंड, ये दोनों संस्थानों की प्रवर्तमान समस्याओं के समाधान करने की पहल, दिलचस्पी व कार्य निष्पादन अत्यंत प्रशंसनीय हैं.

आध्यात्मिकता हमारी कई दैनिक प्रवृत्तिओं पर गहराई से प्रभाव डालती है. यह हमें धार्मिक, सामाजिक, शैक्षणिक, व्यावसायिक, पर्यावरणीय (पृथ्वी के आसपास के वातावरण को शुद्ध रखने की दृढ़ इच्छा एवं प्रवृत्ति) और सृष्टि के परम तत्व को (सत्य को) समझने की प्रेरणा देती है.

प्रस्तुत ग्रन्थ में अनेक शिक्षणशास्त्रीओं के अभिप्राय, धार्मिक संस्थानों के महापुरुषों के अनुभव व समझदारी के वचनों को समाविष्ट किया गया है. इस के सिवा कुछ संस्थानों के अधिकारी, कार्यकर्ता और साहित्य क्षेत्र की प्रमुख व्यक्तियों के साथ आध्यात्मिकता विषयक वार्तालाप एवं विश्व के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिकों के अनुसंधानों का विवरण भी इस ग्रन्थ में दिया गया है.

यह ग्रन्थ ऐसी उम्मीद के साथ प्रस्तुत किया जा रहा है कि जो लोग आतंरिक संतुलन, प्रेम, करुणा, सर्जनात्मकता, अखंडितता (समग्रता) और परम के साथ जुड़ने की आकांक्षा रखते हैं, जो लोग सत्यप्रियता के साथ आतंरिक आनंद और हरेक प्रयास के पीछे कुछ पाने की भावना रखते हैं तथा जो लोग अन्य लोगों के साथ सहभागी होते हुए वास्तविक शांति और स्वस्थता प्राप्त कर के जीवन में एकता और समन्वय प्रस्थापित करने के लिए उत्सुक हैं ऐसी प्रत्येक क्षेत्र की हरएक व्यक्ति को यह ग्रन्थ प्रेरक बनेगा.

मैं आग्रहपूर्वक युवावर्ग को यह पुस्तक पढने का सुझाव देता हूँ, क्यों कि इस पुस्तक के अध्ययन से उन के जीवन के निर्माण के वर्षों में अपने विषय में परिचय मिलेगा और उनके भविष्य को सकारात्मक दिशा में ले जाने की जानकारी भी मिलेगी. संभव है कि यह समझदारी व जानकारी उनको जीवन में आगे चलकर अत्यंत प्रेरक बने.

मेरा मानना ऐसा है कि प्रत्येक मनुष्य में आध्यात्मिकता अन्तर्निहित है. कोई धार्मिक होता है तो कोई नास्तिक, परंतु हम सब की आत्मा हमें आध्यात्मिकता की राह दिखाती है. हमारे भीतर रहा आध्यात्मिक तत्व खदान में रहे एक हीरे जैसा है. उसे बाहर निकल कर उचित तरीके से पहलूदार बनाकर, पालिश कर के चमकाने की आवश्यकता है. फिर यह मूल्यवान हिरा बनकर अपने सम्पूर्ण सौंदर्य के साथ हमारे समक्ष प्रकट होगा. मनुष्य होने के नाते हम में जिज्ञासा और इतनी प्रचंड ताकत होनी चाहिए कि जिससे आध्यात्मिकता की संपूर्ण भावना की समझ हम पा सकें. यह हमें हमारे जीवन के सरल और सच्चे सौंदर्य को जानने-समझने में सहायता करेगी और हमें सहज स्वाभाविक प्रज्ञा की ओर ले जा कर अत्यधिक भौतिक संपत्ति के नकारात्मक प्रभाव के प्रति सचेत करेगी.

मनुष्य के वर्तन पर प्रभावक आध्यात्मिक नियम हजारों वर्षों से विश्व के सारे धर्मों ने और तत्वज्ञानियों ने स्पष्ट रूप से दर्शाएँ हैं. यह संभव है कि प्रयुक्त शब्द भिन्न हों, किंतु मूल सन्देश एक ही होता है जैसे: ईमानदार बनें, न्यायी जीवन जिएं, अनुग्रह और अनुकम्पा जताएं, आप का लक्ष्य स्पष्ट एवं शुद्ध रखें, प्रेम और भ्रातृभाव से और मेलमिलाप से रहें, मनुष्यों की सेवा करें, उन्हें प्रेम दीजिए और प्रकृति के साथ तादात्म्य साधें.

आइये हमें एकदूसरे से विभाजित कर रही कुछ धर्मों की अनुचित व संकुचित मान्यताओं और अंधविश्वासों को हटा कर, हम सर्व धर्मों के आध्यात्मिक तत्वों का परिचय पाएं और उनका अपने जीवन में पालन करें. क्योंकि उसी में निहित है हम सब को एक करने की अपार और प्रचंड संभावना जो कि आगे जा कर मानवजात के लिए सीमाचिन्ह बनेगी.

डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास

साउथ केरोलाइना युनिवर्सिटी,

एकन, यु.एस.ए.

निवृत्त तथा मानद प्राध्यापक,

११०, लोरेल ऑफ ड्राइव,

एकान, साउथ केरोलाइना,

२९८०३, यु.एस.ए.

Email : nirenv@usca.edu


अर्पण

उन तीन दिवंगत आत्माओं को...

मेरे पिताश्री मोहनलाल व्यास

मेरी मातुश्री जयाबेन व्यास

एवं

मेरी पत्नी: उर्मिला व्यास

जिन्होंने अपने गहरे स्नेह और प्रेम से मेरे जीवन का पथ

प्रशस्त किया और मेरे जीवन को समृद्ध किया

वह व्यक्ति जो केवल सृष्टि के भौतिक स्वरूप को ही जानती है, उसका ज्ञान अत्यंत अल्प है. किंतु जो भीतर की गहराई में जा कर उस से जा मिलते हैं, और जो जीवन की एकता के तानेबाने के, संबंधों के सूक्ष्म जाल को देखता है, वही परम तत्व को जान सकता है. जो सर्वोपरि सत्ता हमारे भीतर है और जीव-सृष्टि के उस पार भी है, वही यह विशाल ब्रह्माण्ड के अखंडित परम सत्य को जानता है.

(अथर्व वेद: १०-८.३८ )

ऋण स्वीकार

'वेअर एवरी ब्रेथ इज अ प्रेयर : अ फोटोग्राफिक पिलग्रिमेज इनटू द स्पिरिचुअल हार्ट ऑफ एशिया'. ('Where Every Breath is a Prayer: A Photographic Pilgrimage into the Spiritual Heart of Asia.') पुस्तक के लेखक एवं फोटोग्राफर जोन ऑर्टनर के प्रति मैं कृतज्ञता की गहन भावना व्यक्त करता हूँ. बीस वर्ष की अपनी यात्रा के दौरान जोन ने जिन स्थानों की मुलाकात लीं थीं और जिन स्थानों की तसवीरें खींचीं थीं, उन के सन्दर्भ में इस पुस्तक का अवलोकन करते हुए मैं उन्हीं में खो गया था, लीन हो गया था. जिस अवर्णनीय आध्यात्मिक अनुभूति का अनुभव उन्हें हुआ, वही आतंरिक आनंद की अनुभूति मुझे भी हुई.

इस पुस्तक ने मेरे मन और ह्रदय में आध्यात्मिकता का बीज बोया. मेरी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत यह एक प्रश्न के उत्तर पाने की खोज से हुई: पर्वतो में, नदी किनारे या जंगल में कहीं नहीं जाते हुए भी हम अपने जीवन में भीतरी आनंद और शांति का अनुभव प्राप्त कर सकें इसलिए हमें आध्यात्मिकता का अभ्यास किस प्रकार से करना चाहिए?

पिछले दस वर्षों में मैंने विश्व में फिलहाल जितने भी धर्मों का पालन किया जा रहा है ऐसे सभी धर्मों के बारे में जानकारी प्राप्त की है तथा विश्व के कई धार्मिक स्थानों की मुलाक़ात भी ली है. जिन में जोन ने अपने पुस्तक में निर्दिष्ट सभी स्थानों का भी समावेश हो जाता है. देश-विदेश के विश्वविद्यालयों की मेरी शैक्षणिक मुलाकातों के दौरान मैंने कई लोगों के साथ आध्यात्मिकता के विषय में बातचीत की है. जब मैंने धर्मगुरु, व्यावसायी वर्ग, संचालक, शैक्षणिक तजज्ञ, सामाजिक कार्यकर, राजनीतिज्ञ, साहित्यकार और जीवन के तक़रीबन सारे क्षेत्रों के अन्य लोगों से बातचीत करने पर उन्होंने अपने अनुभव एवं ज्ञान से मेरा अमूल्य पथप्रदर्शन किया और इस के लिए मैं उन सभी को ह्रदयपूर्वक धन्यवाद देता हूँ.

इस पुस्तक में मैंने जगह जगह पर कई विद्वानों के शब्द उद्धृत किए हैं और उन का यथास्थान पर पूर्ण रूप से जिक्र भी किया है. इस ग्रन्थ के प्रकाशन के अवसर पर मैं सभी विद्वान् और तजज्ञों के प्रति सच्चे दिल से गहन कृतज्ञता प्रकट करता हूँ.

मेरे परिवार के सदस्य, निजी मित्र वर्ग और देश-विदेश के मेरे प्राध्यापक मित्रों की और से नियमित रूप से मुझे मिलते रहे प्रोत्साहन का मूल्य अनन्य है, असाधारण है. अमरीका, भारत, नेपाळ और बहरीन के विश्वविद्यालयों ने मेरी शैक्षिक गतिबिधि और सक्रियता के दौरान वहां के प्राध्यापक और छात्रगण के साथ हुए विचार-विमर्श का गहरा प्रभाव इस पुस्तक की प्रस्तुति पर हुआ है जिस का यहाँ पर विशेष रूप से उल्लेख करना आवश्यक है.

ग्रन्थ की पांडुलिपि तैयार करने में एवं उसे सम्पादित करने के लिए मैं मेरी क्लेर के प्रति विशेष रूप से धन्यवाद प्रकट करता हूँ. कार्य के प्रति उन का लगाव, समर्पण भावना और सहयोग के बगैर इस पुस्तक का प्रकाशन शायद संभव नहीं हो पाता.

इस पुस्तक का मूल अंग्रेजी भाषा से गुजराती भाषा और हिंदी भाषा में अनुवाद करने के लिए मैं श्री हर्षद दवे के अथाह परिश्रम, धैर्य और सतत सावधानी के लिए ह्रदयपूर्वक कृतज्ञता प्रकट करता हूँ.

इस पुस्तक के सुन्दर एवं क्षतिरहित मुद्रण व प्रकाशन के लिए मैं श्री स्वामीनारायण गुरुकुल विश्वविद्या प्रतिष्ठानम (SGVP), अमदावाद के प्रति कृतज्ञ हूँ.

मेरे प्रेरक और आदर्श परम पूजनीय गुरुवर्य शाश्त्री श्री माधवप्रियदासजी स्वामी ने आशीर्वचन से गुजराती और हिंदी पाठकगण को यह ग्रन्थ पढ़ने व समझने के लिए प्रोत्साहित किया है, अतः मैं उन का सदैव ऋणी रहूँगा. उन के वात्सल्य की धारा हम सब के प्रति निरन्तर बहती रहे ऐसी श्रीजी महाराज से करबद्ध प्रार्थना करता हूँ और पूज्य स्वामीजी के शिष्य साधू यज्ञवल्लभदासजी ने गुजराती एवं हिंदी अनुवाद में अच्छे से सुझाव दे कर इस पुस्तक को सरल व सुपाठ्य बनाने में सहायता करने के लिए उन के प्रति कृतज्ञ रहूँगा.

-डॉ. निरंजन एम. व्यास,

युनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ केरोलाइना, एकन,

निवृत्त व मानद प्राध्यापक और डीन.

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अनुक्रम

अध्याय : १ आध्यात्मिकता : प्रारंभिक अन्वेषण /१९

अध्याय : २ आध्यात्मिकता की परिभाषा एवं अर्थ/३०

अध्याय : ३ आध्यात्मिकता और धर्म /४५

अध्याय : ४ आध्यात्मिकता, धर्म और विज्ञान /७३

अध्याय : ५ संस्थान, प्रतिष्ठान, प्रबंधन और नेतृत्व पर

आध्यात्मिकता का प्रभाव /११०

अध्याय : ६ आध्यात्मिकता एवं शिक्षण /१३५

अध्याय : ७ आध्यात्मिकता : मनुष्य और समाज /१८५

अध्याय : ८ प्रसिद्ध महापुरुष : कहानी /२३३

अध्याय : ९ प्रेरक सूक्तियां /२५०


(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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रचनाकार: आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : प्रस्तावना - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे
आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : प्रस्तावना - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे
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https://www.rachanakar.org/2018/05/blog-post_46.html
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