जल तू जलाल तू - 3// प्रकृति और जीव के अन्तःसम्बन्धों का सशक्त उपन्यास // प्रबोधकुमार गोविल

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जल तू जलाल तू

प्रकृति और जीव के अन्तःसम्बन्धों का सशक्त उपन्यास

प्रबोधकुमार गोविल


अध्याय 1 | अध्याय 2 |

तीन

रात काफी गहरा चुकी थी।

बच्चों के माता-पिता को इस बात का घोर आश्चर्य हो रहा था कि आमतौर पर जल्दी सो जानेवाले बच्चे नाना से कहानी सुनने में इतने तल्लीन हो गए कि उन्हें दोपहर से शाम, और शाम से रात हो जाने का कोई आभास न हुआ। सभी को किन्जान की कहानी का अन्त जानने की ऐसी उत्सुकता थी कि भूख-प्यास का भी खयाल न रहा। बच्चों और उनके माता-पिता ने कुछ समय पहले ही घूमकर बफलो नगर के वे सारे स्थान देखे थे, इसलिए उन्हें बिलकुल ऐसा अहसास हो रहा था, जैसे उनके बीच से ही कोई घटना घटकर सामने आ गई हो। कहानी के इस विराम के बाद खुद नाना को भी आभास हो रहा था कि उनके मेहमानों ने दोपहर से कुछ खाया नहीं है।

तभी दरवाजा खुला और दोनों बहनें, जो उस भारतीय परिवार को नाना के यहाँ छोड़कर नजदीक ही अपने फ्लैट में चली गई थीं, हाथ में एक बड़ी टोकरी में डिनर का सारा सामान लिए हाजिर हुईं।

थोड़ी ही देर में सब भोजन की मेज पर थे। बहनें बता रही थीं, कि आज उन्होंने खुद भारतीय तरीके से सब्जी बनाने की कोशिश की है। इस बात से बच्चों की उत्सुकता भी बढ़ गई और भूख भी। भोजन के साथ-साथ वार्तालाप भी चलता रहा। छोटी बहन ने बताया कि वह हर सप्ताह जब भी छुट्टी में घर आती है तो एक बार नाना के घर के सामनेवाले पेड़ पर टँगे उस घोंसले को देखने जरूर जाती है, जिसे नाना ने वहाँ खुद बनाकर लगाया है। नाना कहते हैं, कि उस घोंसले में एक दिन अपने आप अण्डे आ जाएँगे। सभी की दिलचस्पी यह जानने में रहती थी कि अण्डे कब और कैसे आएँगे? लेकिन उस भारतीय परिवार की छोटी गुड़िया को उस घोंसले का जिक्र अच्छा नहीं लगा। उसे याद आ गया कि उस घोंसले के चित्रा बने डिब्बे में कैसे अपने आप आग लगी थी, और उसका हाथ जलते-जलते बचा था। वह एक बार फिर, वह सब याद आ जाने से डर गई। उसकी आँखें लाल होने लगीं, और उसे तेज बुखार भी चढ़ने लगा...उसका चेहरा देखकर उसकी मम्मी को घबराहट होने लगी। उन्होंने नाना से तो कुछ कहना उचित नहीं समझा, क्योंकि घर में अकेले बुजुर्ग को वह परेशान नहीं करना चाहती थीं किन्तु उन्होंने बेटी को एक चादर ओढ़ाकर बिस्तर पर सुला दिया और स्वयं बाहर नाना के पास ही आ बैठीं, जहाँ उनका बेटा और पति पहले से मौजूद थे। वे दोनों नाना से किन्जान की कहानी के बाबत तरह-तरह की जिज्ञासा का जिक्र कर रहे थे। इस मार्मिक दृष्टान्त को जानने के बाद सभी की दिलचस्पी रस्बी और किन्जान में हो गई थी और वे आसानी से उन्हें भुला नहीं पा रहे थे।

यह उनकी कल्पना के भी परे था कि कोई लड़की भारतीय गाँव में पैदा हुई और बचपन में ही अपना नाम, धर्म और किस्मत बदलकर खाड़ी के देश में चली आई और फिर एक बार नए नाम और नई किस्मत लेकर अमरीका जैसे देश में चली आई। रसबाला के रसबानो बनकर रस्बी बनने तक की यह दास्तान रोंगटे खड़े कर देनेवाली थी।

जब नाना को पता चला कि छोटी बच्ची को तेज बुखार है तो उन्होंने उसके पास आकर उसका मुआयना किया।

बच्ची को दवा देकर सुला दिया गया। नाना का ही नहीं, खुद उसके मम्मी-पापा का भी यही मानना था कि लगातार बैठकर कहानी सुनने से हुई थकावट के चलते बच्ची को हरारत हो गई है। भोजन के बाद दोनों बहनों ने भी मेहमान दम्पति से जाने की इजाजत ली क्योंकि उन्हें भी सुबह जल्दी ही अपनी ड्यूटी के स्थान के लिए वापस निकलना था। बेहद आत्मीयता से वे दोनों अभिवादन करके चली गईं।

नाना इतने उम्रदराज होते हुए भी बिलकुल थके नहीं हैं, यह देखकर मेहमान दम्पति और उनका बेटा फिर से नाना के पास आ बैठे। माँ ने एक बार बेटे से कहा भी, कि बहुत रात हो चुकी है, और अब वह सो जाए, किन्तु उस पर माँ की बात का कोई असर नहीं हुआ। वह उसी तरह नाना के पास बैठा रहा। कुछ देर की चुप्पी के बाद बेटे ने ही मौन तोड़ा, वह बोला, ”नाना! बाद में रस्बी आंटी को पानी में बहते हुए भी कहीं किन्जान की लाश दिखाई दी?“ यह सुनते ही नाना थोड़ा संकोच के साथ यह देखने लगे, कि क्या वास्तव में इतनी रात गए वे लोग कहानी के बाबत और सुनना चाहते हैं? माता-पिता के चेहरे पर भी बेटे जैसी उत्सुकता देखकर नाना ने कहना शुरू किया, ”रस्बी गिरते ही मौत के साथ दूसरी दुनिया में चली गई। उस दूसरी दुनिया में किसी को तलाश करना मुश्किल होता है। हम सोचते हैं कि जो लोग दुनिया से चले जाते हैं, वहाँ भगवान् के घर एक छत के नीचे सब मिल जाते हैं, किन्तु ऐसा नहीं है। यहाँ तो फिर भी हम सौ-पचास साल के लिए आते हैं, और एक साथ हमारी तादाद चंद अरब में ही होती है, परन्तु उस दुनिया में तो हम करोड़ों सालों से अरबों-खरबों की संख्या में जाते रहे हैं। वहाँ न किसी को ढूँढना सम्भव है, और न किसी का आसानी से ऐसे मिल जाना। लेकिन...“ ”...लेकिन क्या नाना?“ ”लेकिन फिर भी उस दुनिया और इस जगत की दूरी ऐसी नहीं है कि वहाँ से कभी कोई लौटकर आया ही न हो।“ ”क्या मतलब? क्या मरने के बाद भी कोई फिर कभी जीवित हुआ है?“ ”नहीं, जीवित तो नहीं हुआ, मगर...मगर ऐसा जरूर हुआ है कि कोई ठीक से पूरी तरह मर नहीं सका।“ ”पूरी तरह न मरना क्या होता है?“ माँ और पिता ने बेटे जैसी ही उत्सुकता से एक साथ पूछा।

”यदि व्यक्ति असमय, किसी जबरदस्त लगाव के रहते या फिर किसी अभिलाषा के रहते अकस्मात् चला जाता है, तो उसके शरीर के साथ उसकी ‘जान’ या आत्मा के सारे तंतु दुनिया से सिमट नहीं पाते। ऐसे में वह कभी-कभी किसी-न-किसी सूरत में दुनिया में फिर झलकता है, कभी हम इसे आत्मा का भटकना कहते हैं, तो कभी पुनर्जन्म होना।“ ऐसी बातें उन लोगों ने भारत में तो सुनी थीं, किन्तु अमेरिका में इतने अनुभवी बुजुर्ग से सुनना उन्हें रोमांचित कर गया। बेटे के तो यह सुनते ही रोंगटे खड़े हो गए। उसने अपने बिस्तर पर लेटकर झटपट एक चादर से मुँह ढँक लिया।

नाना ने भी उन्हें थका जानकर अब सो जाने का आग्रह किया...तभी उस दम्पति को अहसास हुआ कि नाना भी अब सोना चाहते होंगे अतः उन्हें आराम करने देना चाहिए।

वे दोनों बेटे को भी साथ लेकर दूसरे कमरे में आ गए। बेटी गहरी नींद में सोई हुई थी लेकिन अब उसे बुखार नहीं था। नींद और आराम के कारण शायद अब उसके चेहरे से भी तनाव जाता रहा था।

धीरे-धीरे नींद ने बेटे को भी उनींदा करके फिर गहरी तन्द्रा में सुला दिया।

भारतीय दम्पति की चिंता अब केवल यह थी कि बच्चों पर यदि वास्तव में कोई बाधा या मुसीबत आई है तो उसका पता लगे और उनका इलाज भी हो। यहाँ विदेशी बुजुर्ग मेजबान की उपस्थिति में तो वे बिलकुल निश्चिन्त थे, मगर अभी उनकी भारत तक की यात्रा के कई पड़ाव बाकी थे। और अब वे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते थे।

यह आश्चर्यजनक घटना यदि उनके साथ उनके अपने देश में घटी होती तो वे शायद इसे अन्धविश्वास मानकर इसकी अनदेखी कर देते परन्तु वे इस समृद्ध देश के नागरिकों से इस तरह की बात सुनकर आसानी से इसे टाल भी नहीं सकते थे। फिर जो कुछ बच्चों के साथ घटा था वह कपोल-कल्पित भी तो नहीं था।

गहराती रात ने उन्हें और उनके विचारों को आगोश में ले लिया।

...अगली सुबह जब भारतीय दम्पति उठकर बाहर लॉन में आए तो यह देखकर दंग रह गए कि आमतौर पर देर तक सोने के आदी उनके दोनों बच्चे उनसे पहले ही जग गए हैं, और बगीचे में पानी देने में नाना की मदद कर रहे हैं। बच्चों की मम्मी में भी बच्चों को देखकर कर्तव्यभाव जग गया और उन्होंने भीतर जाकर रसोई की जिम्मेदारी सम्भाल ली। नाना भी भरे-पूरे परिवार के साथ रहने का अवसर पाकर अतिरिक्त रूप से उत्साहित थे।

दोपहर को भोजन से निवृत्त होने के बाद बच्चों के माता-पिता और नाना कमरे में बातों में इतने तल्लीन थे कि बच्चे कब बाहर जाकर एक डिपार्टमेण्टल स्टोर से रंग-बिरंगी मोमबत्तियों के पैकेट्स खरीद लाए, ये उन्हें पता ही न चला।

इतनी मोमबत्तियाँ देखकर बच्चों की मम्मी ने उनकी ओर प्रश्न-वाचक नजरों से देखा। बच्चे भी एक बार तो संकोच के कारण कुछ न बोल पाए, किन्तु पिता की ओर से दोबारा प्रश्न होने पर बेटी ने सिर झुकाकर धीरे-से कहा, ”हम शाम को रस्बी आंटी और किन्जान भैया की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना करेंगे।“ माता-पिता दोनों एक साथ अभिभूत हो गए। उन्होंने देखा, नाना की मिंची आँखें भी नम हो आईं। माता-पिता नाना के पास से उठकर भीतर चले गए। नाना के अकेले होते ही दोनों बच्चों ने करीब आकर उन्हें घेर लिया।

”नाना, क्या किन्जान भैया को भी पानी में बहते हुए कहीं रस्बी आंटी का शव दिखाई दिया?“ बेटे ने अपनी जिज्ञासा रखी। ऐसा लगता था कि बच्चे अब तक रात की कहानी से उबर नहीं पाए थे।

नाना ने इत्मीनान से एक गहरी साँस ली, और बोले, ”दरअसल किन्जान झरना पार करके नीचे आ ही नहीं सका?“ ”क्यों? क्या हो गया था? फिर नाव टूटी कैसे?“ बच्चों के सवाल किसी बन्द गठरी के खुलने से जैसे निकल-निकलकर गिरने लगे थे।

नाना ने किसी उड़ती चिड़िया की तरह कहानी का सूत्रा फिर थाम लिया, ”जैसे ही किन्जान अपनी नौका में सवार होकर रवाना हुआ, वह बहुत खुश था।

उसके साथ में न्यूयॉर्क से लाया गया ब्राजीलियन छोटा कुत्ता भी था, जिसके लिए बॉल के भीतरी अस्तर में खास बेल्ट से बँधी जेब भी बनाई गई थी। खुद किन्जान के लिए भी नौका के भीतर सुरक्षित और मजबूत ट्रांसपेरेण्ट सेफ्टी-कैप्सूल था।

दोनों के मुँह के करीब जूस के पाउच इस तरह लगाए गए थे, कि जरा से प्रयास से जूस पिया जा सके। लेकिन...“ ”लेकिन क्या नाना?“ दोनों एक साथ बोल पड़े।

”एयर-टाइट नौका में ऑक्सीजन भी पर्याप्त मात्रा में थी। पानी की दहाड़ें, भीतर भी सुनाई दे रही थीं। यद्यपि आवाज बाहर की तुलना में भीतर बहुत कम थी। बादलों की गड़गड़ाहट जैसी ध्वनि थी। तभी अचानक एक भयंकर...और तीखी आवाज आई। जैसे किसी ने नौका पर रिवाल्वर की गोलियों से वार किया हो। वार इतना आक्रामक था, कि बुलेट-प्रूफ परदे पर पड़ी खरोंच किसी ब्लेड की तरह एक ओर से परदे को चीर गई। पहले एक गोली चली, फिर कुछ रुककर तीन-चार गोलियों की आवाज आई... ...बहते पानी में भागती नौका का जो हिस्सा खुला, उसके बाहर की ओर पलटते ही छोटा कुत्ता एक भय-मिश्रित चीत्कार के साथ उछलकर पानी से बाहर जा गिरा। बिजली की-सी गति से किन्जान ने बेल्ट हटाकर पानी में कूदने में पल का हजारवाँ हिस्सा भी नहीं गँवाया। उसे अपने मिशन की शुरुआत पर अमेरिकी महिला के कहे शब्द शायद आकाश से हुई वाणी की तरह कांधकर सुनाई दे गए - ”मैं अपना बेटा ही नहीं, अपनी जिन्दगी का एक भाग तुम्हें दे रही हूँ...“ ...कुशल तैराक किन्जान ने झपटकर कुत्ते को हाथों में पकड़ लेने के बाद तेजी से दूर जाती नौका की ओर एक हसरत-भरी नजर डाली, जो किसी आकाश में उड़ते विमान की तरह तेजी से ओझल हो गई। किन्जान साँझ के झुटपुटे में तैरकर उदासी में डूबा किनारे आया। निढाल होकर बैठ जाने के बाद, अब उसका माथा यह सोचकर चकरा रहा था, कि उस पर गोलियों से वार करनेवाला भला कौन हो सकता है? देखते-देखते फटा चीथड़ा बनी नाव बहती हुई आगे निकल गई।

उसकी न तो किसी से दुश्मनी थी, और न ही उसके अभियान से किसी और को कोई नुकसान होनेवाला था। उसकी माँ रस्बी ने आज सुबह ही गुस्से में उसे प्लेट खींचकर जरूर मारी थी, परन्तु यह वह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि माँ उस पर ऐसा कातिलाना हमला कभी कर सकती है। माँ को तो यह भी पता नहीं था, कि वह इस समय कहाँ है? वह तो कुछ भी बताकर घर से नहीं आया था। फिर माँ की जिन्दगी में पिस्तौल उसने कभी देखी तो क्या, सुनी तक न थी।

फिर भी उसे इस घड़ी में माँ याद आई। वह तेजी से घर पहुँचकर माँ की गोद में आराम करना चाहता था। माँ के हाथ से कुछ खाना चाहता था, और उसे यह भरोसा दिलाना चाहता था कि यदि वह न चाहेगी, तो वह ऐसी यात्रा पर फिर कभी न जाएगा।“ सुबह माथे में लगी चोट भी पानी में भीग जाने के बाद और तीखी होकर उभर आई थी। एक हाथ में छोटे कुत्ते को उठाए, वह हथेली से जमीन का सहारा लेकर जैसे ही उठा, उस वीराने में उसका सामना उसी ठिगने बूढ़े से हुआ जो अपनी लम्बी दाढ़ी के कारण इस समय भी किन्जान के फौरन पहचान में आ गया। बूढ़ा आते ही किन्जान से लिपट गया, और जोर-जोर से रोने लगा। इतने बूढ़े आदमी को बच्चों की तरह फूट-फूटकर इस तरह रोते हुए, किन्जान ने तो क्या, किसी ने कभी न देखा था।

किन्जान भांचक्का रह गया। उसे यह सारा माजरा बिलकुल समझ में नहीं आया। बूढ़ा रोने के साथ-साथ तेजी से काँप भी रहा था। जैसे ही उसने कहा, कि किन्जान की नौका पर गोली उसने चलाई थी, किन्जान ने हाथ के कुत्ते को एक ओर रखा और पूरी ताकत से बूढ़े पर वार किया। पहला मुक्का पड़ते ही बूढ़े के होंठों से खून का फव्वारा छूट पड़ा। पर इतने से किन्जान रुका नहीं, उसने मुक्कों और लातों की झड़ी लगा दी। किन्जान भूल गया कि चुपचाप उसके सारे वार सहनेवाला यह आदमी उससे बहुत बड़ा है। वह यह भी भूल गया कि इसी बूढ़े ने उसकी माँ रस्बी को घोड़ा लाकर दिया था। इतना ही नहीं, बल्कि माँ को घोड़ा चलाना भी इसी ने सिखाया था। यह माँ रस्बी का परिचित था। लेकिन इस समय किन्जान और कुछ न सोच पाया। उसके दिमाग में केवल यही बात झंझावात का कोई जलजला बनकर घुमड़ रही थी कि इस आदमी ने किसी दुश्मन की भाँति छिपकर उस पर वार किया था और उसका बरसों पुराना सपना बन्दूक की गोलियाँ बरसाकर छलनी कर दिया था। किन्जान यह खयाल भी मन में नहीं लाना चाहता था कि उसकी जन्मदायिनी माँ रस्बी किसी को इस तरह उस पर कातिलाना हमला करने के लिए भेजेगी। उसकी मुहिम को माँ ने कभी सहारा नहीं दिया था मगर वह किन्जान को जीवित देखना चाहती थी। किन्जान को बचाना चाहती थी।

इस सोच ने किन्जान के हाथों में बिजली-सी ताकत भर दी। उसने बूढ़े पर तड़ातड़ लात-घूँसे बरसाना शुरू कर दिया।

...किन्जान बहुत क्रोध में था, वह शायद बूढ़े की जान ही ले डालता, लेकिन मार खाते-खाते भी बूढ़ा बार-बार गिड़गिड़ाकर यही कहे जा रहा था कि एक बार मेरी बात तो सुनो... किन्जान एक पल हाथ रोककर बोला, ”बोल, बता, तूने ऐसा क्यों किया?“ बूढ़ा बोला, ”मुझे रसबानो ने भेजा था“...लेकिन यह कहते ही बूढ़ा पश्चाताप से भर गया। अपने दाँत काटकर बोला, ”मुझे माफ कर दो, मैंने उसकी दी हुई कसम तोड़ दी।“ किन्जान एकदम ठहर गया। उसे इस बात का ज्यादा आश्चर्य नहीं था कि उसकी माँ ने ही उसे किन्जान का मिशन फेल करने भेजा, बल्कि इससे भी ज्यादा तो वह यह देखकर चांका, कि यह कौन व्यक्ति है जो उसकी माँ को ‘रसबानो’ नाम से पुकार रहा है? बूढ़ा किसी हताश अपराधी की तरह माथे पर हाथ लगाकर नीचे बैठ गया।

उसे लग रहा था कि उससे गलती पर गलती हुए जा रही है।

किन्जान तो जैसे दो पल में ही किसी दूसरी दुनिया का वासी हो गया। उसे ऐसा लगा, जैसे किसी ने प्रश्नों का गट्ठर उसके दिमाग की नसों में घुसा दिया हो।

वह भी ठीक बूढ़े ही की तरह अपने सिर पर हाथ रखकर बूढ़े के सामने बैठ गया।

बूढ़ा आत्मीयता से बोला, ”तुम्हारी माँ तुम्हें बिलकुल भी नुकसान नहीं पहुँचाना चाहती थी। उसने केवल मुझसे यह कहा था कि मैं तुम पर नजर रखूँ, और तुम्हें जब भी पानी जीतने की मुहिम पर जाते देखूँ, तो उचित-अनुचित की परवाह किए बिना तुम्हें रोकने की कोशिश करूँ।“ किन्जान एकटक बूढ़े को देखता रहा। एक पल साँस लेकर वह बूढ़ा खुद ही फिर बोला, ”तुम्हारी नाव बुलेट-प्रूफ थी। इसमें गोली का असर नहीं होता था, मैंने किनारे से केवल इसमें लम्बा काट लगाने की कोशिश की। किन्तु मुझे छेद होता नहीं दिखा, और यह तेजी से भाग रही थी। मैं डर गया। तुम थोड़ी ही देर में छलनी हुई नाव से आसमान जैसी ऊँचाई से गिर जानेवाले थे। मैंने आपा खो दिया, और बिना सोचे-समझे नाव के किनारे पर दनादन गोलियाँ बरसा डालीं।“ कहकर बूढ़ा फिर से अपने आँसू पोंछने लगा। किन्जान और कुछ पूछता, इससे पहले ही बूढ़ा फिर अपने आप बोल पड़ा, ”मैंने आज तक अपनी बहन की कोई बात नहीं टाली...उसने पहले ही बहुत दुःख झेले हैं...“ किन्जान सब भूल गया। अपने मिशन की असफलता भूल गया। अपना दर्द भूल गया। अपने आपको भी भूल गया। बस, उसे याद रहा तो केवल यह, कि एक अजनबी बूढ़ा उसकी माँ को अपनी बहन कह रहा है। और माँ का नाम रस्बी नहीं बल्कि रसबानो उच्चार रहा है। उसकी माँ के आदेश को पत्थर की लकीर मानकर इतना बड़ा जोखिम लेकर उसे बचाने चला आया है। माँ द्वारा कसम दिए जाने की बात कर रहा है...और अपने से चौथाई उम्र के लड़के से मार खाकर भी अविचलित बैठा है। ऐसे में किन्जान को अपनी माँ की याद आई। उसने बूढे़ को अपने साथ आने का इशारा किया और वह बेतहाशा घर की ओर भागने लगा। माँ रस्बी ने इतना बड़ा राज किन्जान से क्यों छिपाकर रखा कि वह बूढ़ा उसका सगा भाई है, और खुद माँ भी तो जीवनभर अपना नाम ‘रसबानो’ उससे छिपाती रही। उसकी माँ का यह परिचय नितान्त नया था।

किन्जान दौड़कर माँ के पास पहुँच जाना चाहता था पर वह अभागा कहाँ जानता था कि उसकी माँ अब इस दुनिया में नहीं है। और माँ के इस दुनिया से चले जाने का सबब भी वह खुद था।

लेकिन दुनिया में जीते-जीते इतना कौन सोच पाता है कि किसी का जीवन, किसी की मौत कौन-कैसे तय करता है।

...जब नदी के किनारे से हारा-थका किन्जान बोझिल कदमों और हैरत-भरे विचारों के साथ-साथ उस बूढ़े और नन्हे कुत्ते को लेकर अपने घर की ओर चला तो शायद वह सोच भी नहीं सकता था कि अब उसकी जिन्दगी और उसका परिवार यही है। माँ के बारे में भी उसे कुछ खबर नहीं थी।

वीरान पड़े घर में देर रात तक तो किन्जान ने माँ का इन्तजार किया, मगर फिर उसे किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी। किसी तरह किन्जान ने अपना और अपने साथियों का पेट भरा, और वे सो गए। जिन्दगी ने सभी का इम्तहान लिया था, इसलिए सभी थके थे। वह बूढ़ा, जो किन्जान का मामा था, किसी बुत की तरह उसके साथ था।

अगली सुबह घर के दरवाजे पर सूरज और पुलिस, साथ-साथ आए। पुलिस ने बताया कि रस्बी अब इस दुनिया में नहीं है। किन्जान ने जिन्दगी का वो अँधेरा देखा, जिसे दूर कर पाने में ताजा उगा सूरज भी लाचार था।

दोपहर को दरवाजे की घंटी बजने पर जब किन्जान ने दरवाजा खोला तो एक जानी-पहचानी कार को खड़ा पाया। न्यूयॉर्क से आई महिला ने किन्जान के मिशन की असफलता के लिए दुःख व्यक्त किया, और अपने नन्हे पुत्रवत् प्यारे कुत्ते को ले जाने की पेशकश की। लेकिन जब किन्जान ने महिला के दिए डॉलर लौटाने चाहे तो उसने कहा कि इन्हें किन्जान अपने भविष्य के मिशन हेतु अग्रिम शुभकामनाओं के रूप में अपने पास रखे।

किन्जान ने लाचारी से यह प्रस्ताव स्वीकार किया, क्योंकि उसे महसूस हो रहा था कि महिला उसके साथ हुए हादसे के बारे में पूरी तरह जान चुकी है।

अब किन्जान का पहला मकसद बूढ़े से अपनी माँ के अतीत के बारे में ज्यादा-से-ज्यादा जानना था। किन्जान तो अब तक केवल यह जानता था कि वे लोग सोमालिया से यहाँ आए थे, किन्जान के पिता अमरीकी सेना में थे, और सेना में रहते हुए ही उनकी मृत्यु हुई थी।

बूढ़ा यह देखकर आश्वस्त था कि अब किन्जान ने अपना गुस्सा छोड़कर उसकी आत्मीयता को जगह दी है। उसने किन्जान को किसी परीलोक की कहानी की तरह पिछली बातों से रूबरू कराया।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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