मुक्तिबोध की कविताः ‘अँधेरे में’, भाष्यालोचन-7 // शेषनाथ प्रसाद श्रीवास्तव.

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मुक्तिबोध की कविताः अँधेरे में, भाष्यालोचन-7

पूर्व प्रसंगः

आतताइयों के हाथों पकड़ा जाकर काव्य-नायक कवि उनसे कड़ी सजा तो पाता है पर वह अनुभव करता है कि उसकी आत्मा बहुत ही कुशल है. वह उसकी देह में रेंगती संवेदना की उष्ण धारा और उसके झनझनाते तारों को समेट कर उसके मन में एक पत्थर-सा कठोर गठान बना देती है और चुपचाप दूर किसी फटे हुए मन (आतताइयों के अत्याचार से दूर स्थित उद्विग्न मन) की जेब में गिरा देती है (अर्थात दूर स्थित व्यक्ति तक यह संवेदना अपनी फैंटेसी-रचना द्वारा पहुँचा देता है). और काव्य-नायक पाता है कि समस्वर सहानुभूति की कोमल सनसनी कहाँ नहीं है. सिर्फ उसपर धूल पड़ी हुई है. आतताइयों के विरुद्ध क्रोध का प्रभंजन डोलता सभी के मन में है, भीषण शक्ति भी है सबके अंदर, पर उनका मन हिमवत और दीन हीन है. ऐसे ही हम अपना जीवन जिए जा रहे हैं. कवि अनुभव करता है कि यह जीवन भी अजीब अजीब रूप धारण करके अपने लक्ष्य के पथ पर (जीवन यापन के) चलता चला जाता है.

खंड-7 का भाष्यः

रिहा!!.............................................................................................तनाव दिन रात

उक्त अंतर्सोच की उधेड़बुन में पड़ा कवि अकस्मात पाता है कि उसे रिहा कर दिया गया है और उसके पीछे कुछ छाया-मुख (जासूस) लगा दिए जाते हैं. अब वे छायामुख हर पल उसका पीछा करते हैं. ये छायाकृतियाँ, जहाँ भी वह जाता है वहाँ, उनकी (छायामुखों की) भौंहों के नीचे के रहस्यमय छेद (जासूसों की आँखों की पुतलियों से जुड़ा कोई रहस्यमय यंत्र) संगीत मारते हैं अर्थात (उसके पास ही अपने होने का) ध्वनिसंकेत देते हैं. उनकी दृष्टि पत्थरी (निर्मम) है पर बहुत चमक वाली और पैनी है.

कवि को अपने पीछे आततायियों की जासूसी नजर होने और अपनी निष्क्रियता को महसूस कर इस निर्णय पर पहुँचता है कि उसे अब कुछ साथी खोजने होंगे. क्योंकि साथी बना कर ही वह आततायी दृष्टि से पीछा छुड़ा सकता है और उसका सामना भी कर सकता है. ये साथी कैसे भी हों- काले गुलाब-से, स्याह सिवंती या श्याम चमेली-से (याने कोमल कांत) कैसे भी हों. कवि सोचता है उसे उन्हें भी साथी बनाना होगा जो भूमि के भीतर पाताल तल में खोहों के जल में खिले हुए सँवलाए कमल-से ही क्यों न हों जो कबसे (क्रांति के) संकेत भेज रहे हैं और सुझाव-संदेश भी भेजते रहते हैं (कवि का ईशारा शायद उन क्रांतिकारियों की तरफ है जो आततायियों से बचने के लिए भूमिगत हो अपनी सक्रियता जारी रखे हुए थे. इसका और अधिक स्पष्ट अर्थ जानने के लिए जब मैंने नंदकिशोर नवल की आलोचना पुस्तक “लिराला और मुक्तिबोध” की ओर रुख किया तो मैंने पाया कि उन्होंने उसमें संकलित अपने लेख ‘अँधेरे में’ की अपनी व्याख्या में इस स्थल को छुआ ही नहीं है) साथी चुनने का विचार जब कवि के मन में आया कि इतने में सहसा उसे दिखा कि दूर क्षितिज पर, सफेद, नीले, मोतिया, चंपई और गुलाबी फूल, बिजली की नंगी लताओं (तने तारोंरूपी) से भर रहे हैं या उनमें गुँथे हुए हैं (कवि कठिन परिस्थति में भी प्रकृति जुड़े बिना नहीं रहता. संभवतः यह उस समय के क्षितिज के सौंदर्य का चित्रण है जब वह छितिज आततायियों के चंगुल से मुक्त कवि के सामने होता है. उस समय संभवतः संध्या का समय है और खंभों पर विद्युत के बल्ब जल उठे हैं जो किसी लता में गूँथे हुए से लगते हैं). उस क्षण की प्रकृति का यह आह्लादकारी दृश्य देख कर कवि के मन में होता है कि उन फूलों को समेट ले. उसके हाथ इस हेतु उठ भी जाते हैं. वह उन फूलों (सितारों, विद्युत-बल्बों) को अपलक देखने लगता है. इससे अचानक उसके भीतर विचित्र स्फूर्ति आ जाती है और वह जमीन पर पड़े हुए चमकीले पत्थरों (जो विद्युत बल्ब की रोशनी में चमक रहे हैं) को लगातार चुन कर बिजली के फूल बनाने की कोशिश करने लगता है. उसके मन में होता है कि ये उसके प्रस्तर (बलबों की रोशनी में चमकते पत्थर) भी हर क्षण रश्मि विकिरित करते हैं. ये रेडियो-ऐक्टिव (स्वतः रश्मि विकिरित करने वाले) रत्न की तरह हैं ये बिजली के फूलों की भाँति ही यत्नपूर्वक बनाए गए हैं. किंतु इस आह्लादकारी छवि को देखने के बावजूद कवि में गहरे असंतोष का भाव है. क्योंकि शब्दों द्वारा उस दृश्य की पूर्णाफिव्यक्ति के लिए वह अपने पास शब्दों के अभाव का संकेत पाता है. अतः वह एक गहरी असंतुष्टि का अनुभव करता है. उसे महसूस होता है कि वह जिसको अभिव्यक्त करना चाहता है उसके लिए उसके पास शब्दों का अभाव-सा है.

विद्युत-फूलों की इन पंक्तियों में कवि काव्य का चमत्कार देखता है. यह चमत्कार अपनी चमत्कारिता के जितना ही रंगीन है. किंतु इस काव्य-चमत्कार में उष्मलता नहीं वल्कि ठंढापन है. कवि को लगता है उसके भी फूलों (जिन्हें उसने जमीन पर पड़े चमक रहे पत्थरों को चुन कर बनाया है) में तेज है पर ये भी शीतल ही हैं (ये भी जीवन की उष्मा से अछूते हैं, थोड़ा अतिरेक करें तो कह सकते हैं कि इनमें क्रांति की उष्मा नहीं है). फिर भी उसके अंदर तीव्र इच्छा है कि (बल्बों में जलती बुझती) बेचैन बिजली की नीली ज्वलंत (वीकीर्ण हो रही किरणरूपी) बाँहों में अपनी बाँहों (जमीन पर पड़े जुने हुए पत्थरों से विकिरित रश्मिरूपी)

को उलझा कर प्रदीप्त (प्रकाश से भरी) लीला करता हुआ पूरे आकाश में साथ साथ घूमे. (कदाचित कवि यह कहना चाह रहा है कि उसमें क्रांति की ज्वाला है पर ढंढी है फिर भी वह उसे ही समस्त लोक में पहुँचाना चाहता है). वह महसूस करता है कि उसके पास बिजली का गौर (गोरा) रंग नहीं है. वह भीम आकार वाला काला मेघ है (जिसके गर्भ में बिजली छिपी रहती है) किंतु उसमें गंभीर आवेश है और संयम का अथाह प्रेरणा-स्रोत है. वह अनुभव करता है कि इन रंगीन पत्थर-फूलों से उसका काम नहीं चलेगा. वह चिंतामग्न होकर स्व-कथन करता है- वह क्या कहे, उसके मस्तक के कुंड में सत-चित-वेदना-सचाई और गलती ज्वलित है अर्थात सत्य, सद्चेतना, शोषित के प्रति सहानुभूति व सत्यकथन उबलता रहता है और उसकी मस्तक-शिराओं में तनाव दिन रात बना रहता है.

अब अभिव्यक्ति................................................................................अच्छी न लगती

इन पंक्तियों से लग रहा है कि देश की सामाजिक, राजनीतिक परिस्थिति को लेकर कवि के मन में घोर आक्रोश है. उसे यह अहसास भी है कि उसके अंदर शक्ति है, साहस है पर व्यापक फलक पर वह अपने तीखे विचार को रखता नहीं. अबतक वह अकेला था. अब वह साथी बनाने में जुट जाता है. इस मनस्थिति में अनायास दृढ़ संकल्प करता है-

अब उसे अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे. उन सभी मठों और गढ़ों को तोड़ने ही होंगे जो शोषकों ने शोषितों को प्रताड़ित करने के लिए बना रखे हैं. अब उसे इन दुर्गम पहाड़ों (वे अवरोध जिन्हें शोषकों ने उन शोषितों तक पहुँचने से रोकने के लिए बना रखा है) के उस पार पहुँचना ही होगा, तभी कहीं उसे वे (श्रमिक की) बाँहें देखने को मिलेंगी जिनमें हर पल एक अरुण कमल (श्रम का) काँपता रहता है अर्थात जिनके काँपते हाथों में उनके श्रम का फल (अरुण कमल) होता है. उस कमल को ले जाने के लिए (उस श्रम के महत्व को अंगीकार करने के लिए) उसे (कवि को) झील (उस कमल थामे बाँह और कवि के बीच की झीलनुमा अर्थात तरल दूरी) के हिम-शीत (शरीर को गला देमे वाले) सुनील जल में धँसना (प्रवेश करना) ही होगा. अर्थात तमाम कठिनाइयाँ झेली ही पड़ेंगी.

रिहा होने के बाद कवि कुछ सक्रिय अनुचिंतन में डूबा लगता है. चिंतन से बाहर आने पर उसे भान होता है कि आकाश में चाँद उग आया है. गलियों में आकाश एक लंबी चीर-सा मालूम होता है जिसमें चंद्रमा की किरणें तिरछी पड़ रही हैं. ऐसा लगता है जैसे वे किरनें गली में स्थित उस नीम (वृक्ष) पर तिरछी मार सी पड़ रही हों जिसके नीचे एक गोल चबूतरा स्थित है और उसपर नीली चाँदनी में कोई सुनहला दीया जल रहा है. यह दृश्य ऐसा लग रहा है मानो कोई अदृश्य स्वप्न ही साक्षात साकार हो उठा हो. भाग रहे कवि को राह में मकानों के बड़े बड़े सूने खंडहर मिल रहे हैं जिनके मटियाले भागों में (अर्थात खंडहर के वे भाग जो मिट्टी से एकाकार हो गए हैं) फूलों से भरी महकती रातरानी खिलती रहती है. वह अपनी जवानी में होते हुए भी लज्जित सी लगती है (अपने सामने खंडहर को देख कर). लगता है तारों से टपकती रोशनी उन्हें अच्छी नहीं लग रही.

भागता मैं दम छोड़.............................................................................तो भी अंतस्थ

रिहा होने के बाद भी कवि भाग ही रहा है. और भागते हुए कई मोड़ों को पार कर जाता है. पर भागते हुए भी वह चौकन्ना-सा है. उसे लगता है कि खंडहर की बच रही दीवालों के उस पार कहीं बहस गरम है (कदाचित सामयिक परिस्थिति पर). उन बहस करने वालों के दिमाग में जान है, उनके हृदयों में दम भी है. उनकी बहसों में सत्य से सत्ता के युद्ध का रंग है (अर्थात उनके मनस में सत्य के लिए सत्ता से युद्ध करने की उत्तेजना है). किंतु कवि अपने को कहीं कमजोर महसूस कर रहा है. उसे अहसास होता है कि उसकी सारी कमजोरियाँ उसके साथ हैं. वह अचानक पाता है कि लोग नगर की अँधेरी सुरंगनुमा गलियों में चुप चाप आ-जा रहे हैं. उनके पैरों में दृढ़ता है, गंभीरता है. बालक और युवा वर्ग शांतचित्त किसी आभ्यंतरिक बात (सोच) में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं. किसी के अंदर अग्नि धधक रही है (याने वे आक्रोस और उत्तेजना में है) तो भी वह अन्तस्थ ही है, अपने में ही डूबा हुआ है.

विचित्र अनुभव...............................................................................ओपने से दुकेला

कवि के लिए यह विचित्र अनुभव है. भागने के दौरान वह लोगों की जितनी ही पंक्तियों को पार कर आगे बढ़ता है उतना ही वह पीछे रह जाता है, अकेला. अर्थ यह कि लोगों की पाँतें इतनी लंबी हैं कि कितना भी वह आगे जाता है उसे लगता है अभी वह पीछे ही रह गया है, जैसे वह लोगों की भीड़ का पिछला पैर हो. इसी बीच लोगों का एक और रेला उसके पीछे से चला और अब सभी उसके साथ हैं. वह इस अद्भुत दृश्य को देख कर आश्चर्य में पड़ जाता है कि चलते हुए लोगों की मुट्ठियाँ बँधी है. मुट्ठी बना रही उनकी अँगुलियों की संधियों से लाल लाल किरणें फूट रही हैं (शायद साम्यवाद के झंडे उनकी मुट्ठियों में हों). कवि और आश्चर्य में पड़ जाता है जब उसे महसूस होता है कि ये लोग उसके ही विक्षोभ-मणियों और विवेक-रत्नों को लिए साहस के साथ अँधेरे में आगे वढ़ रहे है. अर्थ यह कि इन लोगों में वैसा ही विवेक और क्षोभ दिखाई दे रहा है जैसा उसके भीतर है. किंतु वह उनसे अपने को अलग और अकेला महसूस करता है. हाँ वौद्धिक जुगाली में वह अपने को दुकेला पाता है अर्थात वह सोचता है कि उसके साथ निज के अतिरिक्त बुद्धि भी है अतः वह दुकेला है.

गलियों के.............................................................................पारिजात-पुष्प महकते

कवि अँधेरी गलियों में भागा जा रहा है. इतने में कोई चुपचाप उसके हाथों में एक पर्चा थमा जाता है. पर्चा मिलते ही कवि के भीतर की कोई गुप्त शक्ति जागरित हो जाती है और उसके हृद-मन में उस पर्चे की चर्चा होने लगती है अर्थात पर्चा में क्या है वह रहस्य उसे कुरेदने लगता है. वह उस पर्चे को ध्यान से पढ़ता है और पढ़ कर आश्चर्यचकित हो उठता है. वह देखता है कि उसमें तो उसी के गुप्त विचार, उसकी दबी संवेदनाएँ, उसके अनुभव और उसी की पीड़ाएँ जगमगा रही हैं अर्थात व्यक्त की गई हैं. वह सोचने लगता है, आखिर यह सब क्या है.

कवि भाग रहा है अवश्य किंतु प्रकृति भी उसके मन और आँखों में झाँक झाँक जाती है. वह अपने मन के भीतर अपनी सोच को शब्द देने में लगा है. उसके शब्दों से बनी लकीरों (पंक्तियों) के बीच में आकाश झाँकता है अर्थात आकाश की लुभावनी झलक भी उसे बेधती है. और उसे अपने चिंतन-वाक्यों की पंक्तियों में आकाशगंगा-सी फैली दिखने लगती है. वाक्यों के उन शब्द-व्यूहों में तारे चमकते-से नजर आते हैं. इन तारक दलों में भी आँगन (शब्दाकाश) खिलता है अर्थात शब्दों के बीच के खाली स्थान (आँगन) चमकने लगते हैं. उसमें चंपा के फूल-सी चमक आती है. और शब्दाकाशों के कानों में गहरे तुलसी-से श्यामल चेहरे खिलते हैं और इन चेहरों के सुंदर मुखों से पारिजात-पुष्पों की महक लिए हुए आशय (सार्थक बातें) निकलते हैं.

पर्चा पढ़ते हुए........................................................................................ जन को

पर्चा पढ़ते हुए कवि हवा में उड़ने लगता है अर्थात बड़ी बड़ी बातें सोचने लगता है. कुछ ऐसा कि उसे लगता है कि वह चक्रवात की गति से आकाश में घूमने लगा है. किंतु उसके साथ वह जमीन पर भी सर्वत्र अपनी सचेत उपस्थिति पाता है. वह महसूस करता है कि वह प्रत्येक स्थान पर- चौराहे पर, दुराहे व राहों के मोड़ पर और सड़क पर उपस्थित है और काम में लगा है. वह पर्चे की सभी बातों को मानता है और उसे लोगों को मनवाने पर अड़ा है.

और तब (पर्चे की बातें मनवाने के समय) उसे दिशा (कर्तव्य-दिशा) और काल (प्रवहमान समय) की दूरियाँ अपने ही देश के नक्शे के समान टँगी हुई और रंगी हुई लगती हैं (याने नक्शे में रंगीन लकीरों से दिखाई गई सी). कवि सोचता है कि उसने जो स्वप्न देखा है और इस पर्चे में जिनकी वह अभिव्यक्ति पाता है उन स्वप्नों की कोमल किरनें ऐसी हैं कि मानो वे घनीभूत संघनित और द्युतिमान शिलाओं में परिणत होकर दृढ़ हो गई कर्मशिलाएँ (कर्म के पत्थर) हैं, जिनसे स्वप्नों की मूर्तियाँ बनेगी. जिसकी सस्मित (हास भरी) सुखकर (सुख देने वाली) किरणें ब्रह्मांड-भर में गतिमान होकर सबकुछ नाप लेंगी. कदाचित कवि का आशय है कि उसने जिस समाज-रचना का स्वप्न देखा है उसकी किरणें सर्वत्र फैल जाएँगी. उसे तो सचमुच में उसकी जिंदगी की सरहद सूर्यों के प्रांगण (जिस समय सूर्य की रोशनी धरती पर पड़ती है उस समय का पृथ्वी का हिस्सा सूर्य का एक प्रांगण होगा) के पार जाती-सी दिखती है. अर्थ यह कि उसके सपने का समाज समूचे संसार में होगा.

कवि कहता है कि वह परिणत है अर्थात उसने अपने को बदल लिया है, एक अन्य समाज-रचना के पक्ष में अपने को कर लिया है (काव्य-क्षेत्र में आने के बाद उन्होंने साम्यवादी विचारधारा को अपना लिया). वह कहता है कि कविता में कहने की उसे आदत नहीं है पर कहे दे रहा है कि वह वर्तमान समाज में चल नहीं सकता. वर्तमान समाज उसके रहने के लायक नहीं. क्योंकि इस समाज में पूँजी से जुड़े हुए हृदयों का बोलबाला है. और पूँजी से जुड़ा हृदय कभी बदल नहीं सकता. उसके अनुसार स्वातंत्र्य चाहने वाला व्यक्तिवादी (पूँजीवाद में व्यक्ति को महत्वपूर्ण माना जाता है. साम्यवाद में व्यक्तिवादी होना एक दोष माना जाता है) मुक्ति (शोषण से मुक्ति) की कामना करने वाले मन को छल नहीं सकता न ही मुक्तिकामी जन को छल सकता है.

पूँजी से जुड़ा हृदय कभी बदल नहीं सकता”, मुक्तिबोध का यह चिंतन एक परिपक्व मस्तिष्क का चिंतन नहीं लगता. क्योंकि मार्क्स के साथी एंजेल्स एक मिल के मालिक थे. अतः कहा जा सकता है कि एक वह पूँजीपति (पूँजीवादी नहीं) थे. किंतु उनका मन जनता के प्रति बदल गया था. भारत में गाँधी जी के अनुयायी जमनालाल बजाज भी पूँजीपति थे पर उनकी सहानुभूति श्रमिकों के प्रति अधिक थी.

आलोचनाः

‘अँधेरे में’ कविता के इस खंड में कवि कई स्थलों पर अचानक विषय परिवर्तन करता दिखाई देता हैं. उस स्थल की पंक्तियाँ कवि की एक स्वतंत्र अनुभूति को प्रकट करती-सी प्रतीत होती हैं. खंड-7 की यह कविता इन पंक्तियों से शुरू होती है - रिहा!!/ छोड़ दिया गया मैं….चमक है पैनी। इसमें आतताइयों के चंगुल से कवि के छूटने भर की चर्चा है. कैद में मिली प्रताड़ना के फलस्वरूप उसके मन में क्रोध उमड़ा होगा, वह उत्तेजित हुआ होगा. पर इसकी चर्चा यहाँ नहीं है, जिसके चलते उनके विरोधस्वरबप उसे साथियों के खोजने की आवश्यकता पड़ी होगी. अगली पंक्तियों में सीधे वह अपने लिए साथियों की खोज करने की बात करने लगता है- मुझे अब खोजने होंगे साथी....भेजते रहते। ये पंक्तियाँ कवि की एक अलग ही मनस्थिति को दर्शाती हैं. इसमें कवि की आतताइयों से लड़ने की व्यग्रता और आक्रोस का आभास नहीं है. इन पॆक्तियों में खोजे जाने वाले साथियों के गुण और प्रकार का चित्र है. पर वह साथी क्यों खोजना चाहता है, इसका इसमें कोई संकेत नहीं है. यह ‘क्यों’ ही उक्त दोनों अनुभूति खंडों को जोड़ सकता था. इसके बाद की पंक्तियों में वह आकाश के छितिज के सौंदर्य में खो जाता है जो एक स्वतंत्र ही अनुभूति है. यहाँ वह बिजली के फूलों को अपलक देखने में लीन हो जाता है और उसे बटोरने के लिए हाथ उठा लेता हैं. अचानक उसे लगता है इन विद्युत के फूलों से उसका काम नहीं चलेगा (वह करना क्या चाहता है इसका कोई संकेत यहाँ नहीं है). हाँ इतना वह अवश्य कहता है कि उसके मस्तक की शिराओं में दिन रात तनाव बना रहता है. पर उसके पास उसकी अभिव्यक्ति के लिए शब्दों का अभाव-सा है. इसी तरह इस कविता में अन्य स्थल भी हैं जो स्वतंत्र अनुभूति-से लगते हैं.

काव्य-भाषाः

इस कविता-खंड में कवि की काव्य-भाषा न तो स्वतःस्फूर्त है न ही स्वाभाविक. इस कविता में जन की बात की गई है, जन तक इस कविता का संदेश पहुँचता है या नहीं यह तो कवि और जन ही जानें, मुझे तो इस कविता का संदेश लेने के लिए अपने विवेक का उपयोग करना पड़ा है. संभव है मेरा विवेक कवि के विवेक के कहीं आड़े पड़ गया हो. जब कवि के पीछे छायाकृतियाँ लगा दी जाती हैं तो कवि कहता है- (उनकी) भौंहों के नीचे के रहस्यमय छेद/मारते हैं संगीत- मेरे विवेकानुसार भौंहो के नीचे के रहस्यमय छेद आँखों की पुतलियाँ ही हो सकती हैं जिससे ईशारा किया जा सकता है. कवि के रहस्यमय छेद संगीत मारते हैं. अभिधा में संगीत मारने का कुछ अर्थ नहीं होता. और मेरे जानने में संगीत मारना कोई मुहाबरा भी नहीं है. तो फिर कवि इस काव्यगत वाक्य-विन्यास से क्या कहने का प्रयास कर रहा है. मेरे विवेक ने इसका अर्थ ध्वनि-संकेत देना किया है जो अक्सर गुप्तचर करते हैं. फिर कुछ आगे चलने पर एक पंक्ति मिलती है- शब्दाकाशों के कानों में गहरे तुलसी श्यामल/ खिलते हैं/चेहरे!! यहाँ शब्दाकाश का अर्थ किया जा सकता है- शब्दों के बीच का खाली स्थान, किंतु उस खाली स्थान के कान से क्या लक्ष्यार्थ लिया जाए. और फिर उन कानों की गहराई में खिलते चेहरे से क्या आशय लिया जाए. शबदाकाश में खिलते चेहरे तो उस शब्द को गुन कर आनंद लेने वाले से हो सकता है. कवि की एक पंक्ति है- कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ , हालाँकि कवि जो कुछ कह रहा है वह कविता में ही कह रहा है. कदाचित उसका आशय है वह कविता में राजनीतिक भाषण नहीं दे सकता पर बात राजनीतिक ही है अतः उस राजनीति को वह कविता में कह दे रहा है.

अक्सर कुछ आलोचक मुक्तिबोध को निराला की कोटि में रखना चाहते हैं. पर मुक्तिबोध की इस सर्वश्रेष्ठ कविता के भाष्यार्थ के बाद मेरा अनुभव कुछ अलग है. निराला की कविताओं में शब्दों की दुर्बोधता अवश्य है पर थोड़ा सा प्रयास करने पर उनकी कविताओं का अर्थ खुलकर हृद-मन में आनंद की अनुभूति देने लगते हैं पर मुक्तिबोध की कविताओं के साथ ऐसी अनुभूति नहीं होती. इसमें केवल बुद्धि-विलास है जो थकान देता है आनंदानुभूति नहीं.

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