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दादाजी का चश्मा (लघु कथा ) // सुशील शर्मा

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"बिट्टो मेरा चश्मा कहाँ है " दादाजी ने जोर से आवाज़ लगाई

"पता नहीं दादाजी " बिट्टो ने दादाजी का चश्मा अपनी अलमारी में छुपाते हुए कहा।

बिट्टो को मालूम है अगर दादाजी को चश्मा दे दिया तो वो अभी पढ़ाने बैठ जायेंगे और न जाने कितनी डांट पड़ेगी तुम से ये नहीं बनता ,तुम से वो नहीं बनता और न जाने क्या क्या।

"बेटे सुरेश क्या तुमने मेरा चश्मा देखा है " नहीं बाबूजी मुझे नहीं पता सुरेश ने जानबूझ कर कहा जबकि उसने देख लिया था कि चश्मा बिट्टो ने छुपा दिया था। सुरेश को मालूम है अगर अभी चश्मा मिल गया तो बाबूजी सारे हिसाब को बारीकी से देखेंगे दुकान पर कितनी बिक्री हुई कितना खर्च और फिर ढेरो ताने " अभी तक दुकानदारी नहीं सीखी ,उल्लू जैसे बैठे रहते हो और  न जाने क्या क्या।

"बहु मेरा चश्मा ढूंढ दो " दादाजी ने शालिनी को आवाज़ दी।

"बाबूजी आप ही देख लो मुझे किचिन में बहुत काम है " शालिनी को पता था कि बाबूजी का चश्मा मिल गया तो अभी किचिन में आकर कई प्रकार के निर्देश मिलने लगेंगे "बहु तुमने सब्जी को कौन से तेल से फ्राई किया है ,खीर में केसर ऐसे नहीं डालते ,इतने सालों के बाद भी तुम अभी खाना बनाना नहीं सीख पाईं और न जाने क्या क्या।

"देखो न जाने मेरा चश्मा कहाँ रख दिया  मिल ही नहीं रहा  " दादाजी ने दादी से शिकायत की।

दरअसल आपका चश्मा बच्चों की स्वतंत्रता के नीचे दबा है उसे दबा ही रहने दो वैसे भी उस चश्मे की अब तुम्हें ज्यादा जरूरत नहीं है "दादी ने मुस्कुराते हुए कहा।

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