लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताओं में भूमंडलीकरण की आंधी में गाँव की चिन्ता - सुरेश कांटक

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लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताओं में

भूमंडलीकरण की आंधी में गाँव की चिन्ता

- सुरेश कांटक, कथाकार

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मेरे सामने युवा कवि लक्ष्मीकांत मुकुल का काव्य संकलन ‘लाल चोंच वाले पंछी’ है. इस संग्रह में उनसठ कवितायें संकलित हैं. इन तमाम कविताओं को पढ़ने और उन पर विचार करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि आज जब चारों तरफ बाजार अपनी माया फैला रहा है, हमारे मानव मूल्य इसी प्रचंड – धारा में तिरोहित हो रहे हैं, रिश्ते – नाते तिजारती जींस में बदल रहे हैं, भूमंडलीकरण के नाम पर आयातित विचार और जींस हमारी संस्कृति को निगलने में कामयाब है. एक कवि की चिन्ता अपनी मौलिकता को बचाने में संलग्न है. उसके शब्द उसके सपनों को साकार करने के लिए आकुल – व्याकुल हैं.

कवि अपनी रचनाओं में अपने गाँव को बचाने की चिन्ता जाहिर करता है. उनकी कविताओं में ‘पथरीले गाँव की बुढ़िया’ के पास बहुत बड़ी थाती है, वह थाती लोक कथाओं की थाती है. साँझा पराती की है.

जंतसार और ढेंकसारर की है. वह अपनी जिंदगी की नदी में लोककथाओं को ढेंगी की तरह इस्तेमाल करती हुई अपनी हर शाम काट लेती है. अतीत की घाटियों से पार करती वह वर्त्तमान की जिंदगी को भी देखती है, जहाँ तकनीकी हस्तक्षेप उसके गाँव की मौलिकता को निगलती जा रही है. कौवों के काँव – काँव के बीच उसे अपना अस्तित्व कोयल की डूबती कूक - सा लगता है. कवि कहता है –

‘रेत होते जा रहे हैं खेत / गुम होते जा रहे बियहन / अन्न के दाने / टूट – फूट रहे हैं हल जुआठ / जंगल होते शहर से अउँसा गए हैं गाँव /......दैत्याकार मशीन यंत्रों , डंकली बीजों / विदेशी चीजों के नाले में गोता खाते / खोते जा रहे हैं निजी पहचान.’

यहाँ निजी पहचान के खोने का दर्द कवि लक्ष्मीकान्त मुकुल की कविता में ढल कर आया है. गाँव की सुबह और गाँव का भोर कवि की आँखों में कई – कई दृश्य लेकर आते हैं, जहाँ आस्था के पुराने गीतों के साथ किसानों का बरतस है, ओसवनी का गीत है, महुआ बीनती लड़की का गौना के बाद गाँव को भूल जाने का दर्द है, हज़ार चिन्ताओं के बीच बहते हुए नाव की तरह अपने गाँव के बचपन की स्मृतियाँ है.

इस संग्रह में संकलित ‘लुटेरे’ और ‘चिड़ीमार’ जैसी कवितायें मुकुल की वर्त्तमान चिंताओं की कवितायें हैं, जिसमे बाजारवाद का हमारे जीवन में पैठ जाना, बिना किसी हथियार के ध्वस्त कर देना शामिल है. हमारी हर जरूरत की चीजों में मिला है उसका जहर, जो सोख लेगा हमारी जिंदगी को, अर्थव्यवस्था में दौड़ रही धार को.

‘अंगूठा छाप औरतों के लिए विदा गीत’ भी गाँव के मौसम और ढहते सपनों का दर्द बयान करती कविता हैं. इसमें खेत – खलिहान के कर्ज में डूबते जाने और प्रकृति में चिड़ियों का क्रंदन भी शामिल है. ‘धूमकेतु’ में गाँव को बचाने की चीख है, जिसे धूमकेतुनुमा भूमंडलीकरण ध्वस्त करने का संकेत देता है. “जंगलिया बाबा का पुल “जैसी कविता में हरे - भरे खेत को महाजन के हाथों रेहन रखने वाले किसानों की चीख समायी हुई है, जिससे जीवन के सारे मूल्य दरकते हुए लगते हैं.

कवि लक्षमीकांत मुकुल गाँव के साथ – साथ प्रकृति के दर्द को भी अपनी कविता में समेटने का प्रयास करते हैं. प्रकृति और फसलों का साहचर्य धुन इनकी कविताओं का मर्म है. ‘ धूसर मिट्टी की जोत में ‘ गाँव की उर्वरा शक्ति की ओर संकेत करता है कवि.

जब गाँव की बात आती है, तब किसान और मजदूर की छवि बरबस कौंध जाती है, ‘ पल भर के लिए ‘ कविता में गाँव की दहशत की आवाज है, जिसे खेत जोतकर लौटते हुए मजदूर झेलने को विवश होते हैं. ‘ इंतजार ‘ जैसी कविता में थके हारे आदमी और बांस के पुल घरघराना एक रूपक रचाता है, जिंदगी की बोझ और टूटते हुए साँसों की नदी का, जिसे सम्हालने में डरता है बांस का पुल.

शीर्षक कविता ‘ लाल चोंच वाले पंछी ‘ की पंक्तियाँ हैं –

“ तैरते हुए पानी की तेज धार में / पहचान चुके होते हैं वे अनचिन्हीं पगडंडीयां / स्याह होता गाँव / और सतफेडवा पोखरे का मिठास भरा पानी. “ ये पंछी नवंबर के ढलते दिन की कोंख से चले जाते हैं. धान कटनी के समय और नदी किनारे अलाप भर रहे होते हैं. वे दौड़ते हैं आकाश की ओर / उनकी चिल्लाहट से / गूँज उठता है बधार.....अटक गया है उनपर लाल रंग / बबूल की पत्ती पर. ये पंछी कौन ? ललाई लेकर आते हैं , पूरब का भाल लाल करने के लिए , स्याह होते गाँव में उजास भरने के लिए. इसलिए लाल रंग के रेले से उमड़ आता है घोसला

कवि इन पंक्तियों के माध्यम से यथास्थिति को तोड़ने वाले वैचारिक संदर्भों को चिन्हित करता है. बहुत बारीकी से वह प्रकृति का वह रूपक रचता है, जिसमें पंछी अपने विचारों की लाली लिए उतरते हैं. चिड़ीदह में झुटपुटा छाते ही जैसे और लगता है टेसू का जंगल दहक रहा हो, फ़ैल रही हो वह आग जो तमाम उदासियों को छिन्न – भिन्न कर देने का लक्ष्य पालती है अपने सपनों में.

अन्य कवितायें जिसमें ‘ कौवे का शोकगीत ‘ , ‘ पौधे ‘ , ’ बदलाव ‘ , ’ बचना – गाँव ‘ , ’ लाठी ‘, ‘इधर मत आना बसंत ‘ , ’ तैयारी ‘ , ’ आत्मकथा ‘ , ’ टेलीफोन करना चाहता हूँ मैं ‘ शामिल हैं, जो गाँव की विभिन्न स्थितियों का बखान करती हैं जिसमें कवि की बेचैनी साफ़ – साफ़ दृष्टिगोचर होती है. राजनीतिक दलों एवं नेताओं के हंगामे से मरती उम्मीदों की छाया भी दिखाती है, ‘ कौवे का शोकगीत ‘ जैसी कविता में अब निराशा के कुहरे जैसी लगती है नेताओं की बयानबाजी. गाँव के किसान मजदूर मगन रहते हैं अपने काम में. कौवा शोर होता रहता है. नये का आगम संकेतवाहक रूप नहीं दिखता उनमें.

फिर भी कवि भविष्य की उम्मीद जगाने की कविता ‘ पौधे ‘ लिखता है. अपने गाँव को हजार बाहों वाले दैत्य बाजारीकरण से बचने की सलाह देता है.

कुछ कविताओं में कवि का अतीत मोह भी चुपके – चुपके झांकता सा लगता है जैसे ‘लाठी‘

में. कहीं बाबा की मिरजई पहनकर गायब हो जाना चाहता है. पोख्ता वैचारिक दृष्टि सम्पन्न रचनाकार नये सृजन के नये आयामों को टटोलना बेहतर समझता है गुम हो जाने से.

कवि की प्रेम के प्रति गहरी आस्था भी एक कविता ‘ पहाड़ी गाँव में कोहबर ‘ को देखकर झलक जाती है. भयंकर दिनों में भी प्रेम की पुकार जिन्दा थी. बीहड़ जंगल की अँधेरी गुफा में भी रक्तरंजित हवा के साथ प्रेम की अमरता की शिनाख्त कर लेता है कवि. जो मानव सृष्टि का आधार है. कोहबर पेंटिंग में पूरे युग की त्रासदी बोलती है. प्रकृति, पंछी , जीव जंतु, मानव हृदय की धड़कन सब दिख जाता है उसे.

लोरिक - चंदा की प्रेम - लीला जैसे झांकती है लोकगाथा में.

इस तरह कवि में संभावनायें उमड़ती दिखती हैं. वैचारिक धार इसमें बहुत कुछ जोह जाती है. संग्रह की कवितायें उम्मीद जगाती है. पठनीय है. इसका स्वागत होना चाहिए.

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संपर्क :- कांट, ब्रह्मपुर,

बक्सर,बिहार - 802112

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