लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताओं में मौन प्रतिरोध है – कुमार नयन

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समीक्षा लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताओं में मौन प्रतिरोध है – कुमार नयन आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी मिट्टी, भाषा, बोली, त्वरा, अस्मिता, ग्राम...

समीक्षा

लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताओं में मौन प्रतिरोध है

– कुमार नयन

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आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी मिट्टी, भाषा, बोली, त्वरा, अस्मिता, ग्राम्यता, को बचाए रखना बहुत कठिन है, खासकर कविता में जहाँ रोज-ब-रोज शब्द अपना अर्थ खोते जा रहे हैं. ऐसे में कोई कविता या संग्रह अपनी जड़ों को तलाश करते हुए मानवीय संवेदना को स्पर्श करे, तो निश्चय ही मन की व्याकुलता और चिन्ता को एक

आलंबन मिलता है. युवा कवि लक्षमीकांत मुकुल का हाल में ही प्रकाशित काव्य संग्रह ‘लाल चोंच वाले पंछी’ की अधिकांश कवितायें इस अर्थ में पाठकों को काफी सुकून दे जाती हैं. पुष्पांजलि प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित इस संग्रह में कुल 59 कवितायें हैं, जो स्मृतियों के झरोखे से मानवीय मूल्यों की प्रतीति कराने में सचेष्ट दिखती हैं. कविताओं में अतीत के प्रति व्यामोह है, जो छूट गया, वह कितना जरूरी और मूल्यवान था, इसका एहसास बड़ी सिद्दत से इन कविताएँ में किया जा सकता है. आज के इस क्रूर समय में जहाँ रिश्तों पर बाज़ार का प्रभाव छाने लगा है, कवि एक पहाड़ी गाँव में प्रेम में पगे कोहबर की पेंटिंग को देखकर आशान्वित हो उठता है कि पृथ्वी के जीवित रहने की संभावनाएँ अभी भी जीवित है.

लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताओं में संवेदना का ज्वार है, तो मानवीय मूल्यों के टूटने की पीड़ा भी. सभ्यता के विकास के नाम पर जो शहरीकरण और बाजारीकरण हो रहा है, उसमें गाँव – जवार के तमाम प्राकृतिक अवयव और संसाधन हमसे दूर होते जा रहे हैं और तमाम सुविधाओं के बीच जीवन दूभर होता जा रहा है. आधुनिकता का अँधा दौर हमारी संवेदना को लीलता जा रहा है. हम न स्वयं को, न अपनों को, न अपने गाँव को, न छवर (पतला रास्ता) को पहचान पा रहे हैं – ‘बदलते युग की इस दहलीज पर / मानचित्र के किस कोने में बसा है तुम्हारा गाँव / किन सडकों से पहुंचा जा सकता है उस तक?’ (बदलते युग की दहलीज पर). कवि आधुनिकता की दौड़ में हो रहे बदलाव में विघटन देख रहा है. ‘गाँव तक / सड़क आ गयी / गाँव वाले / शहर चले गये’ संग्रह की इस छोटी कविता में त्रासदी भी है, पीड़ा भी. संग्रह की शीर्षक कविता ‘लाल चोंच वाले पंछी’ बहुत सहज और सरलता से यह एहसास करा जाती है कि जहाँ भी श्रम है, प्रकृति है, बदलाव है, सौंदर्य है, वहां लाल रंग है. कवि ने इस कविता द्वारा तथाकथित रूढ़ी को तोड़ने की कोशिश की है कि लाल रंग कोई हिंसा या खूनी क्रांति का प्रतीक है. लाल रंग तो प्रकृति, प्रगति और सकारात्मक परिवर्तन का द्योतक है.

लक्ष्मीकांत मुकुल की इन कविताओं पर आरोप है कि वे पूरी तरह से नोस्टाल्जिक हैं. कवि किसी भी तरह की आधुनिकता या कोई नयापन से गुरेज करता हुआ दिखाई देता है, परन्तु इसके बावजूद कविताओं में एक अनुपस्थित या परोक्ष प्रतिरोध का स्वर है. जो पूरी तरह मौन होकर भी वैश्विक पूंजीकरण और उत्तर आधुनिकता के समक्ष तन कर चीख रहा है.

बहुत ही शालीनता और सूक्ष्मता से कवि ‘चिड़ीमार’ कविता में आम लोगों को आगाह करता है – ‘वे आयेंगे तो बुहार ले जायेंगे हमारी खुशियाँ, हमारे ख्वाब, हमारी नींदें, वे आयेंगे तो सहम जायेगा नीम का पेड़, वे आयेंगे तो भागने लगेंगी गिलहरियाँ.’ कविताओं में व्यवस्था के प्रति मौन विरोध है, किन्तु कहीं-कहीं संयमित आक्रोश भी मुखर हुआ है, ‘इधर मत आना वसंत’ में कवि का आक्रोश प्राथमिकी दर्ज कराता हुआ चीख पड़ता है – ‘दूर – दूर तक फैली हैं / चीत्कारों के बीच चांचरों की चरचराहटें / फूस – थूनी – बल्लों से ढंकी दीवालों पर / पसर रही है रणवीर सेना की सैतानी हरकतें.’ कवि मन इस क्रूर व्यवस्था से इतना व्यथित है कि वह इस दुनिया से ही पलायन करने को संकल्पित हो उठता है. ‘आत्मकथ्य’ कविता में ब्यक्त इन भावात्मक विचारों को पढ़कर पाठक यह समझ सकते हैं कि कवि क्रूरता, अन्याय, कुव्यवस्था से लड़ने के बजाय कायरतापूर्वक पलायन को तरजीह देता है, जो कवि प्रकृति के सर्वथा प्रतिकूल है. परन्तु विचारणीय है कि जब मानवीय मूल्यों पर घोर संकट छाया हुआ हो और आम आदमी नियतिवाद के दुष्चक्र में फँसा हुआ नैराश्य और अवसादग्रस्त हो तो कवि की अभिव्यक्ति का विचलित हो जाना स्वाभाविक है. यहाँ कवि अवसादग्रस्त पीड़ित व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व करता हुआ यह निर्णय लेने को विवश दिखता है – ‘देखोगे / किसी शाम के झुरपुटे में / चल दूंगा उस शहर की ओर / जिसे कोई नहीं जानता ......  लोग खोज नहीं पायेंगे / कहीं भी मेरा अड़ान...... परिकथाओं से मांग लाऊंगा वायु वेग का घोड़ा / और चल दूंगा उस अदृश्य शहर की ओर.’ ऐसा नहीं है कि लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताओं में सिर्फ अतीत प्रेम और निराशात्मक बिम्ब हैं. इसमें भविष्य भी है और ‘अंखुवाती उम्मीद’ भी–

‘काश ! ऐसा हो पाता / पिता लौट आते खुशहाल / माँ की आँखों में पसर जाती / पकवान की सोंधी गंध / मेरी अंखुवाती उम्मीदों को मिल जाते / अँधेरे में भी टिमटिमाते तारे.’

दरअसल कवि की चिन्ता मानवीय रिश्तों की मिठास और प्रगाढ़ता बचाए रखने की है, जो सिर्फ और सिर्फ उन तमाम चीजों और क्रिया – कलापों को संजोकर रखने से ही संभव है, जो हमारे लिए बेहद आत्मीय प्राणदायी है, इसलिए – ‘महुआ बीनती हुई / हज़ार चिंताओं के बीच / नकिया रही है वह गंवार लड़की / कि गौना के बाद / कितनी मुश्किल से भूल पाएगी / बरसात के नाले में / झुक – झुककर बहते हुए / नाव की तरह / अपने बचपन का गाँव.’ उम्मीद जगाती कविता ‘उगो सूरज’ में कवि अपने मन की इच्छाएँ बेलौस होकर ब्यक्त करता है – ‘सूरज ऐसे उगो ! / छूट जाए पिता का सिकमी खेत / निपट जाए भाइयों का झगड़ा / बच जाए बारिश में डूबता हुआ घर / माँ की उदास आँखों में / छलक पड़े खुशियों के आंसू.’ कुछ ऐसे ही भाव ‘गाँव बचाना’ में भी उभर कर आये हैं.

कवि अपने गाँव और गाँव से जुड़ी सभी चीजों को, सात पुश्तों से चली आ रही इंसानी परंपरा की बुनियाद पर टिकी संस्कृति को बचाये रखने की गुहार लगाता है.

संग्रह की सबसे लम्बी कविता ‘कोचानो नदी’ जिसके किनारे कवि का गाँव ही नहीं हजारों गाँव बसते हैं, जो जन – जन के लिए ही नहीं, पेड़ – पौधों, पशु – पंछियों के लिए भी जीवनदायिनी है, वह संकटग्रस्त है. कवि को डर है कि नदियों और पर्वतों का सौदा करने वाली यह ब्यवस्था – ‘कहीं रातों – रात पाट न दे कोई / मेरे बीच गाँव में बहती हुई नदी को / लम्बे – चौड़े नालों में बंद करके / बिखेर दे ऊपरी सतह पर / भुरभुरी मिट्टी की परतें / जिस पर उग आये / बबूल की घनी झाड़ियाँ / नरकटों की सघन गांछें.’ संग्रह की अनेक कवितायें उल्लेखनीय हैं, जिसमें कवि की स्मृतियों का भावुक प्रलाप विविध प्रतीकों व बिम्बों में झलकता है, वस्तुतः ये कवितायें समय के दबाव को झेलती हुई मनुष्यता की कराह है, जो यथास्थिति एवं जड़ होती जा रही व्यवस्था के विरुद्ध प्रतिरोध रचती हैं. बेहद आंचलिक या देशज , ठेठी बोली के शब्दों के प्रयोग ने इसे लोकभाषाई ताना – बाना से पूरी तरह सराबोर कर दिया है. कहीं – कहीं ठेठ गंवई शब्दों के व्यामोह में अभिव्यक्ति कि स्पष्टता बाधित हुई सी लगती है. कवि को इसमें सावधानी बरतने की आवश्यकता है.

फिर भी सीधे सपाट बिम्बों और प्रतीकों में अभिव्यक्त लोक चेतना से आप्लावित ये कवितायें सफल और सार्थक वितान रचती हैं. सर्वत्र कवि का शिल्प वैशिष्ट्य और निजपन पाठकों को सुखद स्मृतियों के सहारे मानवीय संवेदना की अनुभूति प्रदान करते हैं. कहना चाहिए कि समकालीन आंचलिक कवियों के बीच लक्ष्मीकांत मुकुल अपनी कविताओं के खुरदरे रचाव और अपनी अल्हड अभिव्यक्ति में अलग और अभिनव हैं.

संपर्क –

कुमार नयन

खलासी मोहल्ला,

बक्सर – 802101

नाम

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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,152,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,2,बाल उपन्यास,6,बाल कथा,356,बाल कलम,26,बाल दिवस,4,बालकथा,80,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,20,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,31,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,288,लघुकथा,1340,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,20,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,378,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,79,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,2075,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,730,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,847,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,21,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,98,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,216,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,78,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi 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रचनाकार: लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताओं में मौन प्रतिरोध है – कुमार नयन
लक्ष्मीकांत मुकुल की कविताओं में मौन प्रतिरोध है – कुमार नयन
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