कहानी // घुंघरू // अर्चना अग्रवाल

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पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा शहर के सभी गणमान्य व्यक्ति आज यहां थे पुरस्कार स्वरूप नटराज स्वर्ण प्रतिमा मंच पर सुसज्जित थी जब बांसुरी को पुरस्कार ग्रहण के लिए पुकारा गया तो एकबारगी नमी सी उतर आई सभी की आंखों में मंत्रमुग्ध बांसुरी क्रीम कलर रेड बॉर्डर की खूब सूरत कांजीवरम साड़ी में शारदा प्रतिमूर्ति सी मंच की ओर बढ़ रही थी बालों में मोगरे का गजरा महक रहा था उन कुछ क्षणों में ही उसके सामने विगत चलचित्र सा घूम गया और सहसा स्मृति के अधमुंदे कपाट खुल गए

वो काली रात जिसने उसके पैरों में घुंघरू बांध दिए थे आज भी सिहरन दे जाती है

अम्मा ज़ार - ज़ार रो रही थी बापू झुग्गी के सामने ज़मीन पर चित पड़े थे उनके होठों के किनारे से झाग निकल रहा था शायद ज़हरीली शराब के कारण । छोटा भाई बंटी नाक निकाले बिसूरता फिर रहा था

बस उस रात से बांसुरी दिवाली ,होली ,ईद ,जन्मदिन सब रिवाजों ,धर्मों को मान कर नाचने लगी थी अच्छे खाने और थोड़ी बख्शीश के लालच में ।

रागिनी हो या फूहड़ बॉलीवुड आइटम नंबर बांसुरी थिरकने लगती राधे बचपन का साथी ढोलक बजाने लगता और मजमा सीटियां ।

काले घुप्प आसमान में आम की फांक सा चांद निकलता तो वह बदहवास बिना खाए पिए सोए रहती सारा गीत संगीत आवाजें चांदनी की दूधिया धार में .शांत हो जाती या यूं कहिए कि किसी अनजाने क्षितिज की ओर बह जातीं ।

बंटी के स्कूल की फीस ,अम्मा की पैबंद लगी धोती ,कमरे का किराया, बिजली का दो महीने का बकाया बिल बेताल की तरह उस पर चढ़े थे और वह जिजीविषा की चाह में अंदर रुदन बाहर झूठी हंसी पहने थी ।

बस विवशता और राधे थे उसके अंतर्मन के साक्षी ।

वह मंच पर साथ देता रहता और उसके गुलाबी पाँव थिरकते रहते उन वहशी घूरती निगाहों के सामने यह बचपन का साथी कभी ज्यादा बात करने की कोशिश भी नहीं करता । कैसा रिश्ता है इन दोनों के दरमियान जीवन की कटु सच्चाईयों को शायद शब्दों की जरूरत ही नहीं होती वहां सिर्फ भयानक सन्नाटा पसरा रहता है ।

दुख को सुख से सहने का अभ्यास करना पड़ता है ।

जीवन दो तरह से जिया जाता है एक तप कर दूसरा जलकर बांसुरी ने तपने का मार्ग अपनाया था

मां ,बंटी के स्नेह और मोह के धागों ने जकड़ कर उसे अपने बारे में सोचने का अवकाश ही नहीं दिया तांबा जले बिना सोने का गहना कहां बन पाता है ?

शुरू में अनगढ़ और हाथ पैर हिलाना ही नृत्य था जो धीरे-धीरे कुशल भाव और अद्भुत नाट्य कौशल में परिवर्तित होता चला गया ।

यौवन के आगमन ने गोरी ,उजली, दुबली सी बाँसुरी को तीखी नाक और पाखी से फड़कते गुलाबी अधर प्रदान कर दिए थे ।

पद्मगंधा, पद्मिनी सी बांसुरी सभी के हृदय स्थल पर राज करने लगी थी । अपनी भ्रू भंगिमा से दर्शकों के हृदय को क्षत-विक्षत कर देना उसके बाएं हाथ का काम होने लगा ।

शहर में उसके मंच पर पहुंच जाने की खबर से ही उन्माद फैलने लगा ,जाने कितने दिल फेंक आशिक पहुंच जाते और उसे देखकर आहें भरने लगते ।

राधे ने उसके डांस वीडियो यूट्यूब पर क्या अपलोड किए लाइक और कमेंट के धाराप्रवाह आक्रमण होने लगे

शो की एडवांस बुकिंग और नोटों की बरसात ने दिन ही बदल दिए । आलीशान कोठी ,बंटी का नामी कान्वेंट हॉस्टल में एडमिशन ,शोफर सहित दीर्घ देही गाड़ी पोर्च में सुसज्जित हो गयी ।

बस एक बात अपरिवर्तनशील रही राधे वह बिना कोई मेहनताना लिए उसके साथ साए की तरह रहता मनचलों की भीड़ से पान की तरह बचा सहेज लाता बांसुरी को ।

अम्मा की बूढ़ी आंखें सब गुनती थीं ,समझती थीं पर निशब्द रह कुछ कह नहीं पाती थी आईने में देख घुंघराले बालों की लट जब बेटी कानों की लवों के पीछे संवारती तो अम्मा काला टीका लगा देती धड़कते दिल के साथ ईश्वर रक्षा करें मेरी बांसुरी की ।

परंतु जब ललाट की लकीरें ही यदि प्रवंचक बन जाए तो भला कोई क्या करे?

शहर में चुनाव की गहमागहमी थी सत्ताधारी पार्टी और विपक्ष में कांटे का संघर्ष था दोनों एक दूसरे की संपूर्ण बखिया उधेड़ने में पुरज़ोर व्यस्त थे मीडिया के अगणित व अचूक कैमरे जलसे ,सभाएं हर प्रकार से मतदाताओं को लुभाने की उचित ,अनुचित नीति -अनीति अपनाई जा रही थी कि किसी अंतरंग सलाहकार ने सत्ताधीश पक्ष को सलाह दी क्यों ना बांसुरी का नृत्य शो आयोजित कर मतदाताओं को मंत्र पूत डोर से खींचा जाए । उड़ते-उड़ते यह खबर विपक्ष को भी मिली अब दोनों ही पार्टी बांसुरी के शो का आयोजन में तत्पर हो गई

सत्ताधारी पक्ष दबंग बिल्डर कुंजबिहारी के आश्रय में था जो शहर का डॉन माना जाता था

दोनों प्रस्ताव एक साथ बांसुरी के समक्ष जा पहुंचे सर्वप्रथम राधे ही शो की प्रस्तावना का सूक्ष्म व कुशल निरीक्षण करता था । कुंज बिहारी के आदमियों की अकड़ और नृत्य फीस पूछने के अभद्र तरीके से राधे कुछ उखड़ गया. उसने सोने की गठरी को लात मारकर शो से मनाही क्या की कुंज बिहारी का सर्वांग जल उठा

" इतनी . हेठी ? उस नाचने वाली पतुरिया की ? अब तक तो सिर्फ नाचने का ही प्रस्ताव भिजवाए थे अब तो साली की नथ भी उतरेगी हमारे गैस्ट हाऊस में "

ऐसी निकृष्ट टिप्पणियाँ जब बांसुरी व राधे को पता चली तो अब प्रतिवाद और उग्र हो उठा , आनबान का प्रश्न बन गया ।

इस विराट अग्नि में घी डाला बांसुरी के अद्वितीय नृत्य प्रदर्शन ने जो उसने विपक्षी पार्टी के समर्थन में किया I

हाथ भर सावनी चूड़ियां ,नाक पर झलमल सी हीरे की लौंग और गुलाबी जयपुरी लहंगा पहन जब वह रंभा सदृश मंच पर आवृत हुई तो मानो रात्रि के सितारे भी पृथ्वी को उचक उचक कर देखने लगे ।

कुंजबिहारी की क्रोधाग्नि ने प्रचंड रूप धारण कर एक ऐसे वीभत्स षडयंत्र की योजना बनाई कि स्वयं विधि भी सर्वांग कांप उठी

शो से आते हुए बांसुरी पर एसिड प्रहार कर निर्दयी ने अपना प्रतिशोध ले ही लिया

मर्मांतक पीड़ा ,अभेद्य चीखें और शहर भर की सुर्ख़ियों ने बांसुरी पर हुए इस क्रूरतम प्रहार को खूब तूल दिया ।

दबे छुपे ही सही सर्वत्र सत्ता पक्ष की आलोचना होने लगी । सरकार के विशिष्ट पदाधिकारी भी मामले की गंभीरता से चूहे की भांति बिल में जाकर दुबक गए

लोकतंत्र के अचूक सटीक चतुर्थ स्तंभ मीडिया से भला कौन बच पाया है ?

यू ट्यूब के लाखों फॉलोवर्स , टी वी शो में अनवरत डिबेट ने इस कांड को कई दिनों तक अखबार के प्रथम पृष्ठ की सुर्खियां बनाए रखा

प्रतुल जनाक्रोश के कारण आखिर सरकार को उसके विदेशी इलाज का खर्च उठाने की मंजूरी देनी पड़ी और बांसुरी, उसका गुलगोथना सा शरीर एसिड के प्रहार से मज्जा हीन व गड्ढों से भर गया था ।विवर्ण र्और असमय नुच गए पंखों की कोमल काया जीता जागता खंडहर बन गई थी वो ।

राधे के साथ जब प्लेन में बैठी तो पीले शिफॉन दुपट्टे से मुंह ढक लिया बेचारी ने ।

माँ तो जैसे इस दुख के पहाड़ के टूटने से सन्न हो गई थी बस पत्थर बनी उसे जाते देख रही थी

अमेरिका में लगभग पचास अनथक सर्जरी की गईं ताकि नाक , अधर पुनः संपुष्ट किए जा सकें

इलाज के दौरान बांसुरी वाशरूम में आईना देख डरकर चीखे मारने लगी तो उस पूरी रात राधे के पुष्ट वक्ष से भयभीत चिरैया सी सटी रही और वह उसकी सिसकियों से कांपती पीठ को सहला बस मूक धैर्य बंधाता रहा तब मानो कईं सितार मद्विम सुर में बजे उठे ।

विज्ञान ने अन्यतम चमत्कार कर बांसुरी को पुनः अप्रतिम सौंदर्य प्रदान कर दिया  |वहीं मोहक मुखमुद्रा, सिमत से पुष्ट होते गुलाबी अधर और अप्सरा सी जगमगाती कामिनी काया, आह ! कौन ना इस मदन बाण से बिंध जाए ।

राधे ने उसे जादूई इंटरनेट पर शास्त्रीय नृत्य की अनेक वीडियो दिखा अहर्निश अभ्यास कराना प्रारंभ कर दिया इस एकांत का इससे अच्छा भला क्या सदुपयोग हो सकता था?

स्वदेश लौट कर भी बांसुरी घंटों बंद कमरे में अभ्यास करती राधे दक्ष समीक्षक की भांति पद प्रचालन देखता। अम्मा खाने पीने की उचित व्यवस्था कर बूढ़ी आंखों की कोरों में आए अश्रु धोती के पल्लू से चुपचाप पोंछ लेती ।

अंततः वह प्रतीक्षित क्षण आ ही गया जब बांसुरी ने मंच पर नए कलेवर में संपूर्ण शास्त्रीय नृत्य का प्रदर्शन किया । पूरा सभागार वाह , वाह की करतल ध्वनि से गूंज उठा । इस नए जन्म में बांसुरी नृत्य कला को अपनी क्षमता से सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित कर चुकी थी I

और आज यह नटराज पुरस्कार जैसे स्वयं ही धन्य हो गया उसे पाकर सच घुँघरू अब बाज़ार से कला के सौंदर्यतम शिखर पर पहुंच चुके थे और बांसुरी अब नटी नहीं कुशल नृत्यांगना थी ।

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अर्चना अग्रवाल 

शिक्षा - एम.ए. बी.एड

दिल्ली विश्वविद्यालय में दो बार सर्वश्रेष्ठ लेखन पुरस्कार विजेता

ई बुक प्रकाशित - आँसू और दिल

ई बुक प्रकाशित - मन के धागे @juggernaut.in

ई बुक प्रकाशित - मोरपंख pothi.com

ई बुक प्रकाशित - भीगा मन @juggernaut.in

Twitter id- Archana@archanaaggarwa9 .

हृदय के अनकहे भावों को कलम द्वारा अंकित करने का प्रयास करती हूँ । कहाँ तक सफल होती हूँ इसकी गणना पाठकगण स्वयं करें I

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2 टिप्पणियाँ "कहानी // घुंघरू // अर्चना अग्रवाल"

  1. वाह आज आपकी यह अप्रतिम रचना घुंघरू पढकर मुंशी प्रेमचंद की लेखन शैली की याद तरोताजा हो गयी । मैं मंत्रमुग्खोध सा गया था और अंत में जब आपकी तस्वीर दिखी तब ध्यान आया आपकी लेखनी से है । वाह ईश्वर ने क्या खूब कला दी है ।

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