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कहानी // घुंघरू // अर्चना अग्रवाल

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2 टिप्पणियाँ

  1. वाह आज आपकी यह अप्रतिम रचना घुंघरू पढकर मुंशी प्रेमचंद की लेखन शैली की याद तरोताजा हो गयी । मैं मंत्रमुग्खोध सा गया था और अंत में जब आपकी तस्वीर दिखी तब ध्यान आया आपकी लेखनी से है । वाह ईश्वर ने क्या खूब कला दी है ।

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