लघु व्यंग्य // सम्मान खरीद लो (संस्मरण) // सुशील शर्मा

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सम्मान खरीद लो

(संस्मरण)

सुशील शर्मा

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आज मन उदास है, न जाने क्यों खुद पर गुस्सा आ रहा था क्यों मैंने अपनी किताब भेजी थी सम्मान पाने के लिए,कोई भी साहित्यकार कितना भी विनम्र कितना भी वरिष्ठ क्यों न हो उसके मन में सम्मान की लालसा बनी रहती है। कई पटल पर मैंने उपदेश देते हुए साहित्यकार देखे हैं जो कहते है मुझे सम्मान की कोई ललक नहीं है मेरा लेखन तो स्वान्तः सुखाय और लोक कल्याण के लिए है और अगले ही दिन अपना एक लंबा चौड़ा बॉयोडाटा सम्मान के लिए भेज देते हैं। ये स्वाभाविक मानवीय वृति है इसमें गलत कुछ भी नहीं है सिर्फ एक बात गलत है कि आप कहते कुछ है और आपकी इच्छाएं उस प्रवचन के ऊपर चढ़ कर सम्मान के लिए कुलबुलाने लगती हैं।

मैंने भी पटल पर सम्मान की लालसा नहीं है पर लम्बा चौड़ा भाषण पेल कर अपनी एक किताब तुरंत सम्मान के लिए भेज दी।

उधर से तुरंत मेरी पुस्तक के कसीदे पड़े जाने लगे और सम्मान को सुनिश्चित कर दिया गया फिर वो थोड़ा हंसे बोले" हें हें हम सम्मान तो बिल्कुल निशुल्क देते है लेकिन अब आप तो जानते है इस महंगाई के दौर में व्यवस्थाओं पर खर्च होता है इस हिसाब से दो हज़ार भेज दीजिए। हाँ आपकी टिकिट और रहने व खाने पीने का इंतजाम हम कर देंगे उसका अलग से तीन हज़ार कुल आप पांच हज़ार मेरे फलां फलां खाते नंबर में फलां दिनांक तक जमा कर दीजिए।"

मुझे लगा जैसे मैंने किताब लिख कर कोई अपराध किया है और उसको सम्मान के लिए भेज कर तो जैसे खुद का मर्डर ही कर लिया।

मैंने उनसे कहा कि "महोदय मैं बहुत छोटा सा लेखक हूँ शायद गलती से आपके बहु प्रतिष्ठित सम्मान के लिए यह किताब चली गई इसके लिए मुझे माफ़ कर दें।"

कहने लगे "आप में साहित्यिक समझ नहीं है आप वास्तव में इस सम्मान के लायक नहीं है। अगर आपको किताब वापिस चाहिए तो डेढ़ सौ रुपये मनी आर्डर से भेज दो"।

मुझे पांच हज़ार के उस सम्मान से ज्यादा उचित अपनी किताब को वापिस बुलाना लगा । मैं डेढ़ सौ रुपये का मनीऑर्डर करने पोस्ट आफिस जा रहा हूँ।

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