आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय : अध्याय : २ - आध्यात्मिकता की परिभाषा एवं अर्थ - लेखक : डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास - भाषांतर : हर्षद दवे

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आध्यात्मिकता से एकता एवं समन्वय

लेखक

डॉ. निरंजन मोहनलाल व्यास

भाषांतर

हर्षद दवे

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प्रस्तावना  अध्याय 1


अध्याय : २

आध्यात्मिकता की परिभाषा एवं अर्थ

आध्यात्मिकता की परिभाषा करना मुश्किल है इस का एक कारण यह है कि इस विषय में आम लोगों की जो धारणा है उस का संबंध धर्म एवं ईश्वर के साथ जुड़ा हुआ है. इसी कारण शिक्षा, व्यवसाय या राजनीति से जुड़े हुए लोगों को इस शब्द का प्रयोग करने में संकोच होता है. इसलिए आध्यात्मिकता की परिभाषा करने से पहले यह प्रश्न पूछना आवश्यक हो जाता है कि 'क्या ईश्वर धर्म और आध्यात्मिकता ये तीन शब्दों के बीच किसी प्रकार का संबंध है?'

clip_image001ईश्वर

धर्म आध्यात्मिकता

आकृति: २.१ ये तीन शब्दों को जोडती आम धारणा

आध्यात्मिकता से संबंधित मेरी खोज में इंटरव्यू के दौरान मैं लोगों को दो प्रश्न पूछता हूँ:

१. क्या आध्यात्मिक मनुष्य का धार्मिक होना आवश्यक है?

२. क्या यह बात सही है कि आध्यात्मिक मनुष्य ईश्वर के अस्तित्व पर हमेशा विश्वास रखता है?

उत्तर देनेवाले लोगों ने दृढतापूर्वक ऐसा दर्शाया कि सही आध्यात्मिक मनुष्य का धार्मिक होना या किसी धर्म का पालन करना आवश्यक नहीं है. उसका किसी धर्म विशेष का अनुयायी होना भी आवश्यक नहीं है. दूसरे प्रश्न का उत्तर भी उतना ही दिलचस्प था. उन्होंने बताया कि हो सकता है कि आध्यात्मिक मनुष्य ईश्वर पर विश्वास रखता हो या संभव है नहीं भी रखता हो. आध्यात्मिक होने के लिए ईश्वर पर विश्वास रखना कोई पूर्वशर्त नहीं है. फिर भी कुछ लोगों ने ऐसा प्रत्युत्तर दिया कि सच्ची आध्यात्मिक व्यक्ति, जो आध्यात्मिकता का दृढ़ता से पालन करती हो, हो सकता है ईश्वर पर उसका दृढ़ विश्वास हो.

इंटरव्यू के दौरान यह बात भी ज्ञात हुई कि उच्च धार्मिक मनुष्य आध्यात्मिकता पालन करता हो यह आवश्यक नहीं. संभव है वह आध्यात्मिकता का पालन न भी करता हो. उदाहरण के लिए हम देखते हैं कि कई आतंकवादी समूह अत्यंत धार्मिक होने का दावा करते हैं किन्तु उन्हें आध्यात्मिक नहीं कहा जा सकता.

प्रकट रूप से धर्म एवं ईश्वर के बीच का संबंध स्वाभाविक सा लगता है किन्तु इंटरब्यू के दौरान हुई बातचीत से पता चला कि अधिक बातचीत करने पर या फिर अधिक प्रश्न पूछने से बात उलझ जाती है, जटिल बन जाती है.

विश्व के सारे धर्म यही दर्शाते हैं कि ईश्वर की भक्ति करना और ईश्वर पर भरोसा रखना एक समान है. फिर भी, ईश्वर पर विश्वास करने वाले लोगों के लिए यह जरुरी नहीं कि उन्हें किसी न किसी धर्म का पालन करना ही चाहिए. ट्रिनिटी कालेज में दिसंबर, २०११ में अमरीका में किये गए एक सर्वेक्षण में औसतन ९३ प्रतिशत लोगों ने ऐसा कहा कि वे ईश्वर पर या सर्वोपरि सत्ता पर विश्वास करते हैं. केवल ७ प्रतिशत लोगों ने अपने आप को नास्तिक बताया. इस के अतिरिक्त जिन लोगों ने ऐसा कहा कि वे ईश्वर पर भरोसा रखते हैं उनमें से १२ प्रतिशत लोग किसी भी धर्म से जुड़े हुए नहीं थे. यह प्रतिशत युवा वर्ग में इस से भी अधिक है, जो कम से कम २५ प्रतिशत है ऐसा इस सर्वेक्षण से ज्ञात होता है. उनमें से कई लोग जीवन का अर्थ खोजने के लिए आध्यात्मिकता की ओर मुड़ते हैं. उन का मानना है कि आध्यात्मिकता का पालन करने से लोग अधिक अच्छे, अधिक प्रेमपूर्ण बनते हैं और उन में क्रोध की मात्र कम होती है. फिर तो आध्यात्मिकता का पालन करना और भी अधिक अच्छी बात है.

एरिक वेईनर ने २०११ के न्यूयॉर्क टाइम्स के एक लेख में कहा है, 'इस में कोई आश्चर्य नहीं कि कई अमरीकन लोग दलाई लामा से प्रेरणा पाते हैं. वे अक्सर अच्छे से ठहाका लगाते हुए हँस पाते हैं.' लेखक आगे कहते हैं कि,'हमारे प्रतिष्ठित नेताओं में से बहुत कम नेता ऐसे हैं जो खुल कर हँस पाते हैं, शेष नेता चिल्ला कर उपदेश ही देते रहते हैं.' ईश्वर आश्चर्य चिन्ह नहीं, अर्द्ध विराम है जो कि लोगों को संकलित और जागृत करता है. हम यह दृष्टि कहीं गँवा बैठे हैं.

निस्संदेह, धर्म और राजनीति के बारे में एक साथ बहुत कुछ कहा जाता है, फिर भी, वह मूलतः एक दूसरे से भिन्न है. परिभाषा के अनुसार राजनीति एक सार्वजनिक प्रवृत्ति है. धर्म में भी लोगों का विशाल समुदाय होता है, यद्यपि उस के मूल अर्थ के अनुसार यह व्यक्तिगत बात है. यह हमारा अपने खुद के साथ का संबंध है, अथवा जिस प्रकार ब्रिटिश तत्वचिन्तक आल्फ्रेड नार्थ वाईटहेड कहते हैं इस प्रकार से, '(यह) मनुष्य एकांत में जो करता है वह है.'

यहाँ एक समस्या है: प्रकट रूप से निजी भावना के बारे में धर्म की बात कैसे की जा सकती है? इस का क्या उपाय? मेरे विचार से इस में अमरीका की संशोधन वृत्ति महत्वपूर्ण हो जाती है. ईश्वर तत्व क्या है? इस की खुले आम चर्चा करना उचित है.

धर्म के विषय में हमें 'स्टीव जॉब्स' (एपल कंपनी के स्थापक) की आवश्यकता है. हकीकत में कुछ ऐसे लोगों की जरुरत है जो अब नया धर्म नहीं किन्तु स्टीव जॉब्स के संशोधनों की तरह शायद धार्मिक बनाने की नई रीत खोज सकें. यह नया रास्ता बिना जटिलतावाला या बोझ रहित और सम्पूर्ण रूप से आत्मज्ञान (सहजबुद्धि) पर आधारित हो सकता है. मैं ऐसे धार्मिक स्थान की कल्पना करता हूँ कि जहाँ संदेह करने पर उत्सव मनाया जाता हो, जहाँ प्रयोगशीलता को प्रोत्साहित किया जाता हो और सब को निस्संकोच 'ईश्वर' शब्द बोलने की अनुमति हो. हम सब के लिए हमें एक धार्मिक ऑपरेटिंग सिस्टम की आवश्यकता है.

यह मेरा अटल विश्वास है कि वेईनर का अभिप्राय धर्म और ईश्वर के बीच के सही सम्बन्ध का उदाहरण प्रस्तुत करता है. और यह आध्यात्मिकता को उचित रूप से समझाता है. कुछेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों के इंटरव्यू (साक्षात्कार) के समय मेरे उनके साथ किये गए विचार-विमर्श का मैं यहाँ समावेश करना चाहूँगा. इस से विचार-विमर्श से यह स्पष्ट रूप से जाना जा सकता है कि कुछ नास्तिक लोग भी आध्यात्मिकता पर विश्वास करते हैं और आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करते हैं.

v आध्यात्मिकता: परिभाषा

जैसा कि हमने पहले कहा, आध्यात्मिकता की परिभाषा देना सरल नहीं. फिर भी, कुछ विशेषज्ञों और विद्वानों के द्वारा दी गई आध्यात्मिकता की परिभाषाएँ अब तक किए गए वार्तालापों को स्पष्ट रूप से समझने में ज्यादा उपयोगी बनती हैं.

मुझे दलाई लामा के द्वारा दी गई परिभाषा अधिक पसंद है. वे आध्यात्मिकता को जिसमें समझदारी का गहन चिंतन हैं ऐसी मानवीय प्रेम, करुणा, क्षमा जैसी भावनाओं के साथ जोड़ते हैं. 'दी आर्ट ऑफ़ हैपीनेस' नामक आध्यात्मिक जीवन विषयक पुस्तक में दर्शाया गया है कि:

दलाई लामा ने इस बात पर भार देते हुए कहा है कि: आंतरिक शिस्त आध्यात्मिक जीवन की नींव है. सुख प्राप्त करने की यह मूल पद्धति है. वे अपनी पुस्तक में समझाते हैं कि उनके यथार्थ एवं सापेक्ष दर्शन के अनुसार आंतरिक शिस्त में मन की नकारात्मक अवस्थाएँ, भावनाएं जैसे कि क्रोध, नफरत, लोभ इत्यादि के साथ लड़ना होता है और मन की सकारात्मक भावनाएं जैसे कि भलाई, करुणा, सहनशीलता इत्यादि को विकसित करना होता है. उन्होंने हमारा ध्यान उस बात के प्रति आकर्षित किया है कि मन की शांत व स्थिर अवस्था सुखी जीवन की बुनियाद है. आंतरिक शिस्त बनाए रखने की कोशिश करने में ध्यान की औपचारिक पद्धतियों को समाविष्ट किया जा सकता है, कि जिस से मन को स्थिर और शांत करने में सहायता मिल सकती है. अधिकतर आध्यात्मिक परम्पराओं में मन की शांति पाने की बात आती है, कि जिससे हम अपने भीतर की गहन आध्यात्मिक प्रकृति की गहराई में जा सकते हैं.

एक बार दलाई लामा ने अपने वार्तालाप का समापन करते हुए ध्यान के सन्दर्भ में एक बात कही थी जो हमें हमारे विचारों को शांत करने में और मन की आंतरिक प्रकृति का निरीक्षण करने में सहायक बनती है; और इस प्रकार से 'मन की शांत' अवस्था विकसित की जा सकती है.

उपस्थित श्रोतागण को देखकर उन्होंने अपनी लाक्षणिक शैली में जैसे वे किसी विशाल समूह को संबोधन कर रहे हो इस प्रकार से कहने के बजाय जैसे कि वे श्रोतागण में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति को अलग रूप से सूचना दे रहे हो इस प्रकार से कह रहे थे. बीच में वे मौन हो जाते थे तो कभी अधिक उत्साहित हो कर अपने अनुदेश को चेष्टा के साथ हलका सा मस्तिष्क झुकाकर, हाथ की मुद्राओं के द्वारा और नाजुक गति के साथ मोड़ कर घुमा कर प्रत्यक्ष दिखा रहे थे. इस व्यायाम का हेतु अपने मन की प्रकृति को पहचानने का और उसका एहसास पाने का था. उन्होंने कहा कि, 'आम तौर पर जब हम अपने 'मन' की बात करते हैं तब हम एक अमूर्त ख़याल के बारे में बात कर रहे होते हैं. अपने मन से उसका सीधे ही कोई अनुभव किए बगैर बात कर रहे होते हैं. उदाहरण के रूप में यदि हमें मन को पहचानने के लिए कहा जाए तो अनिवार्य रूप से दिमाग की बात करेंगे. या फिर, यदि हमें मन की परिभाषा देने के लिए कहा जाए तो शायद हम ऐसा कहेंगे कि वह ऐसा कुछ है कि जिस के पास 'जानने की' क्षमता है, वह ऐसा कुछ है जो कि 'स्पष्ट' एवं 'बोधगम्य' है. किन्तु मन को ध्यान की प्रक्रिया में उतारे बगैर, मन को पूर्ण रूप से बिना समझे ये परिभाषाएँ केवल खोखले शब्द के सिवा कुछ नहीं हैं. सीधे अनुभव द्वारा मन का परिचय पाना आवश्यक है, नहीं कि मात्र अमूर्त कल्पना के रूप में. अतः इस व्यायाम का हेतु मन की प्रकृति का प्रत्यक्ष अनुभव पाने का अथवा उस की परम्परागत प्रकृति को समझने का है. अब जब आप ऐसा कहें कि मन के पास 'स्पष्टता' एवं 'बोधगम्यता' है, तब आप अनुभव द्वारा उसे पहचानने में समर्थ बन पाएंगे, केवल एक अमूर्त कलपना के रूप में नहीं.'

अपनी पुस्तक 'दि एइटथ हेबिट' फ्रॉम इफेक्टिवनेस टू ग्रेटनेस' में स्टिवन कवि आध्यात्मिक प्रज्ञा (बुद्धि) के रूप में आध्यात्मिकता का उल्लेख करते हैं. उन के अभिप्राय के अनुसार 'आध्यात्मिक प्रज्ञा अनंत का अर्थ समझने की और उस के साथ संपर्क स्थापित करने की हमारी आंतरिक प्रेरणा व्यक्त करती है.' वे यह भी कहते हैं कि, 'यह आध्यात्मिक प्रज्ञा दिशा सूचक कंपास जैसी है जो हमेशा उत्तर दिशा ही दर्शाती है. यह आध्यात्मिक प्रज्ञा हमारे अंतरात्मा की आवाज के अंश प्रस्तुत करते हुए सही सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से समझने में हमारी मदद करती है. ऐसे सिद्धांतों को समझने के लिए कंपास के साथ की उस की गई तुलना सर्वोत्तम है क्यों कि कंपास हमेशा उत्तर दिशा ही दर्शाता है. स्वयं के लिए उच्च नैतिकता बनाए रखने की चाभी 'उत्तर दिशा' के सही सिद्धांतों का सदैव पालन करना ही है.'

इस पुस्तक में कवि मानव जीवन में आध्यात्मिकता के अभाव के परिणामों के प्रति हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं. वे कहते हैं, 'हमारे अकेलेपन के भीतर जो मजबूरी और उलझन है वह आध्यात्मिकता का खालीपन/शून्यत्व है. वह हमारे आत्मविश्वास को ख़त्म कर देता है. हमारे हृदय को कमजोर करता है और हमें अशांत अवस्था में पटक देता है.'

भारत के अग्रगण्य आध्यात्मिक गुरु श्री अरविन्द अपनी पुस्तक 'ग्रोइंग विदिन' में आध्यात्मिकता की परिभाषा अलग प्रकार से देते हैं: 'अपनी की मूल प्रकृति के अनुसार आध्यात्मिकता हमारे अस्तित्व के आंतरिक तथ्यों की ओर की, हमारे जीवात्मा की उस अपार्थिव अंश की जागृति हमारे मन जीवन या शरीर से अलग है. उसे जानने की, महसूस करने की, उस के साथ एकरूप होने की और सृष्टि से ऊपर और सर्वत्र व्याप्त ऐसी परम चेतना को पाने की तीव्र अभिलाषा है.'

दूसरी तरफ रिचर्ड वोल्मेन 'थिंकिंग विद योर सोल' के लेखक, अध्यात्म के विषय में अपना मंतव्य दर्शाते हैं कि: 'मैं आध्यात्मिकता का अर्थ ऐसा करता हूँ कि जो हमारी प्राचीन और सनातन मानवीय खोज है, यह कुछ ऐसा है कि जो हमारे साथ है, जो हम से और हमारे अहंकार से बहुत ही विराट और अधिक विश्वसनीय है और जिस का सम्बन्ध हमारी अपनी आत्मा के साथ, एक दूसरे के साथ, इतिहास और प्रकृति के विश्व के साथ है, अविभाज्य आत्मा के परिवर्तन के साथ और जीवंत होने के रहस्य के साथ है.'

डॉ.वेईन डायर अपनी लोकप्रिय पुस्तक 'देर इज अ स्पिरिच्युअल सोल्यूशन टू एवरी प्रॉब्लेम' में आध्यात्मिकता को उत्तम तरीके से समझाते हैं:

'यह सब एक ही है. जिस प्रकार हम पवन का अनुभव करते हैं किन्तु उसे देख नहीं पाते, ठीक उसी प्रकार से आत्मा को हम अपनी इन्द्रियों के द्वारा यथार्थ सिद्ध नहीं कर सकते.'

भारत के ही अलग अलग धर्म के दो महान संतों ने आत्मा का वर्णन इस प्रकार से किया है: 'हमारे भीतर जो ईश्वर का अंश है वही आध्यात्मिकता है. (मदर टेरेसा) जो कुछ भी मन को बाहर की तरफ आकर्षित करता है वह आध्यात्मिक नहीं है और जो कुछ भी मन को भीतर की तरफ आकृष्ट करता है वह आध्यात्मिक है. (रमण महर्षि)

आध्यात्मिकता को समझने की चाबी इस अंतरजगत और बाहरी जगत का ख़याल है - यह एक ही है, फिर भी ये मनुष्य के दो अदभुत पहलू हैं. मेरे एक मित्र भौतिक पहलू की तुलना बिजली के गोले (बल्ब) के साथ और आध्यात्मिक पहलू की बिजली के साथ करता है.

जब मैं ऐसा कहता हूँ कि 'मैं आध्यात्मिक हूँ' तब मैं स्वयं को धर्म के साथ जोड़ना नहीं चाहता. धर्म रूढ़िवादी नियम और लोगों ने बहुत प्राचीन समय से सुरक्षित रखे हुए पौराणिक धर्मग्रन्थ हैं. साधारण रूप से लोग कुछ भी जांच, पूछताछ या संदेह किए बगैर इस धर्म का पालन किये जा रहे होते हैं. यह मनुष्य की बाहर की रूढ़ी और रीति-रिवाज के अनुसार अपेक्षित परंपरा है जो कि मेरी आध्यात्मिकता की परिभाषा से सुसंगत नहीं है.

मदर टेरेसा और रमण महर्षि के निरिक्षण के अनुसार दर्शाई गई आध्यात्मिकता की परिभाषा को मैं ज्यादा पसंद करता हूँ. आध्यात्मिकता भीतर से प्राप्त स्वीकृति, अनुभूति और उसे मिल रहे आदरभाव का परिणाम है. आध्यात्मिकता का पालन करने के बारे में मेरा मानना ऐसा है कि यह मेरे जीवन को उच्च स्तर पर ले जाने का काम करती है और समस्याओं का समाधान कैसे पाया जा सकता है उस का मार्गदर्शन करती है.

पी.बी. वेईल अपनी पुस्तक 'मेनेजिंग एज अ परफोर्मिंग आर्ट' में कहते हैं कि, 'आध्यात्मिकता विविध प्रकार के ऐसे गहन अनुभवों की खोज है कि जिससे हम भीतर से विचलित हो उठें, और आत्मा का विचलित होने का मतलब है हमारे पूरे अस्तित्व में परिवर्तन हो जाना.

जूडिथ नील अपने लेख 'टीचिंग विद सोल: सपोर्ट फॉर द मैनेजमेंट एड्युकेटर' में आध्यात्मिकता की परिभाषा देने में आड़े आती मुश्किलों के बारे में अक्सर कहतीं हैं. वह आत्मा शब्द की तह तक जातीं हैं और अपने लेख में आध्यात्मिकता की कुछेक परिभाषाओं का जिक्र करतीं है:

आत्मा (स्पिरिट) शब्द का मूल लेटिन शब्द 'स्पिरेर' में है जिस का अर्थ है 'सांस लेना'. अपने मूल अर्थ के अनुसार वह स्पिरिट है जो हमें जीवित व साँस लेते हुए रखता है. यह जीवनशक्ति है. स्कोट (१९९४) आत्मा की परिभाषा इस प्रकार से देते हैं: 'यह आत्मा है कि जिस के बारे में रूढ़ी परम्परा के अनुसार ऐसा माना जाता है कि वह जीवित रहने के लिए आवश्यक तत्व है अथवा चलते फिरते मनुष्य के लिए वह आतंरिक, दिखाई नहीं देनेवाला महत्वपूर्ण चालक तत्व (जिवंत शक्ति) है.'

आध्यात्मिकता की परिभाषा देना और भी मुश्किल है. संस्थानों के रोजमर्रा के कार्यों में आध्यात्मिकता के बारे में बहुत से लोग उसकी परिभाषा देने की कोशिश तक नहीं करते फिर भी फेअर होम (१९९७) आध्यात्मिकता की सर्वग्राही परिभाषा देते हैं जिस का प्रमुख अंश निम्नानुसार है:

स्वयं कौन है, स्त्री या पुरुष जो भी है, पर उसका तत्त्व उस की आध्यात्मिकता है. उस आंतरिक तत्व की परिभाषा इस प्रकार है, 'जो शरीर से अलग होते हुए भी वह भौतिक एवं बौद्धिक (मानसिक) तत्वों का समावेश करता है. मनुष्य का आध्यात्मिक बनने का लक्षण उस की आध्यात्मिकता की दिशा में प्रयाण करने का निर्देश करता है. अपने स्वयं के भीतर और प्रत्येक मनुष्य के अन्दर रहे उस चेतनामय सूक्ष्मातिसूक्ष्म तत्व के सत्य का आदरभाव से स्वीकार करना यही हमारे आंतरिक उच्च मूल्य एवं हमारी नैतिकता के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध की अवस्था है. वही है लोगों की आंतरिक प्रकृति के सत्य की पहचान. आध्यात्मिकता किसी धर्म विशेष के लिए ही उपयुक्त है ऐसा नहीं है, हालाँकि ऐसा हो सकता है कि कुछ धर्मों के मूल्य कदाचित व्यक्ति के आध्यात्मिक केंद्र का हिस्सा हो. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आध्यात्मिकता ऐसा गीत है कि जिसे हम सब गाते हैं. प्रत्येक धर्म के पास अपना अपना गायक है.

आध्यात्मिकता की परिभाषा देने में लोगों को सब से बड़ी कठिनाई यह होती है कि वे अपने अनुभवों को इन्द्रियों से समझने की कोशिश करते हैं. दरअसल आध्यात्मिकता का मूलभूत रूप में बिलकुल व्यक्तिगत, सापेक्ष और जिसे इन्द्रियों से समझा नहीं जा सके ऐसी है. अतः कुछ लोगों ने आध्यात्मिकता के अनुभव के सार रूप सत्व को काव्य में प्रस्तुत करने की कोशिश की है. लि बोल्मेन ने संस्थान के प्रतिदिन के कार्यों में आध्यात्मिकता को समझाने का फारसी (पर्शियन) कवि रूमी का उद्धरण देते हुए अत्यंत प्रभावक कोशिश की है:

'सोचता रहता हूँ दिनभर मैं उस के बारे में

फिर रात को मैं पूछता हूँ,

कहाँ से आया हूँ और यहाँ मुझे क्या करना है?

कुछ नहीं जानता हूँ,

है मेरी आत्मा कहीं ओर, यकीं है मुझे

और अंत में मैं वहीँ पहुंचना चाहता हूँ!'

जेम्स औट्रे, फार्च्यून ५०० के सफल अधिकारी ने एक कविता लिखी है जिस का शीर्षक है 'थ्रेड्स' (धागे या एकदूसरे को जोड़नेवाले तानेबाने), उस काव्य का कुछ अंश:

'सुनो! प्रत्येक कार्यालय में

आप निरंतरता पाते हैं

प्रेम, हर्ष, भय व दोष की

उत्सव और सांत्वना की पुकारें,

और आप जानते हैं कि

इस निरंतरता के साथ जुड़ने का काम

आपको किस तरह से करना है.'

एलिझाबेथ टिसडेल नई भूमिका प्रस्तुत करती अपनी पुस्तक 'एक्सप्लोरिंग स्पिरिच्युअलिटी एन्ड कल्चर इन एडल्ट हायर एड्यूकेशन' में अध्येता को नीचे दर्शाई गई सात धारणाओं के साथ जोडती है.

आध्यात्मिकता एक जटिल विषय है. भिन्न भिन्न लोग उसकी अलग अलग परिभाषाएं देते हैं, किन्तु किसी न किसी तरह से ये सारी परिभाषाएँ अपूर्ण सी लगाती है. फिर भी यहाँ आध्यात्मिकता शब्द के अर्थ की परिभाषाओं को जानना और ये विविध संस्कृति में शिक्षा के साथ किस प्रकार से जुडी हुई है यह जानना आवश्यक है. ३१ धुरंधर शिक्षणशास्त्रीओं के साक्षात्कार पर आधारित और सहाध्यायीओं के इस विषय पर किए गए अध्ययन के आधार पर यहाँ शिक्षा के संदर्भ में आध्यात्मिकता की प्रकृति के बारे में की गई सात धारणाएँ इस प्रकार हैं:

१. अध्यात्म और धर्म एक ही बात नहीं है, किन्तु कई लोगों का विश्वास है कि ये एकदूसरे के साथ जुड़े हुए हैं.

२. आध्यात्मिकता का सम्बन्ध अपनी जागृति से, सम्पूर्णता के स्वीकार के साथ

और इस ब्रह्माण्ड की शक्ति, प्रकृति अथवा परम आत्मा के रहस्य के साथ जुड़ने से हैं.

३. आध्यात्मिकता मूलभूत रूप से जीवन को सार्थक बनाने के साथ संबंधित है.

४. सीखने की भावना के साथ आध्यात्मिकता का अस्तित्व हमेशा होता है (यह

और बात है कि इस पर ध्यान नहीं दिया जाता).

५. आध्यात्मिक विकास सत्य की और सत्य के स्वरूप की और ले जाता है.

६. आध्यात्मिकता अधिकतर अज्ञात व सांकेतिक प्रक्रियाओं के द्वारा ज्ञान कैसे पाया जा सकता है उस के बारे में है. कई बार उसे कला के रूप में दर्शाया जाता है. ऐसे रूपों में सांस्कृतिक, संगीत, कला, चित्र, प्रतिक और कर्मकांड का समावेश होता है.

७. आध्यात्मिक अनुभव अधिकतर आश्चर्यजनक होते हैं और ये अचानक होते हैं.

आध्यात्मिकता के बारे में जिन के ज्ञान का मेरे आध्यात्मिक विचारों पर गहरा प्रभाव है वे एसजीवीपी अमदावाद के पूज्य स्वामी माधवप्रियदासजी हैं. आप ऐसे मनुष्य को आध्यात्मिक मानते है जो भगवदगीता में दी गई परिभाषा के अनुसार स्थितप्रज्ञ हो:

"स्थितप्रज्ञ (आध्यात्मिक) मनुष्य निम्न कक्षा की शक्तियां जैसे की काम-वासना, भय तथा क्रोध से मुक्त होता है."

"स्थितप्रज्ञ (आध्यात्मिक) मनुष्य प्रेम, सर्जनात्मकता, प्रत्यक्ष ज्ञान, भलाई, क्षमा, आत्मसमर्पण और प्रसन्नता जैसी उच्च आध्यात्मिक शक्तियुक्त जीवन जीता है और वह अपनी इन्द्रियों का गुलाम नहीं होता. वह इन्द्रियजन्य आवश्यकताओं से उत्पन्न समस्याओं को अलग रख सकता है."

"स्थितप्रज्ञ (आध्यात्मिक) मनुष्य अपने अहम् को अपने बस में रखते हुए आत्मा की उच्च शक्ति की तरफ जाता है, इस से उसकी आसक्तियां और सांसारिक वस्तुओं से उत्पन्न होते मानसिक तूफ़ान शांत हो जाते हैं.'

"किसी भी वस्तु के प्रति आसक्ति आखिर तो समस्याओं के विश्व में ही ले जाती है. समर्पण की भावना पुष्ट करने से आसक्ति से मुक्त होने की शक्ति मिलती है. इस से शांति और प्रेम की स्थापना होती है. अतः क्रोध, हताशा, संदेह, अज्ञान का अन्धकार और नफ़रत की संभावनाओं का अंत हो जाता है. यह परम कक्षा की ऊर्जा हमें हमेशा समझदारी और शांतिपूर्ण जीवन जीने के प्रति ले जाती है."

भारत के एक और संतपुरुष श्री मोरारिबापु ने साक्षात्कार के दौरान आध्यात्मिकता के कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण एवं सरल तत्व प्रस्तुत किए हैं. श्री मोरारीबापू के मंतव्य के अनुसार मनुष्य की आध्यात्मिकता को प्रमुख तीन विशेषताओं से समझा जा सकता है:

+ सब के लिए प्रेमदृष्टि.

+ सत्यनिष्ठा और

+ करुणामय हृदय

जो मनुष्य जीवन में इन का आचरण करता हो वह आध्यात्मिक जीवन जीता है ऐसा कह सकते हैं. भले ही वह किसी भी धर्म का पालन करता हो. हकीकत में वह मनुष्य नास्तिक भी हो सकता है! सच्ची आध्यात्मिकता किसी के साथ बौद्धिक संवाद करने में नहीं है, परन्तु समस्त जीवन और उस को आवृत्त करती प्रवृत्तिओं में व्याप्त सतर्कता की निश्चित अवस्था है.

मदर टेरेसा ने सरल वाक्य में कहा है: 'आध्यात्मिकता मनुष्य को भीतर से प्राप्त स्वीकृति, अनुभूति और उसे मिलते आदरभाव का परिणाम है. वह आंतरिक यात्रा है.'

भारत के सुविख्यात कवि श्री सुरेश दलाल आध्यात्मिकता की गहन व्यक्तिगत प्रकृति पर जोर देते हुए कहते हैं कि: 'आध्यात्मिकता वहां से शुरू होती है जहाँ कर्मकांड पूर्ण हो जाते हैं.' वे आध्यात्मिकता का पालन करने का महत्त्व दर्शाते हैं और कहते हैं कि 'बाह्य धार्मिक कर्मकांड लोग अक्सर स्वयं कितने धार्मिक हैं इस का प्रदर्शन करने के लिए करते हैं.' उनके मंतव्य के अनुसार ऐसे प्रदर्शन करने से दूर रहना अधिक अच्छा है.

भारत के मेरे निकट के मित्र श्री गिजुभाई थानकी एवं उनकी पत्नी श्रीमती आशाबहन एक अत्यंत आध्यात्मिक ऋषि के भक्त हैं. वे आध्यात्मिकता के बारे में खेती करने का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. खेती करने का कारण जमीन में कुछ न कुछ बोने का होता है. आध्यात्मिकता के बारे में बहुत विद्वत्तापूर्ण विचार-विमर्श किये जाना तो जैसे बीज बोना भूल कर खेती करते रहने जैसा हुआ. बोने की शुरुआत करना ही आध्यात्मिक जीवन के पंथ पर कदम बढाने का प्रारंभ है और यह एक ऐसी क्रिया है कि जो हमें अशांति से शांति और संतोष की ओर ले जाती है. आख़िरकार आध्यात्मिक जीवन अपनाने का आशय जीवन में आंतरिक सुख और आनंद की अनुभूति पाने का ही तो है.

आध्यात्मिक सूफी कवि रूमी के उद्धरण के साथ यह अध्याय पूरा होता है:

रूमी हमारे जीवन के तीन साथियों के बारे में कहते हैं: 'पहला साथी, आप की मालिकी जिस पर है ऐसी वस्तुएं, जब आप मुश्किल में होते हैं या आप के ऊपर संकट आता है तब यह साथी आपका साथ नहीं देता. दूसरा साथी, आपके अच्छे मित्र, जो आप की अंतिम यात्रा तक साथ देंगें परन्तु उस के आगे साथ नहीं निभाएंगे. केवल तीसरा साथी, आप के कर्म - दूसरे के लिए उत्तम भेंट (उपहार) जैसे, आप के द्वारा किए गए कार्य हमेशा आप के साथ रहेंगे. इतना ही नहीं आप की कब्र में भीतर तक यह आप का साथ निभाएगा.'

रूमी की बात बिलकुल सही है: 'हमेशा यह तीसरे साथी का सहारा लीजिए और उस के साथ घनिष्ठ मैत्री रखें. आप उस जंजीर के बंधन को तोड़ दो जिस के बोझ से आप आगे नहीं बढ़ सकते, और आपकी आत्मा को बंधन मुक्त करो, और अंत में आप आप के सहयात्रियों के लिए दिशासूचक प्रकाशस्तम्भ बनिए.'

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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