व्यंग्य // कुत्ता- पुराण डॉ. // सुरेन्द्र वर्मा

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कथा है कि युधिष्ठिर अपने प्रिय कुत्ते को लेकर स्वर्ग के द्वार खड़े थे। देवराज इंद्र ने कहा कुत्ता रखने वालों को स्वर्ग में स्थान नहीं है। इस कुत्ते को छोड़कर आप मेरे साथ चलें। युधिष्ठिर बोले भक्त का त्याग करने से जो पाप होता है उसका कभी अंत नहीं हो सकता। मैं अपने कुत्ते का त्याग नहीं कर सकता। कहने का तात्पर्य यह है कि कुत्ते की मनुष्य के प्रति भक्ति महाभारत काल से ही जानी मानी गई है। लेकिन क्या कुत्ता सचमुच इतना ही वफादार है ?

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भेडिया, लोमड़ी और गीदड़ की जाति का पशु है यह कुत्ता; कुत्ते की बेवफाई देखिए उसने अपनी जाति के साथ रहना छोड़ दिया है और आदमियों के साथ रहने लगा है. इंसान को भी कुत्तों के साथ रहना बड़ा रास आ गया है. उसके गुणों से प्रभावित होकर कुत्ते को पालतू बना लिया गया है. सिर्फ इतना ही नहीं, आदमी ने उसकी अनेक विशेषताओं को अपना भी लिया है और ये विशेषताएं इंसान की मानों अपनी ही दोयम प्रकृति बन गई हैं. लार टपकाना, पूंछ हिलाना, भौंकना आदि, जैसे कुकुर-गुण अब मानवी गुण हो गए हैं. ये गुण आदमी के चरित्र और उसकी संस्कृति की विशेषताएं गिनी जाने लगी हैं.

मानव समाज में कुत्ते का सामाजिक, साहित्यिक, भाषिक तथा राजनैतिक योगदान से कोई इनकार नहीं कर सकता। हाल ही में कुत्ते की उपस्थिति राजनैतिक क्षेत्र में काफी सुर्ख़ियों में रही है। भारत में जब भी चुनाव नज़दीक होते हैं “तू तू मैं मैं” शुरू हो जाती है। विरोधी दल एक दूसरे को ‘कुत्ता-राजनीति’ में घसीटने लगते है। और तो और भारत के प्रधान-मंत्री तक ने यह कहते हुए कोई गुरेज़ नहीं किया कि विरोधी दलों को, जिनमे राष्ट्र प्रेम की बेहद कमी दिखाई देती है, थोड़ी बहुत देश भक्ति कर्नाटक में पाए जाने वाले मुधुल हाउंड कुत्ते से सीख लेना चाहिए जो (अपनी देश भक्ति के कारण?) भारतीय सेना में भरती किया जाता है।

कुत्ते सिर्फ सेना में ही अपना योगदान नहीं दे रहे हैं बल्कि (अपराध) सूंघने की अपनी शक्ति के कारण उन्होंने पुलिस के महकमे में भी अपनी जगह बनाई है। मुख्यत: परिवार की सुरक्षा के लिए तो उन्हें आम आदमी भी पालता है। अफसरों में तो कुत्ते पालने का रिवाज़ शायद कुछ अधिक ही है। वे स्वयं को हर समय असुरक्षित जो महसूस करते हैं। उनके बंगलों में कुत्ते से सावधान रहने की हिदायत लिखी रहती है। शरीफ लोग तो ऐसे “कुत्ता-घरों” में घुसना ही पसंद नहीं करते। आप उनके कुत्ते को कुत्ता बोल दें तो साहब लोग भौंकने लगते हैं। एक बार ऐसा ही हुआ। मैं साहब के यहाँ गया तो कुत्ता भौंकने लगा। मैंने कहा, कुत्ता एक तरफ कर लें साहेब ! साहेब भौंकने लगे। बोले आप क्यों नही एक तरफ हो जाते ? और इसका नाम ‘कुत्ता’ नहीं है; यह ‘डौगी’ है, “डौगी”।

कुत्तों ने साहित्यकारों को भी खूब प्रेरणा दी है। हरिशंकर परसाई ने एक व्यंग्य आलेख “ एक मध्यम वर्गीय कुत्ता” लिखकर कुत्ते पर लिखने के लिए व्यंग्यकारों के लिए ज़मीन तैयार कर दी, वहीं सआदत हसन मंटो ने “टेटवाल का कुत्ता” कहानी लिखकर कुत्तों को चकित कर दिया। भाषा में तो कुत्ता बहुत पहले से ही घुसा हुआ है। हम भाषा में कुत्ते का इस्तेमाल गाली देने के लिए करते हैं; मज़ाक उड़ाने के लिए करते हैं। कुत्ते को “अपनी गली का शेर” बताते हैं। कुत्ते की तरह जीवित रहना गवारा है लेकिन हमारी भाषा को “कुत्ते की मौत मरना” गवारा नहीं है। कुत्ता भौंकता ज़रूर है लेकिन वह उल्टी-सीधी बातें नहीं करता। लेकिन हमारी भाषा में जो उलटी सीधी बात करता है, उसे “कुत्ते का काटा” हुआ बताने में देर नहीं करते। कोई सच्चा आदमी अपनी ‘सीधी’ बात पर यदि अड़ ही जाए तो, मज़ा देखिए, उसे “कुत्ते की पूंछ” कह दिया जाता है जो कभी ‘सीधी’ नहीं होती। कुछ लोग व्यर्थ ही कभी कभी किसी निरर्थक वस्तु के लिए आतुर हो जाते हैं। यह बेशक मनुष्य की हूक हो सकती है (इक हूक सी दिल में उठती है !) लेकिन भाषा की ज्यादती देखिए, वह इसे “कुत्ते की हूक” बताती है। बात न हुई कुत्ता हो गई, उसे ज़बर्दस्त्ती आगे बढ़ाना भाषा में “कुत्ता घसीटना” हो गया।

आदमी कुत्ते को एक वफादार पालतू जानवर के रूप में देखता है और उसे अपना एक भरोसेमंद साथी मानता है. कारण स्पष्ट है. कुत्ते ने आदमी से कभी बेवफाई नहीं की, बल्कि जब भी काम पडा उसने इंसान का साथ दिया। भले ही कुत्ता, जानवरों - जैसे भेडिया, लोमड़ी. गीदड़ आदि ,का - जो पशु होने और उसकी अपनी प्रजाति के होने के कारण जैविक रूप से उसके अधिक नज़दीक हैं, का साथ न दे पाया हो लेकिन जानवरों के शिकार के लिए आदमी कुत्तों को ही साथ ले जाता है. इंसान की बस्ती में गृह-मृग और ग्राम-सिंह की तरह उसने अपनी पहचान बनाई है.

पर दूसरी तरफ, आदमी को देखिए. उसने कुत्ते को हमेशा हिकारत की नज़र से ही देखा। उसका सोचना है कि जो अपनों का नहीं हो सका ,वह दूसरों का भला क्या होगा? आदमी को जब भी किसी की फजीहत करना होती है, वह उसे “कुत्ता” कहने से बाज़ नहीं आता. कुत्ता आदमी के लिए हमेशा गाली ही रहा. उसका सर-नेम कभी नहीं बन पाया. आपको इंसानों में ‘सिंह’, ‘भेंडिया’, ‘लैम्ब’ जैसे कुल-नाम मिल जाएंगे लेकिन ‘कुत्ता’ सर-नेम कहीं नहीं मिलेगा. नाम में भला क्या रखा है? भले ही आदमी का कुल-नाम कुत्ता न भी हो कुत्ता-कुल की हरकतों से उसे वंचित नहीं किया जा सकता.

क्योंकि आदमी कुत्ता पालता है इसलिए वह सुबह-सबेरे ‘मोर्निंग-वाक’ पर उसे भी ले जाता है. उस समय यह तय कर पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि इनमें से कौन पालक है कौन पालतू. कुत्ते की ज़ंजीर बेशक आदमी के हाथ रहती है लेकिन बस, कहने भर को. वस्तुस्थिति यह है कि कुत्ते के इशारे पर ही आदमी की सैर निर्भर करती है. कुत्ता कहता है तो वह चलते चलते रुक जाता है, कुत्ता कहता है तो वह चलना दुबारा शुरू कर देता है. जब तक फारिग होकर कुत्ता इशारा नहीं कर देता मजाल कि आदमी आगे बढ सके.

कुत्ते ने आदमी पर अच्छा-खासा दबदबा कायम कर रखा है. वह आदमी पर इतना हावी हो गया है कि अपनी इंसानियत भूल कर आदमी के मन पर कुत्तई सवार हो गयी है. वह अपनी ही बिरादरी के लोगों का दुश्मन बन गया है. इंसान और इंसानियत को ख़त्म करने के उसने तरह तरह के हथियार आविष्कृत कर लिए हैं. वह अपने ही लोगों का खूँख्वार मांस-भक्षी और अस्थि-भोजी बन गया है. उसे सुधारने की, लगता है, अब कोई गुंजाइश ही नहीं रही है. उसकी पूंछ जो ज़ाहिरा तौर पर दिखाई नहीं देती, टेंडी की टेंडी ही है.

कुत्ते का काटा आदमी पानी नहीं मांगता. बल्कि पानी से डरने लगता है. उसका अपना पानी भी सूख जाता है. पागल कुत्ते की तरह अपनी टेंडी पूंछ को सीधी करके दौड़ने लगता है. अपनी इस संवेदनहीनता के चलते दौड़ते-दौड़ते गिर जाता है और कुत्ते की मौत मर जाता है. अपनी भयानक स्थिति के प्रति वह पूरी तरह बेखबर और लापरवाह हो जाता है. कितने ही कुत्ते अपनी ही बनाई इस जेल में सड़ जाते हैं, ता-उम्र सड़ते रहते हैं. कोई क्या कर सकता है.

फिर भी कुत्ते बड़े प्यारे होते हैं. खासतौर पर सजावटी कुत्ते. बड़े-बड़े बालों वाले छोटे-छोटे कुत्ते – सफ़ेद, काले या भूरे कुत्ते, इंसान की गोद में बड़े खूबसूरत लगते हैं. टीवी में ऐसे कुत्तों को शैम्पू कराते, नहलाते, दुलराते, चूमते देखता हूँ तो लगता है इन कुत्तों को पालने वाले इनके सामने टिक नहीं सकते.

कई वर्ष पहले अमेरिका में सेंट फ्रांसिस्को नाम के एक शहर में वहां के निवासियों ने ‘बॉस’ नामक एक कुत्ते को अपना मेयर चुन लिया था. उनका तर्क था कि कुत्ता राजनीति नहीं कर सकता है. वह आदमी की तरह फालतू के सरकारी झमेलों में भी नहीं पड़ता. आज भी जो लोग राजनीति में आते हैं, उन्हें राजनीति से कोई मतलब नहीं रहता. वे बस सरकारी कोश को लूटने के लिए ही आते हैं. और रईसों के कुत्तों की तरह ठाट से रहते हैं.

कुत्ता तो कुत्ता होता है. कहीं का भी हो. देशी हो विदेशी हो. पर भारत में विदेशी कुत्तों को कुछ ज्यादह ही तवज्जह दी जाती है. एक मर्तबा गांधीजी की समाधि पर विदेश से आए किन्हीं पर्यटकों को अपने कुत्ते के साथ परिक्रमा लगाने की इजाज़त मिल गई. देशी कुत्तों को यह कभी नसीब नहीं होती. कुछ लोगों का तो यहां तक कहना है कि भारत में देशी कुत्ता क्या देशी नेता तक कभी पसंद नहीं किया गया. वह विदेशी भले न हो, कम से कम ‘विदेशीवत’ तो होना ही चाहिए. विदेशी हो तो और भी अच्छा ! हर इम्पोर्टेड वस्तु के लिए हमारी कुत्ता-हूक (ललक) देखते ही बनती है.

बहरहाल, इंसान की तहजीब में कुत्ते ने अपनी एक अहम जगह बना ली है. कुत्ता सिर्फ कुत्ता नहीं रह गया है. बंदूक का घोड़ा भी कुत्ता है और किवाड़ का खटका भी कुत्ता ही है. कुत्ता गाली है, फजीहत है. विश्वसनीयता का माप है, नीचता का पैमाना है. साहित्य, राजनीति और धर्म में उसकी पैठ है. वह भैरव का वाहन है और राजगुरु युधिष्ठिर का नरक तक का साथी है।

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-डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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2 टिप्पणियाँ "व्यंग्य // कुत्ता- पुराण डॉ. // सुरेन्द्र वर्मा"

  1. कुतरते की धूम, चाहे जमीन में गाड़ दो, सीधी नहीं हो सकती। पौराणिक कुत्ते से प्रवर्तमान कुत्ते का जिक्र मजेदार रहा। धन्यवाद।

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  2. मज़ेदार व्यंग्य

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