समीक्षा // शारदा पाण्डेय का हाइकु संसार // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

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यह मेरा सौभाग्य है कि डा. शारदा पांडेय ने मुझे लगभग एक सहस्र हिन्दी की अपनी ‘हाइकु’ रचनाएं पढ़ने के लिए उपलब्ध कराईं। इससे पहले वे भोजपुरी हाइकु का एक संकलन प्रकाशित कर चुकी हैं, जो काफी चर्चा में रहा है। हिन्दी की हाइकु रचनाओं का संकलन प्रकाशनाधीन है।

डा. शारदा पांडेय हिन्दी भाषा की विद्वान हैं। उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि हिन्दी साहित्य में ही प्राप्त की है। भाषा की यह विद्वत्ता उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट झांकती है। उनकी भाषा क्लिष्ट नहीं होती, किन्तु हिन्दी का सौन्दर्य प्रकाशित करने में पीछे नहीं हटती। कुछ उदाहरण –

वैष्णवी सांझ / तुलसी के दीप सी / दिपती रही

अग्नि की साक्षी / जलती रह गई / मृत्यु पर्यंत

मरुत वेगी / मन सदा उन्मुक्त / उड़ता रहा

गति यति का / है योग व्याकरण / चले जीवन

परम्परागत रूप से हाइकु लेखन प्रकृति, मनुष्य और दार्शनिक सोच पर केन्द्रित रहा है। अपनी रचनाओं में डा. पांडेय ने भी मुख्यत: इन्हीं विषयों को प्राथमिकता दी है लेकिन उनके लिए काव्य-कर्म हेतु कोई भी विषय तिरस्कृत नहीं है। जीवन के लगभग सभी आयामों को उनकी लेखनी ने स्पर्श किया है। जब वे प्रकृति की बात करती हैं तो प्रकृति वहां अकेली नहीं रहती। वह सहज ही मानव-मन और मानव स्वभाव से जुड़ जाती है। प्रकृति के साथ मनुष्य की भावनाए जुगलबंदी करती प्रतीत होती हैं –

तारों की हंसी / तोड़ेगी उदासी को / रात खिलेगी

कटा कुहासा / किरण सुनहरी / जब मुस्काई

कह जाती है / कहानी पुरवैया / अथ से इति

पंछी बिखरे / एक डाल के सब / सूखे पत्तों से

ये अलगाव / हुआ क्यों अकारण / पक्षी एकसे


बेशक अधिकांश रचनाओं में प्रकृति अकेली चित्रित नहीं हुई है। मानव चरित्र भी उनके साथ रहा है। किन्तु शारदा जी के हाइकु संसार में कुछ रचनाएं ऐसी भी हैं जो केवल प्रकृति के सौन्दर्य को रेखांकित करती हैं, जैसे-

उषा आगई / लेकर किरणों की / अक्षत रोली

नदी लहरी / पहने श्वेत साड़ी / सितारे टंकी


भारत में राधा-कृष्ण की कहानियां केवल कहानियां ही नहीं है। हर भारतीय के मन में वे भगवान की लीलाएं हैं। जहां जहां वे घटित हुई हैं वे स्थल पवित्र हो गए हैं। आज भी वे जन-मन में बसे हुए हैं और यही कारण है –

आज भी वंशी / टेरती राधा को / वृन्दावन में

ऐसा रोमांच / तन बना कदम्ब / मन कालिंदी

सांझ की वेला / बज उठी बांसुरी / आए क्या कान्हा?

हंसी चांदनी / नाची वृन्दावन में / भाव-गोपिका

डा. शारदा पाण्डेय का लेखन सतही न होकर बात की गहराई तक उतरना चाहता है। इसीलिए वे कभी कभी अपने दार्शनिक अंदाज़ में लेकिन बड़ी सरलता से कभी स्पष्ट रूप से तो कभी प्रकृति के माध्यम से अपने विचार प्रस्तुत करती हैं। अनेकों उदाहरण हैं –

कितना कुछ / चुपचाप बीतता / तो भी नूतन

नदी न लौटी / बहती चली गई / मिली सागर

ढूँढ़ता कहाँ / अपने में निहित / जीवन अर्थ

भटक गए / निज पथ से हम / भूले सोsहम

साधन हीन / होने से क्या रुकते ?/ सपने आते

सांस बाँसुरी / रोम रोम ध्वनित / सुर लहरी

आहुति देते / काल यज्ञ में हम / नित साँसों की

बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ का एक युगल-हाइकु भी देखें –

सूर्य चन्द्र हैं / वही तारे प्रकृति / क्या है नूतन ?

सूर्य वही है / चन्द्र वायु भी वही / गंध नई है (बस बदलाव की गंध पहचानने वाला चाहिए।


डा. पाण्डेय ने यों तो प्रकृति के अलावा मनुष्य की भावनाओं और भावों का भी अपनी हाइकु रचनाओं में अच्छा खासा चित्रण किया है और वे अधिकतर एक सकारात्मक और आशाजनक दृष्टिकोण अपनाती हैं किन्तु कहीं कहीं जहां नकारात्मर भावनाओं का चित्रण हुआ है, वह भी मार्मिक है –

कभी सर्प सा / डंस जाता मन को / एकाकीपन

कुछ न किया / बीता यूँही जीवन / रीता है मन

ऐसा क्योंकर / घटता है दुर्भाग्य / सदा मुझपे

बड़ा कठिन / मन को समझाना / बीता सपना

छाया कोहरा / साध रही अधूरी / पथ ना सूझा


साहित्य में प्रेम की अभिव्यक्ति ताने हुए तार पर चलने की तरह होती है। ज़रा फिसले तो वासना के पंक में गिरना हो सकता है। इसके लिए सधी भाषा और मर्यादित अभिव्यक्ति की आवश्यकता होती है। शारदा जी ने बड़े ही सधे हुए ढंग से प्रेम-भाव को अपनी हाइकु रचनाओं में उभारा है।

मदिरा बनी / प्रणय रागिनी ही / मन अवश

नयन नीर / स्नेहिल आँचल है / अधर हास

नयन खुले / सुदूर भागी निद्रा / अंग फडके

रोज़ देखते / राह तुम्हारी, गईं / बीत सदियाँ


डा. पाण्डेय के हाइकु कथ्य केवल अपने तक ही सिमटे नहीं हैं। वे अपने परिवेश और समाज के प्रति भी जागरूक हैं। जहां कहीं भी उन्हें राजनैतिक छल-छद्म या सामाजिक कुरीतियाँ दिखाई देतीं है, वे जम कर उनका विरोध करती हैं। ऐसे सन्दर्भों में उनकी भाषा और तेवर भी सख्त हो जाते हैं। वे कभी व्यंग्य का सहारा लेती हैं तो कभी अपनी बात बिना लाग-लपेट के साफ़ साफ़ कहती हैं। उन्होंने अपनी राजनैतिक और सामाजिक सन्दर्भ की रचनाओं को हाइकु रचनाओं से अलग रखा है और उन्हें ‘सैनर्यु’ कहा है जो सर्वथा उचित है।

शारदा पाण्डेय जहां एक ओर सुलझी भाषा से अपनी रचनाओं को तराशती हैं, वहीं दूसरी और वे कथ्य के साथ साथ हाइकु ढाँचे को पूरी तरह सुरक्षित रखती हैं। ५-७-५ की मर्यादा का दृढ़ता से पालन करती हैं, और अपने कथ्य को मौलिकता और रोचकता से प्रस्तुत करती हैं। मुझे पूरा भरोसा है की वे हिन्दी हाइकु साहित्य में अपनी प्रतिभा से एक अत्यंत सफल हाइकुकार के रूप में प्रतिष्ठित होवेंगी। तथा अस्तु।

---डा. सुरेन्द्र वर्मा


१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

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1 टिप्पणी "समीक्षा // शारदा पाण्डेय का हाइकु संसार // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा"

  1. हाइकु में है
    शारदा पांडेय का
    सार समस्त

    सुरेन्द्र वर्मा
    परिचय कराते
    पूर्ण व सार्थ

    दोनों हैं पात्र
    अभिनंदन शब्दश:
    खुद भावग्रस्त

    - हर्षद दवे

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