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समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद ¤ डॉ. महेन्द्र भटनागर

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समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद ¤ डॉ. महेन्द्र भटनागर वक्तव्य ‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ मेरा शोध-प्रबन्ध है; जिसे मैंने श्रद्धेय आचार्...

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समस्यामूलक उपन्यासकार

प्रेमचंद

¤

डॉ. महेन्द्र भटनागर

वक्तव्य

‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ मेरा शोध-प्रबन्ध है; जिसे मैंने श्रद्धेय आचार्य विनयमोहन शर्मा जी के निर्देशन में लिखकर, ‘नागपुर विश्वविद्यालय’ को, 1957 में, प्रस्तुत किया था।

इस प्रबन्ध में प्रेमचंद जी के मात्र औपन्यासिक दृष्टिकोण पर विस्तार से विमर्श किया गया है तथा उन्हें समस्यामूलक उपन्यासकार के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

प्रतिपाद्य विषय से सम्बन्धित जितने तथ्यों और तर्कों को प्रस्तुत करना आवश्यक था; प्राय: उन सभी को विवेचना और विश्लेषण का आधार बनाया गया है। मात्र मौजू व युक्तियुक्त उद्धरण देकर निष्कर्षों की पुष्टि की गयी है। उद्धरण-बहुलता है ज़रूर; किन्तु उनकी उपादेयता सिद्ध है। इनसे पाठकों को, विविध विषयों पर, एक ही स्थान पर, प्रेमचंद जी के समस्त उपन्यासों में अभिव्यक्त उनके विचारों को जानने-पढ़ने की सुविधा भी उपलब्ध हुई है।

प्रेमचंद जी विश्व के प्रमुख उपन्यासकारों में स्थान पाने के अधिकारी हैं। उनकी उत्तरोत्तर बढ़ती लोकप्रियता उनकी कृतियों के कलात्मक मूल्य का असंदिग्ध प्रमाण है। सम्स्यामूलक तत्त्व पर दृष्टिक्षेप करने पर ही प्रेमचंद जी के उपन्यासों का वास्तविक मूल्यांकन सम्भव है।

आशा है, ‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ की स्थापना को समीक्षक और शोधार्थी परखेंगे।

॰॰॰महेन्द्रभटनागर

110, बलवन्त नगर, गांधी रोड, ग्वालियर – 474002 (म॰ प्र॰)

E-Mail : drmahendra02@gmail.com

भूमिका

डा. महेन्द्रभटनागर की पुस्तक ‘समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचंद’ पढ़कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। महेन्द्रभटनागर जी ने प्रेमचंद के जीवन-दर्शन और मानवतावादी पक्ष का बहुत उत्तम विश्लेषण किया है। वे मानते हैं, “ प्रेमचंद मानवतावादी लेखक थे। गांधीवादी या साम्यवादी सिद्धान्तों से उन्होंने सीधी प्रेरणा ग्रहण नहीं की। उन्होंने जो कुछ जाना, सीखा, लिया; वह सब अपने अनुभव मात्र से। इसीलिए उनके साहित्य में अपरास्त शक्ति है। गांधीवाद और साम्यवाद कोई मानवता के विरोधी नहीं हैं; अतः प्रेमचंद के विचारों में जगह-जगह दोनों की झलक मिल जाती है। लेकिन उनका मानवतावाद सर्वत्र उभरा दीखता है।’’ यह स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं कि प्रेमचंद पूर्णरूप से मानवतावादी थे। उनके उपन्यासों में और लेखों में जड़-सम्पत्ति मोह - चाहे वह परम्परागत सुविधा के रूप में हो, ज़मीदारी या महाजनी वृत्ति का परिणाम हो, या उच्चतर पेशों से उपलब्ध हो - मानव की स्वाभाविक सद्वृत्तियों को रुद्ध करता है। प्रेमचंद ने सचाई और ईमानदारी को मनुष्य का सबसे बड़ा उन्नायक गुण समझा है। प्रेम उनकी दृष्टि में पावनकारी तत्त्व है। जब वह मनुष्य में सचमुच उदित होता है तो उसे त्याग और सचाई की ओर उन्मुख करता है। महेन्द्रभटनागर जी ने बड़ी कुशलतापूर्वक प्रेमचंद की इस मानवतावादी दृष्टि का विश्लेषण किया है। उनका यह कथन बिल्कुल ठीक है कि ’’ प्रेमचंद ने ’औद्योगिक नैतिकता’ का वर्णन कर उद्योगपतियों की मनोवृत्ति के विरुद्ध जन-मत तैयार किया है।’’ उन्होंने उस मूक जनता का पक्ष लिया है जो दलित है, शोषित है, और निरुपाय है। पुस्तक में प्रेमचंद के उपन्यासों और लेखों से उद्धरण देकर उन्होंने इस बात का स्पष्टीकरण किया है।

प्रेमचंद जी साहित्य सर्जक थे। उन्होंने केवल पात्रों के मुँह से ही विचार नहीं व्यक्त किये हैं बल्कि पात्रों और घटनाओं के जीवन्त गतिमय संघटना के द्वारा अपने मत की व्यंजना की है। महेन्द्रभटनागर जी ने इस पहलू पर ध्यान नहीं दिया है। वे सीधे प्रेमचंद की कलम से निकले हुए विविध प्रसंगों दे उद्- गारों से ही अपने वक्तव्य का समर्थन करते हैं। उनके निष्कर्ष स्वीकार योग्य हैं, परन्तु साहित्य के विद्यार्थी की सभी जिज्ञासाओं को वे संतुष्ट नहीं करते। ऐसा जान पड़ता है कि समस्याओं का रूप स्पष्ट करके प्रेमचंद के उद्गारों से उनके समाधान की ओर इंगित करना ही उनका लक्ष्य है। इस कार्य को उन्होने बड़े परिश्रम और कौशल से सम्पन्न किया है। इस दिशा में उनका प्रयत्न सफल हुआ है।

पुस्तक बहुत उपयोगी हुई है। प्रेमचंद के विचारों को उन्होंने बड़ी स्पष्टता और दृढ़ता के साथ व्यक्त किया है। मुझे आशा है कि साहित्य-रसिक और समाज-सेवी इससे समान रूप से आनन्द पा सकेंगे। हमारे देश की बहु-विचित्र समस्याओं का इसमें उद्घाटन हुआ है और प्रेमचंद जैसे मनीषी का दिया हुआ समाधान इससे स्पष्ट हुआ है। महेन्द्रभटनागर जी से और सुन्दर रचनाअओं की आशा सâहृदयजन करेंगे। मेरी शुभकामना है कि परमात्मा उन्हें दीघ्र जीवन,सुन्दर स्वास्थ्य और अधिकाधिक शक्ति प्रदान करे।

57-11-24 ॰॰॰ डॉ. हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ]अध्यक्ष : हिन्दी-विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय[

अनुक्रम

1 प्रवेशक /7

2 प्रेमचंद के समय का भारत / 13

3 प्रेमचंद युग में मध्य-वर्ग की स्थिति / 24

4 प्रेमचंद की साहित्य-सम्बन्धी मान्यताएँ / 36

5 आदर्शवाद और यथार्थवाद / 53

6 प्रेमचंद : द-वनजीर्शन / 61

7 मानवतावादी प्रेमचंद / 72

8 समस्यामूलक उपन्यास / 86

9 समस्यामूलक उपन्यास और प्रेमचंद / 94

10 भारतीय स्वाधीनता की समस्या /117

11 रियासतों और देशी नरेशों की समस्या /130

12 साम्प्रदायिक समस्या /144

13 शैक्षणिक समस्या / 156

14 औद्योगिक समस्या / 169

15 ग्रामीण जीवन (किसान-वर्ग की समस्याएँ) / 178

16 अछूत वर्ग / 194

17 भारतीय नारी () वैवाहिक समस्या / 205

18 भारतीय नारी () दाम्पत्य जीवन / 219

19 भारतीय नारी () विधवा-समस्या / 231

20 भारतीय नारी () वेश्या-समस्या / 244

21 ‘गोदान’ - समस्यामूलक तत्त्व के कोण से रेखांकन / 256

22 औपन्यासिक रचना-तंत्र और प्रेमचंद / 275

23 अभिमत / 298-308

प्रवेशक

सर्वप्रथम ‘समस्यामूलक’ शब्द की व्याख्या अपेक्षित है। ‘समस्या-प्रधान’ और ‘समस्यामूलक’ शब्दों के शास्त्रीय अर्थ में अन्तर है; लेकिन विरोध नहीं । प्रस्तुत प्रबन्ध का सीधा सम्बन्ध प्रेमचन्द के उपन्यासों में उठाई गई समस्याओं से है, जिनके कारण प्रेमचंद के उपन्यास समस्यामूलक अथवा समस्याओं के उपन्यास बन जाते हैं। प्रेमचन्द-साहित्य के प्रमुख आलोचक प्रेमचन्द के उपन्यासों को समस्यामूलक या समस्या-प्रधान नहीं मानते। सामाजिक उपन्यास और व्यक्ति-चरित्र के उपन्यास नामक दो कोटियों में वे उनके उपन्यासों की गणना करते हैं। मेरा इससे तात्त्विक मतभेद है।

इसमें सन्देह नहीं कि प्रेमचन्द के प्रायः सभी उपन्यास सामाजिक हैं, पर उनकी सामाजिकता किसी-न-किसी समस्या पर ही आधारित है। प्रेमचन्द का कोई भी उपन्यास ऐसा नहीं है जिसमें किसी समस्या को उठाया न गया हो। वस्तुतः वे समस्यामूलक उपन्यासकार ही थे। यहाँ तक कि किसी-न-किसी उपन्यास में तो अनेक समस्याएँ प्रधान समस्या के साथ बराबर दौड़ती हैं और छोटी-छोटी समस्याओं की ओर तो लेखक का ध्यान सदैव ही बना रहता है। जहाँ भी अवसर मिला है, प्रेमचन्द इन समस्याओं को बिना छुए नहीं रहे हैं। मेरी धारणा है कि प्रेमचन्द के समस्त उपन्यासों का उद्देश्य केवल हिन्दुस्तान की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, पारिवारिक आदि समस्याओं को अपने उपन्यासों में प्रस्तुत करना रहा है। समस्याओं का प्रश्न प्रधान है। शेष बातें समस्याओं को ही केन्द्र मानकर बढ़ती हैं और संकुचित होती हैं। समस्यामूलक उपन्यास में उपन्यासकार का लक्ष्य केवल समस्या को रखने और सुलझाने या ज्यों-की-त्यों छोड़ देने की ओर रहता है। उपन्यास के अन्य सामान्य तत्त्व उसकी रचना में बिखर जाते हैं। प्रेमचन्द के उपन्यासों में हमें यही बात मिलती है। बिना इस दृष्टिकोण को सम्मुख रखे प्रेमचन्द के उपन्यासों का शास्त्रीय अध्ययन करना असंगत होगा।

प्रेमचन्द पर कुछ आलोचकों ने ‘प्रचारवादी’ होने का आक्षेप लगाया है। यह आक्षेप बिना उनके मूल उद्देश्य को समझे किया गया है। प्रेमचन्द ने अपने ‘उपन्यास’ शीर्षक निबन्ध में साहित्य और प्रचार के सम्बन्ध में लिखा है: ”जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिए की जाती है तो वह अपने ऊँचे पद से गिर जाता है - इसमें कोई सन्देह नहीं। लेकिन आजकल परिस्थितियाँ इतनी तीव्र गति से बदल रही हैं, इतने नए-नए विचार पैदा हो रहे हैं कि कदाचित् अब कोई लेखक साहित्य के आदर्श को ध्यान में रख ही नहीं सकता। यह बहुत मुश्किल है कि लेखक पर इन परिस्थितियों का असर न पड़े, वह उनसे आन्दोलित न हो। यही कारण है कि आजकल भारतवर्ष के ही नहीं, यूरोप के बड़े-बड़े विद्वान भी अपनी रचना द्वारा किसी ‘वाद’ का प्रचार कर रहे हैं। वे इसकी परवाह नहीं करते कि इससे हमारी रचना जीवित रहेगी या नहीं। अपने मत की पुष्टि करना ही उनका ध्येय है, इसके सिवाय उन्हें कोई इच्छा नहीं। मगर वह क्योंकर मान लिया जाए कि जो उपन्यास किसी विचार के लिए लिखा जाता है, उसका महत्त्व क्षणिक होता है ? विक्टर ह्यू गो का ‘ला मिज़रेबुल’, टाल्सटाय के अनेक ग्रन्थ, डिकेन्स की कितनी ही रचनाएँ विचार-प्रधान हाते हुए भी उच्च कोटि की साहित्यिक हैं और अब तक उनका आकर्षण कम नहीं हुआ। आज भी शॉ, वेल्स आदि बड़े-बड़े लेखकों के ग्रन्थ प्रचार ही के उद्देश्य से लिखे जाते रहे हैं।”1

सहित्य और प्रचार के सम्बन्ध में प्रेमचन्द के उपर्युक्त विचार इस बात की पुष्टि करते हैं कि उनका मुख्य उद्देश्य भारतीय जन-जीवन की समस्याओं को, विचार-प्रधान उपन्यासों के माध्यम से, प्रस्तुत करना था। वे अपने युग की समस्याओं को समझते थे और उन्हीं को लेकर उपन्यास-क्षेत्र में आए। देश की विभिन्न समस्याओं पर वे अपने विचार स्वतंत्र लेखों में भी व्यक्त कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। विचारों का प्रचार एवं समस्याओं के प्रति जनता का ध्यान आकर्षित करने के लिए किसी कलात्मक माध्यम की आवश्यकता होती है। प्रेमचन्द ने यह कलात्मक माध्यम कथा-साहित्य चुना। यह बहुत कुछ लेखक की अपनी व्यक्तिगत रुचि और विषय-वस्तु पर निर्भर करता है। प्रेमचन्द कलावादी नहीं थे। औपन्यासिक कला को उन्होंने अपने विचारों को व्यक्त करने का साधन बनाया था; साध्य नहीं। वे किसी भी रचना में कलात्मक आवरण मात्र इस सीमा तक अनिवार्य मानते थे कि उसके अभाव में वह रचना नीरस और प्रभावशून्य न हो जाय। अपने ‘उपन्यास’ शीर्षक लेख में वे आगे चलकर लिखते हैं:

“उपन्यासकार को इतना प्रयत्न करना चहिए कि उसके विचार परोक्ष रूप से व्यक्त हों। उपन्यास की स्वाभाविकता में उस विचार के समावेश से कोई विघ्न न पड़ने पाए, अन्यथा, उपन्यास नीरस हो जाएगा।”2

उपन्यास-कला के व्याख्याकार के रूप में प्रेमचन्द की उपर्युक्त मान्यता थी। किसी सीमा तक वे इसमें सफल भी हुए हैं। लेकिन उपन्यासकार प्रेमचन्द अपनी स्वयं की मान्यताओं को जगह-जगह छोड़ जाते हैं और सीधे भाषाणकर्ता के रूप में आ उपस्थित होते हैं। उनके उपन्यासों में ऐसे स्थल अनेक हैं। उन्हीं स्थलों के आधार पर कुछ आलोचक उन पर प्रचारवादी होने का आरोप लगाते हैं। मूल प्रश्न यह है कि प्रेमचन्द ऐसा क्यों करते हैं ? उपन्यास-कला की व्याख्या करते हुए जिस तथ्य का उन्होंने विरोध किया है, उसे वे उपन्यास लिखते समय क्यों दृष्टि से ओझल कर जाते हैं ? उपन्यास-कला पर उनके जो विचार लेखबद्ध हैं वे पूर्णतः उनके उपन्यास-साहित्य में क्यों नहीं मिलते ? इसका एकमात्र उत्तर है - उनका समस्याओं के प्रति प्रेम। सामान्य औपन्यासिक कला-सम्बन्धी जितने दोष प्रेमचन्द के उपन्यासों में मिलते हैं, उसका कारण बहुत कुछ उनका समस्याओं के प्रति गहरा आकर्षण है। वे सभी तत्त्वों को पीछे छोड़कर समस्याओं के ताने-बाने में उलझ जाते हैं। ऐसी स्थिति में उनके उपन्यासों को केवल सामाजिक उपन्यास की संज्ञा नहीं दी जा सकती। उनकी सामाजिकता समस्याओं के साथ है। कड़ी आलोचनाओं और आक्षेपों के बावजूद प्रेमचन्द ने यह मार्ग नहीं छोड़ा था। अतः उनके उपन्यास समस्यामूलक हैं। वे उपन्यास की पुरानी परम्परागत शास्त्रीय सीमाओं में नहीं बँध पाते।

दूसरे, कूछ आलोचक प्रेमचन्द के उपन्यासों को व्यक्ति-चरित्र के उपन्यास बताते हैं। यह अवश्य है कि प्रेमचन्द का एक-आध उपन्यास चरित्र-प्रधान है; लेकिन इस तथ्य को स्वीकार कर लेने पर भी प्रेमचन्द के समस्यामूलक उपन्यासकार होने में कोई रुकावट नहीं आती। किसी भी लेखक के साहित्य का मूल्यांकन उसकी केवल एक-आध रचना के आधार पर नहीं किया जा सकता। चरित्रांकन के सम्बन्ध में भी प्रेमचन्द की स्वयं की मान्यताओं में विरोध मिलेगा। ‘उपन्यास’ नामक निबन्ध के प्रारम्भ में ही वे लिखते हैं:

“मैं उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र मात्र समझता हूँ। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।”3

प्रेमचन्द के अधिकांश आलोचकों के लिए उपर्युक्त वाक्य ‘वेद-वाक्य’ हो गए हैं। वे प्रेमचन्द के उपन्यासों का मूल्यांकन पूर्वाग्रह पर करते हैं। माना कि प्रेमचन्द ने औपन्यासिक रचनातंत्र में चरित्रांकन को प्रधानता दी है, पर यह कोई पूर्व निश्चित शर्त नहीं कि वह तथ्य उनके उपन्यासों में भी प्रधान हो। व्यक्ति-चरित्र की सूक्ष्मता प्रेमचन्द के उपन्यासों में है; किन्तु इसी आधार पर उनके उपन्यासों को चरित्र-प्रधान नहीं ठहराया जा सकता। समस्याओं में उलझे हुए पात्रों का चित्रण कुशलता के साथ होना ही चाहिए। प्रश्न यह है कि क्या पात्र समस्या-तत्त्व की प्रधानता को दबा देते हैं एवं प्रेमचंद अपनी कला का सर्वोत्कृष्ट तथा अधिकाधिक उपयोग केवल पात्रों के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण में ही करते हैं ? उनके आगे के उपन्यासकारों में अवश्य यह प्रवृत्ति पाई जाती है, पर प्रेमचन्द के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसका कारण केवल इसके अतिरिक्त और कोई नहीं कि प्रेमचन्द के सम्मुख मात्र एक उद्देश्य था कि उपन्यास के माध्यम से भारतीय जीवन में परिवर्तन लाया जाय। वे अपने को ‘क़लम का मज़दूर’ कहते थे और वही कार्य जो महात्मा गांधी अपनी सक्रिय राजनीति से कर रहे थे, प्रेमचन्द अपनी लेखनी से पूरा करना चाहते थे। प्रत्येक असाधारण प्रतिभा में पात्रों के मनोभावों की तह तक पहुँचने की एक अलौकिक क्षमता होती है और वह प्रेमचन्द में भी थी।

प्रेमचन्द पहले समस्यओं को महत्त्व देते हैं और बाद में चरित्रांकन को। इस बात की पुष्टि उनके विरोधी आलोचकों के आक्षेपों से भी होती है। उनके कथनानुसार प्रेमचन्द का चरित्रांकन बड़ा दुर्बल हैं। उनके पात्र स्थान-स्थान पर लेखक की इच्छानुसार कठपुतली की तरह नाचने लगते हैं। यहाँ तक कि प्रेमचन्द उनके स्वभावों में भी एकाएक परिर्वतन कर देते हैं। अतः उनके चरित्रों में मानव मनोविज्ञान की दृष्टि से दोष आ गया है। मनुष्य का मन इतना सरल नहीं होता, जो बड़ी सुगमता से अपनी इच्छानुसार मोड़ा जा सके। विशेष परिस्थितियों में अथवा एक लम्बा समय निकल जाने के बाद ही चरित्र-परिवर्तन कभी-कभी सम्भव हो सकता है। निस्संदेह प्रेमचन्द के पात्र कहीं-कहीं निर्जीव हो गए हैं। वस्तुतः प्रेमचन्द की महानता चरित्रांकन में दृष्टिगोचर नहीं हाती, भले ही कुछ श्रद्धालु आलोचक उनकी मान्यताओं के अनुसार उनके उपन्यासों को मानव-चरित्र का दर्पण समझें। कहीं-कहीं कहानियों में चरित्रांकन की कसौटी पर वे अवश्य खरे उतरे हैं, पर उपन्यासों में नहीं। उनके उपन्यासों को व्यक्ति चरित्र के उपन्यास कहना उनके महत्त्व को कम करना है।

वास्तव में उनके मानस-पट पर भारतीय जनता की समस्याओं का ऐसा जाल बिछा हुआ था कि वे उससे किसी भी दशा में मुक्ति न पा सके और न पाना ही चाहते थे। समस्याओं को यथासम्भव ओैपन्यासिक कला के भीतर रखने और उन्हें सुलझाने में वे प्रायः पात्रों को अपनी इच्छानुसार मोड़ लेते हैं। यही कारण है कि कुछ आलोचक उनके पात्रों को कठपुतली-पात्र की संज्ञा देते हैं। प्रेमचन्द तुलसीदास की तरह लोक-हितवादी थे। उनका साध्य चरित्रांकन मात्र नहीं था। यदि होता, तो यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि उनके पात्र किसी भी प्रकार हलके नहीं ठहरते; क्योंकि उनमें एक असाधारण प्रतिभा थी, जो उस दिशा में भी अपना प्रभाव निश्चय ही दिखाती।

अतः प्रेमचन्द के उपन्यासों का वैज्ञानिक मूल्यांकन उनके चरित्रांकन को या उनकी समाजिकता को प्रधानता देकर नहीं हो सकता। हमें इनके भी मूल में जाना होगा। और वह है उनका समस्यामूलक रूप। इसी क्षेत्र में उनका गौरव निहित है।

प्रस्तुत प्रबन्ध में यह खोजने का प्रयत्न किया गया है कि प्रेमचन्द के समय में देश की जो अवस्था थी उसके अनुरूप उन्होंने किस प्रकार अपने उपन्यासों को गढ़ा। वे कौन-कौन-सी समस्याएँ थीं जिन्हें प्रेमचन्द हल करना चाहते थे, उनकी ओर समाज का ध्यान आकर्षित करना चाहते थे। उन समस्याओं के प्रति प्रेमचन्द के अपने क्या विचार थे और इस प्रकार प्रेमचन्द समस्यामूलक उपन्यासकार के रूप में कहाँ तक सफल रहे।

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संदर्भ-संकेत

1 कुछ विचार, पृ. 42

2 वही, पृ. 42-43

प्रेमचन्द के समय का भारत

प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई सन् 1880 ई॰ को हुआ था। उनका साहित्यिक जीवन लगभग सन् 1901 से प्रारम्भ होता है। सन् 1901 से 1936 तक भारत प्रेमचन्द की सूक्ष्म दृष्टि का केन्द्र रहा। अतः यह अवश्यक है कि प्रेमचन्द के समय के भारत की राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक दशा पर पहले विचार कर लिया जाय; क्योंकि प्रेमचन्द व्यक्तिवादी लेखक नहीं थे; उन पर उस समय की परिस्थितियों तथा समस्याओं का पूरा-पूरा प्रभाव है। किसी काल-विशेष में जो दृष्टिकोण मान्यता प्राप्त करता है उसका सम्बन्ध जागरूक लेखकों से निकट का रहता है। वस्तुतः विचारक और लेखक ही अपने समय की विचारधारा के वाहक होते हैं। वे ही राष्ट्र तथा समाज को जीवन व गति प्रदान करते हैं।

प्रेमचन्द-युग भारतीय जनता के राष्ट्रीय संघर्ष का युग है। पराधीनता के कारण प्रत्येक क्षेत्र में भारत का विकास रुका हुआ था और उसकी सभी समस्याओं का निराकरण बिना स्वाधीनता-प्राप्ति के सम्भव नहीं हो पा रहा था। राष्ट्रीय पराधीनता एक ग्रन्थि के समान बन गई थी जो भारतीय जीवन की आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं के सूत्रों को सुलझाने नहीं देती थी। सबसे पहला प्रश्न देश को साम्रज्यवादी शक्तियों से मुक्त करने का था। भारत की समग्र चेतना व कर्म-शक्ति ब्रिटिश साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकने में लगी हुई थी। अतः सर्वप्रथम राजनीतिक भारत पर दृष्टिपात करना उपयुक्त होगा।

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में देश में निराशा का वातावरण छाया हुआ था। सन् 1857 का स्वाधीनता-संग्राम विफल हो चुका था। ब्रिटिश सरकार का दमनचक्र अपनी पूरी गति से चल रहा था। भारतीय जन-जीवन उसमें कोई राह न पाकर अनिश्चितता के बीहड़ प्रदेश में भटक रहा था। सन् 1885 में ‘इडियन नेशनल कांग्रेस’ का निर्माण हुआ। भारत के सुप्त प्राण पुनः जाग उठे। देश में एक नई हलचल उत्पन्न हुई।

सन् 1901 में महारानी विक्टोरिया की मृत्यु के पश्चात् सप्तम एडवर्ड गद्दी पर बैठे। सन् 1885 से 1905 तक ‘इंडियन नेशनल कांग्रेस’ ने काफ़ी प्रगति की और वह जन-संस्था के रूप में देखी जाने लगी। इस बीच कांग्रेस के कार्य शांतिपूर्ण समझौते तथा विश्वास के आधार पर ही इुए। “कांग्रेसियों के दिलों में कभी-कभी कुछ उत्तेजना और रोष के भाव आ गए हों, पर इसमें कोई शक़ नहीं कि ठेठ 1885 से 1905 तक कांग्रेस की जो प्रगति हुई उसकी बुनियाद थी वैध आन्दोलन और अंग्रेज़ों की न्यायप्रियता के प्रति उनका दृढ़ अटल विश्वास ही।”1

बीसवीं शताब्दी के प्रथम पाँच वर्ष लार्ड कर्ज़न के दमनपूर्ण शासन के थे। भारत को इस दमन का सबसे बड़ा धक्का बंग-भंग से लगा। बांग्ला भाषा-भाषी जनता की इच्छा के प्रतिकूल बंगाल को दो प्रान्तों में बाँट दिया गया। सन् 1911 की शाही घोषण से बंग-भंग का निर्णय वापस ले लिया गया। इसी समय भारत के राजनीतिक मंच पर सर आगा खाँ के दर्शन हुए। आगा खाँ के नेतृत्व में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई जिसने साम्प्रदायिक पृथक् प्रतिनिधित्व की माँग की और इस प्रकार भारत-विभाजन की नींव डाली। “1912 में लार्ड हार्डिंग जब जुलूस के साथ हाथी पर नई राजधानी दिल्ली में प्रवेश कर रहे थे, किसी ने उन पर बम फेंका और वह मरते-मरते बचे।”2 अफ्रीका के भारतीय आन्दोलन से भी देश की राष्ट्रीय चेतना को नया बल मिला।

जुलाई, 1914 में महासमर छिड़ गया। इस समर में भारतीय फौजों ने ब्रिटेन की पूरी रक्षा की। महात्मा गांधी ने सरकार को पूर्ण सहयोग दिया, क्योंकि युद्ध ‘आत्मनिर्णय’ के आधार पर किया गया था। लेकिन भारत की पराधीनता ज्यों-की-त्यों रही। इसी समय अंग्रेज़ सरकार द्वारा रोलट बिल (1919) को कानून बनाने के प्रयत्न किये गये। गांधी जी ने इसका कड़ा विरोध किया। “गांधी जी ने यह घोषणा की कि यदि रोलट कमीशन की सिफारिशों को बिल का रूप दिया गया तो वे सत्याग्रह-युद्ध छेड़ देंगे।”3 गांधी जी ने सम्पूर्ण देश का दौरा किया और अन्त में उन्हें आन्दोलन छेड़ना पड़ा। देश ने चारों तरफ़ से इस आन्दोलन का साथ दिया। जगह-जगह गोलियाँ चलीं। सबसे भयंकर नर-संहार जलियांवाला बाग (अमृतसर) में जनरल डायर द्वारा हुआ।

“सबसे बड़ी दुख बात वास्तव में यह थी कि गोली चलाने के बाद मृतकों के शव और वे लोग जो सख़्त घायल हो गये थे, उन्हें सारी रात वहीं पड़ा रहने दिया गया। वहाँ उन्हें रात-भर न तो पानी ही पीने को मिला और न डाक्टरी या कोई अन्य सहायता ही। डायर का कहना था, जैसा कि बाद को उसने प्रकट कियाः चूँकि शहर को फौज के कब्ज़े में दे दिया गया था और इस बात की डौंडी पिटवा दी गई थी कि कोई भी सभा करने की इज़ाजत नहीं दी जायगी, तो भी लोगों ने उसकी अवहेलना की, इसलिए मैंने उन्हें एक सबक देना चाहा, ताकि वे उसकी खिल्ली न उड़ा सकें।’ आगे चलकर उसने कहा कि ‘मैंने और भी गोली चलाई होतीं, अगर मेरे पास कारतूस होते। सोलह सो बार ही गोली चलाई, क्योंकि मेरे पास कारतूस ख़त्म हो गये थे।’ उसने कहा : ‘मैं तो एक फौजी गाड़ी (आरमर्ड कार) ले गया था, लेकिन वहाँ जाकर देखा कि वह बाग के भीतर घुस ही नहीं सकती थी। इसलिये उसे वहीं छोड़ दिया था।”4 सितम्बर 1919 में हण्टर-कमीशन की नियुक्ति की घोषण की गई। जिससे पंजाब के उपद्रवों की जाँच करने के लिए कहा गया। गांधी जी ने सत्याग्रह स्थगित कर दिया।

आगे चलकर 1920 के असहयोग-आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ा। सन् 1920 की 28 मई को हण्टर-रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसके कारण देश में क्षोभ और छा गया। भारतीय सदस्य उस रिपोर्ट से सहमत नहीं थे। असहयोग की योजना 1 अगस्त से प्रारम्भ हुई। जगह-जगह आन्दोलनों की बाढ़-सी आ गई। अनेक आन्दोलनकारी जेलों में ठूंस दिये गये। नवम्बर, 1920 में प्रिन्स ऑफ़ वेल्स के स्वागत का बहिष्कार किया गया। आन्दोलन सफलता की सीमा को पहुँचने लगा। लोगों के हौसले बहुत बढ़े हुए थे। असहयोग-आन्दोलन में हिन्दू-मुसलमानों ने मिलकर संघर्ष किया। लार्ड रीडिंग भी इस आन्दोलन से परेशान हो उठे। असहयोग-आन्दोलन अहिंसात्मक था, लेकिन चौरीचौरा के एक थाने पर लोगों ने आक्रमण किया और उसे जला दिया। गांधी जी ने हिंसा देख, आन्दोलन स्थगित कर दिया। गांधी जी भी इस आन्दोलन में छह वर्ष के लिए जेल भेजे गये।

सन् 1922 में टैक्स न देने का आन्दोलन छिड़ा, जिसमें सरकार ने बड़ी कठोरता से काम लिया। सन् 1923 में जेलों से छूटे नेताओं ने कौंसिलों में जाने का निश्चय किया। स्वराज्य पार्टी का निर्माण हुआ। साइमन कमीशन का बहिष्कार किया गया; क्योंकि उसमें एक भी भारतीय नहीं था। सन् 1927 में होने वाले हिन्दू-मुस्लिम दंगों5 को शांत करने के लिए ब्रिटिश गवर्नमेण्ट ने साइमन कमीशन भेजा था, लेकिन उसमें कोई भी भारतीय न होने से भारत ने उसे अपना अपमान समझा। धीरे-धीरे असंतोष तीव्रतर होता गया। जवाहरलाल नेहरू ने मद्रास कांग्रेस में भाग लिया। कांग्रेस में नया खून आया और गांधी जी द्वारा विरोध करने पर भी पूर्ण स्वराज्य की घोषणा कर दी गई। 1930 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में नमक-कानून भंग करने के लिए आन्दोलन प्रारम्भ हुआ। 6 अप्रैल, 1930 को दाण्डी पहुँचकर नमक बनाया गया। स्त्रियों ने पर्दा छोड़कर इस आन्दोलन में भाग लिया। ब्रिटिश सरकार ने लाठियों और गोलियों से इस आन्दोलन को भी दबाना चाहा। गांधी-इरविन पैक्ट सामने आया। तत्पश्चात् गांधी जी कांग्रेस के प्रतिनिधि बनकर गोलमेज कान्फ्रेंस में भाग लेने इंगलैंड गए। गांधी जी जब वापस लौटे तब देश की हालत और भी बिगड़ी दिखाई दी। उस समय लार्ड विलिंगटन का शासन था, जो बड़ा कठोर था। संयुक्त-प्रान्त के किसान लगान-बन्दी आन्दोलन कर रहे थे। नये भारत-कानून के अनुसार हरिजनों को हिन्दुओं से अलग करने की चेष्टा की गई। गांधी जी ने इस साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध आमरण अनशन की घोषणा कर दी। बाद में पूना-पैक्ट हुआ और व्रत तोड़ दिया गया। सन् 1935 में भारतीय शासन-विधान बना। कांग्रेस ने विधान के अनुसार चुनावों में भाग लिया; यद्यपि वह संतुष्ट न थी। इस प्रकार कांग्रेसी बहुमत वाले प्रान्तों में शासन-सूत्र कांग्रेस के हाथ में आ गया। मंत्रिमंडल बन ही रहे थे कि 7 अक्टूबर,1936 को प्रेमचन्द की मृत्यु हो गई।

प्रेमचन्द के जीवन-काल में भारत उपर्युक्त राजनीतिक घटना-चक्रों में से गुज़रा था। वास्तव में प्रेमचन्द का युग भारतीय स्वाधीनता-संग्राम का युग है। उनके समय देश का यौवन अपने पूरे विकास पर था। एक ओर नवयुवक बड़े उत्साह से स्वतन्त्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर रहे थे तो दूसरी ओर ब्रिटिश साम्राज्यवाद का दमन-चक्र अपनी पूरी कठोरता व निर्दयता के साथ चल रहा था। देश में जगह-जगह सभाओं और आन्दोलनों की धूम थी। विशाल जनसमूह के जुलूस प्रमुख नगरों में प्रायः निकला ही करते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार और अर्थशास्त्री रजनी पामदत्त ‘आज का भारत’ नामक ग्रंथ में लिखते हैं : “1914-18 के पहले महायुद्ध से, और उसके बाद सारी दुनिया पर जो क्रांति की लहर छा गई थी, उससे दूसरे सभी उपनिवेशों की तरह हिन्दुस्तान में भी बड़े-बड़े परिवर्तनों का युग आरम्भ हुआ। 1919-22 में बड़े-बड़े जन-आन्दोलनों से भारत हिल उठा और विश्वव्यापी आर्थिक संकट के बाद, जिसका हिन्दुस्तान पर बहुत असर पड़ा, 1930-34 में और भी ज़ोरों से जन-आन्दोलनों की लहर आई। ब्रिटिश हुकूमत इस उठते हुए राष्ट्रीय आन्दोलनों का मुक़ाबला बारी-बारी से सुधार और दमन के जरिये करती थी। एक तरफ भविष्य में खुदमुख़्तार सरकार देने के वादे किए जाते थे, दूसरी तरफ वैधानिक सुधार किये जाते थे कि जिन हाथों में ताक़त पहले थी वह वहीं बनी रहती थी।”6 प्रेमचन्द ने अपनी आँखों से भारतीय चेतना के इस उभार को देखा ही नहीं था; वरन् वे उस चेतना के वाहक एवं प्रसारक भी थे। व्यक्तिवादी लेखक न होने के कारण वे अपने को उपर्युक्त महत्त्वपूर्ण घटना-चक्रों से अलग नहीं रख सकते थे।

लेकिन उनके उपन्यास भारत के राजनीतिक जीवन का ही प्रतिनिधित्व नहीं करते, वरन् उसके आर्थिक, सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर भी दृष्टिपात करते हैं। वस्तुतः प्रेमचन्द के उपन्यास भारत की राष्ट्रीय भावनाओं और उसकी विविध ज्वलंत समस्याओं के प्रतीक हैं। वे मात्र ऐतिहासिक महत्त्व के उपन्यास नहीं हैं। वर्तमान जीवन अर्थनीति पर निर्भर है। आर्थिक संगठन का सामाजिक जीवन पर पूरा-पूरा प्रभाव पड़ता है। प्रेमचन्द के समय देश की आर्थिक स्थिति बड़ी भयानक थी। स्वयं प्रेमचन्द का जीवन आर्थिक अभावों का जीवन था। उन्होंने गरीबी का कटु अनुभव किया था। ग्रामों और नगरों में समान रूप से उनका जीवन बीता था। हिन्दुस्तान की निर्धनता और उससे मुक्त होने का उसका संग्राम प्रेमचन्द के उपन्यासों मे एक विशेष महत्त्व रखता है। भारत की आर्थिक स्थिति के सम्बन्ध में प्रेमचन्द से पूर्व भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने लिखा था :

अंग्रेज राज सुख साज सजे सब भारी।

पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी।।

ताहू पैं महँगी काल रोग विस्तारी।

दिन दिन दूने दुःख ईस देत हा हा री।।

सब के ऊपर टिक्कस की आफ़त आई।

हा हा ! भारत दुर्दशा न देखी जाई।।7

अंग्रेज़ी राज्य में भारतीय जनता के शोषण का यह यथार्थ चित्र है। इस देश की सारी सम्पत्ति धीरे-धीरे ब्रिटेन पहुँच रही थी। भारतीय जनता आर्थिक अभावों में बड़ी कठिनाई से जीवन काट रही थी। इस अपार निर्धनता के बीच जनता पर विभिन्न करों का भारी बोझ लाद दिया गया था; और इस प्रकार भारतीय जनता के रक्त से ब्रिटिश साम्राज्य का भव्य भवन बन रहा था। हिन्दुस्तान ब्रिटिश साम्राज्य की धुरी था। यहाँ के व्यापार का सबसे बड़ा भाग अंग्रेज़ों के हाथ में था। हिन्दुस्तान के दारिद्र्य के संबंध में भारतके प्रसिद्ध अर्थशास्त्री शाह और खंबाटा ने लिखा -

“हिन्दुस्तानियों की औसत आमदनी इतनी होती है कि तीन आदमियों की आमदनी से दो का ही पेट भर सकता है। उनको तीन बार खाना खाने की ज़रूरत होती है। तीन बार न खाकर दो ही बार खाएँ तो इतना हो सकता है कि इन तीनों आदमियों का पेट भर जाय। लेकिन इसके लिए शर्त यह है कि वे कपड़े न पहनें न घर में रहें बल्कि साल-भर बाहर ही दिन काटें। तभी अपनी आमदनी से वे भरपेट खाना खा सकते हैं, लेकिन यह खाना भी ऐसा होना चाहिए जो सबसे मोटा-झोटा और शारीरिक शक्ति के लिए बिलकुल मामूली हो।”8

सरकारी रिपोर्टों से भी साधारण जनता की दयनीय दशा प्रकट होती है : “कुशल मज़दूरों को छोड़कर हिन्दुस्तान के मज़दूरों को इतनी पगार मिलती है कि मुश्किल से ही उनका पेट भर सकता है और तन ढका रह सकता है। हर जगह इनकी बस्ती में ठूंसा-ठूंस मची हुई है। गन्दगी और तबाही की कोई हद नहीं।”9

“हिन्दुस्तान के लोगों का एक बहुत बड़ा हिस्सा अब भी ऐसी गरीबी मे दिन काट रहा है कि इस तरह की चीज़ पश्चिम के देशों में है ही नहीं। ज़िन्दगी और मौत के कगार पर इनके दिन कट रहे हैं।”10

“उद्योग-धंधों के अधिकांश केन्द्रों में मज़दूरों की कुल आबादी का दो-तिहाई भाग ऐसे लोगों का है जो कर्ज़ में डूबे हुए हैं।.... अधिकांश लोगों का खर्च उनकी तीन महीने की मज़दूरी से ज़्यादा और अक़्सर इससे भी बहुत ज़्यादा पड़ता है।”11

“आजकल बंगाल के अधिकतर किसान ऐसा भोजन करते हैं जिसके सहारे चूहे भी पाँच हफ़्ते से ज़्यादा नहीं चल सकते। उचित खुराक न मिलने से उनकी शक्ति इतनी क्षीण हो गई है कि वे गन्दी बीमारियों की छूत का मुक़ाबला कर ही नहीं सकते।”12

प्रेमचन्द के उपन्यासों में किसान-वर्ग का चित्रण बड़े विस्तार से किया गया है। भारतीय गाँवों और किसानों की दशा से वे अत्यधिक निकट से परिचित थे। ‘प्रेमाश्रम’ और ‘गोदान’ ग्रामीण जनता अथवा किसान-वर्ग के महाकाव्य माने जाते हैं। इनके अतिरिक्त ‘वरदान’, ‘सेवासदन’ आदि उपन्यासों में भी प्रेमचन्द ने किसान और उसकी विभिन्न समस्याओं की ओर सशक्त संकेत किये हैं।

भारत की अधिकांश जनता का धंधा खेती रहा है। खेती पर निर्भर लोगों का अनुपात सन् 1891 से 1931 तक की जनसंख्या-रिपोर्ट से देखा जा सकता है।12 सन् 1933 के लगभग भारतीय किसान और खेती की दशा के सम्बन्ध में प्रोफ़ेसर राधाकमल मुकर्जी अपनी पुस्तक ‘हिन्दुस्तान में भूमि की समस्या’ में लिखते हैं :

“धरती से जीविका चलानेवालों की संख्या इतनी बढ़ गई है कि खेत बिल्कुल छोटे-छोटे हो गये हैं। इन छोटे खेतों में एक पूरे परिवार को भी पूरा काम नहीं मिलता।.........साथ ही ज़मीदार अपने पुराने और सम्मानपूर्ण चलन को नहीं निभाते। वे किसी तरह की दौलत पैदा नहीं करते, उनका काम सिर्फ़ लगान वसूल करना है। न वे खेती के लिए पूँजी देते हैं, न किसान के धंधों का संचालन करते हैं। इनके नीचे कारिन्दों की एक ऐसी जमात है, जो उलझी हुई भूमि-व्यवस्था से पूरा फ़ायदा उठाती है। इससे खेत जोतने वाले किसान की हालत बद से बदतर होती जाती है।”13

“युक्त-प्रान्त में खास तौर से मालगुज़ारी की दर बेतहाशा बढ़ाई गई है।”14

‘युक्त-प्रान्त की विकट स्थिति’ शीर्षक से डा॰पट्टाभि भारतीय किसान की दशा का विवरण इस प्रकार देते हैं, “युक्त-प्रान्त में विकट परिस्थति उत्पन्न हो रही थी।......युक्त-प्रान्त में किसानों की, अधिकांशतः ताल्लुकेदारों व जमींदारों के अधीनस्थ किसानों की, आर्थिक दशा बहुत खराब हो रही थी। उनकी विपत्ति बढ़ रही थी। लगान-वसूली के तरीकों में नरमी का नाम-निशान न था।........ बेदख़लियों तथा दबाव की ज़्यादती से यह विपत्ति और भी अधिक गंभीर हो गई। अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में तो किसानों पर आतंक का राज्य छा गया और उनके साथ क्रूरता पर क्रूरता होने लगी।’’15 यह विवरण लगभग सन् 1931 की स्थिति को दृष्टि में रखकर दिया गया है।

इसके अतिरिक्त भारतीय किसान कर्ज़ के बोझ से भी बुरी तरह लदा हुआ था। इस कर्ज़ का कारण अर्थिक है। बिटिश साम्राज्यवाद के समर्थक इस कर्ज़ का कारण किसानों की फ़िजूलखर्ची बताते हैं, जैसे-ब्याह-शादी, मुंडन-छेदन आदि-आदि अवसरों पर निरर्थक व्यय होनेवाला द्रव्य। पर वास्तव में ऐसी बात नहीं है। बंगाल में दक्षिण-पश्चिमी वीरभूम के देहातों के कर्ज़ की जाँच (1933-34) के अनुसार16 यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कर्ज़ का लगभग एक-चौथाई भाग लगान देने के लिए लिया गया है।17 अतः कर्ज़ के कारण आर्थिक हैं, मात्र सामाजिक कुरीतियों व अंधविश्वासों तक ही सीमित नहीं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रेमचन्द के समय भारत राजनीतिक पराधीनता के पाश में ही बद्ध न था; वरन् भंयकर गरीबी का भी शिकार था। कर्ज़ के बोझ से लदा हुआ अधिंकाश भारतीय समाज असंतोष के धुएँ में साँस ले रहा था। इसका प्रमुख कारण अंग्रेज़ी राज की लूट-नीति थी। अंग्रेज़ी शासकों ने भारतीय जनता की गरीबी दूर करने के लिए कोई क़दम नहीं उठाया ; वे शोषण-शस्त्र से अपना ही घर भरते रहे।

प्रेमचन्द ने भारत की इस लूट को अपनी आँखों देखा था। उन्होंने समाज के प्रत्येक अंग - मज़दूर, किसान, मध्यमवर्गीय परिवार आदि की आर्थिक स्थिति अपने उपन्यासों में चित्रित की। तत्कालीन भारत की आर्थिक दशा का यथार्थ ज्ञान प्रेमचन्द-साहित्य से होता है। आर्थिक समस्या का सीधा सम्बन्ध राष्ट्रीय पराधीनता से था, अतः देश को स्वाधीन करने का प्रश्न प्रमुख था। प्रेमचंद ने पूर्ण राष्ट्रीय स्वाधीनता के आन्दोलन को इसीलिए प्राथमिकता दी। सामाजिक समस्याएँ आर्थिक कारणों पर ही अवलिम्बत रहती हैं। अर्थव्यवस्था में परिवर्तन होने से सामाजिक ढाँचा अपने-आप बदलने लगता है। अनेक सामाजिक कुरीतियों को जन्म देने वाली दूषित अर्थव्यवस्था ही होती है। प्रेमचन्द के उपन्यासों में जहाँ कहीं भी सामाजिक समस्याएँ आई हैं उनका आधार आर्थिक है। वेश्यावृत्ति, विधवा-विवाह, अनमेल-विवाह, छुआछूत, शिक्षा, ग्राम्य-जीवन आदि सभी के मूल में आर्थिक पहलू है। हमें यह देखना चाहिए कि प्रेमचन्द ने अपने समय के भारत का किस प्रकार प्रतिनिधित्व किया। वे कौन-कौन-सी तत्कालीन समस्याएँ थीं, जिनकी युग-धर्म को माननेवाला जागरूक साहित्यकार उपेक्षा नहीं कर सकता था।

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संदर्भ-संकेत

1 कांग्रेस का इतिहास, पहला खंड - डॉ. पट्टाभि सीतारमैया, पृ. 58

2 वही, पृ. 67

3 वही, पृ. 129

4 कांग्रेस का इतिहास, पहला खंड - डॉ. पट्टाभि सीतारमैया, पृ. 113

5 ‘‘1926 के मध्य में हमें देश की राजनीतिक स्थिति का सिंहावलोकन करने के लिए उत्तर जाना चाहिए। 6 अप्रैल 1926 को लार्ड इर्विन भारत में आये। लगभग उसी समय कलकत्ते में बड़ा ही भयानक साम्प्रदायिक दंगा हो गया।’’

- कांग्रेस का इतिहास, पृ. 243

‘‘सन् 1927 की गर्मियों में अन्य सालों की भाँति कोई मार्के का क़ानून नहीं पास हुआ, लेकिन देश में हिन्दू-मुस्लिम दंगों की बाढ़-सी आ गयी। सबसे भीषण दंगा लाहौर में हुआ, जो 3 मई से 7 मई तक होता रहा और जिसमें व्यक्ति मारे गये और 272 घायल हुए। बिहार, मुल्तान (पंजाब), बरेली (युक्त-प्रांत) व नागपुर (मध्य-भारत) में भी इसी प्रकार के दंगे हुए।’’

- कांग्रेस का इतिहास, पृ. 252

6 आज का भारत, पृ. 8

7 भारत दुर्दशा

8 भारत की सम्पत्ति और उसकी करोपयोगी क्षमता, 1924, पृ. 153

9 1927-28 में हिन्दुस्तान

10 1929-30 में हिन्दुस्तान

11 व्हिटले कमीशन, 1929, पृ. 224

12 ‘बंगाल स्वास्थ्य रक्षा विभाग’ के डायरेक्टर की रपोर्ट, 1927-28

13 जनसंख्या रिपोर्ट के अनुसार खेती पर निर्भर लोगों का अनुपात-

सन् 1891 ..... 61.1 फीसदी

सन् 1901 ..... 66.5 ’’

सन् 1911 ..... 72.2 ’’

सन् 1921 ..... 73.0 ’’

सन् 1931 ..... 66.6 ’’

14 पृ. 161-62

15 पृ. 206

16 कांग्रेस का इतिहास, पृ. 404

17 लगान देने के लिए / रु. 13,000 / 24.2 फ़ीसदी

पक्के सुधार के लिए / 12,736 / 23.7 ’’

सामाजिक और धार्मिक कार्यों के लिए / 12,021/ 22.3 ’’

पुराना कर्ज़ अदा करने के लिए / 4,503 / 8.4 ’’

खेती के लिए / 2,423 / 4.5 ’’

मुक़दमों के लिए / 708 / 1.3 / ’’

फुटकर / 8,471 / 15.6 ’’

(एस. बोस - आँकड़ों की हिन्दुस्तानी पत्रिका, सितम्बर, 1937)

प्रेमचन्द-युग में मध्य-वर्ग की स्थिति

भारत में मध्य-वर्ग का उदय अंग्रेज़ी साम्राज्य के फलस्वरूप हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भारतीय मध्यवर्गीय समाज का स्वरूप सामने आया। सुप्रसिद्ध कवि और विचारक श्री हुमायूं कबिर अपनी पुस्तक ‘दि इंडियन हेरिटेज’ में तत्कालीन भारतवर्ष की सामाजिक स्थिति का विश्लेषण करते हुए लिखते हैं : “समस्त प्राचीन मूल्यों और विश्वासों को चुनौती दी जा रही थी। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संस्थाएँ तीव्र गति से टूट रही थीं। भारत वास्तविक अर्थ में परिवर्तन की अनिश्चित दशा में था। प्राचीन सामाजिक संगठन अव्यवस्थित हो रहा था। नए तत्त्व उभर रहे थे, जिनकी किसी भी बीते युग मे कोई मिसाल नहीं मिलती।”1

“सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन का परम्परागत ढंग अव्यवस्थित ही नहीं, कहीं-कहीं, नष्ट तक हो रहा था। यही नहीं, नए और सामंजस्यपूर्ण दृष्टिकोण के निर्माण का भी कोई प्रयत्न नहीं था जो अतीत की विरासत को पश्चिम से आये नये तत्त्वों के साथ जोड़ता। पर, प्रकृति रिक्त स्थिति नहीं रहने देती। निदान असंघटित तथा खंडित विश्वास और स्वभाव जीवन के प्राचीन ढंग का स्थान लेने लगे। प्राचीन अप्रत्याशित रूप से नष्ट हो रहा था, लेकिन नए दृष्टिकोण का उत्पन्न होना अभी शेष था।”2 भारतीय समाज पर पाश्चात्य प्रभाव बढ़ता गया जिसके फलस्वरूप मध्यवर्ग का जन्म हुआ।

यह वर्ग पढ़े-लिखे लोगों का बना। अंग्रेज़ी राज्य को सुचारु रूप से चलाने के लिए विभिन्न कार्यालयों में पढ़े-लिखे व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ी। इस आवश्यकता-पूर्ति के निमित्त अंग्रेज़ों ने देश-भर में विद्यालय और महाविद्यालयों के स्थापना की और अंग्रेज़ी को शिक्षा का माध्यम बनाया। इन विद्यालयों और महाविद्यालयों से इस वर्ग के मस्तिष्क का उत्तरोतर विकास हुआ और मध्यवर्ग देश के प्रधान बुद्धिजीवी वर्ग के रूप में सामने आया। ब्रिटिश शासकों की शैक्षणिक नीति का स्पष्टीकरण करते हुए हुमायूं कबिर आगे लिखते हैं, “काफ़ी समय तक शासन व्यावसायिक लाभ को दृष्टि में रखकर किया जाता रहा। देश के साधनों का पूर्णरूपेण शोषण करने के हेतु ब्रिटेन को ऐसे मध्य श्रेणी के मनुष्य-समुदाय की आवश्यकता थी जो उसके और भारतीय लोगों के बीच मध्यस्थ का कार्य कर सके। शासन-प्रबन्ध की आवश्यकता के सम्बन्ध में भी यही समस्या थी। उच्चस्तरीय नीति स्वयं अंग्रेज़ नियत करते थे, पर शासन-प्रबन्ध में उसके दैनिक प्रयोग के लिए भारतीय लोगों की सेवाओं की आवश्यकता पड़ती थी। परिणाम यह हुआ कि प्रबंध के लिए एक व्यापक कर्मचारी वर्ग का निर्माण हुआ, जिसने अंग्रेज़ों को शासन-प्रबंध और व्यापार में सहायता दी। इन सेवकों की प्रमुख योग्यता अंग्रेज़ी भाषा में ‘प्रवीणता’ मानी जाती थी। शिक्षा का स्वरूप भी शासकों की आवश्यकतानुसार निर्मित हुआ। मनुष्य के व्यक्तित्व-निर्माण के स्थान पर शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य अंग्रेज़ी की भाषागत प्रवीणता प्राप्त करना हो गया।”3

मध्यवर्ग पर एक ओर पाश्चात्य प्रभाव पड़ रहा था तो दूसरी ओर भारतीय सुधारवादी संस्थाओं का। वास्तव में मध्यवर्ग की स्थिति का कोई निश्चित रूप दिखाई नहीं देता। इस वर्ग में अनेकरूपता मिलती है। हुमायूं कबिर के शब्दों में, “पढे़-लिखे नए वर्गों ने अपने विचार अधिकतर पश्चिम से ग्रहण किये। उन्होंने किसी-न-किसी रूप में अंग्रेज़ों के सम्पर्क के कारण उनके रहन-सहन को भी अपनाया।.......अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान गत शताब्दी में लगातार बढ़ता गया। जिसके कारण मध्यवर्ग का अत्यधिक फैलाव हुआ।”4 इसके अतिरिक्त इस नवोदित वर्ग पर कुछ सुधारवादी संस्थाओं का भी प्रभाव पड़ा। ब्रह्मसमाज, आर्यसमाज, थियोसोफ़िकल सोसायटी, कांग्रेस आदि संस्थाओं का दृष्टिकोण सुधारवादी ही रहा। बुद्धिजीवी मध्यवर्ग अपने को इन सुधारवादी आन्दोलनों से मुक्त न रख सका और इस प्रकार उसके मानस पर सुधारवादी रंग भी चढ़ता गया। यह भारतीय मध्यवर्ग की मानसिक बनावट का विशिष्ट पहलू है जो उसे विश्व के अन्य मध्यवर्गीय जनों से पृथक करता है। मध्यवर्गीय समाज की आर्थिक श्रेणियाँ भी ध्यान देने योग्य हैं। हुमायूं कबिर लिखिते हैं, “मध्यवर्ग कभी एकरूप नहीं हो सकता। कोई भी सामाजिक वर्ग पूर्ण रूप से एकरूप नहीं होता; लेकिन मध्यवर्गीय लोगों में स्तरहीन विभाजन विशेष रूप से द्रष्टव्य है। एक ओर तो वे बिल्कुल निम्नवर्ग की सीमा पर होते हैं तो दूसरी ओर उनमें और पूँजीपतियों में अन्तर करना कठिन हो जाता है।”5

मध्यवर्ग के उदय और विकास मे पूँजीवादी व्यवस्था का भी हाथ है। पूँजीवादी देशों में मध्यवर्ग की स्थिति काफ़ी अच्छी है। भारत चूँकि पराधीन रहा इसलिए यहाँ पूँजीवादी अर्थव्यवस्था का स्वतंत्रतापूर्वक विकास न हो सका। भारतीय मध्यवर्ग की स्थिति अच्छी न होने के कारण मध्यवर्गीय जनता में सर्वाधिक असंतोष व्याप्त है। हुमायूं कबिर जैसा लिखते हैं, “सभी जगह मध्यवर्ग यह अनुभव करने लगा है कि उसका कोई भविष्य नहीं है। भारत में उसकी दशा और भी दयनीय है। पूँजीवाद के विकास ने अन्य देशों में सामाजिक अर्थव्यवस्था में उनके लिए स्थान बना दिया है, पर भारत में पूँजीवाद को अंग्रेज़ों ने राजनीतिक और आर्थिक दबावों के कारण बढ़ने नहीं दिया। इस पर भी, समाज की अन्य श्रेणियों का झुकाव, मध्यवर्ग की अपेक्षा, अधिक अच्छी दशा देख कर उसकी ओर बराबर हो रहा है। मध्यवर्ग इतना बढ़ा कि मौजूदा आर्थिक स्थिति उस संख्या को सँभाल न सकी। उसके सदस्य आर्थिक श्रेणी के निचले स्तर पर वापस जाने को उद्यत नहीं थे और पूँजीवाद के प्रति उनके बढ़ते हुए क़दम हज़ारों तरीक़ों से रोक दिए गए। बेकारी बढ़ती गई और उसके साथ-साथ असंतोष भी।”6

भारत का सर्वाधिक चिंत्य वर्ग यही मध्यवर्ग है। इसकी अधिकांश समस्याएँ इसकी स्वयं की दुर्बलताओं के कारण हैं। मध्यवर्ग के व्यक्तियों के स्वभाव का विश्लेषण करने पर यह तथ्य समाने आता है कि उनके मन और मस्तिष्क का आधार अभिजातवर्गीय समाज की श्रेणी तक पहुँचने की भावना है; पर यह भावना आर्थिक अभावों के कारण कुंठित हो जाती है। इस कारण मध्यवर्गीय परिवारों में ‘दिखावे का रूप’ प्रायः पाया जाता है। बाहर से वे अपने ऊपर एक अभिजात वर्गीय परदा डाले रहते हैं। यह परदा इस कारण प्रभावहीन सिद्ध नहीं होता; क्योंकि मध्यवर्गीय व्यक्ति मानसिक विकास में किसी से पीछे नहीं होते - विकसित मानसिक धरातल के साथ अभिजातवर्गीय ढोंग निभ जाता है। पर, जीवन-संघर्ष के बीच मध्यवर्ग का यथार्थ रूप सहज ही प्रकट हो जाता है। घर में धन के नाम पर कुछ नहीं निकलता। पर, सम्मान-भावना के पीछे मध्यवर्गीय परिवार कर्ज़ लेते हैं और अपने जीवन को धीरे-धीरे उलझाते हैं। यदि अभिजात-वर्ग की प्रतिस्पर्धा की भावना का लोप इस वर्ग में हो जाए तो इस वर्ग की अधिकांश समस्याएँ दूर हो सकती हैं अथवा उनको सुलझाने में सुगमता उत्पन्न हो सकती है। निःसंदेह दिखावे की भावना के कारण ही आर्थिक तंगी का विशेष शिकार इस वर्ग को रहना पड़ता है।

मध्यवर्गीय समाज के मनोवैज्ञानिक पहलू और उसकी अन्य श्रेणियों से तुलना करते हुए श्री हुमायूं कबिर लिखते हैं, “आधुनिक भारत का संभवतः सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य मध्यवर्ग का असंतुलित फैलाव है। सम्पूर्ण विश्व में मध्यवर्ग के लोग अशांत, आलोचनात्मक और व्यक्तिवादी हैं। ऐसी स्थिति के कारण उनकी आर्थिक स्थिति डावाँडोल है। पूँजीवादी श्रेणी में ऊपर उठाने की प्रबल इच्छा के फलस्वरूप उनमें बहुत से निम्न श्रेणी की स्थिति में पहुँच जाते हैं। वे अनुभव करते हैं कि उन्हें सम्मानपूर्ण स्तर बनाए रखना आवश्यक है; जो प्रायः उनके साधनों की पहुँच के बाहर होता है। लगातार आर्थिक संघर्ष उनके जीवन के समस्त दृष्टिकोण पर प्रभाव डालता रहता है। अपनी स्थिति के सम्बन्ध में निश्चिन्त होने के कारण अभिजातवर्गीय कभी अपने महत्त्व को जताने की आवश्यकता नहीं समझता। निम्नवर्गीय भी अपने भाग्य से संतुष्ट रहता है। मध्यवर्ग संतुष्ट नही रहता और वह प्रायः उद्दण्ड, आत्मप्रदर्शनकारी और मुँहफट होता है। अपने पक्ष का समर्थन करने के लिए वह दूसरों की आलोचना करता है।”7

कुल की तथाकथित मर्यादा मध्यवर्ग के विकास में सबसे बड़ी रुकावट है। यह समस्या उच्च और निम्नवर्ग में नहीं है। निम्नवर्ग में पायः सभी सदस्य काम करते हैं और इस प्रकार अपना-अपना जीविकोपार्जन करते हैं। उनको एक-दूसरे पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। परिवार के सभी सदस्य - युवक, बालक, स्त्रियाँ आदि कुछ भी काम करके थोड़ा-बहुत धन कमा ही लेते हैं। दूसरे, उनकी आवश्यकताएँ भी अधिक नहीं होती। वह बहुत कुछ संतुष्ट रहता है, पर निम्नवर्ग की तुलना में मध्यवर्ग की स्थिति बड़ी भयावह होती है। मध्यवर्गीय परिवार में कमानेवाला केवल एक सदस्य होता है। कुल की मर्यादा के कारण स्त्रियाँ नौकरी नहीं करतीं। इस प्रकार परिवार का सारा आर्थिक बोझ केवल एक व्यक्ति के कंधे पर पड़ता है, और फिर मध्यवर्ग को अपनी थोथी प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए भी अनावश्यक बातों में अनिवार्य रूप से खर्च करना पड़ता है। इस प्रकार मध्यवर्ग आर्थिक अभावों में बुरी तरह ग्रस्त मिलेगा। उच्चवर्ग के पास पैसा है। वह अपने धन के बल पर हर वस्तु खरीद सकता है। अतः मध्यवर्ग का जीवन ही सर्वाधिक जटिल और अभावग्रस्त जीवन है।

पर मध्यवर्गीय अपने वर्ग को, अपने स्वतंत्र अस्तित्व को छोड़ना नहीं चाहता। “.......इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि मध्यवर्गीय भावनाओं से युक्त जनसमूह प्रतिस्पर्द्धा के दृष्टिकोण के होते हुए भी न तो ‘शासक-वर्ग’ मे विलीन हुआ है; और न शोषित औद्योगिक कामगारों के समान बना है। प्रत्युत पूँजीवाद के विस्तार-युग में उसकी संख्या बढ़ी है और उसने उस युग के महत्त्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तनों में प्रायः निर्णयात्मक भाग लिया है।”8

मध्यवर्ग की नारी की समस्या भी जटिल समस्या है। आर्थिक पराधीनता तो उसके साथ है ही; सामाजिक और नैतिक नियमों से भी वह बुरी तरह बँधी हुई है। निम्नवर्ग की नारी एक पति को छोड़कर दूसरा पति कर सकती है। इसी प्रकार उच्चवर्ग की नारी में भी यौन-पवित्रता को इतना महत्त्व नहीं दिया जाता, पर मध्यवर्ग में नारी घर की लक्ष्मी समझी जाती है। उस पर उस घर की प्रतिष्ठा आधारित रहती है। मध्यवर्गीय नारी को अपनी इच्छाओं को दबाना पड़ता है। प्रेमचन्द ने ‘ग़बन’ की ‘रतन’ में और ‘निर्मला’ में यही तथ्य प्रस्तुत किया है।

मध्यवर्ग प्राचीन संस्कारों से बुरी तरह ग्रस्त है। उसमें अभी भी प्राचीन संस्कारों को नष्ट करने की शक्ति नहीं आई है, भले ही प्राचीन संस्कारों के प्रति मोह न रहा हो। परम्परागत रूढ़ियों को मध्यवर्ग आज भी इच्छा-अनिच्छा से ढोये जा रहा है। इन्हीं संस्कारों के फलस्वरूप मध्यवर्गीय नारी-समाज की दशा सर्वाधिक शोचनीय है। सामाजिक क्षेत्र में एक प्रकार का पिछड़ापन मध्यवर्ग के नारी-समाज में प्रायः मिलता है।

मध्यवर्ग में ढुलमुल नीति का अवगुण भी मिलता हे। उसके निश्चय बहुत कम पूरे हो पाते हैं। इसका कारण मध्यवर्ग का आत्मनिर्भर न होना है। उसे श्रम-क्षेत्र में निम्नवर्ग के और अधिकार-क्षेत्र में उच्चवर्ग के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। इस कारण उसे समय-समय पर अनेक विरोधी तत्त्वों से समझौता करना पड़ता है। समझौते की भावना इसलिए और भी उससे मिलती है, क्योंकि वह संघर्ष से यथासंभव बचना चाहता है। मध्यवर्ग के अधिकांश लोग नौकरी-पेशा पाये जाते हैं। सरकारी या ग़ैर-सरकारी नौकरी करने वाले व्यक्तियों की स्थिति ऐसी नहीं होती कि वे सरकार अथवा अपने मालिकों के विरुद्ध कोई क़दम उठा सकें। निदान उन्हें समझोते का मार्ग अपनाना पड़ता है। इससे उनके दैनिक जीवन में कोई व्यवधान उत्पन्न नहीं होता। मध्यवर्गीय व्यक्ति यदि कुछ आगे बढ़ेगा भी तो मात्र सुधार-भावना तक ही। वह कोई ठोस क्रांतिकारी कार्य करने में सर्वथा असमर्थ रहता है। बौद्धिक दृष्टि से यद्यपि उसमें कोई कमी नहीं होती फिर भी सक्रिय रूप में वह कोई आन्दोलन सफलतापूर्वक नहीं चला पाता।

प्रेमचन्द मध्यवर्ग और निम्नवर्ग के लेखक थे। वे जितनी सफलता से साथ मध्य और निम्न वर्गों का चित्रण कर सके उतनी सफलता के साथ उच्च वर्ग का नही ; यद्यपि इस क्षेत्र में भी उनका व्यक्तित्व अप्रतिम है। पर, जब हम उनके समस्त व्यक्तित्व का अध्ययन करते हें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उनका मन जितना मध्य और निम्नवर्गों का समस्याओं में रमा है उतना उच्चवर्ग की समस्याओं एवं प्रश्नों में नहीं। स्वयं प्रेमचन्द और उनका घराना मध्यवर्ग से सम्बन्ध रखता है। मध्यवर्गीय होने के कारण मध्यवर्ग से उनकी निकटता स्वाभाविक थी। वास्तव में मध्यवर्ग से वे सर्वाधिक परिचित थे। यदि निम्नवर्ग का अधिकांश चित्रण उन्होंने तत्कालीन वातावरण को देखकर किया तो मध्यवर्ग का चित्रण व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर।

प्रेमचन्द के समय भारतीय मध्यवर्ग की स्थिति का यथार्थ वर्णन और वैज्ञानिक विश्लेषण डा॰ इन्द्रनाथ मदान ने अपनी पुस्तक ‘प्रेमचन्द : एक विवेचना’ में काफ़ी विस्तार से किया है। वे लिखते हैं : ‘‘मध्यम वर्ग जीवन के प्रधान और नवीन आदर्शों के संघर्ष के बीच से गुज़र रहा था। पूँजीवाद या पाश्चात्य सभ्यता के आघात ने जीवन के मध्यकालीन और आधुनिक दृष्टिकोण के बीच एक गहरी खाई खोद दी थी। प्रेमचन्द की प्रारंभिक कृतियों का सम्बन्ध विशेष रूप से मध्यवर्गीय समाज के इसी संघर्ष से है। वह सुधार करने के लिए कटिबद्ध था।........सामाजिक मामलों में मध्यवर्ग ने व्यक्तिगत स्वातन्त्र्य का अधिक उपयोग आरम्भ किया।.......यह मध्यवर्ग उन जायदाद रखने वाले सज्जनों से मतभेद रखता था, जो अपने किराये की आमदनी के बल पर भविष्य की सभी चिंताओं से मुक्त थे। इसलिए मध्य-वर्ग और उत्साह के साथ नैतिकता को अपना रहा था।”9

प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों में मध्यवर्ग के इसी दल का चित्रण किया है। उनकी सहानुभूति इसी सामाजिक दल के साथ रही। उनके प्रमुख मध्यवर्गीय औपन्यासिक पात्र नैतिकता को अपनाकर चले हैं। चूँकि प्रेमचन्द की नैतिक मूल्यों पर गहन आस्था थी इसलिए उन्होंने अनीति की कहीं विजय नहीं बताई। सत्य की सदैव असत्य पर विजय बताना ही उनका जीवन-दर्शन था। इस प्रकार प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों के माध्यम से भारतीय समाज में उभरने वाले इस प्रगतिशील मध्यवर्ग के नैतिक मूल्यों को प्रतिष्ठित किया है। यह बात दूसरी है कि कहीं-कहीं वे स्वयं के मध्यवर्गीय संस्कारों के कारण समझौते का मार्ग अपना लेते हैं। समझौते की भावना मध्यवर्गीय समाज के मानस में विशेष रूप से दिखाई देती है और इससे प्रेमचन्द भी नहीं बच सके हैं।

प्रेमचन्द के प्रथम उपन्यास ‘वरदान’ का सम्बन्ध मध्यवर्ग के जीवन से ही है। ब्रजरानी, प्रताप, कमलाचरण जैसे प्रमुख पात्र मध्यवर्ग के ही हैं और उनकी समस्याएँ भी मध्यवर्गीय परिवारों की समस्याओं से सम्बन्ध रखती हैं। मध्यवर्गीय समाज में विवाह और प्रेम का जो पारस्परिक विरोध दिखाई देता है उसका बड़ा ही सफल कथात्मक चित्रण ‘वरदान’ में हुआ है। प्रारम्भिक और साधारण उपन्यास होते हुए भी ‘वरदान’ से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि प्रेमचन्द का मन किस प्रकार मध्यवर्गीय समाज की समस्याओं की ओर आकर्षित हो रहा था।

‘प्रतिज्ञा’ में प्रेमचन्द ने विधवाओं के पुनर्विवाह की समस्या का उद्घाटन मध्यवर्गीय समाज की पृष्ठभूमि पर ही किया है। मध्यवर्ग में पाई जाने वाली इस सामाजिक कुरीति का यथार्थ चित्रण ‘प्रतिज्ञा’ की प्रमुख विशेषता है। वे विधवाओं के जीवन की दयनीय स्थिति बताकर विधवा-विवाह के प्रचलन पर ज़ोर देते हैं। चूंकि ‘प्रतिज्ञा’ का युग मध्यवर्ग के जागरण और संघर्ष का उषाकाल था अतः प्रेमचन्द का दृष्टिकोण भी इस उपन्यास में सुधारवादी रहा है। वे सुधार के द्वारा इस सामाजिक कुरीति को मिटाना चाहते हैं। ‘प्रतिज्ञा’ का प्रमुख मध्यवर्गीय पात्र अमृतराय है जो विधवाओं की दशा सुधारने में ही अपने जीवन का होम कर देता है। प्रेमचन्द ने मध्यवर्गीय विशिष्ट नैतिक मूल्यों का अमृतराय के चरित्र में भली-भाँति बताया है।

‘प्रतिज्ञा’ और ‘वरदान’ के पश्चात् ‘सेवासदन’ में प्रेमचन्द मध्यवर्ग के जीवन का बड़े विस्तार से चित्रण करते हैं। वास्तव में ‘सेवासदन’ मध्यवर्ग के जीवन का ही उपन्यास है। उसमें मध्यवर्गीय परिवारों की एक ज्वलंत समस्या पर प्रकाश डाला गया है - यह समस्या नारी-जीवन की समस्या है जो वैवाहिक, वैधव्य और वेश्यावृत्ति के पहलू विशेष रूप से रखती है। डा॰ इन्द्रनाथ मदान ‘सेवासदन’ की समीक्षा करते हुए एक स्थल पर लिखते हैं, “ उपन्यास के सभी प्रमुख पात्र मध्यवर्ग के हैं और उनका चरित्र-चित्रण जीवन के सुधारवादी दृष्टिकोण से ही किया गया है। लड़की के पिता कृष्णचन्द्र में इस वर्ग के सब गुण और अवगुण विद्यमान हैं।”10 .....पद्मसिंह मध्यवर्ग का एक विशेष प्रकार का प्रतिनिधि है। वह पुराने विचारों का है और अपने व्यवहार में नैतिकता का आग्रह रखता है।11 इस प्रकार ‘सेवासदन’ की कहानी भी मध्यवर्गीय परिवारों की कहानी है। उसमें प्रायः सभी पात्र मध्यवर्गीय संस्कारों को अपनाए हुए चलते हैं।

‘वरदान’, ‘प्रतिज्ञा’ और ‘सेवासदन’ के पश्चात् मध्यवर्गीय समाज का उपन्यास ‘निर्मला’ हामरे सामने आता है। इसके पूर्व ‘प्रेमाश्रम’ लिखा जा चुका था, पर ‘प्रेमाश्रम’ में प्रेमचन्द किसानों और जमींदारों के संघर्ष में ही उलझ जाते हैं। मध्यवर्गीय समाज का चित्रण उसमें प्रधान नहीं है। ‘निर्मला’ में दो समस्याएँ हैं - (1) दहेज़-प्रथा और (2) एक ऐसे वृद्ध से, जिसकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी हो, एक युवा लड़की का विवाह। उपन्यास की कथा तीन मध्यवर्गीय परिवारों के जीवन से गुँथी हुई है - एक परिवार बाबू उदयभानु का है, दूसरा बाबू तोताराम का और तीसरा सिन्हा साहब का। इन तीनों परिवारों के पारिवारिक जीवन के चित्रण में मध्य-वर्ग के संस्कारों और धारणाओं का बड़ा ही सफल अंकन हुआ है।

‘निर्मला’ के उपरान्त ‘रंगभूमि’ आता है। ‘रंगभूमि’ में औद्योगिक समस्या प्रमुख है; अतः इस उपन्यास में थैलीशाहों अथवा पूँजीपतियों का उल्लेख ही अधिक है। किसानों और ग्रामीण जनता का भी चित्रण समानांतर हुआ है। अतः ‘रंगभूमि निम्न और उच्च वर्गों के जीवन से सम्बन्ध रखता है।

‘कायाकल्प’ में अवश्य उच्च, मध्य और निम्न वर्गों का सम्मिलित चित्रण द्रष्टव्य है। औपन्यासिक कथा के दो भाग इस उपन्यास में देखे जा सकते हैं। एक भाग का सम्बन्ध सामाजिक समस्या से है और दूसरे का सम्बन्ध आध्यात्मिक और रहस्यमय लोक के चित्रण से। प्रस्तुत उपन्यास में छह प्रसंग हैं : (1) चक्रधर-मनोरमा का प्रसंग, (2) अहल्या-चक्रधर की कथा, (3) मनोरमा-विशालसिंह की कहानी, (4) रोहिणी-विशालसिंह की कथा, (5) महेन्द्रसिंह-देवप्रिय की कहानी, और (6) हरिसेवक-लोंगी की कथा। उपर्युक्त प्रसंगों में केवल चक्रधर का प्रारम्भिक जीवन, उसके विचार और आचरण प्रगतिशील मध्यवर्गीय समाज के प्रतीक हैं, जबकि उसका पिता ब्रजधर पुरानी पीढ़ी के मध्यवर्गीय समाज का प्रतिनिधि है।

‘कायाकल्प’ के पश्चात् मध्य-वर्ग का सबसे प्रसिद्ध और विशिष्ट उपन्यास ‘ग़बन’ लिखा गया है। वास्तव में देखा जाए तो ‘ग़बन’ प्रेमचंद का मध्य-वर्ग की समस्याओं का उद्घाटन करने वाला सर्वश्रेष्ठ उपन्यास है। इस उपन्यास में चरित्र-चित्रण को भी पर्याप्त स्थान दिया गया है। ‘ग़बन’ का प्रमुख पात्र रमरकान्त है। रमाकांत के एवं अन्य प्रमुख पात्रों के चरित्रांकन में लेखक विशेष सजग दिखायी देता है। पर, इसमें भी मध्यवर्गीय समाज की समस्याएँ प्रमुख हैं; जिनके कारण ‘ग़बन’ भी समस्यामूलक उपन्यास ठहरता है। रमरकान्त स्वयं मध्यवर्गीय समाज का व्यक्ति है एवं मध्यवर्ग की अनेक चारित्रिक विशेषताएँ उसमें विद्यमान हैं। मध्यवर्गीय सम्मान-भावना के कारण ही रमाकान्त ग़बन करता है और अपने जीवन को संकट में डालता है।

‘ग़बन’ के बाद ‘कर्मभूमि’, ‘गोदान’ और ‘मंगलसूत्र’ लिखे गए । ‘मंगलसूत्र’ प्रेमचन्द का अपूर्ण उपन्यास है। इसमें अभिजातवर्ग की झाँकियों के साथ-साथ संघर्ष-शील मध्यवर्ग का चित्रण मिलता है। सम्भवतः यह उपन्यास भी मध्यवर्ग से सम्बन्ध रखने वाला बनता।

‘कर्मभूमि’ अछूतों की समस्या के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्वाधीनता की समस्या से सम्बन्धित है। इसमें मध्यवर्ग वैशिष्ट्य प्राप्त नहीं कर पाता । अमरकान्त की पत्नी और विधवा सास अर्थिक दृष्टि से मध्यवर्ग की सीमा में नहीं आते अतः उनकी समस्या मध्यवर्गीय न होकर सामान्य हो गई है।

‘गोदान’ किसान-वर्ग का उपन्यास है - ग्रामीण जनता का महाकाव्य है। पूँजीपतियों और मिल-मालिकों का समावेश अभिजात-वर्ग के क्षयी स्वरूप को व्यक्त करने के निमित्त है। यह बात दूसरी है कि उसमें एक-दो पात्र मध्यवर्ग से सम्बन्ध रखते हों। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रेमचन्द के उपन्यासों में मध्यवर्ग का विशेष महत्त्व है।

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संदर्भ-संकेत

1 ''All old values and beliefs were being challenged. Social economic and political institutions were breaking up at a terrifying pace. India was literally in the melting pot. The old social stratification was disturbed. New types emerged which have no parallel in any previous period.'' - Chap. Modern Ferment, p. 116-117.

2 ''The old traditional pattern of social, economic and political life was disturbed and at times destroyed. Nor was there any attempt to build up a new and integrated outlook which could combine the heritage of the past with new ingredients brought from the west. Nature cannot, permit a vacuum. Haphazard and fragmentary belief and habits took the place of the old way of life. The old was destroyed beyond recall but the new remains still unborn.'' — The same, p. 119.

3 ''Administration was long conducted with a view to commercial advantage. For full exploitation of the country's resources, Britain needed a group of middle men who could act as interpreters between her and the Indian people. The needs of administration also posed the same problem. Higher policy could be determined by the British themselves, but its application to the daily routine of administration required the services of indigenous men. The result was the creation of a large ministerial class who helped the British in administration and commerce. The primary qualiication for such subordinates was proficiency in the English language. Education was therefore remodelled to suit the needs of the rulers. Instead of development of human personality, the chief aim of education became the attainment of linguistic proficiency in English.'' — The Indian Heritage, p. 123-124.

4 ''The new literate classes largely derive their ideas from the West.They also have in one way or another derived their living from the British connection .... Literacy in English has continually expanded in the course of the last century and led to an inordinate expansion of the middle classes.'' — The Indian Heritage, p. 125-126.

5 '' For one thing, the middle classes can never be a homogeneous group. No social class is fully homogeneous. But stratification is even more marked in the case of the middle classes. At one extreme are those who just escape being proletariats. At the other are those who are hardly distinguishable from capitalists.'' — The same. p. 141.

6 ''The middle classes have everywhere started to realise that they have no future. In India their plight is still more pitiable. The growth of capitalism has in other countries secured them a place in the social economy. In India, the expansion of indigenous capitalism was resisted by the British through political and economic pressure. And yet, the relative comforts enjoyed by the middle classes continually attract recruits from other strata of society. A middle class has developed which is too numerous for support by the existing economy. Its members refuse to go back to a lower level of economnic competence. And yet their march forward to capitalism is hampered in a thousand ways. Un-employment has increased and so has discontent.'' — The Indian Heritage, p. 137-138.

7 ''The unbalanced growth of the middle classes is perhaps the most significant fact of modern India. Middle classes all over the world are restless, critical and individualistic. From the nature of the case, they are economically unstable. Impelled by the urge to move upward into the ranks of the capitalist, many of them are yet fated to relapse into the ranks of the proletariat. They feel they have to maintain a standard of respectability which is often beyond their means. The constant economic struggle colours their whole outlook of life. The aristocrat is so sure of his own standing that he feels no need to assert it. The proletariat also is apt to accept his lot. The middle class refuse to be content and often agressive, self-assertive and loud. They seek to justify themselves by criticising others.'' — The Indian Heritage, p. 141.

8 ''....there is cosiderable evidence that group marked by middle class sentiment, with their competitive attitudes and their refusal to become indentified with either the 'ruling class' or the exploited industrial workers, have grown in size during the period of expanding capitalism and have often played a crucial role in the important social changes of that era.'' — 'Society' by R. M. Maciver and C.H. Page, Chap. — 'Social Class and Caste', p. 364.

9 प्रेमचंद : एक विवेचना, पृ. 41-42

10 वही, पृ. 47

11 वही, पृ. 49

प्रेमचन्द की साहित्य-सम्बन्धी मान्यताएँ

प्रेमचन्द की साहित्यिक मान्यताओं के सम्बन्ध में काफ़ी लिखा गया है। आलोचकों ने अपनी विचारधारा को दृष्टि में रखते हुए या तो उनकी इन मान्यताअओं को अपने अनुकूल प्रदर्शित किया है अथवा उनका खण्डन किया है। इस दृष्टिकोण से प्रेमचन्द की साहित्यिक मान्यताओं की वास्तविकता छिपी रह गई है।

मनुष्य में वैचारिक परिवर्तन होते हैं। जीवन-अनुभवों से वह अनेक नयी-नयी बातें सीखता है। यह परिवर्तन आकस्मिक नहीं होता। पहले, मनुष्य में अपनी पूर्व-धारणाओं के प्रति किंचित् अविश्वास-भाव जाग्रत् होता है। इस स्थिति में, वह नयी धारणाओं को अपने हृदय में एकदम स्थान नहीं दे पाता; क्योंकि उसे अपनी पूर्व-धारणाओं से, अविश्वास-अनुभूत होते हुए भी, मोह बना रहता है। क्रमशः उसके अविश्वास-भाव की पुष्टि होती है और वह नये विचारों की ओर आकर्षित होता है। एक समय आता है जब कि वह पूरी तरह से बदल चुका होता है। अतः यह वैचारिक परिवर्तन कुछ समय लेता है - कम या अधिक। जिस साहित्यकार में वैचारिक परिवर्तन होता है; उसके साहित्य में उपर्युक्त स्थितियाँ कम या अधिक रूप में विद्यमान रहती हैं। कहीं-कहीं असंगतियाँ भी पाई जाती हैं। अतः उसके साहित्य में हमें उपर्युक्त मनः स्थितियों की वैज्ञानिक खोज करनी चाहिए तभी हम उसकी वास्तविक मान्यताओं को क्रमबद्ध रूप में समझ सकेंगे। प्रेमचन्द के साथ यही बात है।

उनमें एक विशेष बात और देखने में आती है। वह यह कि पारिभाषिक (टेकनिकल) शब्दों का जो अर्थ वे लेते हैं, वह कोई सर्वमान्य नहीं हैं। ऐसे पारिभाषिक शब्दों के अन्तर्गत अनेक शब्द हैं, यथा शृंगार, आनन्द, आदर्श, यथार्थ, कला कला के लिए, सौन्दर्यवृत्ति आदि। प्रेमचन्द ने इन पारिभाषिक शब्दों का क्या अर्थ लिया है, हमें सर्वप्रथम उसके मूल में जाना चाहिए तभी हमारी व्याख्या उनके प्रति उचित न्याय कर सकेगी।

प्रेमचन्द आदर्शवादी हैं अथवा यथार्थवादी अथवा उनके दृष्टिकोण में दोनों का सम्मिश्रण था, इसका निर्णय करने के पूर्व, प्रेमचन्द ने साहित्य और कला को किस अर्थ में अथवा किस रूप में ग्रहण किया है, उसकी व्याख्या करना आवश्यक है।

साहित्य

प्रेमचन्द साहित्य की परिभाषा अपने ढंग से करते हैं। वास्तव में, किसी एक सत्य को लेकर साहित्य की परिभाषा सीमित भी नहीं की जा सकती। विरोधी तत्त्वों को हम अलग-अलग कर सकते हैं, पर पूरक तत्त्वों को प्रधान या अप्रधान की श्रेणी में ही विभाजित किया जा सकता है। प्रेमचन्द प्रगतिशील साहित्यकार थे। वे प्रतिगामी, प्रतिक्रियावादी व अप्रगतिशील तत्त्वों के विरोधी थे। ‘कलावाद’ से उनका साहित्य कोसों दूर है। कलावाद काल्पनिक अधिक तथा श्लील-अश्लील की सीमाओं से मुक्त, नितान्त वैयक्तिक भावनाओं का प्रतीक है। प्रेमचन्द ऐसे साहित्य के समर्थक नहीं थे। वे साहित्य का वास्तविक जीवन से अविच्छिन्न सम्बन्ध मानते हैं। जीवन साहित्य का आधार है, उससे कटकर साहित्य अपना महत्त्व खो देता है। वे लिखिते हैं -

“साहित्य का आधार जीवन है। इसी नींव पर साहित्य की दीवार खड़ी होती हैं।”1

अब सहज ही प्रश्न उठता है कि जीवन क्या है और उसका क्या उद्देश्य है? प्रेमचन्द जीवन को सामाजिक सापेक्षता में ही देखते हैं। वे उसमें गति और संघर्ष ही नहीं चाहते प्रत्युत सद्भावों की प्रतिष्ठा भी अनिवार्य मानते हैं। जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण महान है। ऐसे जीवन का उद्देश्य क्या आनन्द हो सकता है ? प्रेमचन्द कहते हैं -

“जीवन का उद्देश्य ही आनन्द है। मनुष्य जीवनपर्यन्त आनन्द की खोज में पड़ा रहता है।”2

यहाँ आनन्द से अभिप्राय मात्र मनोरंजन अथवा भौतिक सुख-सुविधा की प्राप्ति से नहीं है। प्रेमचन्द आनन्द को मानसिक तृप्ति के अर्थ में प्रयुक्त करते हैं और इसी से आनन्द का आधार सुन्दर और सत्य बताते हैं। जैसा कि वे आगे लिखते हैं :

“किसी को वह (आनन्द) रत्न, द्रव्य में मिलता है, किसी को भरे-पूरे परिवार में, किसी को लम्बे-चौड़े भवन में, किसी को ऐश्वर्य में, लेकिन साहित्य का आनन्द इस आनन्द से ऊँचा है, इससे पवित्रा है, उसका आधार सुन्दर और सत्य है। वास्तव में सच्चा आनन्द सुन्दर और सत्य से मिलता है, उसी आनन्द को दर्साना, वही आनन्द उत्पन्न करना साहित्य का उद्देश्य है।”3

इसीलिए साहित्य की परिभाषा जीवन, आनन्द, सत्य और सुन्दर के मेल से बनती है। जो कुछ सत्य और सुन्दर है, वही साहित्य है। आनन्द के साथ सत्य का घनिष्ठ सम्बन्ध है -

“जहाँ मनुष्य अपने मौलिक, यथार्थ, अकृत्रिम रूप में है, वहीं आनन्द है। आनन्द कृत्रिमता और आडम्बर से कोसों दूर भागता है।”4

प्रेमचन्द साहित्य को सत्य और सुन्दर का आराधक मानते हैं और उसी की अभिव्यक्ति को साहित्य की संज्ञा देते हैं -

“मनुष्य ने जगत् में जो कुछ सत्य और सुन्दर पाया है और पा रहा है, उसी को साहित्य कहते हैं।”5

लेकिन सत्य की खोज केवल साहित्यकार ही नहीं करता, दार्शनिक और वैज्ञानिक भी करते हैं। प्रेमचन्द सत्य से आत्मा का तीन प्रकार का सम्बन्ध बताते हुए लिखते हैं कि जहाँ सत्य आनन्द का स्त्रोत बन जाए वही वह साहित्य की सीमा में आ जाता है, यथा -

“सत्य से आत्मा का सम्बन्ध तीन प्रकार का है। एक जिज्ञासा का सम्बन्ध है, दूसरा प्रयोजन का सम्बन्ध है और तीसरा आनन्द का। जिज्ञासा का सम्बन्ध दर्शन का विषय है। प्रयोजन का सम्बन्ध विज्ञान का विषय है और साहित्य का विषय केवल आनन्द का सम्बन्ध है। सत्य जहाँ आनन्द का स्रोत बन जाता है, वहीं वह साहित्य हो जाता है।”6

अतः साहित्य जीवन-आनन्द के लिए सत्य की खोज और सुन्दर की प्रतिष्ठा करता है। साहित्यकार जीवन की अवहेलना नहीं कर सकता। जब समाज में जीवन का स्तर गिरने लगता है तब साहित्यकार का यह कर्तव्य हो जाता है कि वह उसकी आलोचना करे। साहित्य जीवन की व्याख्या है, आलोचना है। वह हमें जीवन की महत्ता से परिचित कराता है। प्रेमचन्द कहते हैं :

“साहित्य की बहुत-सी परिभाषाएँ की गई है, पर मेरे विचार से उसकी सर्वोत्तम परिभाषा,‘जीवन की आलोचना’ है। चाहे वह निबन्ध के रूप में हो, चाहे कहानियों के, काव्य के - उसे हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या करनी चाहिए।”7

इतना ही नहीं, वह मानव-जीवन से सम्बन्धित समस्त समस्याओं पर भी विचार करता है, उनको हल करने का प्रयत्न करता है। मात्रा आलोचना जीवन के लिए पर्याप्त नहीं है। इसीलिए प्रेमचंद कहते हैं कि साहित्य का लक्ष्य जीवन का सही रास्ता बताना है, जिससे उसकी पवित्रता एवं महानता बनी रहे -

“साहित्य का उद्देश्य जीवन के आदर्श को उपस्थित करना है, जिसे पढ़कर हम जीवन में क़दम-क़दम पर आने वाली कठिनाइयों का सामना कर सकें। अगर साहित्य से जीवन का सही रास्ता न मिले, तो ऐसे साहित्य से लाभ ही क्या ? जीवन की आलोचना कीजिए, चाहे चित्र खींचिए, आर्ट के लिए लिखिए, चाहे ईश्वर के लिए, मनोरहस्य दिखाइए, चाहे विश्वव्यापी सत्य की तलाश कीजिए, अगर उससे हमें जीवन का अच्छा मार्ग नहीं मिलता तो उस रचना से हमारा कोई फ़ायदा नहीं। साहित्य न चित्रण का नाम है न अच्छे शब्दों को चुनकर सजा देने का, न अलंकारों से वाणी को शोभायमान बना देने का। ऊँचे और पवित्र विचार ही साहित्य की जान हैं।”8

साहित्य की उपर्युक्त परिभाषा से ऐसी ध्वनि निकलती है कि वह ‘नीतिशास्त्र’ का पर्यायवाची है। प्रेमचन्द साहित्य और नीतिशास्त्र का लक्ष्य एक मानते हैं। अन्तर केवल उपदेश की विधि में है। ‘नीतिशास्त्र’ का सम्बन्ध मस्तिष्क की तर्कशक्ति से है, जब कि साहित्य का हृदयगत भावों से -

“नीतिशास्त्र और साहित्यशास्त्र का एक लक्ष्य है; केवल उपदेश की विधि में अन्तर है। नीतिशास्त्र तर्कों और उपदेशों के द्वारा बुद्धि और मन पर प्रभाव डालने का यत्न करता है। साहित्य ने अपने लिए मानसिक अवस्थाओं और भावों का क्षेत्र चुन लिया है।”9

इस प्रकार साहित्य भावों के द्वारा मनुष्य को उसके मौलिक अकृत्रिम यथार्थ रूप में प्रस्तुत करता है।

“मनुष्य स्वभाव से देवतुल्य है। ज़माने के छल-प्रपंच या और परिस्थितियों के वशीभूत होकर वह अपना देवत्व खो बैठता है। साहित्य इसी देवत्व को अपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की चेष्टा करता है, उपदेशों से नहीं, नसीहतों से नहीं ; भावों को स्पन्दित करके, मन के कोमल तारों पर चोट लगाकर, प्रकृति से सामंजस्य उत्पन्न करके।’’10

साहित्य जाति के चरित्र-निर्माण में बहुत बड़ा हिस्सा बँटाता है। साहित्यिक आदर्शों की महत्ता प्रतिपादित करते हुए प्रेमचन्द कहते हैं :

“किसी राष्ट्र की सबसे मूल्यवान सम्पत्ति उसके साहित्यिक आदर्श होते हैं। व्यास और वाल्मीकि ने जिन आदर्शों की सृष्टि की, वह आज भी भारत का सिर ऊँचा किए हुए हैं। राम अगर वाल्मीकि के साँचे में न ढलते, तो राम न रहते। सीता भी उसी साँचे में ढलकर सीता हुई।”11

अतः प्रेमचन्द साहित्य को मानवीय उत्थान का साधन मानते हैं और अपने पूर्व की महान सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते हैं।

कला, सामयिकता और साहित्यकार

कला के सम्बन्ध में प्रेमचन्द के विचारों में कुछ असंगतियाँ भी दिखाई देती हैं; कहीं वे ‘कला के लिए कला’ का स्पष्ट समर्थन करते हैं, तो कहीं सैद्धान्तिक रूप से उसका महत्त्व प्रतिपादित कर मात्र वर्तमान में उसकी उपादेयता स्वीकार करते हैं तो कहीं उसका स्पष्ट खंडन करते हैं।

प्रेमचन्द ‘कलावादी’ नहीं थे, यह उनके समस्त साहित्य से स्पष्ट है। प्रेमचन्द के विरोधियों ने या प्रेमचन्दयुगीन कुछ आलोचकों ने उनके साहित्य पर कलाहीनता का आरोप भी लगाया था। किसी साहित्यकार की कृति को ‘कलावादी’ ठहराना एक अलग बात है तथा उसमें कलाहीनता बताना सर्वथा उससे भिन्न। प्रेमचन्द साहित्य और कला के सम्बन्धों को स्पष्ट करते समय ‘कलावाद’ और ‘कला’ में अन्तर नहीं कर पाए हैं। इसी कारण उनके वक्तव्यों में असंगतियाँ मिलती हैं। वास्तव में वे ‘कलावादी’ नहीं थे; यद्यपि साहित्य में कला का समावेश आवश्यक समझते थे। उस समय के ‘कलावादी’ आलोचकों को इससे संतोष न था। वे प्रेमचन्द के साहित्य में ‘कला के लिए कला’ की अभिव्यक्ति चाहते थे और जब उन्हें यह अभिव्यक्ति नहीं मिली तो उन्होंने निराश होकर प्रेमचन्द के साहित्य पर प्रचारवादी तथा कलाहीन होने के आरोप लगाये।

यदि तनिक गहराई से देखा जाय तो प्रेमचन्द के कला-सम्बन्धी विचारों में असंगतियाँ नहीं हैं, यह समझ में आ सकता है। इस दृष्टि से हमें उन अर्थों पर तटस्थ दृष्टि डालनी होगी जिनको प्रेमचन्द विशिष्ट पारिभाषिक शब्दों के लिए ग्रहण करते हैं।

एक स्थान पर ‘कला के लिए कला’ सिद्धान्त को साहित्य का सबसे ऊँचा आदर्श घोषित करते हुए प्रेमचन्द लिखते हैं :

“साहित्य का सबसे ऊँचा आदर्श यह है कि उसकी रचना केवल कला की पूर्ति के लिए की जाए। ‘कला के लिए कला’ के सिद्धान्त पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती।”12

इससे अधिक स्पष्ट शब्दों में ‘कला के लिए कला’ का समर्थन और क्या हो सकता है ? पर यह भी देखना आवश्यक है कि प्रेमचन्द ‘कला के लिए कला’ का मतलब क्या समझते हैं। आगे चलकर वे ‘कला के लिए कला’ की व्याख्या करते हुए लिखते हैं -

“वह साहित्य चिरायु हो सकता है जो मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों पर अवलम्बित हो। ईर्ष्या और प्रेम, क्रोध और लोभ, भक्ति और विराग, दुःख और लज्जा सभी हमारी मौलिक प्रवृत्तियाँ हैं। इन्हीं की छटा दिखाना साहित्य का परम उद्देश्य है और बिना उद्देश्य के तो कोई रचना हो ही नहीं सकती।”13

अतः स्पष्ट है कि प्रेमचन्द के लिए ‘कला के लिए कला’ का अर्थ कलावादियों का अर्थ नहीं है। वे उसे मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति समझते हैं और इसी कारण सामयिक तथा शाश्वत साहित्य का प्रश्न समाने आता है। वे लिखते हैं :

“......‘कला के लिए कला’ का समय वह होता है जब देश सम्पन्न और सुखी हो। हम जब देखते हैं कि हम भाँति-भाँति के राजनीतिक और सामाजिक बन्धनों में जकड़े हुए हैं, जिधर निगाह उठती है, दुःख और दरिद्रता के भीषण दृश्य दिखाई देते हैं, विपत्ति का करुण क्रन्दन सुनाई देता है, तो कैसे सम्भव है कि किसी विचारशील प्राणी का हृदय न दहल उठे।”14

यहाँ सिद्धान्त रूप में ‘कला के लिए कला’ का महत्त्व स्वीकार करते हुए भी वे वर्तमान सामयिक समस्याओं के सम्मुख, उसके ग्रहण की उपादेयता अस्वीकार करते हैं। सामयिक समस्याओं को मौलिक प्रवृत्तियों के सम्मुख प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्हांने कलावादियों की समसामयिक की उपेक्षा का समर्थन नहीं किया। वे ‘कला के लिए कला’ की झोंक में आकर लोक-हित की चिन्ता करने की बात नहीं कहते । कलावादियों के ‘सौन्दर्य’ में श्लील-अश्लील में कोई अन्तर नहीं किया जाता। प्रेमचन्द ने इस सौन्दर्य-भावना को कहीं भी अच्छा नहीं बताया। अतः बिना ‘कला के लिए कला’ के प्रति प्रेमचन्द का निजी दृष्टिकोण समझे एवं बिना उनके भावों की गहराई में उतरे उनके विचारों में असंगतियाँ बताना अनुचित है।

समसामयिक साहित्य और शाश्वत साहित्य के बारे में लिखते हुए प्रेमचन्द कहते हैं कि सच्चा साहित्य कभी पुराना नहीं होता। मनुष्य की मौलिक प्रवृत्तियाँ सामयिक साहित्य में कभी भी लुप्त नहीं होतीं। और जब-तक वे मौलिक प्रवृत्तियाँ उसमें विद्यमान हैं वह मिट नहीं सकता। चाहे उसका विषय कोई सामयिक समस्या हो और चाहे कोई शाश्वत सत्य। प्रेमचन्द एक उदाहरण देते हुए कहते हैं -

“........टाम काका की कुटिया’ गुलामी की प्रथा से व्यथित हृदय की रचना है, पर आज उस प्रथा के उठ जाने पर भी उसमें वह व्यापकता है कि हम लोग भी उसे पढ़कर मुग्ध हो जाते हैं। सच्चा साहित्य कभी पुराना नहीं होता। वह सदा नया बना रहता है। दर्शन और विज्ञान समय की गति के अनुसार बदलते रहते हैं। पर साहित्य तो हृदय की वस्तु है और मानव-हृदय में तबदीलियाँ नहीं होतीं। हर्ष और विस्मय, क्रोध और द्वेष, आशा और भय आज भी हमारे मन पर उसी तरह अधिकृत हैं।”15

अतः वे कलावादियों की तरह लेखक को देश-काल के बन्धन से मुक्त नहीं करते ; जब तक वह देश-काल का नहीं बनता, तब-तक सर्वदेशीय और सर्वकालिक भी नहीं बन सकता। प्रेमचंद लिखते हैं :

‘‘साहित्यकार बहुधा अपने देश-काल से प्रभावित होता है। जब कोई लहर देश में उठती हैं, तो साहित्यकार के लिए उससे अविचलित रहना असंभव हो जाता है। उसकी विशाल आत्मा अपने देश-बन्धुओं के कष्टों से विकल हो उठती है और तीव्र विकलता में वह रो उठता है, पर उसके रुदन में भी व्यापकता होती है। वह स्वदेश का होकर भी सार्वभौमिक रहता है।”16

साहित्य मानवीय इतिहास का सच्चा लेखा-जोखा है। युग का प्रतिबिम्ब है-

“जीवन पर साहित्य से अधिक प्रकाश और कौन वस्तु डाल सकती है क्योंकि साहित्य अपने देश-काल का प्रतिबिम्ब होता है।”17

लेकिन प्रेमचन्द ने सामयिकता का मात्र ऊपरी स्पर्श नहीं किया था। जैसा डा॰ रामविलास शर्मा लिखते है :

“उनका उद्देश्य सामयिकता व देश-काल की विशेषता से परे नहीं था, उनका साहित्य सामयिकता की सतह को छूने वाला साहित्य नहीं था, उसमें गहराई से डूबने वाला, देश-काल की विशेषताओं के परस्पर संबंध को चित्रित करने वाला साहित्य था। इसलिए वह इतना सशक्त और प्रभावशाली है।”18

कला, उपयोगिता और आनन्द के संबंध भी पर्याप्त विवादग्रस्त हैं। यहाँ भी ‘आनन्द’ शब्द अपनी विशिष्टता का परिचायक है। प्रारम्भ में यह बताया जा चुका है कि प्रेमचन्द आनन्द का आधार सुन्दर और सत्य मानते हैं। वह मनुष्य को मानसिक तृप्ति प्रदान करता है। उसे मनोरंजन या मनबहलाव के अर्थ में ग्रहण करने पर हम प्रेमचन्द-साहित्य की वास्तविकता से दूर चले जाएंगे। कला और उपयोगिता के संबंध में प्रेमचन्द लिखते हैं :

“मुझे यह कहने में हिचक नहीं कि मैं और चीज़ों की तरह कला को भी उपयोगिता की तुला पर तोलता हूँ। निस्संदेह कला का उद्देश्य सौंदर्य की पुष्टि करना है और वह हमारे आध्यात्मिक आनन्द की कुंजी है, पर ऐसा कोई रुचिगत मानसिक तथा आध्यत्मिक आनन्द नहीं, जो अपनी उपयोगिता का पहलू न रखता हो।”19

यहाँ भी आनन्द को प्रमुखता दी गई है। कला की उपयोगिता आनन्द के निमित्त भी है। जो साहित्यकार कला को उपयोगिता के दृष्टिकोण से ग्रहण करता है वही युगधर्म को निबाहता है। ऐसा करने से वह मानव-जाति को जीवन-आनन्द की ओर ले जाता है। आनन्द तक पहुँचना ही मनुष्य जाति का लक्ष्य है। जो लोग कला को उपयोगिता के लिए ग्रहण न करके ‘कला के लिए ही’ ग्रहण करते हैं, उनके संबंध में प्रेमचन्द कहते हैं :

“कला नाम था और अब भी है, संकुचित रूप पूजा का, शब्द-योजना का, भाव-निबन्धन का। उसके लिए कोई आदर्श नहीं है, जीवन का कोई ऊँचा उद्देश्य नहीं है; भक्ति, अध्यात्म और दुनिया से किनाराकशी उसकी सबसे ऊँची कल्पनाएँ हैं। हमारे उस कलाकार के विचार से जीवन का चरम लक्ष्य यही है। उसकी दृष्टि अभी इतनी व्यापक नहीं कि जीवन-संग्राम में सौंदर्य का परमोत्कर्ष देखे। उपवास और नग्नता में सौंदर्य का अस्तित्व सम्भव है, इसे कदाचित् वह स्वीकार नहीं करता। उसके लिए सौंदर्य सुन्दर स्त्री में है, उस बच्चों वाली ग़रीब रूपरहित स्त्री में नहीं, जो बच्चे को खेत की मेड़ पर सुला पसीना बहा रही है, उसने निश्चय कर लिया है कि रँगे होंठों, कपोलों और भोंहों में निस्संदेह सुन्दरता का वास है, उसके उलझे हुए बालों, पपड़ियाँ पड़े हुए होठों और कुम्हलाए हुए गालों में सौंदर्य का प्रवेश कहाँ ? पर यह संकीर्ण दृष्टि का दोष है।”20

यहाँ उनकी कला समस्त कलावादियों व सौंदर्यवादियों से पृथक दिख रही है। प्रेमचन्द की कला हमें यही व्यापक दृष्टि प्रदान करती है। अतः प्रेमचन्द का साहित्य कलापूर्ण है। वह, जैसा कि कुछ आलोचकों ने बताया है, कलाहीन कदापि नहीं। ‘कला कला के लिए’ के समर्थकों को उनके साहित्य में, यह सच है, जैसी कला वे चाहते हैं, उसके दर्शन नहीं होते। अतः वे अपनी संकीर्ण दृष्टि से देखने के कारण उनके साहित्य को ही कलाहीन घोषित कर देते हैं। प्रेमचन्द ने स्पष्ट लिखा :

“कला केवल यथार्थ की नक़ल का नाम नहीं है।”21

कला की आवश्यकता पर उन्होंने पूरा-पूरा ज़ोर दिया है, क्योंकि बिना कला के लेखक अपनी बात प्रभावशाली ढंग से नहीं कह सकता और इस प्रकार वह अपने उद्देश्य में भी सफल नहीं हो सकता। सामाजिक उत्तरदायित्व निबाहने वाले लेखक कला की उपयोगिता को दृष्टि से ओझल नहीं कर सकते। कला क्रांति-भावना को तीव्रता प्रदान करती है। क्रांति से समाज-व्यवस्था में परिवर्तन आता है और यह परिवर्तन मानव-जीवन को आनन्द की ओर ले जाता है ; सत्य और सुन्दर की ओर ले आता है। साहित्यकार इसी क्रांति का साधक व उपासक है। इसी क्रांति को लाने के लिए वह कला के माध्यम से अपने विचारों का प्रसार करता है। कलायुक्त साहित्य प्रचार का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। प्रेमचन्द लिखते हैं :

“मेरा पक्का मत है कि परोक्ष या अपरोक्ष रूप से सभी कलाएँ उपयोगिता के सामने घुटने टेकती हैं, प्रोपेगंडा बदनाम शब्द है; लेकिन आज का विचारोत्पादक, बलदायक, स्वास्थ्यवर्द्धक साहित्य प्रोपगंडा के सिवा न कुछ है, न हो सकता है, न होना चाहिए और इस तरह प्रोपेगंडा के लिए साहित्य से प्रभावशाली कोई साधन ब्रह्मा ने नहीं रचा।”22

एक स्थल पर वे प्रचार की आवश्यकता बताते हुए लिखते हैं :

“जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिए की जाती है, तो वह अपने ऊँचे पद से गिर जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं। लेकिन आजकल परिस्थितियाँ इतनी तीव्रगति से बदल रही हैं, इतने नये-नये विचार पैदा हो रहे हैं कि कदाचित् अब कोई लेखक साहित्य के आदर्श को ध्यान में रख नहीं सकता। यह बहुत मुश्किल है कि लेखक पर इन परिस्थितियों का असर न पडे़।”23

अवश्य, वह प्रचारत्मक साहित्य अपने ऊँचे पद से गिर जाता है जो कला की उपेक्षा करके चलता है। साहित्य के द्वारा कलात्मक प्रचार भी सत्य और सुन्दर की प्रतिष्ठा के लिए है। आनन्द के लिए है। आनन्द और मनोरंजन शब्द पर्यायवाची नहीं हैं। प्रेमचन्द मनोरंजनको साहित्य का निकृष्ट उद्देश्य मानते हैं:

“साहित्य केवल मनबहलाव की चीज़ नहीं है, मनोरंजन के सिवा उसका और भी कुछ उद्देश्य है।”24

साहित्यकार के लक्ष्य के सम्बन्ध में लिखते समय वे कहते हैं :

“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं, उसका दरज़ा इतना न गिराइए।”25

मनोरंजन को एकमात्र उद्देश्य मानकर जो रचना की जाएगी वह तत्त्वहीन होगी। कहानी कला के संबंध में लिखते समय प्रेमचंद ने मनोरंजन की निकृष्टता के बारे में फिर लिखा है :

‘‘तत्त्वहीन कहानी से चाहे मनोरंजन भले ही हो जाए, मानसिक तृप्ति नहीं होती। यह सच है कि हम कहानियों में उपदेश नहीं चाहते, लेकिन विचारों का उत्तेजित करने के लिए, मन के सुन्दर भावों को जाग्रत करने के लिए, कुछ न कुछ अवश्य चाहते हैं।”26

आगे चलकर पठकों का मन बहलाने वाले साहित्यकारों की तुलना वे भाटों, मदारियों, विदूषकों और मसख़रों से करते हैं :

“साहित्यकार का काम केवल पाठकों का मन बहलाना नहीं है। यह तो भाटों और मदारियों, विदूषकों और मसख़रों का काम है। साहित्यकार का पद इससे कहीं ऊँचा है। वह हमारा पथ-प्रदर्शक होता है, वह हमारे मनुष्यत्व को जगाता है, हममें सद्भावों का संचार करता है, हमारी दृष्टि को फैलाता है। कम-से-कम उसका यही उद्देश्य होना चाहिए।”27

अतः प्रेमचन्द का साहित्य सत्य और सुन्दर की प्रतिष्ठा करने वाला, हमें मानसिक तृप्ति प्रदान करने वाला, संघर्ष के लिए प्रेरित करने वाला सत्-साहित्य है। वह ‘दिमाग़ी ऐयाशी’ का साहित्य नहीं है। जीवन में शृंगारिक मनोभावों की सत्ता अवश्य है; पर वे हमारे जीवन के अंग-मात्र हैं। साहित्यकार को अपनी दृष्टि शृंगारिक मनोभावों तक ही सिमित नहीं कर लेनी चाहिए -

“क्या वह साहित्य, जिसका विषय शृंगारिक मनोभावों और उनसे उत्पन्न होने वाली विरह-व्यथा, निराशा आदि तक ही सीमित हो, जिसमें दुनिया और दुनिया की कठिनाइयों से दूर भागना ही जीवन की सार्थकता समझी गई हो, हमारी विचार और भाव संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है ? शृंगारिक मनोभाव मानव-जीवन का एक अंग मात्र हैं, और जिस साहित्य का अधिकांश इसी से संबंध रखता हो, वह उस जाति और वर्ग के लिए गर्व करने की वस्तु नहीं हो सकता और न उसकी सुरुचि का ही प्रमाण हो सकता है।”28

कुछ साहित्यकार यथार्थवाद के नाम पर यौन-संबंधों का नग्न चित्रण करते हैं अथवा श्लील-अश्लील के बन्धन से मुक्त हो साहित्य में अति शृंगार का प्रचार करते हैं। प्रेमचन्द ऐसे कामोत्तेजक साहित्य के सख़्त विरोधी थे। उन्होंने इस नंगी संस्कृति का सदैव लिखकर तथा प्लेटफार्मों से विरोध किया। समाज की नैतिक गिरावट के लिए बहुत कुछ साहित्य उत्तरदायी होता है। प्रेमचन्द अश्लीलता को सहन नहीं कर सकते थे, चाहे वह कलावादियों की ओर से प्रकट हो और चाहे यथार्थवादियों की। ‘भारतीय साहित्य परिषद्’ नामक टिप्पणी में परिषद् के उद्देश्यों की व्याख्या करते हुए वे कहते हैं :

‘‘एक दल साहित्यकारों का ऐसा भी है जो साहित्य को श्लील-अश्लील के बंधन से मुक्त समझता है। वह कालिदास और वाल्मीकि की रचनाओं से अश्लील शृंगार की नज़ीर देकर अश्लीलता की सफ़ाई देता है। अगर कालिदास या वाल्मीकि या औैर किसी नए या पुराने साहित्यकार ने अश्लील शृंगार रचा है तो उसने सुरुचि और सौंदर्य की भावना की हत्या की है। जो रचना हमें कुरुचि की ओर ले जाए, कामुकता को प्रोत्साहन दे, समाज में गंदगी फैलाए, वह त्याज्य है, चाहे किसी की भी हो। साहित्य का काम समाज और व्यक्ति को ऊँचा उठाना है। उसे नीचे गिराना नहीं।”29

रति-वर्णन या नग्न-विलास को साहित्य का ऊँचा आदर्श कौन लोग समझते हैं, इस संबंध में प्रेमचन्द आगे लिखते हैं :

“जो आँख केवल नग्न चित्र ही में सांदर्य देखती है, और जो रुचि केवल रति-वर्णन या नग्न-विलास में ही कवित्व का सबसे ऊँचा विकास देखती है, उसके स्वस्थ होने में हमें संदेह है। यह ‘सुन्दर’ का आशय न समझने की बरकत है। जो लोग दुनिया को अपनी मुट्ठी में बंद किए हुए हैं, उन्हें दिमाग़ी ऐयाशी का अधिकार हो सकता है। पर जहाँ फाका औैर नग्नता है और पराधीनता है, वहाँ का साहित्य अगर नंगी कामुकता और निर्लज्ज रति-वर्णन पर मुग्ध है तो उसका यही आशय है कि अभी उसका प्रायश्चित्त पूरा नहीं हुआ और शायद दो-चार सदियों तक उसे गुलामी में ज़िन्दगी और बसर करनी पडे़गी।”30

अतः स्पष्ट है कि प्रेमचन्द उस शृंगार के विरोधी थे जो हमें कुरुचि की ओर ले जाता है, जो समाज के नैतिक स्तर को गिराता है। शृंगार और प्रेम का हमारे जीवन में अस्तित्व है, लेकिन साहित्यकार को समय देखकर चलना चाहिए। ‘रंगभूमि’ में सोफी के मुख से प्रेमचन्द यही बात कहलाते हैं। सोफी प्रभुसेवक की कविता पर टिप्पणी देती है :

“तुम्हारी कविता उच्च कोटि की है। मैं इसे सर्वांग सुन्दर कहने को तैयार हूँ। लेकिन तुम्हारा कर्तव्य है कि अपनी इस अलौकिक शक्ति को स्वदेश के हित में लगाओ। अवनति की दशा में शृंगार और प्रेम का राग अलापने की ज़रूरत नहीं होती, इसे तुम स्वीकार करोगे।”31

साहित्य के संबंध में प्रेमचन्द की क्या मान्यता थी, वे उसके लिए कौन-कौन से अनिवार्य तत्त्व मानते थे उन पर भी दृष्टि डाल लेनी आवश्यक है। मनोरंजन और विलासित को ही साहित्य समझने वालों से प्रेमचन्द कहते हैं -

“हम साहित्य को केवल मनोरंजन और विलासिता की वस्तु नहीं समझते। हमारी कसौटी पर वही साहित्य खरा उतरेगा जिसमें उच्च चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो, जीवन की सचाइयों का प्रकाश हो, जो हममें गति, संघर्ष और बेचैनी पैदा करे, सुलाये नहीं।”32

साहित्य युग का प्रतिबिम्ब होता है। जाति की गतिहीनता, उसका ह्रास ऐसे साहित्य से मालूम पड़ता है जिसमें प्रेम-वासना और वैराग्य-भावनाओं की प्रधानता हो :

“पतन के काल में लोग या तो आशिकी करते हैं, या अध्यात्म और वैराग्य में मन रमाते हैं। जब साहित्य पर संसार की नश्वरता का रंग चढ़ा हो और उसका एक-एक शब्द नैराश्य में डूबा हो, समय की प्रतिकूलता के रोने से भरा हो और शृंगारिक भावों का प्रतिबिम्ब बना हो, तो समझ लीजिए की जाति जड़ता और ह्रास के पंजे में फँस चुकी है और उसमें उद्योग तथा संघर्ष का बल बाक़ी नहीं रहा। उसने ऊँचे लक्ष्यों की ओर से आँखें बन्द कर ली हैं और उसमें दुनिया का देखने और समझने की शक्ति लुप्त हो गई है।”33

एक स्थल पर प्रेमचन्द शृंगार-रस के बारे में लिखते हैं :

“साहित्य मे केवल एक रस है और वह शृंगार है।”34

उनके इस वाक्य से ऐसा लगता है कि वे शृंगार-रस को ही साहित्य का एकमात्र उद्देश्य मान रहे हैं। यह वाक्य उनकी मान्यताओं में फिर असंगति उत्पन्न करता है। लेकिन वास्तव में असंगति कोई नहीं है। यहाँ शृंगार का अर्थ उन्होंने सौन्दर्य से लिया है। जैसा वे आगे लिखते हैं :

“कोई रस साहित्यिक दृष्टि से रस नहीं रहता और न उस रचना की गणना साहित्य में की जा सकती है जो शृंगार-विहीन और असुन्दर हो। जो रचना केवल वासना-प्रधान हो, जिसका उद्देश्य कुत्सित भावों को जगाना हो, जो केवल बाह्य जगत् से सम्बन्ध रखे, वह साहित्य नहीं है।”35

प्रेमचन्द ने सौन्दर्य-प्रेम पर बहुत ज़ोर दिया है, लेकिन यह सौन्दर्य-भावना शारीरिक नहीं है। उसका स्वरूप मानसिक है जो हमारे हृदय का संस्कार करता है। सौन्दर्य को देखकर हम मुग्ध होते हैं, उत्तेजित नहीं। प्रेमचन्द लिखते हैं :

“कलाकार हममें सौन्दर्य की अनुभूति उत्पन्न करता है और प्रेम की उष्णता।”36

“जिस साहित्य से हमारी सुरुचि न जागे, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति न मिले, हममें शक्ति और गति न पैदा हो, हमारा सौन्दर्य-प्रेम न जाग्रत् हो, जो हममें सच्चा संकल्प और कठिनाइयों पर विजय पाने की सच्ची दृढ़ता न उत्पन्न करे, वह आज हमारे लिए बेकार है, वह साहित्य कहलाने का अधिकारी नहीं।”37

साम्प्रदायिक सद्भावना को साहित्य का लक्ष्य बताते हुए उन्होंने लिखा है :

“जो साहित्य जीवन के उच्च आदर्शों का विरोधी हो, सुरुचि को बिगाड़ता हो अथवा साम्प्रदायिक सद्भावना में बाधा डालता हो, ऐसे साहित्य को यह परिषद् हरगिज़ प्रोत्साहित न करेगी।”38

अतः साहित्यकार को उच्च भावों की अभिव्यक्ति करनी चाहिए -

“साहित्य कलाकार के आध्यात्मिक सामंजस्य का व्यक्त रूप है और सामंजस्य सौन्दर्य की सृष्टि करता है, नाश नहीं। वह हममें वफ़ादारी, सच्चाई, सहानुभूति, न्यायप्रियता और ममता के भावों की पुष्टि करता है। जहाँ ये भाव हैं, वहीं दृढ़ता है और जीवन है; जहाँ इनका अभाव है, वहीं फूट, विरोध, स्वार्थपरता है, द्वेष, शत्रुता और मृत्यु है।”39

साहित्य के विचारगत और कलागत तत्त्वों को प्रेमचन्द एक साथ लिखते हैं -

“साहित्य उसी रचना को कहेंगे जिसमें कोई सचाई प्रकट की गई हो, जिसकी भाषा प्रौढ़, परिमार्जित एंव सुन्दर हो और जिसमें दिल और दिमाग पर असर डालने का गुण हो। और साहित्य के यह गुण पूर्ण रूप से उसी अवस्था में उत्पन्न होते हैं, जब उसमें जीवन की सचाइयाँ और अनुभूतियाँ व्यक्त की गई हों।”40

उपर्युक्त साहित्य के निर्माता का स्थान भी ऊँचा होना चाहिए। यदि साहित्यकार ऊँचे दर्ज़े का मनुष्य नहीं है तो वह सत्-साहित्य का सृजन नहीं कर सकता। इसीलिए हमें पहले मनुष्य बनने की साधना करनी चाहिए, फिर साहित्यकार बनने की। प्रेमचन्द के मत से साहित्यकार को सत्यभाषी होना चाहिए। वह हमारा पथ-प्रदर्शक होता है, मनुष्यत्व को जगाता है, सद्भावों का संचार करता है तथा हमारी दृष्टि को व्यापक बनाता है साहित्य के लक्ष्य को बताते हुए प्रेमचन्द लिखते हैं :

“साहित्यकार का लक्ष्य केवल महफ़िल सजाना और मनोरंजन का सामान जुटाना नहीं है, उसका दर्ज़ा इतना न गिराइये। वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सच्चाई भी नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखती हुई चलने वाली सचाई है।”41

साहित्यकार का क्या कर्तव्य हे ? प्रेमचन्द कहते हैं :

“जो दलित है, पीड़ित है, वंचित है, चाहे वह व्यक्ति हो या समूह, उसकी हिमायत और वक़ालत करना उसका फ़र्ज है। उसकी अदालत समाज है, इसी अदालत के सामने वह अपना इस्तगासा पेश करता है, और उसकी न्यायवृत्ति तथा सौन्दर्यवृत्ति को जाग्रत करके अपना यत्न सफल समझता है।”42

लकिन मात्र वक़ालत से काम नहीं चलता। साहित्यकार उपेक्षितों, तिरस्कृतों का पक्ष लेता अवश्य है, लेकिन सत्य का आँचल नहीं छोड़ता है। वह एक सत्यवादी वकील है।

“पर साधारण वकीलों की तरह साहित्यकार अपने मुवक्किल की आरे से उचित-अनुचित सब तरह के दावे नहीं पेश करता, अतिरंजना से काम नहीं लेता, अपनी ओर से बातें नहीं गढ़ता। वह जानता है कि इन युक्तियों से वह समाज की अदालत पर असर नहीं डाल सकता। उस अदालत का हृदय-परिवर्तन तभी सम्भव है, जब आप सत्य से तनिक भी विमुख न हों, नहीं तो अदालत की धारणा आपकी ओर से ख़राब हो जाएगी और वह आपके खिलाफ़ फैसला सुना देगी।”43

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संदर्भ-संकेत

1 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 73

2 वही

3 वही

4 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 74

5 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 26

6 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 74

7 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 6

8 ‘हंस’, जनवरी, 1935

9 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 8

10 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 79

11 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 80

12 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 41

13 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 42

14 वही

15 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 77

16 वही

17 वही

18 प्रेमचंद और उनका युग, पृ. 152

19 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 14

20 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 15-16

21 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 27

22 ‘प्रेमचंद’, रामविलास शर्मा, पृ. 13

23 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 42

24 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 8

25 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 17

26 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 30

27 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 49

28 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 7

29 ‘हंस’, मई 1936

30 वही

31 रंगभूमि (भाग-1), पृ. 155

32 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 21

33 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 7-8

34 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 74

35 वही

36 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 11

37 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 8

38 ‘हंस’, मई 1936

39 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 11

40 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 6

41 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 17

42 प्रेमचंद : कुछ विचार, पृ. 9

43 वही

आदर्शोन्मुख यथार्थवाद

‘साहित्यकार एक सत्यवादी वकील है।’ - प्रेमचंद। इस सत्यवादिता के साथ ही साहित्य में आदर्शवाद और यथार्थवाद का प्रश्न उपस्थित हो जाता है। सत्यवादी आदर्श और यथार्थ दोनों पर अपनी समान दृष्टि रखता है। प्रेमचन्द का यही सिद्धान्त था, जिसे उन्होंने ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ कहा है। या यों कहा जाय कि वे यथार्थवादी आदर्शवाद के समर्थक थे। साहित्य में आदर्शवाद और यथार्थवाद के प्रचलित अर्थों से उनका क्या सम्बन्ध था, यह उनके लेखों और उपन्यासों के अन्तर्गत देखा जा सकता है।

प्रेमचन्द ने अनेक पहलुओं से यथार्थवाद और आदर्शवाद को देखा है,यथा -

1. उपयोगी यथार्थवाद

2. यथार्थवाद

3. अति-यथार्थवाद

4. आदर्शवाद

5. अस्वाभविक आदर्शवाद

उपयोगी यथार्थवाद से अभिप्राय है समाज और व्यक्ति का ऐसा यथार्थ चित्रण जो मानव को विकास की ओर उन्मुख करे। इसमें ‘असत्’ पक्ष सामाजिक स्वास्थ्य की दृष्टि से चित्रित किया जाता है। ‘सत्’ पक्ष भी यथार्थ के अन्तर्गत है, पर सत् के चित्रण में सामाजिक स्वास्थ्य का प्रश्न उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि वह स्वयं मानव-कल्याण का प्रतीक है। सामाजिक स्वास्थ्य का प्रश्न ‘असत्’ पक्ष के साथ ही लगा हुआ है। समाज या व्यक्ति में जो अभाव हैं, दोष हैं या कुरूपताएँ हैं उनका यथार्थ चित्रण यदि मानव-विकास के दृष्टिकोण से किया जाएगा तो वह उपयोगी यथार्थवाद कहलाएगा। यहाँ सामाजिक स्वास्थ्य की ओर दृष्टि रखना लेखक का प्रथम कर्तव्य माना जाता है।

यथार्थवाद के अन्तर्गत सामाजिक हित-अहित की कोई चिन्ता नहीं रहती। यथार्थवादी अपनी कला को फोटोग्राफ़ी मानता है। जो है, उसका ज्यों-का-त्यों चित्रण कर देना ही उसका धर्म है। वह भौतिक सत्य को ही सब कुछ समझता है। मौलिक सत्य में उसे विश्वास होता अवश्य है, लेकिन वह उसका चित्रण उस समय तक नहीं कर सकता, जब तक वह भौतिक सत्य का रूप धारण न कर ले। यथार्थवाद के अन्तर्गत मनुष्य में पाई जानेवाली समस्त कु-प्रवृत्तियों का चित्रण होता है। वह नग्न और भयानक रूप में हमारे सामने आता हे। यह नग्नता प्रायः शिष्टता की सीमा को भी लाँघ जाती है। यह भयानकता विश्वास-भावना तक को कुचल देती है और मनुष्य को निराशावादी या अविश्वासी बना देती है। यथार्थवाद के अन्तर्गत लेखक का कोई सामाजिक कर्तव्य नहीं होता। समाज उसके यथार्थवादी चित्रण से चौंक अवश्य जायगा, पर वह उसमें सत्वृत्तियों का संचार नहीं कर सकेगा। इसके विपरीत यदि वह सु-प्रवृत्तियों का यथार्थ चित्रण करता है तब सामाजिक स्वास्थ्य का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता; क्योंकि सुप्रवृत्तियाँ स्वयं में मानव-कल्याण की द्योतक हैं। यथार्थवादी लेखक कु-प्रवृत्तियों पर ही अपनी दृष्टि रखते हैं।

अति-यथार्थवाद से अभिप्राय यथार्थ की अतिरंजना से है। उपयोगी यथार्थवाद के अन्तर्गत अल्परंजना रहती है। अल्परंजना सामाजिक सुधार के लिए उपयोगी प्रमाणित होती है; क्योंकि वहाँ लेखक का उद्देश्य न तो ज्यां-का-त्यों चित्रण कर देना है और न अतिरंजना से काम लेकर उसे अस्वाभाविक स्थिति तक ले जाना। अति-यथार्थवाद झूठा होता है। मनुष्य का पतन किस सीमा तक हो सकता है - वह बताता है; चाहे उस सीमा तक मनुष्य पतित न भी हुआ हो। स्पष्ट है, ऐसा चित्रण मनुष्य को पतन की ओर ही ले जाएगा। समाज में अनाचार व व्यभिचार को ही प्रोत्साहित करेगा, क्योंकि उसे मानवी पतन-सीमा की यथार्थता प्रदर्शित-प्रमाणित करनी होती है। अति-यथार्थवाद समाज के लिये प्रत्येक स्थिति में घातक होता है वह मनुष्य के क्षयी व रुग्ण मन का परिचायक है।

यथार्थ के शाब्दिक अर्थ के अनुसार, जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है, उसमें सत् और असत् दोनों पक्षों का समावेश है। जब यथार्थ ‘वाद’ का रूप धारण कर लेता है, तब वह मात्र ‘असत्’ या ‘कु’ के चित्रण का परिचायक हो जाता है। ‘सु’ का क्षेत्र आदर्शवाद ले लेता है। जो लोग ‘सु’ के चित्रण को भी यथार्थवाद के अन्तगर्त सम्मिलित कर लेते हैं; वे ‘यथार्थ’ के शाब्दिक अर्थ और प्रचलित यथार्थवाद के अर्थ में अन्तर नहीं करते।

आदर्शवाद मौलिक सत्य का उद्घाटन करता है। वह मनुष्य को मोलिक रूप में उपस्थित करता है। आज मनुष्य की क्या दशा है, इसकी वह चिन्ता नहीं करता। वह तो इस ओर ध्यान देता है कि मनष्य को कैसा होना चाहिए। उसका वास्तविक रूप क्या है। आदर्शवादी महान् विचारक होता है।

यदि आदर्शवादी लेखक महान् विचारक नहीं है - बौद्धिक नहीं है तो वह या तो अपने आदर्श का स्तर ओछा रखेगा या उसे अस्वाभाविक बना देगा। आदर्शवाद के अन्दर अस्वाभाविक तत्त्व तनिक-सी असावधानी से प्रवेश कर जाता है। इसी कारण आदर्शवादी लेखकों में यह दुर्बलता प्रायः पाई जाती है। अव्यावहारिक आदर्श को अस्वाभाविक आदर्शवाद कह सकते हैं।

कोरा आदर्शवादी सामाजिक स्वास्थ्य की ओर तो ध्यान देता ही है, वह वर्तमान समस्याओं से तटस्थ भी नहीं रहता। वर्तमान की सापेक्षता में ही वह अपना आदर्श सम्मुख रखता है। यदि आदर्शवादी ऐसा नहीं करे तो वह ‘कला के कला’ की श्रेणी में आ जाएगा। वह अलौकिक तथा काल्पनिक लोक में ही विचरण करता रहेगा।

प्रेमचन्द अपने लेखों और उपन्यासों के द्वारा ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ का समर्थन करते हैं। वे आदर्श और यथार्थ का समन्वय करते हैं। उनका दृष्टिकोण उपयोगी यथार्थवाद और आदर्शवाद के समन्वय का है। अस्वाभाविक आदर्शवाद, यथार्थवाद और अति यथार्थवाद का उन्होंने समर्थन नहीं किया। ये विचार लेखों के अतिरिक्त उनके उपन्यासों के प्रमुख पात्रों के मुख से भी व्यक्त किए गए हैं। अति-आदर्शवाद और पात्रों के मुख से लेखक के बोलने के संबंध में वे लिखते हैं :

“कल्पना के गढ़े हुए आदमियों में हमारा विश्वास नहीं है, उनके कार्यों और विचारों से हम प्रभावित नहीं होते। हमें इसका निश्चय हो जाना चाहिए कि लेखक ने जो सृष्टि की है, वह प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर की गई है और अपने पात्रों की ज़बान से खुद बोल रहा है”1

आदर्शवाद का ध्येय बताते हुए प्रेमचन्द लिखते हैं :

“साहित्य और कला में केवल मानव-जीवन की नक़ल को बहुत ऊँचा स्थान नहीं दिया जाता। उसमें आदर्शों की रचना करनी पड़ती है। आदर्शवाद का ध्येय यही है कि वह सुन्दर और पवित्र की रचना करके मनुष्य में जो कोमल और ऊँची भावनाएँ हैं, उन्हें पुष्ट करे और जीवन के संस्कारों से मन और हृदय में जो गर्द और मैल जम रहा हो, उसे साफ़ कर दे। किसी साहित्य की महत्ता की जाँच यही है कि उसमें आदर्श चरित्रों की सृष्टि हो। हम सब निर्बल जीव हैं, छोटे-छोटे प्रलोभनों में पड़कर हम विचलित हो जाते हैं, छोटे-छोटे संकटों के सामने सिर झुका देते हैं। और जब हमें अपने साहित्य में ऐसे चरित्र मिल जाते हैं जो प्रलोभनों को पैरों तले रौंदते और कठिनाइयों को धकियाते हुए निकल जाते हैं तो हमें उनसें प्रेम हो जाता है, हममें साहस का जागरण होता है और हमें अपने जीवन मार्ग मिल जाता है।”2

अतः साहित्य में आदर्शवाद की स्थापना होनी चाहिए, लेकिन प्रेमचन्द सैद्धांतिक रूप से व्यावहारिक आदर्शवाद के समर्थक थे। उनका आदर्श उपयोगिता का शत-प्रतिशत पहलू रखता है। वे लिखते हैं :

“साहित्य का उद्देश्य जीवन के आदर्श को उपस्थित करना है, जिसे पढ़कर हम जीवन में क़दम-क़दम पर आनेवाली कठिनाइयों का सामना कर सकें।”3

वे यथार्थवादियों के दोषों का उल्लेख करते हुए उपयोगी यथार्थवाद से आदर्शवाद का सम्मिश्रण करते हैं :

“यथार्थवादियों का कथन है कि संसार में नेकी-बदी का फल कहीं मिलता नज़र नहीं आता; बल्कि बहुधा बुराई का परिणाम अच्छा और भलाई का बुरा होता है। आदर्शवादी कहता है, यथार्थ का यथार्थ रूप दिखाने से फ़ायदा ही क्या है, यह तो आँखों से देखते ही हैं। कुछ देर के लिए तो हमें इन कुत्सित व्यवहारों से अलग रहना चाहिए, नहीं तो साहित्य का मुख्य उद्देश्य ही ग़ायब हो जाएगा। वह साहित्य को समाज का दर्पण मात्र नहीं मानता, बल्कि दीपक मानता है, जिसका काम प्रकाश फैलाना है। भारत का प्राचीन साहित्य आदर्शवाद ही का समर्थक है। हमें भी मर्यादा का पालन करना चाहिए। हाँ, यथार्थ का उसमें ऐसा सम्मिश्रण होना चाहिए कि सत्य से दूर न जान पड़े।”4

यथार्थ भी उपयोगिता का पहलू रखता है। प्रचलित यथार्थवाद में और प्रेमचन्द के यथार्थवाद में यही अन्तर है। प्रचलित यथार्थवाद के सम्बन्ध में ‘कायाकल्प’ में चक्रधर एक स्थान पर कहता है :

“यथार्थ का रूप अत्यन्त भयंकर होता है और हम यथार्थ ही को आदर्श मान लें, तो संसार नरक के तुल्य हो जाय। हमारी दृष्टि मन की दुर्बलता पर न पड़नी चाहिए, बल्कि दुर्बलताओं में भी सत्य और सुन्दर की खोज करनी चाहिए।”5

प्रेमचन्द यथार्थवाद की एकांगिता के बारे में लिखते हैं :

“यथार्थवाद चरित्रों को पाठक के सामने उनके यथार्थ नग्न रूप में रख देता है। उसे इससे कुछ मतलब नहीं कि सच्चरित्रता का परिणाम बुरा होता है या कुचरित्रता का परिणाम अच्छा। उसके चरित्र अपनी कमज़ोरियाँ या खूबियाँ दिखाते हुए अपनी जीवन लीला समाप्त करते हैं। संसार में सदैव नेकी का फल नेक और बदी का फल बद नहीं होता, बल्कि इसके विपरीत हुआ करता है। नेक आदमी धक्के खाते हैं, यातनाएँ सहते हैं, मुसीबतें झेलते हैं, अपमानित होते हैं - उनको नेकी का फल उलटा मिलता है। बुरे आदमी चैन करते हैं, नामवर होते हैं, यशस्वी बनते हैं - उनको बदी का फल उलटा मिलता है। (प्रकृति का नियम विचित्र है।) यथार्थवादी अनुभव की बेड़ियों में जकड़ा होता है और चूँकि संसार में बुरे चरित्रों की प्रधानता है - यहाँ तक कि उज्ज्वल से उज्ज्वल चरित्र में भी कुछ न कुछ दाग-धब्बे रहते हैं, इसलिए यथार्थवाद हमारी दुर्बलताओं, हमारी विषमताओं, और हमारी क्रूरताओं का नग्न चित्र होता है और इस तरह यथार्थवाद हमको निराशावादी बना देता है, मानव-चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है, हमको अपने चारों तरफ़ बुराई ही नज़र आने लगती है।”6

यह एकांगिता विशुद्ध यथार्थवाद के अन्तर्गत ही है। प्रेमचन्द उपयोगी यथार्थवाद से समझौता ही नहीं करते वरन् उसे आवश्यक भी मानते है; लेकिन वे विशुद्ध या अति-यथार्थवाद के विरोधी हैं -

“इसमें सन्देह नहीं कि समाज की कुप्रथा की ओर उसका ध्यान दिलाने के लिए यथार्थवाद अत्यन्त उपयुक्त है, क्योंकि इसके बिना बहुत सम्भव है, हम उस बुराई को दिखाने में अत्युक्ति से काम लें और चित्र को उससे कहीं ज़्यादा काला दिखाएँ जितना वह वास्तव में है; लेकिन जब वह दुर्बलताओं का चित्रण करने में शिष्टता की सीमाओं से आगे बढ़ जाता है, तो आपत्तिजनक हो जाता है।”7

आगे चलकर विशुद्ध यथार्थवाद की अनुपयोगिता का मनोवैज्ञानिक कारण देते हुए वे लिखते हैं -

“फिर मानव-स्वभाव की विशेषता यह भी है कि वह जिस छल, क्षुद्रता और कपट से घिरा हुआ है, उसी की पुनरावृत्ति उसके चित्त को प्रसन्न नहीं कर सकती। वह थोड़ी देर के लिए ऐसे संसार में उड़कर पहुँच जाना चाहता है, जहाँ उसके चित्त को ऐसे कुत्सित भावों से नजात मिले, वह भूल जाए कि मैं चिन्ताओं के बन्धन में पड़ा हुआ हूँ। जहाँ उसे सज्जन, सहृदय, उदार प्राणियों के दर्शन हाँ, जहाँ छल और कपट, विरोध और वैमनस्य का ऐसा प्राधान्य न हो। उसके दिल में ख़याल होता है कि जब हमें किस्से-कहानियों में भी उन्हीं लोगों से साबक़ा है जिनके साथ आठों पहर व्यवहार करना पड़ता है, तो फिर ऐसी पुस्तक पढ़ें ही क्यों ?”8

जहाँ वे एक ओर विशुद्ध यथार्थवाद की अनुपयोगिता प्रकट करते हैं वहाँ दूसरी ओर आदर्श की स्थापना उपयोगिता की आधार-शिला पर ही करते हैं -

“अँधेरी गर्म कोठरी में काम करते-करते जब हम थक जाते हैं तब इच्छा होती है कि किसी बाग में निकलकर निर्मल-स्वच्छ वायु का आनन्द उठायें। इसी कमी को आदर्शवाद पूरा करता है। वह हमें ऐसे चरित्रों से परिचित कराता है, जिनके हृदय पवित्र होते हैं, जो स्वार्थ-भावना से रहित होते हैं, जो साधु प्रकृति के होते हैं।’’9

यदि किसी को अँधेरी कोठरी में कार्य करने में असन्तोष है और वह अपनी वर्तमान स्थिति में परिवर्तन चाहता है, तो सर्वप्रथम उसे आदर्शवाद रूपी खुली हवा का ज्ञान होना आवश्यक है। तब उसे उस ‘अँधेरी कोठरी’ में पुनः कार्य करने की इच्छा नहीं होगी और वह अपने कार्यक्षेत्र को हवा से पूर्ण बनाने का उत्कट प्रयत्न करेगा।

लेकिन प्रेमचन्द जितने सजग यथार्थ की स्थापना में हैं, उतने ही आदर्श की :

“यथार्थवाद यदि हमारी आँखें खोल देता है, तो आदर्शवाद हमें उठाकर मनोरम स्थान में पहुँचा देता है। लेकिन जहाँ आदर्शवाद में यह सुख है, वहाँ इस बात की भी शंका है कि हम ऐसे चरित्रों को न चित्रित कर बैठें जो सिद्धान्तों की मूर्ति-मात्र हों - जिनमें जीवन न हो। किसी देवता की कामना करना मुश्किल नहीं है, लेकिन उस देवता में प्राण-प्रतिष्ठा करना मुश्किल है।”10

वे अव्यावहारिक आदर्शवाद के समर्थक कभी नहीं रहे। उनमें उपयोगी यथार्थवाद और व्यावहारिक आदर्शवाद का अद्भुत समन्वय है। आगे चलकर वे लिखते हैं :

“इसलिए वही उपन्यास उच्चकोटि के समझे जाते हैं, जहाँ यथार्थ और आदर्श का समावेश हो गया हो। उसे आप ‘आदर्शोंन्मुख यथार्थवाद’ कह सकते हैं। आदर्श को सजीव बनाने के लिए यथार्थ का उपयोग होना चाहिये।”11

इसी प्रकार ‘कर्मभूमि’ में भी अमरकांत और डा॰ शान्तिकुमार के संवादों में आदर्श और यथार्थ के समन्वय की चर्चा आयी है -

“तुम आदर्श की धुन में व्यावहारिकता का बिलकुल विचार नहीं करते। कोरा आदर्शवाद ख़्याली पुलाव है।

अमर ने चकित होकर कहा - मैं तो समझता था, आप भी आदर्शवादी हैं।

शान्तिकुमार ने मानो इस चोट को ढाल पर रोककर कहा - मेरे आदर्शवाद में व्यावहारिकता को भी स्थान है।

इसका अर्थ है कि आप गुड़ खाते है, गुलगुले से परहेज करते हैं।

जब तक मुझे रुपये कहीं से मिलने न लगें, तुम्हीं सोचो, मैं किस आधार पर नौकरी का परित्याग कर दूँ। पाठशाला मैंने खोली है। इसके संचालन का दायित्व मुझ पर है। इसके बन्द हो जाने पर मेरी बदनामी होगी। अगर तुम इसके संचालन का कोई स्थायी प्रबन्ध कर सकते हो, तो मैं आज इस्तीफ़ा दे सकता हूँ; लेकिन बिना किसी आधार के मैं कुछ नहीं कर सकता। मैं इतना पक्का आदर्शवादी नहीं....

मुझे संसार का तुमसे ज़्यादा तजरबा है, मेरा इतना जीवन नये-नये परीक्षणों में ही गुज़रा हे। मैंने जो तत्त्व निकाला है, यह कि हमारा जीवन समझौते पर टिका हुआ है। अभी तुम जो चाहे समझो, पर एक समय आवेगा, जब तुम्हारी आँखें खुलेंगी और तुम्हें मालूम होगा कि जीवन में यथार्थ का महत्त्व आदर्श से जौ भर भी कम नहीं है।”12

‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ का सुलझा हुआ रूप उनके लेखों में द्रव्टव्य है, लेकिन यह स्पष्टता तभी दिखाई देगी जब विशुद्ध यथार्थवाद, उपयोगी यथार्थवाद, आदर्शवाद और अति-आदर्शवाद आदि के सूक्ष्म अंतर को सामने रखा जाए। जो आलोचक इस अन्तर की ओर ध्यान नहीं देते वे या तो उनके विचारों में असंगतियाँ ढूँढ़ते हैं या फिर उन्हें आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओेर आते देखते हैं और ऐसा विश्वास प्रकट करते हैं कि प्रेमचन्द अगर और जीवित रहते तो वे निश्चय ही साहित्य में प्रचलित यथार्थवाद के समर्थक हो जाते। उपर्युक्त वैज्ञानिक विवेचन से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रेमचन्द अपनी साहित्यिक चेतना के प्रारम्भ से अन्त तक आदर्शोन्मुख यथार्थवाद के समर्थक रहे। इस दृष्टि से उनमें कोई सैद्धान्तिक परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होता।

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संदर्भ-संकेत

1 प्रेमचंद, कुछ विचार, पृ. 10

2 ‘हंस’, मार्च, 1935

3 वही, जनवरी, 1935

4 प्रेमचंद, कुछ विचार, पृ. 25

5 ‘कायाकल्प’, पृ. 129

6 प्रेमचंद, कुछ विचार, पृ. 39-40

7 प्रेमचंद, कुछ विचार, पृ. 40

8 वही

9 वही

10 प्रेमचंद, कुछ विचार, पृ. 40-41

11 प्रेमचंद, कुछ विचार, पृ. 41

12 ‘कर्मभूमि’, पृ. 110-111

जीवन-चिन्तन

प्रेमचन्द एक जागरूक कलाकार थे। कल्पना की अपेक्षा सत्य, अन्तर्मुख की अपेक्षा बहिर्मुख, मृत्यु की अपेक्षा जीवन, निराशा की अपेक्षा आशा तथा कुरूपता की अपेक्षा सौन्दर्य के वे सच्चे उपासक थे। उन्होंने यथार्थ का आँचल कभी नहीं छोड़ा। यथार्थ के सुदृढ़ धरातल पर ही उन्होंने अपने आदर्श-लोक का निर्माण किया, जिसे उन्होंने स्वयं ‘आदर्शोन्मुख यथार्थवाद’ का नाम दिया है। जीवन में जो कुछ स्वस्थ, सुन्दर, सत्य एवं कल्याणकारी है, वही उन्हें ग्राह्य है, शेष सर्वथा त्याज्य। उन्होंने अन्धकार को कभी प्रकाश पर छाने नहीं दिया। पशुता और दानवता के समाने मनुष्यता का सिर ऊँचा रखा। धन, अधिकार-मद, शोषण तथा प्रचलित धार्मिक अव्यवस्था के विरोध में उन्होंने अपना जीवन अर्पित कर दिया। वे पीड़ित, पद-दलित व उपेक्षित जनता के लेखक थे। स्वयं मज़दूर थे - क़लम के मज़दूर। उनकी लेखनी फावड़े-कुदाली के समान युग-युग से संस्कारों, विश्वासों, धारणाओं रूपी कड़ी ज़मीन को खोदती चली गई। प्रेमचन्द भारत की महान सांस्कृतिक परम्परा के एक अंग हैं। सादगी व भोलेपन के वे साक्षात् अवतार थे।

प्रेमचन्द का जीवन-दर्शन अद्वितीय था। मानवतावादी लेखक होने के नाते उनका विकसित ‘मनुष्य’ उनके साहित्य से कहीं महान है। ‘रंगभूमि’ में सूरदास का गीत प्रेमचन्द के जीवन-दर्शन का प्रतीक है। इस गीत में उनके जीवन का रहस्य भरा हुआ है :

भई, क्यों रन से मुँह मोड़े ?

वीरों का काम है लड़ना,

कुछ काम जगत में करना

क्यों निज मरजादा छोडे़ ?

भई, क्यों रन से मुँह मोड़े ?

क्यों जीत की तुझको इच्छा,

क्यों हार की तुझको चिन्ता,

क्यों दुख से नाता जोड़े ?

भई, क्यों रन से मुँह मोड़े ?

तू रंगभूमि में आया

दिखलाने अपनी माया,

क्यों धरम नीति को तोड़े ?

भई, क्यों रन से मुँह मोड़े ?1

वे जीवन को एक खेल समझते थे। प्रत्येक प्राणी इस संसार-रूपी मैदान में खिलाड़ी बनकर आता है और अपना-अपना खेल खेलकर चला जाता है। खेल में हार-जीत होती ही है। सूरदास कहता है, “सच्चे खिलाड़ी कभी रोते नहीं, बाज़ी पर बाज़ी हारते हैं, चोट पर चोट खाते हैं, धक्के सहते हैं, पर मैदान में डटे रहते हैं। उनकी त्यौरियों पर बल नहीं पड़ते। हिम्मत उनका साथ नहीं छोड़ती। दिल पर मालिन्य की छींटे भी नहीं आते, किसी से जलते हैं न चिढ़ते हैं। खेल में रोना कैसा ? खेल हँसने के लिए, दिल बहलाने के लिए है, रोने के लिये नहीं।”2

उनके जीवन का यह खेल धर्म व नैतिकता पर आधारित है, ‘क्यों धरम नीति तो तोड़े ?’ उनके जीवन का मूल मंत्र है। वे ‘विजय’ को विजय के साधनों से महान नहीं समझते। जीवन की सफलता मात्रा विजय में निहित नहीं है। संघर्ष की प्रणाली और उसके साधनों का नैतिकता से गहरा संबंध है। चाहे उन साधनों से विजय मिले या न मिले। पराजय, अनैतिक प्रयत्नों की विजय से कहीं श्रेष्ठ है सूरदास कहता है, “हमारी बड़ी भूल यह है कि खेल को खेल की तरह नहीं खेलते। खेल में धाँधली करके कोई जीत ही जाय, तो क्या हाथ आएगा? खेल तो इस तरह चाहिए कि निगाह जीत पर रहे, पर हार से घबराए नहीं, ईमान को न छोड़े। जीतकर इतना न इतराए कि अब हार कभी होगी ही नहीं। यह हार-जीत तो जिन्दगी के साथ है।”3

प्रेमचन्द के साहित्य में जीवन का यही दृष्टिकोण मिलेगा। वे बहुत हँसते थे। उनके पहुँचते ही मुर्दा गोष्ठियों में भी क़हक़हों की धूम मच जाती थी। हास्य उनके जीवन-दर्शन का एक अंग है। प्रेमचन्द के उपन्यासों में जगह-जगह ऐसे स्थल आये हैं, जहाँ प्रेमचन्द अपने पात्रों को बेहद हँसाते है तथा जिनके साथ पाठक भी हँसते हैं। जीवन की गम्भीरतम, अत्यधिक निराशाजनक, विवशताजन्य तथा भयानक परिस्थितियों के बीच यह हास्य कोई साधारण चीज़ नहीं है। ऐसा लगता है, प्रेमचन्द जीवन की विभीषिकाओं को एक साधारण वस्तु समझते थे। वे विभीषिकाएँ प्रेमचन्द के साहसिक मन की चट्टान से टकराती थीं और लौट जाती थीं और एक उन्मुक्त हँसी सदैव वातावरण में गूँजती रहती थी। प्रेमचन्द ने जीवन की विपदाओं को वास्तविक रूप में हँस-हँसकर झेला था।

सुख और दुःख जीवन-रथ के दो पहिए हैं। हास और रुदन मानव-जीवन की पूर्णता के लिए अनिवार्य हैं। एक के अभाव में दूसरे का कोई महत्त्व नहीं है। जो व्यक्ति दुःख की सत्ता को अस्वीकार करता है, वह वास्तविकता पर आवरण तो डालता ही है, समाज को अलौकिक जीवन की मृग-मरीचिका में भी भटका देता है। लौकिक जीवन से निर्लिप्त जीवन की सत्ता प्रेमचन्द को मान्य नहीं थी। उनके सभी पात्र सुख-दुःख की धूप-छाँह में अपना लौकिक जीवन व्यतीत करते हैं। हँसते हैं और रोते हैं। वे कोई ऐसे आदर्श महापुरुष अथवा अतिमानव नहीं; जो सुख-दुःख में समभाव धारण करते हैं। उनके पात्र शत-प्रतिशत मनुष्य हैं और प्रेमचन्द को उनकी मानवीय दुर्बलताओं से प्रेम है, सहानुभूति है। जहाँ एक ओर उनके पात्र सुख-दुःख में हँसते और रोते हैं; वहाँ दूसरी ओर ऐसा नहीं है कि वे दुःख में निराश होकर आत्महत्या कर लें अथवा सुख के मद में मानवीय मूल्यों को भूल जाएँ। मनुष्य के सम्मुख सबसे बड़ी लौकिक वेदना मृत्यु है ; और जब यह असमय ही हो जाए तब और भी मर्मान्तक है। मृत्यु मानव-जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण घटना है। मृत्यु मानव-जीवन का अनिवार्य अंग होने के कारण उपेक्षित वस्तु नहीं है। प्रेमचन्द के उपन्यासों में जहाँ किसी पात्र की मृत्यु होती है वहाँ का वातावरण और वर्णन कितना गम्भीर और दहला देने वाला होता है कि देखते ही बनता है। प्रायः औसत बुद्धि और हृदय की औसत गहराई वाले लेखक मृत्यु जैसे मर्मस्पर्शी प्रसंग को एकदम साधारण घटना समझकर छोड़-से जाते हैं। किसी पात्र की मृत्यु हो गई और मानो कुछ हुआ ही नहीं। कथा आगे बढ़ती जाती है। लेकिन प्रेमचन्द के साथ ऐसा नहीं है। मृत्यु को दो पंक्तियों में अख़बारी समाचार की तरह लिखकर वे आगे नहीं बढ़ जाते, वरन् डूबते-उतराते हैं और अपने महत् जीवन-अनुभव से जो कुछ उन्होंने ग्रहण किया है वह पाठकां के सामने रखते हैं। इतना मर्मस्पर्शी प्रसंग यदि पाठक को रुला न सका तो लेखक की जीवन-साधना उथली ही मानी जाएगी। प्रेमचन्द के उपन्यासों में वर्णित मृत्यु-प्रसंगों के कुछ उद्धरण, जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण को समझने में सहायक होंगे :

(क) “बसंतकुमार ने एक बार फिर ज़ोर मारा, पर हाथ-पाँव न हिला सके। तब उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। तट पर लोगों ने डूबते देखा। दो-चार आदमी पानी में कूदे, पर एक ही क्षण में बसतंकुमार लहरों में समा गए, केवल कमल के फूल पानी पर तैरते रह गए, मानों उस जीवन का अंत हो जाने के बाद उनकी अतृप्त लालसा अपनी रक्तरंजित छटा दिखा रही हो।”4

(ख) “हमारा अंत समय कैसा धन्य होता है। वह हमारे पास ऐसे-ऐसे अहितकारियों को खींच लाता है, जो कुछ दिन पूर्व हमारा मुख नहीं देखना चाहते थे और जिन्हें इस शक्ति के अतिरिक्त संसार का कोई अन्य शक्ति पराजित न कर सकती थी। हाँ, यह समय ऐसा ही बलवान है और बड़े-बड़े बलवान शत्रुओं को हमारे अधीन कर देता है। जिन पर हम कभी विजय न प्राप्त कर सकते थे, उन पर हमको यह समय विजयी बना देता है। जिन पर हम किसी शस्त्र से अधिकार न पा सकते थे, उन पर यह समय शरीर के शक्तिहीन हो जाने पर भी हमको विजयी बना देता है। आज पूरे वर्ष भर के पश्चात् प्रताप ने इस घर में पदार्पण किया। सुशीला की आँखें बन्द थीं, पर मुख-मंडल ऐसा विकसित था, जैसा प्रभातकाल का कमल।”5

(ग) “अँधेरा हो चला था। सारे गृह में शोकमय और भयावह सन्नाटा छाया हुआ था। रोने वाले रोते थे, पर कंठ बाँध-बाँधकर। बातें होती थीं, पर दबे स्वरों से। सुशीला भूमि पर पड़ी हुई थी। वह सुकुमार अंग, जो कभी माता के अंक में पला, कभी प्रेमांक में पोढ़ा, कभी फूलों की सेज पर सोया, इस समय भूमि पर पड़ा हुआ था। अभी तक नाड़ी मंद-मंद गति से चल रही थी, मुंशीजी शोक और निराशा-नद में मग्न उसके सिर की ओर बैठे हुए थे। अकस्मात् सिर उठाया और दोनों हाथों से मुंशीजी का चरण पकड़ लिया। प्राण उड़ गये। दोनों कर उनके चरण का मण्डल बाँधे ही रहे। यह उसके जीवन की अन्तिम क्रिया थी।

रोने वाले रोओ, क्योंकि तुम रोने के अतिरिक्त कर ही क्या सकते हो ? तुम्हें उस समय कोई कितनी ही सान्त्वना दे, पर तुम्हारे नेत्रा अश्रु-प्रवाह को न रोक सकेंगे। रोना तुम्हारा कर्तव्य है। जीवन में रोने के अवसर कदाचित् ही मिलते हैं। क्या इस समय तुम्हारे नेत्र शुष्क हो जायेंगे ? आँसुओं के तार बँधे हुए थे, सिसकियाँ के शब्द आ रहे थे कि महाराजिन दीपक जलाकर घर में लायी। थोड़ी देर पहले सुशीला के जीवन का दीप बुझ चुका था।”6

(घ) “लौंगी ने दोनों फैले हुए हाथों के बीच में अपना सिर दिया और अन्तिम प्रेमालिंगन के आनन्द में विह्नल हो गई। इस निर्जीव मरणोन्मुख प्राणी के आंलिगन में उसने उस आत्मबल, विश्वास और तृप्ति का अनुभव किया, जो उसके लिए अभूतपूर्व था। इस आनन्द में शोक भूल गई। पचीस वर्ष के दाम्पत्य जीवन में उसने कभी इतना आनन्द न पाया था। निर्दय अविश्वास रह-रहकर उसे तड़पाता रहता था। उसे सदैव यह शंका बनी रहती थी कि यह डोंगी पार लगती या मँझधार में डूब जाती है। वायु का हलका-सा वेग, लहरों का हलका-सा आन्दोलन, नौका का हलका-सा कंपन उसे भयभीत कर देता था। आज उन सारी शंकाओं और वेदनाओं का अन्त हो गया। आज उसे मालूम हुआ कि जिसके चरणों पर मैंने अपने को समर्पित किया था, वह अन्त तक मेरा रहा। यह शोकमय कल्पना भी कितनी मधुर और शान्तिदायिनी थी !

वह इसी विस्मृति की दशा में थी कि मनोरमा का रोना सुनकर चौंक पड़ी और दीवान साहब के मुख की ओर देखा। तब उसने स्वामी के चरणों पर सिर रख दिया और फूट-फूटकर रोने लगी। एक क्षण में सारे घर में कुहराम मच गया। नौकर-चाकर सभी रोने लगे। जिन नौकरों को दीवान साहब के मुँह से नित्य घुड़कियाँ मिलती थीं, वे भी रो रहे थे। मृत्यु में मानसिक प्रवृत्तियाँ को शान्त करने की विलक्षण शक्ति होती है। ऐसे विरले ही प्राणी संसार में हांगे जिनके अन्तःकरण मृत्यु के प्रकाश से आलोकित न हो जाएँ। अगर कोई ऐसा मनुष्य है, तो उसे पशु समझो। हरि सेवक की कृपणता, कठोरता, संकीर्णता, धूर्तता एवं सारे दुर्गुण, जिनके कारण वह अपने जीवन में बदनाम रहे, इस विशाल प्रेम के प्रवाह में बह गये।”7

(ङ) “राजा साहब ने यह करुण विलाप सुना और उनके पैरों तले से ज़मीन निकल गयी। उन्होंने विधि को परास्त करने का संकल्प किया था। विधि ने उन्हें परास्त कर दिया। विधि को हाथों का खिलौना बनाना चाहते थे। विधि ने दिखा दिया, तुम मेरे हाथ के खिलौने हो। वह अपनी आँखों से जो कुछ न देखना चाहते थे, वह देखना पड़ा और इतनी जल्दी। आज ही वह मुंशी वज्रधर के पास लौटे थे, आज ही उनके मुँह से वे अहंकारपूर्ण शब्द निकले थे। आह ! कौन जानता था कि विधि इतनी जल्दी यह सर्वनाश कर देगी। इससे पहले कि वह अपने जीवन का अन्त कर दें, विधि ने उनकी आशाओं का अन्त कर दिया।”8

(च) “मुँह से ‘तीन’ शब्द निकलते ही बाबू साहब के सिर पर लाठी का ऐसा तुला हुआ हाथ पड़ा कि वह अचेत होकर ज़मीन पर गिर पड़े। मुँह से केवल इतना ही निकला, हाय मार डाला।... हाय, बेचारे क्या सोचकर चले थे, क्या हो गया। जीवन, तुमसे ज्यादह असार भी दुनिया में कोई वस्तु है ? क्या यह उस दीपक की भाँति ही क्षण-भंगुर नहीं, जो हवा के एक झोंके से बुझ जाता है? पानी के एक बुलबुले को देखते हो, लेकिन उसे टूटते भी कुछ देर लगती है, जीवन में उतना सार भी नहीं। साँस का भरोसा ही क्या ? और इसी नश्वरता पर हम अभिलाषाओं के कितने विशाल भवन बनाते हैं। नहीं जानते, नीचे जाने वाली साँस ऊपर आयेगी या नहीं, पर सोचते इतनी दूर की हैं, मानों हम अमर हैं।”9

प्रेमचन्द जीवन को यद्यपि खेल समझते थे तथापि यह खेल निरुद्देश्य नहीं है। सुख और दुःख के बीच मनुष्य अपने कर्तव्यों के प्रति सजग रहकर विश्व के रंगमंच पर अपना ‘अभिनय’ पूर्ण करता है। मनुष्य एक अभिनेता है, किन्तु वह कृत्रिम अभिनेता नहीं है। प्रेमचन्द उसे स्वाभाविक रूप में देखना चाहते हैं। उसका हँसना और रोना प्राकृतिक व्यापार है। उनके जीवन-दर्शन में अलौकिकता नाम की कोई चीज़ नहीं है, यद्यपि ‘कायाकल्प’ में वे आध्यात्मिक जीवन की अनेक गुत्थियाँ सुलझाते दृष्टिगोचर होते हैं एवं पुनर्जन्म में विश्वास व्यक्त करते हैं। तथापि ‘कायाकल्प’ प्रेमचन्द के विचारों की कोई सीमा नहीं है। उन्होंने भौतिक जीवन की वास्तविकता को ही व्यापक रूप में स्पर्श किया है। ‘गोदान’ में प्रो॰ मेहता के मुख से वे जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को ही एक तरह से व्यक्त करते हुए कहते हैं :

‘‘मेरे जीवन का क्या आदर्श है... मैं प्रकृति का पुजारी हूँ और मनुष्य को उसके प्राकृतिक रूप में देखना चाहता हूँ। जो प्रसन्न होकर हँसता है, दुःखी होकर रोता है और क्रोध में आकर मार डालता है। जो दुःख और सुख दोनों का दमन करते हैं, जो रोने को कमज़ोरी और हँसने का हलकापन समझते हैं, उनसे मेरा कोई मेल नहीं। जीवन मेरे लिए आनन्दमय क्रीड़ा है, सरल, स्वच्छन्द ! जहाँ कुत्सा ईर्ष्या और जलने के लिए कोई स्थान नहीं। मैं भूत की चिंता नही करता। भविष्य की परवा नहीं करता। मेरे लिए वर्तमान ही सब कुछ है। भविष्य की चिंता हमें कायर बना देती है। भूत का भार हमारी कमर तोड़ देता है.... हम व्यर्थ का भार अपने ऊपर लादकर, रूढ़ियों, विश्वासों और इतिहासों के मलबे के नीचे दबे पड़े हैं। ... और जो यह ईश्वर और मोक्ष का चक्कर है, इस पर तो मुझे हँसी आती है। यह मोक्ष की उपासना की पराकाष्ठा है, जो हमारी मानवता को नष्ट किये डालती है। जहाँ जीवन है, क्रीड़ा है, चहक है, प्रेम है, वहीं ईश्वर है, और जीवन को सुखी बनाना ही उपासना है और मोक्ष है। ज्ञानी कहता है, ओठों पर मुस्कराहट न आये। मैं कहता हूँ अगर तुम हँस नहीं सकते और रो नहीं सकते तो तुम मनुष्य नहीं हो, पत्थर हो।”10

जीवन किस प्रकार जिया जाए, इसका यह उत्तर है!

लेकिन प्रेमचन्द का यह भौतिकवादी दृष्टिकोण भोग की भावना पर आधारित नहीं है। वे स्वयं ‘फ़कीर’ और ‘तपस्वी’ थे। उन्होंने धन की कभी चिंता नहीं की। कर्तव्य भूलकर वैयक्तिक सुख-सुविधाओं की ओर कभी ध्यान नहीं दिया। उन्हें अपने आदर्श सर्वाधिक प्रिय थे। धन के लोभ में पड़कर वे अपने आदर्शों और सिद्धान्तों से कभी च्युत नहीं हुए। प्रेमचन्द का जीवन इसका प्रमाण है। आर्थिक संकटों के बीच वे कभी निराश नहीं हुए। महाराजा अलवर के निमंत्रण को अस्वीकार कर उन्होंने अपने आदर्शों के प्रति गहन निष्ठा का ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत किया था।

इसी प्रकार उपन्यासों के आदर्श पात्र, जो उनके विचारों के वाहक हैं, यही कहानी कहते हैं। गोविन्दी अपने पिता खन्ना से कहती है :

“सत्पुरुष धन के आगे सिर नहीं झुकाते। वह देखते हैं, तुम क्या हो। अगर तुममें सच्चाई है, त्याग है, पुरुषार्थ है, तो ये तुम्हारी पूजा करेंगे।”11

धन हमें आत्मसेवी, भोगी और विलासी बना देता है। हम जीवन की पवित्रता को भूल जाते हैं। धन के लोभ ने आज मानव-जीवन को किस तरह विकृत कर दिया है उसका यथार्थ चित्रण प्रेमचन्द-साहित्य में मिलता है। स्वार्थ-भावना की जड़ यही धन-लिप्सा है। धन की लालसा ने सेवा-भावना को कुंठित कर रखा है। प्रेमचन्द ने समाज के समाने सेवा-वृत्ति को प्रतिष्ठापित किया है। सेवा-मार्ग उन्हें अत्यधिक प्रिय था। व्यक्तिगत और समष्टिगत दोनों रूपों में वे सेवाभाव को प्राथमिकता देते थे। राज-प्रजा के संबंधों पर लिखते हुए वे कहते हैं :

“आज राजा और प्रजा में भोक्ता और भोग्य का संबंध नहीं है, अब सेवक और सेव्य का संबंध है। अब अगर किसी राजा की इज्ज़त है तो उसकी सेवा-प्रवृत्ति के कारण।........जब तक कि कोई सेवा-मार्ग पर चलना नहीं सीखता, जनता के दिलों में घर नहीं कर पाता।”12

प्रेमचन्द के प्रायः प्रत्येक उपन्यास में सेवा-धर्म की चर्चा मिलेगी। कितने ही पात्र सेवा-मार्ग के पथिक चित्रित किए गए हैं। ‘कर्मभूमि’ में अमरकांत, नैना, डा॰ शान्तिकुमार, गोदान’ में होरी, प्रो॰ मेहता, ‘कायाकल्प’ में यशोदानन्दन, चक्रधर, मनोरमा, शंखधर, ‘प्रेमाश्रम’ में प्रेमशंकर, ‘वरदान’ में विट्ठलदास, पद्मसिंह, ‘रंगभूमि’ में सूरदास, प्रेमसेवक, सोफी, विनयसिंह आदि सभी के जीवन का उद्देश्य सेवा है। अपने निबंध-संग्रह ‘कुछ विचार’ में भी प्रेमचन्द एक जगह लिखते हैं :

“अगर हमारा अन्तर प्रेम की ज्योति से प्रकाशित हो और सेवा का आदर्श हमारे सामने हो तो ऐसी कोई कठिनाई नहीं जिस पर हम विजय प्राप्त न कर सकें।”13

‘गोदान’ में प्रो॰ मेहता के विचारों की व्याख्या करते समय प्रेमचन्द ने सेवा मार्ग अथवा कर्मयोग पर एक विस्तृत टिप्पणी दी है :

“प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों के बीच में जो सेवा-मार्ग है, चाहे उसे कर्मयोग कहो, वही जीवन को सार्थक कर सकता है, वही जीवन को ऊँचा और पवित्रा बना सकता है।....... सभी मनस्वी प्राणियों में यह भावना (त्याग-भावना) छिपी रहती है और प्रकाश पाकर चमक उठती है। आदमी अगर धन या नाम के पीछे पड़ा है, तो समझ लो, अभी तक वह किसी परिष्कृत आत्मा के सम्पर्क में नहीं आया।’’14

उपर्युक्त विवेचन से उनका भौतिकवादी दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाता है। निःसन्देह, प्रेमचन्द में हमें एक उदात्त नैतिकता के दर्शन होते हैं। उनकी विचारधारा अव्यावहारिक नहीं है। वे सिद्धान्त और जीवन की एकता के समर्थक थे। नक़ली ज़िन्दगी से उन्हें कोई सरोकार नहीं था। ‘गोदान’ में प्रो॰ मेहता जीवन और सिद्धान्तों के सम्बन्धों पर कहते हैं :

“मैं चाहता हूँ, जीवन हमारे सिद्धान्तों के अनुकूल हो।........मुझे उन लोगों से ज़रा भी हमदर्दी नहीं है, जो बातें करती हैं कम्युनिस्टों की-सी, मगर जीवन है रईसों का-सा, उतना ही विलासमय, उतना ही स्वार्थ से भरा हुआ।”15

प्रेमचन्द के जीवन में सिद्धान्त-साम्य सर्वत्र मिलेगा। उनके साहित्य में जिस ईमानदारी के दर्शन होते हैं वह अन्यत्र दुर्लभ है। सिद्धान्त-रक्षा का आत्म-सम्मान से घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रेमचन्द मनुष्य में आत्मसम्मान देखना चाहते थे। उन्होंने मनुष्य मात्र को मरना और जीना सिखाना चाहा था। जनता को उत्तेजित करते हुए वे लिखते हैं :

“जब तक जनता स्वयं अपनी रक्षा करना न सीखेगी, ईश्वर भी उसे अत्याचार से नहीं बचा सकता।

हमें सबसे पहले आत्मविश्वास की रक्षा करनी चाहिये। हम कायर और दब्बू हो गये हैं, अपमान और हानि चुपके से सह लेते हैं, ऐसे प्राणियों को तो स्वर्ग में भी सुख प्राप्त नहीं हो सकता। ज़रूरत है कि हम निर्भीक और साहसी बनें, संकटों का सामना करें, मरना सीखें। जब हमें मरना न आएगा, जीना भी न आएगा।”16

प्रेमचन्द के जीवन-दर्शन के ये मुख्य तत्त्व हैं, जिन्होंने उन्हें महान बनाया है। ये तत्त्व विशुद्ध मानवीय हैं। इन्हीं के आधार पर प्रेमचन्द के हृदय और बुद्धि की गहराई का अनुमान लगाया जा सकता है; क्योंकि ये ही वे तत्त्व हैं जिनसे प्रेमचन्द बने हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनका यह जीवन-दर्शन उभर-उभरकर समाने आया है। इससे उनका मावनतावाद भी भँली-भाँति प्रकट हो जाता है। जो आलोचक गाधीवादी अथवा साम्यवादी विचारधाराओं के माध्यम से उनके जीवन-दर्शन की खोज करते हैं वे वास्तव में आधार की ओर नहीं देखते। प्रेमचन्द न सही अर्थों में गांधीवादी थे और न साम्यवादी। उन्होंने राजनीतिज्ञों अथवा समाजशास्त्रियों द्वारा निश्चित सिद्धान्तों के आधार पर अपने साहित्य का सृजन नहीं किया। मानवीय मूल्यों को उन्होंने सर्वापरि स्थान दिया है। यदि उन्होंने साम्यवाद का समर्थन किया है तो इसीलिए कि साम्यवादी समाज-व्यवस्था में मानवीय मूल्यों की उपेक्षा नहीं की जाती। यही देखकर उन्होंने सोवियत रूस की ‘नई सभ्यता’ का ज़ोरदार समर्थन किया था। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी ‘रूस की चिट्ठी’ में सोवियत रूस की प्रशंसा की थी। इसी प्रकार प्रेमचन्द ने गांधीवादी दर्शन को इसीलिए अपनाया था कि उसमें भी मानवीय मूल्य अपनी पराकाष्ठा में विद्यमान थे। चाहे उसे गांधीवादी दर्शन या गांधीवादी नैतिकता कहा जाए, चाहे भारतीय संस्कृति। सत्य, अहिंसा, स्वदेशी वस्तुओं का उपयोग, हरिजनों व शोषितों के प्रति प्रेम-भावना आदि बातें यदि उनमें मिलती हैं तो इस आधार पर हम उन्हें गांधीवादी नहीं ठहरा सकते, भले ही ये प्रेरणाएँ उन्हें गांधी जी के वैचारिक सम्पर्क से मिली हों। चाहे गांधीवाद से प्रभावित प्रेमचन्द हों और चाहे साम्यवाद से, उनका मौलिक दर्शन सर्वत्र स्पष्ट लक्षित है, तभी वे आज इतने महान बन सके, तभी वे मनुष्य जाति को कुछ दे सके और तभी उनके साहित्य में इतनी गहराई आ सकी।

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संदर्भ-संकेत

1 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 328

2 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 190

3 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 140

4 ‘प्रतिज्ञा’, पृ. 20

5 ‘वरदान’, पृ. 47

6 ‘वरदान’, पृ. 53

7 ‘कायाकल्प’, पृ. 363-364

8 ‘कायाकल्प’, पृ. 467

9 ‘निर्मला’, पृ. 15

10 ‘गोदान’, पृ. 268

11 ‘गोदान’, पृ. 397

12 ‘रंगभूमि’, (भाग71), पृ. 366

13 कुछ विचार, पृ. 19

14 ‘गोदान’, पृ. 414-415

15 ‘गोदान’, पृ. 69

16 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 245 (प्रभुसेवक का कथन)

मानवतावादी दृष्टि

प्रेमचन्द मानवतावादी लेखक थे। गांधीवादी और साम्यवादी सिद्धान्तों से उन्होंने सीधी प्रेरणा ग्रहण नहीं की। उन्होंने जो कुछ जाना, सीखा, लिखा वह सब अपने अनुभव-मात्र से। इसीलिए उनके साहित्य में अपरास्त शक्ति है। गांधीवाद और साम्यवाद का कोई मानवतावाद से विरोध नहीं है, अतः प्रेमचन्द के विचारों में जगह-जगह इन दोनों वादों की झलक मिल जाती है, लेकिन उनका अपना विशिष्ट मानवतावाद सर्वत्र उभरा हुआ दीखता है। इसीलिए न उन्हें मात्र गांधीवादी ठहराया जा सकता है और न साम्यवादी। उन्होंने गांधीवादी और साम्यवादी दर्शन से प्रभावित होकर साहित्य-सर्जन नहीं किया, उनका व्यक्तित्व इन वादों की सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता। वस्तुतः मूल समस्या प्रेमचन्द के गांधीवाद से साम्यवाद की ओर मुड़ने की नहीं है, प्रत्युत उनके मानवतावाद के विकास की है। उनका मानवतावादी जीवन-दर्शन ही उनकी समस्त विचारणा के लिए उत्तरदायी है। इसमें संन्देह नहीं, उनके मानवतावाद पर भारतीय दर्शन की गहरी छाप है। गांधीवादी और साम्यवादी विचारों में यदि कहीं भारतीय ऋषियों के चिन्तन एवं सिद्धान्तों की झलक मिलती है तो उसे मौलिक नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार यदि प्रेमचन्द-साहित्य में उनकी अभिव्यक्ति मिलती है तो मात्र इस आधार पर प्रेमचन्द को भी कोई ‘वादी’ नहीं ठहराया जा सकता। वह तो भारतीय दर्शन के प्रभाव का परिणाम ही माना जाएगा। उदाहरणार्थ, अहिंसा का सिद्धान्त है। यदि प्रेमचन्द में अहिंसा-भाव मिलता है तो इसका अभिप्राय यह नहीं कि वे गांधीवादी हो गए। अहिंसा-भाव भारतीय दर्शन की उपज है।

प्रेमचन्द के मानवतावाद का विकास सुधारवाद से क्रांति की दिशा में हुआ है। जहाँ वे सुधारवादी हैं वहाँ वे गांधीवाद के अधिक निकट हैं और जहाँ क्रांतिकारी हैं वहाँ साम्यवाद के। पर, विशिष्ट तथ्य यह है कि इस भेद के होते हुए भी सुधारवादी और क्रांतिकारी प्रेमचन्द के मौलिक जीवन-दर्शन में अन्तर नहीं आया है। इस बात का प्रमाण सितम्बर, 1936 में ‘हंस’ में प्रकाशित प्रेमचन्द का ‘महाजनी सभ्यता’ शीर्षक लेख है। यद्यपि इस समय तक वे ‘सोज़ेवतन’ से ‘मंगलसूत्र’ तक ही एक लम्बी राह पार कर चुके हैं, फिर भी उनकी पूर्व मान्यताओं का आधार नहीं बदला है। यहाँ जागीरदारी सभ्यता के बारे में प्रेमचन्द लिखते हैं :

“जागीरदार अगर दुश्मन के खून से अपनी प्यास बुझाता था, तो अक़्सर अपने किसी मित्र या उपकारक के लिए जान की बाज़ी भी लगा देता था। बादशाह अगर अपने आदेश को क़ानून समझता था और उसकी अवज्ञा को कदापि सहन न कर सकता था तो प्रजापालन भी करता था। न्यायशील भी होता था। दूसरे के देश पर चढ़ाई वह या तो किसी अपमान-अपकार का बदला फेरने के लिए करता था या अपनी आन-बान, रोब-दाब क़ायम रखने के लिए या फिर देश-विजय और राज्य-विस्तार की वीरोचित महत्त्वाकांक्षा से प्रेरित होता था। उसकी विजय का उद्देश्य प्रजा का खून चूसना न होता था। कारण यह कि राजा और सम्राट जन-साधारण को अपने स्वार्थसाधन और धन-शोषण की भट्ठी का ईंधन न समझते थे, किन्तु उनके दुःख-सुख में शरीक़ होते थे और उनके गुण की क़द्र करते थे।”1

यही बात उन्होंने ‘जागरण’ 1932 के अंक में कही है :

“किसी वर्ग को दूसरे से इतना भय न था कि वह अपना संगठन करता। प्रत्येक वर्ग का कार्यक्षेत्र नियत था। उस क्षेत्रा के भीतर वह अपना जीवन व्यतीत करता था। ब्राह्मण समाज और राष्ट्र का नेता था। इसलिए नहीं कि उसमें धर्मबल था या बाहुबल था, बल्कि इसलिए कि उसमें ज्ञानबल था। वैश्य धन कमाता था, पर उस धन को जनहित में खर्च करता था। मनोवृत्तियाँ कुछ इस तरह हो गई थीं कि लोग अपने अधिकारों की अपेक्षा अपने कर्तव्यों का ज़्यादा विचार रखते थे। उस वक्त का राजा केवल सिंहासन की शोभा न बढ़ता था, बल्कि उसे रात-दिन प्रजा के हित की चिन्ता रहती थी। वह नित्य अपने समय का कुछ-न-कुछ भाग प्रजा का दुःख-दर्द सुनने में व्यतीत करता था, जिससे प्रजा में उसके प्रति भक्ति और श्रद्धा का भाव उत्पन्न होता था। ज़मींदार केवल किसान से लगान वसूल करके चैन न करता था, बल्कि प्रजा के हित की रक्षा करता था। कुएँ और तालाब खुदवाना, अकाल और दुर्भिक्ष के समय प्रजा के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर देना उसका धर्म था।”2

5 सितम्बर, 1932 के अंक में प्रेमचन्द भारतीय संस्कृति पर अपने विचार इस प्रकार प्रकट करते हैं :

“हमारे देश की संस्कृति कर्तव्य-प्रधान, धर्म-प्रधान, परमार्थ-प्रधान, अहिंसा-प्रधान, व्रत और नियम-प्रधान संस्कृति है। उसमें व्यक्ति और समष्टि के सामंजस्य का ऐसा विधान है कि एक-दूसरे का शत्रु न होकर सहायक बना रहे। व्यक्ति के लिए धन और शौर्य प्राप्त करने की पूरी स्वाधीनता है, पर उसका उपयोग समाज और राष्ट्र के हित के लिए होना चाहिए, भोग-विलास, निर्बलों पर प्रभुत्व जमाने के लिए नहीं। ‘अहिंसा परमो धर्मः’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यह दो सूत्र हमारी संस्कृति के मूल तत्त्व हैं और इस अधोवस्था में भी हम उन्हें अपनाए हुए हैं। यद्यपि अनेक कारणों से उस संस्कृति का रूप विकृत हो गया है, उसमें असंख्य बुराइयाँ घुस गई हैं, यहाँ तक कि उसका रूप पहचाना नहीं जा सकता, फिर भी ये तत्त्व प्रकाश-स्तम्भों की भाँति अब भी प्रतिकूल दशाओं का सामान करते हुए खड़े हैं। बहुत कुछ खो चुकने पर भी, अब तक इसमें जो कुछ रहा है, वह उन्हीं प्रकाश-स्तम्भों का प्रसाद है अन्यथा अब तक हमारी नौका न जाने कब की भँवर में पड़कर डूब चुकी होती।”3

प्रेमचन्द का मानवतावादी अहिंसावादी दृष्टिकोण 1932-36 तक यथावत् बना रहा। उनमें जहाँ एक ओर गांधीवादी संस्कार मिलते हैं, वहाँ दूसरी ओर विशेषकर अन्तिम दिनों में साम्यवादी संस्कार भी परिलक्षित होते हैं। इन दोनों विचारों का अपूर्व सम्मिश्रण ‘महाजनी सभ्यता’ शीर्षक लेख में देखा जा सकता है। इस लेख के विचार प्रेमचन्द की जीवन-साधना से प्रतिफलित हैं। उसमें न कोई असंगति है और न कोई परिवर्तन। यदि उन्हें अपने आदर्शों का मूर्त रूप सोवियत रूस में दिखाई दिया तो उन्होंने उसकी एक ईमानदार मानव के नाते प्रशंसा की तथा उस संस्कृति के विरोधियों पर तीव्र प्रहार भी किए।

प्रेमचन्द जी की गांधी जी से कभी भेंट नहीं हो सकी, यद्यपि वे उनसे मिलने के लिए तरसते रहे। गांधी और प्रेमचन्द का युग एक था। गांधी राजनीति में भारत का नेतृत्व कर रहे थे तो प्रेमचन्द साहित्य में। प्रेमचन्द के साहित्य का भी मुख्य उद्देश्य वही था जो गांधीजी का था - स्वतन्त्रता-प्राप्ति। ‘विशाल भारत’ (सन् 1930) में प्रेमचन्द लिखते हैं :

“मेरी अभिलाषाएँ बहुत सीमित हैं। इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा यही है कि हम अपने स्वतंत्रता-संग्राम में सफल हों। मैं दौलत और शोहरत का उत्सुक नहीं हूँ। खाने को मिल जाता है। मोटर और बँगले की मुझे हविस नहीं है। हाँ, यह ज़रूर चाहता हूँ कि दो-चार उच्चकोटि की रचनाएँ छोड़ जाऊँ, लेकिन उनका उद्देश्य भी स्वतंत्रता-प्राप्ति ही हो।”4

गांधी के मनुष्य से किसी का विरोध नहीं। वे महान व्यक्ति थे। गांधी जी में पाये जानेवाले अनेक गुण प्रेमचन्द में भी विद्यमान थे, यथा - सादगी, धन के प्रति विरक्ति, अहिंसा-प्रेम, सत्यवादिता, श्रम-प्रेम आदि। प्रेमचन्द जी गांधी जी को महामानव मानते थे; पर, गांधी से प्रभावित होकर प्रेमचन्द जी ऐसे बने, यह बात नहीं है। गांधी जी यदि उत्पन्न न भी हुए होते तो भी प्रेमचन्द जो थे, वही रहते। अन्य सामान्य बातों में यदि कहीं साम्य पाया जाता है तो वह उद्देश्य की एकता के कारण ही। गांधी जी भी स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील थे और प्रेमचन्द भी। समान उद्देश्य वालों में एक-दूसरे के प्रति प्रेम और साम्य पाया जाना स्वाभाविक है। लेकिन उद्देश्य एक होते हुए भी उस उद्देश्य की प्राप्ति के साधनों में, विधियों में अन्तर हो सकता है। और यहीं प्रेमचन्द जी और गांधी जी में अन्तर उपस्थित हो जाता है। सुधारवादी प्रेमचन्द क्रांतिकारी प्रेमचन्द तो बन गए, पर गांधी जी अन्त तक सुधारवादी ही बने रहे। इसी आधार पर यह कहा जाता है कि जहाँ प्रेमचन्द सुधारवादी हैं, वहाँ गांधीवाद के निकट हैं और जहाँ क्रांतिकारी हैं, वहीं साम्यवाद के। पर, प्रेमचन्द के दृष्टिकोण में यह परिवर्तन वास्तविक अनुभव से आया। प्रेमचन्द प्रारम्भ से ही व्यावहारिक आदर्शवाद के समर्थक थे, यह बताया जा चुका है। गांधी जी के प्रयोगों पर उन्हें आदर्शवादी होने के कारण आस्था थी, पर यह आस्था अंधी नहीं थी। प्रेमचन्द ने जब प्रत्यक्ष अनुभवों से यह देखा कि गांधी जी के तौर-तरीक़े अव्यावहारिक हैं तो उनका उनसे मतभेद हो गया। 7 अगस्त, 1933 के ‘जागरण’ की सम्पादकीय टिप्पणी में उन्होंने स्पष्ट लिखा :

“वैयक्तिक सत्याग्रह का कार्यक्रम राष्ट्र को स्वीकार नहीं है। सम्भव है, उसे पूर्ण रूप से व्यवहार में लाया जा सके, तो राष्ट्र को उसके द्वारा स्वराज्य प्राप्त हो सके, पर यह तो उसी तरह है कि रोगी की देह में रक्त बढ़ जाए तो वह अवश्य अच्छा हो जाएगा। किसी काम की सफलता के लिए असम्भव शर्त लगा देने से हम सिद्धि के निकट नहीं पहुँचते। किसी प्रोग्राम को उसकी व्यावहारिकता के आधार पर ही जाँचना उचित है। जिस दिन ऐसे आदमी बड़ी संख्या में निकल आयेंगे, जो अपना सर्वस्व राज्य के लिए त्यागने को तैयार हो जाएँ, उस दिन तो आप-ही-आप स्वराज्य हो जायगा। लेकिन ऐसा समय कभी आएगा, इसमें सन्देह है। ऐसी दशा में सत्याग्रही नीति से हमें अपने उद्देश्य की प्राप्ति की आशा नहीं।”5

आगे चलकर वे गांधीवाद की अव्यावहारिता के आलोचक बन गए। ‘जागरण’ 16 अप्रैल, 1934 के अंक की सम्पादकीय टिप्पणी में वे लिखते हैं -

“अब यह मान लेना पड़ेगा कि जिस चीज़ को भीतर की आवाज़ कहते हैं, जिसका मतलब यह होता है कि उसके ग़लत होने की सम्भावना नहीं, वह बहुत भरोसे की चीज़ नहीं है, क्योंकि उसने एक से ज़्यादा अवसरों पर ग़लती की है।”6

‘आत्मा की आवाज़’ पर से उनका विश्वास जाता रहा । ‘मंगलसूत्र’ में प्रेमचन्द लिखते हैं :

“ ‘सन्तकुमार ने निस्संकोच भाव से कहा, ‘‘ज़रूरत सब कुछ सिखा देती है। स्वरक्षा प्रकृति का पहला नियम है। वह जायदाद, जो आपने बीस हज़ार में दे दी, आज दो लाख से कम की नहीं है।’

‘वह दो लाख की नहीं, दस लाख की हो। मेरे लिए वह आत्मा का बेचने का प्रश्न है। मैं थोड़े से रुपयों के लिए अपनी आत्मा नहीं बेच सकता।’

दोनों मित्रों ने एक-दूसरे की ओर देखा और मुस्कराये। कितनी पुरानी दलील है और कितनी लचर! आत्मा जैसी चीज़ है कहाँ? और जब सारा संसार धोखेधड़ी पर चल रहा है तो आत्मा कहाँ रही?....”7

इसी प्रकार तथकथित प्रजातंत्र पर से भी उनका विश्वास उठ गया था। प्रजातन्त्र के सिद्धान्तां से उनका कोई विरोध न था, वे तो उसकी व्यावहारिकता पर दृष्टि रखते थे। ‘गोदान’ में मिर्ज़ा के मुख से प्रेमचन्द तथाकथित प्रजातंत्र के बारे में कहते हैं :

“जिसे हम डेमोक्रेसी कहते हैं, वह व्यवहार में बड़े-बड़े व्यापारियों और ज़मीदारों का राज्य है, और कुछ नहीं। चुनाव में वही बाज़ी ले जाता है, जिसके पास रुपये हैं। रुपये के ज़ोर से उसके लिए सभी सुविधाएँ तैयार हो जाती हैं।”8

प्रेमचन्द कहते हैं, ”मिर्ज़ा साहब ने क़ुरान की आयतों से सिद्ध किया कि पुराने ज़माने के बादशाहों के आदर्श कितने ऊँचे थे। आज तो हम उसकी तरफ़ ताक भी नहीं सकते। हमारी आँखों में चकाचौंध आ जाएगी। बादशाह को ख़जाने की एक कौड़ी भी निजी ख़र्च में लाने का अधिकार न था। वह किताबें नक़ल करके, कपड़े सीकर, लड़कां को पढा़कर अपना गुज़र करता था। मिर्ज़ा ने आदर्श महीपों की एक लम्बी सूची गिना दी। कहाँ तो वे प्रजा को पालनेवाले बादशाह, और कहाँ आजकल के मंत्रा और मिनिस्टर, जिन्हें पाँच, छः, सात, आठ हज़ार महावार मिलना चाहिए। यह लूट है या डेमोक्रेसी ?”9

इसी लूट का उल्लेख करते हुए ‘मंगलसूत्र’ में प्रेमचन्द पं॰ देवकुमार के मुख से कहलाते हैं :

“क्यों एक आदमी ज़िन्दगी-भर बड़ी-से-बड़ी मेहनत करके भी भूखों मरता है, और दूसरा आदमी हाथ-पाँव न हिलाने पर भी फूलों की सेज पर सोता है।.... बुद्धि जवाब देती, यहाँ सभी स्वाधीन हैं, सभी को अपनी शक्ति और साधनों के हिसाब से उन्नति करने का अवसर है। मगर शंका पूछती, सबको समान अवसर कहाँ हैं ? बाज़ार लगा हुआ है। जो चाहे वहाँ से अपनी इच्छा की चीज़ ख़रीद सकता है। मगर ख़रीदेगा तो वही जिसके पास पैसा है। और जब सबके पास पैसे नहीं हैं तो सबका बराबर का अधिकार कैसे माना जाए ?”10

प्रेमचन्द की मानवता तथाकथित प्रजातंत्र अथवा प्रचलित प्रजातंत्र की पोषक नहीं थी। वे समाज से शोषित और शोषक के झगड़े को मिटा देना चाहते थे। शोषितों के प्रति प्रेमचन्द के हृदय में अपार श्रद्धा और प्रेम है। वस्तुतः वे शोषित जनता के ही लेखक थे। शोषक-समाज के प्रति उनके हृदय में कोई सहानुभूति नहीं है और यह विरोधाभास निभ भी नहीं सकता। प्रारम्भ से ही उनमें शोषितों के प्रति मानवीय संवेदना दृष्टिगोचर होती है। शोषक-समुदाय के कुकर्मों से उन्हें घृणा थी। उन्होंने लिखा :

“निन्दा, क्रोध और घृणा यह सभी दुर्गुण हैं, लेकिन मानव-जीवन में से अगर इन दुर्गुणों को निकाल दीजिए तो संसार नरक हो जाएगा...... पाखंड, धूर्तता, अन्याय, बलात्कार और ऐसी ही अन्य दुष्प्रवत्तियों के प्रति हमारे अन्दर जितनी ही प्रचंड घृणा हो, उतनी ही कल्याणकारी होगी। जीवन में जब घृणा का इतना महत्त्व है, तो साहित्य कैसे उसकी उपेक्षा कर सकता है, जो जीवन का ही प्रतिबिम्ब है। मानव-हृदय आदि से ही ‘सु’ और ‘कु’ का रंगस्थल है और साहित्य की सृष्टि ही इसलिए हुई कि संसार में जो ‘सु’ या ‘सुन्दर’ है, और इसलिए कल्याणकर है, उसके प्रति मनुष्य में प्रेम उत्पन्न हो और ‘कु’ या असुन्दर और इसलिए असत्य वस्तुओं से घृणा । साहित्य और कला का यही मुख्य उद्देश्य है। ‘कु’ और ‘सु’ का संग्राम ही साहित्य का इतिहास है।”11

लेकिन वे भावनाओं के प्रति ही घृणा का उद्रेक करते हैं, व्यक्तियों के प्रति नहीं :

“इन पंक्तियों के लेखक ही के विषय में एक कृपालु आलोचक ने आक्षेप किया है कि उसने अपनी रचानाओं में ब्राह्मणों के प्रति घृणा का प्रचार किया। हरेक टकापंथी पुजारी को ब्राह्मण कहकर मैं इस पद का अपमान नहीं कर सकता। इस विकृत धर्मोपजीवी आचरण के हाथों हमारा सामाजिक अहित ही नहीं, कितना राष्ट्रीय अहित हो रहा है, यह वर्णाश्रम स्वराज्य संघ के हथकंडों से ज़ाहिर है। ऐसी असामाजिक, अराष्ट्रीय, अमानुषीय भावनाओं के प्रति, जितनी भी घृणा फैलाई जाए वह थोड़ी है, केवल भावनाओं के प्रति, व्यक्ति के प्रति नहीं, क्योंकि वर्णाश्रम-धर्म के संचालक हमारे वैसे ही भाई हैं जैसे आलोचक महोदय के।”12

घृणा के सम्बन्ध में भी उनके विचार न शत-प्रतिशत गांधीवादी हैं और न साम्यवादी। प्रेमचन्द पाखंडियों, धूर्तों, अन्यायियों का पर्दाफाश अवश्य करते हैं, पर उनके विरुद्ध घृणा उत्पन्न नहीं करते। साम्यवादी अन्यायी के प्रति भी घृणा रखने की बात करते हैं। प्रेमचन्द भावनाओं और व्यक्ति में भेद करते हैं। डा॰ रामविलास शर्मा ‘प्रेमचन्द और उनका युग’ नाम पुस्तक में लिखते हैं, ‘‘प्रेमचन्द का मानववाद मनुष्य की तरफ़दारी करनेवाला मानववाद है। वह अमानुषीय भावनाओं को देखकर चुप नहीं रहता। प्रेमचन्द खुल्लमखुल्ला अपना उद्देश्य घोषित करते हैं कि ऐसी भावनाओं के प्रति जितनी भी घृणा फैलाई जाए वह थोड़ी है। वह सोद्देश्य साहित्य के समर्थक हैं। ‘कला कला के लिए’ या निरुद्देश्य साहित्य से उन्हें बैर है। वह भावनाओं और व्यक्ति में भेद करते हैं, लेकिन स्वयं उनके उपन्यास अन्याय ही नहीं अन्यायी के प्रति घृणा करना सिखाते हैं। ज्ञानशंकर के चरित्रा से कौन-सा पाठक क्रोध से विचलित नहीं हो उठता? ज्ञानशंकर को अलग रखकर उसका क्रोध कब सूक्ष्म भावनाओं पर केन्द्रित होता है ? विचार-क्षेत्र में प्रेमचन्द अन्याय और अन्यायी में भेद करते हैं, इस तरह का भेद अस्वाभाविक है और साधारण प्रकृति के विरुद्ध है। असल में अपने उपन्यासों में वह अन्यायी और अत्याचारी से घृणा करना सिखाते हैं, जो उचित ही है।”13

उपर्युक्त तथ्य आंशिक सत्य ही हो सकता है। यह अवश्य है कि व्यक्ति को अलग रखकर सूक्ष्म भावनाओं पर पाठक का क्रोध केन्द्रित नहीं हो सकता, लेकिन यह तभी तक होता है जब तक वह व्यक्ति धृणित कर्म करता है। बाद में घृणा का भाव उस सूरत में कर्म तक ही सीमित रह जाता है; जब कि लेखक उस व्यक्ति में साधु-प्रवृत्तियों का संचार कर देता है। ज्ञानशंकर के मामले में भी यही बात दिखाई देती है। ज्ञानशंकर में जब साधुता जागती है तब वह अपने पूर्वकृत नीच कर्मों के कारण स्वयं से घृणा करने लगता है और आत्मग्लानि से भरकर आत्महत्या कर लेता है। प्रेमचन्द ज्ञानशंकर के हृदय में प्रायश्चित के भावों का समावेश कर देते हैं। यदि व्यक्ति के प्रति ही घृणा का प्रचार करना प्रेमचन्द का उद्देश्य रहा होता तो ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

जीवन के अन्तिम दिनों में वे साम्यवाद के प्रति आकर्षित हुए थे। इस आकर्षण का सूत्र क्या है ? 27 फरवरी 1933 के ‘जागरण’ की टिप्पणी में प्रेमचन्द लिखते हैं :

“संसार में जितना अन्याय और अनाचार है, जितना द्वेष और मालिन्य है, जितनी मूर्खता और अज्ञान है, उसका मूल रहस्य यही विष की गाँठ है। जब तक सम्पत्ति पर व्यक्तिगत अधिकार रहेगा। तब तक मानव-समाज का उद्धार नहीं हो सकता।”14

यहाँ प्रेमचन्द का क्रांतिकारी रूप साम्यवाद के निकट है। साम्यवाद उनके समय में रूस में साकार हो उठा था। प्रेमचन्द का मानववादी मन यदि साम्यवाद की आदर्श समाज-व्यवस्था की ओर आकर्षित हुआ तो वह एक स्वाभाविक विकास-क्रम है। जिस तरह प्रारम्भ में प्रेमचन्द गांधीवाद की ओर आकर्षित हुए थे; कुछ उसी प्रकार का यह भी आकर्षण था। गांधीवाद में अव्यावहारिकता देखकर प्रेमचन्द साम्यवादी यथार्थता की ओर मुडे़ थे। यदि साम्यवादी व्यवस्था या सिद्धान्तों में भी उनकी विचारणा-भावना के प्रतिकूल कोई बात दिखाई देती तो वे उसकी आलोचना अवश्य करते और बहुत सम्भव है उनका मानवतावाद आगे चलकर किसी नई विचारधारा को जन्म देता। लेकिन प्रेमचन्द इस मोड़ के अवसर पर ही हमसे विदा हो गए। इस अवधि में व्यक्त उनके विचारों का विश्लेषण करने से यही स्पष्ट होता है कि वे भारतीय आदर्शों तथा अपने निजी जीवन-दर्शन से प्रभावित होकर ही साम्यवाद का समर्थन करते हैं। साम्यवाद का अर्थ उनके लिए क्या था? साम्यवाद का विरोधी कौन हो सकता है ? प्रेमचन्द लिखते हैं :

“साम्यवाद का विरोध वही तो करता है जो दूसरों से ज़्यादा सुख मोगना चाहता है, जो दूसरों को अपने अधीन रखना चाहता है। जो अपने को भी दूसरों के बराबर ही समझता है, जो अपने में कोई सुर्खाब का पर लगा हुआ नहीं देखता, जो समदर्शी है, उसे साम्यवाद से विरोध क्यों होने लगा ?”15

‘महाजनी सभ्यता’ शीर्षक लेख में प्रेमचन्द जी ने जहाँ एक ओर वर्तमान सामाजिक व्यवस्था का यथार्थ चित्र खींचा है तथा सोवियत रूस की समाज-व्यवस्था की प्रशंसा की है वहाँ दूसरी ओर जागीरदारी सभ्यता की अच्छाइयों का उल्लेख भी किया है तथा इस बात पर खेद प्रकट किया है कि दया और स्नेह, सच्चाई और सौजन्य का पुतला मनुष्य एकदम ममता शून्य जड़-यंत्रा बनकर रह गया है। प्रेमचन्द मानव को उसके मौलिक रूप में देखना चाहते हैं। उसमें जो विकृति आ गई है उसका मूल कारण धन-लिप्सा अथवा धन-संग्रह है, जिसे महाजनी सभ्यता ने बढ़ाया है। अतः वे इस महाजनी सभ्यता को मिटा देना चाहते हैं। सोवियत रूस ने महाजनवाद को समाप्त किया, अतः उस सभ्यता में उन्हें मानव-कल्याण के दर्शन हुए।

वर्तमान समाज-व्यवस्था की यथार्थ स्थिति का वर्णन करते हुए प्रेमचन्द ‘महाजनी सभ्यता’ शीर्षक लेख में लिखते हैं :

“मनुष्य-समाज दो भागों में बँट गया है। बड़ा हिस्सा तो मरने-खपनेवालों का है और बहुत ही छोटा हिस्सा उन लोगों का जो अपनी शक्ति और प्रभाव से बड़े समुदाय को अपने वश में किए हुए हैं। उन्हें इस बड़े भाग के साथ किसी तरह की हमदर्दी नहीं। उसका अस्तित्व केवल इसलिए है कि अपने मालिकों के लिए पसीना बहाए, खून गिराए और एक दिन चुपचाप इस दुनिया से विदा हो जाए।”16

‘कर्मभूमि’ में भी एक स्थान पर प्रेमचन्द इस ओर लक्ष्य कर गये हैं। अमरकांत कहता है :

“एक अदमी दस रुपये में गुज़र करता है, दूसरे को दस-हज़ार क्यों चाहिए ? यह धाँधली उसी वक्त तक चलेगी जब-तक जनता की आँखें बन्द हैं। क्षमा कीजिएगा, एक आदमी पंखे की हवा खाए और ख़सख़ाने में बैठे ओैर दूसरा आदमी दोपहर की धूप में तपे, यह न न्याय है, न धर्म, यह धाँधली है।”17

‘मंगलसूत्रा’ में साधु कुमार कहता है :

“इतने ग़रीबों में धनी होना मुझे तो स्वार्थन्धता-सी लगती है। मुझे तो इस दशा में अपने ऊपर लज्जा आती है, जब देखता हूँ कि मेरे ही जैसे लोग ठोकरें खा रहे हैं। हम तो दोनों वक्त चुपड़ी रोटियाँ और दूध और सेब-सन्तरे उड़ाते हैं, मगर सौ में निन्यानबे आदमी तो ऐसे भी हैं जिन्हें इन पदार्थों के दर्शन भी नहीं होते। आख़िर हममें क्या सुर्ख़ाब के पर लग गए हैं ?”18

और आगे चलकर ‘महाजनी सभ्यता’ शीर्षक लेख में वे रूसी संस्कृति और समाज-व्यवस्था का स्वागत करते हैं :

“परन्तु अब एक नई सभ्यता का सुदूर पश्चिम से उदय हो रहा है जिसने इस नाटकीय महाजनवाद या पूँजीवाद की जड़ खोदकर फेंक दी है। जिसका मूल सिद्धान्त यह है कि प्रत्येक व्यक्ति जो अपने शरीर या दिमाग़ से मेहनत करके कुछ पैदा कर सकता है, राज्य और समाज का परम सम्मानित सदस्य हो सकता है, और जो केवल दूसरों की मेहनत या बाप-दादों के जोड़े हुए धन पर रईस बना फिरता है, यह पतिततम प्राणी है, उसे राज्य-प्रबन्ध में राय देने का हक़ नहीं और वह नागरिकता के अधिकारों का भी पात्र नहीं।”19

इतना ही नहीं, सोवियत संघ के विरुद्ध झूठा प्रचार करनेवाले महाजनों और साम्राज्यवादियों की भी ख़बर लेना वे नहीं भूले हैं :

“महाजन इस नई लहर से अति उद्विग्न होकर बौखलाया हुआ फिर रहा है और सारी दुनिया के महाजनों की शामिल आवाज इस नई सभ्यता को कोस रही है, उसे शाप दे रही है। व्यक्ति-स्वातंत्र्य, आज़ादी, यह इन सबकी घातक, गला घांट देने वाली बताई जा रही है। उस पर नए-नए लांछन लगाये जा रहे हैं, नई-नई हुरमतें, तराशी जा रही हैं। वह काले से काले रंग में रँगी जा रही है, कुत्सित से कुत्सित रूप में चित्रित की जा रही है। उन सभी साधनों से, जो पैसेवालों के लिए सुलभ हैं, काम लेकर उनके विरुद्ध प्रचार किया जा रहा है। पर सचाई है, जो उस सारे अन्धकार को चीरकर दुनिया में अपनी ज्योति का उजाला फैला रही है।”20

आगे चलकर विस्तार से लिखते हुए प्रेमचन्द सोवियत समाज-व्यवस्था की वास्तविकता बड़े निर्भीक ढंग से उपस्थित करते हैं :

“निःसन्देह, इस नयी सभ्यता ने व्यक्ति-स्वातंत्र्य के पंजे, नाख़ून और दाँत तोड़ दिए हैं। उसके राज्य में अब एक पूँजीपति लाखों मज़दूरों का खून पीकर मोटा नहीं हो सकता। उसे अब यह आज़ादी नहीं कि अपने नफ़े के लिए साधारण आवश्यकता की वस्तुओं के दाम चढ़ा सके, दूसरे, अपने माल की खपत कराने के लिए युद्ध करा दे, गोला-बारूद और युद्ध-सामग्री बनाकर दुर्बल राष्ट्रों का दमन कराए। अगर इसकी स्वाधीनता ही स्वाधीनता है तो निस्सन्देह नई सभ्यता में स्वाधीनता नहीं, पर यदि स्वाधीनता का अर्थ यह है कि जन-साधारण को हवादार मकान, पुष्टिकर भोजन, साफ़-सुथरे गाँव, मनोरंजन की और व्यायाम की सुविधाएँ, बिजली के पंखे और रोशनी, सस्ता और सद्यःसुलभ न्याय की प्राप्ति हो तो इस समाज-व्यवस्था में जो स्वाधीनता और आज़ादी है वह दुनिया को किसी सभ्यतम कहाने वाली जाति को भी सुलभ नहीं। धर्म की स्वतंत्रता का अर्थ अगर पुरोहितों, पादरियों, मुल्लाओं की मुफ़्तखोर जमात के दंभयम उपदेशों और अन्धविश्वास-जनित रूढ़ियों का अनुसरण है तो निस्सन्देह वहाँ इस स्वतंत्रता का अभाव है, पर धर्म-स्वातंत्रय का अर्थ यदि लोकसेवा, सहिष्णुता, समाज के लिए व्यक्ति का बलिदान नेकनीयती, शरीर और मन की पवित्रता है तो इस सभ्यता में धर्माचरण की जो स्वाधीनता है और किसी देश को उसके दर्शन भी नहीं हो सकते।

यह नई सभ्यता धनाढ्यता को हेय और लज्जाजनक तथा घातक विष समझती है। वहाँ कोई आदमी अमीर ढंग से रहे तो लोगों की ईर्ष्या का पात्र नहीं होता, बल्कि तुच्छ और हेय समझा जाता है।....

हाँ, इस समाज-व्यवस्था ने व्यक्ति को यह स्वाधीनता नहीं दी है कि वह जन-साधारण को अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की तृप्ति का साधन बनाए और तरह-तरह के बहानों से उनकी मेहनत का फ़ायदा उठाए या सरकारी पद प्राप्त करके मोटी रकमें उड़ाए और मूँछों पर ताव देता फिरे।”21

प्रेमचन्द जानते थे कि कुछ लोग इस नई सभ्यता का इस आधार पर विरोध करेंगे कि वह विदेशी है, भारत की मिट्टी के अनुकूल नहीं। इस कुतर्क का भी उत्तर वे अपने इसी लेख में दे गये हैं :

“यह सभ्यता अमुक देश की समाज-रचना अथवा धर्म-मज़हब से मेल नहीं खाती या उस वातावरण के अनुकूल नहीं है, यह तर्क नितान्त असंगत है। ईसाई मज़हब का पौधा यरूशलम में उगा और सारी दुनिया उसके सौरभ से बस गई। बौद्ध-धर्म ने उत्तर-भारत में जन्म ग्रहण किया और आधी दुनिया ने उसे गुरु-दक्षिणा दी। मानव-स्वभाव अखिल विश्व में एक ही है। छोटी-छोटी बातों में अन्तर हो सकता है, पर मूल स्वरूप की दृष्टि से सम्पूर्ण मानव-जाति में कोई भेद नहीं। जो शासन-विधान और समाज-व्यवस्था एक देश के लिए कल्याणकारी है वह दूसरे देशों के लिए भी हितकर होगी। हाँ, महाजनी सभ्यता और उसके गुरगे अपनी शक्ति-भर उसका विरोध करेंगे, उसके बारे में भ्रमजनक बातों का प्रचार करेंगे, जन-साधारण को बहकावेंगे। उनकी आँखों में धूल झोंकेंगे। पर जो सत्य है, एक- न-एक दिन उसकी विजय होगी और अवश्य होगी।”22

‘मंगलसूत्र’ में पं॰ देवकुमार के मुख से प्रेमचन्द कहलाते हैं :

“नहीं, मुनष्यों में मनुष्य बनना पडे़गा। दरिन्दों के बीच में उनसे लड़ने के लिए हथियार बाँधना पडे़गा।”23

यहाँ ऐसा लगता है कि प्रेमचन्द अहिंसा-पथ से हट गए हैं। हिन्दी के कई अलोचकों ने इस आशय के विचार भी व्यक्त किए हैं। पर, यहाँ ‘हथियार बाँधने’ से अभिप्राय हिंसा से नहीं वरन् संघर्ष से ही लेना अधिक युक्तियुक्त होगा। लाक्षणिक अर्थ में यह संघर्ष अन्याय को चुपचाप सहन न करने के लिए है।

इस प्रकार प्रेमचन्द के विचारों में उत्तरोत्तर विकास होता रहा। प्रारम्भ का सुधारवादी दृष्टिकोण क्रांतिकारी विचारों के समाने ठहर न सका। उनका यह वैचारिक परिर्वतन उनके मानवतावाद के विकास का परिणाम है।

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संदर्भ-संकेत

1 ‘महाजनी सभ्यता’, हंस, सितम्बर 1936

2 ‘जागरण’, 5 सितम्बर,सन् 1932

3 ‘जागरण’, 5 सितम्बर, सन् 1932

4 ‘विशाल भारत’, सन् 1930

5 ‘जागरण’, 7 अगस्त, सन् 1933

6 ‘जागरण’, 16 अप्रैल, सन् 1934

7 ‘मंगलसूत्र’, प्रेमचंद

8 ‘गोदान’, प्रेमचंद

9 ‘गोदान’, प्रेमचंद

10 ‘मंगलसूत्र’, प्रेमचंद

11 ‘महाजनी सभ्यता’, हंस, सितम्बर 1936

12 ‘महाजनी सभ्यता’, हंस, सितम्बर 1936

13 ‘प्रेमचंद और उनका युग’, डॉ. रामविलास शर्मा

14 ‘जागरण’, 27 फ़रवरी,सन् 1933

15 ‘महाजनी सभ्यता’, हंस, सितम्बर 1936

16 ‘महाजनी सभ्यता’, हंस, सितम्बर 1936

17 ‘कर्मभूमि’, प्रेमचंद

18 ‘मंगलसूत्र’, प्रेमचंद

19 ‘महाजनी सभ्यता’, हंस, सितम्बर 1936

20 ‘महाजनी सभ्यता’, हंस, सितम्बर 1936

21 ‘महाजनी सभ्यता’, हंस, सितम्बर 1936

22 ‘महाजनी सभ्यता’, हंस, सितम्बर 1936

23 ‘मंगलसूत्र’, प्रेमचंद

समस्यामूलक उपन्यास

उपन्यास का अत्याधुनिक स्वरूप समस्यामूलक है। ‘समस्यामूलक उपन्यास’ जैसाकि शब्दों से ध्वनित होता है, किसी समस्या-विशेष को लेकर चलते हैं। समस्या सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक, नैतिक, पारलौकिक आदि किसी भी प्रकार की हो सकती है। सामाजिक उपन्यास और सामाजिक समस्यामूलक उपन्यास में वस्तु-विन्यास सम्बन्धी भेद है। यही अन्तर राजनीतिक-उपन्यास, पारिवारिक उपन्यास आदि के संबंध में दृष्टव्य है। समस्यामूलक उपन्यास वस्तु को प्रधानता नहीं देते। वे कहीं-कहीं तो औपन्यासिक रचनातन्त्र तक की उपेक्षा कर जाते हैं। पर, समस्या के महत्व और उसके रखने के प्रभावशाली ढंग के कारण, इस उपेक्षा से सामाजिकों को कृति से अरुचि नहीं होती। समस्यामूलक उपन्यासकार औपन्यासिक-तत्वों में सबसे अधिक महत्व प्रतिपाद्य समस्या को ही देते हैं। शेष तत्व उनमें मिलेंगे, पर अन्य औपन्यासिक प्रकारों से भिन्न। उनके चरित्रांकन, कथा-विकासादि के पृथक मापदण्ड हैं।

समस्यामूलक उपन्यास के दो भेद पाये जाते हैं-

1. जिसमें केवल एक समस्या हो,

2 जिसमें एक प्रधान-समस्या के साथ अन्य समस्याएँ भी गुँथी हुई हों, पर उनका स्थान गौण हो।

वास्तव में देखा जाय तो केवल एक समस्या वाले उपन्यास ही समस्यामूलक नाम से पुकारे जाने के अधिकारी हैं। दूसरे प्रकार के उपन्यास समस्या-प्रधान होते हुए भी समस्यामूलक नहीं कहे जा सकते, क्योंकि उनका रचनातन्त्र अन्य औपन्यासिक-स्वरूपों से इतना भिन्न नहीं होता। समस्यामूलक उपन्यासों की श्रेणी में उन्हें इस कारण गिना जा सकता है कि उपन्यासकार का ध्यान उनमें भी समस्याओं पर ही केन्द्रित रहता है। स्वरूप में भिन्नता होते हुए भी उद्देश्य में एकता अवश्य मिलती है। इसके अतिरिक्त वे एक-दूसरे के अत्यधिक निकट भी हैं। विरोधी होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। अतः समस्यामूलक उपन्यास की विस्तृत परिभाषा के अन्तर्गत उपर्युक्त दोनों प्रकार के उपन्यास सम्मिलित किये जा सकते हैं।

समस्यामूलक उपन्यासों का प्रचार दिन-पर-दिन बढ़ता जा रहा है। वे प्रत्येक देश में लोकप्रिय हो रहे हैं। जीवन की नाना समस्याओं का उद्घाटन तथा उनका हल; यद्यपि हल सदैव अपेक्षित नहीं होता, आज के उपन्यासकार का प्रधान कार्य है। उपन्यासकार एक सामाजिक प्राणी होता है, वह अपने समय की समस्याओं से विमुख नहीं रह सकता। वास्तविक लेखक तो इन समस्याओं से तटस्थ भी नहीं रह सकते। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल अपने हिन्दी-साहित्य के इतिहास में लिखते हैं-

‘‘लोक या किसी जन-समाज के बीच काल की गति के अनुसार जो गूढ़ और चिंत्य परिस्थितियाँ खड़ी होती हैं उनको गोचर रूप में सामने लाना और कभी-कभी निस्तार का मार्ग की प्रत्यक्ष करना उपन्यास का काम है।’’1

प्रेमचन्द साहित्य का उद्देश्य ही समस्याओं पर विचार एवं उनका हल उपस्थित करना घोषित करते हैं-

‘‘अब साहित्य केवल मन-बहलाव की चीज़ नहीं है, मनोरंजन के सिवा उसका और भी कुछ उद्देश्य है। अब वह केवल नायक-नायिका के संयोग-वियोग की कहानी नहीं सुनाता; किन्तु जीवन की समस्याओं पर भी विचार करता है।’’2

अपने युग की समस्याओं से लेखक को कभी भी विमुख नहीं रहना चाहिए। रोल्फ फॉक्स के शब्दों में-

‘‘क्या उपन्यासकार दुनिया की समस्याओं की, जिनमें वह रहता है, उपेक्षा कर सकता है? क्या वह युद्ध के लिए होने वाले शोर के प्रति अपने कान बन्द कर सकता है; अपने देश की दशा के प्रति आँखें बन्द रख सकता है? क्या वह अपने चारों ओर का भयानक वातावरण देखकर अपना मुँह बन्द रख सकता है; जब कि राजकीय मान के नाम पर, व्यक्तिगत लोलुपता को ज्यों-का-त्यों क़ायम रखने के लिए जनता का जीना दूभर कर दिया गया है।

दिन-पर-दिन उपन्यासकार यह अनुभव करने लगे हैं कि आँख, कान और स्वर वास्तव में चेतना के अंग हैं और मानवीय दुनिया को शक्ति प्रदान करने के लिए उत्तरदायी हैं, वे किसी आध्यात्मिक-विश्व के निष्क्रिय दास-मात्र नहीं हैं जैसी की कला के क्षेत्र में परम्परागत मान्यता रही है।’’3

यही उपन्यासकार का युग-धर्म है। उसे अपने समय की समस्याओं में काफ़ी गहरे डूब जाना होता है। समस्यामूलक-उपन्यासकार को कला का उपयोगितावादी दृष्टिकोण ग्रहण करना पड़ता है। उसका उद्देश्य सामाजिक है। वैयक्तिक समस्याओं के उपन्यास मनोवैज्ञानिक उपन्यासों की कोटि में आते हैं। वे व्यक्ति मात्र (Individual) के मन का विश्लेषण करते है, किसी सामूहिक जन-जीवन के प्रश्नों को समस्याओं को अथवा आवश्यकताओं को सामने नहीं रखते। समस्यामूलक उपन्यास हमारे जटिल और विभिन्न रूपात्मक संसार का दर्पण है।

औपन्यासिक तत्त्व समस्यामूलक उपन्यासों में सीमित और निर्दिष्ट दृष्टिकोण लेकर आते हैं। कथावस्तु, चरित्रा-चित्रण, कथोपकथन, देश-काल आदि सभी तत्त्व अपने स्वतन्त्र रूप में इनमें दृष्टिगोचर होंगे। जहाँ तक वस्तु का सम्बन्ध है समस्यामूलक उपन्यास में उसके विन्यास का विशेष महत्व है। समस्या को आधार मानकर उपन्यासकार वस्तु की रचना करता है। जीवन की घटनाओं का वह इस तरह संकलन करता है कि समस्या पाठकों के सामने धीरे-धीरे आती है और आगे चलकर पूरे उपन्यास पर छा जाती है। इस क्रिया में सामाजिक व राजनीतिक परिपार्श्व की बड़ी अपेक्षा रहती है। सामाजिक व राजनीतिक वातावरण समस्यामूलक उपन्यासों की रंगभूमि है। इसी वातावरण पर समस्या की गंभीरता निर्भर करती है। समस्या की जटिलता भी सामाजिक व राजनीतिक सीमाओं में ही आबद्ध रहती है तथा समस्या का हल भी इन्हीं सीमाओं के परिवर्तन या विकास पर निर्भर करता है। समस्यामूलक उपन्यासकार का कर्म ऐतिहासिक उपन्यासकार से भी अधिक बँधा हुआ है। जिस प्रकार ऐतिहासिक उपन्यासकार अपने उपन्यास की कथा को मनमाना रूप नहीं दे सकता; उसी प्रकार समस्यामूलक उपन्यासकार भी अपने प्रतिपाद्य समाज की स्थिति का वर्णन करते समय उसे अपनी इच्छानुकूल बदल नहीं सकता। जिस प्रकार की समस्या उपस्थित होती है, ज्यों-का-त्यों उसे ग्रहण करना पड़ता है, फिर समाजगत बाधाओं, मर्यादाओं तथा सीमाओं का परिचय कराता हुआ वह समयोचित और देशोचित हल निकालता है। प्रायः समस्याओं का उत्पन्न होना और उनका स्वरूप सामाजिक, पारिवारिक या राजनीतिक दशाओं पर निर्भर करता है। अतः समस्यामूलक उपन्यासकार को अपने समय के समस्त प्रकार के वातावरण की सम्पूर्ण जानकारी होनी चाहिए। समाज-शास्त्र, राजनीति, नीतिशास्त्र और इतिहास का विस्तृत वैज्ञानिक ज्ञान उसको होना चाहिए। हडसन लिखते हैं:

‘‘उपन्यासकार जीवन के जो भी क्षेत्र अपने लिखने के लिए चुने, उन्हें वह पूर्ण समझ के पश्चात् ही लिखना प्रारम्भ करे। यह समझ वर्ण्य-विषय के नैकट्य से प्राप्त हो सकती है।’’4

यह तथ्य समस्यामूलक उपन्यास के अन्तर्गत विशेष महत्त्व रखता है। समस्यामूलक-उपन्यास में कथा का विकास विशिष्ट दृष्टिकोण को लेकर होता है। उपन्यासकार का यहाँ उद्देश्य पाठकों का मनोरंजन करना नहीं होता। उसे तो यथार्थ की कठोर भूमि पर खड़े होकर अपनी कृति का निर्माण करना होता है। जिस समस्या को लेकर वह चलता है और उस समस्या को देखने का उसका जो दृष्टिकोण होता है उसी की पूर्ति-भावना को सामने रखकर वह कथा-सामग्री एकत्र करता है। इस कथा-सामग्री में कोई भी अनावश्यक घटना का समावेश नहीं होना चाहिए। अन्य घटनाओं के समावेश से प्रायः अन्य उपन्यासों की रोचकता बढ़ जाती है, पर समस्यामूलक-उपन्यासों में ऐसा करने से उसके प्रभाव की तीव्रता पर व्याघात होता है। समस्यामूलक उपन्यासकार अपने पाठक का ध्यान एक क्षण भी प्रतिपाद्य समस्या से हटाना नहीं चाहता। उसका मार्ग प्रशस्त राजपथ नहीं है; उसे सँकरी पगडंडी पकड़नी होती है और समस्याओं के बीहड़ जंगलों में काफ़ी गहरे पहुँचना होता है। उस पगडंडी के आस-पास या मध्य में जो कुछ है वह उसका है; उसके बाहर के क्षेत्र से उसे कोई सरोकार नहीं।

समस्यामूलक-उपन्यास कोई निबंध नहीं होता, वह कलात्मक रचना होती है। इसलिए उसके समस्या सम्बन्धी विचारों, प्रश्नों व जिज्ञासाओं के लिए अत्यधिक तीव्र व प्रभावशाली घटना की खोज ज़रूरी है। घटना साधारण होने पर समस्या उभर नहीं सकती। एक ही समस्या को लेकर नाना उपन्यासों की रचना की जा सकती है, पर उनकी सफलता-श्रेष्ठता बहुत-कुछ घटना पर निर्भर करती है। विषय वस्तु के चुनाव में समस्यामूलक-उपन्यासकार को बड़ा सजग रहना होता है, बिना इसके ऊँचे विचार और सूक्ष्म-दृष्टि का पूरा-पूरा उपयोग नहीं हो सकता।

कथा-वस्तु की स्वाभाविकता अनिवार्य है। उसके विकास-पथ का ग्राफ़ वक्र होता है। प्रारम्भ का अंश विस्तृत नहीं होता। मध्य-भाग में समस्या का उभार होता है और चरमोत्कर्ष जैसे उत्कर्ष कई आते हैं, द्वन्द्व की तीव्रता उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। और फिर प्रायः सभी पहलुओं के प्रकाशन के बाद उसका अंत हो जाता है। समस्यामूलक उपन्यासों का अन्त प्रायः आकस्मिक होता है। उपन्यासकार समस्या को रखता है, उसका विश्लेषण करता है, उसके कारणों पर प्रकाश डालता है; पर हल नहीं व्यक्त करता; सुझा भले ही दे। वह पाठकों को सोचने के लिए बाध्य करता है और उनकी विचार-शक्ति का बढ़ता है। कुछ समस्यामूलक उपन्यासकार हल भी व्यक्त करते हैं और उपन्यास का अन्त धीरे-धीरे कर, एक आदर्श समाज के सामने उपस्थित करते हैं। समस्याओं के हल का निर्देश यदि उपन्यासकार करता है तो वह उपन्यासकार के साथ-साथ नेता व विचारक का काम भी करता है। प्रेमचन्द साहित्यकार के लक्ष्य के सम्बन्ध में लिखते हैं:

‘‘वह देशभक्ति और राजनीति के पीछे चलने वाली सचाई ही नहीं, बल्कि उसके आगे मशाल दिखाती हुई चलने वाली सचाई है।’’5

वह समाज को बदलने के साथ-साथ उसके नव-निर्माण में भी योग देता है; पर, यहाँ उसके हल के व्यावहारिक और वैज्ञानिक होने का प्रश्न आता है; और यहीं पर उपन्यासकार के व्यक्तिगत मन्तव्यों, धारणाओं, विश्वासों आदि का परिचय मिलता है।

प्रत्येक उपन्यासकार का अपना उद्देश्य होता है। प्रायः यही देखा जाता है कि उपन्यासकार समस्याओं को अपने उद्देश्य की रोशनी में ही देखते हैं। उनका जीवन-दर्शन समस्याओं को देखने व उन्हें हल करने में सदैव आगे रहता है। लेखक का व्यक्तित्व ऐसे उपन्यासों में विशेष रूप से लक्षित होता है। वह सभी चीज़ों को अपने दृष्टिकोण से देखता है। पर, उसका दृष्टिकोण नितान्त वैयक्तिक रहता है। लेखक का व्यक्तित्व ऐसे उपन्यासों में विशेष रूप से लक्षित होता है। वह सभी चीज़ों को अपने दृष्टिकोण से देखता है। पर, उसका दृष्टिकोण नितान्त वैयक्तिक नहीं होना चाहिए। यदि उसने समस्याओं के प्रति अपना दृष्टिकोण सामाजिक चेतना व सामान्य आवश्यकताओं को सामने रखकर बनाया है तो उसकी कृति समाज के लिए स्वास्थ्यकर तथा उपयोगी सिद्ध होगी।

पात्रों के चरित्र-चित्रण का स्वरूप समस्यामूलक उपन्यासों में समस्याओं के साथ सम्पृक्त रहता है। पात्र इतने स्वतन्त्र नहीं हो सकते जितने चरित्र-प्रधान अथवा घटना-चरित्र-प्रधान उपन्यासों में। चरित्र-प्रधान उपन्यासों में लेखक का ध्यान पात्रों पर केन्द्रित रहता है, जब कि समस्यामूलक उपन्यासों में समस्याओं पर। कभी-कभी यह ध्यान इतना अधिक दे दिया जाता है कि पात्रों का स्वतन्त्र अस्तित्व तक ख़तरे में पड़ जाता है, वे उपन्यासकार की इच्छा पर नाचने लगते हैं- कठपुतली की तरह। यह एक दोष अवश्य है और प्रत्येक उपन्यासकार को इससे बचना चाहिए। समस्यामूलक उपन्यासकार को भी अतिरेक से बचना ज़रूरी है, क्योंकि उससे उसके उद्देश्य के कमज़ोर पड़ने की सम्भावना रहती है।

समस्यामूलक उपन्यास में कथोपकथन केवल कथा के विकास अथवा चरित्रांकन के दृष्टिकोण से ही नहीं रखे जाते वरन् समस्याओं का उद्घाटन करने, उनके कारणों आदि पर प्रकाश डालने के निमित भी होते हैं। लेखक उनके द्वारा अपने विचारों को भली-भाँति प्रकट करता है। संवाद प्रायः लम्बे हो जाते हैं। विचार-प्रधान तो वे होते ही हैं। पात्रों के मुख से लेखक अपने मन्तव्यों को सामने रखता चलता है। शेष उपन्यासों के समान उसका मूल उद्देश्य यह नहीं होता कि संवाद छोटे हों, कथा को आगे बढ़ाएँ, पात्रों की मनोवृत्तियों, स्वभाव आदि पर प्रकाश डालें आदि। अतः समस्यामूलक उपन्यासों में यह स्वाभाविक है कि संवाद कहीं लेख या भाषण का रूप धारण कर लेते हैं, क्योंकि उपन्यासकार का प्रयोजन ही वही होता है। कुछ आलोचक ऐसे संवाद वाले उपन्यासों पर प्रचार का आक्षेप लगाते हैं। प्रचार के अच्छे या बुरे होने के सम्बन्ध में दो मत हो सकते हैं। प्रचार के तत्त्व को अलग रख भी दें तो भी उनका आक्षेप संगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि समस्यामूलक उपन्यासकार का उद्देश्य उपयोगिता से सम्बन्ध रखता है। वह जानबूझकर उपन्यासों को प्रचार का माध्यम बनाता है। यदि यह दोष माना भी जाय तो भी उपन्यासकार की चेतनावस्था का जनक है, अतः वह तो अन्ततोगत्वा समस्यामूलक उपन्यास की टेकनीक का एक तत्व ही बन जाता है।

अन्त में समस्यामूलक-उपनयास ओर कला का क्या सम्बन्ध है?- प्रश्न शेष रहता है। कोई भी रचना बिना कलात्मक हुए प्रभावशाली नहीं हो सकती। कला की ओर से समस्यामूलक उपन्यासकार भी उदासीन नहीं रह सकता। कला-शून्य रचनाओं की अवधि क्षणिक होती है। वे पाठक को प्रभावित भी नहीं कर सकतीं। लेकिन कलात्मक-उपन्यासों और समस्यामूलक-उपन्यासों में भेद है। कलात्मक-उपन्यासों को कला के दृष्टिकोण से ही परखना चाहिए, जबकि समस्यामूलक उपन्यासों के विश्लेषण का आधार सामाजिक पृष्ठभूमि है। समस्यामूलक -उपन्यासों में कला रहती है; लेकिन उनका मूल्यांकन कला की दृष्टि से करना अवैज्ञानिक है। समस्यामूलक-उपन्यासकार यदि कहीं-कहीं कला की सीमाओं का उल्लंघन भी कर जाए तो वह अखरता नहीं है; क्योंकि ऐसे उपन्यास अपने उद्देश्य में इतने सुदृढ़ होते हैं कि उनका सामूहिक प्रभाव कलाभाव की पूर्ति कर देता है। वे हमें सोचने के लिए विवश करते हैं। उनका प्रभाव उपन्यास पढ़ लेने के बाद मिटता नहीं है। वे हमारी चेतना और सृजनात्मक-शक्ति को क्रियाशील करते हैं।

समाज अपनी समस्याओं से परिचित तो रहता ही है, सामाजिक-राजनीतिक नेता अपने भाषाणों के द्वारा उसे उन समस्याओं से संघर्ष करने के लिए उत्तेजित भी करते हैं, पर इसका सामाजिक पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना साहित्य के द्वारा। उपन्यासकार कथा के सहारे समस्याओं के सम्बन्ध में जो भी विचार व्यक्त करते हैं उनका सीधा असर समाज पर पड़ता है। स्पष्ट है, इस क्रिया में यहाँ कला का योग है, जिसे हम समस्यामूलक-उपन्यास की कला कहते हैं। पर यहाँ कला, प्रधान-पद पर आरूढ़ नहीं की जाती। उसका तो सहारा मात्र लिया जाता है। इस सहारे से उपन्यासकार के गहरे-से-गहरे विचार टिके रहते हैं और पाठक को अरुचि नहीं होती। वह उसकी टिप्पणियों को ध्यान से पढ़ता है। ऐसे ही उपन्यास समाज को बदलने की क्षमता रखते हैं।

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संदर्भ-सूची

1. हिन्दी-साहित्य का इतिहास, पृ. 535

2. कुछ विचार, पृ. 8

3. "Can a novelist remain indifferent to the problems of the world in

which he lives ? Can he shut his ears to the clamour of preparing war,

his eyes to the state of his country? Can he keep his mouth closed when

he sees horror around him and life being denied daily in the name of a

state pledged to maintain the sanctity of private greed? More and more

novelist are beigining to feel that eyes, yers and voice, are in fact.

Organs of senses, responsible to the stimulus of the human world, and

not mere passive servants of a spiritual world supposed traditinally to

be the domain of art."

‘The Novel and the People’ - Ralph Fox, page 7.

4. "Whatever aspects of life the novelist may choose to write about, he

should write them with the grasp and thoroughness which can be

secured only by familiarity with his materials."

‘An introduction to the Study of Literature' - William Henry Hudson. page 175

5 कुछ विचार, पृ. 17

समस्यामूलक उपन्यास और प्रेमचंद

प्रेमचंद ‘समस्यामूलक उपन्यसकार’ हैं अथवा नहीं, यह एक विवादास्पद प्रश्न है। स्वयं प्रेमचंद अपने को व्यक्ति-चरित्र का उपन्यासकार बता गये हैं –

“मैं उपन्यास को मानव-चरित्र का चित्र मात्र समझता हूँ। मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना और उसके रहस्यों को खोलना ही उपन्यास का मूल तत्त्व है।”1

कुछ आलोचक उन्हें सामाजिक उपन्यासकार घोषित करते हैं, मानों कि उनके उपन्यास मात्र सामाजिक विषयों तक ही सीमित हैं। प्रेमचंद को सामाजिक उपन्यासकार मान लेने पर भी समस्यामूलक उपन्यासकार की कोटि में रखा जा सकता है। पर, ‘सामाजिक’ शब्द प्रेमचंद की समस्त विशेषताओं का परिचायक नहीं है। उनके उपन्यासों में मात्र सामाजिक समस्याएँ ही नहीं उठायी गयी हैं। दूसरे ‘सामाजिक’ शब्द समस्या की एकान्तिकता का सूचक भी नहीं है।

प्रेमचंद के उपन्यास व्यक्ति-चरित्र के उपन्यास हैं, ऐसा मानकर स्वयं प्रेमचंद ही नहीं, प्रेमचंद-साहित्य के आलोचक भी चले हैं। यदि प्रेमचंद के उपन्यासों की यह कसौटी मान ली जाए तो वे साधारण कोटि के उपन्यासकार ठहरते हैं। और जैसा हुआ भी है, प्रेमचंद के आलोचकों ने इसी आधार पर उनके उपन्यासों का मूल्यांकन किया है एवं उनकी चरित्रांकन की दुर्बलताओं पर पर्याप्त प्रकाश डाला है।

प्रेमचंद के पात्र जगह-जगह कठपुतली के समान क्रिया-कलाप करते हैं – आलोचकों ने शास्त्रीय आलोचना-सिद्धान्तों के आधार पर प्रेमचंद में यह एक बड़ा दोष बताया है। कुछ अंशों में बात है भी ऐसी। यह दोष उस स्थिति में और भी उभर आता है जब स्वयं प्रेमचंद मानव-चरित्र पर प्रकाश डालना उपन्यास का मुख्य तत्त्व बताते हैं।

फिर भी प्रेमचंद के उपन्यास बड़े लोकप्रिय हैं। विश्व-उपन्यासकारों की प्रथम पंक्ति में उनका स्थान है। ‘मुख्य तत्त्व’ म्रें दुर्बल होते हुए भी उनके उपन्यास इतने प्रभावाशाली कैसे बन गये? वह कौन-सा रहस्य है जो उनकी प्रसिद्धि के लिए उत्तरदायी है? चरित्रांकन की दृष्टि से तो उनमें पर्याप्त दुर्बलताएँ हैं। अत: प्रेमचंद के उपन्यास व्यक्ति-चरित्र के उपन्यास नहीं कहे जा सकते। उनमें व्यक्ति-चरित्र से भी प्रमुख व बड़ी कोई और ही चीज़ है। स्पष्ट है, वह चीज़ उनके उपन्यासों में पायी जाने वाली ‘समस्या’ है। पाठक ‘समस्या’ पर अपना ध्यान केन्द्रित रखता है। अत: अन्य अभावों की ओर उसका ध्यान नहीं जाता। चरित्रांकन की दृष्टि से दुर्बल होते हुए भी समस्या की उपस्थिति उपन्यास को रोचक बनाए रखती है।

प्रेमचन्द अपने उपन्यासों में केवल समस्याएँ ही प्रस्तुत नहीं करते वरन् उनका हल भी प्रस्तुत करते हैं। पर, यह आवश्यक नहीं कि उन्होंने सदैव हल सुझाया हो। डा॰ विनयमोहन शर्मा के शब्दों में :

“वे समाज-व्यवस्था पर एक हाथ से प्रहार करते और दूसरे हाथ से उसको सहलाते थे। समाज की बुराइयों को प्रस्तुत करना ही वे अपना धर्म न मानते थे, प्रत्युत उनका हल खोजना भी वे आवश्यक समझते थे।”2

प्रेमचन्द के उपन्यासों के मूल्यांकन की यह दूसरी कसौटी है। इस आधार पर उन्हें समस्यामूलक उपन्यासकार मानकर चला जाता है, जहाँ प्रमुख तत्व समस्याओं को रखना व उनका हल प्रस्तुत करना रहता है। उपन्यास के अन्य तत्व गौण रूप में आते हैं।

समस्यामूलक उपन्यासकार आदर्शवादी या यथार्थवादी होते हैं या जैसे कि प्रेमचन्द थे - आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी हो सकते हैं। वस्तुतः समस्यामूलक उपन्यासकार को यथार्थवादी अथवा आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी ही होना चाहिए। आदर्शवादी समस्याओं का कोई व्यावहारिक हल प्रस्तुत कर सकेगा, यह विश्वसनीय कम है। समस्यामूलक उपन्यासकार की सफलता उसके व्यावहारिक दृष्टिकोण पर ही निर्भर करती है।

प्रेमचन्द के प्रायः सभी उपन्यासों में कोई-न-कोई प्रमुख समस्या मिलती है। प्रमुख समस्या के साथ-साथ अन्य समस्याओं की झलक भी प्रायः प्रत्येक उपन्यास में विद्यमान है।

वरदान

‘वरदान’ प्रेमचन्द की प्रारम्भिक कृति है। इसका रचनाकाल 1902 है, यद्यपि प्रकाशन ‘सेवासदन’ (1916) के बाद हुआ। ‘वरदान’ के पूर्व प्रेमचन्द ने एक छोटा-सा उपन्यास ‘कृष्णा’ लिखा जो इण्डियन प्रेस, प्रयाग से छपा था। यह उनके विद्यार्थी-जीवन की रचना है।

‘वरदान’ यद्यपि 1902 में लिखा गया था, लेकिन ‘सेवासदन’ के बाद प्रकाशित होने के कारण उसकी प्रारम्भिकता अछूती नहीं ही रह सकी होगी। कृति में आधारभूत परिवर्तन तो, निश्चय ही, नहीं किये जाते, लेकिन इतने समय के अन्तराल के कारण उस पर एक अनुभवी लेखक का हाथ तो अवश्य चला होगा। यह सब होते हुए भी, यह भी मानना पड़ेगा कि इस कार्य में प्रेमचन्द ने कोई विशेष रुचि नहीं ली होगी ; क्योंकि इसमें अनेक साधारण भूलें रह गई हैं। यथा इलाहाबाद में ट्रामें चलवाना अथवा थानेदार का एक ही रस्सी से सारे गाँव को बँधवा देना आदि।

प्रश्न यह है कि क्या ‘वरदान’ समस्यामूलक उपन्यास है ? यदि हाँ, तो उसमें कौन-सी समस्या प्रमुख है एवं गौण रूप में कौन-कौन-सी समस्याओं का उसमें प्रवेश हुआ है ?

कहना न होगा कि ‘वरदान’ न तो समस्यामूलक उपन्यास है और न उसमें किसी प्रमुख समस्या का ही समावेश किया गया है। वास्तव में ‘वरदान’ कथानक-प्रधान उपन्यास है, लकिन कथानक की दृष्टि से भी वह सफल नहीं है। उसमें घटनाओं का घटाटोप मिलता है। कथा-वस्तु न सजीव है और न सुव्यवस्थित। इसका कारण प्रेमचन्द का समस्या-प्रेम है। ‘वरदान’ में बीज रूप में प्रेमचन्द का समस्याओं के प्रति रुझान स्पष्ट रूप से व्यक्त हुआ है। समस्याओं के प्रति यह रुझान ही ‘वरदान’ को न तो कथानक की दृष्टि से और न चरित्रांकन की दृष्टि से सफल उपन्यास बनने देता है। इसी कारण कुछ आलोचकों को “‘वरदान’ बिलकुल हवा में उड़ता हुआ दीखता है।”3

डा॰ रामरतन भटनागर ‘प्रेमचन्द : आलोचनात्मक अध्ययन’ में लिखते हैं, “कथा-संगठन और चरित्र-चित्रण दोनों दृष्टि से ‘वरदान’ असफल उपन्यास ही कहा जाएगा। जिस प्रकार की प्रेम-कहानियों की धूम उन्ननीसवीं शताब्दी के अन्तिम दो दशकों और बीसवीं शताब्दी के पहले दशक में थी, उनसे यह उपन्यास ज़रा भी भिन्न नहीं है। कथा-संगठन शिथिल है और उसमें कलात्मकता को विशेष स्थान नहीं मिल सका है। स्वयं कथा इतनी लम्बी है कि पाठक ऊब जाते हैं। न कथा-रस का विकास ही सम्भव है, न चरित्र-चित्रण का।“4

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दो दशकों और बीसवीं शताब्दी के पहले दशक की प्रेम-कहानियों से डा॰ रामरतन भटनागर ‘वरदान’ की समता बताते हैं और आगे चलकर उसके कथा-शैथिल्य और पाठक के ऊब जाने की बात कहते हैं। यहाँ आलोचक स्वयं अपने मत का खण्डन कर देते हैं और उन प्रेम-कहानियों का ‘वरदान’ से अन्तर भी स्पष्ट कर देते हैं। उपर्युक्त काल की प्रेम-कहानियाँ पाठक को उबाती नहीं हैं, जबकि ‘वरदान’ के कथानक में यह कमज़ोरी है। वास्तव में प्रेमचन्द उन्नीसवी-बीसवीं शताब्दी के उपरिलिखित काल जैसी प्रेम-कहानियाँ लिखना नहीं चाहते थे। ‘वरदान’ में तो वे उस परम्परा को तोड़कर एकदम नये क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं, जिसके कारण ‘वरदान’ का कोई रूप स्थिर न हो सका है।

‘कथाकार प्रेमचन्द’ में श्री मन्मथनाथ गुप्त और रमेन्द्र वर्मा लिखते हैं, “मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विरजन का चरित्र बिल्कुल हवा में उड़ता हुआ है। उसमें कोई सिर-पैर है ही नहीं। प्रताप का चरित्र बहुत कुछ निभा है पर अन्त में जाकर वह भी बिगड़ जाता है।”5 जब कथावस्तु की दृष्टि से ही ‘वरदान’ असफल कृति ठहरती है, तब चरित्र-चित्रण के क्षेत्र में उसमें कोई महत्त्वपूर्ण बात खोजना दुराशा मात्र है।

‘वरदान मध्यवर्गीय जीवन से सम्बन्ध रखता है। शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय के ‘देवदास’ की कथा ‘वरदान’ से बहुत कुछ मिलती-जुलती है। मन्मथनाथ गुप्त उपर्युक्त दोनों उपन्यासों के विषय-साम्य पर लिखते हैं, “ एक युवक का एक युवती से प्रेम होता है। किसी कारण से, सामाजिक कारण से दोनों का विवाह नहीं हो पाता। लड़की का विवाह दूसरे व्यक्ति से हो जाता है। इसके बाद क्या जटिलताएँ उत्पन्न होती हैं, यही इन दोनों पुस्तकों में दिखलाया गया है।”6

सामाजिक बाधाओं के कारण प्रताप और विरजन का प्रेम वैवाहिक बन्धनों में नहीं बँध पाता। प्रताप संन्यासी हो जाता है और विरजन दुश्चरित्र युवक कमलाशंकर से ब्याह दी जाती है।

यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से वैवाहिक समस्या सामने आ जाती है। डा॰ रामरतन भटनागर शरत्चन्द्र चट्टोपाध्याय के ‘देवदास’ से तुलना करते समय इस ओर स्पष्ट संकेत करते हैं, “शरत्चन्द्र के देवदास और अन्य उपन्यासों में असफल प्रेम नायक को आवारा और आत्मघाती बना देता है। प्रेमचन्द ने असफल प्रेम का समाज-सेवा और राजनीति निष्ठा में पर्यवसान किया है। मनोविज्ञान की दृष्टि से दोनों में कोई भेद नहीं है, परन्तु समाज-हित की दृष्टि से समस्या का प्रेमचन्द द्वारा उपस्थित किया हल अधिक स्वस्थ है।”7

इस कृति में वैवाहिक समस्या की ओर प्रेमचन्द पाठकों का ध्यान उपन्यास- कला की हत्या करके भी आकर्षित करना चाहते हैं :

“मुंशीजी के अगणित बांधव इसी भारतवर्ष में अब भी विद्यमान हैं जो अपनी प्यारी कन्याओं को इसी प्रकार नेत्र बन्द करके कुएँ में ढकेल दिया करते हैं।”8 और आगे चलकर जब विरजन विधवा हो जाती है तब प्रेमचन्द की आँखों के सामने वैधव्य की समस्या नाचने लगती है। कथानक और चरित्र-चित्रण की ओर तो वे ध्यान ही नहीं देते।

इसके अतिरिक्त उन्नीस पृष्ठों में ‘कमला के नाम विरजन के पत्र’ नामक परिच्छेद का उद्देश्य समझने पर यह बात और स्पष्ट हो जाती है। प्रेमचन्द ने इन पत्रों का विषय व्यक्तिगत जीवन नहीं रखा है। पति-पत्नी के पत्र-व्यवहार का कोई रूप उसमें नहीं मिलता। इसके विपरीत उन पत्रों में ग्रामीण जीवन की समस्याएँ बड़ी प्रमुखता से वर्णित की गई हैं। समस्याओं के प्रति प्रेमचन्द का रुझान प्रारम्भ से ही था, यह इन पत्रों की विषय-सामग्री से भली-भाँति समझा जा सका है। यही रुझान ‘वरदान’ में प्रेमचन्द को ‘तीसरे दर्ज़े का उपन्यासकार’ बनाता है।

शैक्षणिक पहलू पर भी ‘वरदान’ में यत्र-तत्र महत्त्वपूर्ण बातें बिखरी हुई हैं।

प्रतिज्ञा

प्रतिज्ञा का प्रकाशन 1905-6 में हुआ। ‘प्रतिज्ञा’, प्रेमा’ (1904-5) का परिवर्द्धित रूप है, जिसका उर्दू में ‘हम खुरमा व हमसबाब’ नाम से पहले प्रकाशन हो चुका था। ‘प्रेमा’ का नाम आगे चलकर ‘विभव’ रखा गया, जिसमे कुछ परिवर्तन भी किये गये। यही उपन्यास परिवर्तनों और परिवर्द्धनों के पश्चात् ‘प्रतिज्ञा’ के नाम से प्रकाशित हुआ; जिसका उर्दू-अनुवाद ‘बेवा’ के नाम से हुआ है।

‘प्रतिज्ञा’ में विधवाओं, पति-पत्नी के पारिवारिक सम्बन्धों और अछूतों की समस्या पर लिखा गया है।

प्रेमचन्द का दूसरा विवाह श्रीमती शिवरानी देवी से 1905 में हुआ। सामाजिक दृष्टिकोण से इसे विधवा-विवाह ही कहा जाएगा ; भले ही शारीरिक व मानसिक दृष्टि से उसे ‘विधवा-विवाह’ की संज्ञा न दी जाए। शिवरानी देवी अपनी पुस्तक ‘प्रेमचन्द : घर में’ लिखती हैं, “मेरी पहली शादी ग्यारहवें साल में हुई थी। वह शादी कब हुई, इसकी मुझे ख़बर नहीं। कब मैं विधवा हुई, इसकी भी मुझे ख़बर नहीं। विवाह के तीन-चार महीने बाद ही विधवा हुई। इसलिए मुझे विधवा कहना मेरे साथ अन्याय होगा ; क्योंकि जो बात मैं जानती ही नहीं, वह मेरे माथे मढ़ना ठीक नहीं।”9

प्रथम विवाह के बारे में प्रेमचन्द और शिवरानी देवी का संवाद इस प्रकार है : “फिर मेरी स्त्री की विदाई का समय आया। कई रोज का अरसा हो गया था। ऊँटगाड़ी से लाना पड़ा। जब हम ऊँटगाड़ी से उतरे, मेरी स्त्री ने मेरा हाथ पकड़कर चलना शुरू किया। मैं उसके लिए तैयार न था। मुझे झिझक मालूम हो रही थी। उमर में वह मुझसे ज़्यादा ही थी। जब मैंने उसकी सूरत देखी तो मेरा खून सूख गया।”10

“वह बदसूरत तो थी ही। उसके साथ-साथ जबान की भी मीठी न थी। यह इन्सान को और भी दूर कर देता है।”11

“मैंने उनको उनके घर पहुँचा दिया और खुद अपने यहाँ रह गया।”12

“मेरी बारात आई। मेरे पिता को मालूम हुआ कि मेरी बीवी बहुत बदसूरत है। बेहयाई की हरक़त उन्होंने बाहर ही देख ली। यह शादी मेरी चाची के पिता ने ठीक की थी। पिताजी चाची से बोले - लालाजी ने मरे लड़के को कुएँ में ढकेल दिया। अफ़सोस ! मेरा गुलाब-सा लड़का और उसकी यह स्त्री ! मैं तो उसकी दूसरी शादी करूंगा। चाची ने कहा, देखा जायेगा।...

चाची मेरी पत्नी पर शासन करती थीं।... अगर बीच में चाची न होतीं तो शायद मेरी-उसकी ज़िन्दगी बीत भी जाती।”13

यह घटना 1904 की है। अभिप्राय यह है कि इन दिनों प्रेमचन्द का जीवन वैवाहिक गुत्थियों में उलझा हुआ था। पहली पत्नी से न पटने के कारण उसे अकाल ‘वैधव्य’ के भँवर में छोड़कर प्रेमचन्द अपने भावी जीवन को सुचारु ढंग से चलाने के लिए दूसरे विवाह का आयोजन करते हैं। इस मनःस्थिति में विधवा की समस्या सबसे प्रखर रूप में उनके सामने थी। वास्तव में, विधवा-विवाह विधवाओं की समस्या के हल की दिशा में एक प्रभावशाली क़दम है। प्रेमचन्द क्यांकि ‘विधुर’ दशा में थे, उन्होंने विधवा-विवाह का निश्चय किया और आगे चलकर बाल-विधवा सुश्री शिवरानी देवी से विवाह कर लिया; जो सामाजिक दृष्टिकोण से तत्कालीन समाज में एक क्रांतिकारी घटना थी। पहली पत्नी के मायके वे मासिक रुपया भेजते रहे।

व्यक्तिगत और समाजगत जीवन में विधवा-समस्या का सामना प्रेमचन्द को करना पड़ा। इसी समस्या को उन्होंने ‘प्रतिज्ञा’ में लिया। विधवा-समस्या ही ‘प्रतिज्ञा’ की प्रमुख समस्या है; यद्यपि इसमें दाम्पत्य जीवन के अनेक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है।

अछूतों की समस्या को भी प्रस्तुत उपन्यास में स्थान दिया गया है, यद्यपि कथा-विकास की दृष्टि से उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी। ‘सनातन धर्म पर आघात’ विषय पर दाननाथ का भाषण अछूतों के सम्बन्ध में ही है।

प्रेमचन्द ने ‘प्रतिज्ञा’ में विधवा-समस्या को शरत्चन्द की तरह मात्र प्रस्तुत ही नहीं किया है वरन् उसके निराकरण के लिए उपाय भी प्रस्तुत किये हैं। सामाजिक सुधार की भावना प्रेमचन्द में सबसे अधिक थी। ‘प्रतिज्ञा’ की समीक्षा निश्चित औपन्यासिक रचना-तन्त्र के सिद्धान्तों पर नहीं की जा सकती। उसमें विधवाओं के उद्धार की समस्या इतनी प्रधान है कि चरित्रांकन, वस्तु-विन्यास इत्यादि सभी उसी के आश्रित होकर आते हैं।

सेवासदन

‘सेवासदन’ का रचनाकाल सन् 1916 है। यह उपन्यास प्रेमचन्द की प्रौढ़ रचनाओं में से है। ‘सेवासदन’ समस्यामूलक उपन्यास है, जिसमें नारी-जीवन से सम्बन्धित समस्याओं को उपस्थित किया गया है, यथा, भारतीय नारी की पराधीनता, दहेज़-प्रथा, वेश्या-समाज आदि। नारी-जीवन सम्बन्धी प्रधान समस्या के अतिरिक्त अन्य पहलुओं पर भी ‘सेवासदन’ में प्रेमचन्द ने विचार किया है, जैसे नागरिक-जीवन, किसान आदि।

सुमन ‘सेवासदन’ की नायिका है। सम्पूर्ण उपन्यास उसी के चरित्र की ओर घूमता है, मुड़ता है। लेकिन ‘सेवासदन’ में समस्या को प्रधानता दी गई है, चरित्रांकन को नहीं। इसी कारण प्रेमचन्द सुमन की मानसिक स्थिति का विश्लेषण नहीं करते। सुमन के चरित्र का अन्दर्द्वन्द्व प्रेमचन्द छोड़ जाते हैं, क्योंकि उनका अभीष्ट भारतीय नारी की पराधीनता-जनित विभिन्न समस्याओं का उद्घाटन करना था; न कि व्यक्ति-चरित्र का चित्रण। सुमन का व्यक्तित्व इसी लिए दबा रहता है। वह भारतीय नारी-वर्ग की प्रतीक बनकर उपन्यास में प्रवेश करती है।

‘सेवासदन’ की समीक्षा करते हुए श्री. मन्मथनाथ गुप्त लिखते हैं, “इस उपन्यास का सबसे कमज़ोर, शिथिल और असम्बद्ध हिस्सा वह है जिसमें म्युनिसिपैलिटी के सदस्यों की तथा अन्य सार्वजनिक वक्ताओं की तथा उनकी तर्कों की बात चित्रित है। यह हिस्सा बहुत कुछ उखड़ता हुआ तथा मुख्य कथानक से अपरिहार्य रूप से सम्बद्ध नहीं ज्ञात होता।”14

इस विषय पर पं॰ नन्ददुलारे वाजपेयी अपनी ‘प्रेमचन्द : साहित्यिक विवेचन’ नामक पुस्तक में लिखते हैं :

“म्युनिसिपैलिटी की कार्रवाइयाँ, उनकी बहसें और प्रस्ताव आदि सुमन की मुख्य कथा से अच्छी तरह ग्रथित नहीं हैं, यद्यपि वे उपन्यास में आई हुई वेश्या-सुधार की समस्या से सम्बन्धित अवश्य हैं। यदि म्युनिसिपैलिटी के ये सारे वृत्तान्त सुमन की कहानी से और अधिक संश्लिष्ट सम्बन्ध रख पाते, तो उपन्यास की कथा अधिक समन्वित और अर्थपूर्ण होती।”15

यह प्रसंग 43 वें परिच्छेद का है। निःसन्देह औपन्यासिक रचना-तन्त्र की दृष्टि से इसका समावेश कथानक के विकास में कोई योग नहीं देता। लेकिन प्रेमचन्द औपन्यासिकता के निश्चित शास्त्रीय सिद्धान्तों के इतने क़ायल न थे। उपन्यास-कला तो उनके लिए समस्याओं के प्रभावशाली ढंग से उपस्थित करने की साधन मात्र थी। यदि इस प्रंसग का समावेश नहीं किया जाता तो नगर-जीवन की समस्या पर प्रकाश नहीं पड़ पाता, दूसरे वेश्या-समाज की व्यवस्था का उत्तरदायित्व म्युनिसिपैलिटी का है। म्युनिसिपैलिटी के सदस्य यदि चरित्रवान और कर्मठ हों तो इस सामाजिक कुरीति को दूर करने में बहुत महत्त्वपूर्ण भाग ले सकते हैं। वेश्या-समस्या पर गम्भीर बहस को रखने में प्रेमचन्द का यही उद्देश्य समझना चाहिये।

इस प्रकार 31 वें परिच्छेद में उस साधु के भाषण का उद्देश्य भी यही है जो सदन में विवाह के अवसर पर आकस्मिक रूप से प्रवेश करता है।

‘सेवासदन’ का महत्त्व इसलिए और बढ़ जाता है कि वह हिन्दी का सर्वप्रथम मौलिक समस्यामूलक उपन्यास है। हिन्दी उपन्यास-साहित्य में वह युगान्तर उपस्थित करता है।

प्रेमाश्रम

‘प्रेमाश्रम’ का प्रकाशन सन् 1922 में हुआ। प्रस्तुत उपन्यास में प्रमुख समस्या ‘भूमि-समस्या’ है। किसान और जमींदार के संघर्ष का चित्रण ही ‘प्रेमाश्रम’ का केन्द्र-बिन्दु है। वर्ग-संघर्ष को इतने यथार्थ रूप में उपस्थित करने वाला यह प्रथम उपन्यास है। ‘प्रेमाश्रम’ में जहाँ कहीं भी अन्य समस्याओं का उल्लेख है वह सब भूमि-व्यवस्था के उद्घाटन अथवा उसके जटिल रूप को सामने रखने के निमित्त है। ‘प्रेमाश्रम’ का राजनीतिक पहलू प्रधान नहीं है। डा॰ रामरतन भटनागर ने ‘प्रेमाश्रम’ को हिन्दी का ही नहीं वरन् भारत का पहला राजनीतिक उपन्यास कहा है।16 राजनीतिक स्वाधीनता भूमि-समस्या का आंशिक हल है। वस्तुतः भूमि-समस्या की नींव में समाज-व्यवस्था एवं आर्थिक पहलू ही प्रमुख है। प्रस्तुत उपन्यास की आत्मा (भूमि-समस्या) को न पहचानकर आलोचकों ने अन्य बातों को प्रधानता दे दी है। ‘प्रेमाश्रम’ में राजनीति का मात्र पृष्ठभूमि का स्थान है, क्योंकि बिना राजनीतिक चेतना के वर्ग-संघर्ष में तीव्रता नहीं आ सकती। तत्कालीन भारत की राजनीतिक चेतना की भूमिका में ‘प्रेमाश्रम’ का निर्माण किया गया है, किन्तु उसकी रीढ़ तो भूमि-समस्या ही है। अतः ‘प्रेमाश्रम’ भी समस्यामूलक उपन्यास है। समस्या या समस्याओं को प्रधानता देने के कारण ‘प्रेमाश्रम’ का ‘कला-पक्ष’ कमज़ोर हो गया है। शास्त्रीय पद्धति को आलोचना का मापदण्ड मानने वाले आलोचकों को उसमें अनेक दोष दिखाई देंगे। श्री. शिवनारायण श्रीवास्तव ‘प्रेमाश्रम’ के पात्रों के संबंध में लिखते हैं,‘‘ ‘प्रेमाश्रम’ के सभी पात्रों में हम देखते हैं कि उनके चरित्र पर नवीन घटनाओं की प्रतिक्रया बहुत होती है। वे मानो बने-बनाए पात्र हैं जो अपनी इच्छा-शक्ति से घटनाओं का निर्माण तो करते चलते हैं, परन्तु उसमें बँधते नहीं।”17 डा॰ रामविलास शर्मा ने भी इस ओर संकेत किया है, “ ‘प्रेमाश्रम’ उपन्यास के साधारण नियमों को तोड़कर रचा गया है। कौन है इसका नायक, कौन है इसकी नायिका ? जिन आलोचकों ने ‘प्रेमाश्रम’ में नायक न होने पर खेद प्रकट किया है, उनके कथानक की शिथिलता दिखलाकर प्रेमचन्द को घटिया कलाकार माना है, उसमें मनोविज्ञान की गहराई या तलछट न पाकर प्रेमचन्द को विश्व साहित्यकार के पद से वंचित कर दिया है, उन्हें प्रेमचन्द ने एक वाक्य में उत्तर दिया था “आज़ाद रौ आदमी हूँ, मसलेहतों का गुलाम नहीं।”18

बड़े कलाकार अपने क़ायदे-क़ानून खुद बनाते हैं। प्रेमचन्द भी क़ायदे पढ़कर उपन्यास लिखने न बैठते थे। ‘प्रेमाश्रम’ में वे उन किसानों की ज़िन्दगी की तस्वीर खींचना चाहते थे। जिन्हें साहित्य के लक्षण-ग्रंथों में जगह न मिलती थी। वे उस अत्याचार और अन्याय की कहानी सुनाना चाहते थे जिसे उपक्रम, उपसंहार, प्रयोजन और उत्पत्ति की चर्चा करने वाले सज्जन अक़्सर भूल जाया करते थे।”19

निःसन्देह, प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों में शास्त्रीयता को कोई महत्त्व नहीं दिया है। पर, दूसरी ओर यह भी सच है कि उन्होंने कोई नये क़ायदे-क़ानून भी नहीं गढ़े। वे तो कथा के माध्यम से अपने समय की विभिन्न समस्याओं का उद्घाटन करना चाहते थे। ‘उपन्यास’ उनका एक साधन था। लेकिन आकर्षक कथा के आवेश में आकर उन्होंने मूल समस्या को कहीं भी दृष्टिक्षेप नहीं किया। समस्या ही स्वयं में इतना आकर्षण उत्पन्न कर लेती है कि औपन्यासिक कला के अन्य तत्त्व आँखों से ओझल हो जाते हैं। समस्यामूलक उपन्यासकार होने के ही कारण प्रेमचन्द के उपन्यासों में तथाकथित ‘कला’ के दर्शन नहीं होते।

‘प्रेमाश्रम’ में भूमि-समस्या के अतिरिक्त अन्य समस्याओं को भी सामने रखा गया है, लेकिन उनमें उल्लेखनीय हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य की समस्या ही है। हिन्दू और मुसलमानों के संघर्ष का कोई आर्थिक, सांस्कृतिक अथवा धार्मिक कारण नहीं है। साम्राज्यवादी शक्तियों ने अपना उल्लू सीधा करने के उद्देश्य से इस प्रश्न को जटिलतर बनाने के भरसक प्रयत्न किये। प्रेमचन्द ने ‘प्रेमाश्रम’ में हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष के मूल कारणों पर पर्याप्त प्रकाश डाला है। इस प्रकार ‘प्रेमाश्रम’ हिन्दी- साहित्य में तत्कालीन ज्वलन्त समस्याओं के प्रति एक नवीन दृष्टिकोण लेकर हमारे सामने आता है।

निर्मला

‘निर्मला’ का रचनाकाल’ सन् 1923 और प्रकाशन-तिथि सन् 1927 है। ‘निर्मला’ एक छोटा उपन्यास है, किन्तु समस्या के उद्घाटन और प्रभाव की दृष्टि से प्रेमचन्द के प्रथम श्रेणी के उपन्यसों में से है। प्रेमचन्द का यह पहला दुखांत उपन्यास है।

कुछ आलोचकों ने ‘निर्मला’ को मनोवैज्ञानिक उपन्यास की कोटि में रखा है, यद्यपि वे उसकी समस्यामूलकता को भी स्वीकार करते हैं। ‘निर्मला’ की समस्या प्रेमचन्द के अन्य उपन्यासों से अधिक स्पष्ट है। डा॰ रामविलास शर्मा ने ‘निर्मला’ में मनोविज्ञान को प्रधानता देने वाले समीक्षकों के विचारों का विश्लेषण करते हए लिखा है, “कल्याणी और सुधा जैसी नारियाँ हिन्दी उपन्यासों और नाटकों की उन तमाम महिलाओं से भिन्न हैं जो व्यभिचारी पति के चरणों कों आँसुओं से तर कर देती हैं और उसके अन्याय का प्रतिकार करने की बात भी नहीं सोचतीं। वे विशेष रूप से शरत् बाबू की देवियों से भिन्न हैं जो अधिकतर अपने दुःख में घुट-घुटकर मरना पसन्द करती हैं; लेकिन समाज का खुला विरोध नहीं करतीं। प्रेमचन्द अपने उपन्यासों में नए ढंग से नारी पात्रों को रच रहे थे जो अन्याय और दुःख सहती हैं ; लेकिन उनका विरोध भी करती हैं। यदि नारी घुट-घुटकर मरा करे और सामाजिक रुकावटों का विरोध न करे तो कुछ लोग इसे बहुत गम्भीर मनोविज्ञान समझते हैं। वास्तव में उससे उनके सामन्ती संस्कारों को सन्तोष होता है।”20

‘निर्मला’ की प्रमुख समस्या नारी-समस्या है; जिसके निम्नलिखत चार पहलू हैं - दहेज़-प्रथा, दोहाजू से विवाह अथवा वृद्ध-विवाह, विवाहित नारी की समस्या और विधवा-समस्या। इन सभी समस्याओं का केन्द्र दहेzज़-प्रथा अथवा आर्थिक व्यवस्था है, जिसका नारी की आर्थिक पराधीनता से भी गहरा सम्बन्ध है। सामाजिक और आर्थिक ढाँचे को बदले बिना वैवाहिक-समस्या सुलझ नहीं सकती। प्रेमचंद ने प्रस्तुत उपन्यास में ‘सेवासदन’ अथवा ‘प्रेमाश्रम’ की तरह समस्या का हल किसी आश्रम की व्यवस्था करके प्रस्तुत नहीं किया है। निर्मला मध्यवर्गीय हिन्दू समाज की प्रतिनिधि दलित नारी बनकर हमारे सामने आती है। अतः उसकी समस्या वैयक्तिक नहीं है और न पूर्व की भाँति उसका कोई वैयक्तिक हल ही प्रेमचन्द ने सुझाया है।

रंगभूमि

‘रंगभूमि’ का प्रकाशन सन् 1924-25 में हुआ। अन्य उपन्यासों की भाँति ‘रंगभूमि’ में भी अनेक समस्याएँ मिलेंगी। डा॰ रामरतन भटनागर ने जैसा लिखा है, “वास्तव में ‘रंगभूमि’ में स्वतन्त्रता-पूर्व भारत की सारी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्याएँ आ जाती हैं। ऐसी विशद चित्रपटी भारतवर्ष के किसी उपन्यासकार ने ग्रहण नहीं की।”21 ‘रंगभूमि’ का केनवस विशाल है, इसमें सन्देह नहीं, लेकिन उसमें स्वाधीनता-पूर्व भारत की समस्त आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्याओं का समावेश है, इस बात में पर्याप्त अतिरंजना है। वास्तव में ‘रंगभूमि’ में दो समस्याएँ ही प्रधान हैं। एक तो औद्योगीकरण की समस्या और दूसरी भारतीय रियासतों की समस्या। ‘रंगभूमि’ में इन दो ही समस्याओं पर प्रेमचन्द की दृष्टि केन्द्रित है। ‘रंगभूमि’ का समस्त कथानक इन्हीं समस्याओं को आधार बनाकर खड़ा किया गया है।

शास्त्रीय पद्धति के आलोचकां को ‘रंगभूमि’ के कथानक तत्त्व में दुर्बलताएँ दिखाई देती हैं। पं॰ नन्ददुलारे वाजपेयी ‘रंगभूमि की वस्तु-विवेचना करते हुए लिखते हैं :

“छोटी-छोटी घटनाओं को लेकर लम्बे-लम्बे अध्याय लिखे गए हैं जिससे कथा-वस्तु आवश्यकता से अधिक लम्बी हो गई है। समस्त मुख्य घटनाओं को लेकर प्रस्तुत आकार से आधे में सारा उपन्यास लिखा जा सकता था।”22 “प्रेमचन्द जी ने कथा-चयन करते हुए इस संयमशीलता को अपने ध्यान में नहीं रक्खा। वे बहुत अनावश्यक रीति से ग्रामीण घटनाओं का वर्णन करते गए हैं।”22 लेकिन प्रेमचन्द के लिए ग्रामीण घटनाओं का वर्णन-विस्तार अनावश्यक नहीं था; वरन् वे तो उसे प्रमुख मानकर चले हैं। यदि इन स्थलों को उपन्यास में से निकाल दिया जाय तो उसकी समस्त गरिमा ही जाती रहेगी। प्रेमचन्द का मूल उद्देश्य तो यहीं अन्तर्निहित है।

‘रंगभूमि’ सन्’ 28 के आन्दोलन के पूर्व लिखा गया है; अतः उस पर गांधीवादी दर्शन की स्पष्ट छाप है। असहयोग के आदर्शों की छाया सर्वत्र मिलती है। श्री मन्मथनाथ गुप्त ने ‘रंगभूमि पर एक नई दृष्टि’ नामक परिच्छेद में एक नई खोज की है। ऐसी वस्तु की खोज जिससे स्वयं लेखक-प्रेमचन्द अनभिज्ञ थे। तर्क के आधार पर, श्री. मन्मथनाथ गुप्त के विचार स्पष्ट और मानने योग्य हैं, लेकिन उनसे ‘रंगभूमि’ का सही मूल्यांकन नहीं हो सकता ; क्योंकि प्रेमचन्द की गांधीवाद पर आस्था भंग नही हुई थी। वे तो सच्चे हृदय से गांधीवादी आदर्शों की प्रतिष्ठा कर रहे थे। प्रेमचन्द के वैचारिक मोड़ का आभास तो काफ़ी आगे चलकर दिखाई देता है। हाँ, यह कहा जा सकता है कि प्रेमचन्द गांधीवादी दर्शन को ‘रंगभूमि’ में सफल ढंग से प्रस्तुत नहीं कर सके और इस कारण श्रद्धा होते हुए भी, अनजाने में, अनेक असंगतियों को चित्रित कर गए हैं। सूरदास गांधी के समान अति मानवीय स्तर तक नहीं पहुँच सका है, पद्यपि वह उनके अत्यधिक निकट अवश्य है। उसे गांधी का लघु संस्करण मानने में तो कोई आपत्ति नहीं ही सकती। तो, कुछ अनजाने में हुई असंगतियों के आधार पर यदि कोई आलोचक ‘रंगभूमि’ में गांधीवादी दर्शन की पराजय बताता है तो उसकी बुद्धि की दाद तो दी जा सकती है, उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। इतनी अधिक स्पष्टता के सामने एक-दो सूक्ष्म बातें कोई अधिक महत्त्व नहीं रखतीं, कम-से-कम इतना तो नहीं ही रखतीं कि उपन्यास के आधार को ही उलटकर रख दें। श्री मन्मथनाथ गुप्त ‘कथाकार प्रेमचन्द’ में लिखते हैं, “जिस ज़मीन के लिए सारा झगड़ा था वह तो बची नहीं, यदि बचती तो हम कहते कि हाँ, आत्मबल ने कुछ प्राप्त किया।”23 पर, प्रेमचन्दजी उपन्यास के अन्तिम अध्यायों में यह दिखलाते हैं कि सबके सब गाँव वाले बिखर गये हैं। कोई कहीं गया, कोई कहीं। नायकराम शहर का रास्ता लेता है, बजरंगी किसी अन्य गाँव में जाकर बसता है। भैरो कहीं और । मैं यह नहीं कहता कि हार हर क्षेत्र में बुरी चीज़ है। नहीं, जैसे कि फिड्रक एंगेल्स ने कहा है, “ज़ोर के साथ लड़ाई के बाद हार होती है, वह उतने ही महत्त्व का तथ्य है जितना कि आसानी से प्राप्त जीत।” पर, पराजय के बाद यदि लड़ने वाले लोग थककर बैठ जायें तो अवश्य ही वह पराजय किसी प्रकार अच्छी चीज़ नहीं कही जा सकती। यहाँ पराजय का अर्थ यह है कि नए ढंग से कार्य करने के लिए स्फूर्ति तथा प्रोत्साहन की प्राप्ति, वहाँ पराजय का अर्थ संग्राम के जीवन में एक नया पन्ना उलटना होता है, ऐसी पराजय पर हमें ग्लानि की आवश्यकता नहीं। ऐसी पराजय तो विजय की सूचक तथा उसकी कृष्णवर्ण अग्रदूती मात्र है। ऐसी पराजय होते हुए भी हम कह सकते हैं, नैतिक जीत हुई, नैतिक जीत माने कल्पना में जीत नहीं बल्कि नैतिक जीत माने ऐसी हार जो जीत की आशा देती है।”24 उपर्युक्त तर्क का कोई खंडन नहीं है। ‘रंगभूमि’ की पराजय पाठक को, जनता को क्या संदेश देती है ? क्या वह उसको पस्तहिम्मत करती है ? क्या सूरदास का बलिदान आत्म-बल प्रदान नहीं करता ? इन प्रश्नों के उत्तर उपर्युक्त आलोचक की स्थापनाओं के विरुद्ध जाएंगे। अतः ‘रंगभूमि’ को प्रेमचन्द ने गांधीवाद का मखौल उड़ाने के लिए अथवा गांधीवाद की निरर्थकता प्रदर्शित करने के लिए नहीं लिखा है वरन् उस पर पूरी आस्था-श्रद्धा के साथ घटनाओं और चरित्रों को रंग-रूप दिया है। यह अवश्य है कि प्रेमचन्द का व्यक्तित्व गांधीवाद के नीचे दब नहीं गया है। गांधीवादी आदर्शवाद और प्रेमचन्दवादी वस्तुवाद दोनों समानान्तर दिखाई देते हैं। अतः ‘रंगभूमि को इसी दृष्टिकोण से परखना वैज्ञानिक होगा और हम लेखक के साथ भी इस प्रकार ठीक-ठीक न्याय कर सकेंगे।

कायाकल्प

प्रेमचन्द ने अगला उपन्यास ‘कायाकल्प’ सन् 1928 में लिखा। प्रस्तुत उपन्यास साधारण कोटि की कृति है। उसे एक सीमा तक प्रगति-विरोधी उपन्यास भी कहा जा सकता है, क्यांकि उसमें आलौकिक बातों का समावेश बहुत है। लेकिन ‘कायाकल्प’ में केवल आलौकिकता अथवा चमत्कार ही नहीं है, उसमें कथा है एवं और भी पहलू हैं, जो अनेक समस्याओं से सम्बन्ध रखते हैं। माना कि घटना-बहुलता के कारण प्रेमचन्द इस उपन्यास में समस्याओं की विस्तार से व्याख्या नहीं कर सके हैं; फिर भी उनका समावेश अपना पूरा महत्त्व रखता है। ‘कायाकल्प’ में मोटे रूप में दो प्रकार की समस्याएँ पाई जाती हैं - सामयिक और चिरंतन। चिरंतन समस्या का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है अतः उसका अस्तित्व उपन्यास को तिलस्मी बना देता है। पूर्वजन्म पर प्रेमचन्द का विश्वास था, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। पर स्वीकार किया जाए अथवा नहीं, जैसा ‘कायाकल्प’ की कथा से विदित होता है, वह प्रेमचंद की पूर्वजन्म सम्बन्धी धारणाओं को व्यक्त करता ही है। इसे एक विराधाभास कहा जा सकता है।

‘कायाकल्प’ का सबसे सबल भाग सामयिक समस्याओं से सम्बन्ध रखता है। ये समस्याएँ सामाजिक, राजनीतिक और सम्प्रदायिक क्षेत्रों की हैं। सामाजिक क्षेत्र में विवाह और प्रेम की समस्या प्रमुख है। राजनीतिक क्षेत्र में राजाओं और जागीरदारों की संस्कृति की वास्तविकता का उद्घाटन मुख्य लक्ष्य है तथा साम्प्रदायिक क्षेत्र में हिन्दू-मुस्लिम समस्या है। इन समस्याओं पर प्रेमचन्द के विचार प्रस्तुत उपन्यास में जगह-जगह बिखर हुए हैं। यदि प्रेमचन्द इसमें अलौकिक कथा का समावेश नहीं करते तो यह उपन्यास भी उत्कृष्ट कोटि का समस्या-प्रधान उपन्यास बन गया होता।

ग़बन

‘गबन’ सन् 1931 के आसपास लिखा गया और मार्च 1932 में छपा। पंडित नन्ददुलारे वाजपेयी अपनी पुस्तक ‘प्रेमचन्द ‘साहित्यिक विवेचन’ में ‘गबन’ की समीक्षा करते हुए लिखते हैं – “इसमें प्रेमचन्दजी ने सामाजिक और मनोवैज्ञानिक समस्याओं को साथ-साथ प्रदर्शित किया है। रमानाथ और जालपा नवविवाहित दम्पत्ति हैं। रमानाथ जालपा से अत्यधिक प्रेम करता है, पर वह उससे अपनी वास्तविक स्थिति को सदैव छिपाता रहता है। वह उपन्यास का मनोवैज्ञानिक सूत्र है। उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि यह है कि रमानाथ अपनी पत्नी की मनःतुष्टि के लिए अपने सामर्थ्य के बाहर जाकर गहने लाता और ऐसे उपायों का आश्रय लेता है, जो उसे अधिकाधिक कठिन परिस्थितियों मे डाल देते हैं।”25 ‘गबन’ में सामाजिक समस्या का स्वरूप तो निःसन्देह स्पष्ट है, पर उसमें कोई मनोवैज्ञानिक समस्या नहीं है। जिस मनोवैज्ञानिक समस्या की ओर पंडित नन्ददुलारे वाजपेयी जी ने संकेत किया है वह सामाजिक समस्या का ही एक अंग है। डॉक्टर रामरतन भटनागर ने इसी बात को कुछ अधिक सुलझे रूप में व्यक्त किया है। ‘गबन’ प्रेमचन्द का अन्तिम सामाजिक उपन्यास है और कला एवं दृष्टिकोण की परिपक्वता की दृष्टि से वह उनके सारे सामाजिक उपन्यासों में श्रेष्ठतम है। हमने इस उपन्यास को ‘गहने की ट्रेजिडी’ कहा है, परन्तु कहानी का मूल विषय यही होने पर भी समस्या का यह रूप अत्यन्त व्यापक समस्या का ही अंग है। यह समस्या है वर्गगत असन्तुलन। गहने वर्ग-श्रेष्ठता के ही प्रतीक हैं। हमारे इस पूँजीवादी समाज की सारी व्यवस्था वर्ग की विभिन्नता पर ही आश्रित है।”26 वास्तव में, ‘ग़बन’ मध्यवर्गीय समाज की समस्याओं का उपन्यास है। मध्यवर्गीय परिवारों में दिखावा अथवा ढकोसला पाया जाता है। वह ‘गबन’ में बड़े सुन्दर ढंग से चित्रित किया गया है। उपन्यास के प्रारम्भ में गहने की समस्या को केन्द्र बनाकर मध्यवर्गीय भारतीय नारी की समस्या का उद्घाटन किया गया है तथा अन्त में कलकत्ते के वर्णन के प्रंसग में भारतीय स्वाधीनता की समस्या को पूरे मनोयोग से चित्रित किया गया है। अंग्रेज़ी शासन में पुलिस के हथकंडों, न्याय की विडम्बनाओं आदि का चित्रण जिसके अन्तर्गत आता है। इस प्रकार ‘गबन’ की समस्याएँ स्पष्ट हैं। ‘गबन’ की विशेषता इस बात में भी है कि प्रेमचन्द इसमें अपने दृष्टिकोण के अधिक निकट दिखाई देते हैं।

कर्मभूमि

‘कर्मभूमि’ प्रेमचन्द की प्रौढ़ कृति है, इसका रचनाकाल सर् 30-32 का है। प्रेमचन्द जिस आदर्शवाद के घेरे में अभी तक आबद्ध थे; उसे तोड़कर अब यथार्थ भूमि में प्रवेश करते हैं। उनके भावी मोड़ का आभास ‘कर्मभूमि’ में मिलता है।

‘कर्मभूमि’ का कथानक वैविध्यपूर्ण है; क्योंकि उसके कई समस्याओं का प्रतिपादन किया गया है। कथावस्तु के शैथिल्य के सम्बन्ध में श्री मन्मनाथ गुप्त एक स्थल पर लिखते हैं : “स्वयं प्रेमचन्द भी शायद ‘कर्मभूमि’ के कथानक की शिथिलता के सम्बन्ध में परिचित थे। उन्होंने जो अपने चार-सौ पन्ने के उपन्यास को पाँच भागों में बाँटा है, इससे इस सम्बन्ध में उनकी सज्ञानता ज़ाहिर होती है।”27 स्पष्ट है, प्रेमचन्द के इस उपन्यास में पाई जाने वाली रचना-तंत्र सम्बन्धी दुर्बलताएँ सज्ञान हैं। प्रेमचन्द उपन्यास के माध्यम से कोई सुन्दर कहानी कहना नहीं चाहते थ; प्रत्युत तत्कालीन अनेक समस्याओं की ओर भारतीय जनता को जागरूक करना चाहते थे। ‘कर्मभूमि’ में यदि कथानक शिथिल है तो इससे उसकी महानता पर कोई विशेष विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता। ‘कर्मभूमि की श्रेष्ठता यथावत् ही बनी रहती है।

‘कर्मभूमि’ की मुख्य समस्या भी स्वाधीनता की समस्या है। अछूतों और किसानों की समस्याएँ उसी का ही अंग बनकर आती हैं। शैक्षणिक समस्या का भी उद्घाटन प्रस्तुत उपन्यास में किया गया है। इस प्रकार ‘कर्मभूमि’ एक राजनीतिक उपन्यास कहा जा सकता है।

पंडित नन्ददुलारे वाजपेयी ‘कर्मभूमि’ के विचार पक्ष की विवेचना करते हुए लिखते हैं, “विचारों के द्वारा प्रेमचन्द जी ने समय का चित्रण तो सफलता से कर दिया, किन्तु पाठक के सम्मुख अधिक योजनाएँ नहीं आतीं, जिन्हें वह भावी आदर्श समाज की पृष्ठिभूमि मान सके।’’28 स्पष्ट है, उपन्यासकार विचारों के द्वारा समय का चित्रण यदि सफलतापूर्वक कर देता है तो यही उसकी सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। योजनाएँ प्रस्तुत करना कोई उसका अनिवार्य तत्त्व नहीं है। समय-चित्रण भी अनेक शास्त्रीय सीमाओं को तोड़कर करना पड़ता है। और यदि योजनाओं का भी उसमें विधिवत् समावेश कर दिया जाये तो वह उपन्यास न रहकर समाजशास्त्र या अर्थशास्त्र का पोथा ही बन जाए। इस प्रकार के आलोचक जहाँ उपन्यास-कला की दुहाई देते हैं, वहाँ योजनाओं की माँग भी करते हैं। यह दृष्टिकोण स्वयं में विरोध लिए हुए है। ‘कर्मभूमि’ पाठक को सम्बन्धित समस्याओं पर सोचने के लिए विवश करता है। यह विवशता योजना-चित्रण से कहीं अधिक उपयोगी है। पूर्व-परम्परा को तोड़कर प्रेमचन्द ने ‘कर्मभूमि’ को अधिक-से-अधिक यथार्थ से जोड़ने का प्रयत्न किया है।

गोदान

‘गोदान’ प्रेमचन्द का अन्तिम पूर्ण उपन्यास है। इसका रचनाकाल सन् 1936 है। ‘गोदान’ में प्रेमचन्द का दृष्टिकोण यर्थाथवादी हो गया है। औपन्यासिक कौशल प्रस्तुत उपन्यास में सबसे अधिक है, किन्तु शास्त्रीय पद्धति पर इसे भी नहीं परखा जा सकता।

‘गोदान’ ग्रामीण जनता का महाकाव्य कहा जाता है। निःसन्देह उसमें ग्रामीण जनता की विभिन्न समस्याओं पर ही लेखक की दृष्टि केन्द्रित है। वैसे देखा जाए तो ‘गोदान’ की पृष्ठिभूमि बड़ी व्यापक है। उसमें शहरी और ग्रामीण दोनों जीवन का चित्रण है तथा दोनों की समस्याएँ उसमें समाहित हैं। लेकिन यदि बारीकी से देखा जाए तो शहरी जीवन का चित्रण ग्रामीण जीवन से गुँथा हुआ ही नहीं मालूम पड़ता; प्रत्युत उसी के हेतु औपन्यासिक कथा में स्थान रखता है - यह भली-भाँति लक्षित हो जाता है।

‘गोदान’ की मुख्य समस्या किसान के सुखी जीवन की समस्या है। यद्यपि किसान के जीवन के प्रत्येक पहलू पर इस उपन्यास में प्रकाश डाला गया है, फिर भी उसकी ऋण-समस्या ही प्रमुख है। ऋण के बोझ के कारण भारतीय किसान किस तरह पिस जाता है, यही ‘गोदान’ का केन्द्र बिन्दु है। होरी ऐसे ही किसान का प्रतीक है।

‘गोदान’ में प्रोफ़ेसर मेहता प्रेमचन्द के विचारों के वाहक हैं। प्रेमचन्द कथा- विकास के साथ-साथ अनेक समस्याओं पर प्रो॰ मेहता के मुख से लम्बी-लम्बी वक्तृताएँ भी दिलवाते चलते हैं। यदि प्रेमचन्द का उद्देश्य केवल एक किसान की कहानी लिखना ही रहा होता तो कथा-विन्यास में उन स्थलों की कोई आवश्यकता न होती। वास्तव में, वे स्थल ‘गोदान’ को महाकाव्यत्व तक पहुँचाने में बड़े सहायक होते हैं। प्रेमचन्द का व्यक्तित्व ‘गोदान’ में भी अन्य उपन्यासों की तरह छाया हुआ है। मात्र ‘कला’ को, किसी रचना की श्रेष्ठता या सफलता की कसौटी मानने वाला लेखक, इस प्रकार के स्थलों को भूलकर भी न रखता। लेकिन प्रेमचन्द का तो मुख्य उद्देश्य समस्याओं को सामने रखना था, इसीलिए ऐसे स्थलों पर उनकी प्रतिभा विशेष रूप से निखरकर हमारे सामने आती है।

मंगलसूत्र

‘मंगलसूत्र’ प्रेमचन्द का अपूर्ण उपन्यास है जो उनकी मृत्यु के 10-11 वर्ष बाद पश्चात् प्रकाशित हुआ। ‘गोदान’ में प्रेमचन्द यथार्थवादी बन गए हैं। ‘मंगलसूत्र’ में हम उनके यथार्थवादी रूप का स्पष्ट दर्शन कर सकते थे, किन्तु वह अपूर्ण ही रह गया। जैसा भी प्रस्तुत उपन्यास सामने आया है उसको देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसकी प्रमुख समस्या वैवाहिक होती । पुष्पा ओैर संतकुमार के दाम्पत्य जीवन का असंतोष प्रारम्भिक पृष्ठों में मिलता है। पुष्पा नारी-जाति की स्वतंत्रता और अधिकारों की समर्थक है। वैवाहिक जीवन से सम्बन्धित विच्छेद का प्रश्न संभवतः इसमें महत्त्वपूर्ण स्थान रखता, किन्तु अपूर्ण कृति पर अटकल या संभावनाओं के आधार पर कुछ अधिक नहीं कहा जा सकता।

(2)

इस प्रकार प्रेमचन्द के सभी उपन्यासों मे किसी-न-किसी समस्या को प्रमुख स्थान मिला है, अतः उनके प्रायः सभी उपन्यास समस्याप्रधान अथवा समस्यामूलक ठहरते हैं। कथानक के अन्दर समस्याओं का समावेश वे नहीं करते वरन् समस्याओं को उपस्थित करने के लिए कथानक को गढ़ते हें। चरित्र-चित्रण के लिए उनके उपन्यास नहीं लिखे गए वरन् समस्याओं के उद्घाटन, विकास और हल के हेतु पात्रों का सर्जन तथा चरित्र-चित्रण हुआ है। कथा विकसित करने के लिए वे संवादां को नहीं रखते वरन् समस्याओं का स्वरूप प्रकट करने के लिए पात्रों के मुख से अनेक बातें कहलाते हैं। अतः प्रेमचंद के उपन्यासों को समझने के लिए यही वास्तविक आधार है। आधार की ओर ध्यान न देकर यदि कोई आलोचक अन्य मापदंडों से उनके उपन्यासों की परख करता है तो वह ग़लत दृष्टिकोण अपनाता है। उसकी आलोचना का निष्कर्ष यही होगा कि प्रेमचन्द प्रथम श्रेणी के उपन्यासकार नहीं हैं, जबकि वे मानव-समुदाय में दिन-पर-दिन लोकप्रिय होते जा रहे हैं। यदि वे सफल उपन्यासकार नहीं होते तो यह लोकप्रियता मिलनी दुर्लभ होती। सच पूछा जाए तो प्रेमचन्द के उपन्यास केवल उपन्यास ही नहीं, वे उपन्यास से कुछ अधिक हैं।

प्रेमचन्द के उपन्यासों में उठाई गई प्रमुख समस्याओं के इस पर्यालोचन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उनके प्रायः सभी उपन्यास समस्यामूलक हैं। यह तथ्य उनके उपन्यासों की समीक्षा करते समय ध्यान में रखना नितान्त आवश्यक है; अन्यथा प्रेमचंद को समझने में ही हम भूल नहीं करेंगे; प्रत्युत उनके उपन्यासों के प्रति भी उचित न्याय नहीं कर पाएंगे।

प्रेमचंद और अन्य विश्वविख्यात उपन्यासकारों में यही सबसे बड़ा अन्तर है कि जहाँ अन्य प्रथम श्रेणी के उपन्यासकार चरित्रांकन की कला में अद्वितीय हैं वहाँ प्रेमचन्द समस्या के उपस्थित करने, उसका पूर्णरूपेण उद्घाटन करने और उसका हल सुझाने में अन्यतम हैं। यदि प्रेमचन्द के उपन्यासों की परख चरित्रांकन के दृष्टिकोण से की जाएगी तो वे विश्वविख्यात उपन्यासकारां की प्रथम श्रेणी में स्थान नहीं पा सकेंगे। इस बात को स्वीकार करने में कोई हीन-भावना का अनुभव हमें नहीं करना चाहिए। चरित्र-चित्रण में, प्रेमचन्द, कहानियों मे जितने सफल हुए हैं उतने उपन्यासों में नहीं। अपवाद रूप में, दो-चार औपन्यासिक पात्रों के सफल चरित्रांकन का उल्लेख कर देने मात्र से उनकी समस्यामूलकता पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता।

प्रेमचन्द की औपन्यासिक कला का सबसे सशक्त पहलू समस्यामूलक तत्त्व है, जिसके आधार पर हम प्रेमचन्द की कृतियों पर गर्व कर सकते हैं और विश्व-साहित्य के सम्मुख उनकी उपादेयता सिद्ध कर सकते हैं।

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संदर्भ-संकेत

1 वही, पृ. 38

2 ‘साहित्यावलोकन’, पृ. 155

3 मन्मथनाथ गुप्त : ‘कथाकार प्रेमचंद’, पृ. 177

4 ‘प्रेमचंद : आलोचनात्मक अध्ययन. पृ. 50-51

5 मन्मथनाथ गुप्त : ‘कथाकार प्रेमचंद’, पृ. 168

6 मन्मथनाथ गुप्त : ‘कथाकार प्रेमचंद’, पृ. 163-164

7 ‘प्रेमचंद : आलोचनात्मक अध्ययन. पृ. 52

8 ‘वरदान’, पृ. 44

9 ‘प्रेमचंद : घर में’, पृ. 13

10 ‘प्रेमचंद : घर में’, पृ. 9

11 ‘प्रेमचंद : घर में’, पृ. 10

12 ‘प्रेमचंद : घर में’, पृ. 10

13 ‘प्रेमचंद : घर में’, पृ. 11

14 मन्मथनाथ गुप्त : ‘कथाकार प्रेमचंद’, पृ. 202

15 ‘प्रेमचंद : साहित्यिक विवेचन, पृ. 25-26

16 ‘प्रेमचंद : आलोचनात्मक अध्ययन. पृ. 84

17 ‘हिन्दी उपन्यास’, पृ. 10

18 ‘हंस’, मई 1937, पृ. 44

19 ‘प्रेमचंद और उनका युग’, पृ. 42-43

20 ‘प्रेमचंद और उनका युग’, पृ. 60-61

21 ‘प्रेमचंद : आलोचनात्मक अध्ययन. पृ. 112

22 ‘प्रेमचंद : साहित्यिक विवेचन, पृ. 70-71

23 ‘प्रेमचंद : साहित्यिक विवेचन, पृ. 71

24 मन्मथनाथ गुप्त : ‘कथाकार प्रेमचंद’, पृ. 293

25 ‘प्रेमचंद : साहित्यिक विवेचन, पृ. 114

26 ‘प्रेमचंद : आलोचनात्मक अध्ययन. पृ. 141-142

27 मन्मथनाथ गुप्त : ‘कथाकार प्रेमचंद’, पृ. 470

28 ‘प्रेमचंद : साहित्यिक विवेचन, पृ. 112

भारतीय स्वाधीनता की समस्या

प्रेमचन्द भारतीय स्वाधीनता-संग्राम के निर्भीक व अविचल योद्धा थे। विदेशी सत्ता के साम्राज्यवादी चक्र में दबा-पिसा भारत उनकी रचनाओं में बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रतिबिम्बत हुआ है। प्रेमचन्द भारतीय राजनीतिक जागरण के एक स्तम्भ हैं। देश में स्वाधीनता के विचारों का प्रचार उन्होंने साहित्य के माध्यम से उतने ही ज़ोरों से किया जितना कि सक्रिय राजनीति में सत्य व अहिंसा के द्वारा गांधी जी ने। साहित्य का जनता के संस्कारी मन पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता हैं; क्योंकि उसमें कला अन्तर्निहित रहती है। प्रेमचन्द इस तथ्य को अच्छी तरह समझते थे। पराधीनता की शृंखलाएँ तोड़ने के लिए भारतीयों में नवीन चेतना, साहस और शक्ति का संचार प्रेमचन्द ने साहित्य के द्वारा किया। उन्होंने सोये भारत को झकझोरकर जगाया ही नहीं, उसे उसकी दयनीय दशा से ही परिचित नहीं कराया, वरन् उसे क्रांति के लिए - स्वाधीनता के हेतु संगठित अभियान के लिए तैयार भी किया। उनके साहित्य में भारत की आत्मा बोलती है।

प्रेमचन्द के समय भारत की राजनीतिक अवस्था बड़ी अनिश्चित थी। राष्ट्रीय महासभा (इण्डियन नेशनल कांग्रेस) के नेतृत्व में स्वाधीनता-आन्दोलन ज़ोर पकड़ रहा था, यद्यपि कुछ असफलताएँ उसके इतिहास में विद्यमान हैं। पर, इन असफलताओं से स्वाधीनता की आग दबी नहीं, प्रत्युत और व्यापक व तीव्र ही होती गई। प्रेमचन्द ने अपनी आँखों जनता के वे जुलूस देखे थे; जो स्वाधीनता की मशाल लिए सड़कों-सड़कों तथा गलियों-गलियों निकलते थे। इसके साथ-ही-साथ प्रेमचन्द ने अपनी आँखों अंग्रेज़ी हुकूमत के अत्याचार, अन्याय व दमन के भी दृश्य देखे। लेखक होने के नाते प्रेमचन्द स्वाधीनता-आन्दोलन से तटस्थ नहीं रह सकते थे। सन् 1920 के ज़माने में जब कि देशव्यापी असहयोग चल रहा था, प्रेमचन्द ने उससे प्रभावित होकर सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था और ‘कलम के मज़दूर’ बनकर स्वाधीनता-संग्राम में कूद पड़े थे। आगे चलकर वे बराबर कांग्रेस की बैठकों में भाग लेते रहे। श्रीमती शिवरानी प्रेमचन्द ने जैसा लिखा है -

“कांग्रेस की मीटिंग रोज़ाना चल रही थी, उसमें भी वे शरीक़ होते। मीटिंग से कभी-कभी लौटने में रात के दस बज जाते।”1

प्रेमचन्द के साहित्य का तत्कालीन राजनीति से घनिष्ठ सम्बन्ध है। शिवरानी-प्रेमचन्द का अधोलिखित वार्तालाप प्रेमचन्द के साहित्य और उनके राजनीति सम्बन्धी विचारों को प्रकट करता है -

“प्रेमचन्द - जब तक यहाँ के साहित्य में तरक्की न होगी, तब तक साहित्य, समाज और राजनीति सब-के-सब ज्यों-के-त्यां पडे़ रहेंगे।

शिवरानी - तो क्या आप इन तीनों की एक माला-सी पिरोना चाहते हैं ?

प्रेमचन्द - और क्या! ये चीज़ें माला जैसी ही हैं। जिस भाषा का साहित्य अच्छा होगा, उसका समाज भी अच्छा होगा। समाज के अच्छा होने पर मजबूरन राजनीति भी अच्छी होगी। ये तीनों साथ-साथ चलनेवाली चीजें हैं।”2

प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों में अंग्रज़ी साम्राज्यवाद की व्यापारिक नीति, भारतीय शिक्षित वर्ग में अंग्रेज़ी शिक्षा के प्रति लगाव, भारतीय ईसाइयों में अंग्रज़ों की नक़ल की प्रवृत्ति, ब्रिटिश नौकरशाही का आतंकपूर्ण शासन तथा उसके सम्राज्यवादी स्वार्थ, अन्याय आदि पर जगह-जगह लिखा है। वे पूर्ण स्वाधीनता के पक्षपाती थे। ‘डोमीनियन स्टेटस’ में उनको तनिक भी विश्वास न था। ‘हंस’ की पहली सम्पादकीय टिप्पणी में उन्होंने ‘डोमीनियन स्टेटस’ का कड़ा विरोध किया है :

“इंगलैंड का डोमीनियन स्टेटस के नाम से न घबड़ाना समझ में आता है। स्वराज्य में किस्तों की गुंजाइश नहीं, न गोलमेज़ की उलझन है, इसलिए वह स्वराज्य के नाम से कानों पर हाथ रखता है। लेकिन हमारे ही भाइयों में इस प्रश्न पर क्यों मतभेद है, इसका रहस्य आसानी से समझ में नहीं आता। वे इतने बेसमझ तो हैं नहीं कि इंगलैंड की इस चाल को न समझते हों। अनुमान यह होता है कि इस चाल को समझकर भी वे डोमीनियन के पक्ष में हैं। इसका कुछ और आशय है। डोमीनियन पक्ष को ग़ौर से देखिए तो उसमें हमारे राजे-महाराजे, हमारे ज़मींदार, हमारे धनी-मानी भाई ही ज़्यादा नज़र आते हैं। क्या इसका यह कारण है कि वे समझते हैं कि स्वराज्य की दशा में उन्हें बहुत-कुछ दबकर रहना पड़ेगा ? स्वराज्य में मज़दूरों और किसानों की आवाज़ इतनी निर्बल न रहेगी। क्या वे लोग उस आवाज़ के भय से थरथरा रहे हैं कि उनके हितों की रक्षा अंग्रेज़ी शासन से ही हो सकती है ? स्वराज्य कभी उन्हें ग़रीबों को कुचलने और उनका रक्त चूसने न देगा। डोमीनियन का अर्थ उनके लिए यही है कि दो-चार गवर्नरियाँ, दो चार बड़े-बड़े पद उन्हें और मिल जावेंगे। उनका डोमीनियन स्टेटस इसके सिवा और कुछ नहीं है। ताल्लुकेदार और राजे इसी तरह ग़रीबों को चूसते चले जायेंगे। स्वराज्य गरीबों की आवाज़ है, डोमीनियन ग़रीबों की कमाई पर मोटे होनेवालों की।”3

वे पूर्ण स्वाधीनता के पक्षपाती तो थे ही, पर उनका स्वतंत्रता का दृष्टिकोण नितान्त जनवादी था। ‘कर्मभूमि’ में डा॰ शान्तिकुमार के मुख से भी उन्होंने जनता की सरकार तथा क्रांति का समर्थन किया है :

“जब तक रिआया के हाथ में अख़्तियार न होगा, अफ़सरों का यही हाल रहेगा...ग़रीबों की लाश पर सब-के-सब गिद्धों की तरह जमा होकर उनकी बोटियाँ नोच रहे हैं... इस हाहाकार को बुझाने के लिए दो-चार घड़े पानी डालने से तो आग और भी बढ़ेगी। इन्कलाब की ज़रूरत है, पूरे इन्कलाब की।”4

वे वर्गहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे, जिसमें अमीर-ग़रीब का भेद न हो :

“गवर्नमेण्ट तो काई ज़रूरी चीज़ नहीं। पढ़े-लिखे आदमियों ने ग़रीबों को दबाये रखने के लिए एक संगठन बना लिया है। उसी का नाम गवर्नमेण्ट है ; ग़रीब और अमीर का फ़र्क मिटा दो और गवर्नमेण्ट का ख़ात्मा हो जाता है।”5

सर्वहारा वर्ग के प्रति उन्हें स्वाभाविक सहानुभूति थी। वे उसे धनिक वर्ग के सामने अपमानित होते देखना पसन्द नहीं करते थे। वे ऐसी आज़ादी के समर्थक न थे जो मानवीय अधिकारों को दबाकर रखे। जागती हुई जनता के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है :

“उसे अपने स्वत्व का ज्ञान हो चुका था। उन्हें मालूम हो गया था कि उन्हें भी आराम से रहने का इतना ही अधिकार है, जितना धनियों को।”6

मार्क्सवादी समीक्षक अमृतराय के शब्दों में यह कहा जा सकता है -

“प्रेमचन्द की देशभक्ति कोई शून्य, हवाई देशभक्ति नहीं, सच्ची जनवादी देशभक्ति है और उन्होंने जो कुछ लिखा है, देश में जनता का शासन, जनवाद क़ायम करने के लिए लिखा है।”7

प्रेमचन्द के विचारों में परिर्वतन होते गए हैं। ‘प्रेमा’ से ‘’मंगलसूत्र’ तक उन्होंने एक बड़ी वैचारिक यात्रा पूर्ण की है। प्रारम्भ में वे सुधारवादी तथा नरम दक्षिण-मार्गी हैं, पर बाद में बड़े उग्र क्रांतिकारी तथा वाममार्गी। यह परिर्वतन उनके अनुभव पर आश्रित है। उन्होंने दिन-दिन बढ़ते शोषण और अत्याचार को देखकर अपनी राय स्थापित की।

प्रारम्भ में उन पर गांधीवादी दर्शन का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव था। प्रायः महान साहित्यकारों में यह बात देखी गई है कि वे अपने युग के राजनीतिक नेताओं से विचारों में आगे होते हैं। जिस प्रकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने गांधी जी के आविर्भाव के पूर्व स्वदेशी और भारतीय संस्कृति के प्रति देश का ध्यान आकर्षित किया था, उसी प्रकार प्रेमचन्द भी गांधी जी के विचारों से आगे निकल जाया करते थे। ‘प्रेमाश्रम’ के रचनाकाल से यह बात स्पष्ट होती है। मज़दूर और काश्तकारों के सम्बन्ध पर लिखा ‘प्रेमाश्रम’ गांधी जी के आन्दोलन का मानो पूर्वाभास है। प्रेमचन्द-शिवरानी संवाद से यह बात स्पष्ट प्रकट होती है -

“शिवरानी - तो आप भी क्या महात्मा गांधी के तरफ़दार हो गए। ?

प्रेमचन्द - अरे, तरफ़दार होने को तुम कहती हो, मैं उनका चेला हो गया। चेला तो उसी समय हुआ, जब वह गोरखपुर में आये थे।

शिवरानी - चेले तब हुए थे, दर्शन अब कर पाये ?

प्रेमचन्द - चेले होने की मानी, किसी की पूजा करना नहीं होता, बल्कि उन गुणों को अपनाना है।

शिवरानी - तो आपने अपना लिए ?

प्रेमचन्द - मैंने अपना लिए। अपनाने को कहती हो, उसी के बाद तो मैंने ‘प्रेमाश्रम’ लिखा है। सन् ’22 में छपा है।

शिवरानी - वह तो पहले से ही लिखा जा रहा है ?

प्रेमचन्द - इसके मानी यह है कि मैं महात्मा गांधी को बिना देखे ही उनका चेला हो चुका था।

शिवरानी - तो इसमें महात्मा गांधी की कौन ख़ास बात हुई ?

प्रेमचन्द - बात यह हुई कि जो बात वह करना चाहते हैं, उसे मैं पहले ही कर देता हूँ। इसके मानी यह हैं कि मैं उनका बना-बनाया कुदरती चेला हूँ।

शिवरानी - यह कोई बात नहीं है, न कोई दलील है।

प्रेमचन्द - दलील की यह कोई बात नहीं। इसके माने हैं कि दुनिया में मैं महात्मा गांधी को सबसे बड़ा मानता हूँ। उनका उद्देश्य भी यही है कि मज़दूर और काश्तकार सुखी हों, वह इन लोगों को आगे बढ़ाने के लिए आन्दोलन मचा रहे हैं। मैं लिखकर के उनको उत्साह दे रहा हूँ। महात्मा गांधी हिन्दू-मुसलमान की एकता चाहते हैं, तो मैं भी हिन्दी और उर्दू को मिलाकर के हिन्दुस्तानी बनाना चाहता हूँ।”8

प्रेमचन्द के भाषा-सम्बन्धी विचारों को आगे चलकर गांधी जी ने भी अपनाया। इस प्रकार अनेक बातों में वे पूर्व ही क़दम उठा चुके थे। गांधी जी के सिद्धान्तों का प्रभाव भी उन पर पड़ा है, अतः उनका प्रतिबिम्ब उनके साहित्य में मिलता है। ‘रंगभूमि’ में ज़ाहिर अली के शब्द विपक्षी के सम्बन्ध में गांधीवादी दर्शन के प्रतीक हैं :

“जिन्होंने मुझ पर ज़ुलुम किया है, उनके दिल में दया-धरम जागे, बस मैं आप लोगों से और कुछ नहीं चाहता।”9

इसी उपन्यास में वे कहते हैं :

“रोग का अन्त करने के लिए रोगी का अन्त कर देना न बुद्धिसंगत है, न न्यायसंगत। आग, आग से शान्त नहीं होती, पानी से शान्त होती है।”10

उन्होंने शान्त उपायों का सदैव समर्थन किया है। सोफी विनयकुमार से कहती है :

“तुम अपने आदर्श से उसी समय पतित हुए, जब तुमने उस विद्रोह को शान्त करने के लिए शान्त उपयां की अपेक्षा क्रूरता और दमन से काम लेना उपयुक्त समझा। शैतान ने पहली बार तुम पर वार किया और तुम फिर न सँभले, गिरते ही चले गये।”11

पर, आगे चलकर सुधारवादी दृष्टिकोण पर से उनका विश्वास हिल गया था। जीवन के अन्तिम दिनों में वे बड़े उग्र हो उठे थे। उनके उपन्यासों में भारतीय स्वाधीनता की गूँज सर्वप्रथम ‘सेवासदन’ में सुनाई देती है जहाँ कि उन्होंने एक भविष्य - द्रष्टा की तरह यूरोप के व्यावहारिक साम्राज्यवाद के प्रति लिखा है :

“शिल्प और कला-कौशल का यह महल उसी समय तक है जब तक संसार में निर्बल, असमर्थ जातियाँ वर्तमान हैं। उनके गले सस्ता माल मढ़कर यूरोपवाले चैन करते हैं; पर ज्योंही वे जातियाँ चौकेंगी, यूरोप की प्रभुता नष्ट हो जायेगी।”12

उन्होंने भारतीय युवकों को पाश्चात्य संस्कृति तथा विदेशी भाषा के पीछे मतवाले होने से रोका व सचेत किया। देश में जब स्वाभिमान तथा निज की संस्कृति के प्रति उपेक्षा-भाव बढ़ते जाते हैं तब वह देश तथा जाति मृतवत् हो जाती है। भारतीय युवकों के द्वारा भारतीय संस्कृति की उपेक्षा ही नहीं हुई, वरन् एक समय था जब कि पाश्चात्य सभ्यता के ये भक्त-युवक उसका उपहास करते थे। अपनी भाषा में बोलना उनके लिए अपने को अशिक्षित तथा असभ्य बताना था। प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों में जाति में पाये जानेवाले आत्महीनता के भावों को व्यक्त किया है; क्योंकि उनके उपन्यास केवल हमारा मनोरंजन ही नहीं करते, प्रत्युत वे समस्याओं को भी सम्मुख रखते हैं, उन समस्याओं के कारणों पर प्रकाश डालते हैं तथा उनके हल का उपाय भी सुझाते हैं। इन समस्याओं में भारतीय स्वाधीनता की समस्या भी एक है। अंग्रेज़ी भाषा के गुलामों को प्रेमचन्द ‘सेवासदन’ के एक समाज-सुधारक पात्रा बिट्ठलदास के द्वारा जाग्रत करना चाहते हैं :

“आपकी अंग्रेज़ी शिक्षा ने आपको ऐसा पद-दलित किया है कि जब तक यूरोप का कोई विद्वान् किसी विषय के गुण-दोष प्रकट न करे, तब तक आप उस विषय की ओर से उदासीन रहते हैं। आप उपनिषदों का आदर इसलिए नहीं करते कि वह स्वयं आदरणीय हैं, बल्कि इसलिए करते हैं कि ब्लावेदस्की और मैक्समूलर ने उनका आदर किया है। आप में अपनी बुद्धि से काम लेने की शक्ति का लोप हो गया है..... यह मानसिक गुलामी उस भौतिक गुलामी से कहीं गयी-गुज़री है। आप उपनिषदों को अंग्रेज़ी में पढ़ते हैं, गीता को जर्मन में, अर्जुन को अर्जुना, कृष्ण को कृष्णा कहकर अपने स्वभाषा ज्ञान का परिचय देते हैं।”13

‘सेवासदन’ में आगे चलकर प्रेमचन्द सुमन के मुख से अंग्रेज़ी पढ़े-लिखे स्वार्थान्धों को खरे शब्दों में ललकारते हैं :

”यह सब-के-सब स्वार्थसेवी हैं, इन्होंने केवल दीनों का गला दबाने के लिए, केवल अपना पेट पालने के लिए अंग्रेज़ी पढ़ी है, यह सब-के-सब फैशन के गुलाम हैं, जिनकी शिक्षा ने उन्हें अंग्रेज़ों का मुँह चिढ़ाना सिखा दिया है, जिनमें दया नहीं, धर्म नहीं, निज भाषा से प्रेम नहीं, चरित्र नहीं, आत्मबल नहीं, वे भी कुछ आदमी हैं ?”14

यह देश की पतित तथा पराजित दशा का कितना मार्मिक तथा उत्तेजक वर्णन है। भाषा की पराधीनता देश की स्वाधीनता में बाधक होती है। अंग्रेज़ी राजनीतिज्ञों तथा शिक्षा-विशारदों ने यह बात खूब सोच-समझकर भारत की राजभाषा अंग्रेज़ी बनायी थी, पर मेकाले का स्वप्न उस देश में कहाँ साकार हो सकता था जहाँ प्रेमचन्द व गांधी जैसे स्वाधीनता के अटल व निर्भीक प्रहरी थे। शिक्षित वर्ग को उन्होंने स्पष्ट शब्दों में सचेत किया -

“शिक्षित वर्ग जब-तक शासकों का आश्रित रहेगा, हम अपने लक्ष्य के जौ भर भी निकट न पहुँच सकेगा।”15

कुछ लोग अंग्रेज़ी भाषा और अंग्रेज़ी राज्य की प्रशंसा करते देखे जाते हैं। किसी जाति के प्रति घृणा के भाव उत्पन्न करना कोई मानवतावादी लेखक पसन्द नहीं करेगा, पर एक ऐसे दल के विरुद्ध जो विजित देश को लूटता है और आतंक फैलाता है, उसके वास्तविक स्वरूप को नहीं छिपाया जा सकता। ब्रिटेन से भारत आनेवाले अनेक ‘गोरों’ की ऐसी कथाएँ हैं जो भारत को ‘सोने की चिड़िया’ समझकर महज़ ऐयाशी के लिए आते थे। ‘कर्मभूमि’ में सोना बेचती हुई मेमों के बारे में बताया गया है :

“यह गोरे उस श्रेणी के थे, जो अपनी आत्मा को शराब और जुए के हाथों बेच देते हैं, बे-टिकट फर्स्ट क्लास में सफ़र करते हें, होटलवालों को धोखा देकर उड़ जाते हैं और जब कुछ बस नहीं चलता, तो बिगड़े शरीफ़ बनकर भीख माँगते हैं।”16

‘रंगभूमि’ में मिसेज सेवक और कुँवर साहब के वार्तालाप से प्रेमचन्द अंग्रेज़ी राज्य की नियामतों की निस्सारता पर बड़े तार्किक ढंग से लिखते हैं :

“कुँवर - जिस राष्ट्र ने एक बार अपनी स्वाधीनता खो दी, वह फिर उस पद को नहीं पा सकता। दासता ही उसकी तक़दीर हो जाती है। मैं अंग्रेज़ों की तरफ़ से निराश हो गया हूँ...

मि॰ सेवक - (रुखाई से) तो क्या आप यह नहीं जानते कि अंग्रेज़ों ने भारत के लिए जो कुछ किया है, वह शायद ही किसी जाति या देश के साथ किया हो ?

कुँ. - नहीं, मैं यह नहीं मानता।

मि. से. - (आश्चर्य से) शिक्षा का इतना प्रचार और भी किसी काल में हुआ था ?

कुँ. - मैं इसे शिक्षा ही नहीं कहता जो मनुष्य को स्वार्थ का पुतला बना दे।

मि. से - रेल, तार, जहाज़, डाक ये सब विभूतियाँ अंग्रेज़ों के ही साथ आयीं।

कुँ. - अंग्रज़ों के बग़ैर भी आ सकती थीं और आयी भी हैं, तो अधिकतर अंग्रेज़ों ही के लिये।

मि. से. - ऐसा न्याय-विधान पहले कभी न था?

कुँ. - ठीक है, ऐसा न्याय-विधान कहाँ था, जो अन्याय को न्याय और असत्य को सत्य सिद्ध कर दे। यह न्याय नहीं गोरखधंधा है।”17

अंग्रेज़ी राज्य में भारतीय जेलख़ानों की दशा तथा क़ैदियों के जीवन पर ‘कायाकल्प’ में विस्तार से लिखा गया है। जिस राज्य में राजनीतिक क़ैदियों को ऐेसे स्थानों पर रखा जाता हो तो उसे क्या सभ्य कहा जा सकेगा?

“उन्हें ईश्वर के दिये हुए वायु और प्रकाश के मुश्किल से दर्शन होते थे। मनुष्य के रचे हुए संसार में मनुष्यत्व की कितनी हत्या हो सकती है, इसका उज्ज्वल प्रमाण सामने था। भोजन ऐसा मिलता था, जिसे शायद कुत्ते भी सूँघकर छोड़ देते। वस्त्र ऐसे जिन्हें कोई भिखारी पैरों से ठुकरा देता, और परिश्रम इतना करना पड़ता था जितना बैल भी न कर सके। जेल शासन का विभाग नहीं, पाशविक व्यवसाय है, आदमियों से जबरदस्ती काम लेने का बहाना, अत्याचार का निष्कंटक साधन। दो रुपये रोज़ काम लेकर, दो आने का खाना खिलाना, ऐसा अन्याय है, जिसकी कहीं नज़ीर नहीं मिल सकती। आदि से अन्त तक सारा व्यापार घृणित, जघन्य, पैशाचिक और नन्दनीय है। अनीति की भी अक़्ल दंग है, दुष्टता भी यहाँ दाँतों तले उँगली दबाती है।”18

भारत में अंग्रेज़ी राज्य की नींव आंतक की शिला पर डाली गई। शासन और शासकीय अधिकारियों का प्रथम और अन्तिम उद्देश्य देश में आंतक का साया डालकर शोषण करना रहा। प्रबल आंतक के कारण जनता को नाना अन्यायों तथा विपत्तियों का सामना करना पड़ा। प्रेमचन्द ने इस आंतकवाद के विरुद्ध लेखनी चलाई, क्योंकि जब तक जनता के हृदय से भय दूर नहीं होता, वह दब्बू बनकर अन्याय को सहन करती जायगी। स्वाधीनता-प्राप्ति का प्रथम आवश्यक चरण हृदयों से अंग्रेज़ी शासन के भय को जड़ से मिटाना था। ‘कर्मभूमि’ में मुन्नी के गोरों द्वारा सतीत्व-हरण की घटना पर सलीम सोचता है :

“इन टके के सैनिकों को इतनी हिम्मत क्यों हुई ? यह गोरे सिपाही इंगलैंड की निम्मतम श्रेणी के मनुष्य होते हैं। इनका साहस कैसे हुआ ? इसलिए कि भारत पराधीन है। यह लोग जानते हैं कि यहाँ के लोगों पर उनका आंतक छाया हुआ है। वह जो अनर्थ चाहे, करें, कोई चूँ नहीं कर सकता। यह आंतक दूर करना होगा। इस पराधीनता की ज़ंजीर को तोड़ना होगा।”19

‘रंगभूमि’ में मि. क्लार्क आतंक की स्थापना के लिए सब कुछ करने को तैयार है। साम्रज्यवादी भावनाओं से मनुष्य का कितना पतन हो सकता है, उसका उदाहरण क्लार्क के अधोलिखित शब्दों से मिलता है जहाँ न्याय जैसी कोई चीज़ नहीं होती :

“हमारा साम्राज्य तभी तक अजेय रह सकता है, जब तक प्रजा पर हमारा आंतक छाया रहे।.... अगर साम्राज्य को रखना ही हमारे जीवन का उद्देश्य है तो व्यक्तिगत भावों और विचारों का यहाँ कोई अस्तित्व नहीं। साम्राज्य के लिए हम बडे़-से-बड़े नुक़सान को उठा सकते हैं, बड़ी-से-बड़ी तपस्याएँ कर सकते हैं। हमें अपना राज्य प्राणों से भी प्रिय है, और जिस व्यक्ति से हमें क्षति की लेशमात्र भी शंका हो, उसे हम कुचल डालना चाहते हैं, उसका नाश कर देना चाहते हैं, उसके साथ किसी भाँति की रियायत, सहानुभूति, यहाँ तक कि न्याय का व्यवहार भी नहीं कर सकते।”20

अपने स्वार्थ के लिए अंग्रेज़ों ने सब कुछ किया। ‘कायाकल्प’ में गुरुसेवक मनोरमा से कहते हैं :

“इनमें उदारता और सज्जनता नाम को भी नहीं होती, बस अपने मतलब के यार हैं ये। इनका धर्म, इनकी राजनीति, इसका न्याय, इनकी सभ्यता केवल एक शब्द में आ जाती है, और वह शब्द है - ‘स्वार्थ’।”21

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के इरादों को बड़े स्पष्ट और बेलाग ढंग से क्लार्क के मुख से प्रेमचन्द कहलाते हैं। इंगलैण्ड में चाहे जिस पार्टी का शासन रहा हो, सभी का प्रयत्न भारत में अपना साम्राज्य-स्थापन और उसकी रक्षा ही रहा। सत्तारूढ़ पार्टी ने जब-जब अत्याचार किये तब-तब अन्य पार्टी ने मात्र दिखावे को उसका विरोध किया। इस प्रकार भारतीयों को भुलावा दिया गया। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की निर्लज्जता का तथा उसकी नीति का पर्दाफ़ाश करने से प्रेमचन्द नहीं चूके हैं :

“अंग्रेज़ जाति भारत को अनन्त काल तक अपने साम्राज्य का अंग बनाये रखना चाहती है। कंजरवेटिव हो या लिबरल, रेडिकल हो या लेबर, नेशनलिस्ट हो या सोशलिस्ट, इस विषय में सभी एक ही आदर्श का पालन करते हैं..... आधिपत्य त्याग करने की वस्तु नहीं।....अंग्रेज़ जाति कभी त्याग के लिए, उच्च सिद्धान्तों पर प्राण देने के लिये प्रसिद्ध नहीं रही। सबके-सब साम्राज्यवादी हैं। अन्तर केवल उस नीति में है, जो भिन्न-भिन्न दल इस जाति पर आधिपत्य जमाये रखने के लए ग्रहण करते हैं। कोई कठोर शासन का उपासक है, कोई सहानुभूति का, कोई चिकनी-चुपड़ी बातों से काम निकालने का। बस, वास्तव में नीति कोई नहीं, केवल उद्देश्य है, वह यह कि क्योंकर भारतवासियों पर हमारा आधिपत्य उत्तरोत्तर सुदृढ़ हो।”22

“हमारा प्रथम और अन्तिम उद्देश्य शासन करना है।”23

मि॰ क्लार्क के उपर्युक्त शब्द अंग्रेज़ी राज्य के नग्न स्वरूप को सामने रखते हैं। प्रेमचन्द इस राज्य को मिटाना चाहते थे। क्योंकि उसका अस्तित्व अन्याय पर था। न्याय का उपहास करता हुआ प्रभुसेवक सूरदास से कहता है -

“सरकार यहाँ न्याय करने नहीं आयी है भाई, राज्य करने आयी है। न्याय करने से उसे कुछ मिलता है ? कोई समय वह था जब न्याय को राज्य की बुनियाद समझा जाता था। अब वह ज़माना नहीं है। अब व्यापार का राज्य है और जो इस राज्य को स्वीकार न करे, उसके लिये तारों का निशाना मारनेवाली तोपें हैं। तुम क्या कर सकते हो ? दीवानी में मुक़दमा दायर करोगे ? वहाँ भी सरकार ही के नौकर-चाकर न्याय-पद पर बैठे हुए हैं।”24

अन्यायी शासक दमन का सहारा लेता है। वह राष्ट्रीय भावनाओं, जन-आन्दोलनों, राष्ट्रीय साहित्य आदि को कुचलने के षड्यंत्र रचता है। अंग्रेजी शासन ने जितने दमन-चक्र चलाये उनके उदाहरण अन्यत्र देखने को नहीं मिलेंगे। प्रेमचन्द भारतीय जनता को दमन का वीरता से सामना करने योग्य बनाते हैं। उनमें आत्मसम्मान, साहस तथा देशप्रेम के भावों का प्रसार करते हैं। प्रभुसेवक के मुख से रक्तपात से डरने वालों की कापुरुषता पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने लिखा है :

“जब तक हम खून से डरते रहेंगे, हमारे स्वप्न भी हमारे पास आने से डरते रहेंगे। उनकी रक्षा तो खून ही से होगी। राजनीति का क्षेत्र समर-क्षेत्र से कम भयावह नहीं है। उसमें उतरकर रक्तपात से डरना कापुरुषता है।”25

इस प्रकार प्रेमचन्द ने साहित्य के द्वारा देश और जाति में नयी चेतना उत्पन्न की, स्वाधीनता-संग्राम को वाणी दी और जनता के एक बहुत बड़े तथा महत्त्वपूर्ण भाग को स्वतन्त्रता के रहस्य से परिचित काराया। उनका साहित्य स्वतन्त्रता का सहग प्रहरी है। भारत के स्वाभिमान व गौरव का धरोहर है। जिस देश ने प्रेमचन्द जैसे लेखक उत्पन्न किए हैं वह कभी भी पथभ्रष्ट नहीं हो सकता। वह सदैव एक गत्यात्मक वातावरण में फलेगा-फूलेगा।

प्रेमचन्द का साहित्य केवल भारत की स्वाधीनता का ही साहित्य नहीं है; वरन् संसार की समस्त पीड़ित, दुखी और शोषित जनता का साहित्य है। अन्य पराधीन या अर्द्ध-पराधीन देश उनके साहित्य से प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं; क्योंकि प्रेमचन्द ने स्वातन्त्र्य-भावना को कभी और कहीं भी संकीर्ण रूप में नहीं देखा। जनवादी होने के कारण वे मानव-मात्र के हैं और संत्रस्त मानवता को, निश्चय ही, उनके साहित्य से सदैव आत्मबल मिलेगा।

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संदर्भ-संकेत

1 ‘प्रेमचंद : घर में’, पृ. 84

2 ‘प्रेमचंद : घर में’, पृ. 94.95

3 ‘हंस’, मार्च, 1930

4 ‘कर्मभूमि’, पृ. 232

5 ‘कर्मभूमि’, पृ. 234

6 ‘कर्मभूमि’, पृ. 266

7 ‘शांति के योद्धा प्रेमचंद’, पृ. 6

8 ‘प्रेमचंद : घर में’, पृ. 128-129

9 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 319

10 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 281

11 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 84

12 ‘सेवासदन’, पृ. 155

13 ‘सेवासदन’, पृ. 244-245

14 ‘सेवासदन’, पृ. 283

15 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 390

16 ‘कर्मभूमि’, पृ. 56

17 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 269

18 ‘कायाकल्प’, पृ.184

19 ‘कर्मभूमि’, पृ. 184

20 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 27

21 ‘कायाकल्प’, पृ.212-213

22 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 186

23 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 342

24 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 150-151

25 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 422

रियासतों और देशी नरेशों की समस्या

प्रेमचन्द ने रियासतों और देशी नरेशों की तत्कालीन स्थिति का ‘रंगभूमि’ और ‘कायाकल्प’ में विस्तार से उल्लेख किया है तथा उनके भविष्य पर भी प्रकाश डाला है।

भारतीय रियासतें स्वतंत्रता-प्राप्ति में एक बड़ी रुकावट थीं। इन प्रदेशों की जनता की स्थिति ब्रिटिश भारत से भी गई-गुज़री रही। राजाओं में नैतिक बल बिलकुल न था। वे ब्रिटिश शासकों के संकेतों पर नाचने वाले मात्र कठपुतली थे। इन राजाओं ने ब्रिटिश शासन की चाकरी करके साम्राज्यवाद की जड़ां को मज़बूत किया और सामंत-प्रथा को पुनर्जीवित किया। एक समय था जबकि राजा ईश्वर का अवतार माना जाता था। जनता उसका सम्मान करती थी। किन्तु, ‘राजावाद’ में जो मूल दोष थे, वे आगे सामने आए और राजसत्ता दूषित हो उठी। राजाओं के नैतिक आदर्श गिर गए, जनता के हृदय में उनके प्रति श्रद्धा की भावना मिट गई। राजा-महाराजाओं और उनके दीवानों-सामंतों के अत्याचार और दमन के विरुद्ध जनता उठ खड़ी हुई। लेकिन इन रियासतों की जनता की मुक्ति का प्रश्न भारतीय स्वाधीनता-प्राप्ति का ही एक अंग था। जब तक भारत से ब्रिटिश साम्राज्य का अन्त नहीं होता, तब-तक इन रियासतों में भी कोई सीमित क्रांति न तो सफल ही हो सकती थी और न स्थायी ही। पर, इन प्रदेशों की जनता में स्वाधीनता के भावों का प्रसार करना आवश्यक था। लेखकों का भी यह कर्तव्य था कि वे इन रियासतों के मनमानी शासन के विरुद्ध आवाज़ उठाएँ और इन प्रदेशों की जनता का साथ दें, उनके आन्दोलनों को बल पहुँचाएँ तथा राजसत्ता की निरर्थकता प्रमाणित करें, जिससे एक स्वाधीन जनवादी भारत का निर्माण हो सके।

प्रेमचन्द ने आजन्म साम्राज्यवाद और उनको बल पहुँचाने वाली शक्तियों से लोहा लिया। सामंती तत्त्वों से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। व्यक्तियों के प्रति घृणा उत्पन्न न करना एक अलग बात है और किसी प्रणाली से समझोता करना नितांत अलग। प्रेमचन्द ने राजसत्ता की प्रणाली के कभी समझौता नहीं किया। ‘कायाकल्प’ और ‘रंगभूमि’ के पढ़ने पर राजसत्ता पर किसी की श्रद्धा नहीं जमेगी। प्रेमचन्द ने उस व्यवस्था के प्रति असंतोष व्यक्त किया है तथा उसमें पाये जाने वाले दोषों को बड़े ही यथार्थ ढंग से प्रस्तुत किया है। यही नहीं, उन्होंने राजा-महाराजाओं के चित्रण में भी किसी तरह का पक्षपात नहीं किया। उनकी दुर्बलताओं का इतना नग्न और व्यंग्यात्मक चित्रण अन्यत्र मिलना दुर्लभ है।

राजसत्ता से संबंधित एक घटना स्वयं प्रेमचन्द के जीवन में भी आती है। श्रीमती शिवरानी देवी ने ‘प्रेमचन्द घर में’ इसका उल्लेख इस प्रकार किया है : “सन् ’24 का जमाना था। आप लखनऊ में थे। ‘रंगभूमि’ छप रही थी। अलवर रियासत से राजा साहब की चिट्ठी लेकर पाँच-छः सज्जन आये। राजा साहब ने अपने पास रहने के लिए बुलाया था। राजा साहब उपन्यास-कहानियों के शौकीन थे। राजा साहब ने 400/- प्रतिमास नक़द, मोटर, बँगला देने को लिखा था। सपरिवार बुलाया था। उन माहशयों को यह कहकर कि मैं बहुत बाग़ी आदमी हूँ, इसी वज़ह से मैंने सरकारी नौकरी छोड़ी है, राजा साहब को एक ख़त लिखा, ‘मैं आपको धन्यवाद देता हूँ कि आपने मुझे याद किया। मैंने अपना जीवन साहित्य-सेवा के लिए लगा दिया है। मैं जो कुछ लिखता हूँ, उसे आप पढ़ते हैं, इसके लिए आपको धन्यवाद देता हूँ। आप जो पद मुझे दे रहे हैं, मैं उसके योग्य नहीं हूँ। मैं इतने में ही अपना सौभाग्य समझता हूँ कि आप मेरे लिखे को ध्यान से पढ़ते हैं। अगर हो सका तो आपके दर्शन के लिए कभी आऊंगा। - एक साहित्य-सेवी, धनपत राय।”1

प्रेमचन्द जानते थे कि रियासतों का वातावरण कितना दूषित है, जहाँ जाकर भले लोग भी बिगड़ जाते हैं; क्योंकि मूलभूत दोष तो उस व्यवस्था का है। अतः उन्होंने न तो उस व्यवस्था को सुधारने या उसे आदर्श बनाने का प्रयत्न किया और न उससे समझौता ही किया। यदि राजाओं के प्रति प्रेमचन्द कटुता उत्पन्न न कर सके तो यह उनके मानवतावादी जीवन-दर्शन के कारण है। व्यक्ति-विशेष के प्रति कटुता उत्पन्न न कर उन्होंने उस व्यवस्था के प्रति ही विरोध प्रकट किया है।

देशी नरेशों और रियासतों पर प्रेमचन्द के विचारों को जानने के लिए ‘रंगभूमि’ (1924) और ‘कायाकल्प’ (1928) में चित्रित रियासतों और देशी नरेशों के जीवन पर दृष्टि डालना आवश्यक है। ‘रंगभूमि’ में कुँवर भरतसिंह, रानी जाद्दवी और विनयसिंह बनारस से संबंधित हैं, म्युनिसिपैलिटी के प्रधान, कुँवर भरतसिंह के दामाद महेन्द्रकुमार सिंह चतारी के राजा हैं, इंदु उनकी पत्नी हैं। बनारस के अतिरिक्त राजपूताने की रियासत उदयपुर-जसवंतनगर का भी विस्तार से चित्रण किया गया है; यहाँ उदयपुर के माहराजा और दीवान सरदार नीलकंठ सिहं प्रमुख हैं। इन दोनों प्रदेशों का संबंध ज़िला हाकिम और ज़िलाधीश मिस्टिर जोसफ़ विलियम क्लार्क से आता है। उपर्युक्त पात्र रियासतों और देशी नरेशों की यथार्थ स्थिति का चित्र उपस्थित कर देते हैं। इसी प्रकार ‘कायाकल्प’ में जगदीशपुर की महारानी देवप्रिया और वहाँ के दीवान ठाकुर हरिसेवक सिंह तथा रानी साहिबा के चचेरे देवर और नए राजा साहब ठाकुर विशालसिंह हैं जिनके वसुमति, रामप्रिया और राहिणी नाम की तीन रानियाँ हैं और जो संतान-कामना के कारण पुत्रवत् चौथी शादी करते हैं। जिस प्रकार ‘रंगभूमि’ में अंग्रेज़ हुक्काम मिस्टर क्लार्क हैं उसी प्रकार ‘कायाकल्प’ में ज़िले के मजिस्ट्रेट मि. जिम और फौज के कप्तान मि. सिम हैं। रियासती वातावरण में भले आदमी भी किस प्रकार बिगड़ जाते हैं यह बताने के लिए ‘रंगभूमि’ में विनय और ‘कायाकल्प’ में चक्रधर की संयोजना हुई है।

इन सब राजाओं के नैतिक बल का बड़ा ही यथार्थ और व्यंग्यात्मक चित्रण प्रेमचन्द ने किया है। उनका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं है। प्रेमचन्द ने बताया है कि कायरता का दूसरा नाम ‘राजा’ है। राजा से अभिप्राय देशी नरेशों से है जो भय के साक्षात् अवतार बने हुए हैं।

चतारी के राजा महेन्द्रकुमार सिंह अपनी पत्नी इंदु से जो अनेक पक्षों पर वार्तालाप करते हैं, वह उनके वास्तविक रूप को सामने ला देता है। सेवा-समितियों से सहानुभूति रखना भी उनके लिए आपत्तिजनक है। आत्म-स्वाधीनता जैसी कोई चीज़ उनमें नहीं पाई जाती। “तुम्हारी समझ में और मेरी समझ में बड़ा अंतर है। यदि मैं बोर्ड का प्रधान न होता, यदि मैं शासन का एक अंग न होता, अगर मैं रियासत का स्वामी न होता, तो स्वच्छंदता से प्रत्येक सार्वजनिक कार्य में भाग लेता। वर्तमान स्थिति में मेरा किसी संस्था में भाग लेना इस बात का प्रमाण समझा जाएगा कि राज्याधिकारियों को उससे सहानुभूति है। मैं यह भ्रांति नहीं फैलाना चाहता।”2

समिति के सेवक गढ़वाल जाने के लिए स्टेशन पर एकत्रा हो रहे थे। इंदु अपने पिता महेन्द्रकुमार सिंह की कायरता की पर्याप्त भर्त्सना करके विनय से मिलने और समिति के सेवकों को विदा देने स्टेशन जाती है। उसके जाने पर राजा साहब सोचने लगे, ”इसको ज़रा भी चिंता नहीं कि हुक्काम के कानों तक यह बात पहुँचेगी, तो वह मुझे क्या कहेंगे ! समाचार-पत्रों के संवाददाता यह वृत्तांत अवश्य ही लिखेंगे, और उपस्थित महिलाओं में चतारी की रानी का नाम मोटे अक्षरों में लिखा हुआ नज़र आएगा।”3

आगे जब उनका स्वाभिमान (?) जाग्रत होता है तो वे स्वयं स्टेशन पहुँचते है और इंदु से अपनी पूर्व दुर्बलता भी निःसंकोच स्वीकार करते हैं, ”‘इंदु इतना अविश्वास मत करो...तुम्हारी यह बात मेरे मन में बैठ गई कि हुक्काम का विश्वासपात्र बने रहने के लिए अपनी स्वाधीनता का बलिदान क्यों करते हो। नेकनाम रहना अच्छी बात है, किंतु नेकनामी के लिए सच्ची बातों में दबना अपनी आत्मा की हत्या करना है।”4 पर, जब उनके स्टेशन जाने का समाचार दैनिक पत्र में आलोचना सहित प्रकाशित हुआ तब वह सारा स्वाभिमान छू-मंतर हो गया। कमिश्नर साहब की संदेहात्मक दृष्टि से विचलित हो उठे। सारी रात इसी चिंता में डूबे रहे और और प्रातःकाल जब दे-चार मित्र उनसे मिलने आए तब उसी समाचार की चर्चा हो उठी। एक साहब बोले, “मैं कमिश्नर से मिलने गया था, तो वह इसी लेख को पढ़ रहा था और रह-रहकर ज़मीन पर पैर पटकता था।” इस पर राजा महेन्द्रकुमार सिंह के होश और उड़ गए। वे सीधे घबराये हुए कमिश्नर के बँगले पर पहुँचे। वहाँ अरदली के कहने पर एक घंटे प्रतीक्षा करते रहे और ऐसा कहकर कि मिस्टर जान सेवक को पांडेपुर की जमीन दिलाने के लिए जनता का विश्वासपात्र बनने का ढोंग रचा था, कमिश्नर को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया। यही नहीं, मिस्टर सेवक तक से उन्हें डर है; क्योंकि मिस्टर सेवक और मिस्टर क्लार्क के सम्बन्ध अच्छे हैं। इस कारण वे अनुचित ढंग से भी मिस्टर सेवक की सहायता करने को उद्यत हैं। “तुम जानती हो, मिस्टर सेवक की यहाँ के अधिकारियों से कितनी राह-रस्म है। मिस्टर क्लार्क तो उनके द्वार के दरबान बने हुए हैं। अगर मैं उनकी इतनी सेवा न कर सका, तो हुक्काम का विश्वास मुझ से उठ जाएगा।”5

इस पर इंदुमती की टिप्पणी उनके सारे अधिकारों से खोखलेपन को उघाड़कर रख देती है, “मैं नहीं जानती थी कि प्रधान की दशा इतनी शोचनीय होती है।“6

प्रेमचन्द आगे चलकर प्रधान की यथार्थ स्थिति का चित्रण और विस्तार से करते हुए लिखते हैं, ”प्रधान केवल राज्याधिकरियों के हाथ का खिलोना है। उनकी इच्छा से जो चाहे करे, उनकी इच्छा के प्रतिकूल कुछ नहीं कर सकता। वह संख्या-बिन्दु है, जिसका मूल्य केवल दूसरी संख्याओं के सहयोग पर निर्भर है।”7

स्वयं महेन्द्रकुमार सिंह के मुख से राजवर्ग की कापुरुषता और विवशता का वर्णन करवाते हुए प्रेमचन्द लिखते हैं, ”तुम्हें मालूम नहीं, इन अंग्रेज़ी हुक्काम के कितने अधिकार होते हैं। यो चाहूँ तो इसे नौकर रख लूँ, मगर इसकी एक शिकायत से मेरी आबरू ख़ाक में मिल जाएगी। ऊपर वाले हाकिम इसके खिलाफ़ मेरी एक भी न सुनेंगे। रईसों को इतनी स्वतन्त्रता भी नहीं, जो एक साधारण किसान को है। हम सब इनके हाथों के खिलौने हैं, जब चाहे, ज़मीन पर पटक कर चूर-चूर कर दें।”8 और इस दयनीय दीनता पर इंदु अपने मन में सोचती है, “बच्चे हौआ से भी इतना न डरते होंगे।”9 राजाओं की भयग्रस्त स्थिति पर इससे सुन्दर व्यंग्य और क्या हो सकता है !

इसी प्रकार राजपूताने की रियासत उदयपुर-जसवंतनगर का भी वर्णन ‘रंगभूमि’ में मिलता है। रेज़ीडेंट का दबदबा कितना रहता है इस पर दीवान सरकार नीलकंठ सिह विनय से कहते हैं, “रेजीडेंट साहब की इच्छा के विरुद्ध हम तिनका तक नहीं हिला सकते।”10 महाराजा अपने को ईश्वर का अवतार समझते हैं, पर वास्तव में देखा जाए तो वे भय के अवतार हैं। विनय से हुआ उनका वार्तलाप उनकी कायरता और नैतिक पतन पर भलि-भाँति प्रकाश डाल देता है – “शिव-शिव ! बेटा, तुम राजनीति की चालें नहीं जानते। यहाँ एक कैदी भी छोड़ा गया, और रियासत पर वज्र गिरा। सरकार कहेगी, मेम को न जाने किस नीयत से छिपाए हुए है, कदाचित् उस पर मोहित है, तभी तो पहले दण्ड का स्वाँग भरकर विद्रोहियों को छोड़ देता है। शिव-शिव! रियासत धूल में मिल जाएगी, रसातल को चली जाएगी। कोई न पूछेगा कि यह बात सच है या झूठ। कहीं इस पर विचार न होगा। हरि-हरि ! हमारी दशा साधारण अपराधियों से भी गई-बीती है। उन्हें तो सफ़ाई देने का अवसर दिया जाता है, न्यायालय में उन पर कोई धारा लगाई जाती है और उसी धारा के अनुसार उन्हें दण्ड दिया जाता है। हमसे कौन सफ़ाई लेता है। हमारे लिए कौन-सा न्यायालय है ! हरि-हरि ! हमारे लिए न कोई कानून है, जो अपराध चाहा, लगा दिया। जो दण्ड चाहा दे दिया। न कहीं अपील है, न फ़रियाद। राजे विषय-प्रेमी कहलाते हैं ही, उन पर यह दोषारोपण होते कितनी देर लगती है ! कहा जाएगा, तुमने क्लार्क की अति रूपवती मेम को अपने रनिवास में छिपा लिया और झूठ-मूठ उड़ा दिया कि वह गुम हो गई। हरि-हरि ! शिव-शिव ! सुनता हूँ, बड़ी रूपवती स्त्री है, चाँद का टुकड़ा है, अप्सरा है। बेटा, इस अवस्था में यह कलंक न लगाओ। वृद्धावस्था भी हमें ऐसे कुत्सित दोषों से नहीं बचा सकती। मशहूर है, राजा लोग रसादि का सेवन करते हैं, इसलिए जीवन-पर्यन्त हृष्ट-पुष्ट रहते हैं। शिव-शिव ! यह राज्य नहीं है, अपने कर्मों का दण्ड है। नकटा जिये बुरे हवाल ! शिव-शिव! जब कुछ नहीं हो सकता। सौ-पचास निर्दोष मनुष्यों का जेल में पड़ा रहना कोई असाधारण बात नहीं। वहाँ भी तो भोजन-वस्त्र मिलता है ही.....

विनय को राज से घृणा हो हो गई। सोचा, इतना नैतिक पतन, इतनी कायरता ! यों राज्य करने से डूब मरना अच्छा है।”11

और उधर कुँवर भरतसिंह भी भयभीत होकर अपनी रियासत कोर्ट ऑफ़ वार्ड्स के सुपुर्द कर देते हैं। इस प्रकार प्रेमचन्द ने इन राजा-महाराजाओं के व्यक्तित्व को बड़े ही यथार्थ ढंग से चित्रित किया है, उस पर कोई आवरण नहीं डाला।

रियासत पर वास्तविक शासन पोलीटिकल एजेण्ट का रहता है; राजा उसी के संकेत पर नाचता है। उसको प्रसन्न करने के लिए वह अपने व्यक्तित्व का सर्वनाश तो करता ही है, प्रजा पर अत्याचार करने से कभी नहीं चूकता। मिस्टर क्लार्क पोलीटिकल एजेंट के पद का महत्त्व प्रतिपादित करते हुए सोफिया से कहते हैं, “‘हाँ, मैं एक रियासत का पोलीटिकल एजेण्ट बना दिया जाऊंगा। यह पद बड़े मज़े का है। राजा तो केवल नाम के लिए होता है, सारा अख़्तियार तो एजेण्ट ही के हाथों में रहता है।”12 उसका अधिकार सर्वत्र, यहाँ तक कि राजा के महल के अंदर भी होता है।... वह राजा के खाने, सोने, आराम करने का समय तक नियत कर सकता है। राजा किससे मिले, किससे दूर रहे, किसका आदर करे, किसकी अवहेलना करे, ये सब बातें एजेण्ट के अधीन हैं। वह यहाँ तक निश्चत करता है कि राजा की मेज़ पर कौन-कौन से प्याले आएंगे, राजा के लिए कैसे और कितने कपड़ों की ज़रूरत है, यहाँ तक कि कि राजा के विवाह का भी निश्चय करता है। बस, यों समझो कि वह रियासत का ख़ुदा होता है।”13

इंदु के दुर्व्यवहार पर सोफ़िया के मुख से प्रेमचन्द कहलवाते हैं, “इसे अपनी रियासत का घमंड है ; मैं दिखा दूंगी कि वह सूर्य का स्वयं प्रकाश नहीं, चाँद की पराधीन ज्योति है। इसे मालूम हो जाएगा कि राजा और रईस, सबके-सब शासनाधिकारियों के हाथ के खिलौने हैं।”14

सूरदास पर अत्याचार किए जाने के निर्णय पर सोफ़िया मिस्टर क्लार्क को इस बात का परिचय देती है कि राजा साहब इसका घोर विरोध करेंगे, इस पर मिस्टर क्लार्क किस ढंग से उत्तर देते हैं, “थुह ! उनमें इतना नैतिक साहस नहीं है। वह जो कुछ करते हैं, हमारा रुख़ देखकर करते हैं। इसी वज़ह से उन्हें कभी असफलता नहीं होती। हाँ, उनमें यह विशेष गुण है कि वह हमारे प्रस्तावों का रूपान्तर करके अपना काम बना लेते हैं और उन्हें जनता के सामने ऐसी चतुरता से उपस्थित करते हैं कि लोगों की दृष्टि में उनका सम्मान बढ़ जाता है।”15

‘कायाकल्प’ में भी प्रेमचन्द राजा विशालसिंह का व्यक्तित्व इसी रंग में रँगकर चित्रित करते हैं। विशालसिंह ज़िले के मजिस्ट्रेट मिस्टर जिम से जब मिलने जाते हैं तब उनके साथ किस प्रकार का व्यवहार होता है, “थोड़ी देर तक तो राजा साहब बाग में टहलते रहे। फिर मोटर पर जा बैठे और घंटे भर इधर-उधर घूमते रहे। 8 बजे वह लौटकर आए, तो मालूम हुआ, अभी साहब नहीं आए। फिर लौटे, इसी तरह घंटे-घंटे-भर के बाद वह तीन बार आए, मगर साहब बहादुर अभी तक न लौटे थे।

सोचन लगे, इतनी रात गये अगर मुलाक़ात हो भी गई, तो बातचीत करने का मौका कहाँ ! शराब के नशे में चूर होगा। आते ही सोने चला जाएगा। मगर कम-से-कम मुझे देखकर इतना तो समझ जाएगा कि वह बेचारे अभी तक खड़े हैं। शायद दया आ जाए।”16

और जिम के आने पर :

“जिम - ओ ! डैम राजा अभी निकला जाओ। तुम भी बाग़ी हो तुम बाग़ी की सिफ़ारिश करता है, बागी को पनाह देता है। सरकार का दोस्त बनता है। अभी निकल जाओ। राजा और रैयत सब एक है। हम किसी का भरोसा नहीं करता। हमको अपने ज़ोर का भरोसा है। राजा का काम बाग़ियों को पकड़वाना उनका पता लगाना है। उनका सिफ़ारिश करना नहीं। अभी निकल जाओ।

यह कहकर राजा साहब की ओर झपटा... राजा दीन भाव से बोले - साहब, इतना ज़ुल्म न कीजिए । इसका जरा भी खयाल न कीजिएगा कि मैं शाम से अब तक आपके रदवाज़े पर खड़ा हूँ! कहिए तो आपके पैरों पडूँ। जो कहिए, करने को हाज़िर हूँ। मेरी अर्ज़ कबूल कीजिए।

जिम - ओ डैमिट ! बक-बक मत करो, सूअर, अभी निकल जाओ, नहीं तो हम ठोकर मारेगा।”17

आगे प्रेमचन्द ने विशालसिंह का जो क्रोध और मिस्टर जिम से उनका मल्ल-युद्ध बताया है उसका कोई महत्त्व नहीं, क्यांकि जिम उस समय शराब में धुत् था।

विशाल सिंह के राजगढ़ी के उत्सव में शमिल होने के लिए दूर-दूर से राजा-महाराजा आए। प्रेमचन्द उनके कैम्प का वर्णन करते हुए लिखते हैं, “बड़े-बड़े नरेश आए थे। कोई चुने हुए दरबारियों के साथ, कोई लाव-लश्कर लिए हुए। कहीं ऊदी वर्दियों की बहार थी, तो कही केसरिये बाने की। कोई रत्नजटित आभूषण पहने, कोई अंग्रेज़ी सूट से लैस, कोई इतना विद्वान कि विद्वानों में शिरोमणि, कोई इतना मूर्ख कि मूर्ख-मंडली की शोभा। कोई 5 घंटे स्नान करता था तो काई सात घंटे पूजा। कोई दो बजे रात को सोकर उठता था, कोई दो बजे दिन को। रात-दिन तबले ठनकते रहते थे। कितने ही महाशय ऐसे भी थे, जिनका दिल अंग्रेज़ी कैम्प का चक्कर लगाने में ही कटता था। दो-चार सज्जन प्रजावदी भी थे।...विद्वान या मूर्ख, राजसत्ता के स्तम्भ या लोकसत्ता के भक्त, सभी अपने को ईश्वर का अवतार समझते थे, सभी ग़रूर के नशे में मतवाले, सभी विलासिता में डूबे हुए, एक भी ऐसा नहीं जिसमें चरित्र-बल हो, सिद्धांत-प्रेम हो, मर्यादा-शक्ति हो।”18

उसी कैम्प के राजाओं का चित्रण करते हुए प्रेमचन्द लिखते हैं :

“राजा-रईस अपनी वासनाओं के सिवा और किसी के गुलाम नहीं होते।”19

इस प्रकार राजाओं की कापुरुषता तथा उनके विलासी जीवन का चित्रण ‘रंगभूमि’ और ‘कायाकल्प’ में स्पष्ट रूप से किया गया है। इन राजाओं और रियासतों के अस्तित्व के पीछे जो कारण हैं उनका स्पष्टीकरण इंदु के मुख से प्रेमचन्द करवाते हैं, “हमारे पूर्वजों ने अंग्रेज़ों की उस समय प्राण-रक्षा की थी जब उनकी जानों के लाले पड़े हुए थे। सरकार उन अहसानों को मिटा नहीं सकती।”20 राजाओं ने जो देशद्रोही कार्य तथा देश के प्रति जो विश्वासघात किया उसके फलस्वरूप ‘बख़्शीश’ के रूप में उन्हें रियासतें दी गयीं।

राजाओं के चित्रण तक ही प्रेमचन्द इस समस्या को स्पर्श नहीं करते वरन् और भीतर रियासतों के शासन-प्रबंध पर भी प्रकाश डालते हैं। वास्तव में रियासतों के शासन-प्रबन्ध की दूषित प्रणाली बताना ही प्रेमचन्द का मुख्य उद्देश्य है। राजाओं का तो वे चित्रण करके ही छोड़ देते हैं, उनके प्रति घृणा का कोई भाव पैदा नहीं होने देते। रियासती प्रबन्ध पर उन्होंने जगह-जगह जिस अतिरंजना या कटुता का परिचय दिया है, वह उक्त व्यवस्था की असारता व निरर्थकता का परिचायक है। जसवन्तनगर के शासन-प्रबन्ध पर डाकू वीरपाल विनय के प्रश्न पर टिप्पणी करता है -

“वीरपाल-... ये लोग प्रजा को दोनों हाथों से लूट रहे हैं। इनमें न दया है, न धर्म। हैं हमारे ही भाई-बन्द, पर हमारी गर्दन पर छुरी चलाते हैं। किसी ने ज़रा साफ़ कपड़े पहने, ओर लोग उनके सिर हुए। जिसे घूस न दीजिए, वही आपका दुश्मन है। चोरी कीजिए, डाके डालिए, घरों में आग लगाइए, गरीबों का गला काटिए, कोई आपसे न बोलेगा। बस, कर्मचारियों की मुट्ठियाँ गर्म करते रहिए। दिन-दहाड़े खून कीजिए, पर पुलिस की पूजा कर दीजिए, आप बेदाग़ छूट जाएंगे, आपके बदले कोई बेक़सूर फाँसी पर लटका दिया जाएगा। कोई फ़रियाद नहीं सुनता। कौन सुने, सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। यही समझ लीजिए कि हिंसक जंतुओं का एक गोल है, सबके-सब मिलकर शिकार करते हैं मिल-जुलकर खाते हैं।”21

रियासत का डाकिया विनय से कहता है- “तलब है, वह साल-भर तक नहीं मिलती, लेकिन यहाँ जो ऊँचे ओहदे पर है, उसका पेट भी उतना ही बड़ा है।”22

न्यायालयों पर व्यंग्य करता हुआ वीरपाल विनय से कहता है, “यहाँ के न्यायालयों से न्याय की आशा रखना चिड़ियों से दूध निकलाना है। हम सबके-सब इन्हीं अदालतों के मारे हुए हैं। मैंने कोई अपराध नहीं किया था, मैं अपने गाँव का मुखिया था; किन्तु मेरी सारी जायदाद केवल इसलिए जब्त कर ली गयी कि मैंने एक असहाय युवती को इलाक़ेदार के हाथ से बचाया था।.... बस, इलाकेदार उसी दिन से मेरा जानी दुश्मन हो गया। मुझ पर चोरी का अभियोग लगाकर क़ैद करा दिया। अदालत अंधी थी, जैसा इलाक़ेदार ने कहा, वैसा न्यायाधीश ने किया। ऐसी अदालतों से आप व्यर्थ की आशा रखते हैं।”23

बड़े-बड़े अफ़सरों पर व्यंग्य करते हुए वीरपाल विनय से कहता है, “रियासत आप जैसे धर्मपरायण, निर्भीक और स्वाधीन पुरुष के रहने योग्य जगह नहीं है, यहाँ उसी का निबाह है, जो परले दर्ज़े का घाघ, कपटी, पाखंडी और दुरात्मा हो, अपना काम निकालने के लिए बुरे-से-बुरा काम करने से भी न हिचके।”24

वीरपाल ने जहाँ रियासत की स्थिति का वर्णन सीधे ढंग से अथवा व्यंग्य के साथ किया है; वहाँ दीवान बडे़ आलंकारिक ढंग से शासन का वर्णन करते हैं, “रियासतों को आप सरकार की महलसरा समझिए, जहाँ सूर्य का भी गुज़र नहीं हो सकता। हम सब इस हरमसरा के बख्शी ख्वाजासरा हैं। हम किसी की प्रेमरसपूर्ण दृष्टि को इधर उठने न देंगे, कोइ मनचला जवान इधर क़दम रखने का साहस नहीं कर सकता। अगर ऐसा हो, तो हम अपने पद के अयोग्य समझे जाएँ। हमारा रसीला बादशाह, इच्छानुसार मनोविनोद के लिए, कभी-कभी पदार्पण करता है। हरमसरा के सोये भाग्य उस दिन जाग जाते हैं। ... आपने इस हरमसरा में घुस आने का दुस्साहस किया है, यह हमारे रसीले बादशाह की एक आँख नहीं भाता, और आप अकेले नहीं हैं, आपके साथ समाज-सेवकों का एक जत्था है। इस जत्थे के सम्बन्ध में भाँति-भाँति की शंकाएँ हो रही हैं। नादिरशाही हुक़्म है कि जितनी जल्द हो सके, यह जत्था हरमसरा से दूर हटा दिया जाए।.....हम आपको अपने प्रेम-कुंज में आग न लगाने देंगे।”25

रियासतों का सम्बन्ध अफ़सरों की मनमानी पर निर्भर है। दीवान साहब कहते हैं, “सरकार की रक्षा में हम मनमानी कर वसूल करते हैं, मनमाने कानून हैं, मनमाने दंड लेते हैं, कोई चूँ नहीं कर सकता।”26

विनयसिंह के कारावास-दंड पर डाक्टर गांगुली अधिकारियों की निरंकुशता पर कहते हैं, “वहाँ का हाकिम लोग खु़द पतित है। डरता है, रियासत में स्वाधीन विचारों का प्रसार हो जाएगा, तो हम प्रजा को कैसे लूटेगा। राजा मसनद लगाकर बैठा रहता है, उसका नौकर-चाकर मनमाना राज करता है।”27

अफ़सरों की मनमानी का एक और उदाहरण वह घोषणा है जिसमें कहा गया है कि जसवंतनगर एक सप्ताह के लिए खाली कर दिया जाए। इस घोषणा पर सोफ़िया का मत रियासतों के प्रबन्ध की खुली आलोचना करता है, “ऐसी ज़्यादती रियासतों के सिवा और कहीं नहीं हो सकती।”28

प्रेमचन्द बताते हैं कि इन रियासतों का शासन-प्रबन्ध न्याय पर नहीं, आंतक पर निर्भर है। सरदार नीलकंठ सिंह विनय से कहता है, “......उनके दिल से रियासत का भय जाता रहेगा, और जब भय न रहा, तो राज्य भी नहीं रह सकता। राज्य-व्यवस्था का आधार न्याय नहीं, भय है।”29

रियासती अफ़सरों के मनमाने अत्याचारों का वर्णन ‘कायाकल्प’ में भी विस्तार से किया गया है। मनोरमा चक्रधर से कहती है, “अभी एक गोरा आ जाए, तो घर में दुम दबाकर भागेंगे। उस वक्त जबान भी न खुलेगी। उससे ज़रा आँखें मिलाइए तो देखिए, ठोकर जमाता है या नहीं। उससे तो बोलने की हिम्मत नहीं, बेचारे दीनों को सताते फिरते हैं। यह तो मारे को मारना हुआ। इसे हुकूमत नहीं कहते। यह चोरी भी नहीं है। यह केवल मुरदे और गिद्ध का तमाशा है।”30

आदर्श राजाओं की बात अब कल्पना में ही सत्य हो सकती है। प्रेमचन्द इस तथ्य से भली-भाँति परिचित थे, इसलिए उन्होंने उस आदर्श व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न नहीं किया। समय बदल जाने पर आदर्श भी बदल जाते थे। प्रेमचन्द लिखते हैं, “अब ज़माना नहीं रहा, जब राजे-रईसों के नाम आदर से लिए जाते थे, जनता को स्वयं ही उनमें भक्ति हाती थी। वे दिन विदा हो गए। ऐश्वर्य-भक्ति प्राचीन काल की राज्य-भक्ति का एक अंश थी। प्रजा अपने राजा, जागीरदार, यहाँ तक कि अपने ज़मींदार पर सिर कटा देती थी। वह सर्वमान्य नीति-सिद्धान्त था कि राजा भोक्ता है, प्रजा भोग्य है। यही सृष्टि का नियम था, लेकिन आज राजा और प्रजा में भोक्ता और भोग्य का सम्बन्ध नहीं है, जन-सेवक और सेव्य का सम्बन्ध है। अब अगर किसी राजा की इज्ज़त है, तो उसकी सेवा-प्रवृत्ति के कारण,अन्यथा उसकी दशा दाँतों तले दबी हुई जिह्ना की-सी है।”31

फिर रियासतों की समस्या क्या है? प्रेमचन्द विनय के एक वाक्य में रियासतों के भविष्य पर लिखते हैं, “इससे तो यह कहीं अच्छा था कि रियासतों का निशान ही न रहता।”32 रियासतों और राजाओं की निरर्थकता प्रेमचन्द ने ‘रंगभूमि’ और ‘कायाकल्प’ में भली-भाँति प्रकट कर दी है। रियासतों और देशी नरेशों का सारा दबदबा अंग्रेज़ी सत्ता के कारण था, यह बात आज सिद्ध हो चुकी है।

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संदर्भ-संकेत

1 ‘प्रेमचंद : घर में’, पृ. 97

2 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 272

3 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 275

4 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 280

5 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 282

6 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 287

7 वही

8 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 288

9 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 294

10 वही

11 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 231

12 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 207-209

13 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 410

14 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 414

15 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 343

16 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 347-348

17 ‘कायाकल्प’, पृ. 205-206

18 ‘कायाकल्प’, पृ. 134

19 ‘कायाकल्प’, पृ. 146

20 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 371

21 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 302-303

22 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 304-305

23 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 313-314

24 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 314

25 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 319-320

26 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 321

27 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 429

28 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 36

29 ‘रंगभूमि’ (भाग-2), पृ. 200

30 ‘कायाकल्प’, पृ. 133

31 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 266

32 ‘रंगभूमि’ (भाग-1), पृ. 329

साम्प्रदायिक समस्या

यहाँ साम्प्रदायिकता से अभिप्राय हिन्दू और मुसलमान सम्प्रदायों से है। भारत में हिन्दुत्व और इस्लाम के झगड़े बहुत पुराने समय से चले आ रहे हैं। अतः हिन्दू-मुस्लिम एकता की समस्या नई नहीं है; उसका अपना इतिहास है। इस्लाम धर्म जेता बनकर इस देश में आया। हिन्दुत्व का विनाश करके उसने अपना प्रसार करना चाहा। इस्लाम की मज़हबी कट्टरता ने उसे और उग्र बना दिया। अतः प्रारम्भ में इस्लाम एक आक्रमक शक्ति थी। मुग़ल शासनकाल में उसे फैलाने के सभी अच्छे-बुरे साधन काम में लाये गए। दुर्भाग्य से, हिन्दू-मुसलमानों के सम्बन्धों में कटुता की भावना प्रारम्भ से ही उत्पन्न हो गई थी। मध्ययुगीन सन्तों और सूफ़ियों ने हिन्दू-मुस्लिम भेद-भाव दूर करने में काफ़ी सहायता पहुँचाई। यदि सन्तों की परम्परा आगे और विकसित हुई होती तो सम्भव था, उक्त समस्या का महत्त्व नगण्य रह जाता, लेकिन ब्रिटिश शासन का सबसे बड़ा दुष्परिणाम हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य के रूप में सामने आया। हिन्दुओं-मुसलमानों को आपस में लड़ाकर अंग्रेज़ों ने भारत में अपने शासन की नींव मज़बूत की और कूटनीतिक तौर-तरीक़ों से ऐसी भयावह स्थिति पैदा कर दी कि उक्त समस्या दिन-पर-दिन उलझती ही गई। उसे सुलझाने के सारे नेक उपाय व्यर्थ प्रमाणित हुए। इतिहास से यह बात भली-भाँति स्पष्ट हो जाती है कि हिन्दू-मुस्लिम समस्या का आधार धार्मिक नहीं है, वरन् उसका विशिष्ट राजनीतिक पहलू है; जिसने एकता के किसी भी प्रयत्न को कारगर सिद्ध नहीं होने दिया। ऊपरी तौर पर उसका रूप धार्मिक दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में धर्म को तो, राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा पूरी करने के लिए, मात्रा ‘हथियार’ के रूप में इस्तेमाल किया गया। यदि राजनीतिक पहलू मूल में नहीं होता तो केवल धर्म के कारण इन दो जातियों में इतना वैमनस्य कभी नहीं बढ़ता। भारत में अनेक धर्मावलम्बी रहते हैं और उनमें इतनी कटुता ढूँढे़ भी नहीं मिलती; जितनी कि हिन्दू और इस्लाम धर्म के मानने वालों में पाई जाती है।

इस राजनीतिक पहलू से हिन्दू और मुसलमान कभी अपरिचित नहीं रहे, लेकिन व्यक्तिगत स्वार्थों ने उन्हें उचित मार्ग पर नहीं आने दिया। हिन्दुओं ओर मुसलमानों की एक मिली-जुली संस्कृति का निर्माण करने के प्रयत्न जब निजी स्वार्थों से टकराये, तब मज़हब के नाम पर सीधी और धर्मपरायण जनता को बरगलाया गया ओैर दंगे-फ़सादों को प्रोत्साहित किया गया। अन्त मे अंग्रेजों की चाल सफल हुई। देश को कमज़ोर बनाने की नीयत से उसका विभाजन कर दिया गया। लेकिन देश का विभाजन हिन्दू-मुस्लिम समस्या का कोई हल नहीं है। केवल कुछ लोगों की स्वार्थ-भावना की सिद्धि व तृप्ति ही इससे हुई।

प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों में जिस तरह अनेक समस्याओं को स्थान दिया है; उसी तरह उनमें हिन्दू-मुस्लिम समस्या का भी प्रवेश किया गया है। ‘कायाकल्प’ में तो इस विषय पर बहुत विस्तार से लिखा गया है। प्रेमचन्द हिन्दू-मुस्लिम एकता के जबरदस्त समर्थक थे। उनकी रचनाएँ हिन्दू और मुसलमान दोनों समान चाव से पढ़ते हैं। उपन्यासों के अतिरिक्त अनेक कहानियों में भी वे इस प्रश्न को लेकर चले हैं और उनमें वहाँ मानवीय आदर्शों की प्रतिष्ठा की है।

हिन्दू-मुस्लिम झगड़ां के क्या कारण हैं, कौन-से तत्त्व इन झगड़ों को उत्तेजना देते हैं, इस समस्या के सुलझाने का यथार्थ और स्थायी हल क्या हो जाता है आदि विषyYयों पर प्रेमचन्द ने अपने विचार अपने उपन्यासों में जगह-जगह व्यक्त किये हैं।

‘कायाकल्प’ में यह समस्या गाय की क़ुरबानी को मुख्य विषय बनाकर उपस्थित की गई है। आगरा शहर में गाय की क़ुरबानी पर फ़साद हो जाता है। इस तरह के फसाद कौन लोग करवाते हैं ? आगरा हिन्दू सभा एवं सेवा-समिति के सदस्य यशोदानन्दन जब बनारस से लौटकर आगरा आते हैं तो एक थानेदार उनका भी असबाब देखना शुरू करता है। इस पर यशोदानन्दन आश्चर्य से पूछते हैं, “क्यों साहब, आज यह सख़्ती क्यों है ?

थानेदार - आप लोगों ने जो काँटे बोये हैं, उन्हीं का फल है। शहर में फ़साद हो गया है।

यशोदा - अभी तीन दिन पहले तो अमन का राज्य था, यह भूत कहाँ से उठ खड़ा हुआ ?

इतने में समिति का एक सेवक दौड़ता हुआ आ पहुँचा। यशोदानन्दन ने आगे बढ़कर पूछा :

क्यों राधामोहन, यह क्या मामला हो गया ? अभी जिस दिन मैं गया हूँ, उस दिन तक तो दंगे का कोई लक्षण न था।

राधा - जिस दिन आप गये, उसी दिन पंजाब से मौलवी दीन मुहम्मद साहब का आगमन हुआ। खुले मैदान में मुसलमानों का एक बड़ा जलसा हुआ। उसमें मौलाना साहब ने जाने क्या ज़हर उगला कि तभी से मुसलमानों को कुरबानी की धुन सवार है। इधर हिन्दुओं को यह ज़िद है कि चाहे खून की नदी बह जाए, पर क़ुरबानी न होने पायेगी। दोनों तरफ़ से तैयारियाँ हो रही हैं, हम लोग तो समझाकर हार गये।”1

इसमें संदेह नहीं कि इन फ़सादों को चाहे किसी भी उद्देश्य से पैदा किया जाता हो, पर इनको उत्तेजना मज़हब से ही मिलती है। मज़हब भी वह, जिसे दक़ियानूस मौलवी या पंडे बताते हैं। धर्म के नाम पर ही यह सारे कुकृत्य होते हैं, अच्छे-अच्छे लोग धार्मिक भावावेश में आकर हिंसक बन जाते हैं, पथभ्रष्ट हो जाते हैं, मानवताहीन हो जाते हैं। ख्वाजा महमूद जिन्हें हिन्दू फरिश्ता समझते थे, जो हिन्दू-मुसलमानों की मिली-जुली सेवा-समिति के सदस्य थे, मौलवी दीन मुहम्मद साहब की तक़रीर से इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि क़ुरबानी को लेकर होनेवाले फ़साद का नेतृत्व करने लगते हैं। यशेदानन्दन इस कायापलट पर अपना मत प्रकट करता है, “अगर महमूद में सचमुच यह कायापलट हो गई है, तो यही कहूंगा कि धर्म से ज्यादा द्वेष पैदा करनेवाली वस्तु संसार में नहीं।”2

इधर हिन्दू भी उत्तेजित हो जाते हैं। स्वयं यशोदानन्दन, जिसने अभी तक मानसिक सन्तुलन नहीं खोया था, चुनौती के स्वर में कहता है, “ख़्वाजा महमूद के द्वार पर कुरबानी होगी। उनके द्वार पर इसके पहले या तो मेरी क़ुरबानी हो जायगी या ख़्वाजा मुहम्मद की।” और ताँगे में बैठकर वे तुरन्त रंगभूमि पर पहुँच जाते हैं; जहाँ ख्वाजा महमूद से उनकी भेंट होती है।

यशोदानन्दन ने त्योरियाँ बदलकर कहा – “क्यों ख़्वाजा साहब, आपको याद है, इस मुहल्ले में कभी कुरबानी हुई है ?

महमूद - जी नहीं, जहाँ तक मेरा ख़याल है, यहाँ कभी क़ुरबानी नहीं हुई।

यशोदा - तो फिर आज आप यहाँ कुरबानी करने की नयी रस्म क्यों निकाल रहे हैं ?

महमूद - इसलिये कि क़ुरबानी करना हमारा हक़ है। अब तक हम आपके ज़ज्बात का लिहाज़ करते थे, अपने माने हुए हक़ को भूल गये थे; लेकिन जब आप लोग अपने हक़ों के सामने हमारे ज़ज्बात की परवाह नहीं करते, तो कोई वज़ह नहीं कि हम अपने हक़ों के सामने आपके ज़ज्बात की परवा करें। मुसलमानों की शुद्धि करने का आपको पूरा हक़ हासिल है, लेकिन कम-से-कम पाँच-सौ बरसों में आपके यहाँ शुद्धि की कोई मिसाल नहीं मिलती। आप लोगों ने एक मुर्दा हक़ को ज़िन्दा किया है। इसलिए न कि मुसलमानों की ताक़त और असर कम हो जाए। जब आप हमें जे़र करने के लिए नये-नये हथियार निकाल रहे हैं, तो हमारे लिए इसके सिवा और क्या चारा है कि हम अपने हथियार को दूनी ताक़त से चलायें।

यशोदा - इसके यह मानी है कि कल आप हमारे द्वारों पर, हमारे मन्दिरों के सामने, क़ुरबानी करें और हम चुपचाप देखा करें। आप यहाँ हरगिज़ क़ुरबानी नहीं कर सकते और करेंगे तो इसकी ज़िम्मेदारी आपके सिर होगी।”3

प्रेमचन्द ने यहाँ, और आगे भी यह बताया है कि यदि दोनों कौमें एक-दूसरे की भावनाओं का ख़याल रखने लगें तो बहुत-से ऐसे मामूली झगड़े जो आगे चलकर भीषण दंगे का रूप ले लेते हैं, अपने-आप सामप्त हो जाएँ। एक गाय के पीछे, एक पशु के पीछे इन्सानों का खून बहाना कभी भी मानवीय नहीं कहा जा सकता। गौ-हत्या यदि पाप है तो मानव-हत्या महापाप। यशोदानन्दन से चक्रधर कहता है, “अहिंसा का नियम गौओं के लिए ही नहीं, मनुष्यों के लिए भी तो है।”4 निःसन्देह गौ-हत्या भी जिस दृष्टिकोण से की जाती है वह भी नितांत अनुचित है। मूल कारण मनुष्य की, विचार से काम न लेने की प्रवृत्ति है। यशोदानन्दन और चक्रधर वाद-विवाद करते हैं -

“यशोदा - कैसी बातें करते हो जी ! क्या यहाँ खड़े होकर अपनी आँखों से गौ की हत्या होते देखें ?

चक्रधर - अगर आप एक बार दिल थामकर देख लेंगे, तो यक़ीन है कि फिर आपको कभी यह दृश्य न देखना पडे़गा।

यशोदा - हम इतने उदार नहीं हैं।....

चक्रधर - तो फिर आइये, लेकिन उस गौ को बचाने के लिए आपको एक भाई

का खून करना पड़ेगा।”5

यहाँ प्रेमचन्द बड़े यथार्थ ढंग से समस्या प्रस्तुत कर रहे थे कि अंत में चक्रधर को गांधीवादी बनाकर समस्या को वैयक्तिक रूप दे देते हैं। चक्रधर हिन्दुओं को, इस प्रकार शांत करके, फिर मुसलमानों के बीच में जाता है। प्रेमचन्द, इस्लाम की उदारता की ओर संकेत करवाते हुए, चक्रधर से, एक-दूसरे की भावनाओं की क़द्र करने वाली बात को यहाँ पुनः दोहराते हैं, “इस्लाम की इज्ज़त मेरे दिल में है, वह मुझे बोलने के लिए मजबूर कर रही है। इस्लाम ने कभी दूसरे मज़हब वालों की दिलजारी नहीं की। उसने हमेशा ज़ज्बात का एहतराम किया है, बगदाद और रूस, स्पेन और मिस्र की तारीखें उस मज़हबी आज़ादी की शाहिद हैं, जो इस्लाम ने उन्हें अता की थीं। अगर आप हिन्दू जज़्बात का लिहाज़ करके किसी दूसरी जगह क़ुरबानी करें, तो यकीनन इस्लाम के वकार में फ़र्क न आयेगा।”6

मनुष्यता सद्विचारों के सम्मुख सोयी नहीं रह सकती। ख्वाजा महमूद जो मौलवी दीन मुहम्मद के भाषणों से मानवता-विरोधी कार्य करने को उद्यत हो गए थे, चक्रधर की विवेकसंगत दलील सुनकर सचेत हो जाते हैं। प्रेमचन्द यहाँ पर भी झगड़ों के उकसानेवालों का भली-भाँति पर्दाफाश करते हैं, “ख्वाजा महमूद बड़े ग़ौर से चक्रधर की बातें सुन रहे थे। मौलवी साहब की उद्दडण्ता पर चिहुँककर बोले - क्या शरीयत का हुक़्म है कि क़ुरबानी यहीं हो ? किसी दूसरी जगह नहीं की जा सकती ?......

आपको तो अपने हलवे भाड़े से काम है, ज़िम्मेदारी तो हमारे ऊपर आयेगी, दुकानें तो हमारी लुटेंगी, आपके पास फटे बोरिया और बधने के सिवा और क्या रहा है ?...

चक्रधर - हर एक क़ुरबानी हिन्दुस्तान से 21 करोड़ हिन्दुओं के दिलों को जख़्मी कर देती है, और इतनी बड़ी तादात के दिलों को दुखाना बड़ी-से-बड़ी क़ौम के लिए भी एक दिन पछतावे का वाइस हो सकता है। हिन्दुओं से ज़्यादा बेतअस्सुब क़ौम दुनिया में नही है; लेकिन जब आप उनकी दिलजारी और महज दिलजारी के लिए क़ुरबानी चाहते हैं, तो उनको सदमा ज़रूर होता है और उनके दिलों में जो शोला उठता है, उसका आप खयाल नहीं कर सकते। अगर आपको यक़ीन न आये, तो देख लीजिये कि इस गाय के साथ एक हिन्दू कितनी खुशी से अपनी जान दे सकता है।”7

जिस तरह हिन्दुओं के धार्मिक जोश को शान्त करने के लिए चक्रधर गांधीवादी ढंग अपनाता है, उसी तरह मुसलमानों को शान्त करने के लिए भी : “यह कहते हुए चक्रधर ने तेज़ी से लपककर गाय की गरदन पकड़ ली और बोला, आपको इस गौ के साथ एक इन्सान की क़ुरबानी करनी पड़ेगी।

चक्रधर - मैं एक ख़ुदा का क़ायल हूँ। वही सारे जहान का ख़ालिक औैर मालिक है। फिर और किस पर ईमान लाऊँ !

ख़्वाजा - वल्लाह, तब तो तुम सच्चे मुसलमान हो। हमारे हज़रत को अल्लाहताला का रसूल मानते हो ?

चक्रधर - बेशक मानता हूँ, उनकी इज्ज़त करता हूँ और उनकी तौहीद का क़ायल हूँ।

ख्वाजा - हमारे साथ खाने-पीने से परहेज़ नहीं करते ?

चक्रधर - ज़रूर करता हूँ, उसी तरह, जैसे किसी ब्राह्मण के साथ खाने से परहेज़ करता हूँ, अगर वह पाक-साफ़ न हो।

ख्वाजा - काश, तुम जैसे समझदार तुम्हारे और भाई भी होते ; मगर यहाँ तो लोग हमें मलेच्छ कहते हैं। यहाँ तक कि हमें कुत्ते से भी नजिस समझते हैं। उनकी थालियों में कुत्ते खाते हैं, पर मुसलमान उनके गिलास में पानी नहीं पी सकता... अब कुछ-कुछ उम्मीद हो रही है कि शायद दोनों कौमों में इत्तफाक हो जाय।”8

प्रेमचन्द ने उक्त प्रकरण को समाप्त करने में जो भी ढंग अपनाया हो, पर यह बात निर्विवाद है कि हिन्दू-मुस्लिम फ़सादों के पीछे गाय की क़ुरबानी, जो प्रायः मूल कारण के रूप में सामने आती है, उस पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। उपन्यासकार इससे अधिक विस्तार उक्त प्रकरण को दे भी नहीं सकता। यह प्रेमचन्द जी की ही कला है जो इन अनेक बातों का समावेश करके भी उपन्यास की रोचकता को कम नहीं होने देते।

वास्तव में इस तरह के दंगे न हिन्दू चाहते हैं और न मुसलमान। छोटे या बड़े सभी झगडों की बुनियाद में भय का भाव निहित है। जब हिन्दू और मुसलमान एक-दूसरे से भयभीत होना छोड़ देंगे तब यह साम्प्रदायिक वातावरण स्वतः सुधर जाएगा। चक्रधर मनोरमा से कहता है, “मुसलमानों को लोग नाहक बदनाम करते हैं। फ़साद से वे भी उतना ही डरते हैं, जितना हिन्दू। शान्ति की इच्छा भी उनमें हिन्दुओं से कम नहीं है। लोगों का यह ख़्याल कि मुसलमान लोग हिन्दुओं पर राज्य करने का स्वप्न देख रहे हैं, बिल्कुल ग़लत है। मुसलमानों को केवल यह शंका हो गयी है कि हिन्दू उनसे पुराना वैर चुकाना चाहते हैं और उनकी हस्ती को मिटा देने की फ़िक्र कर रहे हैं। इसी भय से वे ज़रा-ज़रा-सी बात पर तिनक उठते हैं और मरने-मारने पर, आमादा हो जाते हैं।”9 दूसरे, कुछ लोग अपने निजी लाभ के लिए भी इन झगड़ों को बनाए रखना चाहते हैं। अहल्या से ख्वाजा महमूद कहते हैं, ”दोनों क़ौमों में कुछ ऐसे लोग हैं, जिनकी इज्ज़त और सरवत दोनों को लड़ाते रहने पर ही क़ायम है। बस, वह एक-न-एक शिगूफ़ा छोड़ा करते हैं। मेरा तो कौल है कि हिन्दू रहो, चाहे मुसलमान रहो, खुदा के सच्चे बन्दे रहो। सारी खूबियाँ किसी एक ही कौम के हिस्से में नहीं आतीं; न सभी हिन्दू राक्षस हैं, न सब मुसलमान देवता हैं; इसी तरह न सभी हिन्दू काफ़िर हैं, न सभी मुसलमान मोमिन। जो आदमी दूसरी कौम से जितनी नफ़रत करता है, समझ लीजिए कि वह खुदा से उतनी ही दूर है।’’10 ऐसे लोग अपने स्वार्थ-साधन के लिए सामाजिक जीवन के प्रत्येक पहलू को दूषित करते हैं।

‘सेवासदन’ में एक इमामबाड़े का वली तेगअली कहता है, “इस वक़्त, उर्दू-हिन्दी का झगड़ा, गौकशी का मसला, जुदागाना इन्तखाब, सूद का मुआविजा कानून, इन सबों से मज़हबी तास्सुब के भड़काने में मदद ली जा रही है।”11

‘कायाकल्प’ का पच्चीसवाँ परिच्छेद प्रेमचन्द ने साम्प्रदायिक समस्या के निमित्त ही लिखा है। इस परिच्छेद में साम्पद्रदायिक दंगों के कारणों, उसके स्वरूप और परिणाम पर बड़ी विस्तृत चर्चा है। प्रेमचन्द लिखते हैं, “.....हिन्दुओं और मुसलमानों में आए दिन जूतियाँ चलती रहती थीं।.......निज के रगडे़-झगड़े साम्प्रदायिक संग्राम के क्षेत्र में खींच लाए जाते थे। ... मुसलमानों ने बजाजे खोले, हिन्दू नैचे बाँधने लगे। सुबह को ख्वाजा साहब हाकिम ज़िला को सलाम करने जाते, शाम को बाबू यशोदानन्दन। दोनों अपनी-अपनी राजभक्ति का राग अलापते। दोनों देवताओं के भाग्य जागे; जहाँ कुत्ते निद्रोपासना किया करते थे, वहाँ पुजारी जी की भंग घुटने लगी। मस्जिदों के दिन फिरे, मुल्लाओं ने अबाबीलों को बदख़ल किया। जहाँ सांड जुगाली करता था, वहाँ पीर साहब की हँडिया चढ़ी। हिन्दुओं ने ‘महावीर दल’ बनाया, मुसलमानों ‘अलीगोल’ सजाया। ठाकुर द्वारे में ईश्वर-कीर्तन की जगह नबियों की निन्दा होती थी, मस्जिदों में नमाज की जगह देवताओं की दुर्गति। ख्वाजा साहब ने फ़तवा दिया, जो मुसलमान किसी हिन्दू औरत को निकला ले जाये, उसे एक हज़ार हजों का सवाब होगा। यशोदानन्दन ने काशी के पंडितों की व्यवस्था मँगवाई कि एक मुसलमान का वध एक लाख गोदानों से श्रेष्ठ है।”12 आगे चलकर, होली के अवसर पर, भयंकर दंगा हो जाता है। प्रेमचन्द ने दंगे का जो विस्तृत वर्णन दिया है, उसे पढ़कर पाठक का हृदय विक्षोभ से भर उठता है और उसे साम्प्रदायिकता से घृणा हो जाती है।

जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है, साम्प्रदायिक समस्या को अंग्रेज़ साम्राज्यवादियों ने राजनीतिक रूप दे रखा था। फूट डालकर शासन करने की नीयत अपना कर अंग्रेज़ अपना प्रभुत्व बनाये रखना चाहते थे। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम भेद-भाव पनपने दिया। दोनों कौमों के सम्बन्ध किस सीमा तक पहुँच चुके थे, उनका स्पष्ट वर्णन प्रेमचन्द तेगअली के मुँह से करवाते हैं, “आजकल पोलीटिकल मफ़ाद का ज़ोर है, हक़ और इन्साफ़ का नाम न लीजिये। अगर आप मुदर्रिस हैं तो हिन्दू लड़कों को फेल कीजिए ; तहसीलदार हैं तो हिन्दुओं पर टैक्स लगाइए ; मजिस्ट्रेट हैं तो हिन्दुओं को सजाएँ दीजिए ; सब इन्स्पेक्टर पुलिस हैं तो हिन्दुओं पर झूठे मुकदमें दायर कीजिए; तहक़ीकात करने जाइए तो हिन्दुओं के बयान ग़लत लिखिए; अगर आप चोर हैं तो किसी हिन्दू के घर डाका डालिए ; अगर आपको हुस्न और इश्क का ख़ब्त है तो किसी हिन्दू नाजनीन को उड़ाइए, तब आप कौम के ख़ादिम, कौन के मुहसिन, कौमी क़िस्ती के नाखुदा सब कुछ हैं।”13 ऐसी स्थिति में यह समस्या दिन-पर-दिन जटिल होती गई।

प्रेमचन्द ने साम्प्रदायिक समस्या के हल के निमित्त कई सुझाव अपने उपन्यासों में दिये हैं। सर्वप्रथम धर्म की सच्ची शिक्षा देना आवश्यक है। धर्मान्धता का विरोध करते हुए चक्रधर कहता है, “जब तक हम सच्चे धर्म का अर्थ न समझेंगे, हमारी यही दशा होगी। मुश्किल यह है कि जिन महान् पुरुषों से अच्छी धर्मनिष्ठा की आशा की जाती है, वे अपने अशिक्षित भाइयों से भी बढ़कर उद्दण्ड हो जाते हैं। मैं तो नीति को धर्म समझता हूँ और सभी सम्प्रदायों की नीति एक-सी है। अगर अन्तर है तो बहुत थोड़ा। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, बौद्ध सभी सत्कर्म और सद्विचार की शिक्षा देते हैं। हमें कृष्ण, राम, ईसा, मुहम्मद, बुद्ध सभी महात्माओं का समान आदर करना चाहिए। ये मानव जाति के निर्माता हैं। जो इनमें से किसी का अनादर करता है या उनकी तुलना करने बैठता है, वह अपनी मूर्खता का परिचय देता है। बुरे हिन्दू से अच्छा मुसलमान उतना ही अच्छा है, जितना बुरे मुसलमान से अच्छा हिन्दू। देखना यह चाहिए कि यह कैसा आदमी है, न कि यह कि वह किस धर्म का आदमी है। संसार का भावी धर्म सत्य, न्याय और प्रेम के आधार पर बनेगा। हमें अगर संसार में जीवित रहना है, तो अपने हृदय में इन्हीं बातों का संचार करना पड़ेगा।”14

दूसरी आवश्यकता मध्ययुगीन इतिहास को स्वस्थ और प्रगतिशील दृष्टि से लिखने की है। साम्राज्यवादियों ने भारत के इतिहास को अपने दृष्टिकोण से लिखा है। उन्होंने वहाँ हिन्दू और मुग़ल बादशाहों के वर्णन में इस वैमनस्य को गाढ़ा करके बताया है और आगामी पीढ़ियों के हृदयों में द्वेष की विषैली भावनाएँ भरने के प्रयत्न किये हैं। ‘कर्मभूमि’ से ज़िला हाकिम गजनवी ग़लत तवारीख़ के सम्बन्ध में सलीम से कहता है, “ग़लत तवारीखें पढ़-पढ़कर दोनों फ़िरके एक-दूसरे के दुश्मन हो गये हैं और मुमकिन नहीं कि हिन्दू मौका पाकर मुसलमानों से फौजी अदावतों का बदला न लें, लेकिन इस ख्याल से तसल्ली होती है कि इस बीसवीं सदी से हिन्दुओं जैसी पढ़ी-लिखी जमाअत मज़हबी गिरोहबन्दी की पनाह नहीं ले सकती। मज़हब का दौरा तो खत्म हो रहा है, बल्कि यों कहों कि ख़त्म हो गया। सिर्फ़ हिन्दुस्तान में उसमें कुछ-कुछ जान बाक़ी है। यह तो दौलत का ज़माना है। अब कौम में अमीर और ग़रीब, जायदाद वाले और मर-भूखे, अपनी-अपनी जमाअतें बनायेंगे। उनमें कही ज़्यादा खूरेजी होगी, कहीं ज़्यादा तंगदिली होगी। आखि़र एक-दो सदी के बाद दुनिया में एक सल्तनत हो जायगी। सबका एक क़ानून, एक निजाम होगा, कौम के खादिम कौम पर हुकूमत करेंगे, मज़हब शख्सी चीज़ होगी।”15

तीसरे, प्रेमचन्द ने आपसी झगड़ों को निपटाने के लिए पंचायत का सुझाव भी रखा है। ‘कायाकल्प’ में ख्वाजा महमूद और चक्रधर तय करते हैं, “एक पंचायत बनायी जाए और आपस के झगड़े उसी के द्वारा तय हुआ करें।”16

हिन्दू-मुसलमान एकता के बड़े मार्मिक चित्रा प्रेमचन्द-साहित्य में विद्यमान हैं। ‘कर्मभूमि’ में लाला समरकान्त और सलीम के भोजन करने का दृश्य हमारे घायल हृदय पर मरहम का काम करता है। प्रेमचन्द छुआछूत की असारता कितने सुन्दर ढंग से व्यक्त करते हैं, “भोजन का समय आ गया था। सलीम ने पूछा,‘आपके लिए क्या खाना बनावाऊँ ?... मैं तो आज आपको अपने साथ बैठाकर खिलाऊंगा।’’

‘‘तुम प्याज, मांस, अण्डे खाते हो। मुझसे उन बर्तनों में खाया ही न जायगा।’’

‘‘मगर मेरे साथ बैठना पड़ेगा। मैं रोज़ साबुन लगाकर नहाता हूँ।...आपका खाना हिन्दू बनाएगा।’’

....सेठजी सन्ध्या करके लौटे, तो देखा, दो कम्बल बिछे हुए हैं और दो थालियाँ रखी हुई हैं।

सेठजी ने खुश होकर कहा, ‘यह तुमने बहुत अच्छा इन्तज़ाम किया।’

सलीम ने हँसकर कहा, ‘मैंने सोचा, आपका धर्म क्यों लूँ, नहीं एक ही कम्बल रखता।’

‘अगर यह ख़याल है तो तुम मेरे कम्बल पर आ जाओ। नहीं, मैं ही आता हूँ।’

वह थाली उठाकर सलीम के कम्बल पर आ बैठे। अपने विचार में आज उन्होंने अपने जीवन का सबसे महान त्याग किया। सारी सम्पत्ति दान देकर भी उनका हृदय गौरवान्वित न होगा।

सलीम ने चुटकी ली, ‘अब तो आप मुसलमान हो गए।’

सेठजी बोले, मैं मुसलमान नहीं हुआ। तुम हिन्दू हो गए।”17

स्पष्ट है, प्रेमचन्द समस्यामूलक उपन्यासकार हैं। चरित्र-प्रधान उपन्यास लिखने वाला लेखक उपर्युक्त बातों को अपने उपन्यास में कोई स्थान नहीं देगा; जबकि प्रेमचन्द उनको स्थान ही नहीं, बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं। यदि उनके उपन्यासों में से ये स्थल या ऐसे स्थान निकाल दिया जाए तो उनके उपन्यास निश्चय ही अपना प्रभाव खो देंगे। जिस हिन्दू-मुस्लिम एकता की भावना को प्रेमचन्द ने अपने उपन्यासों का विषय बनाया था और मानवता को उच्च विचारों की जो अमूल्य सम्पत्ति सौंपी थी वह काम में नहीं लाई गई। हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य किस सीमा तक गया। कैसी-कैसी अमानुषिक नृशंस हत्याएँ की गइंर्। यदि प्रेमचन्द आज जीवित होते तो यह कल्पना सहज ही की जा सकती है कि उनके उपन्यासों में कितनी आग होती। मनुष्य को सभ्य बनाने के लिए साहित्य सबसे प्रभावशाली माध्यम है। साहित्यकारों की कृतियों का जनता में समुचित प्रचार होना चाहिए। राजनीतिज्ञों के मात्र भाषणों से जनता के हृदय पर कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ सकता। प्रेमचन्द ने जिस हिन्दू-मुस्लिम एकता का स्वप्न देखा था वह उनके जीवन-काल में तो साकार न हो सका। आगे तो उस एकता की नींव ही ढहती ज्ञात हुई। पर, जब तक प्रेमचन्द-साहित्य जीवित है, साम्प्रदायिकता की घृणित दानवी कभी भी अपने खूनी पंजे मानवता पर नहीं गड़ा सकती। प्रेमचन्द-साहित्य उसको एक चुनौती है।

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संदर्भ-संकेत

1 ‘कायाकल्प’, पृ. 30

2 वही, पृ. 31

3 वही, पृ. 33

4 वही, पृ. 34

5 वही, पृ. 35

6 वही, पृ. 37

7 वही, पृ. 37 से 39

8 वही, पृ. 39-40

9 वही, पृ. 57

10 वही, पृ. 427

11 ‘सेवासदन’, पृ. 249

12 ‘कायाकल्प’, पृ. 256

13 ‘सेवासदन’, पृ. 174

14 ‘कायाकल्प’, पृ. 227

15 ‘कर्मभूमि’, पृ. 222-223

16 ‘कायाकल्प’, पृ. 44

17 ‘कर्मभूमि’, पृ. 354-355

शैक्षणिक समस्या

प्रेमचन्द केवल उपन्यासकार, कहानीकार, नाटककार व पत्रकार ही नहीं थे, वरन् समाज के विभिन्न अंगों पर दृष्टिपात करने वाले एक जागरूक चिन्तक थे। उनके विचार ही उनके समग्र साहित्य के प्राण हैं। उपन्यास में भी वे अपने विचारों को ही प्रधानता देते हैं। ये विचार भारतीय जीवन की विभिन्न समस्याओं से सम्बंध रखते हैं। विभिन्न समस्याओं पर उनके विचार उनकी कृतियों में जगह-जगह बिखरे हुए हैं। स्पष्ट है, उपन्यास में ये विचार अधिकतर पात्रों के द्वारा ही प्रकट किए जा सकते हैं, लेखक अपनी ओर से तो संक्षेप में टिप्पणी-मात्र दे सकता है। मानव-जीवन को सुसंस्कृत करने और उसे पूर्ण विकास की आरे ले जाने में शिक्षा का स्थान सर्वोपरि है। प्रेमचन्द जैसे सचेत लेखक शिक्षा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को कैसे छोड़ सकते थे ! अतः उनके उपन्यासों में तत्कालीन शिक्षा-पद्धति, उसके दोषों और उसे सुधारने अथवा बदलने की जटिल समस्या का भी समावेश किया गया है।

प्रेमचन्द ने शिक्षा के उद्देश्य, पाश्चात्य शिक्षा-प्रणाली, अध्यापकों और युवकों की मनोवृत्ति, शैक्षणिक संस्थाओं की दशा, पाठ्यक्रम आदि पर अपने कुछ उपन्यासों में चर्चा की है। ये उपन्यास ‘वरदान’, ‘कायाकल्प’ ‘प्रेमाश्रम’, ‘कर्मभूमि’ और ‘रंगभूमि’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आलोचकों ने प्रेमचंद के शिक्षा-सम्बन्धी विचारों की ओर ध्यान नहीं दिया है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को अर्थिक सुविधाएँ प्राप्त थीं, अतः वे अपने शिक्षा-सम्बन्धी विचारों को मूर्त रूप दे सके। प्रेमचन्द के पास ऐसा कोई साधन नहीं था। फिर भी वे अपने विचारों की शैक्षणिक संस्था ‘कर्मभूमि’ में छोड़ गए हैं, जो उनके महान शिक्षा-शास्त्री होने का प्रमाण देती है। प्रेमचन्द ने एक निर्धन विद्यार्थी का जीवन व्यतीत किया था। वे उन सभी कष्टों और आपदाओं से परिचित थे; जो एक निर्धन छात्रा को उठानी पड़ती हें। प्रेमचन्द के शब्दों में, “एक कुप्पी के सामने रात को बैठकर टाट बिछाकर पढ़ता।1 पाँच रुपये का ट्यूशन करके आठ रुपये में अपना गुज़र करता था। सुबह उठकर हाथ-मुँह धोकर रोटी पकाता, रोटियाँ सेंककर स्कूल जाता।”2 एक बार रोटी के लिए उन्हें अपनी पुस्तकें बेचनी पड़ी थीं :

“जाड़ों के दिन थे, पास में एक कौड़ी न थी। दो दिन एक-एक पैसे का खाकर काटे। मेरे महाजन ने उधार देने से इन्कार कर दिया था। संकोचवश मैं उनसे माँग न सकता था। चिराग जल चुके थे। मैं एक बुकसेलर की दुकान पर किताब बेचने गया। एक चक्रवर्ती गणित कुंजी दो साल हुए ख़रीदी थी, अब तक उसे बड़े जतन से रखे हुए था, पर आज चारों ओर से निराश होकर मैंने उसे बेचने का निश्चय किया। किताब दो रुपये की थी, लेकिन सौदा एक रुपये में तय हुआ।”3 इस प्रकार विद्यार्थी जीवन में ही प्रेमचन्द अपने समय के शिक्षा-सम्बन्धी अनेक दोषों से अत्यधिक सूक्ष्मता से परिचित हो गए थे। उन्होंने तत्कालीन शिक्षा-पद्धति की आलोचना, पुस्तकालयों से शिक्षा-सम्बन्धी पुस्तकें पढ़कर नहीं की; उसमें जीवन के अनुभव निहित हैं। इसलिए उनके विचार विशेष महत्त्व रखते हैं।

आगे चलकर प्रेमचन्द एक विद्यालय के प्रधानाध्यापक की कृपा से अठारह रुपये मासिक पर अध्यापक हो गए। कानपुर बस्ती गोरखपुर आदि स्थानों में उन्होंने अध्यापन का कार्य किया। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के सब-डिप्टी-इन्स्पेक्टर की हैसियत से छह साल उन्होंने महोबे में बिताए। इस बीच अध्यापक-वर्ग की मनोवृत्ति से ही उनका परिचय नहीं हुआ, वरन् अधिकारी-वर्ग की नौकरशाही वृत्ति का भी उन्हें सामना करना पड़ा। गोरखपुर में इन्स्पेक्टर के निरीक्षण की घटना यहाँ उद्धधृत करना संगत होगा, “जाड़े के दिन थे। स्कूल का इन्स्पेक्टर मुआयना करने आया था। एक रोज़ तो इन्स्पेक्टर के साथ रहरकर आपने स्कूल दिखा दिया। दूसरे रोज़ लड़कों को गेंद खेलना था। उस दिन आप नहीं गए। छुट्टी होने पर आप घर चले आए। आरामकुर्सी पर लेटे दरवाज़े पर आप अखबार पढ़ रहे थे कि सामने ही इन्स्पेक्टर अपनी मोटर पर जा रहा था। वह आशा करता था कि उठकर सलाम करेंगे, लेकिन आप उठे भी नहीं। इस पर कुछ दूर जाने के बाद इन्स्पेक्टर ने गाड़ी रोककर अपने अर्दली को भेजा। अर्दली जब आया तो आ गए।

‘कहिए, क्या है ?’

इन्स्पेक्टर, ‘तुम बड़े मगरूर हो। तुम्हारा अफ़सर दरवाज़े से निकल जाता है। उठकर सलाम भी नहीं करते !’

‘मैं जब स्कूल में रहता हूँ, तब नौकर हूँ। बाद में मैं भी अपने घर का बादशाह हूँ। यह आपने अच्छा नहीं किया। इस पर मुझे अधिकार है कि आप पर केस चलाऊँ।’

इन्स्पेक्टर चला गया। आपने अपने मित्रों से राय ली कि इस पर केस चलाना चाहिए। मित्रों ने सलाह दी, जाने दीजिए। आप भी उसे मगरूर कह सकते थे। हटाइए इस बात को। मगर इस बात की कुरेदन उन्हें बहुत दिनों तक रही।”4

प्रेमचन्द जैसे स्वाभिमानी मनुष्य के जीवन में ऐसी घटना का होना स्वाभाविक बात है। आगे चलकर देश पर होने वाले अंग्रेजी शासन के अत्याचारों से खिन्न होकर उन्होंने अपनी पच्चीस साल की नौकरी पर लात मार दी। अभिप्राय यह है कि प्रेमचन्द ने जिस प्रकार एक निर्धन छात्र का जीवन व्यतीत किया था उसी प्रकार एक अभावग्रस्त अध्यापक का जीवन भी बिताया था। अतः शिक्षा के क्षेत्र में उनकी धारणाएँ कितनी महत्त्वपूर्ण होंगी, उसका अनुमान भली-भाँति लगाया जा सकता है।

‘कर्मभूमि’ में प्रेमचन्द शिक्षा का उद्देश्य बताते हुए आज के अध्यापकों के रहन-सहन तथा विचारों की आलोचना करते हुए लिखते हैं, “जीवन को सफल बनाने के लिए शिक्षा की ज़रूरत है, डिग्री की नहीं। हमारी डिग्री है हमारा सेवा-भाव, हमारी नम्रता, हमारे जीवन की सरलता। अगर यह डिग्री नहीं मिली, अगर हमारी आत्मा जागरित नहीं हुई, तो कागज़ की डिग्री व्यर्थ है। उसे (अमरकान्त) इस शिक्षा ही से घृणा हो गई है। जब वह अपने अध्यापकों को फ़ैशन की गुलामी करते, स्वार्थ के लिए नाक रगड़ते, कम-से-कम काम करके अधिक-से-अधिक लाभ के लिए हाथ पसारते देखता, तो उसे घोर मानसिक वेदना होती थी। और इन्हीं महानुभावों के हाथ में राष्ट्र की बागडोर है। यही क़ौम के विधाता हैं।”5 प्रेमचन्द भारत के प्रचीन आदर्शों के क़ायल थे, अतः अतीत के अध्यापकों की प्रशंसा करत हुए वे लिखते हैं, “तब अमर को उस अतीत की याद आती, जब गुरुजन झोपड़ी में रहते थे, स्वार्थ से अलग, लोभ से दूर, सात्त्विक जीवन के आदर्श, निष्काम सेवा के उपासक। वह राष्ट्र से कम-से-कम लेकर अधिक देते थे। वह वास्तव में देवता थे। और एक यह अध्यापक हैं, जो किसी अंश में एक मामूली व्यापारी या राज्य कर्मचारी से पीछे नहीं। इनमें भी वही दम्भ है, वही धन-मद है, वही अधिकार-मद है। हमारे विद्यालय क्या हैं, राज्य के विभाग हैं और हमारे अध्यापक उसी राज्य के अंग हैं। ये खुद अंधकार में पड़े हुए हैं, प्रकाश क्या फैलाएंगे ? वे आप अपने मानेविकार के क़ैदी हैं, आप अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं, और अपने शिष्यों को भी उसी क़ैद और गुलामी में डालते हैं।”6 इसका अभिप्राय यह नहीं कि प्रेमचन्द गुरुकुल-पद्धति को पुनर्जीवित करना चाहते थे। विगत युग की अच्छाइयों को आज भी अपनाया जाना चाहिए। केवल यह ध्वनि उक्त उद्धरण से निकलती है।

जिस प्रकार अध्यापक-वर्ग की स्पष्ट आलोचना है उसी प्रकार देश के नवयुवकों की मनोवृत्ति पर भी प्रेमचन्द ने खुलकर लिखा है, जिससे उनमें कुछ सुधार हो सके, वे शिक्षा के वास्तविक महत्त्व को समझ सकें। अधिकांश नवयुवक कोई ऊँचा सरकारी पद पा जाने की नीयत से ही शिक्षा ग्रहण करते हें। ‘कर्मभूमि’ में सलीम का यही आदर्श है, “वह एम॰ए॰ की तैयारी कर रहा था। उसकी अभिलाषा थी कि कोई अच्छा सरकारी पद पा जाए और चैन से रहे। सुधार और संगठन और राष्ट्रीय आन्दोलन से उसे विशेष प्रेम न था।”7 एक और स्थल पर डा॰ शान्तिकुमार से कहता है, “यह तो आप जानते ही हैं, मैं एक सीधा जुमला ठीक नहीं लिख सकता, मगर लियाक़त कौन देखता है ? यहाँ तो सनद देखी जाती है।”8 प्रेमचन्द ने शिक्षा का उद्देश्य रोटी-प्राप्ति कभी नहीं समझा। ‘रोटी-रोज़ी’ (Bread and Butter) को शिक्षा का सिद्धान्त माननेवालों के वे कड़े विरोधी थे। ‘कायाकल्प’ में प्रेमचन्द का आदर्श पात्र चक्रधर शिक्षा और नौकरी पर अपना स्पष्ट मत अपने पिता वज्रधर के सामने रखता है -

“चक्रधर - मेरी नौकरी करने की इच्छा नहीं है।

वज्रधर - यह ख़ब्त तुम्हें कब से सवार हुआ ? नौकरी के सिवा और करोगे ही क्या ?

चक्रधर - मैं आज़ाद रहना चाहता हूँ।

वज्रधर - आज़ाद रहना था तो एम॰ ए॰ क्यों पास किया?

चक्रधर - इसलिए कि आज़ादी का महत्त्व समझूँ।”9

प्रेमचन्द को यह बात हस्यास्पद मालूम होती थी, “आदमी केवल पेट पालने के लिए आधी उम्र पढ़ने में लगा दे। अगर पेट पालना ही जीवन का आदर्श हो, तो पढ़ने की ज़रूरत ही क्या ? मzzज़दूर एक अक्षर भी नहीं जानता, फिर भी वह अपने और अपने बाल-बच्चों का पेट बड़े मज़े से पाल लेता है। विद्या के साथ जीवन का आदर्श कुछ ऊँचा न हुआ, तो पढ़ना व्यर्थ है।”10 अतः प्रेमचन्द अपने समय की शिक्षा-पद्धति से बड़े असंतुष्ट थे। बड़े-बड़े डिग्रीधारियों की आलोचना करते हुए ‘कर्मभूमि’ में वे लिखते हैं, “जिसके पास जितनी भी बड़़ी डिग्री है, उसका स्वार्थ भी उतना ही बढ़ा हुआ है, मानो लोभ और स्वार्थ ही विद्वत्ता का लक्षण है। ग़रीबों को रोटियाँ मयस्सर न हों, कपड़ों को तरसते हों, पर हमारे शिक्षित भाइयों को मोटर चाहिए, बँगला चाहिए, नौकरों की पलटन चाहिए।”11

आज के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों पर वज्रधर से टिप्पणी करवाते हुए प्रेमचन्द लिखते हैं, “जैसे और भी चीज़ें बनाने के कारख़ाने खुल गए हैं, उसी तरह विद्वानों के कारख़ाने हैं और उनकी संख्या हर साल बढ़ती जाती है।”12 पश्चिमी सभ्यता की बुराइयों में शिक्षा-पद्धति का स्थान प्रमुख है। पश्चिमी आदर्शों से प्रभावित शिक्षा-पद्धति पर छात्र अमरकान्त के मुख से प्रेमचन्द बड़ा तीख व्यंग्य करवाते हैं, “बताना क्या है, पश्चिमी सभ्यता की बुराइयाँ हम सब जानते ही हैं। वही बयान कर देना।”

“तुम जानते होगे, मुझे तो एक भी नहीं मालूम्। ”

“एक तो यह तालीम ही है, जहाँ देखो, वही दुकानदारी। अदालत की दुकान, इल्म की दुकान, सेहत की दुकान। इस एक पाइंट पर बहुत कुछ कहा जा सकता है ?”13

इसी प्रकार, डा॰ शान्तिकुमार के शब्दों में, “यह किराये की तालीम हमारे कैरेक्टरों के तबाह किए डालती है। हमने तालीम को भी एक व्यापार बना लिया है। व्यापार में ज्यादा नफ़ा होगा। तालीम में ज़्यादा खर्च करो, ज़्यादा ऊँचा ओहदा पाओगे। मैं चाहता हूँ, ऊँची-से-ऊँची तालीम सबके लिए मुआफ़ हो, ताकि ग़रीब-से-ग़रीब आदमी भी ऊँची-से-ऊँची लियाक़त हासिल कर सके और ऊँचे-से-ऊँचे ओहदे को पा सके। युनिवर्सिटी के दरवाज़े मैं सबके लिए खुले रखना चाहता हूँ। सारा खर्च गवर्नमेंट पर पड़ना चाहिए। मुल्क को तालीम की उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरत है, जितनी फौज की।”14 फौज और शिक्षा के इस अनुपात को प्रेमचन्द ने समझा था। किसी भी देश की रक्षा मात्र सामरिक शक्ति बढ़ा देने से नहीं हो सकती, जब-तक कि उस देश के नवयुवक उच्च आदर्शों की वाहक शिक्षा ग्रहण नहीं करते। खेद है, प्रेमचन्द के इन विचारों पर नवोदित राष्ट्र के कर्णधार ध्यान नहीं देते और वही किराए की शिक्षा ज्यों-की-त्यों क़ायम है जो भावी पीढ़ी के चरित्र को नष्ट कर रही है।

‘कर्मभूमि उपन्यास का प्रारम्भ ही आधिनक शिक्षा पर व्यंग्य के साथ होता है। शैक्षणिक संस्थाओं का यथार्थ चित्रण करते हुए प्रेमचन्द लिखते हैं, “हमारे स्कूलों और कॉलेजों में जिस तत्परता से फ़ीस वसूल की जाती है, शायद मालगुज़ारी भी उतनी सख़्ती से नहीं वसूल की जाती। महीने में एक दिन नियत कर दिया जाता है। उस दिन फ़ीस दाख़िल न हो, रोज़ कुछ जुर्माना दीजिए। कहीं-कहीं ऐसा भी नियम है कि उसी दिन फ़ीस दुगुनी कर दी जाती है, और किसी दूसरी तारीख़ को फ़ीस दुगुनी न दो, तो नाम कट जाता है, काशी के क्वींस कालेज में यही नियम था।... ऐसे कठोर नियमों का उद्देश्य इसके सिवा और क्या हो सकता था कि ग़रीबों के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जाएँ। वही हृदयहीन दफ़्तरी शासन, जो अन्य विभागों में है, हमारे विद्यालयों में भी है। वह किसी के साथ रियायत नहीं करता, चाहे जहाँ से लाओ, कर्ज़ लो, गहने गिरो रखो, लोटा-थाली बेचो, चोरी करो, मगर फ़ीस ज़रूर दो, नहीं दूनी फ़ीस देनी पड़ेगी, या नाम कट जायगा। ज़मीन और जायदाद के कर वसूल करने में भी कुछ रियायत की जाती है। हमारे शिक्षालयों में नर्मी को घुसने ही नहीं दिया जाता। वहाँ स्थायी रूप से मार्शल ला का व्यवहार होता है। देर में आइए तो जुर्माना, सबक़ याद न हो तो जुर्माना, किताबें न ख़रीद सकिए तो जुर्माना, कोई अपराध हो जाय तो जुर्माना। शिक्षालय क्या हैं, जुर्मानालय हैं। यही हमारी पश्चिमी शिक्षा का आदर्श है, जिसकी तारीफ़ों के पुल बाँधे जाते हैं। यदि ऐसे शिक्षालयों में पैसे पर जान देने वाले, पैसे के लिए ग़रीबों का गला काटने वाले, पैसे के लिए अपनी आत्मा तक बेच देने वाले छात्रा निकलते हैं, तो आश्चर्य क्या ?”15 प्रेमचन्द छात्रों पर होने वाले