लघुकथा // हत्यारा कौन // श्रद्धा मिश्रा

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हत्यारा कौन?
मन में इतनी बेचैनी है कि कुछ कहा भी नहीं जा रहा और चुप रहा भी नहीं जा रहा। एक विचार आता है मस्तिष्क में और वो पूरी तरह स्थापित भी नहीं होता दूसरा और फिर तीसरा विचार कौंधने लगता है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या जो हुआ सही हुआ? क्या यही नियति है?किसी अपराध की सजा? कही ऐसा तो नहीं किसी और के पाप की सजा किसी और को मिल गयी? ईश्वर से कोई गलती तो नहीं हो गयी?नहीं! नहीं! ईश्वर पर आक्षेप ये तो पाप है, पाप क्या है ये भी तो नहीं पता पुण्य तो गंगा स्नान से मिल जाएगा पाप भी गंगा स्नान से धूल जाएगा। पाप और पुण्य तो इतने छोटे हैं कि एक स्नान से धुल जाते है मिल जाते हैं, पाप करते रहो धुलते रहो।


पर ये पाप वास्तव में इतना छोटा है? नहीं तो फिर जो आज हुआ वो पाप नहीं होगा , इससे भी कुछ अधिक हुआ है, तो फिर पाप से बड़ा क्या है?
ये प्रश्न बड़ा जटिल है सुलझाने में उलझने की संभावना ही नहीं निश्चित है उलझना। फिर आज जो हुआ वो किस श्रेणी में आता है।
जबकि वो जानती है कि आज तक उसके मन से कुछ हुआ ही नहीं। जब छोटी थी तो माँ ने अलविदा कह दिया। बाप ने खुद से दूर नाना नानी के पास भेज दिया, फिर पढ़ना चाहती थी तो शादी कर दी गयी और शादी  हुई तो पति ने छोड़ दिया। इसे  ईश्वर की दया कहो या दंड की दूसरी शादी हो गयी। और ये सब होता रहा उसकी बिना मर्जी के, आज पहली बार कुछ उसकी मर्जी से होने जा रहा था। और फिर वही हो गया जो उसने कभी चाहना तो दूर सोचा भी नहीं था।


एक माँ ने अपने नौ माह के बेटे को खो दिया, नहीं, नहीं एक दिन के , शायद एक घंटे के, एक मिनट के कहना भी ठीक नहीं लगता, वास्तव में उसे मरा हुआ बच्चा हुआ। वो बच्चा जिसे नौ माह उसने अपने रक्त से सींचा था। जिसके लिए अपनी रातें जाग कर और अपने दिन इंतजार में बिता रही थी क्या इस दिन के लिए, जब भी दिन में  अकेली होती उससे बातें करती। जाने कितने नाम जहन में सोचे थे कि ये कहके बुलाऊंगी,वो गा के सुलाऊंगी। जब रोयेगा तो हंसाउंगी। जब लड़खड़ायेगा तब थाम लूँगी। जब माँ कहेगा तब तो उसपे सब वार दूंगी। मगर उसे क्या मालूम कि उसे जब होश आएगा तो उसकी दुनिया ही वीरान हो जाएगी। उसकी ममता उसके सीने में शूल सी चुभेगी, उसकी आंखें तो खुली होंगी पर उनके सामने अंधेरा होगा। क्या वो ये नहीं पूछेगी की हत्यारा कौन?

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