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बर्लिन से बब्बू को - बालकवि बैरागी के पत्र विष्णु बैरागी को - 1

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  भूमिका ‘ बर्लिन से बब्बू को ’ : एक जिद का पूरी होना ‘बर्लिन से बब्बू को’ के बारे में मेरी यह बात तनिक लम्बी ही होगी। कभी-कभी ऐसा हो...

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 भूमिका

बर्लिन से बब्बू को’ : एक जिद का पूरी होना

‘बर्लिन से बब्बू को’ के बारे में मेरी यह बात तनिक लम्बी ही होगी। कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि कृति के मुकाबले उसके निर्माण का ब्यौरा लम्बा हो जाता है। नाक पर नथनी भारी हो जाती है। कोई महत्वपूर्ण उल्लेख छूट न जाए इस भावना के अधीन अधिकाधिक जानकारियाँ, सन्दर्भ और नाम देने का मोह मैं छोड़ नहीं पा रहा हूँ।

दादा श्री बालकवि बैरागी, सितम्बर 1976 में तत्कालीन पूर्वी जर्मनी की यात्रा पर गए थे। तब मैं मन्दसौर में, दैनिक ‘दशपुर दर्शन’ का सम्पादन कर रहा था। दादा की यह दूसरी विदेश यात्रा थी। इससे पहले वे मारीशस की यात्रा कर चुके थे और ‘धरती रामगुलाम’ की शीर्षक से उनकी मारीशस यात्रा के संस्मरण प्रकाशित हो चुके थे।

यात्रा के दौरान दादा संस्मराणात्मक पत्र मुझे लिखेंगे, यह शायद उन्होंने भी नहीं सोचा था। जाने से पहले उन्होंने ऐसा कोई संकेत नहीं दिया था। यह विचार उनके मन में निश्चय ही, यात्रा शुरु करते समय या पूर्वी जर्मनी में उतरने के बाद आया होगा। भारत लौटने के बाद भी उन्होंने इस बारे में कभी, कुछ नहीं बताया।

जब मुझे पहला पत्र मिला तो, मुझे अच्छा तो लगा लेकिन मैं चौंका भी था। इतना सब मुझे बताने का उनका क्या मकसद हो सकता है? पहले पत्र को मैंने दो-तीन बार पढ़ा और पढ़ते-पढ़ते मुझे लगा, दादा की भावना हो न हो लेकिन मेरी सोच-समझ पर उन्हें कहीं न कहीं यह विश्वास तो है कि मैं इन पत्रों को अपने तक ही सीमित नहीं रखूँगा। मेरे अनुमान की पुष्टि उनके तीसरे और चौथे पत्र में बड़े ही सहज भाव से होती है। उनका तीसरा पत्र पढ़ने के बाद अपनी सम्पादकीय सूझ-बूझ पर मेरा भरोसा बढ़ा ही।

इन पत्रों के प्रकाशन का निर्णय लेने में मैंने किसी से परामर्श नहीं किया। हाँ, यह तय किया कि इस प्रकाशन का निमित्त और इससे मिलनेवाले यश का स्वामी ‘दशपुर दर्शन’ बने, ताकि उसकी आय और प्रसार में भी वृद्धि हो। एक सम्पादक यही तो चाहता है कि उसका अखबार अधिकाधिक लोगों तक पहुँचे, अधिकाधिक पढ़ा जाए! इस मोह को कुछ और बातों ने ताकत दी। जैसे कि मैं एक अखबार का सम्पादक हूँ, मेरे मालिक के पास छापाखाना है। मेरा मालिक दादा का अभिन्न मित्र है। दोनों एक ही पार्टी के सक्रिय, अग्रणी कार्यकर्ता हैं। आदि-आदि।

लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ जैसा मैंने सोचा था। ‘दशपुर दर्शन’ के माध्यम से इन पत्रों के प्रकाशन का निर्णय जब मैंने अपने मालिक श्री सौभाग भाई को बताया तो उन्होंने मंजूरी तो दी लेकिन साफ कह दिया कि इसके लिए वे कोई आर्थिक वजन नहीं उठाएँगे। इस प्रकाशन का खर्च मुझे ही जुटाना होगा। मेरे लिए यह अत्यन्त दुसाध्य काम था। लगभग असम्भव। विज्ञापन जुटाने का गुण मुझमें आज तक नहीं आ पाया। एक क्षण लगा कि यह विचार ही छोड़ हूँ। लेकिन एक जिद मन में उभर आई - ‘पत्र तो छपेंगे।’ तब तक तीन पत्र आ चुके थे।

मैंने अपने गुरु (अब स्वर्गीय) श्री हेमेन्द्र कुमारजी त्यागी और कई मित्रों से विस्तार से बात की। अपनी भावना और सौभाग भाई की बात बताई। सबने पत्रों को बार-बार पढ़ा। अकेले में भी और सामूहिक रूप से भी। सबने कहा - ‘पत्र छपने चाहिएँ। छपेंगे। आगे बढ़ा जाए। जो होगा, देखा जाएगा।’

सौभाग भाई ने बजट बताया और हम सब शुरु हो गए।

तीन पत्र हमारे हाथ में थे। पत्रों से यह तो लग रहा था कि दादा और पत्र लिखेंगे जरूर। लेकिन ‘कितने पत्र लिखेंगे?’, ‘लिखेंगे तो हम तक कितने पहुँचेंगे?’, ‘कब पहुँचेंगे?’, ‘बादवाला पत्र तो मिल गया लेकिन उससे पहलेवाला नहीं मिला तो क्या करेंगे?’ जैसे सवालों का जवाब हममें से किसी के पास नहीं था। लेकिन तय हो चुका था - छापना है।

प्रकाशन का नामकरण करने में न तो समय लगा, न ही कठिनाई हुई। सब कुछ साफ था - ‘दादा ने लिखे हैं। बर्लिन से लिखे हैं। बब्बू को (मेरा, घर का नाम बब्बू ही है) लिखे हैं। इसके बाद क्या सोचना! यही नाम हो सकता है - बर्लिन से बब्बू को।’

अखबार में पहली घोषणा से ही पाठकों में मानो बिजली का करण्ट दौड़ गया। पाठकों ने जताया कि उन्हें हमसे अधिक उतावली थी। लेकिन हमें धैर्य बरतना था। ऐसे नितान्त व्यक्तिगत और आत्मपरक पत्रों में सम्पादन की सामान्यतः न तो आवश्यकता होती है और न ही कोई गुंजाइश। लेकिन जब वैयक्तिकता सार्वजनिकता से जुड़ती है तो फिर सम्पादन की आवश्यकता स्वतः पैदा हो जाती है। हम सौभाग भाई की ‘पेढ़ी’ का उपयोग कर रहे थे। यह हमारी जिम्मेदारी थी कि उन्हें कोई खरोंच न आए।

ये पत्र जब पुस्तकाकार में आए तो सम्पादक मण्डल में चार नाम छपे - त्यागीजी, राजा दुबे, विजय बैरागी और मैं। लोगों ने कभी मजाक में तो कभी तंज कसते हुए पूछा - ‘इसमें सम्पादन जैसा क्या था जो इतने लोगों को मेहनत करनी पड़ी? चलो करनी पड़ी तो भी बैरागी दादा के लिखे का सम्पादन! आप चारों उनसे अधिक विद्वान् हो गए?’ हमारे पास न तब जवाब था न मेरे पास अब जवाब है। बस! इतना ही कह पा रहा हूँ कि हाँ, सम्पादन की जरूरत थी। दादा के मूल पत्रों में उप शीर्षक नहीं थे। उप शीर्षक देना तय हुआ। सारे उप शीर्षक राजा दुबे ने दिए।

पत्र छपने शुरु हुए तो पूरे जिले में मानो कोई छोटा-मोटा लोकोत्सव शुरु हो गया हो। लोगों ने इन्हें हाथों-हाथ लिया। प्रशंसाभरे, उत्साहवर्द्धक पत्रों का ढेर लग गया। कुछ इतना कि एक दिन खुद पोस्ट मास्टर सा’ब आकर बता गए - ‘आपके पत्रों के लिए अलग से व्यवस्था करनी पड़ रही है।’ हमारी प्रसार संख्या में भी यथेष्ठ बढ़ोतरी हुई।

हमने पूरी सुविचारित योजना बनाकर ये पत्र पाठकों तक पहुँचाए। अखबार के साथ 8×5.5 इंच के आठ पेज का एक पन्ना छापते थे जिसे मोड़कर पुस्तकाकार दिया जा सकता था। कोशिश रहती थी कि जैसे-जैसे विज्ञापन मिलते जाएँ, वैसे-वैसे पन्ने देते जाएँ। ऐसा किया भी। लेकिन विज्ञापनों की प्रतीक्षा में पन्ने रोके नहीं। जब तक पत्र हमारे हाथ में आते रहे, पन्ने बराबर जारी करते रहे। तब ट्रेडल मशीन पर अखबार छपता था और चित्रों के ब्लॉक इन्दौर से बनवाने पड़ते थे। लेकिन इन दोनों कारणों से प्रकाशन नहीं रुका। पाठकों को प्रतीक्षा तब ही करनी पड़ी जब डाक की गड़बड़ के कारण हमें पत्र नहीं मिले। लेकिन सन्तोष की बात यह रही कि दादा के भेजे सारे सात पत्र हमें मिल गए। एक पत्र हमें दादा के भारत लौटने के बाद मिला।

पत्र प्रकाशन में व्यवधान पर पाठकों की अधीरता भरे पत्र हमें (इन पत्रों के प्रकाशन के) अपने निर्णय पर आत्मसन्तोष प्रदान करते रहे।

अन्ततः सारे पत्र प्रकाशित हुए। आवरण पृष्ठों सहित पूरी किताब 108 पृष्ठों की बनी। हमें पूरे पृष्ठ के अठारह, आधे पृष्ठ के चौदह और चौथाई पृष्ठ के तीन विज्ञापन मिले। फिर भी आर्थिक सन्दर्भों में यह घाटे का ही सौदा रहा। लेकिन इनके प्रकाशन से उपजा आत्म सन्तोष मेरे लिए आज भी अमूल्य है। किसी भी प्रकाशन की यह मेरी पहली इच्छा और कोशिश थी जो साकार हुई। दादा को छापने का निमित्त बनने के सुख-सन्तोष का मोल तो मेरी मृत्युपर्यन्त अकूत ही रहेगा।

हमने इस प्रकाशन का कोई समारोह नहीं किया। घर-घर में, पाठकों ने ही पुस्तक तैयार कर ली थी। हमने अपने लिए अतिरिक्त प्रतियाँ छपवाई थीं। अखबारी कागजवाली प्रतियाँ ज्यादा थीं। कुछ प्रतियाँ अच्छे, सफेद कागज पर थीं। यूँ तो हमने एक प्रति का मूल्य बीस रुपये रखा था लेकिन एक भी प्रति नहीं बिकी। सब मुफ्त में ही बँटी। कुछ इस तरह कि अच्छे, सफेद कागज पर छपी एक भी प्रति हमारे परिवार में ही उपलब्ध नहीं है। पुस्तक में प्रकाशित चित्रों को मैं ब्लॉग पर भी देना चाहता था लेकिन अखबारी कागजवाली प्रति पर छपे चित्रों में शकलें ही नजर नहीं आ रहीं। अच्छे, सफेद कागजवाली प्रति की तलाश खूब की। फेस बुक पर भी माँगी। लेकिन अब तक नहीं मिली। फिर भी, अखबारी कागज पर छपे तीन चित्र ऐसे मिल गए हैं जिनमें शकलें पहचान में आती हैं और जिन्हें कम खराब’ कहा जा सकता है। पुणेवाले डॉक्टर रतनलालजी सोनग्रा ने कहा है कि दादा ने इसकी एक प्रति उन्हें दी थी। वे उसे तलाश करेंगे। मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा हूँ उन्हें यह प्रति मिल जाए और यह प्रति अखबारी कागजवाली नहीं, अच्छे, सफेद कागजवाली हो।

दादा के लोक सभा सदस्यतावाले काल में किसी प्रकाशक ने यह किताब ‘एक बैरागी बर्लिन में’ शीर्षक से छापी थी। लेकिन उसमें चित्र नहीं थे।

इन पत्रों को ब्लॉग पर प्रकाशित करने की तैयारी सितम्बर 2009 में ही हो गई थी। सबसे बड़ा काम था टाइपिंग का। भाई श्री पुरुषोत्तम लोहाना, सितम्बर 2009 में ही यह विकट काम कर चुके थे। उन्होंने अपना पारिश्रमिक भी अब तक नहीं लिया है। मैं चित्रों के मोह में उलझा रहा। खूब हाथ-पैर मारे। पर असफल ही रहा। कुछ तो कोशिशों के बाद की प्रतीक्षा, कुछ इधर-उधर और टटोलने का जतन और कुछ आलस्य। इन सबके चलते ब्लॉग पर प्रकाशन टलता रहा। दादा से जब भी बात की, उन्होंने सदैव ही निर्लिप्त भाव से कहा - ‘तू जाने और तेरा काम।’ लेकिन उनके जाने के बाद इन्हें ब्लॉग पर देते समय मेरे आँसू थम नहीं रहे। दादा इन्हें मेरे ब्लॉग पर प्रकाशित देखते तो उन्हें अतिरिक्त प्रसन्नता ही होती और खूब होती। वे यकीनन बच्चों की तरह खुश होते। लेकिन उनकी यह खुशी मेरे भाग्य में नहीं रही। मैंने ही खुद से छीनी।

इन्हें पढ़ने से पहले कुछ बातों पर यदि ध्यान देंगे तो बड़ी कृपा होगी।

1975 से लेकर अब तक अन्तरराष्ट्रीय राजनीति और दशा में बदलाव आ गया है। तब जर्मनी विभाजित तथा। आज एक है। वहाँ की उस समय की राजनीतिक विचारधारा, आर्थिक, सामाजिक नीतियाँ बदल गई हैं। ऐसे में इन पत्रों को किसी देश के आन्तरिक और/या अन्तरराष्ट्रीय राजनीति के सन्दर्भों से जोड़ना समीचीन नहीं होगा। इन्हें लेखकीय और पाठकीय दृष्टि से देखते हुए इनका आनन्द लेना बेहतर होगा। यात्रा के दौरान किसी देश के बारे में जानना, उसके नागरिकों, उसकी सामाजिकता, अपने देश के प्रति नागरिकों की भावना, वहाँ के मजदूर-किसान, उनका आचरण, महिलाओं, बच्चों, बूढ़ों के साथ किया जानेवाला व्यवहार, वहाँ के जीवन मूल्य जैसे अनगिनत कारकों को टटोलना आदि बातें इन पत्रों की दर्शनीयता है। दो देशों के बीच सेतु का काम करनेवाले मैत्री संघों के कामकाज में दोनों देशों की राजनीतिक विचारधारा मुख्य आधार होती है। प्रतिनिधि मण्डलों के सदस्यों का चयन भी इन्हीं आधारों पर होता ही है। लेकिन जब कोई सदस्य कलमकार भी हो तब उसकी नजर और उसकी अभिव्यक्ति में सामंजस्य बैठाना चुनौती बन जाता है। कलमकार को केवल वही नहीं दिखता जो उसे दिखाया जाता है। जो उससे छुपाया जाता है, राजनयिक शिष्टाचार और सीमाएँ निभाते हुए वही सब उजागर करने का कौशल उसे बरतना पड़ता है। ये पत्र दादा की राजनीति और कलम की बेहतरीन जुगलबन्दी का बेहतरीन नमूना है - ऐसा मुझे तब भी लगता था और अब भी लग रहा है।

इन पत्रों का आनन्द लेने के लिए या तो इनके काल में ठहरना पड़ेगा या फिर उसे साथ बनाए रखना पड़ेगा। वर्तमान से उनकी मुठभेड़ शायद ‘बासमती भात में कंकर’ की स्थिति बना दे।

इस सबसे हटकर और इस सबसे पहले इस बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि अपने पूर्वनिर्धारित अति व्यस्त कार्यक्रम के बीच दादा ने ये पत्र कितनी कठिनाई, कितने परिश्रम से लिखे होंगे? इसके लिए उन्होंने अपनी, आहार-निद्रा जैसी दैनन्दिन चर्या के समय में ही कटौती की होगी। उनके लिखे वे मूल पत्र मेरे पास नहीं हैं। लेकिन एक भी पत्र में काटा-पीटी या ‘ओव्हर राइटिंग’ नहीं थी। दादा कभी भी ‘नोट्स’ बनाकर नहीं लिखते थे। ऐसे में बरबस ही यह बात मन में आती है कि लिखने से पहले किस तरह उन्होंने कागज से पहले ये पत्र अपने मन में लिखें होंगे? आज की पीढ़ी तो हाथों से इतना लिखने की कल्पना भी नहीं कर सकगी। भाई लोहानाजी ने एमएस वर्ड डाक्यूमेण्ट की, 65 पृष्ठों की जो फाइल मुझे दी है वह 25,423 शब्दों की, 23,08,760 केबी की है।

ब्लॉग पर देते समय मैंने भी कुछ बदलाव किए हैं। पुस्तक में दिए सारे गीत हटा दिए हैं। ऐसा करना, इनकी पठनीयता में कहीं भी बाधक नहीं बना। दो वाक्य हटा दिए हैं। हमारे कुटुम्ब में, सर्वाधिक मानसिक तादात्म्य हम दोनों भाइयों में ही था। यह बात दादा खुद ही कहते थे। उसी आधार पर कह पा रहा हूँ कि मेरे इस दुस्साहसिक हस्तक्षेप पर दादा को कोई आपत्ति नहीं होती। इसके अतिरिक्त मैंने ‘प्रजातन्त्र’ को ‘लोकतन्त्र’ से विस्थापित कर दिया है। मेरा मानना है कि ‘प्रजा’ के आते ही ‘राजा’ अपने आप ही चला आता है। हम गणतान्त्रिक लोकतन्त्र में जी रहे हैं। राजा और प्रजा शब्द मुझे अवमाननाकारक लगते हैं। विश्वास करता हूँ कि मेरे इस हस्तक्षेप को पाठकों का भी स्वीकार मिलेगा।

इतना कुछ कहने के बाद भी लग रहा है कि काफी-कुछ कहना बाकी है। लेकिन अभी इतना ही। बस।

-विष्णु बैरागी

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पहला पत्र

(इस पत्र में - ‘गुलाब बा’ याने उस समय हमारे घर/मकान के रखवाले। ‘पिया’ याने मेरी भाभीजी, श्रीमती सुशील चन्द्रिका बैरागी। ‘पप्‍पू’ याने दादा का साला, घन सच्चिदानन्‍द बैरागी। ‘गोर्की’ याने दादा का छोटा बेटा, मेरा छोटा भतीजा।)


रोस्टोक (पूर्वी जर्मनी से)

8 सितम्बर 76

शाम 4 बजे।

प्रिय बब्बू,

प्रसन्न रहो,

किसी भी देश के बारे में इतनी जल्दी कुछ लिख देना अच्छी बात नहीं होती। कुल जमा 4 दिन हुए हैं मुझे यहाँ पहँचे। याने कि 4 दिनों में क्या कुछ देखा होगा? पर मैं जानता हूँ कि तू और तेरे आसपास के सभी साथी मित्र, मेरे परिचित और हितैषी, मेरे पाठक और श्रोता, मुझ पर श्रद्धा रखने वाले और मुझ से ईर्ष्या करने वाले अनुयायी और विरोधी सभी की दिलचस्पी इस बात में अवश्य होगी कि मैं कहाँ हूँ, कैसा हूँ,क्या कर रहा हूँ और यह देश कैसा है? यहाँ का जन-जीवन, संस्कृति, राजनीति और स्तर किस तरह का है? कई प्रश्न होंगे जो उत्तर चाहते होंगे। मेरे पत्र की प्रतीक्षा तुम सब लोगों को होगी।

मैं कहाँ से शुरु करूँ? एक गुबार सा मेरी कलम की नोक पर उतर कर रास्ता चाहता है। जी. डी. आर. (जिसे हम पूर्वी जर्मनी भी कहते हैं) एक यूरोपीय देश है और 1945 में हिटलर की पराजय के बाद यह देश अस्तित्व में आया। यह तो सर्व विदित है। आबादी यहाँ की कुल एक करोड़ 80 लाख है। पूर्वी बर्लिन इसकी राजधानी (आबादी 11 लाख) होती है। भारत का क्षेत्रफल इससे 33 गुना अधिक है। उधर बँटवारे में पश्चिम जर्मनी जो गया तो अपने साथ कोई सवा छः करोड़ की आबादी भी ले गया। पश्चिम जर्मनी एक पूँजीवादी देश है। 100 फीसदी अमेरिकन प्रभुत्ववाला। जबकि जिस देश में मैं घूम रहा हूँ वह जी. डी. आर. (जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक) याने जर्मन समाजवादी गणतन्‍त्र अर्थात पूर्वी जर्मनी कहलाता है। यह वही देश है जिसके खिलाड़ियों ने अभी मान्ट्रियल ओलम्पिक की पदक तालिका में रूस के बाद सीधा दूसरा स्थान प्राप्त करके दुनिया को अवाक् कर दिया है। जिस समय मैं यह पत्र तुझे लिख रहा हूँ, यहाँ शाम के 4 बजे रहे हैं। भारत में इस समय रात के 8.30 बजे होंगे। मैं कल्पना कर रहा हूँ कि पिताजी सो गये होंगे। माँ गुलाब बा को हिदायतें दे रही होगी। पप्पू दुकान से लौट आया होगा। पिया रात का खाना खाने की तैयारी रही होगी। और गोर्की? वह पढ़ने का बहाना बनाते हुए रेडियो बजा रहा होगा। रहा सवाल तेरा, तो तू ‘दशपुर-दर्शन’ के लिए समाचारों को अन्तिम रूप दे रहा होगा।

4 अगस्त की सुबह 9 बजे भारतीय समय 4.30 बजे प्रातः हम सकुशल बर्लिन उतरे। शिष्ट मण्डल में कुल 14 मित्र हैं। इन 14 में से 5 लोग हम सीधे काँग्रेस से आते हैं। भू. पू. संसद सदस्या श्रीमती फूलरेणु गुप्ता (बंगाल) हमारे पूरे शिष्ट मण्डल की नेता हैं। शेष 4 में वर्तमान संसद सदस्य श्री दिनेश गोस्वामी (आसाम) श्री प्रफुल्ल गड़ई (महा सचिव, प्रदेश काँग्रेस उड़ीसा) श्री गुप्ता (भू. पू. सदस्य दिल्ली महा पालिका) और मैं हूँ। बाकी जो 9 मित्र हैं वे अलग-अलग स्थानों और निकायों से हैं। इस पूरे शिष्ट मण्डल का प्रवर्तन किया है भारत-जी. डी. आर. मैत्री संघ दिल्ली ने। दूसरों की तो मैं नहीं कहता पर मुझमें रुचि सीधे यहाँ वालों की थी। मेरा नाम पहला नाम था जिस पर इन्दिराजी ने सहमति दी ऐसा मुझे दिल्ली में बता दिया गया था। श्री के.एन. सेठ नामक एक पत्रकार किन्हीं अज्ञात कारणों से नहीं आ सके और चण्डीगढ़ के श्री बंसल पारिवारिक कारणों से ठहर गये। शेष सदस्य हैं प्रो. पाण्डेय (राजस्थान), श्री गोपाल प्रसाद (बिहार), श्री राव (आन्ध प्रदेश), श्री रेड्डी (रिटायर्ड जज मद्रास हाय कोर्ट), श्री श्रीधरन (दल के सचिव), श्री रामनाथन (बंगलौर के वकील), श्री खरसाटी (रिटायर्ड डिप्टी डायरेक्टर एग्रीकल्चर, मेघालय), प्रो. श्री भट्टाचार्य (आसाम, राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक), श्री शर्मा (दिल्ली के एक रिटायर्ड प्राचार्य)। सभी सदस्यों की अपनी-अपनी योग्यता है।

इस दल में नेपाल के एक साथी और श्रीलंका के दो भाई भी यहाँ शामिल हो गये हैं। इन 17 सदस्यों को 4 सितम्बर से 22.9.76 तक का बिलकुल व्यवस्थित कार्यक्रम दे दिया गया है। याने अब भारत में मेरा आना 23-9-76 को या फिर 30-9 को ही सम्भव होगा। 23-9 से 27-9 तक के मेरे साहित्यिक कार्यक्रम उधर भारत में तय हैं। केवल 26-27-28 के कार्यक्रमों का पक्का प्रस्ताव मुझे दिल्ली में मिलना है। शायद मिल जाय। 23-24-25 एवम् 29 के मार्यक्रम मेरे तय हैं। और यदि 1-10 को मुझे दिल्ली बोलना ही पड़ा तो फिर मैं 3-10 को मनासा पहुँच पाऊँगा। खैर, ये सब बातें बात की हैं। बात यहाँ से चल रही थी-

पहली रात हम लोग बर्लिन के एक आधुनिकतम होटल ‘होटल स्ताद बर्लिन’ (बर्लिन का हृदय) में ठहराये गये। 37 मंजिले इस होटल की 29वीं मंजिल पर मैं कमरा नम्बर शून्य आठ में था। 2000 बिस्तरों वाले इस होटल को यहाँं का विशेष दर्जा दिया गया है। चार तरह के होटल होते हैं इस देश में। प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, तीसरी श्रेणी और सर्वापरि विशेष श्रेणी। मेरे बापदादे भी ऐसे बिस्तरों पर नहीं सोये होंगे। हाँ तू, तेरे बच्चे और भतीजे सोयें तो मुझे खुशी होगी। इतने आरामदेह और नरमतम बिस्तरों पर सोना मेरे भाग्य में तो है, पर मुझे नींद नहीं आ पती है इन पर।

शायद तुझे पता नहीं होगा कि अगस्त 76 के अन्तिम सप्ताह में जब मैं विश्व हिन्दी सम्मेलन के लिये मॉरीशस में था तब वहाँ धोती, कुर्ता और जाकेट पहने घूमता था। पर यहाँ बर्लिन और रोस्टोक की सड़कों पर मैं अकेला भारतीय हूँ जो चुस्त पायजमा, कुर्ता, जाकेट पहने घूमता हूँ। जब हम लोग बस में या होटल में होते हैं तब तो सब कुछ एयर कण्डीशन होता है इसलिये सामान्य कपड़ों से काम चल जाता है। पर ज्यों ही बस या होटल से बाहर निकले कि तेज हवा और दगाबाज सर्दी की लहरें चमड़ी के भीतर घुस जाती हैं। अच्छा हुआ जो मैं चेस्टर लेता आया। खादी के इस ओव्हरकोट ने जान बचा दी। वैसे मैं अपनी बसन्ती लुंगी, बसन्ती कुर्ता और ऊपर भगवा ऊनी शाल ओढ़े भी हर जगह घूम लेता हूँ। मुझे देखते ही ‘इन्डिया इन्दिया’ की आवाजें शुरु हो जाती हैं। हमारे व्यवस्थापक साथी डॉ. गुन्थर, श्रीमती रुथ, श्रीमती एन और दुभाषिये श्री क्लोफर खूब मजा लेते हैं।

कोई इस बात पर विश्वास नहीं करेगा कि इन चार दिनों में हमने एक साल से लेकर दस साल तक के सैकड़ों बच्चे देखे हैं पर एक भी बच्चा रोता हुआ नहीं देखा। हम लोग ढूँढ रहे हैं कि कोई बच्चा रोता हुआ मिल जाये। अविश्वसनीय लगता होगा पर यह सच है कि इस देश में पाँचवीं से सातवीं तक की कक्षाओं में यौन सम्बन्धी सारा पाठ्यक्रम पढ़ा दिया जाता है। यौनाचार बच्चों को फूहड़ता की तरफ तब नहीं धकेल पाता।

दूसरे विश्व युद्ध की तबाही का यह देश जीवित प्रमाण है। पर अटूट संकल्प शक्ति, दृढ़ निश्चय, उत्कृष्ट राष्ट्रीय चरित्र, अनुपम अनुशासन और महान नवनिर्माण का भी यह देश अद्भुत सम्मिश्रण है। भूख, गरीबी, बेकारी, भ्रष्टाचार और भाई भतीजावाद यहाँ कहानियों में भी स्थान नहीं पाते। तस्करी और काला बाजारी यहाँ 1945 से पूर्व की घटनाएँ हैं। देश बना 1945 में। हिटलर और नाजियों ने यातना शिविरों में जिन दो करोड़ लोगों को जीवित जला दिया और भून दिया उसमें इस देश के केवल 10 लाख तो बच्चे ही थे। महिलाएँ और जवान तथा बूढ़े अलग। सब कुछ कल्पनातीत है। यातना का अनुमान पुस्तकों से नहीं लग पाता। हम लोगों ने एक यातना शिविर को देखा। आज वह अजायबघर है। शिविर की दीवार के उस पार आज सोवियत सेना का शिविर है। पर जो कुछ भी मैं देख पाया उससे मेरी कलम से एक कविता, आँखों से आँसू और कलेजे से चीख एक साथ निकल पड़ी। वह कविता वहीं के विजिटर्स रजिस्टर में मैं छोड़ आया हूँ। बच्चों पर यह देश उतना ही ध्यान देता है जितना एक मुर्गी अपने अण्डे पर या एक गाय अपने वत्स पर। राजमहलों में जो सुविधा राज पुत्रों को नसीब नहीं होती वह यहाँ बच्चों को दी जाती है। वस्तुतः बच्चे पढ़ते हैं, पढ़ाये नहीं जाते। पाठ्यक्रम ही ऐसा होता है। एक 10 वर्षीय बालक ने जब अपनी कक्षा में हमारे दल के सदस्यों से हाथ मिलाकर ‘इन्दिरा गाँधी को अभिवादन’ कहा तो सारा दल मुग्ध रह गया। हर बच्चा उत्फुल्ल, ताजा और किलकता मिलता है। उसकी किलकारियों से ही आभास हो जाता है कि इस बच्चे का भविष्य सौ फीसदी सुरक्षित है।

28 और 29 की पोस्टें यहाँ जोड़नी हैं।

बर्लिन से बब्‍बू को

बड़े बालों का फैशन यहाँ भी आया था। तब एक नियम बनाया गया - चाहे जितने बड़े बाल रखो पर उन्हें साफ रखो और उनके कारण काम में बाधा नहीं पड़नी चाहिए। बस! बाल एक ही झटके में कट गए। गर्दन तक आ गये। सारे रोस्टोक में एक अकेले हमारे साथी श्री गुप्ता ही बेलबाटम पहने घूम रहे थे। यहाँ पतलून न चुस्त है न ढीला। बिल्कुल करीने से है। पुरुष भी भरपूर कद्दावर कद वाले हैं पर खुले बटन और नंगी छातियों का प्रदर्शन नहीं करते। उनके कुरतों के बटन सलीके से बन्द होते हैं।

दवाई की दुकानें यहाँ बाजार और गलियों में नहीं हैं कि चाहे जहाँ से, चाहे जो, चाहे जैसी दवाई खरीद ले। डॉक्टर हर एक के लिए पूरी मुस्तैदी से तैयार बैठा है। पश्चिम से एल. एस. डी. और मादक दवाइयों का रोग यहाँ नहीं आया। ऐसी दवाईयों का सेवन करने वाला सीधा सख्त कैद पाता है। शराब पीने पर प्रतिबन्ध नहीं है, पर पी कर बेवकूफी करने पर तत्काल जेल दे दी जाती है।

परिवार और पारिवारिक खर्च

बच्चे पैदा करने पर कोई रोक नहीं है। कम आबादी की यहाँ समस्या है। पर दो बच्चों से अधिक के माँ-बाप स्वयं ही लज्जा महसूस करते हैं। यदि 5 बच्चों से अधिक का परिवार हो तो मकान किराये में सरकार सबसीडी देती है। परिवार का हर सदस्य कमाता है। 450 मार्क याने भारतीय 1800 रुपयों से कम किसी की तनख्वाह नहीं है। किन्तु ऊपर वालों की तनख्वाह 2600 मार्क अर्थात 10400 भारतीय रुपयों तक है। तनख्वाहों में दुगुना और तिगुना तक फर्क है। शनिवार और रविवार को शहर और सड़कें इस तरह सुनसान मिलेंगी मानो कर्फ्यू लग गया हो। सब छुट्टियाँ मनाने कहीं न कहीं चले जाएँगे। पर सोमवार से शुक्रवार तक सारा देश तन तोड़ मेहनत करता है।

कपड़ा बहुत मँहगा है। ओव्हरकोट भारतीय 1000 रुपये तक, मौजे 80 रुपये तक, टाई भारतीय 300 रुपये तक और पूरा सूट भारतीय 3000 रुपये तक पड़ता है। रेडियो, टीवी और कैमरे भी खूब मँहगे हैं। सामान्य कलम तक मँहगा है। सब्जियाँ और फल सस्ते हैं।

रोटी नहीं खाई जाती। डबल रोटी और मांस डटकर खाया जाता है। एक ही जहाज हमें दिखाया गया जो प्रतिदिन भारतीय 20 लाख रुपयों की मछलियाँ पकड़ता है। बहुत बड़ा जहाज था। 6 करोड़ रुपये प्रतिमाह मूल्य की मछली एक ही जहाज पकड़ता है। ऐसे 72 जहाज अकेले रोस्तोक काउन्टी (प्रान्त) के पास हैं। हर कारखाने में शानदार केण्टीनें। हिन्द महासागर के सिवाय बाकी सब समुद्रों में रोस्तोक के जहाज मछली का शिकार करते हैं।

बिना सोवियत संघ के इस देश का काम एक दिन भी नहीं चल सकता है। इस बात को यह देश स्वीकार करता है। किसी भी विदेशी पर कोई नजर भीतर घूमने पर रखी जाने का कोई उदाहरण नहीं मिला। हम लोग बेरोकटोक हमारी मर्जी से भी खूब घूमते हैं- अकेले ही। हर तरह के प्रश्न उत्तरित होते हैं। कोई पुलिस दिखाई नहीं देती। हाँ, सोवियत सैनिक और ऑफिसर अवश्य दिखाई दे जाते हैं।

खिलाड़ी, मजदूर और आबादी

खिलाड़ियों पर यह देश बहुत ध्यान देता है। आज से 25 वर्ष पूर्व जब इस देश ने खेलकूद पर पैसा खर्च करना शुरु किया तो पश्चिम ने इसकी बहुत आलोचना की। वैसे ही जैसी कि हमारी अणु नीति पर की गई है। पर यह देश अपने खिलाड़ियों को अवसर देता रहा। परिणाम ओलम्पिक (माण्ट्रियल) की पदक तालिका पर अमिट है। जब मैंने कुछ ओलम्पिक खिलाड़ियों से भेंट करने की इच्छा प्रकट की तो मुझे बताया गया कि हमारे खिलाड़ी अभी थकान उतार रहे हैं, आराम कर रहे हैं। हम उन्हें किसी तरह की बाधा नहीं पहुँचायें, कृपा होगी।

यहाँ के मजदूर की समस्या आज न रोटी है न कपड़ा। और मकान, शिक्षा या चिकित्सा तो है ही नहीं। उसकी समस्या अब है टेलिविजन, कपड़े धोने की मशीन और रेफ्रीजरेटर। सन 1980 तक यह सब हर वर्कर को प्राप्त हो जायेगा ऐसा वादा अगले प्लान में आ रहा है।

रिहायशी मकानों की समस्या को इस देश ने जिस तरह हल किया है उसका मुकाबला इतिहास में नहीं है। 1945 में यह सारा देश राख और मलबे का ढेर मात्र था। आज शहरों के आसपास ऊँची-ऊँची आवासीय बस्तियों के इन्द्रलोक बस गये हैं। 20 हजार से कम आबादी वाला कोई उपनगर नहीं बसाया गया। हर उपनगर में हर सुविधा प्रदान की गई। एक कमरे का फ्लैट, दो कमरों का फ्लैट और फिर तीन, चार और पाँच कमरों के फ्लैट।

साफ सफाई की बात क्या पूछिये! सड़कें, गलियाँ, घर, आँगन, बाग-बगीचे और गलियारे, बाथरूम, सब मन्दिरों की तरह साफ और सजे हुए। मकानों के रंग बिलकुल सादे। कोई रंगीनी पुताई में नहीं। सड़कें, फुटपाथ फूलों, पौधों से लहलहाते। जगह-जगह कचरा पेटियाँ और चलती फिरती कचरा बटोरने वाली ट्रालियाँ। गन्दगी से कोई रिश्ता नहीं।

पीने के पानी का कोई नल मीलों तक नहीं। पानी पीना हो तो बाथरूम में जाओ और नल चला कर पानी पियो। होटलों में पानी नहीं दिया जाता। न कहीं सार्वजनिक मूत्रालय, न शौचालय। हर आदमी मानो कहीं जरूरी काम से भागा जा रहा हो। धीरे चलने का कोई कारण नहीं। सबको न जाने कौन-सी जल्दी पड़ी है। कोई किसी की न तो सुनता है न कहता है।

जनमत और जन प्रासाद

साम्राज्यवाद, अमेरिका, प्रतिक्रियावाद, नाजीवाद, फासिस्ट, हिटलर, सम्प्रदायवाद, रंगभेद ये ऐसे शब्द हैं जिन्हें पूरी नफरत के साथ बोला जाता है। पूँजीवाद माँ-बहिन जैसी गाली के अर्थ में प्रयुक्त होता है। जबकि शान्ति, अमन, भाईचारा, समाजवाद, साम्यवाद, मित्रता, कॉमरेड, संघर्ष, मुक्ति, मानवता, समानता ऐसे शब्द हैं, जिन्हें बोलते समय गर्व और प्रगति का अनुभव किया जाता है। गाँधी, नेहरु, लेनिन, मार्क्स को आदर से बोला जाता है। इन्दिरा गाँधी और भारत के प्रति आत्मीय समादर व्यक्त होता है। भारतीयों को ये लोग पवित्र पूज्य और आदर्श मानते हैं। भारतीयों की कमजोरियों से खूब परिचित है यह देश। पर भारत ने गये 30 सालों में बिना किसी नो-हाऊ के जो तकनीकी तरक्की की है, वैज्ञानिक विकास किया है और समाजवाद को हृदय से स्वीकार किया है उसका लोहा यह देश खुलकर मानता है। हमारी यात्रा के ओर-छोर कई महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़े हैं। अभी-अभी इस देश की 9वीं काँग्रेस सम्पन्न हुई है। जुलाई में इन्दिराजी का भव्य स्वागत इस देश ने किया। आगामी सत्रह अक्टूबर को यहाँ की संसद और काउण्टी कौंन्सिलों (प्रान्तीय-विधानसभाओं) के आम चुनाव हैं। माण्ट्रियल की अद्भुत विजय, माओ की मृत्यु, भारतीय हवाई जहाज का अपहरण वातावरण में अपना असर बनाये हुए हैं। किसी बात पर यहाँ वाले चुप हो जाते हैं तो किसी बात पर हम चुप्पी लगा जाते हैं।

अद्भुत है यहाँ का संसद भवन जिसे पीपुल्स पैलेस कहा जाता है। मैंने इसे जन प्रासाद नाम दिया है। मात्र 32 महिनों में यह विशाल भवन आधुनिकतम तकनीक पर बना दिया गया। यह आश्चर्य की बात है। पूरा भवन तो हम लोग नहीं देख पाये पर इसका मात्र एक प्रेक्षागृह हमने देखा है। 5000 सीटों वाला यह सभागार दो तीन बटन दबाने मात्र से चाहे जिस आकार में बदल लिया जाता है। इसका मंच और कुर्सियाँ अपने आप कम ज्यादह हो जाते हैं। 12 भाषाओं में अनुवाद की व्यवस्था इस सभागार में है। पूरे संसद भवन में कहीं भी, एक भी, पर्दा नहीं लगाया गया है। सारी दीवारें स्टील और एल्यूमिनियम की हैं। ताम्रवर्णी पारदर्शी विशाल शीशे, धूप से रक्षा करते हैं और जीवन की हर सुविधा यहाँ उपलब्ध है। यह संसद भवन बर्लिन में है। संसद की बैठक वर्ष में चार या पाँच बार होती है और वह भी केवल एक-एक दिन के लिये। यहाँ की चुनाव पद्धति और कार्यप्रणाली पर पूरा लेख अलग से हो सकता है। कुल पाँच पार्टियाँ जनता में काम करती हैं पर विरोधी दल नाम की कोई चिड़िया इस देश में नहीं है। भ्रष्टाचार, लालफीता और वेश्यावृत्ति इस देश के लिए अपरिचित शब्द है।

दूसरा पत्र तुझे जल्दी ही लिखूँगा। अभी इतना ही बस।

भाई,

बालकवि बैरागी

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रचनाकार: बर्लिन से बब्बू को - बालकवि बैरागी के पत्र विष्णु बैरागी को - 1
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