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बर्लिन से बब्बू को - बालकवि बैरागी के पत्र विष्णु बैरागी को - 2

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दूसरा पत्र रोस्तोक से 12-9-76 शाम 6 बजे भारतीय समय रात्रि 10.30 प्रिय बब्बू, प्रसन्न रहो, इस आशा से यह लम्बा पत्र फिर लिख रहा हूँ कि मेरा प...

दूसरा पत्र

रोस्तोक से

12-9-76

शाम 6 बजे

भारतीय समय रात्रि 10.30

प्रिय बब्बू,

प्रसन्न रहो,

इस आशा से यह लम्बा पत्र फिर लिख रहा हूँ कि मेरा पूर्व पत्र मिल गया होगा और लगता होगा कि पत्र अधूरा है। मैं नहीं जानता कि तुम लोग मेरे उस पत्र का कैसा और क्या उपयोग करने का सोच रहे होगे। खैर,

वह पत्र लिखते-लिखते एक दिलचस्प घटना घट गई। श्री के. एन. सेठ जिनका कि आने की हम लोग उम्मीद छोड़ बैठे थे वे अनायास आ गये। दिल्ली से मास्को और फिर मास्को से बर्लिन, उनकी अकेले की यात्रा कम दिलचस्प नहीं रही। पर वे स्वयम् एक जागरुक पत्रकार हैं सो उनकी यात्रा पर वे खुद लिखेंगे। ज्यों ही होटल में हम लोगों को पता चला कि श्री सेठ दिल्ली से रोस्तोक पहुँच गये हैं, हर कमरे से प्रतिनिधि भाग कर उनके कमरे में जा पहुँचे। उन्हें घेर लिया। भारत के ताजा समाचार वे ही हमें दे सकते थे। वे हमारे तीन-चार दिन बाद भारत से चले थे। यद्यपि बी. बी. सी. का समाचार बुलेटिन हमारे लोग सुन लेते थे तो भी मात्र एक दिन पूर्व के समाचार उनसे ही मिलने की प्रामाणिक उम्मीद थी। पर श्री सेठ ने हम सबको निराश किया। वे न तो समाचार लाये न पुराने समाचार-पत्र ही। भारत में सब कुछ यथावत है। कोई विशेष गर्म हवा उधर नहीं चली। निराशा के साथ ही साथ तसल्ली भी मिली। यहाँ न तो हिन्दी अखबार आते हैं न अंग्रेजी। हाँ, लन्दन से निकलने वाला अंग्रेजी अखबार मार्निंग स्टार (Morning Star) जरूर आता है। पर वह मूलतः भारत विरोधी अखबार है। किसी की दिलचस्पी उसमें नहीं थी। मेरे पास तो केवल 5-9 से 11-9 तक का ‘धर्मयुग’ है जिसे मैं पचासों बार तरह-तरह से पढ़ चुका हूँ।

अंग्रेजी को किसी तरह का प्रोत्साहन यह देश नहीं देता है। अंग्रेजी सारे यूरोप में अपाहिज और अमान्य भाषा है। यदि दुभाषिया नहीं हो तो यहाँ अंग्रेजी किसी काम नहीं आये। अपनी भाषा जर्मन के लिये इस देश की आसक्ति हम हिन्दी वालों के लिये ईर्ष्या की बात है। मैंने कहा न! अंग्रेजी यहाँ पहले पंगु है फिर अनाथ।

जर्मनी में भिखारी?

श्री सेठ के आगमन से भी अधिक दिलचस्प रही दूसरी घटना। इस घटना ने हमें मनुष्य की कमजोरियों का आश्वासन दिलवा दिया। हुआ यह कि बड़ी सुबह कोई 7.30 या 8 बजे मैं होटल के ठीक बाहर अपनी डाक डालने के लिये पोस्ट के डिब्बे का ढक्कन टटोल रहा था कि एक जर्मन भिखारी मेरे सामने खड़ा हो गया। पाँच फिनिक्स का सिक्का दिखा-दिखा कर वह हाथ फैला रहा था। यह समूचे संसार के लिये एक अविश्वस्त समाचार है पर है बिलकुल

सच। मैंने तत्काल श्री मूलचन्द गुप्ता को बुलाकर उस भिखारी से उनकी भेंट करवा दी। हमने किसी ने उसे भेंट या भीख नहीं दी पर मेरा मन करता है हो न हो वह भिखारी इस देश का निवासी नहीं रहा होगा। पर फिर बाहरी आदमी

यहाँ क्यों कर भीख माँगेगा? आनन्द तब आया जब वह मुझसे पाँच फिनिक्स के लिये आजिजी करने लगा। मुझे अपने बीते दिन याद गये। मेरी हँसी भी चल गई। एक भिखारी से दूसरा भिखारी माँग रहा है! वह भी जी. डी. आर. जैसे समाजवादी देश में! वाह रे भाग्य? भीख से यहाँ भी पीछा नहीं छूटा। अपने जैसे हर जगह भगवान मिला देता है। पर उस समय सारे होटल में कुहराम मच गया जब हमारे व्यवस्थापकों को इस बात का पता चला। किस बुरी तरह उस भिखारी की ढूँढ मची कि मैं कह नहीं सकता। ईश्वर जाने उसका क्या भविष्य हुआ होगा। राम जाने वह कहाँ होगा। पर हम लोगों से क्षमा माँगते-माँगते हमारे व्यवस्थाकों की जबान घिस गई है।

कल दोपहर के भोजन के बाद हम लोग रोस्तोक काउण्टी छोड़ देंगे। दो रातें रास्ते के किसी मोटल में बिताकर 15-9 की सुबह बर्लिन पहुँच जायेंगे। पूरे आठ दिन इस प्रान्तर में बहुत अध्ययन मनन के काटे। खाने वालों ने खूब खाया। मैंने खूब लिखा पर सबसे ज्यादह बाजी मार ले गये पीने वाले। रूसी शराब, जिसे वोदका कहते हैं, यारों ने खूब पी। यहाँ की स्थानीय शराब कोनिया भी पट्ठों ने खूब गटकी। कोनिया बमुकाबले वोदका कुछ कम नशीली होती है। पर नशा आखिर नशा तो है ही।

अब पता चला कि हमारी यह यात्रा जून 1976 में क्यों नहीं हो पाई? चक्कर यह चला कि एक साथ एक होटल में कहीं भी 25 बिस्तर या 16 कमरे नहीं मिल सके। मार्च में हम लोगों के लिये कमरों की तलाश शुरु हुई। कमरे मिल पाये सितम्बर के लिए। वे भी आठ दिन एक जगह और आठ दिन दूसरी जगह। 6 माह पूर्व कमरों का आरक्षण यहाँ सामान्य बात है। जिस समय मनासा में यह समाचार आया कि हमारी यात्रा जून के बदले सितम्बर में होगी तो तुझे पता होगा, मेरे ईर्ष्यालु फूहड़ आलोचकों ने कितनी फब्तियाँ कसी थीं। वे लोग कितना कूदे थे। राम जाने यह सब पढ़कर उन पर क्या बीत रही होगी क्योंकि मैं यह सारी राम कहानी उसी देश से लिख रहा हूँ। इतना ही नहीं इस देश की यात्रा मारिशस से और जुड़ गई। याने एक के बदले दो देश जाना पड़ा। ईश्वर कितना सटीक उत्तर देता है!

सवाल अपने-अपने खाने का

खेतों में इस समय यहाँ मक्का की फसल खड़ी है। मेरी-तेरी छाती बराबर ऊँची फसल होगी। कच्ची मक्का यहाँ सूअरों की खिलाई जाती है। उनके खाने से जो बच जाती है वह सूखने पर घर आती है और फिर उसे विशेष तौर पर भून कर नमकीन बनाकर काजूनुमा फूलों की तरह खाया जाता है या फिर सलाइयों जैसे मुरमुरे लम्बे बिस्कुट बनाकर चाय काफी और शराब के साथ सेवन किया जाता है।

पशुओं में अभी तक कुत्ते, बिल्ली, सुअर, घोड़े और गायें ही हमें यहाँ देखने को मिली। गायें यहाँ सफेद या लाल नहीं होतीं। वे काली, कबरी, कजरी और कपिला होती हैं। सींग छोटे, सामने की ओर और पैने। एक भी गाय दुबली या मरियल नहीं देखी। खूब दूध देती है। थन भरे और फटते से दिखाई पड़ते हैं। दूध उतना ही स्वस्थ और नीरोग। मैं साँझ सवेरे डटकर दूध पीता हूँ। 24 अगस्त की शाम को डाक्टर संघई साहब की मशीन पर 67 किलो तुलकर बस में बैठा था। कल शाम को यहाँ तुला तो 69 किलो उतरा हूँ। कुल 19 दिन की खुराक, भ्रमण और आत्म सन्तोष का यह पुरुस्कार मिला। शाकाहारी भोजन यद्यपि इतना रुचिकर नहीं होता, तो भी इतना पुष्ट होता है कि जिस समय हमारी शिष्ट मण्डल यहाँ पहिले दिन खाना खाने बैठा था तब शाकाहारी के नाम पर हम कुल तीन व्यक्ति थे। पर आज? 15 में से 9 शाकाहारी टेबल पर बैठते हैं। मजा तब आता है जब कि अण्डा शाकाहारियों को भी परोस दिया जाता है। हम केवल दो व्यक्ति हैं जो अण्डा भी नहीं खाते। सारी प्लेटें फिर से लगाई जाती हैं। अण्डे की सामग्री हटाई जाती है। शाकाहारियों को उबली सब्जियाँ और ब्रेड, मक्खन आदि मिलता है। दूध, दही खूब खाओ। सामिष लोग यहाँ के मांस से ऊब गये। मछली, मुर्गी तो खाते ही हैं यहाँ ‘बीफ’, जिसे गौमांस कहते हैं खूब खाया जाता है। जब खाना शुरु होता है तब आनन्द यह आता है कि शाकाहारी लोग तो सामिष भोजन की चर्चा करते हैं और सामिष लेने वाले शाकाहारी भोजन की बातें करते पाये जाते हैं। व्यवस्थापकों सहित यह दल कोई 22 लोगों का है पर इन 22 ही लोगों को होटल में एक ही कन्या बिना किसी हड़बड़ी और तनाव के हँसते-मुस्कुराते आराम से खाना खिला देती है। इन कन्याओं की संख्या कभी तीन से अधिक नहीं बढ़ी। शराब भी ये ही प्रस्तुत करती हैं।

इन 22 लोगों में हमारी बस का ड्रायवर भी शामिल है। कितना अच्छा लगता है जब नाश्ता करते समय और खाना खाते समय तथा घूमते, देखते समय ड्रायवर भी साथ ही खाता-पीता और बैठता है। व्यवस्थापक दल में दो तो दुभाषिये हैं। एक श्री क्लोफर, मूलतः आस्ट्रियन। खूब हँसोड़ और विनोदी। जी. डी. आर. के ट्रांसलेशन ब्यूरो में चीफ ट्रांसलेटर हैं। अनुवाद इतना सजीव और विनोदपूर्ण करते हैं कि सुनने वाले बाग-बाग हो जाते हैं। दूसरी हैं श्रीमती ईरीज कोबा। कल तक हम उसे कुमारी समझते थे। वह श्रीमती निकली। नई-नई अनुवादिका है। सीख रही है। फिर है व्यवस्थापिका श्रीमती रुथ और श्रीमती ईमी। गये पत्र में मैं श्रीमती ईमी को श्रीमती एन लिख गया था। डॉ. गुन्थर अगली व्यवस्था के लिए बर्लिन चले गये हैं। और प्रथम मानो या अन्तिम सदस्य है हमारा ड्रायवर। इस देश में काम और कर्मठता की पूजा होती है। पदों की नहीं। डॉ. गुन्थर इस दल के सर्वाच्च आफिसर हैं पर हम लोग बड़े से बड़े पदासीन लोगों से मिले तब भी हमारा ड्रायवर साथ था। आज इस काउन्टी के उपाध्यक्ष की बराबरी में उनका व हमारा ड्रायवर इत्मीनान से खाना खा रहा था। मनुष्य यहाँ समानता का व्यवहार पाते हैं और करते हैं। यदि तनख्वाह से ही मामला जाँचा जाय तो हमारे बस ड्रायवर की तनख्वाह है 650 मार्क याने 2600 भारतीय रुपये। सामान्य जीवन में यह देश व्यक्ति को पद से नहीं नापता।

अवकाश गृह के अजूबे

अपने कामगारों, किसानों और बुद्धिजीवियों की सुख सुविधा का सारा माध्यम यहाँ की ट्रेड यूनियनें हैं। हर व्यक्ति को वर्ष में 13 दिन का सवेतन अवकाश मिलता है। इस अवकाश को ये लोग समुद्र के किनारे बने होलीडे होम्स (अवकाश गृहों) में पूरी मस्ती के साथ बिताते हैं। कल शनिवार को हम लोगों को ऐसे ही एक हालीडे होम में ले जाया गया। अकेले रोस्तोक प्रान्त के पास छुट्टियाँ मनाने के लिये ऐसे 35 हजार शेडों की व्यवस्था है। एक शेड में दो व्यक्ति आराम से पाँव पसार कर समुद्र के किनारे स्नानावकाश, मालिश और धूपस्नान का आनन्द लेते हैं। 13 दिनों के लिये प्रति व्यक्ति केवल 75 मार्क याने 300 भारतीय रुपये चुकाने होते हैं। बच्चे के 30 मार्क अलग। इस तरह यदि पति, पत्नि और एक बच्चा अवकाश मनाने आयें तो उन्हें 720 भारतीय रुपयों में पूरे 13 दिन तक हर सुविधा (खाना, पीना, नाश्ता, स्नान, शेड और होटल) ट्रेड यूनियन देती है। यह घर से भी सस्ता होता है। शेड का तात्पर्य है छायादार छोटी सी गुमटी। समुद्री हवा से बचने के लिए शेड की पीठ समुद्र की तरफ करके, सूर्य की ओर मुँह करे, पति पत्नि या प्रेमी युगल केवल स्नान के कपड़ों में सारा दिन समुद्र स्नान और धूप स्नान का आनन्द लेते हैं। कल हम लोगों ने कोई 6 या 7 हजार जोड़े इस तरह एक साथ देखे। मक्खन की तरह गोरी काया वाली इतनी महिलाओं और पुरुषों को करीब-करीब 90 फीसदी नग्न देखने का यह हमारा पहला अवसर था। कई मित्रों की बाँछे खिल गईं पर कई की घिग्गी बँध गई। निस्संकोच जोड़े अपने कलापों में लगे हुए थे। हमें इस अवकाशगृह के डायरेक्टर ने कहा कि आप चाहें जिससे, चाहें जो बात कर सकते हैं पर बात कौन कर सकता था! इन अवकाश गृहों में युवा विद्यार्थियों का प्रवेश बिना किसी झिझक के वर्जित है। उनके लिए अलग से अवकाश गृह बने हुए हैं। इस अवकाश गृह का चरम अभी आगे है। डायरेक्टर ने बताया कि समुद्री हवा में नमक के कारण प्रायः यहाँ चर्म रोग बहुत हो जाते हैं। इसलिए कई नर-नारी अपने चर्म रोगों का ईलाज करवाने, डॉक्टरों की सलाह से यहाँ भेजे जाते हैं। डायरेक्टर महोदय ने एक लकड़ी के बाड़े की तरफ इशारा किया। समुद्र तट से बिलकुल लगा यह बाड़ा एक दम सामान्य था पर जब उसके भीतर धूप ले रहे और खेलते कूदते सैंकड़ों स्त्री पुरुषों को हमने देखा तो हमारे दीदे फटे रह गये। सैकड़ों स्त्री पुरुष चर्म रोग का अद्भुत ईलाज कर रहे थे। उनके पास नाम मात्र को भी कपड़ा नहीं था। अद्भुत संकोचहीनता थी। अविश्वसनीय दृश्य था। इतने, बिलकुल नंगे लोग इस तरह उछलते-कूदते जीवन में किसी भी भारतीय ने नहीं देखे होंगे। ओफ! क्या नजारा था! वे अपनी दुनिया में मस्त थे। हम काठ होते जा रहे थे।

इन अवकाश गृहों में दो मौसम अवकाश मनाने के होते हैं। एक शरदावकाश और दूसरा ग्रीष्मावकाश। अगली योजना में कोई 50 लाख लोगों के लिए इस तरह के अवकाश गृहों का प्रावधान किया जा रहा है। अभी यह संख्या शायद 10 लाख तक ही सीमित है।

ऑपेरा और हिन्दी : नये आयाम

यहाँ आकर यदि कोई ऑपेरा नहीं देखे तो यात्रा अधूरी मानी जाती है। हम लोगों को सौभाग्य से विश्व प्रसिद्ध कला सर्जक ऑपेरा आराध्य जर्मन लेखक स्व. मोजार्ट का ऑपेरा ‘दी एस्केप’ अनायास देखने को मिल गया। यहाँ का आपेरा मंच चूँकि दुरुस्त किया जा रहा है इसलिये इसका प्रदर्शन कोई 300 लोगों की उपस्थिति में एक पुराने डान्स हाल में, फर्श पर किया गया। चिली, बल्गेरिया, जर्मन और पोलैण्ड के कलाकारों ने यह भव्य संगीत कथा जब बिलकुल हमसे कोई 7 या 8 फीट दूरी पर, ठीक हमारे सामने, फर्श पर प्रस्तुत की तो हम लोग साँस रोके देखते रह गये। यह एक सुल्तान के हरम से दो बेगमों को, उनके प्रेमियों द्वारा भगाये जाने की सुखान्त नाटिका है। कोई पर्दा नहीं। कोई सेट नहीं। हाँ, कोई 70 लोगों का कर्ण मधुर आर्केस्ट्रा अवश्य था। संगीत संचालक पसीने से नहा गया था। पहिली बार मैंने किसी जर्मन सर्वांग सुन्दरी नारी को इतने पास से इस देश में देखा था। यह इस ऑपेरा की नायिका थी। यहाँ की सुप्रसिद्ध गायिका भी है। ऑपेरा का रूप हमारे ‘माच’ और खास तौर पर ‘भोई’ से बिलकुल मिलता है। सवा दो घण्टे के इस प्रदर्शन में सम्वाद तो हमारे किसी की समझ में एक अक्षर भी नहीं आया पर अभिनय इतना अद्भुत था कि कथानक क्षण-क्षण प्राणों में उतरता चला गया। दो घटनाएँ इस आपेरा की मुझे सदा याद रहेंगी। एक तो समाप्ति पर बजी तालियाँ। कोई बीस मिनिट लगातार सारा सभागार तालियों से गूँजता रहा और कलाकार अभिवादन स्वीकार करते रहे। दूसरा, इस प्रदर्शन पर यहाँ के विजिटर्स बुक में लिखी मेरी टिप्पणी। मुझसे इस प्रदर्शन पर आपेरा की संचालिका ने कुछ लिखने का आग्रह किया। मैंने एक पृष्ठ की टिप्पणी हिन्दी में लिखी। जब संचालिका और नायिका को बताया गया कि यह टिप्पणी ‘हिन्दी’ में है तो दोनों ने उस पृष्ठ को भाव विभोर होकर चूम लिया। मैं इसे हिन्दी का गौरव मानता हूँ। मेरा यह विशेषाधिकार रहा कि मेरी टिप्पणी पर एक अन्तर्राष्ट्रीय लोक-नायिका-गायिका के ओठ भावाकुलता से लगे। मैंने तब उन्हीं के सामने अपने कलम को चूम लिया था। मैं और कर भी क्या सकता था?

भीड़ का चरित्र : रैली के सम्बन्ध में

आज हम लोग एक अन्तर्राष्ट्रीय रैली के दर्शक बने। 12 सितम्बर इस पूरे देश में फासिस्ट विरोधी दिवस के तौर पर मनाया गया। बड़े सबेरे नौ बजे यह रैली एक सभा में बदल गई। दो लाख की आबादी वाले इस शहर में कल शाम ऐसी कोई चहल-पहल नहीं थी। पर सुबह के नौ बजते-बजते शहर के मुख्य चौक में कोई पचास-साठ हजार आबाल-वृद्ध नर-नारी राष्ट्र पताकाओं और बैण्डबाजों की धुनों के साथ बिलकुल संयत होकर जुट गये। तीन या चार भाषण हुए। मंच पर कोई कुर्सी नहीं थी। जमीन पर कोई बिछात नहीं। मंच पर दस-दस की पंक्ति में पचास आदमी खड़े थे। सामने हजारों की भीड़। दस बजते-बजते सारी भीड़ न जाने कहाँ समा गई। न कहीं ट्रेफिक रुका, न कोई चिल्लपों मची, न सभा स्थल पर कोई गन्दगी हुई, न कोई अनहोनी। सारा शहर एक घण्टे भर में वापस रविवार के सन्नाटे में डूब गया।

उसके बाद हम लोग इसी काउण्टी की सरकारी बोट में बाल्टिक सागर तक सैर करने चले गये। इस सैर में खूब कविताएँ और खूब ठहाकेबाजी हुई। यहाँ आकर मुझे अहसास हुआ कि मैं यूरोपीय स्तर की अंग्रेजी बोल भी लेता हूँ। समझ भी लेता हूँ। कविताएँ मैं हिन्दी में लिखता और गाता हूँ। श्री क्लोफर उनका जर्मनी में अनुवाद करते हैं। जर्मनी के लिये अंग्रेजी अनुवाद श्री प्रसाद और श्री सेठ करते हैं पर मैं अब यह काम खुद भी कर लेता हूँ।

मैं बात भीड़ की कर रहा था। भीड़ को सलीके और शिस्त से रास्ते लगाने के लिए अच्छी सड़कों का होना बहुत जरूरी है। मैं लिख चुका हूँ कि यहाँ की सड़कें खूब चौड़ी और चमकीली हैं। उनसे लगे ही हुए दोनों तरफ सबसे पहिले सायकल पाथ हैं। सायकल वालों का रास्ता कोई तीन फीट चौड़ा छोड़ने के बाद फिर पैदल चलने के लिये रास्ता है। सायकलें यहाँ बहुत हैं पर भारतीय सायकलों की तरह खूबसूरत नहीं हैं। अक्सर महिलाएँ, बच्चे और किशोर सायकलों पर भागते हैं। मोटरें, कारें और सायकलें यहाँ तेज अवश्य चलती हैं पर अन्धाधुन्ध नहीं। तीन साल के बच्चे को बिना पेडल की सायकल थमा दी जाती है। वह निश्चिन्त होकर इन सड़कों की उप सड़कों पर अपनी सायकल चलाता रहता है। यह सायकल भी दो पहियों की ही होती है।

वास्तव में बच्चों पर यह देश तभी से ध्यान देना शुरू कर देता है जब वह गर्भ में होता है। गर्भवती महिलाओं की इतनी देखभाल राष्ट्रीय स्तर पर समाजवादी-साम्यवादी देश में ही सम्भव है। गर्भवती नारी को यह देश राष्ट्रमाता का दर्जा देता है। उसका धारित गर्भ वस्तुतः राष्ट्र होता है। इस बहस में जी. डी. आर. कभी नहीं पड़ा कि गर्भ में लड़का है या लड़की। गर्भ के एक-एक दिन का हिसाब रखा जाता है और गर्भवती को अतिरिक्त सुख, सन्तोष और समुल्लास दिया जाता है। वन्दनीय है यह आराधना।

किशोरों और जवानों को अलग से यूथ क्लब की व्यवस्था दी गई है। 18 वर्ष का नागरिक यहाँ मतदान का अधिकारी है। यह राष्ट्र की अमानत और भविष्य होता है। यूथ क्लबों पर उपन्यास लिखे जा सकते हैं। उनका अनुशासन और कठोर प्रवर्तन, निर्मम नहीं आकर्षक है। 17 बरस का होते-होते विद्यार्थी कम से कम 100 मार्क (भारतीय 400 रुपये) प्रशिक्षण वृत्ति पाने लगता है। डिग्री, डिप्लोमा या सर्टिफिकेट, जैसी उसकी प्रतिभा और रुझान हो, उसके लिए अवसर का हर द्वार खुला है। सम्भावनाओं का क्षितिज निस्सीम है। वह शिकायत नहीं, प्रयत्न करने पर बाध्य है। राजनीति से वह जुड़े या नहीं जुड़े, कोई प्रतिबन्ध नहीं है। उसे स्वतन्त्र चिन्तन का पूरा अवसर मिलता है। लेकिन उसके आसपास का वातावरण ही ऐसा है कि वह राजनीति, समाजवाद, प्रगति, कठोर श्रम, अनुशासन, राष्ट्रीयता और विश्व-बन्धुत्व की चेतना से जुड़ जाता है। राजनीतिक दलों और मजदूर संघों के विशाल आराम देह कार्यालय यहाँ दर्शनीय हैं। उनमें पुस्तकालय से लेकर टी. वी. तक की सुविधा है। पार्टियों के कार्यालय यहाँ इतने विशाल और आधुनिकतम हैं कि भारत में बड़े से बड़े उद्योगपति का कार्यालय इतना साधन-सम्पन्न नहीं होगा। हाँ, उनमें साज सजावट बिलकुल नहीं है पर सुविधाएँ सभी हैं।

रातें.....औरतें....कारें......और मशीनें

इतने बड़े व्यस्त देश में आखिर निमाण कार्य कब होते हैं? क्या ये रात-दिन होते हैं? नहीं। सड़कें और भवन निर्माण तथा शहर, सड़कों, गलियों और चौराहों की सफाई के सारे काम रात में होते हैं। दिन में कोई खट-खट नहीं। सड़कों पर दवा का छिड़काव नियमित होता है पर साँझ ढले। रात नौ बजे के बाद किसी को टेलीफोन करना भी बुरा माना जाता है। नाईट क्लब जरूर हैं पर इने-गिने। कोई विशेष नाईट लाईफ नहीं है। सप्ताह में शनिवार, रविवार की छुट्टी होती है पर महीने में प्रत्येक व्यक्ति को 192 घण्टे काम करना ही होता है। इससे कम की गुंजाइश नहीं है। मजदूर, किसान और हर कामगार के लिये ओव्हर टाईम की व्यवस्था है पर लालच में उसको जान नहीं देने दी जाती है। राजनीतिज्ञ हमारी तरह चौबीसों घण्टे भाइयों! बहनों! नहीं करते फिरते।

सोमवार से शुक्रवार तक सप्ताह के पाँचों दिन यदि सड़कों पर देखो तो कुल दो चीजें दिखाई देंगी। कारें-कारें-कारें और फिर औरतें-औरतें-औरतें। इसका अर्थ यह नहीं है कि और कुछ दिखाई नहीं देता, पर पहिले आपको ये दो चीजें देखनी होंगी। अन्य बाद में।

खेती का सारा आधार या तो सहकारी खेती है या फिर सामूहिक खेती। समूची खेती मशीनों से होती हैं। कहीं कहीं घोड़ों से भी होती दिखाई पड़ी। खेती की कोई मेड़ नहीं। एक खेत शुरु हुआ तो मीलों तक चला गया। फिर सौ-पचास एकड़ का जंगल आ गया। फिर खेत शुरु हो गया। उत्तरी जर्मनी में कोई पहाड़ है ही नहीं। उधर दक्षिण जी.डी. आर. में पहाड़ है पर उत्तरी जी.डी. आर. मैदानों, खेतों, छोटे टीलों और छोटे जंगलों का इलाका है। जंगल घने हैं पर बीहड़ नहीं। पेड़ों में चीड़, देवदारु मुख्य। सारे देश में लकड़ी का काम अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का मिलेगा।

कारखानों में मशीन, मनुष्य की गुलाम है। मनुष्य मशीन का दास नहीं। निजी स्वामित्व समाप्त सा हो गया है। मशीन यहाँ मनुष्य की सहायता करती है। भारत में कितने ही कामों को मैं मशीन से हुआ मानता था पर यहाँ देखा कि यह सब काम मनुष्य हाथों से कर रहा है। यदि मशीनीकरण में मानव श्रम की गुंजाईश नहीं रखी गई तो मशीन मनुष्य को खा जायेगी। मार्क्स और गाँधी शायद इस बिन्दु पर एक हैं।

और उलरिच ने कविता पढ़ी

यहाँ के कवियों-लेखकों-नाटककारों का भी देश व्यापी संघ बना हुआ है और वे भी करीब-करीब ट्रेड यूनियनी तरीकों से काम करते हैं। रोस्तोक के एक 36 वर्षीय युवा कवि श्री उलरिच (Ulrich) से भोजन पर मेरी भेंट करवाई गई। कोई दो घण्टे हमारी कविताबाजी वहीं भोजन के समय चलती रही। मैंने कविता सुनाई, मिट्टी, रक्त, पसीने, श्रम, संघर्ष और भाईचारे की। जब उससे कहा गया तो उसने कविता पढ़ी। विचित्र लगी सबको। शीर्षक था ‘गलियारे में।’ अनुवाद मैंने किया। कविता इस तरह बही-

फ्लेट तुम्हारे पास भी है फ्लेट मेरे पास भी

एकान्त तुम्हारे पास भी है, एकान्त मेरे पास भी

पर ओ! मेरी प्रेमिका!

जो रोमाँच

इस गलियारे में लिये गये

आलिंगन, चुम्बन देते हैं

वह कमरों के एकान्त में कहाँ?

कमरों में हमें हाथ धोना पड़ते हैं

गलियारों में नहीं

कमरों के कसाव ढीले पड़ जाते हैं

गलियारे के सुदृढ़।

आओ न गलियारे में

कुछ करें

एक दूसरे की बाहों और आँखों में

डूब मरें।

आओ न गलियारे में

कुछ करें।।

ओ! मेरी प्रेमिका !

आओ गलियारे में।।

जापानी सिरेमिक्स की प्रदर्शनी इस देश की रोस्तोक आर्ट गेलरी में देखने के बाद ऊपर वाली कविता एक समाजवादी साम्यवादी- प्रगतिशील से सुनकर मुझे बिलकुल अनपेक्षित नहीं लगा। हाँ, दूसरे श्रोताओं को अवश्य आश्चर्य हुआ।

बर्लिन की मेरी 15-9 से 22-9 वाली यात्रा में मैं इस देश की महान् कवयत्री श्रीमती अन्ना सेगर से मिलने की जिद किये हुए हूँ। कोई 80 वर्षीया इस वन्दनीया नारी को मैं प्रणाम करना चाहता हूं। मुझे विश्वास है कि मुझे यह सौभाग्य प्राप्त हो जाएगा।

बड़ा मन है हम सबका इस शेष यात्रा में दक्षिण का प्रसिद्ध शहर लिपजिग देखने का। लिपजिग का विश्व मेला अभी-अभी समाप्त होने को है। हमारे कार्यक्रम में दक्षिण का कोई भाग सम्मिलित है। हम लोग अपने-अपने स्तर पर प्रयत्नशील हैं पर समस्या वही है- होटलों की। कोई बिस्तर वहाँ खाली नहीं मिल रहा है हमारे मेजबानों को।

आठ दिनों के बाद आज ज्ञात हो पाया है कि हम शाकाहारियों को नियमित तौर पर मशरूम भी खिलाया जाता रहा है। क्या होता है यह मशरूम? जब पल्ले पड़ा तो माथा ठोक लिया मैंने। रोज जो सब्जी हम यहाँ मशरूम की खा रहे हैं वह होता है ‘‘कुकुरमुत्ता”- हमारे यहाँ ‘कुत्ते की छतरी।’ प्याज का दर्शन इस देश में अभी तक नहीं हो पाया। कहते हैं कि इसी साल इस देश ने भारत से कोई दो लाख रुपयों का प्याज लिया था। भगवान जाने उसे कौन खा गया?

भाई

बालकवि बैरागी

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3841,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,336,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2786,कहानी,2116,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,831,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,4,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,315,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1919,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,648,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,688,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,55,साहित्यिक गतिविधियाँ,184,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,68,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: बर्लिन से बब्बू को - बालकवि बैरागी के पत्र विष्णु बैरागी को - 2
बर्लिन से बब्बू को - बालकवि बैरागी के पत्र विष्णु बैरागी को - 2
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