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आलेख

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विज्ञान साइंस का पर्याय नहीं है

विष्णु प्रसाद चतुर्वेदी

आलेख

इ स आलेख को लिखने का उद्देश्य विज्ञान बालकहानी और बाल विज्ञानकथा के अन्तर को स्पष्ट करना है। कई समीक्षक इनमें अन्तर नहीं कर पाते और बाल विज्ञानकथा के मानदण्डों के आधार पर विज्ञान बालकहानियों की समीक्षा कर रहे हैं। कई संपादक विज्ञान गल्प को विज्ञानकथा कह कर छाप रहे हैं।

आज विज्ञान का बोलबाला है। विज्ञान खोजों के आधार पर बने उपकरणों ने मानव जीवन में इतना स्थान बना लिया है कि इनके बिना जीवन गुजारना मुश्किल लगने लगा है।

आजकल प्राथमिक कक्षाओं से ही विज्ञान एक प्रमुख विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। विज्ञान की पाठ्यपुस्तकों व विज्ञान की कक्षा की अपनी मजबूरियां होती हैं। पाठ्यपुस्तकें विज्ञान के क्षेत्र में हो रही नवीनतम घटनाओं के विषय में बच्चों से संवाद नहीं कर पाती हैं। पाठ्यक्रम पूरा कराने की जिम्मेदारी के बोझ से दबा विज्ञान शिक्षक भी पाठ्यक्रम की चारदीवारी से बाहर नहीं आ पाता। ऐसे में विज्ञान बालसाहित्य ही बच्चों के ज्ञान की प्यास को बुझाता है। बच्चों में विज्ञान की समझ उत्पन्न करता है।

विज्ञान बालसाहित्य की विधाएं :

वर्तमान में साहित्य की सभी विधाओं यथा कहानी, कविता, नाटक, लेख, जीवनी, यात्रावृतान्त चित्रकथा, विज्ञान समाचार, विज्ञान प्रश्नोत्तर, विज्ञान कार्टून (साईटून) आदि में विज्ञान बाल साहित्य रचा जारहा है। विज्ञान बाल साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा कहानी है। विज्ञान कहानी को लेकर अभी भी भ्रान्तियाँ हैं। विज्ञान कहानियाँ तीन प्रकार लिखी जा रही हैं। विज्ञान आधारित कहानियों में विज्ञान के तथ्यों को स्पष्ट करने के लिए किसी घटना का सृजन किया जाता है। इन कहानियों में विज्ञान के ज्ञात तथ्यों को ही प्रस्तुत किया जाता है। वैज्ञानिक कल्पना का इनमें कोई स्थान नहीं होता। कहानीकार विज्ञान क्षेत्र की प्रमुख जानकारियों को कहानी रूप में प्रस्तुत कर बच्चों को विज्ञान की प्रकृति से परिचित कराता है।

विज्ञान कहानी विधाओं में अन्तर : पत्र पत्रिकाओं के संपादक विज्ञानकथा की तकनीकी शैली से परिचित नहीं होते। संपादक विज्ञान जानकारी युक्त गद्य रचनाओं पर ‘विज्ञानकथा’ का छाता उदारता से तान देते हैं।

वे बाल विज्ञानकथाएं, विज्ञान बालकथा व विज्ञान गल्प (फेन्टेसी) में अन्तर नहीं करते जबकि यह तीन अलग विधाएं हैं। बाल विज्ञानकथा तथा विज्ञान बालकथा में लेखक विज्ञान की मर्यादा से बंधा होता है। ये रचनाएं पाठक की विज्ञान की समझ को बढ़ाती है। इनमें विज्ञान के ज्ञात तथ्यों से विपरीत बात नहीं कही जा सकती। विज्ञानगल्प या ‘फेन्टेसी’ में लेखक वैज्ञानिक शब्दावली का उपयोग करते हुए अपनी कल्पना के बेलगाम घोड़े दौड़ता है। मनोरंजन ही इन रचनाओं का प्रमुख ध्येय होता है। ऐसे में लेखक, विज्ञान की सीमाओं का उल्लघंन कर देता है। विज्ञान गल्प (फेन्टेसी) पाठक की वैज्ञानिक समझ को बढ़ाने की जिम्मेदारी नहीं निभाती। बाल पाठक के मन में उलझाव ही उत्पन्न करती है।

विज्ञानकथा विश्वस्तर पर मान्य विधा ‘साइन्स फिक्शन’ का देशज रूप है। विज्ञानकथा से अर्थ लेखक मेरी शैली के विज्ञान उपन्यास फ्रैन्केंन्स्टीन (1818) व आईजक आसीमोव की शैली में लिखी गई कथाओं से है। विज्ञानकथा का उद्देश्य समाज पर विज्ञान के प्रभाव की अग्रिम झलक पाठक को दिखाना होता है। ये प्रभाव अच्छे व बुरे दोनों के प्रकार हो सकते हैं। विज्ञान के ज्ञात तथ्यों का ठोस आधार बना कर भविष्य की वैज्ञानिक कल्पना करना विज्ञानकथा की अनिवार्य शर्त होती है। इस कारण विज्ञानकथा लम्बी व कुछ तकनीकी होती है।

बाल विज्ञानकथा की कठिनाईयाँ :

विज्ञानकथा बच्चों के लिए लिखी जाय या बड़ों के लिए उपरोक्त मानदण्डों को पूर्ण करना आवश्यक है। बालसाहित्य में वर्तमान में 1200 शब्दों तक की गद्य रचनाओं को प्रकाशित किया जा रहा है। इतने कम शब्दों में विज्ञानकथा का लेखन असम्भव नहीं है तो कठिन अवश्य है। बच्चों के लिए विज्ञानकथा लिखना इस कारण भी कठिन होता है कि विज्ञानकथा का आधार ज्ञात वैज्ञानिक तथ्यों पर खड़ा किया जाता है बच्चों का विज्ञान ज्ञान इतना विस्तृत नहीं होता। बच्चों के विज्ञानकथा लिखना कठिन कार्य है, फिर भी बाल विज्ञानकथा के क्षेत्र में कुछ कार्य हुआ है। कई बालपत्रिकाएं बाल विज्ञानकथा के विशेषांक निकालती रही है।

विज्ञान बालकथाएं :

बालकथा समीक्षक गोविन्द शर्मा का मानना है कि विज्ञान बालकथाएं दोहरी भूमिका निभाती हैं। विज्ञान की दुरूह अवधारणाओं को कथा का आधार बनाकर न केवल कहानी को शिक्षा का सहज माध्यम बनाती हैं बल्कि बच्चों की जिज्ञासु प्रवृत्ति को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाती हैं। यह एक दोहरा काम है जो कई तरह के खतरों से भरा है। खतरे इस मायने में कि एक और तो आपको सही वैज्ञानिक तथ्यों का ध्यान रखना है और दूसरी ओर बाल मनोविज्ञान के दायरे में कथा की रोचकता भी बनाए रखनी है। गोविन्द शर्मा ने विज्ञान गल्प व विज्ञान बालकथाओं में अन्तर स्पष्ट करते हुए लिखा है कि विज्ञान बालकथाएं कल्पना की अनोखी उड़ान नहीं होकर वास्तविक विज्ञान है। प्रमाणिक ज्ञान है।

नए विषयों पर लिखना :

अब समय आ गया जब बाल विज्ञानकथा तथा विज्ञान बालकथा को दो अलग अलग विधाएं मान कर उनकी समीक्षा की जाय जिससे रचना के साथ अन्याय नहीं हो। विज्ञान बालकथा का मूल्याकंन इस आधार पर ही हो सकता है कि उसमें विज्ञान की किस जानकारी को सम्मिलित किया गया है।

विज्ञान की जानकारी के आधार पर विज्ञान बालकथा की शैली में परिवर्तन करना होता है। विज्ञान को बच्चों तक पहुँचाने हेतु विज्ञान बालकहानी में मैंने कई प्रयोग किए हैं। इनमें एक प्रयोग यह भी है कि पहले कहानी सुना कर जिज्ञासा पैदा की जाती है फिर कहानी में आए वैज्ञानिक पक्ष की विवेचना अलग से की जाती है। विज्ञान बालकहानी की यह शैली इतनी लोकप्रिय हुई कि राजस्थान पत्रिका के कार्यालय पहुँचते ही रविवारीय परिशिष्ट पर विज्ञान बालकहानी छप जाती थी। कुछ ही महीनों में इतनी कहानियाँ हो गईं कि एक स्थानीय प्रकाशक ने ‘कहो कैसी रही’ शीर्षक से पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर दिया।

1998 में राजस्थान साहित्य अकादमी ने बालसाहित्य का पुरस्कार मुझे दिया था।

यह सही है कि बच्चों के सम्मुख जानकारी को घटना के रूप में प्रस्तुत किया जाना अच्छा रहता है। समस्या यह है कि विज्ञान की प्रत्येक जानकारी को घटना के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। बच्चों को परमाणु संरचना या कोशिका के सूक्ष्म अंगों की जानकारी देनी हो तो घटना सर्जन कैसे होगा? उसे वार्तालाप से ही स्पष्ट करना होगा।

कोई विज्ञान बालकहानी अंधविश्वास को प्रेरित नहीं कर सकती। किसी कहानी में परी शब्द आ जाने से ही कोई बालकथा परिकथा नहीं हो जाती। मंत्र या ओम शब्द का प्रयोग अंधविश्वास का पर्याय नहीं हो सकता। मुख्य बात यह होती है कि कहानी क्या संदेश दे रही है।

विज्ञान सांइस का पर्याय नहीं है :

विज्ञान बालकहानी की बात हो तो विज्ञान की बात होना आवश्यक है। कई विज्ञान समीक्षक माध्यमिक कक्षाओं तक पढ़ाए जाने वाले भौतिकी के नियमों को ही विज्ञान मान कर अपने को ज्ञानी और लेखक को अज्ञानी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। भारतीय मान्यताओं को बिना समझे ही उस पर प्रहार करते हैं। ऐसा करके वे वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विपरीत आचरण करते हैं। अपने विश्वास को दूसरे पर लादना वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं है।

अधिकांश लोग विज्ञान को साइंस शब्द का हिन्दी अनुवाद समझते हैं। विज्ञान शब्द साइंस की तुलना में बहुत पुराना है। विद्वानों का कहना है कि भारत में विज्ञान शब्द का प्रयोग ईसा से हजारों वर्ष पूर्व से होता आ रहा है।

लिखित रूप में विज्ञान शब्द का प्रथम प्रयोग ऋग्वेद में देखने को मिलता है। बाद में अथर्ववेद में भी इस श्लोक को लिया गया है :

सुविज्ञानं चिकितुषे अनाय सच्चासच्च वचसी पस्पृधाते।

तयोर्यत् सत्यं यतरहजीव स्तदित् सोयांडऽवति हन्त्यासत्।।

ज्ञानी पुरुष के लिए विज्ञान सुगम है। सच व असच एक दूसरे के विरोधी होते हैं। राजा सत्य और सरल बात को स्वीकारता है और असत्य को नष्ट करता है।

संस्कृत के लोकप्रिय शब्दकोश अमरकोश के अनुसार - मोक्षे धीर्नानम् अन्यत्र विज्ञानं शिल्पशात्रयों अर्थात मोक्ष के लिए उपयोगी जानकारी ज्ञान है तथा अन्य शास्त्रों व शिल्पों की जानकारी विज्ञान है। विज्ञान के अन्तर्गत व्याकरण, आयुर्वेद, ज्योतिष्य, संगीत, नाटक, ललितकला आदि सभी आ जाते हैं।

स्पष्ट है कि विज्ञान शब्द साइंस की तुलना में बहुत व्यापक है।

प्राचीन भारत में शिक्षा व्यवस्था भी इसी के अनुरूप थी। मोक्ष के लिए अध्ययन को शिक्षा तथा विज्ञान के अध्ययन को अविद्या कहा जाता था। शिक्षा की पाठ्यचर्या में दोनों को बराबर का महत्व प्राप्त था।

भारत के संविधान में देशवासियों से वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने की अपेक्षा की गई है। विज्ञान बालकथा से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वह पाठकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करे। वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति का एक गुण प्रशंसाभाव होता है। सूर्य पर हमारी निर्भरता स्वीकारते हुए प्रशंसाभाव से ओम सूर्याय नमः कहने से विज्ञान बालकथा में रोचकता उत्पन्न होती है, नहीं कि अंधविश्वास।

सनातन मूल्य कभी पुराने नहीं होते, बदलते भी नहीं हैं। विज्ञान की प्रवृति भी सनातनता की ही है। विज्ञान के नियम सम्पूर्ण सृष्टि पर सर्वकाल में समान रूप से लागू होते हैं। भारत में सनातन धर्म का अर्थ विज्ञान अर्थात प्रकृति की सत्ता को स्वीकारना ही रहा है। प्रकृति को ललकारना नहीं। ‘क्लाईमेट चेन्ज’ से भयभीत विश्व भारत की इस सोच की मुग्ध भाव से प्रशंसा कर रहा है। पश्चिम ने अपने सोच में परिवर्तन कर लिया है मगर हमारे वामपंथी मित्र अडिग हैं। आवश्यकतानुसार उपभोग व वृक्षों के महत्व को स्वीकार उन्हें पवित्र घोषित किया गया तो पृथ्वी की रक्षा होती रही। उस विश्वास को तोड़ने का परिणाम हम ‘क्लाईमेट चेन्ज’ के रूप में भुगत रहे है।

विज्ञान कथा व शिक्षा :

भारतीय भाषाओं में विज्ञान कथाएं लिखी जा रही हैं मगर उनका उपयोग शिक्षा क्षेत्र में नहीं किया जा रहा। विदेशों में विज्ञान कथा का उपयोग विज्ञान विषय को लोकप्रिय बनाने के लिए होता रहा है। कई देशों में तो विज्ञान कथा को पाठ्यचर्या का भाग बनाया हुआ। कक्षा के स्तर के अनुसार विज्ञान कथाएं लिखी व पुस्तकाकार में प्रकाशित की जा रही हैं।

वर्तमान भारत में शिक्षा के नीति निर्धारक इस विषय में अनभिज्ञ बने हैं जबकि प्राचीन भारत में विज्ञान व धर्म में विवाद नहीं रहा दोनों साथ साथ चले। भारत का आदि धर्म सनातन धर्म कहलाता है जिसका अर्थ सृष्टि के नियमों से है। वह क्या है जिसे जानने से सब कुछ जाना जा सकता है? भारत में धर्म प्रारम्भ से ही इस प्रश्न की खोज में लगा रहा है, यह वहीं प्रश्न है जिसे विज्ञान थ्योरी ऑफ एवरी थिंग कह कर आज भी तलाश रहा है। भारत में विज्ञान व धर्म के बीच वैसा टकराव कभी नहीं रहा जैसा चर्च व विज्ञान के मध्य होता रहा है।

भारतीय धर्म शास्त्रों में कहानियों के माध्यम से वैज्ञानिक सूचनाओं को दिया जाता रहा है। बालक ध्रुव की कहानी द्वारा यह जानकारी दी गई कि ध्रुव तारा उदय या अस्त नहीं होता। एक स्थान पर स्थिर रहता है। ध्रुव तारा की खोज अपने समय की एक बड़ी खोज रही होगी तथा इस जानकारी को जनसाधारण तक पहुँचाने के लिए ही किसी ऋषि ने ध्रुव तारा की कहानी लिखी होगी।

भारतीय विज्ञान कहानी का एक और रोचक उदाहरण देखिए - लीलावती पूछती है पिता जी यह पृथ्वी जिस पर हम निवास करते है किस पर टिकी हुई है? भास्कराचार्य कहते- हे बाले लीलावती कुछ लोग जो यह कहते हैं कि यह पृथ्वी शेषनाग, कुछ कछुआ या हाथी या अन्य किसी पर आधारित है तो वे गलत कहते हैं। यदि यह मान लिया जाए कि पृथ्वी किसी पर टिकी हुई है तो भी यह प्रश्न बना रहता है कि वह वस्तु किस पर टिकी हुई है। इस प्रकार कारण का कारण और फिर उसका कारण.......... यह क्रम चलता ही रहता है तो न्यायशास्त्र में इसे अनावस्था दोष कहते हैं।

लीलावती ने कहा पिता जी मेरा प्रश्न तो अभी बना हुआ है कि पृथ्वी किस पर टिकी हुई है? तब भास्कराचार्य ने कहा हम यह क्यों नहीं मान सकते कि पृथ्वी किसी पर भी आधारित नहीं है।...... यदि हम यह कहें कि पृथ्वी अपने ही बल से टिकी है और इसे धारणात्मिका शक्ति कह दें तो क्या दोष है।

तब लीलावती पूछती है यह कैसे सम्भव है? भास्कराचार्य कहते हैं पृथ्वी में आकर्षणशक्ति है। पृथ्वी आकर्षणशक्ति से प्रत्येक भारी वस्तु को अपनी ओर खींचती है और प्रत्येक वस्तु पृथ्वी पर गिरती है। पर आकाश में समान ताकत चारों ओर से लगती है तो पृथ्वी कैसे गिरे? अर्थात आकाश में ग्रह बिना सहारे हैं क्योंकि विविध ग्रहों की गुरुत्व शक्तियाँ संतुलन बनाए रखती है। यह विज्ञानकथा न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के नियम के 559 वर्ष पूर्व की है। खोज करने पर अनेक उदाहरण और मिल जाएंगे।

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