पुस्तक समीक्षा // सार्थक श्रमनिष्ठा का संदेशवाहक-‘‘घाम हमर संगवारी‘‘ // वीरेन्द्र ‘सरल‘

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पुस्तक समीक्षा

सार्थक श्रमनिष्ठा का संदेशवाहक-‘‘घाम हमर संगवारी‘‘

वीरेन्द्र ‘सरल‘

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बचपन से जिस लेखक की आदर्श छवि मन में बसी हो। मन जिनके लेखन का मुरीद हो। जिनके लिखे गीतों को गाते और गुनगुनाते हुए साहित्यिक अभिरूचियां परवान चढ़ी हो। उसी लेखक के द्वारा डाक के माध्यम से उनकी नवीनतम कृति सस्नेह भेंट की टिप्पणी के साथ प्राप्त हो तो मन मयूर का नाच उठाना स्वाभाविक है। मन का प्रफुल्लित हो जाना लाजिमी है और साहित्य में अपनी उपस्थिति का अहसास सहज है। जी हां, मैं बात करना चाह रहा हूँ छत्तीसगढ़ी और हिन्दी के सुपरिचित साहित्यकार मुकुंद कौशल जी की।

आकाशवाणी रायपुर के प्रातःकालीन कार्यक्रम वंदना से लेकर दोपहर के लोक मंजरी ओर सुरसिंगार एव संध्या चौपाल में बजते गीतों मे से किसी न किसी गीत के गीतकार के रूप में आपको मुकुंद कौंशल का नाम अवश्य ही सुनाई देगा। कौशल जी के अध्ययन का फलक बहुत ही विस्तृत और सुजन का संसार बड़ा ही व्यापक है। उन्होने कभी एक फ्रेम में बंधकर लेखन नहीं किया बल्कि साहित्य के हर विधा में अपनी लेखनी को आजमाकर हर बार नई जमीन तोड़ने की कोशिश की है। वे अपना प्रतिमान स्वयं गढ़ते हैं। लेखन में उनकी प्रतिस्पर्धा कभी किसी और से नहीं बल्कि अपने आप से ही रही है। इसलिए वे विभिन्न विधाओं के माध्यम से अपनी अनुभूतियों को पाठकों से साझा करते है और पाठकों को उनका हर रूप अपना ही लगता है।

विभिन्न सम्मानों से सम्मानित और अलंकरणों से अलकृंत कौशल जी न केवल हिन्दी और छत्तीसगढ़ी बल्कि गुजराती साहित्य के भी चिर-परिचित साहित्यकार हैं। इस बार वे अपनी नवीनतम कृति घाम हमर संगवारी के माध्यम से छत्तीसगढ़ी गजलों के साथ गजलगों के रूप में पाठकों से रूबरू हुए हैं।

जैसे कि गजल संग्रह के नाम से स्पष्ट है कि यह संग्रह सार्थक श्रमनिष्ठा का संदेशवाहक बनकर हमारे बीच है। भारतीय कृषि को मानसून का जुआ माना जाता है। कृषि हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है पर बदलते परिवेश में कृषि भूमि औद्योगीकरण की भेंट चढ़ रही है। पर्यावरण प्रदूषण के कारण कहीं अल्प वृष्टि और कहीं अतिवृष्टि के कारण भारतीय किसान हर बार बाजी हारने लगा है और आकंठ कर्ज में डूबकर अपनी जीवन लीला समाप्त करने को मजबूर हो रहा है। कुंठा और निराशा के भंवर में फँसे हुए किसान , मजदूर की पीड़ा को महसूस कर उनके मन में आशा की ज्योति जलाकर जीवन के प्रति आशान्वित करने का कार्य ही इस संग्रह का लक्ष्य है। इसीलिए कौशल जी ने इस संग्रह की शुरूआत निम्न पंक्तियों से की है-‘‘ जिनगानी म कभु अंजोरी, कभु रथे अंधियारी। नांगर, बइला , बरसत पानी, घाम हमर संगवारी।।‘‘

संग्रह के गजलों में जीवन के विविध रूप उद्धृत हुए हैं। खेत-खार, घर-परिवार, देश-दुनिया, समाज, प्रकृति, श्रृंगार, अध्यात्म, जन-जीवन, हर्ष-विषाद, आशा-निराशा सभी भावों को गजलकार ने अपनी लेखनी की स्याही से किसी कुशल चित्रकार की तरह कागज के कैनवास पर शब्दों की कारीगरी से जीवंत कर दिया है। दर्शन का एक शब्द चित्र इन पंक्तियों में देखिए-‘‘ रंगरूप अउ देंहपान के, काय गरब करबे ‘कौशल‘। चिक्कन चाम घलो उम्मर संग, भाजी कस अइला जाथे।‘‘ और ‘‘लेजत हे मरघट्टी कोती, काल सबो ला हुदरत-हुदरत। सइघो उम्मर पहागे संगी, अतके भर ल समझत-समझत।‘‘

व्यंग्योक्ति का एक चित्र देखिए-‘‘तरिया साफ करे बर जे मन उतरै हावै पानी मा, निरमल तरिया के पानी ला उही सबो मतलावत हे।‘‘ और ‘‘ गदहा के सन्मान देख के आवत हवं। पसरा म इ्रमान देख के आवत हवं। हमरे बांटा भीख असन देवत हे तउन, कतका हे बइमान देख के आवत हवं।‘‘ इस तरह के अंठावन उम्दा गजलों से लबरेज इस संग्रह को पढ़कर ही पाठक इसका रसस्वादन कर पायेंगे।

संग्रह के गजलों में छत्तीसगढ़ी के भूले-बिसरे या हाशिये पर ढकेल दिये गये शब्दों का प्रयोग कौशल जी ने इस कुशलता के साथ किया है जिसे पढ़कर पाठक न केवल आनंद विभोर होगे बल्कि छत्तीसगढ़ी के शब्द सामर्थ्य से परिचित होकर उससे शब्दकोश का भी काम ले सकेंगे।

संग्रह के बारे में अपनी बात रखते हुए कौशल जी ने गजल के उदभव और विकास के सबंध में बहुत ही संक्षिप्त मगर बहुत ही सारर्गिर्भत बातें कही है जो छत्तीसगढ़ी गजल लेखन में रूचि रखने वाले नये गजलकारों के लिए मील के पत्थर के समान ही पथप्रदर्शक साबित हुआ है। ऐसी आशा है कि यह संग्रह निश्चित ही पाठकों के बीच लोकप्रियता के श्खिर पर पहुंचेगा। मैं मुकुंद कौशल जी के यशस्वी लेखकीय जीवन की मंगल कामना करते हुए इस संग्रह हेतु हार्दिक बधाई देता हूँ।

वीरेन्द्र ‘सरल‘

बोड़रा (मगरलोड़)

जिला-धमतरी( छत्तीसगढ़)

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