साहित्य समाचार // प्राची - जून 2018

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साहित्य समाचार

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डॉ. कुंवर प्रेमिल का सम्मान

जबलपुरः त्रिवेणी परिषद् की टीम शिक्षाविद श्रीमती साधना उपाध्याय, मनीषा गौतम, डॉ. कामना श्रीवास्तव ने प्रेमिल निवास पर पधारकर अस्वस्थ हुए डॉ. कुंवर प्रेमिल का सम्मान कर उन्हें लघुकथाकार मनीषा गौतम द्वारा रचित रघुकथा कृति ‘इधर कुआं उधर खाई’ की प्रति भेंटकर सम्मानित करने की रस्म निभाही।

दरअसल ‘इधर कुआं उधर खाई’ के विमोचन समारोह में डॉ. प्रेमिल का सम्मान भी पूर्व नियोजित था, जो अस्वस्थता के कारण अधूरा रह गया था। माननीय त्रिवेणी परिषद की टीम ने प्रेमिल निवास पर पहुंचकर उन्हें यह सुखानुभूति प्रदान की।

गौरतलब है कि कृति ‘इधर कुआं, उधर खाई’ की समीक्षात्मक भूमिका डॉ. प्रेमिल ने त्रिवेणी परिषद् के अनुरोध पर लिखी थी।

अपनी भूमिका में उन्होंने संस्कारधानी की गौरव गाथा पिरोते हुए लिखा था- ‘सचमुच यह मेरे लिए गौरव व सम्मान की बात है कि मैं आज महिला दिवस पर एक महिला लेखिका की कृति की समीक्षात्मक भूमिका लिख रहा हूं। यह भी ‘संस्कारधानी से निकलने वाली सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘प्राची’ के दिसंबर 2017 के अंक में अतिथि संपादक की हैसियत से मैंने लिखा था- लघुकथा के बढ़ते कदम संस्कारधानी को लघुकथाधानी में बदलने में प्रयासरत है, यह कितना सच है यह समय ही बताएगा। समय सबका हिसाब रखता है- वह अपनी जद में रखकर हर एक का मूल्यांकन भी करता है।

अतएव- ‘संस्कारधानी को साहित्यधानी भी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।’

यह भी- ‘लघुकथा के क्षेत्र में अपनी लघुकथाओं से विस्मित कर देने वाली इन महिला लघुकथाकारों में साधना उपाध्याय, अर्चना नायडू, कमल सृनत वाजपेयी, छाया त्रिवेदी, रत्ना ओझा, अर्चना मलैया, डॉ. वीणा आचार्य, आशा भाटी, आशा रानी एवं स्मृति शेष डॉ. गायत्री तिवारी है। इनकी रचनाओं ने लघुकथा के फलक को अलंकृत कर चमत्कृत कर दिया है।’

इसमें दो मत नहीं है कि संस्कारधानी (जबलपुर) में बारहों महीने साहित्य की गंगा बहती रहती है। एक से बढ़कर एक कद्रदां साहित्यकारों ने यहां जन्म लेकर अपनी मातृभूमि का गौरव बढ़ाकर रौशनाई फैलाई है।’

‘वहीं ‘प्राची’ जैसी पत्रिका ने अपनी स्वस्थ पत्रकारिता से लेकर-साहित्य को भी एक मानक स्तर तक पहुंचाकर अपनी अहम भूमिका निभाई है। पत्रिका दिनों-दिन प्रगति पथ पर है।’ उन क्षणों का पुण्य लाभ लेते हुए एवं भाव विभोर होते हुए डॉ. प्रेमिल ने त्रिवेणी परिषद की महिलाओं का आभार व्यक्त किया एवं दै. नवीन दुनिया के साप्ताहिक अंकों में स्थान पाकर अपनी प्रतिभा के मांजने में डॉ. राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’ की अहम भूमिका को याद किया जिसके साहित्य संपादक सुमित्र जी थे.

मेजबान आशा भाटी ने महिला अतिथियों का स्वागत जल-पान की व्यवस्था कर एवं प्रेमिल जी की पुत्रवधू ने इस मौके को मोबाइल में कैद कर जीवंत बना दिया।

पुराने समय से आज तक के साहित्य उपासकों को बीच-बीच में याद कर एक सौहार्दपूर्ण वातावरण में यह कार्यक्रम संपन्न हुआ..

प्रेषक : डॉ. कुंवर प्रेमिल, जबलपुर


सुविख्यात साहित्यकार आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को याद किया

झांसीः दिनांक 15 मई, 2018, सुविख्यात साहित्यकार, युग प्रवर्तक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की जयंती समारोह उत्तर मध्य रेल, झांसी मंडल में आयोजित की गई।

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म 15 मई 1864 ई. को दौलतपुर, रायबरेली (उ.प्र.) में हुआ और आप इंडियन मिडलैंड रेलवे में तार बाबू के रूप में बम्बई में नियुक्त हुए।

आपने खण्डवा, हरदा, इटारसी आदि स्टेशनों पर कार्य किया और अन्त में सन् 1904 में मण्डल कार्यालय, झांसी से रेल सेवा से त्याग पत्र दिया व इलाहाबाद से प्रकाशित ‘सरस्वती’ पत्रिका के सम्पादक का कार्य भार संभाला।

आचार्य द्विवेदी जी ने खड़ी बोली को काव्य की भाषा बनाने का श्रेयस्कार कार्य किया तथा हिन्दी भाषा और साहित्य को एक नई दिशा और गति प्रदान की जिसके फलस्वरूप उन्हें ‘‘आचार्यत्व’’ का पद प्राप्त हुआ।

इस महान साहित्यकार का स्वर्गवास 21 दिसम्बर 1938 में हुआ।

सर्वप्रथम जयंती समारोह में रेलवे स्टेशन झांसी परिसर स्थित आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रतिमा के साथ-साथ स्थापित राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त एवं उपन्यास सम्राट बाबू वृन्दावन लाल वर्मा जी की प्रतिमाओं पर प्रातः 10.30 बजे अपर रेल मंडल प्रबंधक/एवं अपर मुख्य राजभाषा
अधिकारी श्री संजय नेगी ने माल्यार्पण कर श्री द्विवेदी जी को पुष्पांजलि अर्पित की। इस अवसर पर श्री गिरीश कंचन, स्टेशन निदेशक सहित श्रेत्रीय साहित्यकार एवं रेल कर्मचारी उपस्थित रहे।

श्री एम.एम भटनागर, राजभाषा अधिकारी द्वारा कार्यक्रम के अध्यक्ष अपर मंडल रेल प्रबंधक श्री संजय सिंह नेगी एवं आमंत्रित वक्ता डॉ. नेवन्द्र सिंह, प्रोफेसर हिन्दी विभाग, बुन्देलखण्ड महाविद्यालय, झांसी व डॉ. अनिल अविज्ञांत, विभागाध्यक्ष (हिन्दी विभाग), राजकीय महिला महाविद्यालय, झांसी का स्वागत करते हुए आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीजी के साहित्य पर चर्चा कर उन्हें अपनी पुष्पांजलि अर्पित की। अध्यक्ष एवं अपर मंडल रेल प्रबंधक ने अपने उद्बोधन में कहा कि साहित्य विचारों का दर्पण है, जैसे हमारे विचार होंगे हमारी लेखनी भी उसी तरह चलेगी। हमारा देश विभिन्न साहित्यकारों से परिपूर्ण है और द्विवेदी जी भी उन्हीं में से एक महान साहित्यकार रहे हैं।

द्विवेदी जी का संबन्ध रेलवे के साथ अत्यंत निकट का रहा है। जब झांसी ‘जी.आई.पी.’ रेलवे का जंक्शन था और यहां संभागीय कार्यालय था जो वर्तमान में मंडल रेल प्रबंधक कार्यालय है, उस समय द्विवेदी जी इसी कार्यालय में तार बाबू के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने यहां बीस वर्षों तक सेवा की। और इन बीस वर्षों में अपने साहित्य, अपनी कार्यशैली के माध्यम से काफी ख्याति प्राप्त की। किन्हीं कारणों से उन्हें नौकरी से त्यागपत्र देना पड़ा और वे साहित्य सृजन में जुट गये और स्वाभिमान पूर्वक इंडियन प्रेस, प्रयाग में एक साधारण सी नौकरी कर ली। उनकी सुयोग्यता से ही उन्हें उस समय की प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादन का कार्य सौंपा गया जिसे उन्होंने पूर्ण दायित्व के साथ निभाया और अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय देकर संपादक के रूप में उन्होंने भाषा का रूप संवारा और परिष्कृत कर विभिन्न शैलियों को जन्म दिया, सुव्यवस्थिति किया, आलोचना पद्धति का सूत्रपात किया और उन्होंने सबसे बड़ा जो कार्य किया वह खड़ी बोली का स्वरूप निर्धारण करना था। उनका जीवन संघर्षमय बीता और वे निर्धनता की समस्याओं से भली भांति परिचित थे। अतः गरीबों की सेवा-सहायता में तल्लीन रहते थे। उन्होंने अपने जीवन में सादा जीवन उच्च विचार को चरितार्थ किया और उनकी प्रकृति राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत थी। आचार्य द्विवेदी जी के साहित्य सृजन व प्रयासों से ही द्विवेदी युग का प्रादुर्भाव हुआ और इस युग में गद्य और पद्य की भाषा का एकीकरण हुआ। द्विवेदी जी ने साधारण बोलचाल की भाषा जिसे हम खड़ी बोली कहते हैं, में अपने साहित्य का सृजन किया।

झांसी द्विवेदी जी की कर्मभूमि रही है। यहां का नैसर्गिक सौन्दर्य और बुन्देली भाषा का सरल स्वभाव व अपनापन उन्हें बहुत भाया। इसकी झलक उनके साहित्य में कई जगह देखने को मिलती है।

आमंत्रित अतिथि वक्ताओं ने कहा कि हमारे देश में राष्ट्रभाषा की कल्पना अनेक कालदर्शी चिंतकों, मनीषियों एवं विचारकों ने की है। लेकिन राष्ट्रभाषा हिन्दी के स्वरूप का सृजन केवल आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने ही किया है। उन्होंने समय और समाज के अंधकार में नवज्योति की दीपशिखा दिखा कर सबसे पहले देश को राष्ट्र पथ दिखाया फिर देश व समाज के लिये राष्ट्रवाणी का सेतु बनाकर मार्गदर्शन किया।

संगोष्ठी में अनुराग यादव, विपिन कुमार सिंह, श्री भीमराज धन्ना, श्री मुदित चंदा, श्री जे.पी. शर्मा, श्री उल्लास कुमार, श्री विजय कुमार, श्री रूपेश कुमार वघेला आदि
अधिकारी, पर्यवेक्षक, कर्मचारीगण व साहित्यकार उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का संचालन राजभाषा अधिकारी एम.एम. भटनागर द्वारा किया गया तथा वरिष्ठ अनुवादक श्री भगवान दास द्वारा सभी अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया।

प्रस्तुति : देवेन्द्र भारद्वाज, झांसी

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मशहूर गजल गायक पंकज उधास को डाक निदेशक केके यादव ने माई स्टैम्प भेंट कर किया सम्मानित

जोधपुर : ‘चिट्ठी आई है’ गीत से प्रसिद्धि पाने वाले मशहूर गजल गायक पंकज उधास के जोधपुर आगमन पर डाक विभाग की तरफ से सम्मानित किया गया। राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र,
जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएँ एवं चर्चित साहित्यकार व् ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव ने उन्हें ‘माई स्टैम्प’ भेंट कर सम्मानित किया। 12 डाक टिकटों के इस माई स्टैम्प पर हवा महल के साथ पंकज उधास की तस्वीर लगाई गई है। जिस चिट्ठी पर गाये गीत ने पंकज उधास को एक पहचान दी, उसी चिठ्ठी वाले डाक विभाग द्वारा अपने ऊपर पर्सनलाइज्ड डाक टिकट पाकर पंकज उधास काफी हर्षित हुए और डाक विभाग का आभार व्यक्त किया।

जोधपुर के 560 वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में पंकज उधास ने अपनी दिलकश गजलों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। 1982 के बाद पहली बार जोधपुर पधारे पंकज उधास की पहली गजल प्रस्तुति के बाद ही लोगों ने चिट्ठी आई है गीत की फरमाइश की। इस पर पंकज उधास ने चिट्ठियों के बदलते चलन पर कहा कि हम सब ई-मेल के जमाने में जी रहे हैं, पर चिट्ठियों का अपना एक अलग अंदाज है, एक अपना रंग है। गौरतलब है कि पंकज उधास को फिल्म ‘नाम’ में गायकी से प्रसिद्धि मिली, जिसमें उनका एक गीत चिठ्ठी आई है, काफी लोकप्रिय हुआ था। उसके बाद से उन्होंने कई फिल्मों के लिए एक पार्श्व गायक के रूप में अपनी आवाज दी ।

प्रस्तुति : सुदर्शन सामरिया, संयोजक- शब्द-साहित्य

जोधपुर, राजस्थान-342001

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