मन // शबनम शर्मा की नई कविताएँ

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मन

स्थिरता का नाम नहीं,
पल-पल कुलांचे भरता,
कभी इस पार
तो कभी उस पार,
पहुंच जाता,
अपनों के करीब,
दुश्मनों से दूर,
बना लेता अपनी जगह
अपने फैसले
अपने फासले,
इक अदृश्य डोर से बंधा,
कितने सब्जबाग देखता,
रूला देता अंखियन को
कभी ठहाकों में डूबा देता,
दिखाता वो, जिसकी
कल्पना न की थी,
डराता, सिहराता, हंसाता,
रूलाता, मनाता, रूठाता,
तो कभी किसी अंधेरे
में उकडू हो, बच्चे की
मानिद बैठ जाता ये
मन।



रिवाज़

सुबह उठ बुहारना आंगन,
झाड़ना पूरा घर,
नहा-धोकर
दीया बाती जला,
नित ताकना इक बार,
सभी दरवाजों की ओर
जो अभी नहीं, अपने
वक्त पर चाय की चुसकियों
के साथ खुलेंगे
व आयेगी आवाज़
‘‘माँ क्या है?
सुबह-सुबह ही छटर-पटर
करती हो, नींद नहीं आती’’
सुनकर, अनसुना कर
चल देती रसोई की ओर,
बनाती इन नाशुत्रों के
लिये नाश्ता,
कभी रोटी, कभी परांठा
और थका लेती खुद को
सभी पेट भर खाते
पर उठते हुए कभी
कहना न भूलते
‘‘माँ मोटे हो जाएँगे,
कुछ हल्का-फुल्का
बना दिया करो।’’
चुपचाप देखती, सोचती
उन दिनों को
जब हाथ में रोटी लिये
मक्खन की डली के
साथ, रोली-पोली बना
लड़-लड़कर, छीना झपटी
करते खाते थे ये बच्चे।
अभी बासन भी न मंजते
कि दोबारा भूख-भूख
करते थे ये बच्चे,
थमाती थी मक्कई, गेहूँ का भूजा
साथ में छाछ,
और चढ़ाती चुल्हे पर
दाल की हांडी, बीनती चावल
गूंथती आटा,
दोपहरी निपटते ही शाम
और फिर रात कब हो जाती
पता ही न चलता,
आज कंधे पर कंप्युटर
का बैग लिये निकलते
पूरा दिन कुर्सी पर बैठे
गड़ाये आँखें सामने,
अकड़ा लेते हाथ पाँव
बढ़ा लेते तोंद
व शिकायत करते
उसी माँ को
जिसके हाथ भी जले, सिके
रोटियों संग
‘‘कुछ हल्का-फुलका बना
लिया कर माँ।’’
सुन सब की, फिर भी दूध
से मलाई उतार
गिलास भर, थमाती सबको,
कहती, ‘‘पी लो, इसमें अब
मोटा होने का कुछ भी नहीं।’’
माँ है जानती सब
रिवाज़, सब ढंग व खिला ही
देती है अमृत जो आज नहीं
कल पता चलेंगे इनको।

कबूतर

‘धांय’ की आवाज़,
मौत का खौफ़,
तूफान की तरह
सैंकड़ों कबूतर
उस सामने वाली इमारत
की आखिरी मंजिल
से उड़े,
कि आज वो बूढ़ा कबूतर
टस से मस न हुआ,
मैंने उसे इशारा कर
बुलाया, वो सधी हुई
उड़ान में उड़कर
मेरे पास आया।
मैंने पूछा, ‘‘तुम्हें डर नहीं लगा?’’
बोला, ‘‘जानती हो तुम,
बरसों पहले घना जंगल
था यहाँ,
पेड़ों पर थे हमारे आशियाने,
दिन गुटर-गूं में,
तो रात एक दूसरे से
सट कर सोने में निकल
जाती थी,
सुबह होते ही
देखने जाते थे पास वाले
घर में निकले अंडों से
कबूतरी के बच्चे,
लिबाते थे दााना,
मनाते थे जश्न,
कट गये पेड़,
बन गई अट्टारियाँ,
रहने लगे लोग
चिपका कर अपने नाम
की पट्टियाँ।
देखता हूँ मैं, रोता हूँ में,
क्यूंकि इन सब कबूतरों
की उड़ान शाम को
यहीं खत्म होती है
ले जाता हूँ किसी
खाली घर की बालकनी में
सुनाता हूँ लोरी व सुला
देता हूँ, पर कब तक......
हर रोज तान देते हैं
ये बंदूक हमारी तरफ
बिन सोचे कि इन्होंने
घर बनाये हैं
हमारे घर छीन कर,
बदलते-बदलते आशियाँ
थक गया हूँ मैं।’’
दास्तान उसकी सुनकर
मेरा दिल, मेरी आँखें
रो पड़ीं,
पर जैसे ही मैंने उसे
सांत्वना देनी चाही,
झट से उड़ने को तैयार
पंख फैला उसने कहा
‘‘तुम भी तो हमारे
घर में रहती हो
कभी रोका उसे कि
बन्दूक से मत मारे हमें।’’

खुशी

न जाने कितने पल,
घंटे, महीने
वो काम करता
यही सोच, कि इसमें
किस-किस की हँसी
छिपी है,
फिर भी सुननी पड़ती
कभी ‘आह’ तो कभी ‘वाह’
दुनिया के लिये ‘आह’
कहना जितना आसान
‘वाह’ कहने को ज़माना
चाहिये,
आसानी से नहीं
मिलती दुआ,
न ही दी जाती
खुशियाँ किसी को
क्यूँकि न जाने
कितने जज़्बातों को
सलीब पर लटकना
होता है,
दुनिया के चेहरों पर
खुशी देखने हेतू।

सफेद बाल

मुझे डर लगता है
सफ़ेद बालों से,
इसलिये नहीं कि
ये मौत की मंजिल
दिखाते हैं हमें,
इसलिये भी नहीं,
कि अब सुन्दर नहीं
लगते हम,
बस सिर्फ तो सिर्फ
इसलिये कि छीन लेते हैं ये
हमारी हँसी,
मार देते हैं वर्षों से
रह रहे उस छोटे बच्चे को,
जो आईसक्रीम, तो कभी
चॉकलेट माँगता है
छीन लेते हैं ज़िन्दगी
के रंग,
जिन्हें ओढ़कर
ठहाके लगाते थे कभी हम
कभी अंगुली मार
गोलगप्पे में डुबकी
लगाते थे हम,
छीन लेते हैं हमारा
वो सजा कमरा,
बिठा देते हैं
घर के पिछवाड़े
वाले दलान में,
जहाँ तमाम रिश्ते
हवा में घूमते,
और कहा जाता
माँ-बापू सो रहे हैं,
चूड़ी वाला भी रंगीन
चूड़ियाँ नहीं दिखाता
भद्दे-भद्दे रंगों के
मोटे-मोटे कड़े देकर
कहता, ‘‘माँ जी, ये
आप पर ठीक रहेंगे
जबकि झाँकती
चिड़ाती वो बंधी
डोर में हरी चूड़ियाँ
फेरी वाला, हलके
रंगों के सूट ढूंढता,
जबकि लाल, पीली
हरी चुनरिया, लहरा-लहराकर
ढाँपती,
सच में डरती हूँ मैं,
इन सफे़द बालों से
जो इन्सान के अन्दर
से, उस वाणी से चाल
तक को धीमा कर
देते हैं व बना देते हैं अपंग।’’



तेरी चिरइया

आजकल की व्यस्तता
और बेटियों का पीहर,
बचपन पढ़ाई में
जवानी नौकरी में
कि कब बड़ी होकर
चली जाती ससुराल,
मानों सब बातें
कल की ही हों,
शादी के बाद
घर आई बिटिया,
वक्त पंख लगा
कुछ ही क्षणों में
पूरा हो गया,
जी भर न बैठ पाये
न बतिया सके
कि लगी, वो अपना
सामान बाँधने,
देख उसे
काँप उठा मेरा मन
पर छिपा लिये
मैंने अपने आँसू
वो देर से उठने वाली,
कमरा बिखेरना भूल गई
‘‘माँ भूख लगी’’ की
वो शैतान आवाज़, लगाना भूल गई,
हर काम को हाँजी, हाँजी,
इन्कार तो जैसे वो भूल गई।
मैं सोच ही रही थी
कि वो मेरे पास
आकर, मेरे हाथ पकड़कर बोली,
‘‘माँ बहुत मन करता है
ज़िन्दगी के इस पड़ाव पर
आप दोनों के साथ रहूँ,
करूँ जी भर के आपकी
सेवा, नहीं मन करता छोड़ आपको
जाने को माँ’’
कि वो गले लग रो पड़ी,
मैंने उसे अलग किया,
कहा, ‘‘बेटी दो घरों की
शान है, धरोहर है, जननी है,
रक्षक है, जहाँ भी रहो
तुम मेरे साथ हो।’’
सुन मेरी बात आंसुओं भरी
मुस्कराहट से सूटकेस की
जिप लगाने लगी।


मेला

सुबह से बच्चे खुश,
आज मेला देखने
जाना है,
कभी कोई, तो कभी कोई
पहनावे पहन-पहन कर,
सबसे पैसे माँगकर,
मेले के सपने
संजो रहे
कि आज माँ जी ने कभी कहा
‘‘मैं भी तुम संग चलूँगी।’’
मज़ाक लगा सबको
हैरानी भी, पर माँ जी तैयार
होकर एक छोटे बच्चे की
तरह चल पड़ी,
मेला देखा, घर आई,
पाँव सूज गये,
तबीयत बिगड़ गई,
गरम पानी में पाँव डाले बैठी थी
कि मुझसे रहा न गया
पूछ ही लिया
‘‘अम्मा ये क्या
नया चाव चढ़ा आज
तुम तो कभी न जाती थी।’’
कराहती, मुस्कुराती बोली,
‘‘सुन लम्बी कहानी है यह
बचपन में माँ कहती
‘‘मेले नहीं जाना,
भीड़ में बाबा उठा
ले जायेगा’’
जवानी में, बाबूजी की
कठोरता, जवान लड़की,
शराबी लड़कों के
धक्के, नहीं जाना,
ब्याह कर आई, सास की सीख,
सज-धज कर बहू-बेटियाँ
मेलों में हमारे घर से जाएँ,
न भाई न, रिवाज़ को न’’
दबी रही मेले जाने की इच्छा,
कि आज हिम्मत कर ही
ली, देखने की मेला
कैसा होता है,
और लगी मलने गरम पानी
में पाँव, जैसे कह रही हो,
‘‘ये तो ठीक हो जायेंगे
मेला तो देख लिया।’’

बच्चा

अंधेरे मुँह दोनों का निकलना,
उठता बच्चा,
चहुँ ओर ताकता,
शून्य-शून्य-शून्य,
आया के सिवा कोई
चारा न देख,
फैला देता बाँहें,
न रोता, न जिद्द करता,
पहन शाला की वर्दी
अनमने मन से दूध गटक,
धीमे-धीमे कदमों से
चला जाता ज़िन्दगी के कुछ
सबक सीखने,
टुकुर-टुकुर देखता, दोस्तों
को, जो माँ या पापा की
गोद में से उतर,
बस में बैठते,
आ जाता, कुछ घन्टों बाद,
बस से उतर,
थैला थमा आया को,
घिसटता सा घर तक आता।
जिद्द करता
नीचे खेल रहे बच्चों संग,
खेलने की,
पर वो बन्द कमरे में,
सुला दिया जाता,
दूध पिलाकर घंटों के लिये,
क्यूंकि करने हैं बाई ने
घर के बाकी काम भी,
शाम को उठता, कुछ खाता,
मास्टर जी से होमवर्क करता,
झांकता ऊपर की मंजिल
से नीचे, बच्चों को खेलते
देख, कि अन्धेरा फिर आता
नन्हा कुछ भी खा-पी सो जाता
थके माँदे, दोनों वापस आते
और हर रोज कहते,
‘‘ओह! बेबी सो गया।’’

शमशान घाट

कल शिवमन्दिर से लौटते,
मैं और रिकशावाला,
ध्यान गया बांई ओर,
शान्त आग की लपटें,
अपने कार्य में मगन,
बाहर खड़ा कारों, स्कूटरों,
लोगों का हजूम।
‘‘कोई बड़ा आदमी मरा है
बीवीजी’’ की आवाज ने
मुझे झकझोर दिया।
सोचने लगी,
इतना बड़ा शहर,
रहने को जगह नहीं,
जिस ओर देखो लोग ही लोग,
दौड़ रहे, न जाने किस मंजिल
की ओर,
छोटे पड़ रहे शहर, इमारतें
सब्र ही नहीं आ रहा
वो सेठ, वो राजा,
कोई भंगी, कोई फ़कीर,
कोई मालिक, कोई नौकर,
कोई बूढ़ा, कोई जवान,
सबकी अपनी-अपनी सोच
अपने-अपने नाम,
बात छोड़िये गैरों की,
बाँटने में शर्म नहीं,
अपनों से भी
पर वाह री ये श्मशान भूमि,
शत-शत प्रणाम है तुझे,
जहाँ आते ही रुतबा,
नाम, अकड़, पैसा सबको
बराबर कर देती
और शहर के शहर
समा लेती ये मिट्टी
खुद में, क्षणों में,
जहाँ एक ही आवाज़
आती, ‘‘मुर्दा जल रहा।’’

औरत परीक्षा है

जन्म लेने से पहले,
मशीनों से गुजरती,
ताकती, सहमी सी
सुनती गर्भ में ही
अपने भविष्य के फैसले,
वो इस संसार को देखे या
न देखे, कुछ भी पता नहीं
होता, कि तभी तीखे औजारों
की आवाज़ से बैठ जाता
उसका नन्हा दिल
घुट जाती आवाज़,
और कुछ ही पलों में
खत्म कर दी जाती उसकी लीला,
कभी-कभार गलती से
जन्म ले भी लिया,
तो आज़ाद नहीं है वो
करने हैं उसे घर के,
भाई-बाप और स्कूल
के काम,
सुनने हैं अगले घर जाने के ताने,
तैयार करना है खुद को
उस दहलीज़ के लिये,
जिस का लेशमात्र भी
पता नहीं है उसको,
फिर जाना है उस घर
में सज-संवर कर
जहाँ मुँह बाए खड़े हैं
छोटे से बड़े सब आस
लगाये कि बहू आयेगी
ये करेगी-वो करेगी,
न होने पर कई
तमगे पहना दिये जायेंगे।

शबनम शर्मा
अनमोल कुंज, पुलिस चौकी के पीछे,
मेन बाजार, माजरा, तह. पांवटा साहिब,
जिला सिरमौर, हि.प्र.

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