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आत्मकथात्मक उपन्यास - पथ - भाग 4 - राजेश माहेश्वरी

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आत्मकथात्मक उपन्यास पथ - राजेश माहेश्वरी भाग 1 || भाग 2 || भाग 3 भाग 4 कर्ज चुकाने की समय सीमा समाप्त हो चुकी थी। कुछ दिन रूक कर एक दिन मो...

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आत्मकथात्मक उपन्यास

पथ


- राजेश माहेश्वरी


भाग 1 || भाग 2 || भाग 3


भाग 4

कर्ज चुकाने की समय सीमा समाप्त हो चुकी थी। कुछ दिन रूक कर एक दिन मोहन सिंह राममनोहर के घर उनका हाल जानने के लिये पहुँच गये। वहाँ पहुँचकर वे स्तब्ध रह गये। बीती रात को ही राममनोहर का स्वर्गवास हो गया था। उन्होंने बिना लिखा-पढ़ी के रूपया दिया था क्योंकि उन्हें राममनोहर पर पूरा विश्वास था। उसकी अचानक मृत्यु हो जाने से यह सोचकर कि उनका रूपया डूब चुका है उनका दिल बैठा जा रहा था। लेकिन अब कुछ किया भी नहीं जा सकता था। उनके लड़कों से कुछ अपेक्षा रखना ही व्यर्थ था। वे भारी मन से अंतिम संस्कार में शामिल हुए।

शाम का समय था। मोहनसिंह अपने घर पर उदास बैठे थे। एक तो उनका सच्चा मित्र आज चला गया था। जिसे उन्होंने अपनी आंखों के सामन पंचतत्वों में विलीन होते देखा था और दूसरी ओर उनकी एक लाख की पूंजी भी डूब गई थी। राममनोहर का सबसे छोटा लड़का तभी उनके यहां आया और बोला कि माँ ने आपको याद किया है। मोहनसिंह यह सोचकर कि क्या पता भौजी को ऐसी कौन सी आवश्यकता आ पड़ी जो आज के दिन उन्होंने बुलाया है। वे छोटे लड़के के साथ ही उनके घर की ओर चल दिये।

जब वे उनके घर पहुँचे तो राममनोहर की पत्नी ने उन्हें एक पैकेट दिया और बतलाया कि राममनोहर वह पैकेट अपने सिरहाने रखे थे। उनकी बीमारी के कारण उनका आना-जाना बन्द हो चुका था। उन्होंने अपनी पत्नी को जता रखा था कि यदि किसी कारण से कोई अनहोनी हो जाए तो यह पैकेट मोहन सिंह तक पहुँचा देना है। यह कहकर उसने बतलाया कि मुझे नहीं पता कि इसमें क्या है।

जब मोहनसिंह ने वह लिफाफा खोला तो उसमें एक लाख रूपये रखे थे। यह देखकर उनकी आंखों के आगे राममनोहर का चेहरा झूल गया और उनकी आंखें छलक उठीं। उन्होंने उस रकम से राममनोहर के स्मृति में एक स्मारक के रुप में एक चबूतरा बनवा दिया जो आज भी ईमानदारी के स्मारक के रुप में प्रसिद्ध है।

हमारा कामकाज अब सुचारू रुप से चल रहा था और पंकज एक नया उद्योग भी प्रारम्भ करना चाहता था। मेरा सोचना था कि अभी कुछ वर्ष और वह इसी काम को सम्हाले और इसकी बारीकियों को समझे। मैंने चर्चा के दौरान उससे कहा कि जीवन में यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि हम अपने जीवन की दिशा का पूरा घ्यान रखें। सही दिशा का चयन करें और आगे बढ़ें। हमारा मस्तिष्क दिशा को चुनने के लिये विभिन्न विकल्प प्रस्तुत करता है। हमें उन पर विवेकपूर्वक विचार करना चाहिए। इसके माध्यम से ही हमें अपने लक्ष्य का निर्धारण करना होता है और उसकी प्राप्ति होती है। उस लक्ष्य के लिये दृढ़ निश्चय और कठोर परिश्रम करना पड़ता है। जीवन में संघर्षशील बनना होता है। हमें कठिनाइयों और विपत्तियों पर विजय प्राप्त कर कल्पनाओं को वास्तविकता में परिवर्तित करना चाहिए यही जीवन की विजय है।

सफलता प्राप्त करने के लिये कोई भी कार्य करो तो उसमें असफलता के विषय में पहले से गंभीरता पूर्वक विचार कर लेना चाहिए। यदि तुम असफलता पर प्रहार करना जानते हो तो सफलता अपने आप ही तुम्हें प्राप्त होगी। हम अपने कार्यां में असफल तब होते हैं जब हम असफलता के विषय में विचार नहीं कर पाते हैं। किसी भी कार्य को करना एक सकारात्मक प्रयास होता है। इसके साथ ही नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करना भी आवश्यक है। हमारे विरोधी प्रयासरत रहेंगे कि हम सरलता से सफलता प्राप्त न कर सकें। उनके ऊपर भी अपनी सजग दृष्टि होना चाहिए ताकि हम उनके प्रयासों को प्रभावहीन कर सकें। हमें नया काम करने के पहले कर्मचारियों, अधिकारियों, हितैषियों से विचार-विमर्श करना चाहिए। तुम देख ही चुके हो कि मैं बंटवारे के बाद बहुत तेजी से आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा था। इस प्रयास में मैंने परेशानियां भी झेलीं और आर्थिक हानि भी उठाई। मैं नहीं चाहता कि जल्दबाजी में तुम्हें भी उसी प्रकार की स्थितियों का सामना करना पड़े।

मेरी सोच थी कि इसी उद्योग के चलने से उसी की कमाई के माध्यम से हम नये उद्योग का गठन करें, ब्याज की मार से बच सकें। मैंने उससे यह भी कहा कि जब हम किसी नये उद्योग को प्रारम्भ करते हैं तो हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हम अपनी समस्त पूंजी एक ही उद्योग में न लगा दें। इससे यदि एक व्यापार घाटे में जा रहा हो तो उस समय दूसरा व्यापार उसकी क्षतिपूर्ति करते हुए हमारे जीवन को उससे प्रभावित होने से बचाता है। हम किसी भी उद्योग की स्थापना करें, शासकीय एवं अशासकीय जमीनों के विषय में अच्छी तरह समझ लें जिनके ऊपर हमें अपना उद्योग स्थापित करना है।

हमें इस विषय की पूरी जानकारी होनी चाहिए कि जहां हम उद्योग स्थापित कर रहे हैं वहां कच्चा माल उपलब्ध होता है या नहीं, माल ढुलाई की सुविधा कैसी है, हमारे उत्पादन का बाजार है या नहीं और हमारी प्रतिस्पर्धा में कितने उद्योग हैं, उनकी क्या स्थिति है। हम किसी भी उद्योग की स्थापना अपनी बौद्धिक क्षमता का प्रदर्शन धन की प्राप्ति एवं समाज में मान-सम्मान तथा बेरोजगारों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने हेतु करते हैं। हमें ऐसे निर्णय दिल से नहीं दिमाग से लेना चाहिए। हम प्रायः जीवन में सफलता की बात करते हैं। किसी भी काम को करने के लिये ढेरों संसाधनों की आवश्यकता होती है। इनके अभाव में व्यक्ति न तो काम कर सकता है और न ही उसे सफलता प्राप्त होती है।

एक समय था जब बैंक आपकी साख पर रूपया कर्ज के रुप में दे देते थे। आज बिना निजी गारण्टी के कहीं कोई भी वित्तीय संस्थान कर्ज नहीं देता है। कर्ज न चुका पाने की स्थिति में हमारी निजी सम्पत्ति भी खतरे में पड़ जाती है। हमारे दिन का चैन और रातों की नींद हराम हो जाती है। किसी भी नये उद्योग में तुम्हें सफलता प्राप्त नहीं होने तक संघर्षशील रहना होगा। हमें स्वयं में दूरदर्शिता विकसित करनी होती है ताकि हम विपत्तियों को पार करते हुए सफलता प्राप्त कर सूर्य के समान ऊर्जावान बन सकें। हमें कल्पनाओं को वास्तविकता में बदलकर सफलता के नये आयामों को पाना होता है। तभी हम एक सफल उद्योगपति बनने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।

मैं चाहता हूँ कि तुम कोई भी नया उद्योग जो करना चाहते हो उसका पूरा खाका तैयार करो जिससे हम उससे होने वाले लाभ की विस्तृत जानकारी प्राप्त हो सके। फिर हम इस पर विचार करके कि हम कैसे आगे बढ़ें और उसे कब प्रारम्भ करें इस पर सोचेंगे और कोई निर्णय लेंगे।

अनुभव

अनमोल हैं

इनमें छुपे हैं

सफलता के सूत्र

इनमें हैं

अगली पीढ़ी के लिये

नया जीवन।

बुजुर्गों के अनुभव

और

नई पीढ़ी की रचनात्मकता से

रखना है

देश के विकास की नींव।

इस पर बनी इमारत

होगी इतनी मजबूत

कि उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे

ठण्ड-गर्मी-बरसात

आंधी या भूकम्प।

अनुभवों को अतीत समझकर

मत करो तिरस्कृत

ये अनमोल हैं

इन्हें अंगीकार करो

इनसे मिलेगी

राष्ट्र को नई दिशा

समाज को सुखमय जीवन।


जब उद्योग अच्छे मुनाफे पर चलता है तो हमें कर्मचारियों एवं उद्योग के हित में ग्रेच्युटी ट्रस्ट बनाकर उसमें राशि जमा करते जाना चाहिए। इसमें ब्याज भी प्राप्त होता है और आयकर में छूट भी मिलती है।

जब उद्योग मुनाफे पर हो तो उस समय एक निश्चित राशि कारखाने में तकनीकी और आधुनिकीकरण पर खर्च करना चाहिए और शेष राशि सुरक्षित बचाकर रखना चाहिए ताकि आवश्यकता होने पर कारखाने में इनका सदुपयोग किया जा सके।

हम प्रायः अच्छा मुनाफा होने पर कारखाने की उत्पादन क्षमता बढ़ाने में रकम लगा देते हैं और मन्दी आने पर जब माल नहीं बिकता और कार्यरत पूंजी की आवश्यकता होती है तब धन की कमी के कारण हम परेशानी में फंस जाते हैं। यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा विपरीत समय आने पर बैंक भी मदद करने से अपना हाथ खींच लेता है।

हमें बैंक के ब्याज के विषय पर सचेत रहना चाहिए। उनका समय पर भुगतान हो इसके प्रति सावधान रहना चाहिए। इससे बैंक की ब्याज दर में कमी हो जाती है अन्यथा आपको जुर्माने के साथ-साथ ऊंची ब्याज दरों पर भुगतान करना पड़ता है जो कि उद्योग के हित में नहीं होता है। हमको निजी साहूकारों और व्यापारियों से ऋण नहीं लेना चाहिए क्योंकि उनकी ब्याज दरें भी अधिक होती हैं और इससे हमारी प्रतिष्ठा भी खराब होती है।

हमें आगे आने वाले समय में श्रमिकों की कमी का भी सामना करना पड़ेगा। इसलिये आधुनिकीकरण बहुत आवश्यक है। इस पर निरन्तर काम करने की आवश्यकता है।

जब कारखाना अच्छी कमाई दे रहा होता है तो हम अपने खर्चे बढ़ा लेते हैं। यह समय और भी अधिक जागरुकता से रहने का होता है ताकि हम अपने खर्चों पर नियन्त्रण रख सकें। ऐसे समय में अधिकारियों एवं कर्मचारियों की भी वेतन वृद्धि की आशा बढ़ जाती है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि वेतन बढ़ाया तो जा सकता है किन्तु कम नहीं किया जा सकता। इसलिये वेतन अवश्य बढ़ाइये परन्तु इतना नहीं कि बाद में उद्योग के लिये यह सफेद हाथी साबित हो।

बैंक का कर्ज सबसे पहले चुकता करना चाहिए ताकि ब्याज की मार से हम बच सकें। हमें कारखाने में व्यवसायिक प्रबंधन का ध्यान रखना चाहिए ताकि हर विभाग सुचारू रुप से कार्य करता रहे। अधिकारियों एवं श्रमिकों के साथ हमारे मधुर संबंध होना चाहिए। समय पड़ने पर उनकी मदद करने से हाथ नहीं खींचना चाहिए। हमारे उत्पादन की क्षमता और गुणवत्ता दोनों पर समुचित नियन्त्रण रखकर सर्वोत्तम कार्यक्षमता पर उद्योग को ले जाना चाहिए।

अच्छे कर्मचारियों और अधिकारियों को समय-समय पर प्रोत्साहन और पुरूस्कार प्रदान करने की भी व्यवस्था होना चाहिए। यह प्रोत्साहन नगद भी हो सकता है और इसे पदोन्नति आदि के रुप में भी दिया जा सकता है। इससे प्रबंधन में स्वस्थ्य वातावरण का निर्माण होता है और नये-नये रचनात्मक सुझाव सामने आते हैं जिन पर हमें गंभीरता पूर्वक विचार कर उन्हें क्रियान्वित करना चाहिए।

कारखाने में की जाने वाली नयी नियुक्तियों में कारखाने के पुराने कर्मचारियों के परिवार के लोगों को प्राथमिकता दी जाना चाहिए। इससे कार्यरत कर्मचारी तो उत्साहित होता ही है उसे अपने और अपने आश्रितों का भविष्य भी सुरक्षित लगने लगता है जो कारखाने के प्रति उनके लगाव को भी बढ़ाता है और उनकी कार्य के प्रति लगन में भी वृद्धि करता है।

जब आप अच्छे मुनाफे की स्थिति में हों उस समय आप अपने परिवार जनों के प्रति भी सजग रहें। कहीं ऐसा न हो कि परिवार जन फिजूलखर्ची और गलत दिशा की ओर अग्रसर हो जाएं। यदि ऐसी प्रवृत्तियां परिवार में प्रवेश कर जाएंगी तो आपका सारा उपक्रम छिन्न-भिन्न हो जाएगा। यह स्थिति आपको आर्थिक क्षति भी देगी और आगे आने वाले समय में आपके लिये विपत्तियां खड़ी कर देगी। हमारे भीतर अहंकार न आये वरन हममें और भी अधिक विनम्रता आना चाहिए ताकि समाज में हमारा मान-सम्मान बढ़ सके।

मैंने पंकज को बताया कि तुम्हें अब उद्योग के साथ-साथ अपने परिवार पर भी ध्यान देना आवश्यक है। मानव जीवन नदी के समान होता है। जिस तरह नदी अपने उद्गम से प्रारम्भ होकर सागर में विलीन हो जाती है उसी तरह हमारा जीवन भी मां के गर्भ से प्रारम्भ होकर मृत्यु पर समाप्त हो जाता है। जीवन जन्म और मृत्यु के बीच का संघर्ष है। नाविक अपनी बुद्धि और अपने कौशल से जल प्रवाह के बीच रास्ता बनाते हुए अपनी नाव को मंजिल की ओर बढ़ाता है। वह धारा, मंझधार और प्रवाह के साथ संघर्ष करता हुआ तट पर पहुँचकर कर्मवीर बन जाता है इसी तरह उद्योगपति को भी विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए जीवन का लक्ष्य प्राप्त करना होता है।

वह नाविक जो सही निर्णय लेने एवं विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करने में अक्षम होता है उसकी मंजिल उसे नहीं मिलती और उसकी नाव डूबती ही है। इसी तरह अनुभवहीन और विवेकहीन व्यक्ति समाज में सफलता प्राप्त करने में असफल होता है। नाविक अपने अनुभव, अपनी कला को अपने बच्चों को सौंप जाता है। जीवन में सफल व्यक्ति भी अपने अनुभवों को अगली पीढ़ी को सौंपकर विदा हो जाता है। नाविक की पतवार उसकी नाव को गति व दिशा देती है। हमारा विवेक और ज्ञान हमें कर्मक्षेत्र में आगे बढ़ाता है यदि इस तथ्य को मानव समझ ले तो उसके जीवन का रास्ता भी आसान हो जाता है और सफलता उसके कदम चूमती है। वह सुख समृद्धि व सम्पन्नता का जीवन जीते हुए समाज में मान-सम्मान पाकर रहता है।

जीवन में मित्रता एक अति महत्वपूर्ण स्थान रखती है। हमारे मित्र तीन प्रकार के होते हैं- सामाजिक मित्र, व्यवसायिक मित्र एवं निजी मित्र। व्यवसायिक मित्रता में यदि तुम्हें एक भी मित्र ऐसा मिल जाए जो तुम्हारा सच्चा हितैषी हो तो अपने को भाग्यशाली समझना चाहिए। ऐसा व्यक्ति यदि उम्र में बड़ा भी हो तो तुम्हारे लिये और भी अच्छी बात होगी क्यों कि उसके मन में तुम्हारे प्रति स्नेह का भाव भी होगा और वह तुम्हारी निजी बातों को गुप्त भी रखेगा। वह तुम्हें सही सलाह एवं मार्गदर्शन देगा। निजी एवं सामाजिक मित्र कितने भी हो सकते हैं। लेकिन सदैव ध्यान रखना कि तुम उन्हें कभी भी कोई गलत राय मत दे देना। यदि वे तुम्हें कोई सलाह दें तो अच्छी तरह सोच समझकर ही कोई निर्णय लेना। यदि सच्ची मित्रता और ईमानदारी मिल जाती है तो जीवन के अधिकांश अभाव स्वमेव समाप्त हो जाते हैं।

जीवन में यदि तुम सच्चा मित्र चाहते हो तो तुम स्वयं अच्छे मित्र के गुण अपने में विकसित करो। तुम्हारे दादा जी कहा करते थे कि वह उद्योगपति बहुत भाग्यवान होता है जिसे वकील, डाक्टर एवं राजनीतिज्ञ सच्चे मित्र के रुप में प्राप्त होते हैं एवं उचित समय पर उचित सलाह देते हैं। वे इस कथन को सत्य करके दिखलाते हैं कि परहेज उपचार से बेहतर होता है। वे आपको वर्तमान व भविष्य में होने वाली गलतियों से सचेत कर देते हैं। हम स्वस्थ्य, कानून सम्मत जीवन जियें यही हमारा लक्ष्य रहना चाहिए। जीवन में उद्योग में सफलता के लिये कोई आवश्यक नहीं है कि आपके पास बहुत बड़ी पूंजी का भण्डार हो। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनमें थोड़े से संसाधन जुटाकर भी कड़ी मेहनत और परिश्रम के बल पर बहुत बड़ी सफलताएं प्राप्त की गईं हैं। नदी अपने उद्गम में एक पतली सी रेखा होती है। वह धीरे-धीरे आगे बढ़कर विशाल रुप लेती है। किसी ने सच ही कहा है-

अगर न देते साथ कहीं निर्झर-निर्झरणी,

तो गंगा की धार क्षीण रेखा रह जाती।।

यदि हमारी नियत साफ हो, हृदय में ईमानदारी हो, तन में परिश्रम करने की क्षमता हो, मन में धैर्य हो, मस्तिष्क में विवेकपूर्ण मनन व चिन्तन की क्षमता हो तो व्यक्ति सकारात्मक सृजन करके मिट्टी से भी सोना बना सकता है। प्रसिद्ध उद्योगपति धीरुभाई अम्बानी का उदाहरण हमारे सामने है। उन्होंने बचपन में पैट्रोल पंप पर भी नौकरी की थी। सूत के व्यापार के क्षेत्र में प्रवेश करके अपने अथक परिश्रम, लगन एवं राष्ट्र-प्रथम की भावना से वे देश के प्रमुख उद्योगपति बने। आज अखिल भारतीय स्तर पर जो भी उद्योगपति जैसे टाटा, विड़ला, बांगड़ आदि स्थापित हैं उन्होंने अपने जीवन की शुरूआत बहुत छोटे स्तर से की थी। वे लगातार संघर्ष करके आज इस मुकाम पर पहुँचे हैं। उन सभी ने हमारे देश की सभ्यता, संस्कृति एवं संस्कारों का संरक्षण किया।

मैंने पंकज को अपने अनुभव के अनुसार बताया कि आज से दस वर्ष के बाद तुम्हें श्रमिक मिलना बहुत कठिन हो जाएगा। आज उनके बच्चे भी अच्छे स्कूलों में अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। वे बड़े होकर मजदूरी नहीं करेंगे। इसीलिये हमें अपने उद्योगों का अधिक से अधिक मशीनीकरण करना होगा। हमारी सरकार भी स्वरोजगार को प्रेरित करने के लिये अरबों रूपया खर्च कर रही है परन्तु समुचित मार्गदर्शन के अभाव में इसका सदुपयोग नहीं हो पा रहा है और बेरोजगारी की समस्या वैसी की वैसी बनी हुई है।

मेरे एक मित्र ने स्वरोजगार के संबंध में युवाओं में जन चेतना जागृत करने हेतु बहुत काम किया है। परन्तु उन्हें जितनी अपेक्षा थी उतनी सफलता नहीं मिली। सरकार प्रधानमन्त्री स्वरोजगार योजना में जो पैसा दे रही है उसका एक हिस्सा भ्रष्टाचार के कारण व्यवस्था ही खा जाती है। इसके पश्चात जिन्हें यह रूपया मिलता है वे इसे उपहार समझकर डकार जाते हैं और कुछ दिनों के बाद ही वहीं खड़े होते हैं जहां वे थे। इसके साथ ही वे ब्लैक लिस्टेड भी हो जाते हैं।

सरकारी तंत्र में नौकरियों के अवसर प्रतिवर्ष कम होते जा रहे हैं और यही स्थिति निजी क्षेत्र में भी मशीनीकरण एवं आधुनिकीकरण के कारण होती जा रही है। देश में बेरोजगारी समाप्त करने के लिये स्वरोजगार ही एकमात्र विकल्प है। यदि इस दिशा में सही कदम, सही सोच व सही माध्यम हो तो हमारी युवा पीढ़ी आर्थिक रुप से सम्पन्न हो सकती है। आज केन्द्रिय शासन का करोड़ों रूपया स्वरोजगार योजना के क्रियांन्वन में खर्च हो रहा है परन्तु इनके हितग्राहियों द्वारा निर्मित उत्पादन को बेचने के लिये कोई भी शासकीय एजेन्सी नहीं है। इसके कारण प्रतिस्पर्धा में ये बड़ी-बड़ी कम्पनियों के आगे टिक नहीं पाते हैं और अपना अस्तित्व गंवा बैठते हैं।

मुझे अच्छी तरह याद है कि जिस समय हमारे कारखाने का विवाद समाप्त हुआ था और छटनी के बाद कर्मचारियों को उनकी ग्रेच्युटी एवं मुआवजे का भुगतान कर दिया गया था उसके कुछ समय बाद ही वे श्रमिक मेरे पास आये और उन्होंने अपनी समस्या बतलाई थी। उनका कहना था कि जो रूपया उन्हें मिला है वह तो धीरे-घीरे समाप्त होता जा रहा है और यदि ऐसी ही स्थिति रही तो वह धीरे-धीरे पूरा समाप्त हो जाएगा और उसके बाद उनके परिवारों का भरण-पोषण कठिन हो जाएगा। वे मुझसे मार्गदर्शन चाहते थे कि वे क्या करें जिससे उनकी रोजी-रोटी की समस्या हल हो जाए। मैंने उन्हें अपने मित्र के पास भिजवाया था। उनकी सलाह और सहयोग से उन श्रमिकों ने छोटे-छोटे काम प्रारम्भ किये। आज वे उन कार्यों को कर रहे हैं और समाज में सम्मान पूर्ण जीवन जी रहे हैं।

हमें उद्योग में अलग से समय देना चाहिए क्योंकि बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता। हमारा उद्योग के साथ-साथ सर्वांगीण विकास भी होना चाहिए। हमें समय निकालकर साहित्य, कला, संगीत, जनसेवा आदि को भी समय देना चाहिए। तभी हम जीवन के वास्तविक स्वरुप का दर्शन कर सकेंगे। चीन के प्रसिद्ध दार्शनिक कनफ्यूसियस ने कहा था कि व्यक्ति अपना आधा जीवन धन कमाने में खर्च कर देता है और शेष आघा जीवन अपने स्वास्थ्य को बचाने के लिये धन को खर्च करने में कर देता है। जब वह मृत्यु शैया पर होता है तब उसे जीवन का कड़ुवा सच समझ में आता है कि वह न ही धन बचा सका और न ही स्वास्थ्य। उसका जीवन व्यर्थ ही चला गया। मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि उद्योग के विकास के साथ-साथ हमें अपना समय जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी देना चाहिए। तभी समाज में हमारा मान-सम्मान के साथ स्थान बन सकता है।

हमारा देश प्राचीन काल से ही उद्योग व्यापार में विश्व में अपना विशिष्ट स्थान रखता था। हमने शून्य का अविष्कार कर विश्व को गणित का ज्ञान दिया। उद्योग गणित का ही खेल है। जिसे गणित का ज्ञान न हो वह उद्योग के क्षेत्र में कभी सफल नहीं हो सकता।

उद्योग को सफलता पूर्वक चलाने के लिये हमें सजग रहकर त्वरित निर्णय लेना पड़ता है। यदि हमारा चिन्तन सही दिशा में नहीं है तो चिन्ता को जन्म देने लगेगा। और चिन्ता चिता की ओर खींचने लगती है। सांसारिक संबंधों में हमें सावधान रहना चाहिए और ईश्वर के प्रति समर्पण और विश्वास होना चाहिए। जीवन में अच्छा और बुरा समय आता और जाता रहता है। यदि हम ईमानदारी से अपना कर्तव्य करें, ईश्वर के प्रति हमारे मन में सच्ची आस्था हो तो हमें उसकी मदद

स्वमेव ही मिल जाएगी और इससे हम जीवन की कठिनाइयों को पार करते हुए सफलता की ओर अग्रसर होंगे।

मैंने पंकज को एक गम्भीर एवं गहरी बात समझाई कि हम अपने परिवार के प्रति कितने भी आशावान हों लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे काम वही आएगा जो हम अपने श्रम से प्राप्त करेंगे। मैंने देखा है कि जो लोग यह सोचकर कि जब भी उन्हें आवश्यकता होगी उनकी पत्नी और बच्चे उनकी आवश्यकताओं को पूरा करेंगे, ऐसा सोचकर अपना पूरा धन अपनी पत्नी और बच्चों में बांट देते हैं उनको दुख और निराशा ही हाथ लगती है। जीवन की वास्तविकता बहुत कठोर है। पत्नी से भी धन मांगने पर हमको ऐसा उत्तर मिल सकता है जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। उस समय हम स्वयं को कितना भी अपमानित अनुभव करें और उन दिनों की याद दिलाएं जब हमारे धन पर पूरा परिवार चलता था और सारे सुखों का उपभोग कर रहा था, यह सुनने के लिये किसी के पास समय भी नहीं होगा और हम ठगा सा अनुभव करते रह जाएंगे। इस संबंध में फिल्म उपकार की ये पंक्तियां आज भी सामयिक हैं-

कसमें, वादे, प्यार, वफा सब

बातें हैं बातों का क्या ?

कोई किसी का नहीं ये झूठे

नाते हैं नातों का क्या ?

इसलिये हमें स्वयं सावधान रहना चाहिए और धन के संबंध में अपनी निर्भरता अपनी संतानों और अपनी पत्नी पर भी नहीं रखना चाहिए। हमको अपनी वृद्धावस्था के लिये अपनी पूंजी अलग जोड़कर रखना चाहिए।

मुम्बई के पैडर रोड में जसलोक हास्पिटल के पास एक बहुमंजिला इमारत में मोहनलाल जी नाम के एक व्यक्ति रहते थे। वे जितने बुद्धिमान थे उतने ही दयालु भी थे। उसी इमारत के पास एक सन्यासी रहता था। वह दिन भर ईश्वर की आराधना में व्यस्त रहता था। मोहनलाल जी के यहाँ से उसे प्रतिदिन रात का भोजन प्रदान किया जाता था। यह परम्परा कई दिनों से चल रही थी। एक दिन उस सन्यासी ने भोजन लाने वाले को निर्देश दिया कि अपने मालिक से कहना कि मैंने उसे याद किया है। यह जानकर मोहनलाल जी तत्काल ही उसके पास पहुँचे और उससे उन्होंने बुलाने का प्रयोजन जानना चाहा। सन्यासी ने कहा- आज आपके भोजन के स्वाद में अन्तर था। जो मुझे आप पर आने वाली विपत्ति का संकेत प्रतीत हो रहा है। आप कोई बहुत बड़ा निर्णय निकट भविष्य में लेने वाले हैं। मोहनलाल जी ने बताया- मैं अपने दोनों पुत्रों और पत्नी के बीच अपनी संपत्ति का बंटवारा करना चाहता हूँ। मेरी आवश्यकताएं तो बहुत सीमित हैं जिसकी व्यवस्था वे खुशी-खुशी कर देंगे। सन्यासी ने यह सुनकर निवेदन किया कि आप अपनी संपत्ति के तीन नहीं चार भाग कीजिये और एक भाग अपने लिये बचाकर रख लीजिये। इससे आपको जीवन में किसी पर भी निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

मोहनलाल जी यह सुनकर मुस्कराये और बोले- हमारे यहां सभी में आपस में बहुत प्रेम है। मुझे इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसके बाद मोहनलाल जी वहां से विदा हो गए। बाद में जब उन्होंने संपत्ति का वितरण किया तो उसके तीन ही हिस्से किए और वे अपनी पत्नी और बच्चों में बांट दिये।

कुछ समय तक तो सब कुछ सामान्य रहा। फिर उन्हें अनुभव होने लगा कि उनके बच्चे उद्योग-व्यापार और पारिवारिक मामलों में उनकी दखलन्दाजी पसन्द नहीं करते हैं। मोहन लाल जी की कुछ माह में उपेक्षा होना प्रारम्भ हो गया और जब स्थिति मर्यादा को पार करने लगी तो एक दिन दुखी मन से अनजाने गन्तव्य की ओर प्रस्थान करने हेतु घर छोड़कर बाहर आ गए। वे जाने के पहले उस सन्यासी के पास मिलने गए। उन्होंने पूछा कैसे आए ? तो मोहनलाल जी ने उत्तर दिया- कि मैं प्रकाश से अन्धकार की ओर चला गया था और अब वापिस प्रकाश लाने के लिये जा रहा हूँ। मैं अपना भविष्य नहीं जानता किन्तु प्रयासरत रहूँगा कि सम्मान की दो रोटी प्राप्त का सकूं। सन्यासी ने उनकी बात सुनी और मुस्कराकर कहा- मैंने तो तुम्हें पहले ही आगाह

किया था। तुम कड़ी मेहनत करके सूर्य की प्रकाश किरणों के समान प्रकाशवान होकर औरों को प्रकाशित करने का प्रयास करो।

मेरे पास बहुत लोग आते हैं जो मुझे काफी धन देकर जाते हैं जो मेरे लिये किसी काम का नहीं है। तुम इसका समुचित उपयोग करके जीवन में आगे बढ़ो और समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत करो। जिन्होंने तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार किया है उनको भी समुचित शिक्षा मिलनी चाहिए। ऐसा कहकर उस सन्यासी ने लाखों रूपये जो उसके पास जमा थे वह मोहनलाल जी को दे दिये।


(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

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रचनाकार: आत्मकथात्मक उपन्यास - पथ - भाग 4 - राजेश माहेश्वरी
आत्मकथात्मक उपन्यास - पथ - भाग 4 - राजेश माहेश्वरी
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