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आत्मकथात्मक उपन्यास - पथ - भाग 3 - राजेश माहेश्वरी

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आत्मकथात्मक उपन्यास

पथ


- राजेश माहेश्वरी


भाग 1 || भाग 2


भाग 3

आज मैं बहुत प्रसन्न था। आज तक मैं अकेला ही समस्याओं से जूझता रहा पर आज से मेरा बेटा मेरे कारोबार में हाथ बंटाने आ रहा था। उसकी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। उसने सभी विषयों में विशेष योग्यता प्राप्त करते हुए मेकेनिकल शाखा से बी ई कर लिया था। आज से वह जीवन के उस क्षेत्र में कदम रख रहा था जिसकी प्रतीक्षा प्रत्येक पिता को होती है। मेरे मन में अनेक विचार आ और जा रहे थे। मैं अपने बेटे से बहुत कुछ कहना चाहता था। मैं अपने जीवन के सारे अनुभव सभी सम्मान और सभी उपलब्धियां उसे सौंप देना चाहता था। अपना सब कुछ उसे सौंपकर हल्का हो जाना चाहता था। मैं नहीं जानता कि मैं उसे कितना सौंप सकूंगा और पशोपेश में था कि कहाँ से प्रारम्भ करुं। यह भी नहीं जानता कि कहां उसका अन्त होगा। प्रारम्भ से अन्त या अन्त से प्रारम्भ।

मुझे पूरा विश्वास था कि पंकज में वे सभी क्षमताएं हैं जो कि किसी उद्योगपति को सफलता देकर समाज में अपना विशिष्ट स्थान बनाने में समर्थ बनाती हैं। मैं उसे यह भी समझाना चाहता था कि ईश्वर की महिमा अपरम्पार हैं। उनकी कृपा से ही जीवन में सफलता एवं लक्ष्य की प्राप्ति होती है। यह संसार गति, चिन्तन एवं चेतना पर निर्भर है। जब तक गति और चेतना है तब तक जीवन है। गति में विराम ही मृत्यु है। जीवन में गति, चेतना, हमारी सभ्यता, संस्कृति और संस्कार ही हमारे जीवन का आधार होते हैं और हमारे जीवन को सार्थक बनाते हैं। जीवन से वास्तविकता से सामना होने पर क्षण भर में आदमी की मनोदशा भी बदल जाती है। उसमें आकाश पाताल का अन्तर आ जाता है। हमारी कल्पना में भविष्य की रुपरेखा होनी चाहिए एवं वह वास्तविकता पर आधारित होना चाहिए। उसका स्वभाव हर काम समय पर करने वाला होना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उसका स्वभाव मृदु और वाणी में विनम्रता होना चाहिए। हमें काम, क्रोध, लोभ, माया और मोह को नियन्त्रित करके सुखी जीवन के लिये संघर्षरत रहना चाहिए। मुझे पूर्ण विश्वास है कि तुम भविष्य में एक सफल उद्योगपति के रुप में समाज में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करोगे। मेरी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं।

कठिन उलझनें राह की,

धैर्य सहित सुलझाय।

मानवता की सुरभि से

मानव को महकाय।

वाणी मीठी बोलिये,

सत्य का कर श्रृंगार।

सच्चाई के रुप को

कर लो अंगीकार।

वाणी ऐसी हो सदा,

मन को शान्त कराय।

सब को सुख दे आपको,

यश अरू मान दिलाय।

सदैव याद रखना कि सफलता के चार सिद्धांत होते हैं। हमारा जीवन मन्थन इसी में समाहित है एवं यही सफलता की सीढ़ी है। किसी को दुख एवं पीड़ा मत पहुँचाओ। धन का उपार्जन नीतिपूर्ण एवं सच्चाई पर आधारित हो। जीवन में जो भी कर्म करो उसे ईश्वर को साक्षी मानकर सम्पन्न करो तथा अपनी मौलिकता को कभी खोने मत दो। इन्हीं सिद्धांतों में जीवन की सच्चाई छुपी है एवं इन सिद्धांतों पर चलकर कभी तुम्हारी पराजय नहीं होगी।

कल वह जो बीत गया

आज है वर्तमान

और जिसकी प्रतीक्षा है

वह है भविष्य।

तीनों का सामन्जस्य है

जीवन में आशाओं का सृजन।

यदि हो

सकारात्मक और रचनात्मक दृष्टि

तो सृजन बन जाता है

जीवन का आधार।

नकारात्मक व्यक्तित्व के लिये

यह है विध्वंस का प्रारम्भ।

यह मानव पर निर्भर है

वह किसे चुनता है

सृजन या विध्वंस।

सृजन और विध्वंस है

निरन्तर चलने वाली क्रिया।

कल भी थी

आज भी है

और कल भी रहेगी।

यही है सृष्टि का अनवरत नियम।

पंकज ने अपनी शिक्षा अंग्रेजी माध्यम से प्राप्त की थी। अंग्रेजी में बात करना उसका स्वभाव बन गया था। मैंने उसे समझाया कि हमें मजदूरों से काम लेना है इसलिये हमें उनकी बोली में ही उनसे बात करना उचित होगा तभी वे हमारी बात अच्छी तरह से समझ सकेंगे और अपनी बात हमसे खुलकर कह सकेंगे। हमें अंग्रेजी का ज्ञान होना चाहिए किन्तु हमें अपनी मातृभाषा का तिरस्कार नहीं करना चाहिए। हम हिन्दी में अपने विचारों को जितनी अच्छी तरह से समझा सकेंगे उतनी अच्छी तरह से किसी अन्य भाषा में नहीं समझा सकेंगे।

हमारी शिक्षा एवं जीवन की वास्तविकता में जमीन आसमान का अंतर है। हमें नैतिकता का पाठ ईमानदारी से रहने का जीवन व उच्च आदर्शों की बातें सिखाई जाती हैं। हम अपनी शिक्षा पूरी करके जब जीवन के किसी भी क्षेत्र में पदार्पण करते हैं तब वास्तविकता से साक्षात्कार हमें हत्प्रभ कर देता है। आज भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, भाई-भतीजावाद का साम्राज्य है जिसे न चाहते हुए भी हमें उसका एक भाग बनना पड़ता है। यदि हम ऐसा न करें तो सफलता से बहुत दूर चले जाएंगे। आज किसी भी उद्योगपति को पग-पग पर इनका सहारा लेना पड़ता है। आज सभी काम कराने के मूल्य निर्धारित हैं। यह राष्ट्र का दुर्भाग्य है कि जो इसका विरोध करता है उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। आज सच को भी सच सिद्ध करने के लिये झूठ का सहारा लेता पड़ता है।

यह जीवन की कटु वास्तविकता है कि हमें सफलता पाने के लिये यह सब भी स्वीकार करना पड़ता है। सूर्य का प्रकाश ऊर्जा का स्त्रोत है और चन्द्रमा की चाँदनी शान्ति एवं शीतलता प्रदान करती है। हमें इन्हीं के बीच रास्ता बनाकर अपने गन्तव्य तक पहुँचना होता है। आज जीवन में सफलता का कारण कोई नहीं जानना चाहता। किसी ने किस प्रकार सफलता प्राप्त की इसे कोई नहीं जानना चाहता। समाज के लिये बस इतना ही पर्याप्त है कि फलां व्यक्ति सफल होने के कारण मान व सम्मान का अधिकारी है। एक समय जेल जाने से समाज में तिरस्कार होता था पर अब विचारधारा में परिवर्तन हो गया है। जेल जाने का भय लोगों में कम होता जा रहा है। वहां से निकलने पर बाहुबलियों, राजनैतिक अपराधियों का फूल-मालाओं से स्वागत होता है जिससे उनकी प्रसिद्धि और भी अधिक बढ़ जाती है।

....................

कारखाना पुनः प्रारम्भ होने के बाद हमने अपना ध्यान इस बात पर केन्द्रित किया कि न केवल हमारा उत्पादन बढ़े बल्कि उसकी गुणवत्ता भी पहले से बेहतर हो। हम जो माल बेचें उसका भुगतान भी एक माह के भीतर हमें प्राप्त हो जाए। कारखाने के मुनाफे से हमने बैंक के ऋणों का भुगतान प्रारम्भ कर दिया। हमारे उन निकट संबंधी ने जिन्होंने बुरे समय में हमारी मदद की थी उन्होंने किसी प्रकार का ब्याज हमसे नहीं लिया। वर्तमान में रूपयों के लेन-देन में हम जो आपसी व्यवहार देखते हैं उसे देखते हुए यह उनका हमारे ऊपर बहुत बड़ा उपकार था।

जीवन में किसी भी क्षेत्र में हम कोई कार्य करते हैं तो केवल सफलता के विषय में ही चिन्तन करते हैं। हमें उसमें संभावित असफलताओं पर भी विचार करना चाहिए और उनके कारणों पर भी सोचना चाहिए। तभी हम उन कारणों अथवा उनके दोषों से भी बचने का उपाय कर सकेंगे और तब सफलता का रास्ता अधिक सरल हो जाता है। सफलता पाने के लिये किया जाने वाला कार्य एक सकारात्मक प्रयास होता है साथ ही मार्ग के कण्टकों को दूर करना भी नकारात्मकता को समाप्त करना होता है।

मेरा एक मित्र रमेश बहुत परेशान रहता था। वह जिस कार्य को भी करता उसमें असफल होता था। उसे बहुत आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। वह प्रायः कहता था कि समय और भाग्य साथ नहीं देते हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसके धर्म और कर्म में कोई कमी रह गई है। एक दिन वह मेरे पास आया और उसने मुझे सारी परिस्थितियों से अवगत कराया। मैंने उसे समझाया- कि जीवन में समय व भाग्य कभी खराब नहीं होते एवं वे कभी हमारा अहित नहीं करते। हमें यदि अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं तो उसके लिये हमारे कर्म उत्तरदायी हैं और हम निश्चित रुप से कहीं गलती कर रहे हैं। हमारा चिन्तन, मनन व मन्थन हमें भ्रमित कर रहा है। इसके लिये हमारे कर्म जवाबदार हैं।

हमें हमारा चिन्तन, मनन एवं मन्थन सही राह का मार्गदर्शन दे तभी हमें सफलता प्राप्त होती है। हम रास्ते एवं दिशा से भटक रहे हैं इस कारण हम असफल होते हैं और हमें हानि उठाना पड़ती है। ऐसी स्थिति में हम अपने भाग्य व समय को दोष देने लगते हैं। हमें अपनी गलतियों को खोजकर सुधारना चाहिए। तब निश्चित रुप से हमारा भाग्य हमें सफलता देकर आगे बढ़ाएगा। सफलता के लिये समय पर विश्वास रखो और चिन्ता मत करो। नैतिकता आस्था और विश्वास जीवन के आधार स्तम्भ हैं। इनके अभाव में जीवन उस वृक्ष के समान होता है जिसके पत्ते झर चुके होते हैं और अब उसमें न तो शीतलता देने वाली छाया है और न ही वह प्राण वायु का उत्सर्जन करता है।

अब मैंने आत्मावलोकन प्रारम्भ किया। चिन्तन, मनन एवं मन्थन से इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि हमें उद्योग को सुचारू रुप से संचालित करके धन की प्राप्ति के लिये कड़े वित्तीय प्रबंधन करना पड़ेंगे। हमें कर्मचारियों एवं अधिकारियों का अपने प्रति विश्वास प्राप्त करना होगा। हम अपने उन दिनों को भूले नहीं थे जब हम अकेले परेशानी में लगभग डूबती हुई नैया पर सवार होकर छटपटा रहे थे। जब हमारी किस्मत के सितारे गर्दिश में होते हैं तो अपने भी बेगाने हो जाते हैं। जीवन में विपरीत एवं कठिन समय में हम जिनकी मदद करते हैं वे भी अनजाने हो जाते हैं और कठिन समय में हमारे काम नहीं आते हैं। हमने जिन्हें अच्छे समय में धन देकर उपकृत किया था वे धन मांगने पर आंखें दिखाते हैं। केवल वे पुण्य कार्य ही हमारा साथ निभाते हैं जो हमने बुरे समय में किये होते हैं। बुरे वक्त में वे ही तलवार और ढाल बनकर हमारे काम आते हैं।

एक समय जिन काकाजी ने मुझसे कहा था कि जब खाने पीने के भी लाले पड़ें तो हमारे पारिवारिक मन्दिर में भोजन देने की व्यवस्था है, तुम सपरिवार इसका उपयोग कर सकते हो। उन्हीं काकाजी ने एक दिन मुझे बुलाया और मुझसे बोले- तुमने जिस चतुराई से अपनी फैक्टरी को बेचा और उसे सम्हाला है वह तारीफ के काबिल है। मेरी लखनपुर की एक फैक्टरी भी इस समय मेरे लिये परेशानी बनी हुयी है। मैं चाहता हूँ कि तुम उसे भी बिकवा दो। मैं इसके लिये तुम्हें दस लाख रूपये कमीशन दूंगा। उस समय एक बार फिर मैं हत्प्रभ रह गया था। यह समय का ही तो फेर था। एक समय जिनके लिये मैं मिट्टी के समान था आज उन्हीं के लिये मैं सोना हो गया था।

मानव इस सृष्टि में ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना है जिसके कांधों पर सृजन का भार है। उद्योग इस सृजनशीलता का एक रुप है। इसलिये भी यह समाज के लिये अति महत्वपूर्ण है। यह समाज की सक्रियता और राष्ट्र की गतिशीलता का दर्पण है। इसमें समय के साथ परिवर्तन, परिमार्जन एवं परिष्करण होता रहता है।

ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है

मानव,

बनाएं इसे अमृतमय।

जीवन को

तप व कर्म से

बनाएं तपोवन।

तन को समर्पित करें जनहित में

और उसे बनाएं

सेवामय।

परपीड़ा को हरने के लिये

हमेशा रहें प्रयासरत

और बनाएं अपने आप को

सच्चा मानव।

हम उद्योग के क्षेत्र में क्यों हैं ? हमारा दृष्टिकोण कैसा हो, जिससे आय में वृद्धि के साथ, हमें मानसिक शान्ति भी प्राप्त हो और हमारा जीवन भी सदाचारी हो। हमें अपने कर्म को धर्म से नियन्त्रित करना चाहिए, तभी उद्योग व व्यापार की उन्नति कर सकेंगे। हमें अच्छाई और बुराई पर सजग दृष्टि रखना चाहिए। इससे हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ने के लिये नूतन शक्ति और नवीन ऊर्जा प्राप्त होती रहेगी।

वर्तमान प्रतिस्पर्धा के युग में शासकीय नीतियों के कारण उद्योग एवं व्यापार को चलाना एक चुनौती है। हम सफल या असफल कुछ भी हो सकते हैं। हमें अपनी जमा पूंजी से उतना ही धन किसी उद्योग में लगाना चाहिए ताकि असफल होने पर धन डूब भी जाए तो हमारी परिस्थितियों व खर्चों पर कोई विपरीत प्रभाव न पड़े।

हम किस दिशा का निर्धारण करें और किस दिशा में अपने उद्योग का विस्तार करें, इस संबंध में निर्णय करते समय हमें हमेशा अपने परिवार और अपने हितैषियों से चर्चा करके ही निर्णय लेना चाहिए। जब उद्योग प्रारम्भ करें तो पूर्ण लगन, क्षमता एवं परिश्रम के साथ सही दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। यह ध्यान रखना चाहिए कि लगभग नब्बे प्रतिशत व्यक्ति इसमें असफल होते हैं और उनमें से गिने-चुने ही राष्ट्रीय क्षितिज पर अपना स्थान बना पाते हैं। जीवन में जो असफल होते हैं वे अतीत के गर्त में खो जाते हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम चन्द सफल लोगों के जीवन से ही परिचित होते हैं। हम उन बहुत से लोगों को जान भी नहीं पाते जो असफल होते हैं। आज तीन प्रकार के उद्योगपति देखने को मिलते हैं। एक वे जो उद्योग के नाम पर शासकीय कर्ज लेने के बाद रकम डकारकर भाग जाते हैं। ये हमारे देश व समाज के कलंक हैं। दूसरे वे हैं जो कारखाने का निर्माण करते हैं किन्तु अनुभव के अभाव और अन्य कारणों से उसे सुचारू रुप से चला नहीं पाते और अपनी पूंजी गंवाकर कर्ज में डूब जाते हैं। तीसरे वे होते हैं जिनका निश्चय स्पष्ट रहता है और वे सफल होते हैं। ऐसे लोग कर्म को धर्म मानकर जीवन में आगे बढ़ते हैं। समाज को रोजगार उपलब्ध कराते हैं। राष्ट्र के आर्थिक विकास में सहभागी बनते हैं तथा सुखी और समृद्ध जीवन व्यतीत करते हैं।

किसी भी उद्योग में कर्ज और पूंजी में समन्वय होना चाहिए, फिर चाहे वह कर्ज बैंक से लिया गया हो, शासन से लिया हो या निजी संस्थानों से लिया गया हो। पूंजीगत निवेश को कार्यकारी पूंजी से हमेशा अलग रखना चाहिए इससे उद्योग को अर्थाभाव का सामना नहीं करना पड़ेगा। अधिकांश उद्योगों की असफलताओं के पीछे यही एक कारण होता है। उद्योग का संचालन गणित का खेल है। यदि आप इसमें पारंगत हैं तो आप उद्योग को सफलता पूर्वक चला सकेंगे। समय पर उत्पादन हो और समय पर बिक्री होकर समय पर भुगतान प्राप्त हो यह आवश्यक होता है। किसी भी उद्योग के निर्माण में आधुनिक तकनीक का प्रयोग किया जाना चाहिए। उत्पादन की गुणवत्ता बनाये रखने और न्यूनतम उत्पादन लागत पर उत्पादन के लिये यह भी आवश्यक होता है।

हम अकेले नहीं हैं। हमारी प्रतिस्पर्धा में और भी कई लोग हैं और आगे आने वाले समय में और भी लोग आगे बढ़कर आएंगे। हमें उन सब के बीच न केवल अपने अस्तित्व को बचाये रखना है वरन लाभ प्राप्त करते हुए अपने उद्योग को सुदृढ़ता प्रदान करना है। हम अकेले कुछ नहीं कर सकते। हमारे अधिकारियों और कर्मचारियों का सामूहिक प्रयास ही हमें सफल या असफल बनाता है। हमें उनमें लगातार नयी ऊर्जा का संचार करते रहना चाहिए और उनमें उत्साह बनाये रखना चाहिए। इससे उनमें कार्य के प्रति समर्पण की भावना जाग्रत होती है। वे हमारे उद्योग को अपना उद्योग मानकर चलें तभी सफलता प्राप्त होती है।

एक बार हमारे एक परिचित उद्योगपति के यहाँ आयकर विभाग ने छापा मारा। उनके सारे बही-खातों की जांच होने लगी। इस प्रक्रिया में शाम हो गई, अंधेरा घिरने लगा। वह उद्योगपति आश्चर्य चकित रह गया कि उसके सारे अधिकारी और कर्मचारी घर नहीं गये। वे वहीं रूके हुए थे। यह देखकर मालिक अपने अधिकारियों और कर्मचारियों के पास गया और उसने उनसे घर जाने के लिये और निश्चिन्तता से अपना कार्य करने को कहा। सभी श्रमिकों और अधिकारियों ने अधिकारियों ने घर जाने से मना कर दिया। वे बोले जब तक आप जाग रहे हैं हम भी यहीं हैं। जब तक आपने भोजन नहीं किया है हम भी भोजन नहीं कर सकते। यह उद्योग हमारी आजीविका है। आप हमारे अन्नदाता हैं। उनकी निष्ठा देखकर आयकर वाले भी आश्चर्यचकित रह गये। उनकी यह आत्मीयता ही उद्योग की सफलता का प्रमुख आधार थे।

मैं पंकज की सामाजिकता के विकास और उसके दायरे में विस्तार करने की दृष्टि से उसे अपने साथ विभिन्न आयोजनों में ले जाता था। जिससे उसका सर्वांगीण विकास हो सके। पंकज पूरे समय कारखाने की देखरेख में लगा रहता था। वह निरन्तर उद्योग के विकास के लिये प्रयासरत एवं समर्पित रहता था। उसने मेकेनिकल इन्जीनियरिंग का अध्ययन किया था इसीलिये उसे कारखाने के तकनीकी विभाग को समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई। वह वित्तीय प्रबंधन की बारीकियों को समझने में सक्षम था। उसने जल्दी ही पूरे उद्योग को अपने हाथों में संभाल लिया। उसने उद्योग को नवीन एवं सुदृढ़ रुप देने की दृष्टि से स्वयं प्रमुख नेताओं से मुलाकात कर उसने व्यक्तिगत संबंध स्थापित किये। इसका यह लाभ हुआ कि कारखाना बन्द होने के कारण जिन लोगों से हमारे संबंध टूट रहे थे वे पुनः बहाल हुए और बाजार में हमारे माल की पकड़़ ठीक होकर पहले जैसी बिक्री होने लगी। इसके साथ ही उसने कारखाने के आधुनिकीकरण की दिशा में अध्ययन किया एवं इस संबंध में उसने चीन की भी यात्रा की।

चीन में श्रमिकों को हड़ताल पर जाने का अधिकार नहीं है। यदि कोई समस्या है तो उसके लिये समन्वय अधिकारी होता है, जिसे असीमित अधिकार प्राप्त होते हैं। किसी भी समस्या के लिये नियोजक या श्रमिक को उसके पास जाना होता है। वह उनकी समस्या को सुनकर उस पर निर्णय देता है। उसका निर्णय मानने के लिये दोनों ही पक्ष बाध्य होते हैं। वहां श्रमिकों को न्यूनतम बारह घण्टे काम करना पड़ता है। ओवर टाइम का कोई प्रावधान वहां नहीं है। इस व्यवस्था का प्रभाव यह है कि वहां उत्पादन न तो कभी रूक सकता है और न ही कम हो सकता है।

वहां पर वहां के चेम्बर ऑफ कामर्स से संबंधित एक महिला ने मुझसे कहा- आपका देश आर्थिक प्रगति में हमारे समकक्ष कभी नहीं आ सकता है। भारतीय महिलाएं स्वयं को घर की चहारदीवारी में सीमित रखती हैं। देश के आर्थिक विकास में उनका योगदान नगण्य होता है। हमारे देश की नब्बे प्रतिशत महिलाएं काम करके धनोपार्जन करती हैं एवं आत्म निर्भर हैं।

उस महिला की बात लगभग सही ही थी। हमारी अर्थव्यवस्था में यह एक कमी है जो दूर होना चाहिए। सरकार को महिलाओं को आगे लाने के लिये और भी अधिक सुविधाएं एवं आयकर में छूट देना चाहिए। देश की शिक्षित महिलाओं को आगे आकर इन सुविधाओं का लाभ लेते हुए स्वयं की भागीदारी सुनिश्चित करना चाहिए। इससे वे स्वावलंबी बनकर आत्म निर्भर होंगी। वे स्वयं भी सक्षम और समृद्ध होंगी और उनके ऊपर होने वाले अत्याचारों में भी कमी आएगी व देश की प्रगति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।

मुझे चेम्बर ऑफ कामर्स, एलॉयन्स क्लब इन्टरनेशनल एवं अपनी निजी यात्राओं के कारण अनेक देशों का भ्रमण करने का अवसर प्राप्त हुआ। मैंने अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, जापान, हांगकांग, चीन, योरोप के देश आदि का भ्रमण किया है। वहां के आयकर आर्थिक विकास के संबंध में उनकी नीतियां और औद्योगिक मामलों से संबंधित कानूनों का अध्ययन किया है। इसमें मैं सबसे अधिक प्रभावित चीन की व्यवस्था से हुआ हूँ।

वहां पर जब मैंने बीजिंग, संघाई, आदि नगरों में झुग्गी-झोपड़ी नहीं देखीं तो इसका कारण जानने का प्रयास किया। मुझे पता चला कि यहां पर नगरों को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। ए क्लास में बड़े नगर, बी क्लास में मध्यम नगर और सी क्लास में गांव और छोटे कस्बे आते हैं। इन तीनों श्रेणियों में रहने वालों को करों की दरों में बहुत अंतर है। सबसे न्यूनतम कर सी ग्रेड के नगरों में है और सबसे अधिक कर ए ग्रेड में रहने वालों को देना पड़ता है। इसके कारण बड़े नगरों में जो लोग रहते हैं, उन्हें सबसे अधिक कर चुकाना पड़ता है इसके कारण जिसमें इतनी क्षमता होती है वह ही वहां निवास कर सकता है यही कारण है कि वहां झुग्गी-झोपड़ी नहीं दिखती, क्योंकि उनकी आय इतनी होती ही नहीं है कि वे वहां का कर दे सकें।

वहां पर दिन-रात चौबीस घण्टे डिपार्टमेण्टल स्टोर्स खुले रहते हैं। वहां रात को ग्यारह बजे से सुबह छः बजे तक माल बिक्री पर दस से पन्द्रह प्रतिशत तक छूट दी जाती है। जिससे खरीददार इस छूट का लाभ उठाने के लिये रात में ही खरीददारी करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि दिन में सड़कों पर अनावश्यक भीड़ नहीं रहती।

एक बार हमारी कम्पनी से एक व्यापारी को प्रथम श्रेणी के माल की जगह गलती से द्वितीय श्रेणी का माल भेज दिया गया। उसने हमारी कम्पनी को पूरा भुगतान प्रथम श्रेणी के माल का कर दिया। हमारी कम्पनी के प्रथम एवं द्वितीय श्रेणी के माल की गुणवत्ता में कुछ अधिक अन्तर नहीं था। इसीलिये उस व्यापारी की ओर से कोई शिकायत भी नहीं की गई। इस प्रकार कीमत में अंतर का अतिरिक्त लाभ कम्पनी को हो गया था। मैंने यह निर्णय लिया कि उक्त व्यापारी को दोनों श्रेणियों के मूल्य का अन्तर वापिस भेजा जाए और कम्पनी इस गलती के लिये क्षमा याचना भी करे। पंकज मूल भावना से सहमत था किन्तु उसकी सोच थी कि जब क्रेता संतुष्ट है और कोई शिकायत नहीं कर रहा है तब हमें ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करना चाहिए। इस पर मेरी उससे लम्बी चर्चा हुयी और अन्त में वह मेरे इस विचार से सहमत हो गया कि जीवन में ईमानदारी से काम करना चाहिए तभी शान्ति और संतुष्टि दोनों रहेंगी और हम किसी विषय पर सही चिन्तन कर सही निर्णय लेने में सक्षम होंगे। पंकज कारखाने के एक-एक बिन्दु पर गम्भीरता से विचार कर निर्णय लेता था। वह बैंक का ऋण जल्दी से जल्दी चुकता करना चाहता था। कारखाना भी अब वापिस लाभ की स्थिति में आ गया था। लोगों का भुगतान भी प्रारम्भ कर दिया गया था।

एक दिन उसने बतलाया कि उसके एक मित्र को आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। वह भी उसकी मदद करना चाहता है। मैंने उसे समझाया कि समय परिवर्तनशील होता है। आज सभ्यता, संस्कृति और संस्कारों की परिभाषा बदल गई है। आज कर्जदार वह नहीं है जो धन का कर्ज लेता है। आज गुनहगार वह है जो कर्ज देता है। वह घनचक्कर के समान कर्ज लेने वाले के पीछे चक्कर लगाता रहता है कि किसी प्रकार उसका धन वापिस मिल जाए। एक समय था कि कर्ज लेना प्रतिष्ठा के विपरीत माना जाता था। समय पर कर्ज न चुकाना हमारी संस्कृति के विरूद्ध माना जाता था। समाज में ऐसे व्यक्ति को तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता था। अब चिन्तन में परिवर्तन हुआ है। धन की महिमा अपरम्पार हो गई है। वह कैसे किस तरह सही या गलत ढंग से कमाया गया है इसकी सोच अब समाप्त हो गई है। अब तो उल्टी गंगा बह रही है। कर्ज देने वाले को ही मदद क्यों की इसकी उलाहना मिल रही है। कर्जदार तो बेखौफ घूम रहा है और कर्जदाता रो रहा है। आज ऐसा ही हो रहा है। तुम किसी को भी कर्ज देने के पहले इन बातों को ध्यान में रख लेना। मेरे कहने का अर्थ यह नहीं है कि दुनियां में सभी बेइमान होते हैं, कई अच्छे लोग भी होते हैं जो कर्ज को समय पर चुकाते हैं। ऐसे व्यक्तियों की समाज में मान-सम्मान व प्रतिष्ठा रहती है। इस संबंध में मैं तुम्हें एक घटना भी बतलाना चाहता हूँ।

जबलपुर के पास एक स्थान है स्लीमनाबाद। वहां राममनोहर नाम के एक सम्पन्न किसान रहते थे। उनके पास खेती की काफी जमीन थी लेकिन पारिवारिक विवादों एवं पुत्रों की नासमझी के कारण धीरे-धीरे उनकी जमीनें बिकती चली गईं और एक दिन ऐसा भी समय आ गया कि घर की गुजर-बसर के लिये उन्हें निकट के गांव के मालगुजार मोहन सिंह से कर्ज लेना पड़ गया। वे जब भी कर्ज लेते उसे सदैव समय पर चुका दिया करते थे। एक बार उन्हें उनसे एक लाख रूपये कर्ज लेना पड़ गया।

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(क्रमशः अगले भाग में जारी...)

उपन्यास 7434634196102935684

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