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व्यंग्य आलेख // नज़र और नज़ारे // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

बदली तेरी नज़र तो नज़ारे बदल गए। यह कोई फिल्मी बात नहीं है। ऐसा सचमुच होता है। हमारी नज़र जैसा देखना चाहती ही वैसा ही देखती है। दार्शनिकों का तो यहाँ तक कहना है कि दृष्टि ही सृष्टि है। नज़र ही नज़ारा है। लेकिन न तो मैं यहाँ फिल्म की बात करूंगा न ही दर्शनशास्त्र की। मैं तो आपको अपनी बात बता रहा हूँ।

पिछले दिनों सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रखा गया। चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने मोदी जी पर ज़ोरदार हमला किया। उनका अंदाज़ और जोश देखकर सभी हतप्रभ रह गए। उन्हें लगा कि अब वे नज़र अंदाज़ नहीं किए जा सकते, कि अपने भाषण में उन्होंने सरकार के खिलाफ वो-वो आरोप लगाए हैं कि मोदी जी उनसे अब नज़र मिला कर बात नहीं कर सकते। ऐसा उन्होने भरी सभा में कह भी डाला। साथ ही शायद उन्हें यह भी लगा की वे कुछ ज्यादह ही बोल गए हैं। सो अपने भाषण के बाद वे अप्रत्याशित रूप से प्रधान मंत्री जी के पास पहुँच गए। और लगभग जबरन उनके गले लग लिए। यह वाकई, जादू की झप्पी ही थी। जिन्होंने भी यह नजारा देखा बिना मुस्काराए रह न सका। प्रधान-मंत्री जी भी हंसने लगे। नज़रों की यह दास्ताँ यहीं ख़त्म नहीं हुई। लौटते समय अपनी सीट पर बस बैठने ही वाले थे कि राहुल गांधी की नज़रें अपने एक सहयोगी पर पड़ गईं। राहुल जी ने एक दोस्ताना तरीके से उन्हें आँख ( नज़र) मार दी। शायद वे कहना चाह रहे थे, देखा, पप्पू कहने वालों को क्या पप्पू बनाया है। किस्सा कोताह, मोदी सरकार के विरुद्ध लाया गया अविश्वास प्रस्ताव नज़रों की भेंट चढ़ गया।

जब से मैंने यह सारा नज़ारा टीवी पर देखा है, मेरा सारा ध्यान ‘नज़रों’ पर ही टिक गया है। मेरे ज़हन में एक ही शब्द, ‘नज़र’ गुंजायमान रहा। कैसी कैसी तो नज़रें हैं और क्या क्या कारनामें वे नहीं करतीं ? किसी की बुरी नज़र लग जाती है तो समझिए आफत ही आ जाती है। कोई भी बन्दा बड़ी कुरसी पर बैठा नहीं कि लोग बिना नज़र लगाए नहीं रहते। जब तक उनमें सांस रहती है, वे बन्दे को गिराने का भरसक प्रयत्न करते रहते हैं। इन दिनों मोदी जी की कुरसी पर सबकी नज़र है। भाजपा का विरोधी, हर पूर्व और वर्त्तमान मुख्य-मंत्री, प्रधान-मंत्री की कुरसी पर नज़र गढ़ाए है। सबका एक ही सम्वेत स्वर है। मोदी को हटाओ। कौन बैठेगा कुरसी पर,यह किसी को नहीं पता। कुरसी न हुई वो खूब-सूरत प्रेमिका हो गई जिसके पीछे, हर लायक-नालायक, आशिक बना फिर रहा है। सबकी नज़रों में बस कुर्सी ही बसी है।

भारत में अधिकतर ट्रकों पर “बुरी नज़र वाले तेरा मुंह काला” –यह ‘सुभाषित’ लिखा मिल जाता है। क्या इस सुभाषित को कुरसियों {पदों} के पीछे भी लिखा जा सकता है ? ऐसा होता तो पद पर बैठने वाले, मानसिक रूप से ही भले, कुछ तो अपने को सुरक्षित महसूस करते। मैंने तो एक बस के पीछे यहाँ तक लिखा देखा कि ‘कोई पूछे की आई थी, तो बता देना, नज़र तो आई थी, चली गई”। बस न हुई इन्तजार करती, कोई प्रेमिका हो गई।

कमबख्त इस नज़र के साथ हम क्या क्या नहीं करते। हम नज़र लगाते हैं; नज़र उतारते है; नज़र मिलाते हैं; नज़र टिकाते हैं। जिनसे हमारा काम होता है उन्हें कुछ न कुछ नज़र ‘कर’ भी देते हैं। गलती से भी उन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया ला सकता। हर माँ अपने बच्चों की नज़र उतारती है। उसे डर रहता है कि बच्चे को कहीं किसी की नज़र न लग जाए। बुरी नज़र से बचाने के लिए उसके चेहरे पर एक काला टीका लगा देती है।

नज़र का यह खेल प्रेमी-प्रेमिकाओं के बीच भी खूब चलता है। नज़र मारते हैं, और दोस्ती हो जाती है। नज़रों-नज़रों में ही बात हो जाती है। नज़र मिलते ही मन, मनमानी और शरीर, शरारते करने लगता है। वो नज़र क्या होती है, बस क़यामत की नज़र होती है।

फिलहाल इतना ही। भेंट करता हूँ यह लेख आपको। आपकी नज़रेइनायत चाहिए।

डा. सुरेन्द्र वर्मा

१०,एच आई जी / १,सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

व्यंग्य 9137691286770634879

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  1. नजर और नजारे में एकदम सहज व स्वस्थ व्यंग के लिए साधुवाद । अच्छा है कि कुरसी पर 'बुरी नजर वाले ' नहीं लिखा जाता, वरना कुरसी कोई छोडता ही नहीं । श्रेष्ठ व्यंग्य है ।बधाई स्वीकारें ।

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