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हास्य नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” का अंक १३ - राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

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हास्य नाटक

“दबिस्तान-ए-सियासत”

राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित

हास्य नाटक //  “दबिस्तान-ए-सियासत” - अंक 9 // राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित


नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” के पुराने अंक  यहाँ [लिंक] पढ़ें


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नाटकदबिस्तान--सियासतका अंक १३

राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित


मंज़र

वार्ड मेंबर का टिकट किसे मिलेगा ?

[मंच रोशन होता है, मनु भाई अपनी दुकान पर बैठे नज़र आ रहे हैं ! वे इस वक़्त ग्राहकों को किरणा का सामान तोलकर दे रहे हैं ! अब फन्ने खां साहब हाजी मुस्तफ़ा के गले में बांह डाले, वहां आते हैं ! फिर दोनों पत्थर की बेंच पर बैठ जाते हैं ! अब फन्ने खां साहब अपनी मूंछों पर ताव देते हुए, मनु भाई से कहते हैं !]

फन्ने खां – [मूंछों पर ताव देते हुए, कहते हैं] – मनु भाई, हम आ गए हैं !

मनु भाई – [लबों पर तबस्सुम बिखेरते हुए, कहते हैं] – रुख़्सत बिला इतला, यानी बिना बुलाये आ गए प्यारे ! कहिये जनाब, अब क्या ख़िदमत करूँ आपकी ? निकालू शतरंज ?

फन्ने खां – [खिसयानी हंसी के साथ] – हैं..हैं....हैं..जब आप जानते ही हैं, तो फिर क्या पूछना ?

[मनु भाई उन्हें थैली थमाते हैं, जिसमें शतरंज के मोहरे और बिसायत रखी है !]

हाजी मुस्तफ़ा – [फन्ने खां से] – सद्दाम साहब ! क्या करें, हुज़ूर...? आज़कल आपके दुल्हे भाई साबू भाई की गली, सूनी-सूनी नज़र आ रही है ! कोई चहल-पहल नहीं हुज़ूर, क्या बात है ?

फन्ने खां – सूनी ही रहेगी, जनाब ! आज़कल हमारे एम.एल.ए. साहब को, काले भंवरे की तरह भम-भम करते हुए उड़ने की कोई ज़रूरत नहीं ! जानते नहीं, आप ? उनके घर पर ही ख़ूबसूरत तितलियाँ, उन पर मंडराकर चली जाती है ! क्या क़िस्मत पायी हुज़ूर, हमारे एम.एल.ए. साहब ने ? क्या कहूं, आपको ? एक आहू-चश्म मेहरारू, उनके दफ़्तर और की रौनक बनती जा रही है !

हाजी मुस्तफ़ा – [अचरच करते उए] - क्या कहा, जनाब ? एम.एल.ए. साहब अब हमारे मोहल्ले में तशरीफ़ नहीं रखेंगे ? ख़ुदा रहम ! अब तो हम गए, काम से..? अब हमारे मोहल्ले का डवलपमेंट, होने से रहा !

[हाजी मुस्तफ़ा फन्ने खां साहब की बात सुनकर, हो जाते हैं उदास ! तभी मुन्नी तेलन मुंह लटकाए अपने खाविंद के साथ, उनकी साईकल की पीछे की सीट पर बैठी गली से गुज़रती नज़र आती है ! उसे देखते ही हाजी मुस्तफ़ा, के मुख से टीस निकल उठती है !]

हाजी मुस्तफ़ा – हाय...अल्लाह ! यह क्या हो गया, मियां ? अब इस बेचारी मुन्नी तेलन का, क्या होगा ? इस बेचारी की क़िस्मत थोड़ी सी जगकर, अस्त होते सूरज की तरह हमेशा के लिए सो गयी ! कल यह बेचारी अपने शौहर के साथ स्कूटर पर बैठकर, यहाँ से गुज़रती थी....और आज, बेचारी इस चू..चू.. करती साईकल पर बैठी जा रही है ? हाय इसकी बदक़िस्मती, कहाँ-कहाँ ठोकरे लगवायेगी ?

फन्ने खा – [हंसते हुए] – अजी हमारा एम.एल.ए. कोई टटपूँजिया गली का मच्छर नहीं, यह तो प्यारे ‘ख़ुशअख़्तर भंवरा’ है ! जानते हो, भंवरा कभी केवल एक ही फूल पर बैठकर रस नहीं चूसता..? जानते हो, प्यारे खां ? कई फूलों का रस चूसता है ! अरे बिरादर, तुम कुछ नहीं जानते ! फूल झर जाते हैं, और कलियाँ ख़िल जाती है...इस ख़ुशअख्तर भंवरे के लिए. बस फिर क्या ? वह झट, उस नए खिले फूल पर जाकर बैठ जाते है !

[मुन्नी तेलन की ऐसी दुर्दशा देखकर, बेचारे हाजी साहब उदास हो गए हैं ! अब इस बोझिल माहौल को बदलने के लिए, फन्ने खां साहब झट बिसायत बिछाकर, उस पर शतरंज के मोहरे जमा देते हैं ! मगर हाजी मुस्तफ़ा, अपना ध्यान मुन्नी तेलन से नहीं हटा पाते ! वे बिना सोचे-समझे, अपने मोहरे चला रहे हैं ! उनका दिल कह रहा है कि, “बेचारी मुन्नी तेलन नगर परिषद के दफ़्तर में कितना लिहाज़ रखती थी, उनका ! उसी के प्रयासों से नगर-परिषद में हाजी साहब का काम आसानी से निकल जाता, कभी भी नगर-परिषद में हाजी साहब का काम रुका नहीं !” आज़ उसी रहनुमा मोहतरमा का ऐसा बुरा हाल देखकर, बेचारे हाजी साहब का दिल अब इस शतरंज के खेल में लग नहीं रहा..? हाजी साहब तो इसी उधेड़बुन में हैं, तभी फन्ने खां साहब झट शातिर खिलाडी की तरह अपना हाथी आगे बढ़ा देते हैं ! मगर, यह क्या ? अभी भी हाजी मुस्तफ़ा को, मुन्नी तेलन का ग़म सताए जा रहा है ! वे बिना ध्यान दिए, अपने मोहरे चला रहे हैं....तब-तक फन्ने खां साहब के मोहरे कमाल कर देते हैं, वे कई मोहरों को मारकर अपने हाथी का रास्ता साफ़ कर देते हैं ! फिर क्या ? अचानक फन्ने खां साहब का हाथी हाजी साहब के बादशाह के सामने आ जाता है, और बेचारे हाजी साहब के बादशाह को शह मिल जाती है ! इस तरह, चालाक फन्ने खां साहब अपने मोहरों के ज़रिये हाजी साहब के बादशाह को मात दे चुके हैं !]

फन्ने खां – [चहकते हुए, कहते हैं] – मुन्नी तेलन की लगाम छोड़िये, हुज़ूर ! राई के भाव, रात को ही चले गए ! अब तो आप, उगते सूरज को सलाम कीजिये ! जानते हैं, आप ? उस तेलन के ख़्वाब में पड़कर, आपको मिल गयी किश्त ! अब बचाइये, अपने बादशाह को !

हाजी मुस्तफ़ा – [रुंआसे होकर] – जनाब, आपने अच्छा नहीं किया ! हमें बातों में उलझाकर आपने हाथी चढ़ा दिया !

फन्ने खां – [ख़ुश होकर] – हाथी क्या ? जनाब , अब तो गधे भी सवार हो जायेंगे...इतने सीधे रहे तो मियां, वार्ड मेंबर का टिकट कैसे हासिल करोगे पार्टी से ? जानते हो, कोई दूसरा ही आकर आपको मिलने वाला टिकट, उठा ले जाएगा और आप उसका मुंह ताकते रह जाएंगे ! जानते हो, प्यारे ? आज़ सीधे लोगों का, ज़माना नहीं है ? बोलिए, वार्ड मेंबर का टिकट किसे मिलेगा ?

हाजी मुस्तफ़ा – मुन्नी तेलन को, और फिर किसको ?

फन्ने खां – वह वक़्त तो रात को ही चला गया, हुज़ूर ! अब राई के भाव बढ़ने से रहे, वक़्त-वक़्त की बात है मियां ! अब यह मुन्नी तेलन, एम.एल.ए. साहब की आँखों से उतर चुकी है ! ख़ाक़ टिकट लेगा...अब ?

[उन दोनों की गुफ़्तगू की आवाज़ बराबर साबू भाई के कानों में सुनायी दे रही है, जनाब अपनी दुकान की दहलीज़ पर बैठे बराबर इस गुफ़्तगू पर ध्यान दे रहे हैं ! टिकट की बात चलते ही, जनाब से चुप बैठा नहीं रहा जाता...! जनाब साबू भाई झट उठकर आ जाते है यहाँ, और बिन बुलाये बुलंद आवाज़ में बोल पड़ते हैं..बीच में ! फिर, बैठ जाते हैं वहीं पत्थर की बेंच पर !]

साबू भाई – बा अदब होश्यार...टिकट मिलेगा तो हमको ही, यानी साहबे आलम साबू भाई को ! कौन है ऐसा, जो हमसे करे बराबरी इस मोहल्ले में ? [फन्ने खां साहब पर, निग़ाह डालते हुए] कहो साले साहब, बताइये...हमने कुछ ग़लत तो नहीं कह दिया ?

फन्ने खां – [हंसी के ठहाके लगाते हुए] – क्या कहें, दुल्हे भाई ? आपसे कौन टक्कर ले सकता है, अब ? वह भी बूढ़े शेर से...अजी वक़्त आ गया, अब नौजवानों को आगे बढ़ाओ !

हाजी मुस्तफ़ा – यह क्या बेतुकी बात कह रहे हैं, सद्दाम साहब ? ख़ाली नौजवान कहने से काम नहीं चलता, आप ख़ूबसूरत जवान हसीना को आगे लाने की बात कीजिये ! जानते नहीं, आप ? इस राजस्थान स्टेट की वज़ीरे आला का ओहदा औरतों के पास चला गया है, जनाब हुजूरे आलिया वसुंधरा सिंधिया इस स्टेट की वज़ीरे आला एक औरत है ! अब यह ओहदा, जनानी हो गया है ! इसलिए, अब मर्दों को इन सियासती ओहदों से दूर ही रहना चाहिए !

फन्ने खां – ये बूढ़े शेर, क्या जानेंगे ? ये कभी इस मोहल्ले से बाहर गए हो तो जाने कि, ‘इस नगर-परिषद की चेयरमेन, अब एक औरत है !’ क्या करें ? आज़कल सियासती गलियारे में, अब मर्दों का कोई काम नहीं रहा ! हुज़ूर, ज़माना आ गया है...अब तो इस देश में हीज़ड़े ही राज़ करेंगे ! देख लीजिये, मध्य प्रदेश में क्या हुआ ?

साबू भाई – शबनम मौसी बन गयी एम.एल.ए., भारी वोटों से जीतकर ! हाय अल्लाह, क्या ज़माना आ गया ? अब तो प्यारों, हीज़ड़े सराकर चलाने लगेंगे ! अब हम मर्दों का, क्या काम ? [ताली पीटते हुए] बस, बैठे-बैठे पीटते रहो ताली...काम-धाम अब कुछ नहीं, बस यारों चूल्हा फूंकना रोटियाँ बेलना...रह गया है, मर्दों का काम ! बस, बन जाओ सभी..[ताली पीटकर] छक्के !

फन्ने खां – [साबू भाई को चिढ़ाते हुए, कहते हैं] – साहबे आलम ! अब आप इन मूंछों को, नीचे झुका दीजिये ! फिर जाकर ब्यूटी पार्लर में, लाली मल देना अपने रुख़सारों पर और ओढ़ लेना बुर्का ! अब छोड़ दीजिये, ख़्वाब वार्ड मेंबर बनने का !

[बातों में डूबे फन्ने खां साहब को देखकर, हाजी मुस्तफ़ा चुप-चाप अपना हाथी इस तरह आगे बढ़ाते हैं....जिससे, फन्ने खां साहब का हाथी मारा जाए ! ख़ुदा की पनाह ! फन्ने खां साहब का ध्यान अचानक मोहरों पर चला आता है, वे हाजी मुस्तफ़ा की चाल को समझ लेते हैं ! झट अपने ऊंट को तिरछी चाल चलाते हुए आगे बढ़ा लेते हैं, अब यह हाजी साहब का हाथी फन्ने खां साहब के ऊंट की ज़द में आ जाता है ! इस तरह अब फन्ने खां साहब का हाथी बच जाता है, और साथ में लग रही किश्त से उनका बादशाह भी बच जाता है !]

फन्ने खां – [मोहरे को आगे बढ़ाते हुए, कहते हैं] – असतग़फिरुल्लाह, कहीं ग़लत बात न कह दूं, आपको ! अभी क्या कर डालते, प्यारे मियां ? जनाब आप तो इब्नुल वक़्ती ठहरे, अरे हाजी साहब यार आप तो अभी क़त्ल कर देते हमारे बादशाह का ?

साबू भाई – [चौंकते हुए, कहते हैं] – बादशाह..किसका बादशाह ? अरे यार, वह तो हम हैं, आपके बादशाह यानी मोहल्ला-ए-आज़म ! [ज़ोर से गरज़कर, कहते हैं] कौन कर रहा है, हमारा क़त्ल ? क्या समझ रखा है, लोगों ने ? साबू भाई यानी साहबे आलम, इतने कमजोर नहीं हुए कि कोई आकर हमारा बाल बांका कर दे !

फन्ने खां – [हंसते हुए] – हुज़ूर ! सलामत रहें ! आपका क़त्ल नहीं हो रहा था, अब ज़रूर क़त्ल ज़रूर हो रहा है, आपकी सियासत का !

साबू भाई – [ज़ोर से] – किसका ? क्या कहा आपने ?

फन्ने खां – [मुस्कराते हुए] – अरे हजूर, ख़फ़ा न हो...वह आपका नहीं, इस शतरंजी खेल में हमारे बादशाह का हो रहा था ! हुज़ूर आप तो हमारे दिल के बादशाह हैं, अगर आपका ऐसा क़त्ल हो जाए तो लानत है हमें ! फिर, किस मुंह से कहें आपको...कि, आप सियासती गलियारे में टिके रहेंगे !

साबू भाई – टिकना, क्या मुश्किल ? हम तो टिकने और टिकाने ही, धंधा करते हैं ! जानते हैं, आप ? हम क्या बेचते हैं ? सुनिए, कान खोलकर...अम्बुज़ा सिमेंट ! इसकी बनी दीवार, टूट नहीं सकती ! वह हमेशा टिकी रहती है !

हाजी मुस्तफ़ा – [फन्ने खां से] – शायद आपने टी.वी. में आ रहे इश्तिहारों को ध्यान से देखा न होगा, देख लेते तो आप यही कहते कि, दुल्हे भाई ग़लत नहीं कह रहे हैं !

साबू भाई – ये क्या बोलेंगे, अब ? हम कह रहे हैं कि, टिकना क्या जनाब ? हम तो चिपक जायेंगे, सियासती कुर्सी से लिपटकर ! उससे ऐसे जुड़ जायेंगे, जैसे चिपका रहता है फेविकोल का जोड़ !

[अब सड़क पर, सामने से दाऊद मियां साईकल थामे चले आ रहे हैं ! थोड़ी देर बाद वहां आकर, साईकल को पेड़ के सहारे रख दते हैं ! फिर, आकर बैठ जाते हैं पत्थर की बेंच पर ! और, चल रही गुफ़्तगू में शामिल हो जाते हैं !]

दाऊद मियां – [साबू भाई से] – साबू भाई ! सुना, आपने ? सियासती गलियारे में, काफ़ी हलचल है ?

मनु भाई – [दुकान पर ग्राहकों को, सामान देते हुए] – हलचल नहीं, मियां इसे तूफ़ान कहते हैं ! जानते नहीं ? आज़कल, हमारे एम.एल.ए. साहब हूर की परियों से घिरे रहते हैं !

दाऊद मियां – क्या कहा, जनाब ? इतने गिरे हुए हैं, हमारे एम.एल.ए. साहब..

मनु भाई – अजी, बहरे हो क्या ? सुनते नहीं, मैंने कहा कि “उनको ख़ूबसूरत हसीनाएं घेरकर, चारों तरफ़ खड़ी हो जाती है...मानों, वे फूल से निकाले गए पराग हो..जिसको हासिल करने के लिए, उनके चारों तरफ़ मधु मक्खियाँ उन पर मंडराती रहती है ! और जानते हैं, आप ? उधर ओपोजिट पार्टी वालों ने, इस वार्ड में दमदार उम्मीदवार खड़ा किया है !

फन्ने खां – अजी इस दमदार उम्मीदवार को छोड़िये, आप ! भले ये ओपोज़िशन वाले किसी लंगूर को लाकर खड़ा कर दें, तो भी हमारी मुन्नी तेलन को हरा नहीं पायेगा ! जनाब, किसकी हिम्मत...जो हमारी मुन्नी तेलन से, मुक़ाबला करे ?

दाऊद मियां – [लबों पर, मुस्कान लाकर] – वज़ा फ़रमाया, हुज़ूर ! मुन्नी तेलन के लबों पर छाई तब्बसुम का, क्या कहना ? मोहल्ले के बड़े-बड़े तुर्रम खां, अपना होश हवाश खो बैठते हैं ! हक़ीक़त तो यह है जनाब कि, उस हसीना को गजगामिनी का ख़िताब दे दिया जाय तो उसकी ख़ूबसूरती के साथ इंसाफ़ होगा !

साबू भाई – [झुंझलाते हुए, कहते हैं] – अरे छोड़िये, उस गजगामिनी को ! जब आपके सामने, साबू भाई नाम का सफ़ेद हाथी मौज़ूद है ! क़िब्ला...एक मर्तबा, इसे देख तो लीजिये !

मनु भाई – दिन लद गए, साबू भाई ! अब आज़कल इन सफ़ेद हाथियों के पीछे, सरकार छोड़ देती है खूंखार कुत्तों को ! और इस आहूचश्म [मृगलोचना, मृगनयनी] के दीदार पाने के लिए लोग, घंटों कतारों में खड़े रहते हैं, हुज़ूर !

[तभी आयशा की टेक्सी आकर, स्कूल के गेट के पास रुकती है ! न जाने कहाँ से इधर-उधर खड़े मोहल्ले वाले, उसका दीदार पाते ही झट उसके पास चले आते हैं ! इन सबको गेट के पास खड़ा देखकर, पहली पारी की महिला चपरासी चाँद बीबी आकर गेट खोल देती है ! थोड़ी देर बाद, आयशा बैग उठाये अन्दर चली आती है ! उसके पीछे-पीछी मोहल्ले वाले भी, उसके कमरे की तरफ़ क़दम बढ़ा देते हैं ! कुछ मोहल्ले वाले बेंच पर बैठे रह गए हैं, मगर उन सबकी निग़ाहें आयशा के दीदार करने लगी है ! इस मंज़र को देख रहे मनु भाई से अब बिना हँसे रहा नहीं जाता..बरबस, वे ख़िलखिलाकर हंस पड़ते हैं !]

मनु भाई – [हंसी का ठहाका लगाते हुए, कहते हैं] – वह..भाई, वाह ! कमाल का है, इस ग्रज़ालचश्म का कुव्वते जाज़बा..? इसकी ख़ूबसूरती ने इन लोगों की क्या क्या दशा बना डाली है..? अब तो भय्या, ऐसा लगता है कि, सियासत में बैठी आला कमेटी, किसी ग्रज़ालचश्म को ही टिकट देना चाहती होगी ? तुम जैसे पतझड़ के पत्तों को नहीं ! अरे जनाब, आख़िर वोटों का सवाल है !

दाऊद मियां – आपको याद होगा, आपके एम.एल.ए. साहब के प्रयासों से इस आहूचश्म की पोस्टिंग हमारी स्कूल में हुई है ! हुज़ूर ने यहाँ पोस्टिंग क्या दी, इसको ? वे ख़ुद इस आहूचश्म की आँखों के ज़ाल में, गिरफ्त्त हो गए !

हाजी मुस्तफ़ा – गिरफ्त क्या हुए, हुज़ूर ? आप तो यह कहें कि, ‘इस मोहतरमा के कटीले नयन से, बेचारे बिना जुर्म कैद कर लिए गए !’ अब देखिये, हुज़ूर ! कभी एम.एल.ए. साहब इस मोहतरमा के ग़रीबखाने हाज़री देते हैं, तो कभी यह मोहतरमा इनके दौलतखाने पर हाज़िर हो जाया करती है !

दाऊद मियां – और बेचारे इसके शौहर रशीद मियां, घर पर बैठे आहे भरते रहते हैं !

[फन्ने खां साहब ठहरे, आयशा के मुंह-बोले चच्चा ! जो इस आयशा के वालिद के दोस्त हैं, वे कैसे इस आयशा के लिए बेहूदी बातें सुनना बर्दाश्त कर पाते ? वे झट, दाऊद मियां द्वारा लगाए गए आरोप को झुठला देते हैं !]

फन्ने खां – बेचारी ग़रीब छोरी पर झूठी तोहमत मत लगाओ, यह बेचारी छोरी भोली है..हिरणी के माफ़िक ! चारों तरफ़ से ये सियासत जंगली भेड़िये, उसे नोचने के लिए खड़े हैं !

दाऊद मियां - क़िब्ला बचा दीजिये ना, अपनी इस हिरणी को ! वह क्यों मुंह लगा रही है, इन खूनी भेड़ियों को ? ज़रा पूछिए आप, इस मोहतरमा से !

[मौक़ा पाकर हाजी मुस्तफ़ा, फन्ने खां साहब के बादशाह के सामने अपना हाथी का मोहरा रखकर उसके पीछे अपने ऊंट का ज़ोर लगा देते हैं ! और एक तरफ़ यह ऊंट, उनके वजीर को बचा रहा है ! मगर बदक़िस्मत रही फन्ने खां साहब की, जिनका बादशाह खड़ा है अकेला..जिस पर उनके किसी मोहरे का ज़ोर नहीं ! इस तरह हाजी साहब चाल चलकर, बरबस कह बैठते हैं !]

हाजी मुस्तफ़ा – [ज़ोर से] – मात...! फन्ने खां साहब, आप अपनी हिरणी को बाद में बचा लेना, अभी आप अपने बादशाह को बचाइये ! [हंसते हैं] मारा गया, आपका बादशाह...बेमौत !

फन्ने खां – हाय...अल्लाह ! आप तो बड़े फ़हीम निकले ! चारों खाना चित्त कर डाला, हमारे बादशाह को ! आज़ अगर तौफ़ीक़ साहब यहाँ होते तो, चाल में से चाल निकाल लेते..और हमारा बादशाह बेरहम हाथों से मारा नहीं जाता !

दाऊद मियां – [उठते हुए] – अरे ओ.., फ़सले ख़िजां के झड़ते पत्तों ! अगर हम यहाँ बैठे रह गए, तो यह ख़ूबसूरत बला हमारी मुख़बीरी करवाने के लिए...किसी चपरासी को यहाँ भेज देगी !

[दाऊद मियां रुख़्सत होते हैं ! कुछ देर बाद, वे अपनी सीट पर बैठे नज़र आते हैं ! तभी, आयशा अपनी टेबल पर रखी घंटी को बजाती है ! घंटी सुनकर, शमशाद बेग़म उसके पास हाज़िर होती है ! वह कहती है !]

शमशाद बेग़म – कहिये जनाब, ख़ैरियत है ?

आयशा – [ग़मगीन होकर, कहती है] – ख़ाला ! आपसे, हमारी हालत क्या छिपी है ? ग़म में जीयें जा रहे हैं !

शमशाद बेग़म – बेदिरेग़ बयान कीजिये...हमसे जो मदद होगी, वह हम अवश्य करेंगे ! हुज़ूर कहिये, क्या ख़िदमत की जाए आपकी ?

आयशा – स्कूल के टूर्नामेंट के लिए चन्दा लाना हमारे लिए, बन गया है सर-दर्द ! अब वक़्त दे नहीं पाती, घर पर ! इधर रशीद मियां के मुख़्तलिफ़ मिज़ाज का, क्या बयान करूँ ?

[दुःख से आयशा के नयन अश्कों से नम हो जाते है ! इन अश्कों के एक-एक कतरे को, रुमाल से साफ़ करती हुई आयशा आगे बयान करती है !]

आयशा – [रुमाल से अश्कों को साफ़ करती हुई] - एक बात कहूं, ख़ाला ! आप स्कूल में रहें या फिर मेरे घर, बात एक ही है ! मैं पूरे एक हफ़्ते के दस्तख़त एक साथ, आपसे हाज़री रजिस्टर में करवा दूंगी ! बस, आप कुछ दिन हमारे घर पर वक़्त देकर घर के काम संभाल लें ! फिर, काम है भी क्या ? ख़ाली गेहूं बिनना, रोटी पकाना वगैरा.. वही घरेलू काम, जो आप अपने घर करती आ रही हैं ! और, क्या ?

[जाफ़री के दरवाज़े के पास, किसी के आने की आहट सुनायी देती है ! शमशाद बेग़म दरवाज़े पर निग़ाह डालकर, कहती है !]

शमशाद बेग़म – हुज़ूर ! फन्ने खां साहब तशरीफ़ लाये हैं ! शायद वे, टूर्नामेंट के चंदे की बात करते हों..! अच्छा है, मैं चल देती हूं ! आप उनसे सहजता से, बात कर पायेंगे !

[शमशाद बेग़म जाती है, और फन्ने खां साहब कमरे में दाख़िल होते हैं ! मंच पर, अँधेरा छा जाता है !]

नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” का अंक १३ राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित मंज़र २ “लौटकर बुद्धू घर को आये !”

नए किरदार – बच्चियों के वालेदान

[[मंच रोशन होता है, आयशा अपने कमरे में कुर्सी पर बैठी हुई है ! तभी दरवाज़े पर दस्तक होती है, फन्ने खां साहब कमरे में तशरीफ़ रखते हैं ! अब फन्ने खा साहब कुर्सी पर बैठकर, कमरे की दीवारों पर नज़र दौड़ाते हैं ! उनको कमरे की छत्त पर, मकड़ी के कई जालें बुने हुए नज़र आते हैं ! उनके दिल में, एक ही ख़्याल आता है !

फन्ने खां – [अपने-आप] – यहाँ मकड़ियां ही जाले नहीं बुनती, इंसानों की भी आदत है जाले बुनने की ! अपने ज़ाल में भोले-भाले मोहल्ले वालों को फंसाकर, इन बेचारों को मूंड लेते हैं ! अभी हाल में ही, बेचारे हाजी साहब इस आहूचश्म मोहतरमा द्वारा मूंड लिए गए ! ख़ुदा रहम, कहीं यह मोहतरमा मुझे भी अपने ज़ाल में फंसाकर, अपना उल्लू सीधा न कर ले ? अरे नहीं, नहीं ! ऐसा हो नहीं सकता, आख़िर यह छोरी मुझे चच्चाजान का सम्मान देती आयी है !

आयशा – अजी चच्चाजान, किस सोच में पड़े हैं जनाब ? ज़रा, तशरीफ़ लाइए ना ! [उनको बैठाने के लिए, कुर्सी आगे खिसकाती है !]

[फन्ने खा साहब कुर्सी पर तशरीफ़ आवरी होते हैं, तभी शमशाद बेग़म आबेजुलाल से भरा लोटा लिए आती है ! उनको पानी पिलाकर, वह वापस लौट जाती है ! अब आयशा उनके चेहरे के भावों को पढ़ती हुई, उनसे कहती है !]

आयशा – [उनका चेहरा देखती हुई] – आज़ तो चच्चा जान मैं आपसे, ज़रूर लग्व करूंगी ! लग्व ज़रा अफ़सोसनाक सरका है...मगर, क्या करें चच्चाजान ? इस स्कूल पर हेड ऑफिस वालों ने, टूर्नामेंट करवाने का भार थोप दिया ! अब इस टूर्नामेंट को पूरा करवाना, हमारी मज़बूरी बन गयी है !

फन्ने खां – कहो बेटी, मेरे लिए कोई काम हो तो..?

आयशा – [मुस्कराती हुई, कहती है] – आप और दूसरे डवलपमेंट कमेटी के मेम्बरान...टूर्नामेंट का, कितना फण्ड जुटा सकते हैं ?

फन्ने खां – [अपने-आपसे] – हाय अल्लाह ! हम तो आये हैं यहाँ, बच्चियों से ली गयी कंप्यूटर फीस को वसूल करने ! जो क़ायदे के तहत सरकार को देनी है ! मगर, यहाँ तो यह मोहतरमा हमसे ही वसूल करने जा रही है...चन्दा ? [अपनी बात रखते हुए] हम तो बड़ी उम्मीद लेकर, बेटा तुम्हारे पास आये हैं ! पहले हमारी बच्चियों की समस्या पर, ग़ौर कीजिये बेटा !

आयशा – मगर चच्चा जान, आप पहले मुझे इस चंदे वाली समस्या से निज़ात दिलाइये ! बच्चियों की बात तो, बाद भी सुनी जा सकती है ! बस आप सभी मेम्बरान, डवलपमेंट फंड से पच्चास हज़ार रुपये निकलवाने की मंजूरी दे दीजिएगा !

फन्ने खां – [सर के बालों पर, अपनी उंगलियाँ फेरते हुए] – क्या कहा, पच्चास हज़ार ? [ज़ोर से तल्ख़ आवाज़ में] यह क्या ? किसी मुफ़लिस का, निकाह करवाना है..? हाय अल्लाह, इतनी बड़ी रक़म ?

आयशा – [लबों पर, मुस्कान लाकर] – जनाब, हमारा निकाह तो गया..दस साल पहले ! आपने ग़लत समझा, हुज़ूर ! यह बात ज़रूर सही है, आपकी बच्ची का निकाह होने वाला है..हुस्ने इत्तिफ़ाक़ से हम ज़रूर अपनी बहन के निकाह में शराकत करेंगे...

[आयशा को भरोसा नहीं हो रहा है, वालिद जैसे ये चच्चाजान फन्ने खां साहब टूर्नामेंट के ख़र्चे को लेकर नाराज़ कैसे होते जा रहे हैं ? उनको शांत करती हुई, आयशा आगे कहती है !]

आयशा – आप फ़िक्र न करें, चच्चा जान ! अभी तो इस टूर्नामेंट में आने वाले, आला कमान के सियासती लीडर यानी ख़ुद वज़ीरे आला और साथ में उनके मिनिस्टर वगैरा की आवभगत करनी है ! उसमें होने वाले ख़र्चे पर, आप ध्यान दे दीजिये !

फन्ने खां – [गुस्से से बेक़ाबू होकर, कुर्सी से उठते हैं] – वज़ीरे आला...और साथ में इन सियासती लीडरों से, इस एजुकेशन महकमें का क्या काम ? मोहतरमा, यह इल्म की तामिर है....स्कूल !

आयशा – चच्चा जान, पहले आप मेरी बात को अच्छी तरह से समझिये फिर...

फन्ने खां – अब सुनने में, क्या रहा ? अब तरन्नुम में आफ़रीनी को छुपाने की कोई ज़रूरत नहीं है, बेटी ! अब तुम असली बात मुझसे छुपाने की कोशिश मत करो ! हम सभी मेम्बरान जान गए हैं, आख़िर तुम क्या काम करवाना चाहती हो....इन सियासती लीडरों से ?

[मर्जी माफ़िक न होता देखकर, आयशा कुछ उखड़ जाती है ! वह झट तल्ख़ी से, कह देती है !]

आयशा – [तल्ख़ी से] – आप क्या जानते हैं ?

फन्ने खां – अंदाज़े बयान, कुछ गंजलक है....अभी-तक, तुम्हारे नवाबी ख़र्चों के बारे में सुनते आये हैं..मगर, आज़ अपनी इन आँखों से देख लिया !

आयशा – क्या देख लिया, हुज़ूर ?

फन्ने खां – तुम क्या जानों, इस डवलपमेंट फंड का पैसा उन गरीब वालेदान की जेब से आता है...जो एक वक़्त खाना न खाकर, यह पैसा जुटाते आ रहे हैं ! केवल इसी आशा से कि, उनकी बेटी कुछ पढ़-लिख जाय ! माफ़ करना, बेटी ! तकलीफ़ दे दी तूझे, चलता हूं...ख़ुदा तुम्हें, सही रास्ता दिखला दे !

[फन्ने खां उलटे पाँव लौट पड़ते हैं ! आकाश में उड़ता हुआ एक कनकव्वा, दफ़्अतन [अचानक से] कटकर, ज़मीन पर आकर गिरता है ! मोहल्ले के बच्चे उसे लुटने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़ते हैं ! इस कटे हुए कनकव्वे से ध्यान हटाकर फन्ने खां साहब, स्कूल के मेन गेट के पास आकर, पीछे मुड़कर इस स्कूल की तामिर को ग़मभरी नज़रों से देखते हैं ! इसे बनवाने के लिए, फन्ने खां साहब और उनके दोस्तों ने क्या नहीं किया ? कितने मिनिस्टरों और ओहदेदारों के पास चक्कर काटते रहे, तब कहीं जाकर नगर परिषद को सरकार द्वारा इसे बनवाने की मंजूरी मिली ! बस वे बातें याद करते हुए उनके दिल में एक टीस उठती है, उनके दिमाग़ में एक ख़्याल रोशन होता है कि “कितनी कोशिशें करने के बाद, हम लोगों ने इस दबिस्तान की तामिर खड़ी की ? और आज इस सरकार ने यह दबिस्तान किन ग़ैर जिम्मेदार लोगों के हवाला कर दी, जिनका स्वार्थ इतना बढ़ गया है कि वे इन दूषित सियासती लीडरों के सियासत के ज़ाल में फंसकर, इस दबिस्तान का भट्टा बैठाते जा रहे हैं !” अब तो यह दबिस्तान, इन स्वार्थी लोगों की स्वार्थ-पूर्ति के लिए दूषित “दबिस्तान-ए-सियासत” चलाने का साधन बन गया है ! सोचते-सोचते, फन्ने खां साहब के सीने में दर्द उठने लगा ! इस हर्राफ़ सियासती अफ़सर आयशा द्वारा दी गयी चोट को बर्दाश्त करते हुए फन्ने खा साहब, अपने शकिस्ता दिल को थामे उस पत्थर की बेंच की तरफ़ अपने क़दम बढ़ाने लगे, जहां इनके दोस्त इनका इन्तिज़ार कर रहे हैं ! बरबस, इनके मुख से यह जुमला निकल उठता है !]

फन्ने खा – [दर्द भरे सुर में] – जिस मोहतरमा को हमने इल्म-ए-नूर समझा, वह बुलंद तो क्या ? बस, एक तस्वीर बनकर रहा गयी, इस मोहमल, बेमानी और हिमाकत की ! अच्छा होता, हम उस दानिश दाऊद मियां की सलाह को मान लेते...जिसने एक बार कहा था, “सद्दाम साहब, जिसे आप इल्म-ए-नूर कह रहे हैं, वह एक दिन आपके और इस दबिस्तान के लिए बोझ बन जायेगी !” हाय अल्लाह, अब क्या करें ? यह मोहतरमा तो इन बेचारी ग़रीब बच्चियों के पैसों को, फ़सले ख़िजां बना देगी ?

[फन्ने खां साहब को आते देखकर, दुकान पर ग्राहकों को सामान-ए-ख़ुरोनोश देते हुए मनु भाई बोल पड़ते हैं !]

मनु भाई – [ग्राहकों को, सामान-ए-खुरोनोश देते हुए] – क्या हो गया, जनाब ? कहीं लफ़्ज़ी इख़्तिलाफ़ [जुबानी लड़ाई] हो गया, या किसी ने आपको ज़लील कर डाला ?

साबू भाई – [समीप आकर, फन्ने खां साहब का चेहरा पढ़ते हुए] – साले साहब ! यह क्या नक्क़ाशी है, चेहरे पर ? आख़िर जाकर आ गए, उस ख़ूबसूरत बला के पास ? क्या, हुज़ूर सही बात है ना ?

[बहुत कुछ सुन लिया, और देख लिया फन्ने खा साहब ने ! अब सुनना और कहना, क्या बाकी रह गया ? ख़ाली इस शकिस्ता दिल पर मरहम लगाने की जगह, यहाँ बैठे दोस्त उनके क़ुरुह को क़ुरेद देंगे, क्या बस अब यही बाकी रहा ? बस अब तो उनके दिल में, शाइर लतीफ़ नागौरी का यह कलाम गूंज़ता है - “क़दरदां वे होते हैं, जो क़ुरुह को कुरेदते हैं इनसे बहतर ख़न्नास है जो ईजाद करते हैं लिल्लाह के सुखनदर उम्दा है दुनिया में जो इख़लास जुबां रबी को याद करते हैं !” इतना कुछ होने के बाद, फन्ने खां साहब अब यहां रुकने वाले कहाँ ? वे तो झट चल देते हैं, अपने ग़रीब खाने की तरफ़ ! उनको रुख़्सत होते देख, साबू भाई और मनु भाई ठहाके लगाकर ज़ोर से हंस पड़ते हैं !]

साबू भाई –[हंसी के ठहाके लगाकर, कहते हैं] – मआमला क्या था, भाइयों ? मुझे, कुछ नहीं आया समझ में ? ख़्वामख़्वाह, बेचारे हमारे साले साहब को आप लोग ले उड़े ?

मनु भाई – फिर, आप हँसे क्यों ? अब बताने के बाद हंसना मत, क्योंकि बहरा दो दफ़े हँसता है ! एक दफ़े लोग हंसते हैं तब, और दूसरी दफ़े जब उसे हंसने का कारण मालुम होता है ! समझ गए, मोहल्ला-ए-आज़म ?

हाजी मुस्तफ़ा – [शतरंज के मोहरे बिसायत पर जमाते हुए, कहते हैं] – मफ़हूम यह है मियां कि, गए थे बेचारे अपनी नातिका [वाक़-शक्ति] दिखाने ! ख़्याल यह था कि, उनकी लाडली भतीजी ज़रूर इन बच्चियों की कंप्यूटर फ़ीस लौटा देगी...मगर, वहां तो इनकी बात न सुनकर इनसे चन्दा माँगने लगी !

साबू भाई – ख़ूब सोचकर भी गए थे बेचारे, वहां बैठकर चलाएंगे अपनी तक़रीर के तीर..कि, सरकार ने माफ़ कर दी है यह कंप्यूटर फ़ीस ! अब आपको यह फ़ीस, लौटानी ही होगी ! मगर...

मनु भाई – [हंसते हुए] – मगर, इनकी लाडली भतीजी ने गारत कर डाले सारे रब्त ! गए थे बेचारे दिल-ए-आरज़ू बयान करने, मगर लौट आये वापस बेआबरू होकर !

साबू भाई – [बेंच पर बैठते हुए] – अब चलो, खेल ही लेते हैं, यह शतरंज “शायद हम भी इस तरह दो-चार सियासती चालें सीख लें, यहाँ शतरंज खेलकर !” आख़िर, हमें भी चालें चलनी पड़ती है, “दबिस्तान-ए-सियासत” की ! क्योंकि हम हैं मेम्बरान, इस दबिस्तान की डवलपमेंट कमेटी के ! अब हम ऐसी चालें चलेंगे, लोग दांतों टेल उंगली दबा देंगे ! आख़िर हम, साले साहब का बदला ज़रूर लेकर ही रहेंगे !

हाजी मुस्तफ़ा – आख़िर हम भी कोई ऐसी-वैसी चीज़ नहीं है, जनाब ! इस दबिस्तान की डवलपमेंट कमेटी के मेम्बरान है, भाई !

मनु भाई – मेंबर भी वो..जनाब, जिसे एम.एल.ए. साहब ने नोमिनेट करके भेजा है !

साबू भाई – अब तो तहलका मचा देंगे, हुज़ूर ! इस मोहतरमा पर, ग़बन का चार्ज लगाकर ! अजी क्या समझती होगी, वह ? हम तो शिकायतों के पुलिंदे रख देंगे, एम.एल.ए. साहब के सामने ! फिर देखना, हुज़ूर..आगे-आगे क्या होता है ?

हाजी मुस्तफ़ा – हम क्या देखें, हुज़ूर ? आप देखिये, ज़रा ! आपका हाथी मारा गया, और अब ऊंट की बारी है ! [साबू भाई के हाथी को उठाकर, वहां अपना वज़ीर रख देते हैं !]

मनु भाई – शतरंज के जंग में मारे जा रहे हो मियां, अब क्या सियासती जंग जीतेंगे आप ? [मनु भाई ठहाका लगाकर, हंसते हैं !]

[तभी एक सफ़ेद कार, स्कूल के गेट के पास आकर रुकती है ! जैसे ही कार से मजीद मियां बाहर निकलकर आते हैं, उसी वक़्त एक उडता हुआ शैतान कौआ उन पर मंडराता हुआ उनकी सफ़ेद सफ़ारी पर बींट कर देता है ! गेट खोलकर आयशा बाहर आती है, वह उस कौए को बींट गिराते देख लेती है !]

आयशा – [नज़दीक आकर] - वाह जनाब ! क्या कहना है, आपका ? चलो इस मर्तबा जनाब पर कलाग़ मेहरबान हो गए, अच्छा रहा बदशगुन टल गए..आइये, अब अब यहाँ से चलने का नाम लीजिये ! [दोनों आकर, कार में बैठ जाते हैं !]

मजीद मियां – [कार स्टार्ट करते हुए] - मोहतरमा, अब तो आप मान गयी ना ? आपका जुमला ग़लत साबित हुआ, आख़िर कलाग़ ने हम पर बींट कर ही डाली !

[कार रवाना हो जाती है, कार के जाने के बाद बच्चियों के सारे वालेदान इकट्ठे होकर साबू भाई के सामने आकर खड़े हो जाते हैं, और उनसे कहते हैं !]

एक वालेदान – साबू साहब, ज़रा सुनिए हमारी दरख़्वास्त ..

[साबू भाई को सियासती क्षेत्र में पूछने वाला है, कौन ? और अब वे इन वालेदानों को अरदास करते देख, वे ख़ुश हो जाते हैं ! उनकी दरख़्वास्त सुनकर, उनका सीना और चौड़ा हो जाता है ! वे अपनी मूंछों पर ताव देते हुए, उनसे कहते हैं !]

साबू भाई – [मूंछों पर ताव देते हुए, कहते हैं] – क्या चाहते हो, बिरादर ? पहले आप सभी इस बेंच पर तशरीफ़-आवरी हो, फिर तसल्ली से हम आपसे बात करेंगे !

दूसरा वालेदान – [झुंझलाता हुआ] - तसल्ली से बैठे, मेरा सर ! क्या, आपको कोई ग़म नहीं है ? आपको क्या कहें, जनाब आप तो इस मोहल्ले में रहने वालों के सभी ग़म भूलकर यहाँ बैठे हमेशा शतरंज खेलते नज़र आते हैं ?

साबू भाई – ना वाकिफ़े-ग़म अब दिल-ए-नाशाद...ख़ाक करूँ, ग़म ? कुछ बताओगे, मियां..खड़े-खड़े बाबरनामा पढ़ते रहोगे ? कुछ तो बताओगे, तब...

दूसरा वालेदान – हुज़ूर, यह कैसा इंसाफ़ ? सरकार ने अख़बारों में इन सभी दबिस्तान-ए-निज़ाम को ऑर्डर दिया है कि, “जो बच्चियों से कंप्यूटर फ़ीस ली गयी है, वे उसे बहुत जल्द लौटाएं !” मगर, यहाँ तो अंधेर है... अभी-तक, यह फ़ीस लौटाई नहीं गयी ! साबू भाई, ज़रा उठिए और चलिए हमारे साथ बड़ी बी से मिलने...

साबू भाई – रहने दीजिये, जनाब ! अब वह चौदवी का चांद, बादलों की ओट में छुप गया है ! मेरे कहने का मफ़हूम यह है कि, बड़ी बी के दीदार होंगे नहीं ! काहे वक़्त बरबाद करते हैं, आप ? चलिए, आप भी बैठिये इस बेंच पर...और, आपसे एक शतरंज की बाज़ी हो जाय !

दुअरा वालेदान – [ख़िसियाता हुआ] – काहे की बाज़ी ? यहाँ तो ज़िन्दगी की बाज़ी लगी है, कमठे पर गए नहीं ! एक दिन की पगार मारी गयी, अब आप आज़ की पगार दे सकते हैं..क्या ? [दूसरे वालेदानों से] ये क्या चलेंगे, हमारे साथ ? नाम के मेंबर है, डवलपमेंट कमेटी के !

[सभी वालेदान, यहाँ से चले जाते हैं ! और घुस पड़ते हैं, फाटक खोलकर सीधे स्कूल में ! उनको स्कूल में दाख़िल होते देख, साबू भाई के लबों पर मुस्कान छा जाती है ! वे बरबस, कह उठते हैं !]

साबू भाई – वापस लौटकर आ जाना..मुंह लटकाए ! अब तो जो भी जाएगा, वापस आयेगा मुंह लटकाए ! उन्हें यों कहो तो ज़्यादा अच्छा, लौटकर बुद्धू घर को आये !

हाजी मुस्तफ़ा – [साबू भाई के बादशाह के सामने, अपना वजीर बढ़ाते हुए] – हुज़ूर को किश्त ! अब मुंह लटकाने की बारी, आपकी है !

[अब साबू भाई खिसियाकर रह जाते हैं, अब वे करे भी क्या ? उनका हाल “खिसियानी बिल्ली, खम्बा नोचे” जैसी बन गयी है ! इनको छोड़कर, सभी ठहाके लगाकर ज़ोर से हंस पड़ते हैं ! इन ठहाकों की गूंज़, अब सुनायी नहीं दे रही है ! और मंच पर, अँधेरा छा जाता है !]

नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” का अंक १३ राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित मंज़र ३ “आये थे फ़ीस वसूल करने, मगर यहाँ तो जेब के पैसे भी जाते रहेंगे !”

[मंच रोशन होता है, स्कूल का बरामदा दिखाई देता है ! बड़ी बी के कमरे के बाहर एक बेंच लगी है, उस पर ये आगंतुक बच्चियों के वालेदान बैठे हुए हैं ! आयशा के के बाहर जाने के कारण, कमरे के बाहर रखी टेबल पर इन्कामिंग फ़ोन रखा है ! अब शमशाद बेग़म सामने से इधर ही आती नज़र आती है, इसके दायें कंधे पर झाड़ू इस तरह रखा हुआ है जैसे कोई सिपाही कंधे पर बन्दूक उठाये, जंगाह की तरफ़ अपने क़दम बढ़ाता जा रहा हो ? अब उसे कमरे की सफ़ाई करने टी-क्लब के पास वाले कमरे में जाना है, मगर बीच में यह फ़ोन की घंटी ऐसी बजती है कि, बेचारी के क़दम रुक जाते हैं ! घंटी सुनकर, उसके दिल में ख़्वाब आता है, कहीं यह फ़ोन रशीद मियां का होगा तो फिर मुझे झूठ बोलने को मज़बूर होना होगा ! वह फ़ोन की तरफ़ क़दम न बढ़ाकर, गुस्से भरी लाल-लाल आँखों से बेंच पर बैठे वालेदानों को घूरती है ! दिल में एक ही ख़्याल उठता है, “आ जाते हैं कमबख़्त , इस बड़ी बी को परेशान करने ! अगर अभी बड़ी बी यहाँ आ गयी तो वह इन्हें देखकर, मुझे चाय बनाने का ऑर्डर देकर मेरा काम बढ़ा देगी ?” तभी फ़ोन की घंटी, आनी बंद हो जाती है ! उसके कंधे पर झाड़ू रखने की स्टाइल, और वलेदानों को लाल-लाल आँखों से गुस्से में घूरकर देखना ही इन वालेदानों को आंतकित करने के बराबर है ! उसके ऐसे व्यवहार से मानों ऐसा लग रहा है कि, “वह कमरे में सफ़ाई करने नहीं, बल्कि वह उनकी पिटाई करने के लिए ही इधर आ रही है ?” मानो ये बैठे सारे वलेदान उसकी नज़रों में इंसान न होकर, ख़न्नास नज़र आ रहे हो ? उसका ऐसा रुख़ देखकर, बेचारे वालेदान घबरा जाते हैं ! घबराकर एक वालेदान कह उठता है, अपने पास बैठे दूसरे वालेदान को !]

पहला वालेदान – [घबराकर, कहता है] – ओ..मेरे मोला ! ख़ुदा रहम..ख़ुदा रहम ! अरे भाई जान, यहाँ तो इस तरह आने वाले बासिंदों की ऐसे आवभगत होती है ! अब कभी फ़ीस माँगने, यहां नहीं आयेंगे ! ख़ुदा बचाए, ऐसी शैतान की ख़ाला से !

दूसरा वालेदान – [चिल्लाता हुआ, कहता है] – अरे ओ, मरियम के अब्बा ! क्यों, गला फाड़ रहे हो ? अल्लाह मियां महफ़ूज़ रखे, आपको ! अब तो जनाब, पानी सर पर आ गया...यहाँ का बिगड़ा हाल देखा नहीं जा रहा है ! ख़ुदा रहम, यह देखना नाक़ाबिले-बर्दाश्त है ! इन नामाकूल चपरासियों का दिमाग़, ठिकाने लगाना ही होगा ! अरे जनाब, आपसे क्या कहें ? ना तो इन लोगों ने चाय का पूछा, न पानी का ?

पहला वालेदान – [डरता हुआ, कहता] - ऊपर से यह कमबख़्त , झाड़ू से पीटने चली आ रही है..हमें ?

तीसरा वालेदान – इसका दिमाग़ दुरस्त कीजिये ना, किसने मना किया ? अभी फन्ने खां साहब को लेकर चलते हैं, कलेक्टर साहब के दफ़्तर ! इस बड़ी बी और इन मुलाज़िमों के खिलाफ़, दरख़्वास्त पेश करनी होगी ! फिर..

दूसरा वालेदान – फिर तो मियां, ज़रूर हम इनके हाथ के तोते उड़ते देखेंगे !

[अब फ़ोन की घंटी वापस बजती है, उसकी ट्रिंग-ट्रिंग की कटु आवाज़ शमशाद बेग़म के लिए सुनना नाक़ाबिले बर्दाश्त ठहरा ! वह झट झाड़ू नीचे आंगन पर पटककर, फ़ोन की ओर लपकती है ! और साथ में, वह बड़बड़ाती भी जा रही है !]

शमशाद बेग़म – [बड़बड़ाती हुई, कहती है] – ठण्ड के दिनों में बादाम-काजू का बना हलुआ खाओ ! बक-बक करके दिमाग़ में गर्मी बढ़ाना, तंदरुस्ती के लिए अच्छा नहीं है ! [झिड़कती हुई, वालेदानों से कहती है] चलिए हटिये, फ़ोन के नज़दीक बैठकर रास्ता रोक डाला ! ख़ुदा खैर करे, रशीद मियां का फ़ोन न होकर बड़ी बी का ही हो तो...

[वालेदानों के हट जाने के बाद, शमशाद बेग़म आगे बढ़ती है ! फ़ोन के निकट जाती हुई वह, रेशमिया का गाया हुआ फ़िल्मी नग़मा गाती है !]

शमशाद बेग़म – अभी बोलेगी, हमें “आ जा...आ जाओ मेरे घर [नग़म गाती हुई] “झलक दिखला...जा..एक बार आ जा..आ जा..आ जा..आ...जा झाड़ू लगा जा...एक बार आ जा आ जा आ...जा...!”

[शमशाद बी को गीत गाते देखकर, वालेदानों का गुस्सा गायब हो जाता है ! सबके लबों पर तबस्सुम फ़ैल जाती है ! अब एक वालेदान, ख़ाला से कहता है !]

एक वालेदान – ख़ाला ! क्या कहना है, आपका ? माशाअल्लाह, क्या गाती हैं..नग़मा ? यह नग़मा गाकर, आपने तो हमारे गुस्से को रुख़्सत कर डाला ! अब तो ख़ाला, आपको अपनी झलक बड़ी बी को दिखलानी ही होगी..हाथ में झाड़ू ली हुई यह अदा, ज़रूर दिखलाना !

दूसरा वालेदान – अरे बिरादर, झाड़ू नहीं इसे शमशीर कहो तो अच्छा रहेगा !

शमशाद बेग़म – [गुस्से में] – ख़ामोश ! नासपीटे, अभी दिखलाती हूं झलक...यह शमशीर चलाकर ! तू यहीं खड़े रहना, आती हूं अभी फ़ोन अटेंड करके !

मरियम के अब्बा – गुस्सा थूको, ख़ाला ! यह बेचारा नादान है, तुम तो फ़ोन का चोगा उठाओ ! बेचारी बड़ी बी मोबाइल लिए, थक गयी होगी ? आख़िर, अल्लाह जाने बेचारी अपने कोमल बदन को कैसे कष्ट दे रही होगी ?

शमशाद बेग़म – बड़े ख़ैरख़्वाह बने फिरते हो, बड़ी बी के ? कभी उसने सोचा, तुम्हारे बारे में ? दुर्दशा देखनी है तो मेरी देखो, इधर चक्कर आ रहा है..इधर है, सर-दर्द ! बुखार के मारे मेरी आँखें हो गयी है, लाल-सुर्ख़ ! मगर, करूँ क्या ? मेरी जैसी ग़रीब चपरासी के लिए बोलने वाला है, कौन ? ऐसी हालत में हर किसी का हुक्म, तामिल करते रहो..हाय, कैसी है मेरी मज़बूरी ? [जाकर फ़ोन का चोगा उठाती है, फिर कान के पास चोगा ले जाकर कहती है] हल्लू, कौन साहब बोल रहे हैं ?

टेलेफ़ोन से आवाज़ आती है – “साहब नहीं, ख़ाला ! ज़बान पर ज़ोर देकर कहिये, “बड़ी बी, मैं हाज़िर हूं, फ़रमाइए !”

शमशाद बी – [फ़ोन पर] – माफ़ करना, बड़ी बी ! ग़लती हो गयी, आगे से ध्यान रखूंगी !

आयशा – [फ़ोन से] – आप सब भूल जाया करती हैं, ख़ाला ! कल चाँद बीबी के साथ, हमने क्या कहलाया था ?

[शमशाद बेग़म कुछ न कहकर, पल्लू को लबों से दबाती हुई अपनी हंसी को रोकती है !]

आयशा – [फ़ोन से] - ज़बान तालू से चिपक गयी, क्या ? या न बोलने की कसम खा रखी है, ख़ाला ? क्या ज़माना आया है...? आप जैसी मोहतरमा को, ख़ाला जान ख़ाला जान कहते हमारी ज़बान नहीं थकती ! और आप जैसी आरिफ़ मोहतरमा को, हम मोहब्बत से बुलाते हैं...अफ़सरशाही को ताक में रखते हुए..मगर आप...?

शमशाद बेग़म – [फ़ोन पर] – गुस्ताख़ी माफ़ कीजिये, बड़ी बी ! पहले ज़रा हमारी दास्तान तो सुन लीजिएगा, एक बार ! कल फ़ज्र की नमाज़ के बाद, हमारे मियां के पेट में दर्द उठने लगा ! तब से उनकी ख़िदमत में लगी रही, फिर किसी तरह मैं आयी हूं स्कूल ! अब करूँ क्या, हुज़ूर ? नसीब ख़राब है, कल शाम को बेचारे दिलावर भाई को छुट्टी होने के बाद स्कूल के सभी कमरों के ताले जड़ने पड़े !

आयशा – [फ़ोन से] - तो फिर...चाँद बीबी ने आकर, आपको कहा नहीं ?

शमशाद बेग़म - [फ़ोन पर] – यही, बात...तसलीमात अर्ज़ करना चाहती हूं, हमारे रुख़्सत होने तक वह मोहतरमा आयी नहीं ! अब आप ही बता दीजिये, बड़ी बी ! हमारी मुलाक़ात, चाँद बीबी से कैसे होती ?

आयशा – [फ़ोन से] – अब छोड़िये, मेरी अम्मा इन बातों को ! अब आप यह बताएंगी कि, अब तो आपके दीदार हमें हो जायेंगे....? या फिर, आपके शौहर-ए-आज़म...

शमशाद बेग़म – [फ़ोन पर] – हुज़ूर ! शौहर तो पड़े हैं, बीमार ! वैसे भी वे भी मन-मर्ज़ी के मालिक हैं, आप समझ गयी होगी, वे ऐसे शाअबदा बाज़ [चमत्कारी, जादूगर] नहीं जो मुझे साईकल पर बैठाकर आपके दौलत खाने छोड़ दें !

आयशा – [फ़ोन से] – उनको बुलाती ही, क्यों ? आप ख़ुद आ जाएँ..

शमशाद बेगान – [फ़ोन पर] – कारण यह है कि, मुझे पैदल चलने से चक्कर आते रहते हैं ! मैं ठहरी, ब्लड-प्रेसर की मरीज़ ! जनाब, पैदल चलती हूं...तब पांवों में नाक़ाबिले बर्दाश्त दर्द उठता है, और इधर जनाब मेरा सर घनचक्करी की तरह घूमने लगता है ! उधर ये...हमारे शौहर...?

आयशा – [फ़ोन से] – सब देख लेंगे, आप ओटो में बैठकर तशरीफ़ लाइए ! अगर तबीयत ख़राब हो गयी तो, आप यहीं मेरे घर लेट जाना ! और क्या ? हकीम साहब को भी बुला लूंगी, घर जाते वक़्त आपके लिए ओटो या तांगे का इन्तिज़ाम भी कर लूंगी ! अब ठीक है ? मंजूर है, मेरी अम्मा ?

शमशाद बेग़म – [फ़ोन पर, रुंआसी आवाज़ में] – अब क्या कर सकती हूं, हुज़ूर ? आना तो होगा ही...आप अफ़सर हैं, और हम ठहरे आपके अदद मुलाज़िम ! आपको मालुम ही है, मेरी आदत है सुर्ती फांकने की..कभी सुर्ती फांकूगी, तो कभी उठकर पीक थूककर आऊंगी ! ख़ुदा खैर करे, यदा-कदा कभी पेट में मरोड़े उठ गए तो मुझे पाख़ाना भी जाना पडेगा !

आयशा – [फ़ोन से] – आप फ़िक्र न कीजिये, हमारे दौलत खाने में दो-दो पाख़ाने बने हैं, बस आप आ जाइए..अब मैं आगे कुछ भी सुनना नहीं चाहती ! [चोगा क्रेडिल पर, रखने की आवाज़ आती है !]

[शमशाद बेग़म चोगा क्रेडिल पर रखती है, सामने से तौफ़ीक़ मियां आते नज़र आते हैं !]

शमशाद बेग़म – [तौफ़ीक़ मियां की ओर देखती हुई, कहती है] – या अल्लाह ! ऐसा क्या मुलाज़िम बनाया, हमें ? जिसे अपने शौहर के साथ-साथ इन अफ़सरों को भी खुश रखना पड़ता है ! हम ठहरे शऊर वाले, इनके सामने बोल नहीं सकते...

[अब शमशाद बेग़म, टेबल पर रखी थैली और टिफ़िन उठाती है ! फिर, तौफ़ीक़ मियां को आवाज़ देकर बुलाती है ! तौफ़ीक़ मियां आते हैं, वह उनसे कहती है !]

शमशाद बेग़म – [तौफ़ीक़ मियां से] - हम चलें ख़िदमत करने, इन अफ़सर साहिबा की ! वापस लौटने का पत्ता नहीं, वापस कब आयें ? आप देखते रहना स्कूल को, अब क्या करना है ?

तौफ़ीक़ मियां – इस स्कूल को देखते हैं, रोज़ ! आज भी देख लेंगे, ख़ाला ! बदलती रहती है सियासत, मगर कोई फर्क नहीं पड़ता ! हम तो वहीँ खड़े रहेंगे, ख़ाला !

शमशाद बेग़म – [अपने-आप] – जहां कल खड़े थे, आज भी वहीँ खड़े हैं.... क्योंकि आप करते है सलाम, उगते आफ़ताब [सूरज] का !

[शमशाद बेग़म थैली और टिफ़िन लिए, चल देती है ! दीवार पर टंगी घड़ी, सुबह के दस बजने का वक़्त बता रही है ! अब इस बरामदे में दाऊद मियां आते नज़र आते हैं ! वहां बैठी मेडमें उनको देखकर, सलाम कहती है ! दुआ-सलाम करने के बाद मियां ख़ाली कुर्सी पर तशरीफ़ आवरी होते हैं !]

दाऊद मियां – [जेब से रुमाल बाहर निकालकर, ज़ब्हा पर छलक रहे पसीने को साफ़ करते हुए] – हाय परवरदीगार ! हम ठहरे, दफ़्तर-ए-निज़ाम, फिर भी हमें जाना पड़ता है डी.ई.ओ. दफ़्तर ! [जम्हाई लेते हुए] थक गया, यार तौफ़ीक़ मियां ! ज़रा आबेजुलाल लाना यार, इस हलक़ को तर कर लूं ! [पास बैठे वालेदानों से] हुजूरे आला ! आप सभी लोग, यहाँ कैसे तशरीफ़ लाये ?

एक वालेदान – जनाब ! बड़ी बी के इन्तिज़ार में बैठे हैं है, हम ! कब वह आये यहाँ, और हम उनसे कंप्यूटर फ़ीस की राशि वसूल करें ! बस हुज़ूर, यही हमारा मक़सद है ! आपसे इल्तज़ा है कि, आप...

दाऊद मियां – [हंसते हुए] – बड़े मियां, कुछ देर बैठिये हुज़ूर ! आपकी क़िस्मत अच्छी रही तो, बड़ी बी के दीदार आपको हो जायेंगे ! वैसे आप नहीं जानते हैं, बड़ी बी की फ़ितरत ? फ़ीस लौटाने की बात छोड़िये जनाब, वह तो आपकी जेब से...हज़ार-दो हज़ार रुपये टूर्नामेंट के चंदे के नाम वसूल कर लेगी !

दूसरा वालेदान – [उठते हुए] - उठो रे..., बिरादर ! यहाँ कहाँ फंस गए, बिरादर ? आये थे फ़ीस वसूल करने, मगर यहाँ तो जेब के पैसे भी जाते रहेंगे ! हाय अल्लाह ! क्या ज़माना आ गया, मियां ? सर मुंडाते ही ओले गिरे !

मरियम के अब्बा – [उठते हुए] – चलो रे...चलो ! वापस घर लौट चलें, अब तो लोग यही कहेंगे हमें देखकर कि, “लौटकर बुद्धू घर को आये !”

[सभी वालेदान, रुख़्सत होते हैं ! उनके जाने के बाद, दाऊद मियां के हंसी के ठहाके गूंज जाते हैं ! मंच पर, अँधेरा छा जाता है !]

कठिन उर्दू अल्फ़ाज़ के मफ़हूम –: [१] ग्राज़ल चश्म : मृगनयना, मृगलोचना, [२] मुख़्तलिफ़ : विभिन्न [अलग] , [३] बिसायत : जिस पर शतरंज के मोहरे जाते हैं, [४] आहूचश्म : मृगनयना, मृगलोचना, [५] दफ़्अतन : अचानक से, [६] सामाने ख़ुरोनोश : खाने-पीने का सामान, [७] लफ़्ज़ी इख्तिलाफ़ : ज़बानी लड़ाई, [८] नातिका : वाक शक्ति, [९] आरिफ़ : ज्ञानी, संत, [१०] शऊर वाला : विवेकी, ज्ञानी, शिष्ट, [११] ख़न्नास : शैतान !

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रचनाकार: हास्य नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” का अंक १३ - राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित
हास्य नाटक “दबिस्तान-ए-सियासत” का अंक १३ - राक़िम दिनेश चन्द्र पुरोहित
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रचनाकार
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